श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 201–210
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 201–210
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१४८ सुश्रुतसंहिता । विरेचनार्थं अधिक प्रयोग होता है । पत्र का तो कचित् प्रयोग है ।
कोशातकी सप्तला शङ्खिनी देवदाली कारवेल्लिका ।
चेत्युभयतोभागहराणि । एपां स्त्ररसा इति ॥ ५ ॥
उभयभागदोपहर द्रव्य -- कोशातकी, सप्तला, शङ्खिनी, देवदाली, करेला ये द्वन्य वमन तथा विरेचन द्वारा शरीर के ऊर्ध्व और अधोभाग के दोषों का हरण करते हैं । इनका स्वरस कार्य में लेना चाहिये ॥ ५ ॥
पिप्पलीविडङ्गापामार्ग शिशुसिद्धार्थकशिरीपमरिच-करवीर विम्चीगिरिकर्णिकाकिणिहीवचान्योतिष्मतीकर-लार्कालर्कलशुना तिविपाशृङ्गवेरतालीशतमालसुरसाऽर्ज-केङ्गुदीमेपशृङ्गीमातुलुङ्गीसुरगीपीलुजातीशालतालमधु-कलाक्षाहिङ्गुलवणमद्यगोशकृद्रसमूत्राणीति शिरोविरेच-नानि । तत्र, करवीरपूर्वाणां फलानि । करवीरादीना-मर्कान्तानां मूलानि । तालीशपूर्वाणां कन्दाः । ताली शादीनामर्जकान्तानां पत्राणि । इङ्गुदीमेपशृङ्गयोस्त्व-चः । मातुलुङ्गी सुरङ्गी पीलुजातीनां पुष्पाणि । शालता-मधूकानां साराः । हिङ्गुलाचे निर्य्यासौ । लवणानि पार्थिवधिशेपाः । मद्यान्यासुतसंयोगाः । शकृद्रसमूत्रे मलाविति ॥ ६ ॥
शिरोविरेचक द्रव्य - पिप्पली वायविडङ्ग, अपामार्ग, सह-जन, श्वेत सरसों, शिरीप, काली मरिच, कनेर, कुन्टरू, अपराजिता, कटभी, बचा, मालकानी, करअ, आऊ, श्वेत-पुष्प का आक, लहसुन, अतीस, सौंठ, तालीसपत्र, तमालपत्र, सुरसा ( तुलसी ), अर्जक ( तुलसी भेद ), इंगुदी, मेढासीद्गी, बिर्जेर का भेद, सुरही ( लाल सहजन ), पीलु, जाती ( चमेली ). साल वृक्ष, तादयृत, महुआ, लाख, हींग, लवण, मद्य, गोवर का रस और गोमूत्र ये शिरोविरेचक द्रव्य हैं । इनमें से कनेर से पहले कहे हुए द्वन्यों के फल लेवे तथा करवीर से आक तक के द्रव्यों की जडे और तालीश के पूर्व के द्रव्यों के कन्द्र तथा तालीस से अर्जक तक के द्रव्यों के पत्र, छुट्टी और पन्नी की छाल लेनी चाहिये, मातुलुङ्गी, सुरही, पीलु और जाति इनके पुप्प लेवे, माल, ताल और महुआ इनके लार भाग को लेवे, हिरु और लावा ये निर्यास ( गोंट ) के रूप में ग्रहण किये जाते हैं । लवण पार्थिव ( सनिज ) विशेष होते हैं । सन्धान करने से मद्य तैयार होते है । गोबर का रस और गोमूत्र ये मल हैं ॥ ६ ॥
संशमनान्यत कुत्रं वच्यामः तत्र, भद्रदारुकुष्ट-हरिद्रावरुणमेपश्शृङ्गीचलाऽतिबलार्तगलकच्छुरासल्लकी-कुबेराचीवीरतरुसहचराग्निमन्यवत्सादन्येरण्डाश्मभेद-काल कर्कशतावरी पुनर्नवावसुकवसिरकाञ्चनकभार्गीका -र्पासीवृश्चिकालीपत्तूरबदुययको लकुलत्थप्रभृतीनि । वि दारिगन्धादिश्च द्वे चाद्ये पञ्चमूल्यौ समासेन वात-संशमनो वर्गः ॥ ७ ॥
अब यहां से संशमनीय वर्ग की ओषधियों का वर्णन करते हैं । बान संशमन वर्ग देवदार, कुष्ठ, हरिद्रा, वरुण, मेढा-सीङ्गी, वला, अतिबला ( कंधी ), आर्तगल ( नीलपियावासा ), कौंच के बीज, सल्लकी, कुबेराची ( पाटला ), वीरतरु ( अर्जुन ), सहचरा ( पियावासा ), अरणी, वत्सादनी ( गिलोय ), एरण्ड, पाषाणभेद, श्वेत पुष्प का आक, आक, शतावरी, पुनर्नवा, वसुक ( मोलसीरी फूल ), वसिर ( सूर्यावर्त ), कच-नार ( डल्हण मत से धत्तूर ), भारंगी, वनकपास, बिच्छूटी, पत्तूर ( कुचन्दन ), वैर, यव, कोल ( झड़वेर ), कुलथी इत्यादि ओषधियां तथा पूर्वोक्त विदारीगन्धादिगण, आदि के लघु तथा बृहत्पञ्चमूल ये सब संक्षेप से वातसंशामक हैं ॥ ' चन्दनकुचन्दनह्रीवेरोशीर मञ्जिष्ठापयस्याविदारीश-तावरी गुन्द्रावल कहार कुमुदोत्पलकदलीकन्दलीदूर्वामू-र्वाप्रभृतीनि काकोल्यादिः सारिवाऽदिरञ्जनादिरुत्प-लादिर्न्यग्रोधादिस्तृणपञ्चमूलमिति समासेन पित्तसंश-मनो वर्गः ॥ ८ ॥
पित्तसंशमनवर्ग - श्वेतचन्दन, लालचन्दन, हीवेर ( बालक ), खस, मजीठ, क्षीरकाकोली, विदारीकन्द, शतावर, गुन्द्रा ( तृणभेद ), शैवल ( काई ), कल्हार ( श्वेत, नील या लाल कमल ), कुमुद ( श्वेतकमल ), उत्पल ( किञ्चिन्नीलकमल ), कन्दली ( पद्मवीज ), दूर्वा, मूर्वा इत्यादि ओपधियां तथा काकोल्यादिगण, सारिवादिगण, अञ्जनादिगण, उत्पलादि-गण, न्यग्रोधादिगण और तृणपञ्चमूल ये सब संक्षेप से पित्त-संशामक द्रव्य हैं ॥ ८ ॥
कालेयकागुरुतिलपर्णीकुष्ठहरिद्राशीत शिवशतपुष्पा-सरलारास्ना प्रकीर्योदकी गुदी सुमनःकाकादनीलाग-| लकीहस्तिकर्णमुखात कलामज्जकप्रभृतीनि वल्लीकण्टक-पञ्चमूल्यौ पिप्पल्यादिर्वृहत्या दिर्मुष्ककादिर्व चादिः सुर-सादिरारग्वधादिरितिसमासेन श्लेष्मसंशमनो वर्गः ॥ कफसंशमन वर्ग - कालेयक ( हरिचन्दन या पीतचन्दन ), अगर, तिलपर्णी ( लाल चन्दन ), कुए, हरिद्रा, शीतशिव कपूर या सेन्धा नमक या सौंफ ), सौंफ, सरला ( त्रिवृत् या राल का वृक्ष ), रास्ना, प्रकीर्यं ( पूतिकरअ ), उदकीर्य ( करक्ष ), होंगोट, चमेली, काकादनी ( गुक्षा ), कलिहारी, हस्तिकर्ण ( भूपलाश या रक्तैरण्ड ), मुआतक, क ( ससभेद ) आदि ओपधियां तथा वल्लीपञ्चमूल, कण्टक-पञ्चमूल, पिप्पल्यादिगण, वृहत्यादिगण, मुष्ककादिगण, वचा-दिगण, सुरसादिगण और आरग्वधादिगण यह संक्षेप से कफ का संशमन करने वाला वर्ग है ॥ ९ ॥
तत्र सर्वायेची पधानि व्याध्यग्निपुरुपबलान्यभि-समीक्ष्य विदध्यात् । तत्र, व्याधिबलादधिकमौषधमु-पयुक्तं तमुपशम्य व्याधिं व्याधिमन्यमावहति । अग्नि-बलादधिकमजीर्ण विष्टभ्य वा पच्यते । पुरुपबलाद्-धिकं ग्लानिमूच्छ मदानावति संशमनम् । एवं संशो-धानमतिपातयति । हीनमेभ्यो दत्तमकिञ्चित्करं भवति तस्मात्सममेव विदध्यात् ॥ १० ॥
उक्त सर्व प्रकार की ओषधियों को रोग, जठराग्नि और | रोगी इनके यल का विचार करके न्यूनाधिक मात्रा में प्रयुक्त
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श्रध्यायः ४० ] सूत्रस्थानम् । १४६ करनी चाहिये । यदि रोग के वल की अपेक्षा अधिक वल वाली ओषधि प्रयुक्त की जाय तो वह ओषधि पूर्व व्याधि को तो नष्ट कर देती है किन्तु अन्य व्याधि को उत्पन्न करती है । जठराग्नि की शक्ति से अधिक मात्रा या वल वाली औषध देने से अजीर्ण उत्पन्न करती है अथवा पेट में शूलादिक उत्पन्न करके देर से हजम होती है । रोगी के वल से अधिक मात्रा यावल वाली प्रयुक्त संशामक औषध ग्लानि, मूर्च्छा और मद उत्पन्न करती है । इस प्रकार से प्रयुक्त संशमन ओषधियां दोपवती होती हैं । संशोधन औषध भी रोग, अग्नि और रोगी के बल से अधिक प्रयुक्त करने पर रोगी को अधिक हानि पहुंचाती है । रोग, अग्नि तथा रोगी की शक्ति की अपेक्षा । अल्पमात्रा में दी हुई औषध निष्फल हो जाती है । इस लिये रोग, अग्नि तथा रोगी के वल के अनुसार ही औषध मात्रा की कल्पना करनी चाहिये ॥ १० ॥
विमर्शः — विष्टब्धलक्षणम् - विष्टब्धे शूलमाध्मान विविधा वातवे-दनाः । मलवाताप्रवृत्तिश्च स्तम्भो मोहोऽङ्गपीडनम् ॥ ( अ ० सं ० ) ।
भवन्ति चात्र-रोगे शोधनसाध्ये तु यो भवेद्दोषदुर्बलः ।
तस्मै दद्याद्भिषक् प्राज्ञो दोषप्रच्यावनं मृदु ॥ ११ ॥
संशोधन कर्म से साध्यरोग में यदि रोगी दोषों की उस्क-टता से दुर्बल हो गया हो तो उसे मतिमान् वैद्य दोषों को गिराने वाली मृदुवीर्यं युक्त रेचक और वामक ओषधियां देवे ॥
चले दोषे मृदौ कोष्ठे नेतात्र बलं नृणाम् ।
अव्याधिदुर्बलस्यापि शोधनं हि तदा भवेत् ॥ १२ ॥
स्वयं प्रवृत्तदोपस्य मृदुकोष्ठस्य शोधनम् ।
भवेदल्पबलस्यापि प्रयुक्तं व्याघिनाशनम् ॥ १३ ॥
दोष के अपने स्थान से चलायमान न होने पर तथा कोष्ठ के मृदु होने पर रोगी के शारीरिक बल का विचार नहीं करना चाहिये क्योंकि विना व्याधि के ( अर्थात् उपवासादि से ) दुर्बल हुये रोगी को भी उस समय संशोधन करना हित-कारी होता है । जिसके दोष स्वयं अपने स्थान से चलायमान हो गये हों तथा जिसका कोष्ठ मुलायम हो ऐसे भल्प वल वाले रोगी में भी प्रयुक्त संशोधक द्रव्य व्याधिनाशक होता है ॥
व्याध्यादिषु तु मध्येषु काथस्याञ्जलिरिष्यते ।
बिडालपदकं चूर्ण देयः कल्कोऽक्षसम्मितः ॥ १४ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने संशोधनसंशमनीयो नाम एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
औषध मात्रा - न्याधि, अग्नि तथा रोगी के बल के मध्यम होने पर क्वाथ का प्रमाण एक अञ्जलि ( ४ पल = १६ तोला ) होना चाहिये तथा चूर्ण का प्रमाण एक विडाल पदक ( १ कर्ष, १ तोलाभर ) होना चाहिये एवं कल्क का प्रमाण भी एक अक्ष ( एक कर्ष = १ तोला ) होना चाहिये ॥ १४ ॥
विमर्श: -- मध्य तु मान निर्दिष्ट स्वरसस्य चतुष्पलम् ॥ किन्तु शार्ङ्गधर ने स्वरस का प्रमाण भाषा पल ही लिखा है-स्वरसस्य गुरुत्वाच्च पलमर्थं प्रयोजयेत् । व्याध्यादिषु तु मध्येषु ॥ वस्तुतस्तु मात्रा की कोई निश्चित स्थिति नहीं है । मात्राया-नास्त्यवस्थानं व्यार्थि कोष्ठ वल वयः । आलोच्य देशकालौ च योज्या तद्वश्च कल्पना ॥ ( अ ० सं ० ) । इत्यायुर्वेदतत्त्वसन्दीपिकाभाषायां सूत्रस्थाने संशोधनसंशमनीयो नामैकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ३ ९ ॥ www चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः । अथातो द्रव्यरसगुणवीर्य्यविपाकविज्ञानीयमध्याय व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके अनन्तर ' द्रव्य - रस - गुण - वीर्य - विपाकविज्ञानीय ' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्शः - द्रव्यादिविज्ञानीय - द्रव्यादीना विशिष्ट शान तदधिकृत्य कृतोऽध्यायः । डाक्टरी में इसे फार्मेंकोलोजी ( Pharmacology ) कहते है । इस विभाग से ओषधियों की उपयोगिता सिद्ध होती है । जिन भोपधियों की उपयोगिता रस, गुण, वीर्य, विपाकादि से नहीं हो सकती है वैसी स्थिति में चरक तथा वाग्भट ने उनके लिये प्रभाव शब्द का प्रयोग किया है तथा सुश्रुत ने ऐसी औषधियों को अचिन्तनीय तथा अमी-मांस्य कहा है । अर्थात् ये ओषधियां किस तरह अपना कार्य करती हैं यह इनका प्रभाव है ऐसा माना है । द्रव्य - सादीन्यात्मा मनः कालो दिशश्च द्रव्यसग्रह. । ( चरक ) । यत्राश्रिता कर्मगुणाः कारण समवायि यत् तद् द्रव्यम् ( चरक ) । ' सर्व द्रव्यं पाञ्चभौतिकमस्मिन्नर्थे ' ( चरक ) । ओषधियों की पञ्चमहाभूतात्मक रचना द्रव्य है । डाक्टरी में द्रव्य को ओषधियों का सङ्गठन ( Composition of drugs ) कह सकते हैं । रस - रसनाग्राह्यो गुणो रस. ' ( नैयायिक ) । ' रस्यते आस्वाद्यते इति रस ' रसनार्थी रसः. ( चरक ) । जिह्वा अतिरिक्त अन्य स्थानों से भी रस का ज्ञान होता है जैसे कटु या कषाय रस का ज्ञान गला, आमाशय और त्वचा द्वारा । डाक्टरी में यद्यपि इन रसों की कल्पना नहीं है फिर भी व्यवहारतः तिक्त को ( Bitter ) कपाय को ( Astringent ) । तथा अम्ल को ( Aoid ) कह सकते हैं । वैद्यक में रस और अनुरस दो माने हैं । तत्र व्यक्तो रस स्मृतः । अव्यक्तोऽनुरसः किञ्चिदन्ते व्यक्तोऽपि चेष्यते । ( अ ० सं ० ) । व्यक्तः शुष्कस्य चादी च रसो द्रव्यस्य लक्ष्यते । विपर्ययेणानुरस ॥ ( चरक ) । गुणलक्ष-णन् --समवायी तु निश्चेष्ट कारण गुण । ( चरक ) । अथ द्रव्याश्रिता शेया निर्गुणा निष्क्रिया गुणाः ॥ ( कारिकावली ) । द्रव्याधय्यगुणवान् संयोगविभागेष्वकारणमनपेक्ष इति गुणलक्षणम् । ( वैशेषिकदर्शन ) । ' विश्वलक्षणा गुणा. ' इति रसवैशेषिकसूत्रम् । गुण - को फार्मेकोलो-जिकल एक्शन ( Pharmecological action ) कहते हैं । अर्थात् भोपधियों का शरीर पर रोगनाशन, स्वास्थ्यरक्षण एवं । बलवृद्धिरूपी जो कार्य होता है वह गुण है । यद्यपि गुणों की संख्या अनेक हैं तथापि आयुर्वेद में श्रीस गुण प्रसिद्ध है । गुरुमन्दहिमस्निग्धश्लक्ष्गसान्द्रमृदुस्थिरा । गुणा समूदनविशदा विंशति सविपर्ययाः ॥ इन्द्रियार्थं व्यवायी च निकासी चापरे गुणा । ( अ ० सं ० ) । चरक मे ४१ गुण माने है - साथ गुर्वा बुटि
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१५० सुनुतसहिता | प्रयाण राज्य ' गुणः प्रोक्ताळ, सर्ग, रूप, रस, गन्ध ये पञ्च इन्द्रियार्थं तथा गुरु, मन्द्रादि बीम सामान्य गुण, वुद्धि एवं इच्छा, छैन, मुन्ख, हुन्छ और प्रयत्न ये आत्मगुण और युक्तिय मुनरो स्वच । विपरि कः प्रोक्त प अर्थ गच्छ से मन के अर्थ भी गृहीन होते हैं —त्रिय विचार्य सुइद्ध छैन सदृस्यनैत्र च । यन्तिद्विन्नको हेयं तत्सर्वं धर्थमुदकम् । नन्ौन्नोऽर्थो बुढिगन्न चेन्द्रध्यान्न द्रव्य संग्रहः । ( सू.अ ८ ) । रोचक —कर भगवन्स या परिणति योगविभाग सत्तर: मुदुले इच्छाद्वेषौ प्रवा गुण -1 ( चै ० इ ० ) | वर्जन्— या यात्री हुन्ने चिन्नव नर्ग गेष्कृता किन । ' बैन कुन नीन् ( सुश्रुत ) । केनेनेि उसे बा, बिनकेन व प्रमाण, गुर्वादिपर इत्युनहिडने एकां क्रिगग मद्रसादिर्य ( चक्रपाणिदत्त ) इसक्रिमवधि के न्यूक्कर्तरि गुने बोईन् । शक्ति उत्यक्तिविशेषः खात् प्रभाव इत्यर्था । अर्थात् जो कार्य द्रव्य, रम, गुन और विपाक द्वारा न हो सकता हो वह चीर्य या | द्रव्याणामेकदेशेनापि व्यावयः साम्यन्ते, यथा - महा-। वृक्षचीरेणेति । तस्माद् क्रव्यं प्रधानम् | द्रव्यलचणन्तु ' क्रियागुणवत् समवायिकारणम् ' इति ॥ ३ ॥
कुछ आचार्य कहते हैं कि द्रव्य, रस, गुण, वीर्य और । विनात्रों में द्रव्य ही प्रधान है । क्रिम हेतु से द्रव्य प्रधान है? उत्तर नं ६ - द्रव्य रसगुणादि की अपेक्षा व्यवस्थित ( स्थिर या अपरिवर्तन शील ) होने से प्रधान है । क्योंकि इन्य व्यवस्थित होते हैं, रस, गुग, बीर्यादि स्थिर नहीं होते हैं जैसे कच् में जो जो अल्लादि रस होते हैं वे पक में नहीं रहते हैं क्योंकि उनकी जगह मधुरादिरस बन जाते हैं । नं. २- द्रव्य की प्रधानता-सिद्धि में दूसरा हेतु द्रव्यों के निन्य होने का देते हैं । द्रव्य नित्रय ही नित्य होते हैं किन्तु गुण आदि उसमें अनित्य होते है । जैसे द्रव्य के एक आदि विभाग होते हैं किन्तु उसके रसगन्धादि गुग कभी सम्पन्न ( अच्छे ) और कभी व्यापन्न ( विकृत ) होते हैं । नं ३ द्रव्य अपनी पार्थिवादि न स्थिर रहने से प्रवान है जैसे कि पार्थिवादि द्रव्य अन्य जलादि जाति में परिवर्तित नहीं होते हैं एवं शेष जल, तेज आदि द्वन्य भी अन्य जाति प्रभाव द्वारा हो जाता है । वीर्यनंदा ' – दुदीक्षागुरउवुस्निग्वरून्द्रियों में परिवर्तित नहीं होते हैं । नं १ - पांचों ज्ञाने-खोई नवम् वीर्यनष्टचि द्विविधमालिनः॥शांनोग निनि । ( त्र. सु. अ. २६ ) । गुग और वीर्य में मेड -यपि हरड़ और आंचले दोनों ने समान गुग होते हैं किन्तु दोनों के वीर्य । में भेद है । हरीतकी उष्मात्री तथा आंवले शीतवीर्य होते हैं । विपाक — काढले पनिना योगयदेखि रमाना सान्द्रे स विभक्रश्चनै स्तृद्र । ( वाग्मड ) । मेद्रा - त्रित्रिम । उच्चम वाढन्प्रत्रयुकन्छ । सानो रस, । निकीत करणारा विनाक हा १ ( अहृ.सू. ९ ) । ही विरात्रावित मश्रुम –न्यु · देते । अन्य प्रविन ण्डू पत्र मन्यन्ते दन्न - ब्यास बरु नान् षड् केचिचसांद्रम् | यह कदुन्नद्दिज्वल र चन्दनी दिन्छ । यति कुर्जी न निष्ठीवनि ॥ केचिद्वाचार्या क्रुब्ते - द्रव्यं प्रधानम् । कस्मात्? व्यवस्थितत्वात् · इ॒ह स्व॒लु द्रच्यं व्यवस्थितं न रसादयः, यथा मे फले ये रसाइचन्ने पक्के न सन्ति । नित्य-ताञ्च नित्यं हि द्रव्यमनित्या गुगाः यथाकादि -प्रविभागःः न एव नन्पन्नरसगन्धो व्यापन्नरसगन्धो भति । खजात्यवस्थानाच यथा हि पार्थिवं द्रव्यसन्यमारं न गृच्छुत्येयं शेषाणि । पञ्चेन्द्रियग्रह णाच, पञ्चभिरिन्द्रियैर्गृह्यते द्रव्यं न रसादूयः । आश्र याच्च द्रव्यमाश्रिता रसादयो भवन्ति । आर । म्भसामर्थ्याच्च द्रव्याश्रित आरम्भः चया - विदारिग-न्वादिमात्य सनु विपचेदित्येनादिषु न रसा-विष्कारम्भः । शान्र्प्रामाख्याच्च, शास्त्रे हि द्रव्य प्रवा-नमुपदेशे हि योगानां यथा - मातुलुङ्गाग्निमन्य चेत्यादौ न रसाइ उपदिश्यते । क्रमापेचितत्वाच्च रसा-दीनां, रमायो हि व्यक्रममपेचन्ते, यथा - तरुणे वरुण सम्पूर्ण सम्पूर्णा इति । एकदेशसाध्यत्वाच्च । के द्वारा ग्रहण किये जाने से हृन्य प्रधान है जैसे द्रव्यों को पांचों इन्द्रियों से जान सकते हैं किन्तु रस- गन्धादि गुण एक २ इन्द्रिय से ही जाने जाते हैं । नं -आश्रय ( आधार ) होने से द्रव्य प्रधान है क्योंकि रस, गन्ध आदि द्रव्य को ही जाति करके रहते हैं । नं ६ -सुहन, आहरण तथा योग का आरम्भ आदि द्रव्य से ही होता है अतः वही प्रधान है जैसे बिदारिगन्धादि राग के दृष्य को लेकर कूट के पकाये । इस तरह का रस, गन्धादि में कार्य नहीं किया जाता है । नं -- शान्त्र के प्रमाण से भी अन्य ही प्रधान है जैसे शाम्म्र में किसी भी योग के वर्णन में अन्य ही प्रधान माने गये हैं । जैसे ' मातुलुङ्गादि योग में मातुलुङ्ग, अनिमन्य आदि इन्यों के ही नाम लिखें हैं । रस-गन्वादिगुणों के नाम से किसी भी योग का उपदेश नहीं किया गया है । नं. ८ - इन्यों के क्रम ( स्थित्यन्तर ) के अनुरूप ही रसगन्धादि गुणों की उत्पत्ति का कम लपेचित होने से द्वय ही प्रधान है क्योंकि सुन्वादि द्रव्य के क्रम के । अनुसार चलते रहते हैं । जैसे वल्ग ( अपक ) द्रव्य में रसम्बादि भी तला ( अपक ) रहते हैं और सम्पूर्ण । ( परिपक्क ) द्रव्य में रसगन्धादि भी पूरी हो जाते हैं । नं. ९व्यों । के एक देश द्वारा सान्य होने से भी द्रव्य प्रधान हैं । हों के एक देश से भी व्याधियां ठीक हो जाती हैं, जैसे महावृ ( थूहर ) के दुग्ध से अनेक गुल्म, शूल, आध्मान, यकृद्ववृद्धि आदि रोग ठीक हो जाते हैं, इसलिये उपर्युक्त सर्वकारणों से द्रव्य ही प्रधान है । द्रव्य का लक्षण इस प्रकार का है— जिसमें क्रिया तथा गुण दोनों रहते हों तथा जो समवायी कारण हो उसे ' इज्य ' कहते हैं ॥ ३ ॥
विमर्श - त्रि - विद्याथ गुणा सन्त्यस्मिनि । समाविन्नरां उत्सनवेन कार्यमुल्यने, यथा नन्तवः पडत्य । नेत्याहुरन्ये | रसात्तु प्रधानम्: कस्मात्? आग • मान्, आगमो हि शास्त्रमुच्यतेः शाबे हि रसा अधि कृताः चया - रसायत आहार इति, तस्मिञ्च प्राणाः ।
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श्रध्यायः ४० ] सूत्रस्थानम् । १५१ उपदेशाच्च, उपदिश्यन्ते हि रसा:, यथा- मधुराम्ललवणा वातं शमयन्ति | अनुमानाच्च, रसेन ह्यनुमीयते द्रव्यं, यथा- मधुरमिति । ऋषिवचनाच्च, ऋपिवचनं वेदों यथा - किञ्चिदिन्यार्थ मधुरमाहरेदिति । तस्माद्रसाः
प्रधानम् । रसेषु गुणसंज्ञा । रसलक्षणमन्यत्रोपदे-क्ष्यामः ॥ ४ ॥
द्वन्य प्रधान नहीं है ऐसा अन्य आचार्य कहते हैं । उनका मत है कि सही प्रधान है । किस कारण से? नं १ - आगम प्रमाण । ' भागम ' शास्त्र को कहते हैं । शास्त्र में रसों ही को प्रधान माना है । जैसे रसों के आधीन आहार है तथा आहार के आधीन प्राण हैं । नं २ - उपदेश से भी रस प्रधान हैं । रसों का ही उपदेश किया जाता है जैसे मधुर, अम्ल और लवण रस वात का शमन करते हैं । नं. ३ - अनुमान से भी रस प्रधान है क्योंकि रसों ही के द्वारा द्रव्य का अनुमान होता है जैसे यह द्रव्य मधुर है । नं ४ - ऋषियों के वचन से भी रस प्रधान हैं । ऋपियों के वचन वेद हैं | जैसें यज्ञ करने के लिये कुछ मधुर लाओ, यहां पर द्रव्य का निर्देश न कर मधुर रस का ही वेद ने निर्देश किया है इसलिये उपर्युक्त सर्वकारणों से रस ही प्रधान होते है । रसों ही की ' गुण ' संज्ञा है । रस का लक्षण अन्य स्थान में कहेगे ॥ ४ ॥
नेत्याहुरन्ये । वीर्य्यं प्रधानमिति । कस्मात्? तद्व-शेनौषधकर्मनिष्पत्तेः । इहौषधकर्माण्यूर्ध्वाधोभागोभ-यभागसंशोधनसंशमनसङ्ग्राहकाग्निदीपनपीडनलेख-नबृंहणरसायनवाजीकरणश्वयथुकरविलयनदहनदारणमा-दनप्राणघ्नविपप्रशमनानि वीर्य्यप्राधान्याद्भवन्ति । तच्च वीद्विविधमुष्णं शीतं च, अग्नीपोमीयत्वाज्जगतः । केचिदष्टविधमाहुः– शीतमुष्णं स्निग्धं रूक्षं विशदं पिच्छिलं मृदु तीक्ष्णं, चेति एतानि वीर्याणि स्त्रबलगुणो-त्कर्षाद्रसमभिभूयात्मकर्म कुर्वन्ति । यथा तावन्महू-त्पञ्चमूलं कपायं तिक्तानुरसं वातं शमयति, उष्णवीर्य-त्वात्, तथा कुलत्थः कषायः, कटुकः पलाण्डुः, स्नेहभा-वाच । मधुरश्चक्षुरसो वातं वर्द्धयति, शीतवीर्यत्वात् । कटुका पिप्पली पित्तं शमयति, मृदुशीतवीर्यत्वात् अम्लमामलकं लवणं सैन्धवञ्च । तिक्ता काकमाची पित्तं वर्द्धयति, उष्णवीर्यत्वात्, मधुरा मत्स्याश्च । कटुकं मूलकं । श्लेष्माणं वर्द्धयति, स्निग्धवीर्यत्वात् । अम्लं कपित्थं
श्लेष्माणं शमयति, रूक्षवीर्यत्वात् 3 मधुरं क्षौद्रञ्च ।
तदेतन्निदर्शनमात्रमुक्तम् ॥ ५ ॥
भन्य आचार्य कहते है कि रस भी प्रधान नहीं है, वीर्य tara | कारण से? उत्तर - वीर्य की अधीनता ही से ओषधियों का रोगनाशनादि कार्य होने से जैसे इस शास्त्र ओषधियों के भिन्न भिन्न कार्य, यथा ऊर्ध्वभाग का वमन द्वारा संशोधन, अधोभाग का विरेचन द्वारा संशोधन, उभय भाग संशोधन, संशमन, संग्राहक, अग्निदीपन, प्रपीडन, लेखन, बृंहण, रसायन, वाजीकरण, श्वयथु ( शोथ ) हर, श्वयथुविलयन, दहन, दारण, मादन, प्राणनाशन तथा विप-प्रशमन आदि भोपधियों का कर्म वीर्य की प्रधानता से ही होते हैं । यह वीर्य उष्ण और शीत ऐसे दो समस्त संसार भी आग्नेय और सौम्य ( से ही बना है । कुछ लोग वीर्य को आठ जैसे शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, विशद, तीक्ष्ण । उक्त द्विविध या अष्टविध वीर्य स्कर्ष से रस को पराजित करके स्वकार्य त्पञ्चमूल ' रस में कपाय तथा अनुरस में उष्णवीर्य होने से वात का सशमन कषायानुरस कुलत्थ उष्णवीर्य होने से प्रकार का है क्योंकि जल ) द्विविध तत्त्वों प्रकार का मानते हैं पिच्छिल, मृदु और अपने चल के गुणो-करते हैं । जैसे ' बृह-तिक्त होता हुआ भी करता है । इसी तरह एवं कटुकरस वाला प्याज स्निग्धवीर्य होने से वायु का शमन करता है । इनु ( गन्ने ) का रस मधुर होता हुआ भी शीतवीर्य होने से ' दायु को बढाता है । कटुक रस वाली पीपल मृदु शीतवीर्य होने से पित्त को शान्त करती है । अम्ल रस युक्त भांवला और लवण रस युक्त सैन्धव नमक शीतवीर्य होने से पित्त का शमन करते है । तिक्तरस युक्त मकोय उष्णवीर्य होने से पित्त को बढ़ाती है । इसी प्रकार मत्स्य मधुर रसवती होने पर भी उष्णवीर्य होने से पित्त को बढ़ाती है । मूली कटु रस वाली होती हुई भी स्निग्धवीर्या होने से कफ को बढ़ाती है । अम्ल रस युक्त कपित्थ रूक्षवीर्य होने से श्लेष्मा को शान्त करता है तत् मधुर रस युक्त मधु ( शहद ) भी रूक्षवीर्य होने से कफ को शान्त करता है । इस तरह वीर्य के विषय में यह निदर्शन-मात्र कहा है ॥ ५ ॥
1. भवन्ति चात्र-ये रसा वातशमना भवन्ति यदि तेषु वै ।
रौक्ष्यलाघवशैत्यानि न ते हन्युः समीरणम् ॥ ६ ॥
ये रसाः पित्तशमना भवन्ति यदि तेषु वै ।
तैक्ष्ण्यौष्ण्यलघुताश्चैव न ते तत्कर्मकारिणः ॥ ७ ॥
' ये रसाः श्लेष्मशमना भवन्ति यदि तेषु वै ।
स्नेहगौरवशैत्यानि न ते तत्कर्मकारिणः ॥ ८ ॥
तस्माद्वीर्यं प्रधानमिति ॥ ६ ॥
इस विषय में अन्य भी कहा है यथा जो रस बात के संशामक है यदि उनमें रूक्षता, लघुता और शीतता हो तो वे बात का शमन नहीं करते हैं । इसी तरह जो रस पित्त के संशामक हैं उनमें यदि तीक्ष्णता, उष्णता और लघुता हो तो वे रस पित्त को शान्त नहीं करते है । जो रस कफशामक है यदि उनमें स्निग्धता, गुरुता और शैत्य हो तो वे कफ का
शमन नहीं करते हैं । इस हेतु से वीर्य ही प्रधान है ॥ ६ - ९ ॥
विमर्शः -- रसा. स्वाद्वम्ललवणतिक्तोषणकपायकाः । तत्राचा मारुत घ्नन्ति त्रयस्तिकादय कफम् । कपायतिक्तमधुराः पित्तमन्ये तु कुर्वते ॥ ( अष्टाङ्गहृदय ) । नेत्याहुरन्ये । विपाकः प्रधानमिति । कस्मात्? सम्य मिथ्याविपाकत्वात् । इह् सर्वद्रव्याण्यभ्यवहृतानि सम्यमिध्याविपक्कानि गुणं दोपं वा जनयन्ति ॥१० ॥
अन्य आचार्य कहते हैं कि द्रव्य, रस और वीर्य इनमें से
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सुश्रुतसंहिता | कोई भी प्रवान नहीं है । उनका कथन है कि विपाक हो । और कटु विपाक ल्यु होता है । पृथिवी, बल, तेज, वायु और प्रधान है । चित्र हेतु से? चर - सब हस्यों का योग्य अथवा व्याकाश इन पञ्चमहाभूतों के गुणों के साव से गुस्ता और मिय्या विनात्र होने से, क्योंकि आहारादि रूप में ग्रहण किये । बुवा ऐसे दो भेद होते हैं । इनमें पृथिवी और जल गुरु होते ( ख ) हुये सर्व द्रव्य सम्यन् जयवा मिव्या रूप से चिरक हो ही गुन या दोषों को उत्पन्न करते हैं ॥१० ॥
तत्राहुरन्ये -प्रतिरसं पाक इति । केचित्त्रिविव-मिच्छन्ति मधुरमन्तं कटुकं चेति । वचु न सम्यक्, भूनगुन्यागमाच्चान्येोऽन्तो त्रिपाको नास्ति । पित्तं हि त्रिग्वनन्तनामुपैत्यग्नेर्मन्दत्तान् । यद्येवं लवगोऽस्य न्यः पात्रो भविज्यति, इलेप्मा हि विदुग्यो लवगवानु-पैनीति ॥। ११ ॥ विनाक के नेत्रों के विनन में कई अन्य आचार्य कहते हैं निरस पात्र होता है यदि मनुरादि र ६ होने से उनके विराक के भी मेद्र होते हैं । कुछ आचार्य नवुर, अम्ल और कटुक ऐसे तीन प्रकार के विपाक नानते हैं किन्तु यह मंत्र नहीं है क्योंकि पन्हान्तों के गुगों से और नागन ( चाल ) से अन्य अन्य विशक सिद्ध नहीं देता है । केवल कतिको मन्ता होने से चित्र होकर वा को प्रात देता है वह विपाक नहीं है । यदि ऐसा ही मान लिया जाय तो भैया भी मानना पड़ेगा क्योंकि पिच को तरह कप भी विदग्ध होकर लगता को प्राप्त होता है ॥१ ॥
नबुरो नघुरत्गन्तोऽन्तस्यैः सर्वेषामिति केचि • दाहुः । दृष्टान्तं चोपदिशन्ति च्या तावन् भीरमुखागतं पच्यमानं मधुरनेव स्यात्तथा शालिचत्रमुद्रादयः प्रकीर्गाः मात्रमुत्तरकापि न परित्यजन्ति वदिति ।
केचिदन्ति अन्दो बलत्रतां वशमायान्तीति ।
एवमनस्थितिः तस्मादसिद्धान्व एकः ॥ १२ ॥
अन्य बचाने कहते हैं कि नहर रस का विपाक नपुर और रस का विराट इस तरह भी ( हाँ ) रसों का वही पात्र होता है । इस विषय में देते हैं कि सेना ( पान ) में पका हुआ दुग्ध प्रारम्भ से अन्त तक नहर ही रहता है हुसी तरह चावल, यत्र और मूंग खेत में बोने पर उ रित होकर बढ़ने और पहने तन्तु में नी हैं तथा गैप तेज, वायु और नाकाम लघु होते हैं इस लिये विपाक भी दो ही प्रकार का होता है ॥ १३ ॥
भवन्ति चात्र-द्रव्येषु पच्यमानेषु चेष्वस्पृथित्रीगुणाः ।
निर्वर्तन्तेऽविकास्तत्र पाको मधुर उच्यते ॥ ११ ॥
तेजोऽनिलाकाशगुणाः पच्यमानेषु येषु तु ।
निर्वर्तन्तेऽवितत्र पाकः कटुक उच्यते ॥ १५ ॥
इस विजय ने कहा है कि जिन पच्यमान इव्यों में पृथिवी । और बल के गुणों की बहुलता होती है उनमें मर पात्र होता है और जिन पच्यमान वृज्यों में तेज, वायु और लाकान के गुगों की बहुलता होती है उनमें कटुविपाक होता है ॥१४- १५
पृयक्त्वदर्शिनानेत्र वादिनां वादसङ्ग्रहः ।
चतुर्गामपि सामप्रथमिच्छन्त्यत्र विपश्चितः ॥१६ ॥
पृथक् पृथक् द्रुल्य, रस, गुग वीर्य, विपाक का प्राधान्य मानने वाले विवादी आचायों के बादविवाद का संग्रह ऊपर दिखा दिया है । इस विनय में विद्वान् मनुष्य रस, गुग, वीर्य और विराक इन चारों के समुदाय को प्रधानरूप से स्वीकार करते हैं ॥ ६६ ॥
तद् द्रव्यमात्मना किञ्चित्किञ्चिग सेवितम् ।
। किञ्चिद्रसविपाकाभ्यां दोषं हन्ति करोति न ॥ १७ ॥
वस्तुतस्तु कुछ द्रव्य अपनी लाग्ला या हव्यात सामर्थ्य से, कुछ वीर्य के सामर्थ्य से कुछ रस और विपाक के सामर्थ्य से दोषों को नष्ट करते हैं लयत्रा दोष - प्रकोपण करते हैं ॥१० ॥
विमर्श में शरीर पर द्रव्यों का जो रोगनादान-रूपी या रोगवृद्धि कभी कार्य होता है वह नृव्य के रस, वीर्य, विनाक इनके निक्ति सामर्थ्य से होता है । चरक तथा वाग्मिव भी इसी मन को मानते हैं - ब्रिकुन्दे कर्मच रम् । द्रव्यं गुरोग के प्रोन हि ॥ रमुत्रीयंत्रगकादीनां बन? उच्यतेच्चद् द्रव्ये रसानां बलवत्वेन अपने स्वभाव ( रूरूप ) का परित्याग नहीं करते हैं दसीले दिउँ प्रकार रस भी पकने पर अपने न्वभाव को नहीं होते हैं ॥ दिनहगुनसंयोगे कुछ आचार्य कहते हैं कि इन रसों में जो बलहीन होते हैं वे द्वान् खोनि डगिकं प्रमदात् व्यमेतेि ॥ बळ्वान् के वश में हो जाते हैं । इस तरह सर्व व्यवसायं कटते व्टम् । स्वीर्यवानां स्थित है । इसलिये तीन रस मानना यत्रा ६ र मानना कोई विद्वान् या शानभाग नहीं है ॥ १ ९ ॥ आगने हि द्विविध एक पाको मधुरः कटुक्य । तयोर्नघुरायो गुरुः काल्यो लघुरिति । तत्र पृथि -व्ययेोगाच्चानां द्वैविव्यं भवति गुसावर्म्याद्
गुरुता लघुना च । पृथिव्यापञ्च गुर्भ्यः शेषागि लबूनि ।
तरमा द्विविध एक पात्र इति ॥ १३ ॥
लगन ( आयुर्वेद आत्र ) में मर और कट्ट ऐसे दो ही प्रकार के पाक होते हैं । चनमें से मधुर विपाक गुरु होता है ॥ चितृतः । | प्रयोः पवनः संत्रा, चिन्तनकोनां धरने रोगनिवृतिः । दन्त्री रोग सम्बेदन्दी चिन्तन्ते तु रे । 1 ( चरक ) । पात्रो नास्ति विना वीर्याद्वीच्यं नास्ति विना रसात् । रसो नाति बिना द्रव्याद् द्रव्यं श्रेष्टतमं रसृवम् || १८ | ] वीर्य के बिना पात्र नहीं, रस के बिना वीर्य नहीं एवं आधारभूत इच्य के बिना रस की उत्पत्ति नहीं होती इसलिये । इम्य को ही अधिक श्रेष्ठ या प्रधान समझना चाहिये ॥ १८ ॥
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अध्यायः ४१ ] सूत्रस्थानम् । १५३
जन्म तु द्रव्यरसयोरन्योऽन्यापेक्षिकं स्मृतम् ।
अन्योऽन्यापेक्षिकं जन्म यथा स्याद् देहदेहिनोः ॥ १६ ॥
वीर्य्यसंज्ञा गुणा येऽष्टौ तेऽपि द्रव्याश्रयाः स्मृताः ।
रसेषु न भवन्त्येते निर्गुणास्तु गुणाः स्मृताः ॥ २० ॥
द्रव्ये द्रव्याणि यस्माद्धि विपच्यन्ते न पडूसाः ।
श्रेष्ठं द्रव्यमतो ज्ञेयं, शेषा भावास्तदाश्रयाः ॥ २१ ॥
द्वन्य और रस का जन्म एक दूसरे के आश्रित है जिस तरह देह ( शरीर ) और देही ( आत्मा ) का जन्म ( आवि-र्भाव ) एक दूसरे के आधीन होता है । इसी तरह वीर्यसज्ञक आठों गुण भी द्रव्य के ही आश्रित होते है । रसों के अन्दर ये वीर्यज्ञक गुण नहीं रह सकते हैं क्योंकि गुण के लक्षण में यह बताया है कि गुण गुण में नहीं रहते हैं । पाञ्चभौतिक इस द्रव्य ( शरीर ) में औषधीय अथवा आहारोपयोगी द्रव्य ही पकते हैं न कि पड्स अथवा वीर्यादि अत एव [ द्वव्य को ही श्रेष्ठ या प्रधान मानना चाहिये तथा शेष अन्य भाव अर्थात् रस, गुण, वीर्य, विपाकादि उस द्रव्य के ही आश्रित हो कर रहते हैं ॥ १ ९ -२१ ॥ विमर्श वस्तुनो द्रव्येष्वेव गुगा भवन्ति, साहचर्याश्च रसगुणा उच्यन्ते - गुर्वादयो गुणा द्रव्ये पृथिव्यादौ साश्रये । रसेषु व्यपदिश्यन्ते । साहचर्योपचारत ॥ ( वाग्भट सू ० अ ० ९ ) रसों की गुण संज्ञा है ( रसेषु गुणसंज्ञा इति थुन. ) तथा गुण स्वयं निर्गुण होते हैं - अथ द्रव्याश्रिता ज्ञेया निर्गुणा निष्क्रिया गुणा ॥ अत एव जो रसों के शीतादिगुण कहे हैं वे द्वन्य के ही गुण हैं - गुणा गुणाश्रया नोक्तास्तस्माद्वसगुणान् भिषक् । विद्याद् द्रव्यगुणान् कर्तुरभिप्रान: पृथग्विधः ॥ ( च ० सू ० अ ० २६ ) ।
अमीमांस्यान्यचिन्त्यानि प्रसिद्धानि स्वभावतः ।
आगमेनोपयोज्यानि भेषजानि विचक्षणैः ॥ २२ ॥
प्रत्यक्षलक्षणफलाः प्रसिद्धाय स्वभावतः ।
नौषधीर्हेतुभिविद्वान् परीक्षेत कथञ्चन ॥ २३ ॥
सहस्रेणापि हेतूनां नाम्बष्ठादिर्विरेचयेत् ।
तस्मात्तिष्ठेत्तु मतिमानागमे न तु हेतुषु ॥ २४ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने द्रव्यरसगुणवीर्यविपाक-विज्ञानीयो नाम चत्वारिशत्तमोऽध्यायः ॥ ४० ॥
अपने स्वभाव से प्रसिद्ध ओषधियों ( खदिर, तुवरक, रसा-अन, हरिद्रादि कुष्ठनाशक ) के विषय में कोई मीमांसा ( तर्क वितर्क, यह ऐसी है या नहीं आदि ) या चिन्तन नहीं करना । चाहिये किन्तु विद्वान् वैद्य उन्हें जैसा आगम ( शास्त्र ) ने आज्ञा दे रखी है तदनुसार प्रयुक्त करे । जिन ओषधियों के लक्षण और फल प्रत्यक्ष हों तथा जो स्वभाव से ही प्रसिद्ध हों उन ओषधियों को विद्वान् वैद्य किसी भी प्रकार तर्कवितर्क से नहीं परखे । हजारों तर्क वितर्क रूपी हेतुओं से भी अम्बष्टा ( पाठा ) आदि ओषधियों का विरेचनकर्तृत्व सिद्ध नहीं किया जा सकता है अत एव मतिमान् वैद्य आगम ( शास्त्र ) में विश्वास करे । हेतु या तर्क से उनका गुणधर्म या प्रयोग न करे ॥ विमर्शः — ओषधियों के वैद्यकीय उपयोगों की मीमांसा २० सु ० अथवा उपपत्ति उनके पञ्चमहाभूतात्मक सङ्गठन, रस, गुण, चीर्य और विपाक के द्वारा की जाती है किन्तु खदिर, तुवरक, विपमणि आदि द्रव्यों के उपयोग की उपपत्ति उनके रसादि द्वारा ज्ञात न होने पर उन्हें अचिन्त्य या अमीमांस्य मान लिया है किन्तु ' चरक ' और ' वाग्भट ' ने द्रव्यों के इस अचिन्त्य शक्ति को ही प्रभाव मान लिया है । रसादिसाम्ये यत्कर्म विशिष्टं तत्प्रभावजम् । ( अ ० सं ० सू ० भ ० १७ ) डाक्टरी में ओषधियों के उपयोगों की मीमांसा उपलब्ध वैज्ञानिक तरीकों से की जा सकती है उन्हें ' मीमांस्य ' ( Rational ) तथा जिनकी मीमांसा न की जा सके उन्हे ' अमीमांस्य ' ( Empherical ) कहते है । जैसे मलेरिया में Qainine, T. B के लिये स्वर्ण अमीमांस्य हैं । इत्यायुर्वेदतत्त्वसंदीपिकाभापायां द्रव्यरसगुणवीर्यविपाक-विज्ञानीयो नाम चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४० ॥
एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ।
अथातो द्रव्यविशेषविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके अनन्तर ' द्रव्यविशेषविज्ञानीय ' नामक अध्याय का वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने । सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १–२ ॥ तत्र, पृथिव्यप्रेजोवाय्वाकाशानां समुदायाद् द्रव्या-भिनिर्वृत्तिः, उत्कर्पस्त्वभिव्यञ्जको भवति इदं - पार्थिव-मिदमाप्यमिदं तैजसमिदं वायव्यमिद्माकाशीर्यामतिः ॥ द्रव्योत्पत्ति — पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पांचों तत्वों के मिलने से द्रव्य की उत्पत्ति होती है । इन पांचों के समुदाय में से जिस भूत के गुणों की उत्कृष्टता होती है उसी से वह द्रव्य पहचाना जाता है जैसे यह ' पार्थिव ' है, यह ' जलीय ' है यह ' तेजस ' द्रव्य है यह ' वायव्य ' द्रव्य है और यह ' आकाशीय ' द्रव्य है ॥ ३ ॥
विमर्श: - कार्यरूपी द्रव्य पञ्चमहाभूतात्मक हैं - इह हि द्रव्य पञ्चमहाभूतात्मक, तस्याधिष्ठान पृथिवी, योनिरुदक, खानिला-नलसमवायान्निर्वृत्तिविशेषौ ॥ ( अ ० सं ० ) । प्रायः प्रत्येक द्रव्य में थोड़ी बहुत मात्रा में ' पञ्चमहाभूत ' रहते हैं और जिसमें जिस भूत के गुणों का आधिक्य हो उसका उसी भूत के नाम से व्यपदेश करते हैं-- ' व्यपदेशस्तु भूयसा ' । तत्र, स्थूलसारसान्द्रमन्दस्थिरखरगुरुकठिनगन्ध-बहुलमीषत्कपायं प्रायशो मधुरमिति पार्थिवम् । तत् स्थैर्य्यबलगौरवसङ्घातोपचयकरं विशेषतञ्चाधोगतिस्व-भावमिति ॥ ४ ॥
पार्थिव द्वन्य- इनमें जो स्थूल, सार ( दृढता ) युक्त, सान्द्र ( ठोस ), मन्द, स्थिर, गुरु ( भारी ) तथा कठिन हो तथा गन्ध की जिसमें अधिकता हो एवं कुछ कपाय और प्रायः मधुर रस का आधिक्य हो उसे ' पार्थिव ' द्रव्य समझना चाहिये । वह शरीर की स्थिरता, बल, गुरुता, कठिनता और वृद्धि को करता है तथा विशेषकर उसे ऊचा फेंकने पर भी नीचे गिरने ( गति करने ) का स्वभाव वाला होता है ॥ ४ ॥
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१५४ सुश्रुतसहिता । विमर्श: - गुलदाकर्षण नियम ' से पार्थिव पदार्थ नीचे । गिरते हैं । शीतस्तिमितस्निग्धमन्द्गुरुसरसान्द्रमृदुपिच्छिलं रसबहुलमीपत्कपायाम्ललवणं मधुररसप्रायमाप्यम् तत् स्नेहनह्लादनक्लेदनवन्धनविष्यन्दनकरमिति ॥ ५ ॥
जलीय द्वन्य - ठंडा, गीला या लढ, चिकना, मन्द, भारी, फैलने वाला, सान्द्र, मृदु, पिच्छिल, अधिक रसदार, कुछ कषाय, अम्ल और लवण रसों से युक्त तथा अधिक मधुर रस वाला ' जलीय ' द्रव्य होता है । जलीय द्रव्य शरीर में स्नेहन, तर्पण, गीला करना, चूर्णादि का पिण्डीकरण ( बांधना ) और विस्रावण करता है ॥ ५ ॥
उष्णतीच्णसूक्ष्मरूनखरलघुविशदं रूपगुणबहुलमी-षदुम्ललवणं कटुकरसप्रायं विशेषतचोर्ध्वगतिस्वभाव-मिति तैजसम् । तद्दहनपचनदारणतापनप्रकाशनप्रभा -वर्णकरमिति ॥ ६ ॥
वैनस द्रव्य -- गरम, तीचग, सूक्ष्म, रूक्ष, सरदरा, लघु और विशद ( स्वच्छ ) होता है तथा रूपगुणाधिक्ययुक्त, कुछ अम्ल और लवणरसयुक्त किन्तु कटुक रस की अधिकता से युक्त तथा विशेषकर ऊपर को गति करने वाला ' तेजस ' पदार्थ होता है । वह दहन, पचन, दारण, तापन, प्रकाशन, प्रभा और वर्ण को करता है ॥ ६ ॥
सूक्ष्मरूत्तखरशिशिरलघुविशदं स्पर्शबहुलमीष । त्तिक्कं विशेषतः कषायमिति वायवीयम् । तद्वैशद्यलाघव-ग्लपनविरूक्षणविचारणकर मिति ॥ ७ ॥
वायवीय दृष्य — जो पदार्थ सूक्ष्म, खर, शिशिर, हलका, विशट, स्पर्शगुण की अधिकता वाला, कुछ तिक्त और विशेष तया कपायरसयुक्त हो वह ' वायवीय ' द्रव्य है । वह शरीर में वैशद्य, लाघव, ग्लानि या अवृप्यत्व, रौच्य और मन में अनेक कल्पना करता है ॥ ७ ॥
श्लक्ष्णसूक्ष्ममृदुव्यवायिविशदविविक्तमव्यक्तरसं शब्दबहुलमाकाशीयम् । तन्मादवशौधिर्य्यलाघवकरमिति आकाशीय द्रव्य — जो पदार्थ चिकना, सूक्ष्म, मृदु, व्यवायी, विशद, विविक्त ( अवयव रहित ), अन्यतरस,
शब्द गुण की अधिकता से युक्त हो वह ' आकाशीय ' द्रव्य है ।
यह द्रव्य देह में मार्दव, छिद्रता और लघुता करता है ॥ ८ ॥
अनेन निदर्शनेन नानौपघीभूतं जगति किञ्चिद् द्रव्यमस्तीति कृत्वा तं तं युक्तिविशेषमर्थं चाभिसमीक्ष्य स्त्रवीर्य्यगुणयुक्तानि द्रव्याणि कार्मुकाणि भवन्ति । तानि यदा कुर्वन्ति स कालः, यत्कुर्वन्ति तदधिकरणं, यथा कुर्वन्ति स उपायः, यन्निष्पादयन्ति तत् फलमिति ॥ प्रमाण से संसार में कोई भी द्रव्य ओपधि से भिन्न नहीं है ऐसा मानकर भिन्न भिन्न युक्तिविशेष और अथा ( प्रयोजनों ) का ठीक तरह से विचार कर प्रयुक्त किये हुये अपने वीर्य और गुणों से युक्त द्रव्य रोगनाशनरूपी कार्य करने में समर्थ होते हैं । वे द्रव्य नव कार्य करते हैं उसे ' काल ' कहते हैं, जो कुछ करते हैं वह ' कर्म ' है, जिसकी शक्ति या प्रभाव से करते हैं उसे ' वीर्य ' कहते हैं, जहां करते हैं उसे ' अधिकरण ' ( कार्यकरण स्थान ) कहते हैं, जिस प्रकार करते हैं वह ' उपाय ' है और परिणामरूप से जो कुछ बन जाता है या हो जाता है उसे ' फल ' कहते हैं ॥ ९ ॥
विमर्श - अमन्त्रमक्षर नास्ति नास्ति मूलमनौषधम् । अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभ ॥ तत्र, विरेचनद्रव्याणि पृथिव्यम्वगुणभूयिष्टानि, पृथिव्यापो गुर्व्यस्ता गुरुत्वादघो गच्छन्ति, तस्माद्वि-रेचनमधोगुणभूयिष्ठमनुमानात् । यमनद्रव्याण्यग्निवा-गुणभूयिष्टानि, अग्निवायू हि लघू, लघुत्वाच्च तान्यू-र्ध्वमुत्तिष्ठन्ति, तस्माद्वमनमप्यूर्ध्वगुणभूयिम् । उभ-यगुणभूयिष्ठमुभयतोभागम् । श्राकाशगुणभूयिष्ठं संश-मनम् । सामाहिक मनिलगुणभूयिष्ठम्, अनिलस्य शोषणात्मकत्वात् | दीपनमग्निगुणभूयिष्ठं ( तत्समा-नत्वात् ) । लेखनमनिलानलगुणभूयिष्ठम् | बृंहणं पृथि
व्यम्बुगुणभूयिष्ठम् । एवमौपधकर्माण्यनुमानात्साघयेत् ॥
उनमें से जो विरेचक द्रव्य हैं उनमें पृथिवी और जल के गुणों की अधिकता रहती है क्योंकि पृथिवी और जल दोनों भारी होते हैं जिससे उनका किसी भी वस्तु को अपने साथ नीचे लेजाने का स्वभाव होता है इसलिये अनुमान से यह कहा जाता है कि विरेचक द्वन्य प्रायः ' अघोगामी गुणभूयिष्ठ’– होते हैं । वामक द्रव्य अग्नि और वायु के अधिक गुणों से युक्त होते हैं । अग्नि और वायु दोनों हलके है एवं लघु होने से वे दोनों ऊपर को उठते हैं इसलिये वमनद्रव्य भी ' ऊर्ध्वगा • मीगुणभूयिष्ठ ' होते हैं । जिन पदार्थों में उक्त गुण होते हैं वे ऊर्ध्व और अधः दोनों भागों में गति करते हैं अर्थात् उनसे वमन और विरेचन दोनों कार्य होते हैं । ' आका-शगुणभूयिष्ठद्रव्य ' संशमन करता है, ' अनिलगुणभूयिष्ठद्रन्य ' संग्राही ( दस्त बांधने वाला ) होता है क्योंकि वायु शोषणका कार्य करता है । ' अग्निगुणभूयिष्ठ द्वन्य ' दीपन कार्य करते हैं । क्योंकि ये आग्नेयद्रव्य जठराग्नि के समान होते हैं । अनिल ( वायु ) और अनल ( अग्नि ) गुणों की अधिकता वाले द्वन्य लेखन कार्य करते हैं । पृथिवी जौर जल के अधिक गुणवाले द्रव्य वृंहण कार्य करते हैं । इस प्रकार से ओषधियों के कार्य । अनुमान द्वारा सिद्ध होते हैं ॥ १० ॥
विमर्शः — संशमनलक्षणम् -न शोधयति यद्दोषान् समान् नोदीरयत्यपि । समीकरोति विधमान् तत् सशमनमुच्यते ॥ ( शार्ङ्गधर ) । सङ्ग्राहिलक्षणम् —-आग्नेयगुणभूयिष्ठान्तोयाश परि-शोध्य यत् । सङ्गृहाति मल यत्तु ग्राही शुण्ठथादयो यथा ॥ ( भावप्र ० ) । दीपनलक्षणम् - चेन्नाम वह्निकृन्च.ढोपन तद्यथा मिशि. । ( शार्ङ्गघर ) । लेखनलक्षणम् —ातून् मलान्वा देहस्य
विशोष्योल्लेखयेच यत् । लेखन तद्यथा क्षौद्र नीग्मुष्णं वचा यवा ॰ ॥
( शार्ङ्गधर ) । वृंहणलक्षणम् -- बृहत्त्वं यच्छरीरस्य जनयेत्तच्च बृह्णन् । ( चरक ) । भवन्ति चात्र-भूतेजोवारिजैर्द्रव्यैः शमं ' याति समीरणः ।
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श्रध्यायः ४२ ] सूत्रस्थानम् । १५५
भूम्यम्युवायुः पित्तं क्षिप्रमाप्नोति निर्वृतिम् ॥११ ॥
खतेजोऽनिलजैः श्लेप्मा शममेति शरीरिणाम् ।
वियत्पवनजाताभ्यां वृद्धिमाप्नोति मारुतः ॥ १२ ॥
आग्नेयमेव यद् द्रव्यं तेन पित्तमुदीर्य्यते ।
वसुधाजलजाताभ्यां बलासः परिवर्द्धते ॥ १३ ॥
एवमेतद्गुणाधिक्यं द्रव्ये द्रव्ये विनिश्चितम् ।
द्विशो वा बहुशो वाऽपि नात्या दोपेषु चाचरेत ॥ १४ ॥
पृथिवी, अग्नि और जलीय द्रव्यों से वायु शान्त होती है । पृथिनी, नल और वायु इन तत्प्रधान द्वयों से पित्त शीघ्र ही शान्त होता है । आकाश, तेज और चायु इन तचजन्य द्रव्यों से मनुष्यों का कफ शान्त होता है । आकाश और चायुगुण भूरिष्ठ द्वयों से वात वृद्धि को प्राप्त होता है । केवल अग्निगुणप्रधान इव्य से पित्त प्रकुपित होता है । पार्थिव और कफ गुण वाले द्रव्यों से कफ बढ़ता है । इस प्रकार प्रत्येक द्रव्य में भिन्न भिन्न तत्रों के गुण की अधिकता रहूती है उसे भलीभांति समझकर एक दोष, द्विदोष और अनेक दोषों की चिकित्सा में प्रयुक्त करना चाहिये ॥ ११–१४ ॥ तत्र य इमे गुणा वीर्य्यसंज्ञकाः शीतोष्णस्निग्धरू क्षमृदुतीक्ष्गपिच्छिलविशदास्तेषां तीच्णोष्णाचाग्नेयौ । शीतपिच्छिलावम्बुगुणभूयिष्ठी, पृथिव्यम्बुगुणभूयिष्ठः स्नेहः, तोयाकाशगुणभूयिष्टं मृदुत्वम्, वायुगुणभूयिष्ठं रौक्ष्यम्, क्षितिसमीरणगुणभूयिष्ठं वैशद्यम्, गुरुलघुचि-पाकायुक्त गुणी; तत्र, उष्णस्निग्धी वातन्नो, शीतमृदु-पिच्छिलाः पित्तघ्नाः, तीक्ष्णरूक्षविशदाः श्लेष्मघ्नाः; गुरुपाको वातपित्तन्नः, लघुपाकः श्लेष्मन्नः, तेपां मृदु-शीतोष्णाः स्पर्शग्राह्याः, पिच्छिलविशदौ चक्षुः स्पर्शा भ्यां स्निग्धरुक्षौ चक्षुषा, तीच्णो मुखे दुःखोत्पाद-नातू; गुरुपाकः सृष्टविण्मूत्रतया कफोत्क्लेशेन च, लघुर्बद्धविण्मूत्रतया मारुतकोपेन च । तत्र तुल्यगुणेषु भूतेषु रसविशेषमुपलचयेत् । तद्यथा - मधुरो गुरुच पार्थिवः, मधुरः स्निग्धश्चाप्य इति ॥ १५ ॥
द्रव्य में जो शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, मृदु, तीक्ष्ण, पिच्छिल और विशद ये अष्ट वीर्यसंज्ञक गुण हैं, उनमें तीक्ष्ण और उष्ण गुण आग्नेय हैं, शीत और पिच्छिल ये जलगुण-भूयिष्ठ हैं, स्नेहगुण पृथिवी और जल की अधिकता से, मृदु गुण जल और आकाश की अधिकता से, रूक्षगुण वायु की अधिकता से तथा विशद गुण पृथिवी और पवन तत्व की अधिकता से होता है । गुरु और लघु अर्थात् मधुर तथा कटु-विपाक के गुण प्रथम कह दिये हैं । इनमें उष्ण और स्निग्ध गुण वातनाशक हैं । शीत, मृदु और पिच्छिल गुण पित्तशामक होते हैं । तीचग, रूक्ष और विशद गुण श्लेप्मनाशक होते है । गुरुविपाक बात और पित्त को नष्ट करता है तथा लघुविपाकः कफ को नष्ट करता है । इनमें से मृदु, शीत और उष्ण गुण स्पर्शनेन्द्रिय ( स्वग् ) द्वारा ग्राह्य होते है । पिच्छिल और विशद गुण नेत्र तथा स्पर्श से, स्निग्ध और रूक्ष गुण नेत्र द्वारा तथा तीचगगुण सुख में दुःस के उत्पादन से जाना जाता है । गुरपाक मल और मूत्र के त्याग से तथा कफ के द्वारा उत्क्लेश होने से जाना जाता है इसी प्रकार लघुविपाक विष्टा और मूत्र के विबन्ध से तथा वायु के कुपित होने से जाना जाता । जिन भूर्ती ( पृथिव्यादिक ) में गुणों की समानता हो यहां विशिष्ट रम द्वारा प्रयोगादि की कल्पना करनी चाहिये ' जैसे पार्थिव द्रव्य मधुर और गुरुविपाकी होते हैं तथा जलीय-द्वन्य मधुर एवं स्निग्ध होते है ॥ १५ ॥
भवति चात्र--गुणाय उक्ता द्रव्येषु शरीरेष्वपि ते तथा ।
स्थानवृद्धिक्षयास्तस्माद देहिनां द्रव्यहेतुकाः ॥ १६ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने द्रव्यविशेर्पाविज्ञानीयो मैकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस विषय में कहा भी है कि द्रव्यों में जो ये बीस गुण कहे हैं वे गुण मनुष्यों के शरीरों में भी उसी तरह विद्यमान रहते है इसलिये प्राणियों के शरीर में दोप, धातु और म की स्थिति, वृद्धि तथा क्षय सेवित हव्यों के कारण ही होते हैं । इत्यायुर्वेदतन्यसन्दीपिकाभापायां सूत्रस्थाने द्रव्यविशेषवि-ज्ञानीयो नामकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
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द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ।
अथातो रसविशेपविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१ ॥
ययोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके अनन्तर ' रसविशेपविज्ञानीय ' नामक अध्याय का व्याख्यान करते है जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ आकाशपवनद्हनतोयभूमिपु यथासङ्ख्यमेकोत्तर-परिवृद्धाः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः, तस्मादाप्यो रसः । परस्परसंसर्गात् परस्परानुग्रहात् परस्परानुप्रवेशाच्च सर्वेषु
सर्वेषां सान्निध्यमस्ति । उत्कर्षापकर्षात्तु ग्रहणम् ॥ ३ ॥
आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमि इनमें क्रमशः उत्तरोत्तर एक एक गुण को वृद्धि होने से शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये गुण होते हैं । अर्थात् आकाश मैं शब्द गुण, वायु में शब्द और स्पर्शगुण, अग्नि में शब्द, स्पर्श और रूप-गुण, जल में शब्द, स्पर्श, रूप और रसगुण एवं पृथिवी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पांचो गुण होते है । इस तरह रस जल से उत्पन्न होता है । इन भूतों के परस्पर संसर्ग, " परस्पर अनुग्रह तथा परस्पर अनुप्रवेश ( एक का दूसरे में प्रवेश ) होने से सर्व भूतों में सर्वभूतों का अथवा गुणों का सान्निध्य रहता है परन्तु जिसका उत्कर्ष ( बाहुल्य ) होता है उसी के नाम से उसका ग्रहण होता है एवं जिसका अपकर्ष ( अल्पस्य ) रहता है उसका उस नाम से ग्रहण नहीं होता है ॥ ३ ॥
विमर्श: - प्रायः प्रत्येक भूत का उत्कर्षदृष्टि से एक एक मुख्य या नैसर्गिक गुण होता है - महाभूतानि ख वायुरग्निर।पः
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१५६ सुश्रुतसहिता । क्षितिस्तथा । शब्द स्पर्शश्च रूपञ्च रसो गन्धश्च तद्गुणा ॥ प्रत्येक । भूत में क्षपकर्ष दृष्टि से अन्य भूतों के गुण भी रहते हैं अतएव लिखा है कि ' एकोत्तर परिवृद्धा ' चरक ने भी यही माना 1 तेषामेकगुण पूर्वो गुणवृद्धि परे परे । पूर्व पूर्वगुणश्चैव क्रमशो गुणि स्मृतः ॥ स खल्वाप्यो रसः शेषभूतसंसर्गाद्विदग्धः पोढा विभज्यते । तद्यथा - मधुरोऽम्लो लवणः कटुकस्तिक्तः कषाय इति । ते च भूयः परस्परसंसर्गात्त्रिषष्टिधा भिद्यन्ते । तत्र भूम्यम्बुगुणबाहुल्यान्मधुरः, भूम्यग्नि गुणबाहुल्यादम्लः, तोयाग्निगुणबाहुल्याल्लवणः, वाय्व-ग्निगुणबाहुल्यात्कटुकः, वाय्वाकाशगुणबाहुल्यात्तिक्तः, पृथिव्यनिलगुणबाहुल्यात्कपाय इति ।
तत्र, मधुराम्ललवणा वातघ्नाः, मधुरतिक्तकषायाः ।
पित्तघ्नाः, कटुतिक्तकषायाः श्लेष्मघ्न्नाः ॥ ४ ॥
यह जलीय रस अन्य भूतों के संसर्ग से परिपक्क होकर ६ प्रकार का हो जाता है । जैसे मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय । ये रस पुनः परस्पर मिलकर ६३ तिरसठ । प्रकार के हो जाते हैं । पड्सों में पृथिवी और जल के गुणों क बहुलता से मधुर रस, पृथिवी, और अग्नि गुण की बहुलता से अम्लरस, जल और अग्नि के गुण चाहुल्य से लवण रसी, वायु और अग्निगुण चाहुल्य से कटुरस, वायु और भाकाशगुण चाहुल्य से तिक्तरस एव पृथिवी तथा पवन के गुण बाहुल्य से कपाय रस होता है । इनमें मधुर, अम्ल और लवण रस यात को नष्ट करते है । मधुर, तिक्त और कपाय रस पित्त को नष्ट करते है एवं कटु, तिक्त तथा कपाय रस कफ को नष्ट करते है ॥ ४ ॥
विमर्शः -- द्रसगुणा – स्वादम्ललनणा वायु कषायस्वादुतिक्त का । जयन्ति पित्त श्लेष्माण कषायकटुतिक्तका ॥ तत्र, वायु ( यो ) रात्मैवात्मा, पित्तमाग्नेयं, श्लेष्मा
सौम्य इति ।
त ते रसाः स्वयोनिवद्धना अन्ययोनिप्रशमनाश्च ॥
इन में वायु वायु से ही उत्पन्न होता है । पित्त अग्नि से और श्लेष्मा ( कफ ) सोम अर्थात् जल से उत्पन्न होता है । ये मधुरादिपस स्व ( अपने ) योनि ( उत्पत्ति ) करने वाले ढोप के वर्द्धक होते हैं तथा अन्ययोनि जो दोप होते हैं उनके शामक होते हैं ॥ ५ ॥
विमर्श ' – स्वयोनि– कपायरस की योनि वायु, कटुकरस की योनि पित्त, मधुर रस की योनि श्लेष्मा है । केचिदाहुरभीपोमीयत्वाज्जगतो रसा द्विविधाः - सौ-म्या आग्नेयाश्च । तत्र मधुरतिक्तकपायाः सौम्याः कट्वम्ललवणा आग्नेयाः । तत्र मधुराम्ललवणाः स्त्रि-ग्धा गुरवश्च, कटुतिक्तकपाया रूक्षा लघवञ्चः सौम्याः शीता आग्नेयाश्चोपणाः ॥ ६ ॥
कुछ आचार्य कहते हैं कि जगत् अग्निरूप और सौम्य ( तटीय ) रूप होने से रस भी सौम्य और आग्नेय ऐसे दो ही प्रकार के होते हैं । इनमें मधुर, तिक्त और कषाय सौम्य तथा कटु, अम्ल और लवण आग्नेय होते हैं । उनमें मधुर, अम्ल और लवण रस स्निग्ध तथा भारी होते हैं तथा कटु, तिक्त और कषाय रस रूक्ष और लघु होते हैं । सौम्यरस शीत और आग्नेय रस उष्ण होते हैं ॥ ६ ॥
तत्र, शैत्यरौक्ष्यलाघववैशद्यवैष्टम्भ्यगुणलक्षणो-वायुः । तस्य समानयोनिः कषायो रसः । सोऽस्य शैत्याच्छेत्यं वर्द्धयति, रौदयाद्रौदयं, लाघवाल्लाघवं वैश-द्याद्वैशद्यं, वैष्टम्भ्याद्वैष्टम्भ्यमिति ॥ ७ ॥
उनमें शीत, रूच, लघु, विशद और विष्टम्भ गुणों से युक्त लक्षण वाला वायु होता है तथा उसके समान योनि ( उत्पत्ति-स्थान ) वाला कपाय रस है एवं यह कषाय रस शीतल होने से वायु की शीतता को बढ़ाता है तथा अपनी रूक्षता से वायु की रूक्षता को बढ़ाता है, स्वलाघव से वायु के लाघव को बढाता है, स्ववैशद्य से वायु की विशदता को बढ़ाता है और अपने वैष्टम्भ्य गुण से वायु की विष्टम्भता ( विबन्धत्व ) को बढ़ाता है ॥ ७ ॥
अध्ययतैक्ष्यरोचयलाघववैशद्यगुणलक्षणं पित्तम् । तस्य समानयोनिः कटुको रसः । सोऽस्यौष्ण्यादौष्ण्यं वर्द्धयति, तदण्यात्तैक्ष्ण्यं, रौक्ष्याद्रौक्ष्यं लाघवाल्लाघवं, वैशद्या द्वैशद्यमिति ॥ ८ ॥
उष्णता, तीक्ष्णता, रूक्षता, लघुता और विशदता इन गुणों से युक्त लक्षणों वाला पित्त है तथा इस पित्त के समान योनि वाला कटुरस है । यह रस अपनी उष्णता से पित्त की उष्णता को बढ़ाता है, स्वतीचणता से पित्त की तीक्ष्णता, स्वरूक्षता से पित्त की रूक्षता, स्वलघुता से पित्त की लघुता और स्ववैशद्य से पित्त की विशदता को बढ़ाता है ॥ ८ ॥
माधुर्य्यस्नेहगौरव शैत्यपैच्छिल्यगुणलक्षणः श्लेष्मा । तस्य समानयोनिर्मधुरो रसः । सोऽस्य माधुर्यान्मा-धु वर्द्धयति, स्नेहात् स्नेह, गौरवाद्गौरवं, शैत्याच्छेत्यं, पैच्छिल्यात्पच्छिल्यमिति ॥ ६ ॥
माधुर्य, स्नेह, गौरव, शैत्य और पैच्छिल्य इन गुणों के लक्षणों से युक्त कफ होता है तथा उसके समान योनि वाला मधुर रस है । वह मधुर रस अपनी मधुरता से कफ के माधुर्य को बढ़ाता है तथा स्वस्नेह गुण से कफ की स्निग्धता को बढ़ाता है, स्वगौरवगुण से कफ की गुरुता को बढ़ाता है, स्वशैत्यगुण से कफ की शीतता को तथा स्वपैच्छिल्य गुण से कफ की पिच्छिलता को बढ़ाता है ॥ ९ ॥
तस्य पुनरन्ययोनिः कटुको रसः । स श्लेष्मणः प्रत्यनीकत्वात् कटुकत्वान्माधुर्य्यमभिभवति, रौक्ष्यात् स्नेह, लाघवा गौरवमौष्याच्छेत्यं, वैशद्यात्पच्छिल्य-मिति । तदेतन्निदर्शनमात्रमुक्तम् ॥ १० ॥
उस कफ का दूसरा अन्य योनि कटुक रस है तथा यह कटु रस कफ के विरुद्ध गुण वाला होने से तथा कटुक होने से कफ की मधुरता को नष्ट करता है तथा यह कटुरस रूप होने से फफ की स्निग्धता को नष्ट करता है एवं लघु होने से कफ
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अध्यायः ४२ ] सूत्रस्थानम् । १५७ की गुरुता को नष्ट करता है, उष्ण होने से कफ की शीतता को
तथा विशद होने से कफ की पिच्छिलता को नष्ट करता है ।
यह केवल दिग्दर्शन ( उदाहरण ) मात्र है ॥ १० ॥
विमर्शः - समानयोनि द्रव्य से दोप और धातुओं की वृद्धि तथा विपरीतयोनि द्रव्य से नाश होता है । यह सामान्य नियम है । वृद्धि ममानै • सर्वेषा विपरीतैर्विपर्यंय. । चरकेऽपि -रसदोपसन्निपाते तु ये रसा यैर्दोषैः समानगुणाः समानगुणभूयिष्ठा वा भवन्ति ते तानभिवर्धयन्ति, विपरीतगुणा विपरीतगुणभूयिष्ठा वा शमयन्ति अभ्यस्यमाना ' । एतद्धि न्यवस्थाहेतो. पट्त्वमुपदिश्यते रसाना त्रित्व दोषाणाम् । ( चरक ) । रसलक्षणमत ऊर्ध्वं वक्ष्यामः तत्र, यः परितोप-मुत्पादयति प्रह्लादयति तर्पयति जीवयति मुखोपलेपं जनयति श्लेष्माणं चाभिवर्द्धयति स मधुरः । यो दन्त-हर्षमुत्पादयति मुखास्रावं जनयति श्रद्धानोत्पादयति सोऽम्लः । यो भक्तरुचिमुत्पादयति कफप्रसेकं जनयति मार्दवं चापादयति स लवणः । यो जिह्वाग्रं बाधते उद्वेगं जनयति शिरो गृहीते नासिकाच स्रावयत स कटुकः । यो गले चोपमुत्पादयति मुखवैशद्यं जनयति भक्तरुचि चापादयति हर्षन स तिक्तः । यो वक्त्रं परिशोपयति जिह्वां स्तम्भयति कण्ठं बध्नाति हृदयं कर्पति पीडयति च स कषाय ॥ ११ ॥
अब इसके अनन्तर रसों का लक्षण कहते है । रसों में जो शरीर या मन की तुष्टि करता है, आह्लाद देता है, तृप्ति करता । है, प्राणों का धारण करता है, मुख में चिपचिपापन पैदा करता है तथा क्फ को बढाता है वह मधुररस है एवं जो दन्तों को हर्पित करता है, मुख में लाला का स्राव करता है तथा • भोज्यादि पदार्थ अधिक सेवन करने की इच्छा को उत्पन्न करता है वह अम्लरस है । इसी प्रकार जो भोजन में रुचि करता है, कफ को स्रवित करता है एवं शरीर में मृदुता उत्पन्न करता है वह लवण रस है । जो जीभ के अग्रप्रदेश में बाधा या झनझनाहट उत्पन्न करता है, उद्वेग उत्पन्न करता है, शिर को भारीपन से जकड देता है और नासा में सिंघाणक ( नासा मल ) या पानी का स्राव कराता है वह कटुक रस है ॥ जो गले में चोप ( चूपणसमान वेदना ) पैदा करता है, मुख में विशदता पैदा करता है, खाने की रुचि और हर्ष उत्पन्न करता है वह तिक्त रस है एवं जो मुख ( लाला रस ) को सुखाता है, जिह्वा को स्तम्भित कर देता है, कण्ठ का संकोच करता है तथा हृदय को खींचता है तथा पीड़ित करता है वह पायरस है ॥ रसगुणानत ऊर्ध्वं वक्ष्यामः तत्र, मधुरो रसो रसरक्तमांसमेदोऽस्थिमज्जौजः शुक्रस्तन्यवर्धनश्चक्षुष्यः केश्यो वयों चलकृत्सन्धानः शोणितर सप्रसादनो बाल-वृद्धक्षतक्षीणहितः पट्पदपिपीलिकानामिष्टतमस्तृष्णामू-छदाहप्रशमनः पडिन्द्रियप्रसादनः कृमिकफकरो. ति स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमासेव्यमानः कास-श्वासालसकत्रमधुवदनमाधुर्यस्वरोपघातकृमिगलगण्डा-| नापादयति, तथाऽर्बुदश्लीपदवस्तिगुदोपलेपाभिष्यन्द-प्रभृतीन् जनयति ॥ १२ ॥
इसके अनन्तर अब रसों के गुणों का वर्णन करते हैं । उनमें मधुर रस रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, ओज, वीर्य और दुग्ध इनका वर्धक है, नेत्रों के लिये हितकर है, केशों को लाभ पहुंचाता है, शरीर के रङ्ग को बढ़ाता है, बलकारक, भग्न हुए अस्थ्यादि भागों का सन्धान करता है, रक्त और रस को प्रसन्न करता है, बालक, बूढ़े, चत और क्षीण हुये मनुष्यों के लिये हित करता है, भ्रमर तथा चींटियों के लिये अत्यन्त प्रिय है एवं तृपा, मृर्च्छा और दाह को शान्त करता है, पञ्च ज्ञानेन्द्रिय तथा मन इन छ इन्द्रियों को सन्तुष्ट करता है, और अधिक सेवन करने से कृमि और कफ को बढ़ाता है । यह मधुर रस उक्त प्रकार से अच्छे गुण वाला होने पर भी अकेला इसे ही अधिक सेवन किया जाय तो वह कास, श्वास, अलसक ( अजीर्ण भेट ), वमन, मुख की मधुरता, स्वर का नाश, कृमि रोग और गलगण्ड को पैदा करता है एवं अर्बुद, श्लीपद, बस्ति और गुदा में लेप साया चिकनापन अथवा भारीपन और अभिष्यन्द ( आंख का दूखना ) प्रभृति रोगों को उत्पन्न करता है ॥ १२ ॥
अम्लो जरण ' पाचनो दीपनः पवननिग्रहोऽनुलो-मनः कोष्ठविदाही बहिश्शीतः क्लेदनः प्रायशो हृद्यश्चेति । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपसेव्यमानो दन्तहर्षनयन-सम्मीलनरोमसंवेजन कफविलयनशरीरशैथिल्यान्यापा-दयति, तथा नताभिहतदग्धदष्टभग्नशून रुग्णप्रच्युताव-मूत्रितविस पितच्छिन्नभिन्नविद्धोत्पष्टादीनि पाचयत्या-ग्नेयस्वभावात् परिदहति, कण्ठमुरो हृदयचेति ॥ १३ ॥
अम्लरस भोजन का पाचन करने वाला, पाचन, दीपन, वायु का निग्रहकारक, दोपों का अनुलोमक या कार्मिनेटव ( Carminative ), कोप में दाहकारक, बाहर से शीत, शरीर का क्लेदक और प्रायः हृदय के लिये हितकर होता है । वह ऐसा उत्तम गुणों वाला होता हुआ भी यदि अकेला ही अधिक मात्रा में लेवित किया जाय तो दन्तहर्ष, नेत्रसंकोच, शरीर में रोमाञ्चकारी, कफ का विलायक और शरीर की शिथिलता को उत्पन्न करता है तथा हत, अभिहत, दग्ध, सर्पा अस्य्यादिभन्न, शोथयुक्त, रुग्ण, प्रच्युत ( स्वस्थानभ्रष्ट ), लूतादि से अवमूत्रित, स्पर्शविपादि जन्तुओं के स्पर्श से दूषित, छिन्न, भिन्न, विद्ध और उत्पिष्ट ( चूर्णित ) आदि स्थानों को पकाता है तथा आग्नेय स्वभाव का होने से कण्ठ, छाती और हृदय में दाह उत्पन्न करता है ॥ १३ ॥
लवणः संशोधनः पाचनो विश्लेषण: क्लेदन: शैथि-ल्यकृदुष्णः सर्वरसप्रत्यनीको मार्गविशोधनः सर्वशरीरा-वयवमार्दवकरोति । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमा-सेव्यमानो गात्रकण्डूकोठशोफवैवर्ण्य पुंस्त्वोपघातेन्द्रि-योपतापमुखाक्षिपाकरक्तपित्तवातशोणिताम्लिकाप्रभृती-नापादयति ॥ १४ ॥
लवणरस दोपों का संशोधक, आमादि का पाचक, संधियों