श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 191–200

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 191–200

पृष्ठ 191

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री, पृष्ठ 191 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१३८ सुश्रुतसहिता । वातिक शोथ में स्निग्ध, अम्ल और लवण युक्त तथा कुछ कुछ गरम लेप लगाना चाहिये । पैत्तिक शोफ में दुग्ध के साथ पीसा हुआ तथा शीत लेप लगाना चाहिये । कफजन्य शोध में क्षार और गोमूत्र युक्त गरम लेप लगाना चाहिये ॥ ८ ॥

शणमूलकशिणां फलानि तिलसर्पपाः ।

शक्तवः किण्वमतसी द्रव्याण्युष्णानि पाचनम् ॥ ६ ॥

पाचन - शण, सूली और सहजने के वीज, तिल, सरसों, सत्तू, सुरावीज, अलसी तथा अन्य उष्ण पदार्थों का व्रण शोफ मैं पाचन करता है ॥ ९ ॥

विमर्श: -- सक्तु - यवतण्डुललाजादिचर्णे सक्तु प्रकीर्तितः । चिरबिल्वोऽग्निको दन्ती चित्रको हयमारकः ।

कपोतगृध्रकङ्काणां पुरीषाणि च दारणम् ।

क्षारद्रव्याणि वा यानि चारो वा दारणं परम् ॥ १० ॥

दारण-- बढ़ा कर, भिलावा, दन्ती की जट, चित्रक की छाल, कनेर की जड, कबूतर, गीध और कंक इनकी वीट, इन्हें पीस कर लेप करने से शोथ का दारण होता है अथवा मुष्कक कुटज - पलाशादि क्षारद्रव्य या केवल क्षार ये अत्यन्त दारण करने वाले हैं ॥ १० ॥

द्रव्याणां पिच्छिलानां तु त्वमलानि प्रपीडनम् यवगोधूममाषाणां चूर्णानि च समासतः ॥ ११ ॥

पीडन - पिच्छिल द्रव्यों की छाल या जट और जौ, गेहूँ तथा उडदी इनका चूर्ण ये समास ( संक्षेप ) से व्रणों के पीडन द्रव्य हैं ॥ ११ ॥

विमर्श: -- सेमल, लिसोढा, वैर, नागवला ये पिच्छिल द्रव्य हैं । पीडन द्रव्यों को पीस कर व्रणशोथ पर लेप करने पर जब वह सुखता है तब खिंचाव उत्पन्न होने से पूय बाहर निकलता है । पूयगर्भानणुद्वारान् व्रणान् मर्मंगतानपि । यथोक्तै • पीडनद्रव्ये समन्तात् परिपीटयेत् ॥ शुष्यमाणमुपेक्षेत प्रदेह पीडन-प्रति । न चाभिमुखमालिम्पेत्तथा दोप प्रसिच्यते ॥

शङ्खिन्यकोठसुमन ' करवीरसुवर्चलाः ।

शोधनानि कपायाणि वर्गवारग्वधादिक ॥ १२ ॥

' शोधन कपाय ' - द्रव्यों में शंखिनी, अंकोठ, मालती, कनेर, सूर्यमुखी तथा आरग्वधादि गण की ओषधियां प्रमुख है ॥ विमर्श - कपाय, वर्ति, कल्क, घृत, तैल, रसक्रिया, अव-चूर्णन और धूपन ऐसे आठ प्रकार से व्रणों का शोधन करते हैं ।

अजगन्धाऽजशृङ्गी च गवाक्षी लागलाह्वया ।

पूतीकचित्रकः पाठा विडङ्गै लाहरेणवः ॥ १३ ॥

कटुत्रिकं यवक्षारो लवणानि मन ' शिला ।

कासीसं त्रिवृता दन्ती हरितालं सुराष्ट्रजा ॥ १४ ॥

संशोधनीनां वर्त्तीनां द्रव्याण्येतानि निर्दिशेत् ॥

एतैरेवौषधैः कुर्यात्कल्कानपि च शोधनान् ॥ १५ ॥

अजगन्धा, काकढासिङ्गी, इन्द्रवारुणी, कलिहारी, वडा करक्ष, चित्रक की छाल, पाठा, वायविडंग, बढ़ी इलायची, हरेणुका, सोंठ, मरिच, पिप्पली, यवक्षार, सैन्धव सामुद्रादि पांचो लवण, मैनसिल, कासीस, निशोथ, दन्ती, हरताल, फिटकरी, ये ' संशोधन ' करने वाली वर्ति के द्रव्य है तथा इन्ही द्रव्यों से ही शोधन के लिये कल्क बनाना चाहिये ॥ १३-१५ ॥

कासीसकटुरोहिण्योतीकन्दहरिद्रयोः ।

पूर्वोद्दिष्टेषु चाप कुर्यात्तैलघृतानि वै ॥ १६ ॥

कासीस, कुटकी, चमेली की जद और हल्दी इनके काथ और कल्क से तैल और घृत पकाकर शोधन के लिये प्रयुक्त करें ॥

अर्कोत्तमांस्नुहीतीरं पिष्ट्रा क्षारोत्तमानपि ।

जातीमूलं हरिद्रे द्वे कासीसं कटुरोहिणीम ॥

पूर्वोद्दिष्टानि चान्यानि कुर्य्यात् संशोधनं घृतम् ॥१७ ॥

आक की जड़, त्रिफला, थूहर का दुग्ध, मुष्कक, पलाश आदि श्रेष्ठ क्षार, चमेली की जड़, हरिद्रा, दारुहरिद्रा, कासीस, कुटकी, एवं पूर्व के श्लोक में कहे हुये अजगन्धादि द्रव्य लेकर कल्क बना के यथाविधि संशोधन घृत सिद्ध कर लेना चाहिये ॥ मयूरको राजवृक्षो निम्बः कोशातकी तिलाः ॥ १८ ॥

बृहती कष्टकारी च हरितालं मनःशिला ।

शोधनानि च योज्यानि तैले द्रव्याणि शोधने ॥ १ ९ ॥

अपामार्ग, अमलतास, निम्ब की छाल, कडवी तरोई, तिल, वढी कण्टकारी, छोटी कण्टकारी, हरताल, मैनसिल तथा अन्य शोधनवति के द्रव्यों का कल्क वना कर यथाविधि शोधन तैल सिद्ध कर लेना चाहिये ॥ १८-१९ ॥ कासीसे सैन्धवे किवे वचायां रजनीद्वये शोधनानेषु चान्येषु चूर्ण कुर्वीत शोधनम् कासीस, सैन्धव लवण, सुरावीज, चचा, दारुहरिद्रा तथा अन्य शोधन द्रव्यों को लेकर । शोधन चूर्ण बना लेवें ॥ २० ॥

सालसारादिसारेपु पटोलत्रिफलासु च । रसक्रिया विधातव्या शोधनी शोधनेषु च रसक्रिया शालसारादि गण के द्रव्य, पटोल, | ॥ २० ॥

हरिद्रा और खांट कूट के ॥ २१ ॥

त्रिफला तथा अन्य शोधक द्वन्य लेकर व्रणशोधनार्थ रसक्रिया करनी चाहिये ॥ २१ ॥

श्रीवेष्टके सर्जरसे सरले देवदारुणी ।

सारेष्वपि च कुर्वीत मतिमान् व्रणधूपनम् ॥ २२ ॥

धूपनद्रव्य - श्रीवेष्टक, राल, सरल के पेड की छाल, देवदारु तथा अन्य सालसारादि गण की ओपधियों का चूर्ण बना कर उससे ' व्रणधूपन ' करना चाहिये ॥ २२ ॥

कपायाणामनुष्णानां वृक्षाणां त्वक्षु साधितम् ।

शृतं शीतं कषायं वा रोपणार्थेषु शस्यते ॥ २३ ॥

रोपण द्रव्य - शीतवीर्य तथा कसेले वृत्तों की छाल से सिद्ध किया हुआ काथ अथवा शीत कपाय व्रणरोपण के लिये श्रेष्ठ है ॥

शीतकपायः -- द्रव्यादापोथितात्तोये तत्पुनर्निशि सस्थितात् ।

कषायो योऽभिनिर्याति स शीत. समुदाहृत ॥

सोमामृताऽश्वगन्धासु, काकोल्यादौ गणे तथा ।

क्षीरिप्ररोहेष्वपि च वर्तयो रोपणाः स्मृताः ॥ २४ ॥।

पृष्ठ 192

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री, पृष्ठ 192 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रध्यायः ३७ ] सूत्रस्थानम् । १३६ सोम, गिलोय, असगन्ध, काकोल्यादि गण की ओषधियां और वट, पीपल आदि क्षीरीवृत्तों की जटा के प्ररोह ( अडर ) इनके कल्क से लिप्त कर रुई या गाज की बनाई हुई बर्तियां ग में रखने से उनका रोपण करती हैं ॥ २१ ॥

विमर्श - श्रीरिणी वृक्षाः अन्योदुम्बरप्लवटपिप्पलसविना ।

चैते क्षीरिणो वृक्षाः समाख्याता विचक्षु ॥

समङ्गा सोमसरला सोमवल्कः सचन्दनः ।

काकोल्यादिश्च कल्कः स्यात् प्रशस्तो व्रणरोपणे ॥ २५ ॥

मजीठ नयवा लजालु, सोम, सरलकाष्ट, श्वेतम्खदिर, लाल चन्दन और ' काकोल्यादि गग की ओषधियों का कल्क व्रण-रोपण के लिये श्रेष्ठ है ॥ २४ ॥

पृथकूपर्वात्मगुमा च हरिद्रे मालती सिता ।

काकोल्यादिश्च योज्यः स्यात् भिपजा रोपणे घृते ॥ २६ ॥ ।

पृश्निपर्णी, कौच के बीज, हल्दी, दारहलडी, चमेली, मिश्री तथा ' काकोल्यादिगग ' की ओषधियों के द्रव्य रोपण घृत सिद्ध करने के लिये प्रयुक्त करे ॥ २६ ॥

कालानुसायागुरुणी हरिद्रे देवदारु च ।

प्रियङ्गवच रोत्रञ्च तैले योज्यानि रोपणे ॥ २७ ॥

तगर, अगुरु, हरिद्रा, द्वारहरिद्रा, देवदारु, फूलप्रियहु, पठानी लोघ इन इल्यों को रोपण तेल सिद्ध करने में प्रयुक्त करें ।

कक्हूगुका त्रिफला रोधं कासीसं श्रवणाहुया ।

ववाश्वकर्णयोस्त्वक् च रोपणं चूर्णमिष्यते ॥ २८ ॥

प्रियङ्गुका सर्जरसः पुष्पकासीसमेव च ।

त्वक्चूर्ण धवजं चैव रोपणार्थ प्रशस्यते ॥ २ ९ ॥

कधान्य, त्रिफला, पठानी लोध, कासीस, गोरखमुण्डी, घूत्र तथा राल वृक्ष की छाल इनका चूर्ण व्रणरोपण करता है । प्रिय, राल, पुष्पकासीस, धववृक्ष की छाल इनका चूर्ण व्रण पग के लिये श्रेष्ठ है ॥ २८-२९ ॥

त्वक्षु न्यग्रोधवर्गस्य त्रिफलायास्तथैव च ।

रसक्रियां रोपणार्थे विधीत यथाक्रमम् ॥ ३० ॥

' न्यग्रोधादिगण के वृक्षों की छाल तथा त्रिफला इनसे ' दिन णीयोक्त विधि ' के अनुसार नगरोपणार्थ ' रसक्रिया ' करनी चाहिये । अपामार्गोऽश्वगन्धा च तालपत्री सुवर्चला । उत्सादने प्रशस्यन्ते काकोल्यादिश्च यो गणः ॥ ३१ ॥.

उरमाइन द्रव्य — आंधी जाडा, अनगन्ध, मुसली, ब्राह्मी अथवा सूर्यभक्ता तथा काकोल्यादि गण की ओषधियों के द्रव्य ar के रसादन के लिये उत्तम हैं ॥ ३१ ॥

कासीसं सैन्धवं किएवं कुरुविन्दो मनःशिला ।

कुक्कुटाण्डकपालानि सुमनोमुकुलानि च ॥ ३२ ॥

फले शैरीपकारजे धातुचूर्णानि यानि च ।

व्रणेषूत्सन्नमांसेषु प्रशस्तान्यवसादने ॥ ३३ ॥

कासीस, सैन्धच लबण, सुराबीज, पद्मराग, मैनसिल, मुर्गी के अण्डे की छाल ( कवच ), चमेली के पुष्पों की कलियां, गिरीप और करन के फल तथा हरतालादि अन्य धातुओं के चूर्ण उत्सन्न ( अतिबृढ ) मांसाहर वाले व्रणों के अवसादन ( नष्ट ) करने के त्रिये ' उत्साद्दन विधि ' में श्रेष्ठ हैं ॥ ३२-३४ ॥ ।

-समस्त वर्गमर्द्ध वा यगलाभमथापि वा ।

प्रयुञ्जीत भिषक् प्राज्ञो यथोद्दिष्टेषु कर्मसु ॥ ३४ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने मिथकाध्यायो नाम पत्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ३६ ॥

actress मान वैद्य ऋण के विम्लापनादि कर्म के लिये यथोद्दिष्ट समस्त वर्ग की ओषधियाँ या अर्ध औषध जो भी प्राप्त हो सके उनका प्रयोग करें ॥ ३४ ॥

इत्यायुर्वेदतत्त्वमन्दीपिकाभाषायां मिश्रकाव्यायो नाम पत्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ३६ ॥

B

सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः ।

अथातो भूमिप्रविभागीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

to इसके अनन्तर ' भूमिप्रविभागीय नामक ' अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैना कि भगवान् धन्वन्तरि ने श्रुसुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श -- वर्षाशीतोष्णादि महाभूतकार्य की दृष्टि से तथा महाभूत गुणदृष्टि से भूमि की परीक्षा करते है जिससे ओप-धियों के गुणधर्म, इनकी उत्तमता, हीनता तथा रोगिपरिज्ञान में सहायता होती है । ' तत्र भूमिपरीक्षा आनुरपरिद्यानहंतोर्वा स्यादीपनपरिद्यानहेतो- ' ( चरक ) श्वभ्रशर्कराऽइमविषमवल्मीकश्मशानाघातनदेवता-यतनसिकताभिरनुपहतामनपरामभङ्गुरामदूरोदकां स्त्रि-ग्धां प्ररोहवती मृहीं स्थिरां समां कृष्णां गौरी लोहितां वा भूमिमापधार्थ परीक्षेत ॥ ३ ॥

वन ( खड्डे, बिल ), कंकड, पत्थर, निम्नोन्नता, वल्मीक, श्मशान, फांसी देने का स्थान, देवता का स्थान तथा बालू से रहित हो, ऊपर ( नोनिया या क्षारयुक्त ) न हो, भगुर ( फटने वाली ) न हो, जिसमें खोदने पर जल ज्यादा दूर ( नीचे ) न हो, चिक्नी हो, दूर्वा, घास आदि उगता रहता हो, जो मुला-यम, स्थिर और समतल हो, जो काले, सफेद और रक्तवर्ण की हो उसकी ओषधि को उखाड़ने के लिये परीक्षा करनी चाहिये तस्यां जातमपि कृमिविपशत्रातपपवनदहनतोयस-म्बाधमार्गेरनुपहतमेकरसं पुष्टं पृथ्ववगाढमूलमुदीच्या-वौषधमाददीतेत्येष भूमिपरीक्षाविशेषः सामान्य || ४ || उपर्युक्त लक्षण वाली भूमि में उत्पन्न हुई औषध भी कृमि के द्वारा नही खाई गई हो, विष, शस्त्र, धूप, वायु, अग्नि, जल तथा अन्य बाधाओं से और रास्ते में होने से नष्ट नहीं हुई हो, तथा उत्तम एक रस से युक्त हो, पुष्ट हो, जिसकी जढ़ भूमि गहराई तक गई हुई हो ऐसी औषध को उत्तर की ओर बैठ कर ग्रहण करें । यह साधारणतया औषध और भूमि की विशेष परीक्षा है ॥ ४ ॥

विशेषतस्तु तत्र, अश्मवती स्थिरा गुर्वी श्यामा कृष्णा वा स्थूलवृनशस्यप्राया स्वगुणभूथिष्टा | स्निग्धा शीतलाऽऽसन्नोदका स्निग्धसस्यतृणको मलवृत्तप्राया शुक्लाऽम्बुगुणभूयिष्टा । नानावर्णा लघ्त्रश्मवती प्रवि-

पृष्ठ 193

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री, पृष्ठ 193 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४० सुश्रुतसहिता । रलाल्पपाण्डुवृतप्ररोहा अग्निगुणभूयिष्टा । रूक्षा भस्म-रातभर्णा तनुरूक्षकोटराल्परसवृत्तप्राया अनिलगुणभू-विष्टा | मृद्वी समा श्वभ्रत्रत्यञ्चरसजला सर्वतोऽसार वृक्षप्राचा श्यामा चाकाशगुणभूयिष्ठा ॥ ५ ॥

विशेषरूप से नो पत्थर वाली, स्थिर, भारी, श्याम अथवा काले रंग की एवं बड़े बड़े पेड़ तथा घास वाली भूमि अपने पार्थिव गुणों से युक्त होती है । जो चिकनी, ठंडी, थोड़ी गहराई पर खोदने से जल वाली तथा जिसमें मुलायम धान्य और घाल पैदा होता हो प्रायः कोमल वृक्ष हों और खेत वर्ण । की मिट्टी हो वह जल के शीतत्निग्धादि प्रचुर गुणों से युक्त होती है । एवं जो अनेक वर्ण की छोटे छोटे पत्थरों वाली, कहीं कहीं छोटे छोटे सफेद रह के वृक्ष और तृगाङ्कुरों से युक्त हो वह भूमि आग्नेय तत्व प्रधान वाली होती है । तो रूह हो, भस्म लयत्रा गढ़हे के समान धूलर वर्ण की हो, जिसमें छोटे छोडे और रूज्ञ तथा कोटरयुक्त और अल्प रस वाले वृत्रों की बहुलता हो वह वायुगुण प्रधान भूमि होती है । जो मुला-यम, समतल, बिल ( गडे ) युक्त हो तथा जहां रस और जल अल्प होने से प्रकट नहीं होता हो जहां चारों ओर सारहीन बड़े २ वृक्ष हाँ एवं जहां बड़े २ पर्वत हों और जिसकी मिट्टी नाम हो वह भूमि नाकाशगुण प्रधान होती है ॥ ५ ॥

अत्र केचिदाहुराचार्य्याः – प्रावृड्वर्षाशरद्धेमन्तत्र- । सन्तग्रीष्मेषु यथासंख्यं मूलपत्रत्वक्क्षीरसारफलान्या-ददीतेति । तत्तु न सम्यक्; सौन्याग्नेयत्वात्जगतः । सौन्गन्यौपवानि सौम्येष्वृतुषु गृहीतानि सोमगुणभू-विष्टागं भूमौ जातान्यतिमधुरस्निग्धशीतानि जायन्ते । एतेन रोषं व्यास्यातम् ॥ ६ ॥

अनेक लावायों का कथन है कि प्रावृद् ( वर्षा के आदि काल ) में वनस्पतियों या ओषधियों की जड़ें, वर्षा ऋतु में पत्र, शरद् ऋतु नैं छाल, हेनन्त ऋतु में दुग्ध, वसन्त ऋतु में सार और प्रोप्न ऋतु में फलों का ग्रहण ( समय ) करना चाहिये किन्तु यह मत ठीक नहीं है क्योंकि जगत् सौम्य ( सलीन या कफ तत्र प्रधान ) तथा लग्नेय ( लनि या पिच पात्र प्रधान ) होता है इस लिनं सौम्य ( शीतवीर्य नयवा बल या क्फ गुन प्रधान ) ओषधियों को सौम्य ( दक्षिणायन चूर्य होने पर ) धनुओं में तथा अति गुण प्रधान ( उष्णवीर्य ) लोपचिनों को आय ( उत्तरायण सूर्य होने पर ) ऋतुओं में ग्रहण करनी चाहिये । इस प्रकार समय करने से औषधियां नविन गुगोंवाली होती हैं । सौम्य लोपधियों को सौम्य श्रुतुओं में ग्रहण की जाय तथा सौन्य भूमि में वे उत्पन्न हुईं हाँ तो वे जयन्त नवुर रस वाली, स्निग्ध तया नतीव शीत-वीर्य प्रधान होती हैं । इसी प्रकार लाग्नेय लोपधियों की भी व्यारना समझ लेनी चाहिये ॥ ६ ॥

तत्र पृथिव्यन्युगुगभूविटायां भूमौ जातानि विरे चनद्रव्याख्याददीत, अग्न्याकाशमारतगुणभू विष्टायां वसनद्रव्याणि । उभचगुणभू चिटावानुभवतो भागानि । आकाशगुणभूयिष्ठायां संशमनानि । एवं बलत्रचराणि सवन्ति ॥ ७ ॥

/ पृथिवी और जल्गुणभूयिष्ठ भूमि में उत्पन्न हुई विरे-| चक ओषधियों को ग्रहण करना चाहिये । अग्नि, आकाश तथा वायु गुण भूयिष्ठ भूमि में उत्पन्न हुई वामक ओपनि का सचय करना चाहिये । उभय गुण भूयिष्ठ भूमि में उत्पन्न हुई उभय गुण अर्थात् चमन और विरेचन कर्म करने वाली । दोषधियों का सचय करना चाहिये । आकाश गुण भूयिष्ठ भूमि में उत्पन्न हुई संशमन करने वाली ओषधियों का लचय करना चाहिये । इस प्रकार की भूमि से और उचित उक्त समय में सञ्चित की हुई ओषधियां अपने अपने गुणों में अधिक बलवती होती हैं ॥ ७ ॥

सर्वाण्येव चाभिनवान्यन्यत्र मधुघृतगुडपिप्पली विडङ्गेभ्यः ॥ = ॥ / सर्व प्रकार के औषध द्वन्य नूतन हो ग्रहण करने चाहिये किन्तु शहद, घृत, गुड, पिप्पली और वायविडङ्ग इन्हें सदा पुराने होने पर ग्रहण करें ॥ ८ ॥

विडङ्गं पिप्पली क्षौद्रं सर्पिञ्चाप्यनवं हितम् ।

शेषमन्यत्त्त्रभिनवं गृह्णीयाद्दोषवर्जितम् ॥ ६ ॥

इस विषय में कहा भी है- कि विडङ्ग, पिप्पली, शहद और घृत ये पुराने हितकारी होते हैं किन्तु अन्य द्वन्यों को दोषों से रहित तथा नवीन रूप में ही ग्रहण करे ॥ ९ ॥

विमर्श: - निम्न द्रव्य सदा ताजे या गीले ही ग्रहण करें । गुडूची कुटनो वान्ता ग्नाण्डद्ध शत्रावरी । अवगन्ना सहचरी शुद्र-पुष्पा प्रचारिनी ॥ प्रयोजदा सदैगर्दा ( शार्ङ्गघर ) । निम्न द्रव्य सदा गीले तथा योगोक्त प्रमाण में ही ग्रहण करें भार्द्वद्वन्य सदा द्विगुण गृहीत होते हैं किन्तु इन्हें द्विगुण न ले- वासादिन्दोलकेतला गण्डकेन्दीवरी, वर्षाभूकुटनाश्च मन्द-सहिताः सा पूतिगन्धानृता । ऐन्द्री नागदटाकुरप्टकट: क्षत्रावृता सर्वदा सार्द्रा एव तु न क्वचिद् द्विगुणिता कार्येषु चोल्या बुधै ॥ ( भावप्र ० ) । धनियां, घी पुराना श्रेष्ठ होता है — नवान्येव हि । गेव्यानि द्रव्याण्यखिकर्मसु । विना विकृष्णाम्यां गुडघान्या • व्यनाक्षिकैः ॥ ( शार्ङ्गघर ) । पुरानद्वावधि. – न्युनः शर्करायाश्च

। गुडत्यादि विशेषतः । एकसरे वृचे पुरागन्यं न दुधैः ॥

। बृंहणार्थ शहद नूतन श्रेष्ठ होता है - हनीयं नषु नत्र नावि-| इलेनहर सरन् । निन्नरोगेषु नवं घृतम् —योनयेनवनेत्राज्यं नोटने नग्ने अने । वये पाण्डुरोगे कानलानेत्र रोगयोः ॥ ( भावप्र ० ) । ओषधियों के गुणहीन होने की अवधिः - गुनहीन म्वेद् वर्षा-दूर्ध्वं तद्रूपनौषधम् । मामुद्रयाचया चूर्ण दोनवोर्यत्वमाप्नुयात् ॥ होनल गुटिकलेही उमेवे बत्तरा परम् । होनाः सुर्धृततैला-| चातुर्मासाधिकाथा ॥ ( शार्ङ्गघर ) । सर्वाण्येव सक्षीराणि वीर्य्यवन्ति तेषामसम्पत्ताव-| नतिक्रान्तसंवत्सराण्याददीतेति ॥ १० ॥

क्षीरयुक्त लयवा रसयुक्त होने पर ही सर्व ओषधियां । चीर्यवती होती हैं । उनके सम्पत् ( गुण ) युक्त न होने पर । या न मिलने पर एक वर्ष के भीतर को ग्रहण करनी चाहिये ॥

भवन्ति चात्र-गोपालात्तापसा व्यावा ये चान्ये वनचारिणः ।

मृलाहाराश्च चे तेभ्यो भेषजव्यक्तिरिष्यते ॥ ११ ॥

पृष्ठ 194

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री, पृष्ठ 194 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रध्यायः ३८ ] सूत्रस्थानम् । १४१ इस विषय में कहा भी है कि गो, भैंस और बकरी चराने वाले, जगल में रहने वाले तपस्वी, हरिणादि का शिकार करने वाले तथा कन्द, मूल, फल खाकर जगल में रहने वाले एवं अन्य भी जो वनवासी हों उनसे औषध ( जडी, चूटी ) का ज्ञान होता है ॥ ११ ॥

विमर्श: - ओषधियों के केवल नाम और स्वरूप मात्र जानने से काम नहीं चलता है किन्तु उनका रोगों में प्रयोग कैसे होता है यह जानना भी अत्यावश्यक है जैसा कि चरक ने कहा है— ओषधीर्नामरूपाभ्या जानते ह्यनपा वने । न नाम-ज्ञानमात्रेण रूपमात्रेण वा पुन ॥ ओषधीना परां प्राप्तिं कश्चिद्वे दितुमर्हति । योगविन्नामरूपज्ञस्तासा तत्त्वविदुच्यते ॥

सर्वावयवसाध्येषु पलाशलवणादिषु ।

व्यवस्थितो न कालोऽस्ति तत्र सर्वो विधीयते ॥१२ ॥

वनस्पतियों के मूल, पत्र, फल आदि L सर्व अवयवों से बनाये हुये जो पलाशादिक क्षार हैं उनके ग्रहण का ( सञ्चय करने का ) कोई खास व्यवस्थित समय नहीं है । उनके ग्रहण में सर्व समय उपयुक्त है ॥ १२ ॥

गन्धवर्णरसोपेता पडूविधा भूमिरिष्यते ।

तस्माद् भूमिस्वभावेन बीजिनः षड्रसायुताः ॥१३ ॥

अव्यक्तः किल तोयस्य रसो निश्चयनिश्चितः ।

रस एव स चाव्यक्तो व्यक्तो भूमिरसाद्भवेत् ॥ १४ ॥

गन्ध, वर्ण और मधुरादि षडूसों से युक्त भूमि भी छ प्रकार की होती है इस लिये भूमि के स्वभाव के कारण वृक्ष भी छ रसों से युक्त होते हैं । जल अव्यक्त रस वाला होता है यह अनेक निश्चयों ( प्रमाणों ) से निश्चित है तथा वही जल का अव्यक्त रस भूमि के रस से व्यक्त ( स्पष्ट ) हो जाता है ।

सर्वलक्षणसम्पन्ना भूमिः साधारणा स्मृता ।

द्रव्याणि यत्र तत्रैव तद्गुणानि विशेषतः ॥ १५ ॥

पूर्व में कहे हुये सर्व लक्षणों से युक्त भूमि को साधारण भूमि कहते हैं । जो द्रव्य जैसी भूमि में उत्पन्न होते हैं उन द्रव्यों के गुण विशेषकर उसी भूमि के गुणों के अनुसार होते हैं ॥

विगन्धेनापरामृष्टमविपन्नं रसादिभिः ।

नवं द्रव्यं पुराणं वा ग्राह्यमेव विनिर्दिशेत् ॥ १६ ॥

J साधारणतया जो दुव्य विकृत गन्ध से युक्त न हों तथा जिसके मधुरादि रसों में भी विकार उत्पन्न न हुआ हो वह द्वन्य चाहे नया हो अथवा पुराना हो उसे ग्राह्य ही समझना चाहिये ॥ १६ ॥

जगमानां वयःस्थानां रक्तरोमनखादिकम् ।

क्षीरमूत्रपुरीषाणि जीर्णाहारेषु संहरेत् ॥ १७ ॥

युवावस्था वाले जङ्गम पशु - पक्षियों का रक्क, रोम और नख आदि ग्रहण करने चाहिये तथा उनके आहार के जीर्ण हो जाने पर दुग्ध, सूत्र और मल भौपधार्य ग्रहण करना चाहिये ॥ विमर्श: -- वीरादिग्रहे अष्टादसनह. - क्षीरं वाष्कयण ग्राह्य वि

ण्मूत्र तच्च नोरुजान् । वयोवलवता धातुपिच्छखुरादिकम् ॥

प्लोतमृद्भाण्डफलकशङ्कुविन्यस्तभेषजम् ।

प्रशस्तायां दिशि शुचौ भेषजागारमिष्यते ॥ १८ ॥

| इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने भूमिप्रविभागीयो नाम सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ३७ ॥

ww प्लोत ( चत्र के खण्ड ), मिट्टी के पात्र, काठ के तस्त और खूटियों पर ओषधियां रखी हों तथा पवित्र और प्रशस्त स्थान में भेषजागार ( ओषधि शाला ) बनवाना चाहिये ॥१८ ॥

इत्यायुर्वेदतत्त्वसन्दीपिकाभाषायां सूत्रस्थाने भूमिप्रविभागीयो नाम सप्तत्रिंशत्तमोध्यायः ॥ ३७ ॥

- ~

अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः ।

अथातो द्रव्यसङ्ग्रहणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब इसके अनन्तर द्रव्यसंग्रहणीय नामक अध्याय का न्याख्यान करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत | लिये कहा था ॥ १–२ ॥ समासेन सप्तत्रिंशद् द्रव्यगणा भवन्ति ॥ ३ ॥

संक्षेप से द्रव्यों के सैंतीस गण होते हैं जैसे कि भागे कहते है ॥ ३ ॥

( १ ) तद्यथा - विदारिगन्धा विदारी विश्वदेवास-हदेवा श्वदंष्ट्रा पृथक्पर्णी शतावरी सारिवा कृष्णसारिवा जीवकर्षभको महासहा क्षुद्रसहा वृहत्यैौ पुनर्नवैरण्डो हंसपादी वृश्चिकाल्यृषभी चेति ॥ ४ ॥

विदारीगन्धादिगण में निम्न ओषधियां हैं जैसे- विदारी-गन्धा ( शालपर्णी ), विदारी ( भूमिकूष्माण्ड ), विश्वदेवा ( नागवला या गंगेरन ), सहदेवा ( पीले फूलों की वला ), श्वदंष्ट्रा ( गोखरू ), पृथकपर्णी ( पिठवन ), शतावर, अनन्त-मूल ( सालसा ), कृष्णसारिवा, जीवक, ऋषभक, महासहा ( माषपर्णी ), क्षुद्रसहा ( मुद्रपर्णी ), बडी कटेरी, छोटी कटेरी, पुनर्नवा, एरण्ड, हंसपादी ( हंसराज ), विच्छ्रियाघास, ऋषभी ( कौंच के बीज ) ॥ ४ ॥

विमर्शः --- जीवकर्षभकाभावे गुडूचीवशलोचने । भावमिश्र ने इन दोनों के अभाव में विदारीकन्द लेना लिखा है ।

विदारिगन्धाऽऽदिरयं गणः पित्तानिलापहः ।

शोषगुल्माङ्गमर्दोर्ध्वश्वासकासविनाशनः ॥ ५ ॥

यह उपर्युक्त विदारिगन्धादि गण पित्त और वात को नष्ट करता है तथा राजयक्ष्मा, गुल्म, अङ्गमर्द, ऊर्ध्वश्वास और कास को नष्ट करता है ॥ ७ ॥

पृष्ठ 195

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री, पृष्ठ 195 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४२ सुश्रुतसंहिता । ( २ ) आरग्वधमदनगोपघोएटाकण्टकीकुटजपाठा-पाटलामूर्वेन्द्रथबसप्तपर्णनिम्बकुरुष्टकदासी - कुरुण्टक गुडूची चित्रकशार्ङ्गष्टाकरञ्जद्वयपटोलकिराततिक्तकानि सुपवी चेति ॥ ६ ॥

आरग्वधादिगण में निम्न ओषधियां है । अमलतास, मैन-फल, गोपघोण्टा ( कर्कोटी या सुपारी ), कण्टकी ( विककत ), कूडा, पाठा, पाटला, मूर्वा, इन्द्रयव, सतवन, निम्ब, कुरुण्टक ( सफेद फूलों की झिण्टी, ) दासी कुरण्टक ( नीले फूलों की ।

झिण्टी, पियावामा ), गिलोय, चित्रक, शार्ङ्गष्टा ( काकजङ्घा ), ।

नाटा और पूतीकरक्ष, पटोल, चिरायता, करेला ॥ ६ ॥

आरग्वधादिरित्येष गणः श्लेष्मविपापहः ।

मेहकुष्ठब्रवमीकडूनो व्रणशोधनः ॥ ७ ॥

यह आरग्वधादिगण कफ और चिप को नष्ट करता है तथा प्रमेह, कुष्ठ, ज्वर, बमन और कण्ड का नाशक तथा व्रणों का शोधक है ॥ ७ ॥

( ३ ) वरुणार्त्तगलशिग्रुमधुशियतर्कारीमे पशृङ्गीपूतीक-नक्तमाल मोरटाग्निमन्थमैरेयकद्वयविम्बीवसुकवसिरचि-त्रकशतावरीबिल्वाजशृङ्गीर्भा बृहतीद्वयचेति ॥ ८ ॥

वरुणात्रिराग में निम्न ओषधियां हैं । जैसे - चरुण, आतंगल ( नीले फूल का पियावासा ), सहजना, लाल सहजना, तर्कारी ( जयन्ती ), मेढा मिट्टी, पूतीकरज, नकमाल ( करक्ष ), मूर्वा या अकोल, अरणी, दोनों प्रकार के कुरण्टक, त्रिम्बी कुन्द ( ), a सुक ( चकपुष्प या आक ), वनिर ( अपामार्ग या गजपीपल ), चित्रक, शतावरी, बिल्व, काकडासिट्टी, कुश, छोटे और बडे फलों वाली कटेरी ॥ ८ ॥

वरुणादिर्गणो ह्येष कफमेदोनिवारण: 1. विनिहन्ति शिरःशूलगुल्माभ्यन्तरविद्रधीन् ॥ ६ ॥

उपर्युक्त वरुणादिगण की ओपधियां कफ और मेद को करती हैं तथा शिरःशूल, गुल्म और आभ्यन्तरिक विधि की नाशक है ॥ ९ ॥

( ४ ) वीरतरु सहचरद्वयदर्भवृक्षादनी गुन्द्रानलकुश-काशाश्मभेदकाग्निमन्थमोरटवसुकवसिर भल्लूककुर-एटकेन्द्रीवरकपोतवङ्काः श्वदंष्ट्रा चेति ॥ १० ॥

वीरतर्वादिगग में निम्न औषधिया है जैसे - वीरतरु ( अर्जुन ), दोनों प्रकार के सहचर ( पीत - नील पुष्पवाली पियावासा ), कुशा, वृंदाफ, गुन्द्रा, नरसल, कुश, काश, पाषाणभेद, अरणी, मोरट । ( मूर्वा ), चसुक ( चकपुष्प ), बसिर ( अपामार्ग ), भल्लूक ( म्योनाक ), कुरण्टक ( पीले फूल का पियावासा ), नील कमल, कपोतया ( घाह्मी ), गोरु ॥ १० ॥

वीरतर्वादिरित्येष गणो चातविकारनुत् ।

अश्मरीशर्करामूत्रकृच्छ्राघातरुजापहः ॥ ११ ॥

यह वीरतर्वादिगण वायु के विकार को नष्ट करता है तथा अश्मरी, शर्करा, मूत्रकृच्छ्र और मृत्राघात की पीडा को शान्त करता है ॥ ११ ॥

( ५ ) सालसाराजकर्णखदिरकदरकालस्कन्धक्रमुकभू-जमे पशृङ्गीतिनिशचन्दनकुचन्दनशिशपाशिरीषासनघ-वार्जुनतालशाकनक्तमालपूतीकाश्वकर्णागुरुणि कालीय-कञ्चेति ॥ १२ ॥

' सालसारादिगण ' में निम्न ओपधियां हैं जैसे सालवृक्ष, अजकर्ण, खैर, कदर ( श्वेत या पूर्ति खैर ), कालस्कन्ध ( तिन्दुक-वृक्ष या तमाल ), सुपारी का वृक्ष, भोजपत्र, मेढासिङ्गी, तिनिग ( सादन ), सिरस, असन, धव, अर्जुन, ताढ वृक्ष, शाक ( सागौन ), नक्तमाल ( करअ ), पृतिकरञ्ज, अश्वकर्ण ( साल वृक्षभेद ), अगर, कालीयक ( पीत चन्दन ) ॥ १२ ॥

सालसारादिरित्येष गणः कुष्ठविनाशनः ।

मेहपाण्ड्वामयहरः कफमेदोविशोपणः ॥ १३ ॥

यह ' सालसारादिगण ' कुष्ठ को नष्ट करता है तथा प्रमेह और पाण्डुरोग को नष्ट करता है एवं कफ और मेदो धातु का शोषक है ॥ १३ ॥

विमर्श: --- काठीयक तु कालीय पीताम हरिचन्दनम् ॥ ( ६ ) रोधसावररोधपलाशकुटन्नटाशोक फल्लीकट्-फलैलवालुकशल्लकीजिङ्गिनीकदम्बसालाः कदली चेति १४ रोधादिगण में निम्न ओषधियां हैं जैसे- लोध, पटानी लोध, ढाक, कुटन्नट ( श्योनाक ), अशोक, फञ्जी ( भारी ), कायफल, एलवालुक ( नालुका या हरिवालुलक ), शल्लकी, जिङ्गण, कदम्ब, साल, और कदली ॥ १४ ॥

परोधादिरित्युक्त मेदःकफहरो गणः ।

योनिदोपहरः स्तम्भी वय विपविनाशनः ॥ १५ ॥

यह रोधादि गण मेद और कफ को नष्ट करता है तथा योनि दोपों का नाशक, अतिसारादि रोगों में मलादि का स्तम्भक a ण में हितकारी और विप का नाशक है ॥ १५ ॥

( ७ ) अर्कालर्ककरद्वयनागदन्तीमयूरकभार्गीरास्ने-न्द्रपुष्पीक्षुद्रश्वेतामहाश्वेतावृश्विकाल्यलवणास्तापसवृक्ष-श्चेति ॥ १६ ॥

' अर्कादिगण ' में निम्न ओषधियां होती हैं जैसे आक, अलर्क ( सफेद आक ), दोनों प्रकार के करअ, नागदन्ती ( जमालगोटा ), अपामार्ग, भारगी, रास्ना, इन्द्रपुप्पी ( लांगली ), श्वेता ( सेफन्द, अतीस या विदारीकन्द ), महाश्वेता ( नील-पुप्प सेफन्द, वन्ध्याकर्कोटी, श्वेतापराजिता ), वृश्चिकाली ( मेढासिद्गी भेद ), अलवणा ( ज्योतिष्मती ) और तापस वृक्ष ( इङ्गुदी ) ॥ १६ ॥

अर्कादिको गणो ह्येष कफमेदोविपापहः ।

कृमिकुष्ठप्रशमनो विशेषाद् व्रणशोधनः ॥ १७ ॥

यह ' अर्कादिगण ' कफ, मेद और विपों को नष्ट करता है तथा कृमि और कुष्ठ का शामक और विशेषकर व्रणों का शोधक है ॥ १७ ॥

( ८ ) सुरसाश्वेतसुरसाफणिज्भकार्जक भूस्तृणसुगन्ध-कमुमुखकालमालकासमर्दक्षवकखर पुष्पा विडंग कट्फल-

पृष्ठ 196

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री, पृष्ठ 196 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रध्यायः ३८ ] सूत्रस्थानम् । १४३ सुरसीनिर्गुण्डीकुलाहलोन्दुरुकणिकाफञ्जी प्राचीबलंका-कमाच्यो विषमुष्टिकश्चेति ॥ १८ ॥

सुरसादिगण ' में निम्न ओषधियां होती हैं जैसे- सुरसा ( कृष्ण तुलसी ), श्वेत तुलसी, फणिज्झक ( मरुवक ), अर्जक ( वर्वरिका ), भूस्तृण ( रोहिस घास ), सुगन्धक ( द्रोणपुष्पी ), सुमुख ( राजिका ), कालमालिका ( कृष्णार्जक ), कसौंदी, aas ( नकलिंकनी ), खरपुष्पा ( वनवर्वरिका ), वायविडङ्ग, कायफल, सुरसी ( कपित्थपत्रा तुलसी या श्वेत निर्गुण्डी ), निर्गुण्डी ( नीलपुष्पा सम्भाल ), कुलाहल ( मुण्डिका ), उन्दुरुकर्णिका ( मूसाकानी ), फक्षी ( भारङ्गी ) प्राचीवल ( काकजंघा ), मकोय और विपमुष्टि ( राजनिम्व, वड़ी अल म्बुषा, कर्कोटी या कुचला इनमें से कोई एक ) ॥ १८ ॥

सुरसादिर्गणो ह्येष कफहृत् कृमिसूद्नः ।

प्रतिश्यायारुचिश्वासकासघ्नो व्रणशोधनः ॥ १६ ॥

यह ' सुरसादिगण ' कफ का नाशक, कृमियों का नाशक तथा प्रतिश्याय, अरुचि, श्वास और कास को नष्ट करता है एवं व्रणों का शोधक है ॥ १ ९ ॥ ( १ ) मुष्ककपलाशधवचित्रकमदनवृक्षकशिशपाव-वृक्षात्रिफला चेति ॥ २० ॥

' मुकादिगण ' में मोखा, ढाक, धव, चित्रक, मदन, वृक्षक ( कूडा ), सीसम, थूहर, हरड बहेडा, आंवला होते हैं ॥

मुष्ककादिर्गणोप मेदोध्नः शुक्रदोषहृत् ।

मेहार्शः पाण्डुरोगघ्नः शर्करानाशनः परः ॥ २१ ॥

. यह ' मुष्ककादिगण ' वढ़ी हुई चरवी तथा शुक्र दोषों को नष्ट करता है । इसी तरह प्रमेह, ववासीर, पाण्डुरोग और मूत्रशर्करा ( पथरी ) का नाशक है ॥ २१ ॥

( १० ) पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकशृङ्गबेर मरि-चहस्ति पिप्पलीहरेणुकैलाजमोदे न्द्रयवपाठाजीरकसर्षप-महानिम्बफलहिङ्गुभार्गी मधुरसाऽतिविषावचाविडङ्गा-नि कटुरोहिणी चेति ॥ २२ ॥

' पिप्पल्यादिगण ' में पिप्पली, पिपरामूल, चम्य, चित्रक, सोंठ, कालीमरिच, गजपीपल, हरेणुका, छोटी इलायची, अज मोद, इन्द्रयव, पाठा, जीरा, सरसों, बकायन का फल, हींग, भारंगी, मूर्वा, अतीस, वचा, वायविडग और कुटकी ये हैं ॥ २२ ॥

पिप्पल्यादिः कफहरः प्रतिश्याया निलारुचीः ।

-निहन्याद्दीपनो गुल्म शूलघ्नश्चामपाचनः ॥ २३ ॥

यह ' पिप्पल्यादिगण ' कफहर्ता तथा प्रतिश्याय, वात. विकार, अरुचि इन्हें नष्ट करता है तथा अग्नि का दीपक है, गुल्म और शूल का नाशक है एवं भामदोषों का पाचक है ॥ २३ ॥

( ११ ) एलातगरकुष्ठमांसीध्या मकत्वकुपननागपुष्प-प्रियङ्गुहरेणुकाव्याघ्रनखशुक्तिचण्डास्थौणेयकश्रीवेष्टक- ' ' ' चोच चोर कवालुकगुग्गुलुसर्जरसतुरुष्ककुन्दुरुकागरुस्पृ-क्कोशीरभद्रदारुकुङ्कुमानि पुन्नागकेशरव्चेति ॥ २४ ॥

' एलादिगण ' में छोटी इलायची, तगर, कूठ, जटामांसी, ध्यामक ( रोहिसतृण ), दालचीनी, पत्र ( तमालपत्र या तेजपत्र ), नागकेशर, प्रियडु, हरेणुका, व्याघ्रनख, शुक्ति ( नखीभेद ), चण्डा ( चोरक ), स्थौणेयक ( थुनेर ), श्रीवेष्टक, चोच ( दालचीनी भेद ), चोरक ( ग्रन्थिपर्णं ), वालुक ( खश ), गूगल, सर्जरस ( राल ), तुरुष्क ( शिलारस ), कुन्दुरु ( लोभान ), अगुरु, स्पृक्का ( सुगन्धित द्रव्य ), उशीर ( खस ), देवदारु, केशर, पुन्नागकेशर ( पद्मकेशर ) ये द्रव्य हैं ॥२४ ॥

एलादिको वातकफौ निहन्याद्विषमेव च ।

वर्णप्रसादनः कण्डूपिडकाकोठनाशनः ॥ २५ ॥

यह ' एलादिगण ' वात, कफ और विष को नष्ट करता है तथा शरीर के वर्ण को निर्मल करता है एवं कण्डू, पिडका और कोठ को नष्ट करता है ॥ २५ ॥

( १२ ) वचामुस्तातिविषाभयाभद्रदारुणि नागकेश-रचेति ॥ २६ ॥

' वचादिगण ' में वचा, नागरमोथा, अतीस, हरड, देवदारु और नागकेशर ये द्रव्य है ॥ २६ ॥

C ( १३ ) हरिद्रा दारुहरिद्रा कलशीकुटजबीजानि म-धुकं चेति ॥ २७ ॥

इसी तरह ' हरिद्रादि गण ' में हल्दी, दारूहल्दी, कलशी ( पृश्निपर्णी ), इन्द्रयव और मुलेठी ये द्रव्य हैं ॥ २७ ॥

एतौ वचाहरिद्रादी गणौ स्तन्यविशोधनौ ।

आमातिसारशमनौ विशेषाद्दोषपाचनौ ॥ २८ ॥

ये उपर्युक्त ' वचादिगण ' तथा ' हरिद्रादिगण ' दुष्ट स्तन्य ( दुग्ध ) के शोधक, आमातिसार के शामक और विशेष कर आम दोषों के पाचक हैं ॥ २८ ॥

( १४ ) श्यामामहाश्यामात्रिवृद्दन्तीशङ्खिनीतिल्वक-कम्पिल्लकरम्यकक्रमुकपुत्रश्रेणीगवाक्षीराजवृक्षकरञ्जद्वय-गुडूचीसप्तलाच्छ्रगलान्त्रीसुधाः सुवर्णक्षीरी चेति ॥२ ९ ॥ ' श्यामादिगण ' में काली निशोथ, महाश्यामा ( विधारा ), लाल निशोथ, दन्ती, शङ्खिनी ( कालमेघ या कालादाना ), तिल्वक ( लोध्र ), कबीला, रम्यक ( वकायन ), सुपारी, पुत्रश्रेणी ( दन्तीभेद ), गवाक्षी ( इन्द्रायण ), अमलतास, नाटा और पूर्ति करअ, गियोय, सातला, छगलान्त्री ( वृद्ध-दारुक भेद ), सेहुण्ड, स्वर्णतीरी ( सत्यानाशी, चोक, कंकुष्ट, उशारे रेवन ) ये ओषधियां हैं ॥ २ ९ ॥

उक्तः श्यामादिरित्येष गणो गुल्मविषापहः ।

आनाहोदरविड्भेदी तथोदावर्तनाशनः ॥ ३० ॥

उपर्युक्त यह ' श्यामादिगण ' गुल्म और विष को नष्ट करता

है तथा आध्मान और उदर रोग में मल का भेदन करता है ।

एवं उदावर्तनाशक है ॥ ३० ॥

( १५ ) वृहतीकण्टकारिकाकुटजफलपाठा मधु-कञ्चेति ॥ ३१ ॥

' वृहत्यादिगण ' में बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी, इन्द्रयव, पाठा । और मुलेठी ये द्रव्य हैं- ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 197

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री, पृष्ठ 197 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सुश्रुतसंहिता ।

पाचनोयो बृहत्यादिर्गणः पित्तानिलापहः ।

कफारोचकद्रोगमूत्रकृच्छ्ररुजापहः ॥ ३२ ॥

यह ' वृहत्यादिगण ' पाचनीय, पित्त और वात का नाशक एवं कफ, अरुचि, हृदयरोग और मूत्रकृच्छ्र की पीडा को नष्ट करता है ॥ ३२ ॥

( १६ ) पटोलचन्दनकुचन्दनमूर्वागुडूचीपाठाः कटु-रोहिणी चेति ॥ ३३ ॥

' पटोलादिगण ' में पटोल, श्वेत चन्दन, लालचन्दन, मूर्वा, गिलोय, पाठा तथा कुटकी ये द्रव्य हैं ॥ ३३ ॥

पटोलादिर्गणः पित्तकफारोचकनाशनः ।

न्त्ररोपशमनो प्रर्द्धादिकण्डूविषापहः ॥ ३४ ॥

यह ' पटोलादिगण ' पित्त, कफ और अरुचि को नष्ट करता है, ज्वर का शामक है, व्रण के लिये शोधनादि दृष्टि से हित-फारी है और वमन, कण्डू तथा विष को नष्ट करना है ॥ ३४ ॥

( १७ ) काकोलीचीरकाकोलीजीवकर्षभकमुद्गपर्णीमा-पपर्णीमेदामहामेदाच्छिन्नरुहा कर्कट शृङ्गीतुगातीरीपद्म-कप्रपौण्डरीकद्धि वृद्धिमृद्वी काजीवन्त्यो मधुकञ्चेति ३५ ' काकोल्यादिगण ' में काकोली, चीरकाकोली, जीवक, ऋपक, सुपर्णी, मापपर्णी, मेदा, महामेदा, गिलोय, काकड़ा मिट्टी, वंशलोचन, पदमकाठ, प्रपौण्डरीक ( श्वेत कमल ), ऋद्धि, वृद्धि, द्राक्षा, जीवन्ती और मुलेठी ये हैं ॥ काकोल्यादिरयं पित्तशोणितानिलनाशनः । जीवनो बृंहणो वृष्यः स्तन्यश्लेष्मकरस्तथा यह ' काकोल्यादिगण ' पित्त, रक्त और वायु जीवनीय, बृंहणीय, वृष्य है तथा दुग्ध और क्षीण बढ़ाना है ॥ ३६ ॥

विमर्श - इस गण में अष्टवर्ग की ओपधियों उनके न मिलने पर निम्न औषध लेना लिसा है ३५ ॥ ॥ ३६ ॥

का नाशक, हुये कफ को का वर्णन है । ऋदयभावे चन्न ग्राना वृद्धयभावे महाबला । नेदाभावे चाश्वगन्धा महामेदे तु शारिया ॥ जोवरूपमकाभावे गुडूचीवशलोचने । काकोटीयुगलाभावे निक्षिपेच शतावरीम् ॥ अष्टवर्गाप्राप्ती भावप्रकाशमतम् - मेदाजीवक-काकोनोवृद्धिद्वन्द्वेऽपि वासनि । वरी विदार्यश्वगन्धावाराहीश्च क्रमात क्षिपेत् ॥ ( १८ ) - ऊपकसैन्धवशिलाजतुकासीसद्वयहिङ्गुनि तुत्यचेति ॥ ३७ ॥

' ऊपकादिगण ' में ऊपक ( क्षारमृत्तिका ), सेन्धानमक, शिलाजीत, कासीस और पुष्पकामीस, हींग तथा नील थोथा ये द्रव्य है ॥ ३७ ॥

ऊपकादिः कफं हन्ति गणो मेदोविशोषणः ।

अश्मरीशर्करामूत्रकृच्छ्रगुल्मप्रणाशनः ॥ ३८ ॥

यह ' ग ' क्फ को नष्ट करता है । मेदो वृद्धि को शोषित करता है तथा भश्मरी, शर्करा, मूत्रकृच्छ्र और गुल्म को नष्ट करता है ॥ ३८ ॥

( १६ ) सारिवामधुकचन्दनकुचन्दनपद्मककाश्मरी-फलमधूकपुष्पाण्युशीरचेति ॥ ३६ ॥

' सारिवादिगण ' में सारिवा ( अनन्तमूल ), मुलेठी, चन्दन, लालचन्दन, पद्माख, संभारी का फल, महुवे के फूल, खस ये द्रव्य है ॥ ३ ९ ॥

सारिवाऽऽदिः पिपासाघ्नो रक्तपित्तहरो गणः ।

पित्तन्वरप्रशमनो विशेषाद्दाहनाशनः ॥ ४० ॥

यह ' सारिवादिगण ' प्यास को नष्ट करता है, रक्तपित्त का नाशक है, पित्तञ्चर को शान्त करता है तथा विशेष कर दाह का नाशक है ॥ ४० ॥

( २० ) अञ्जनरसाञ्जननागपुष्प प्रियङ्गुनीलोत्पलन-लढ़नलिन केशराणि मधुकञ्चेति ॥ ४१ ॥

' अञ्जनादिगण में भञ्जन ( सौवीराञ्जन, Sulphide of load ), रसाञ्जन ( स्रोतोञ्जन Antimony sulphide, तथा दारुहरिद्राकाथकृत ), नागकेशर, प्रियद्धु, नीलकमल, उशीर, कमलकेशर और मुलेठी ये द्रन्य हैं ॥ ४१ ॥

अञ्जनादिर्गणो ह्येष रक्तपित्तनिबर्हणः ।

विषोपशमनो दाहं निहन्त्याभ्यन्तरं तथा ॥ ४२ ॥

यह अञ्जनादि गण रक्तपित्त का नाशक, चिप का संशामक तथा शरीर के भीतरी दाह को नष्ट करता है ॥ ४२ ॥

विमर्श: --- रसायन द्विविध, स्रोतोञ्जन कृष्णपापाणाकृति Antimony Sulphide, धातुद्रव्य, द्वितीयञ्च दारुहरिद्राक्वाथेन कृत कृत्रिम पोतकृष्णद्रव्यम् - दार्वी क्वाथसम क्षीर पाठ पक्त्वा यदा घनन् । तदा रसाजन खनात नेत्रयो. परम हितम् ॥ नलद --- वीर

णस्य तु मूल स्यादुशीर नलद च तत् ।

( २१ ) परूपकद्राक्षाकट्फलदाडिमराजादनकतकफ-लशाकफलानि त्रिफला चेति ॥ ४३ ॥

' परूपकादिगण ' में फालसा, द्राक्षा, कट्फल, दाहिम, खिरणी, निर्मलीवीज, सागवान का फल तथा त्रिफला ये हैं ॥

परूपकादिरित्येष गणोऽनिलविनाशनः ।

मूत्रदोपहरो हृद्यः पिपासाध्नो रुचिप्रदः ॥ ४४ ॥

यह ' परूपकादिगण ' वात को नष्ट करता है, मूत्र के दोषों का हारक, हृदयहितकारी, प्यास को नष्ट करने वाला तथा रुचिकारक है ॥ ४४ ॥

( २२ ) प्रियङ्गुसमङ्गाघातकीपुन्नागनागपुष्पचन्दन-कुचन्दनमोचरसरसाञ्जनकुम्भीकस्रोतोञ्जनपद्मकेसरयो-जनवल्ल्यो दीर्घमूला चेति ॥ ४५ ॥

' प्रियवादिगण ' में प्रियद्धु, लजालु, घाय के फूल, पुन्नाग ( तु ), नागपुष्प ( नागकेशर ), श्वेत चन्दन, रक्तचन्दन, मोचरस, रसाञ्जन, जलकुम्भी, स्रोतोऽञ्जन, कमल केशर, मजीठ, शालपर्णी अथवा दुरालभा ये द्रव्य है ॥ ४५ ॥

( २३ ) अम्बष्ठाधातकीकुसुमसमङ्गा कट्वद्गमधुकवि-ल्वपेशिकासावररोध्रपलाशनन्दीवृत्ताः पद्मकेशराणि चेति ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 198

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री, पृष्ठ 198 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्यायः ३८ ] सूत्रस्थानम् । १४५ ' अम्बष्ठादिगण ' में अस्त्रष्ठा ( पाठा ), धाय के फूल, लज्जालु, सोनापाठा, मुलेठी, बेलफल की गिरी, पठानीलोध, ढाक, तून और कमलकेशर ये द्वन्य हैं ॥ ४६ ॥

गणौ प्रष्ठादी पक्कातीसारनाशनौ ।

सन्धानीयौ हितौ पित्ते व्रणानां चापि रोपणौ ॥४७ ॥

उपर्युक्त ' प्रियङ्ग्वादिगण ' तथा ' अम्बष्ठादिगण ' पक्क अति सार को नष्ट करते हैं, भग्न अस्थि का सन्धान करते हैं तथा पित्त के विकारों में हितकर और व्रणों का रोपण करते हैं ॥ १७ ॥

( २४ ) न्यप्रोघोदुम्बराश्वत्थप्लक्षमधुककपीतनककु-भाम्रकोशाम्रकचोरकपत्रजम्बूद्वयपियालमधूकरोहिणीव-जुलकदम्बबद्ररीतिन्दुकीसल्लकीरोधसावररोधभल्ला-तकपलाशा नन्दीवृनश्चेति ॥ ४८ ॥

' न्यग्रोधादिगण ' में वड़, गूलर, पीपल, पाखर, मुलेठी, आम्रातक, अर्जुन, आम, कोशात्र, चोरक के पत्ते, वडी और छोटी जामुन, चिरोली वृक्ष, महुआ, कुटकी, वेतस, कदम्व, बैर, तेन्दु, सहलकी, लोध, सावरलोध, मिलावा, ढाक और नन्दीवृक्ष ( पारसपीपल ) ये द्रव्य हैं ॥ ४८ ॥

न्यग्रोधादिर्गणो ब्रण्यः संग्राही भग्नसाधकः ।

रक्तपित्तहरो दाहमेदोघ्नो योनिदोपहृत् ॥ ४ ९ ॥

यह ' न्यग्रोधादिगण ' ऋण का हितकारी, सङ्ग्राही, भग्न-अस्थि को जोडने वाला, रक्तपित्त का नाशक, दाह और मृढ मेदोधातु का नाशक तथा योनिदोपहारक है ॥ ४ ९ ॥ ( २५ ) गुडूचीनिम्बकुस्तुम्बुरुचन्दनानि पद्म-कञ्चेति ॥ ५० ॥

' गुहूच्यादिगण ' में गिलोय, नीम, धनियां, चन्दन और पद्माख ये द्रव्य हैं ॥ ५० ॥

एष सर्वज्वरान् हन्ति गुडूच्यादिस्तु दीपनः ।

हल्लासारोचकवमीपिपासादाहनाशनः ॥ ५१ ॥

यह ' गुडुच्यादिगण ' सर्व प्रकार के ज्वरों का नाशक और दीपन है तथा हृलास ( जीमिचलाना ), अरुचि, वमन, पिपासा और दाह को नष्ट करता है ॥ ५१ ॥

( २६ ) उत्पलरक्तोत्पलकुमुदसौगन्धिककुवलयपुण्ड-रीकाणि मधुकञ्चेति ॥ ५२ ॥

' उत्पलादिगण ' में कमल, लाल कमल, श्वेत कमल, नील कमल, श्वेत नीलकमल, पुण्डरीक ( अतिश्वेत कमल ) और मुलेठी ये द्वय हैं ॥ ५२ ॥

उत्पलादिरयं दाहपित्तरक्तविनाशनः ।

पिपासाविषहृद्रोगच्छर्दिमूर्च्छाहरो गणः ॥ ५३ ॥

' उत्पाद शाह, रक्तपित्त, पिपासा, विपविकार, हृदय के रोग, वमन और मूर्च्छा को नष्ट करता है । ( २७ ) मुस्ताहरिद्रादारुहरिद्राहरीतक्यामलकबिभी- । तककुष्ठ हैमवतीवचापाठाकटुरोहिणीशार्ङ्गष्टाऽतिविषा-द्राविडी भल्लातकानि चित्रकश्चेति ॥ ५४ ॥

‘ मुस्तादिगण ' में मोथा, हलदी, दारुहळदी, हरड़, आंवला, १६ सु ० बहेडा, कूठ, श्वेत वचा, बचा, पाठा, कटुकी, काकजंघा, अतीस, द्राविड़ी ( छोटी इलायची ), भिलावा और चित्रक ये द्रव्य हैं ॥

एप मुस्तादिको नाम्ना गणः श्लेष्मनिषूदनः ।

योनिदोषहरः स्तन्यशोधनः पाचनस्तथा ॥ ५५ ॥

यह ' मुस्तादिगण ' नामक औषधवर्ग कफ के रोगों को नष्ट करता है, योनि के दोषों का विनाशक, स्तन्यशोधक तथा आमादि दोषों का पाचक है ॥ ५५ ॥

( २८ ) हरीतक्यामलकबिभीतकानि त्रिफला ॥ २६ ॥

त्रिफला - हरीतकी, आंवले और बहेड़ा इन्हें ' त्रिफला ’ कहते हैं ॥ ५६ ॥

विमर्श: यहां ' त्रिफला ' से समान प्रमाण तीनों का लिया | है अन्यत्र प्रमाणभिन्नता है — एका हरीतकी योजना द्वौ च योज्यौ विभीतकौ । चत्वार्यांमलकान्याहुखिफलैपा प्रकीर्तिता ॥ ( शार्ङ्गघर ) । भावप्रकाश समप्रमाण ग्रहण करता है -- पथ्याविभीतधात्रीणा फलै. स्यात् त्रिफला समैः । महती स्वल्पा च त्रिफला पथ्या विभी-तकं धात्री महती त्रिफला मता । स्वल्प । काश्मर्यखर्जूरपरूपकफलैर्भवेत् ॥

त्रिफला कफपित्तघ्नी मेहकुष्ठविनाशनी ।

चक्षुष्या दीपनी चैव विषमज्वरनाशनी ॥ ५७ ॥

' त्रिफला ' कफ और पित्तको नष्ट करती है तथा प्रमेह और कुष्ठ को भी नष्ट करती है एवं नेत्रों के लिये हितकर तथा अग्नि की दीपक और विषमज्वर को नष्ट करती है ॥ ५७ ॥

( २१ ) पिप्पलीमरिचशृङ्गवेराणि त्रिकटुकम् ॥ २८ ॥

' त्रिकटु ' - छोटी पीपल, काली मरिच और सोंठ इन्हें ' त्रिकटु ' कहते हैं ॥ ५८ ॥

त्र्यूषणं कफमेदोघ्नं मेहकुष्ठत्वगामयान् ।

निहन्याद्दीपनं गुल्मपीनसाग्न्यल्पतामपि ॥ ५६ ॥

' यूषण ' ( त्रिकटु ) कफ और मेदोरोगों को नष्ट करता है तथा प्रमेह, कुछ और त्वचा के रोगों को नष्ट करता है एवं अग्नि को दीप्त करता है तथा गुल्म, पीनस और मन्दाग्नि को नष्ट करता है है ॥ ५ ९ ॥ ` ( ३० ) आमलकीहरीतकीपिप्पल्यश्चित्रकश्चेति ॥ ६० ॥

' आमलक्यादिगण ' में आंवले, हरड, पीपल और चित्रक ये द्रव्य हैं ॥ ६० ॥

आमलक्यादिरित्येष गणः सर्वब्वरापहः ।

चक्षुष्यो दीपनो वृष्यः कफारोचकनाशनः ॥ ६१ ॥

यह ' आमलक्यादिगण ' सर्वप्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है, नेत्रों के लिये हितकारी है, अग्नि को दीप्त करता है, वृष्य है तथा कफ और अरोचक को नष्ट करता है ॥ ६१ ॥

( ३१ ) त्रपुसीसताम्ररजतकृष्णलोहसुवर्णानि लोह-मलश्चेति ॥ ६२ ॥

' त्रप्वादिगण ' में त्रपु वंग ( Tin ), सीसा ( Iread ), ( Copper ), चांदी ( Silver ), कान्तलौह ( Iron ), ताम्बा सुवर्ण ( Gold ) और लोहे का किट्ट ( मण्डूर ) ये द्रव्य हैं ॥६२ ॥

पृष्ठ 199

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री, पृष्ठ 199 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४६ सुश्रुतसहिता ।

विमर्शः— उत्तमलोहकिट्टलक्षणम् - शताब्दमुत्तमं कीट मध्यचा- ।

शीतिवार्षिकम् । अधम पष्टिनषय ततो हीन विषोपमम् ॥

गणादिरित्येपर क्रिमिहरः परः ।

पिपासाविपहृद्रोगपाण्डुमेहहरस्तथा ॥ ६३ ॥

यह ' नप्वादिगण ' गरदोप तथा क्रिमियों को नष्ट करता है तथा प्यास, विपविकार, हृदय के रोग, पाण्डु और प्रमेह को नष्ट करता है ॥ ६३ ॥

विमर्श: - ' गर ' से कृत्रिमविप ग्रहण करते हैं । नानाप्राण्य-प्रशमलविरुद्वौषधि भस्मनाम् । विषाणा चाल्पवीर्याणा योगो गर इति स्मृतः ॥ ( चाग्भट ) । ( ३२ ) लाक्षा रेवतकुटजाश्वमारकट्फलहरिद्राद्वयनि-म्बसप्तच्छदमालत्यत्रायमाणा चेति ॥ ६४ ॥

' लाचादिगण ' में लाख, अमलतास, कूडा, कनेर, काय फल, हलदी, दारुहळदी, निम्ब, सप्तपर्ण, चमेली और त्रायमाणा ये द्रव्य हैं ॥ ६४ ॥

कषायस्तिक्तमधुरः कफपित्तार्त्तिनाशनः ।

कुष्ठक्रिमिहरश्चैव दुष्टव्रणविशोधनः ॥ ६५ ॥

यह ' लाक्षादिगण ' कपाय, तिक्त और मधुर है तथा कफ और पित्त की वेदना को विनष्ट करता है, कुछ और क्रिमि नाशक एवं दुष्टत्रण का विशोधक है ॥ ६५ ॥

पञ्च पञ्चमूलान्यत ऊर्ध्वं वक्ष्यामः ॥ ६६ ॥

अब इसके अनन्तर पांच प्रकार के पञ्चमूलों का वर्णन करते हैं ॥ ६६ ॥

विमर्श: - ' अष्टाङ्गसंग्रह ' में मध्यम और जीवन नामक दो पञ्चमूल अधिक वर्णित हैं । वलापुनर्नवैरण्डसूप्यपर्णीद्वयेन च । मध्यम कफवातन्न नातिपित्तकर लघु ॥ अभीरुवीरानीवन्तीजीवक भकै स्मृतम् । जीवनाख्यन्तु चक्षुष्य वृष्य पित्तानिलापहम् ॥ ( ३३ ) तत्र त्रिकण्टक बृहतीद्वयपृथक्पर्यो विदारि गन्धा चेति कनीयः ॥ ६७ ॥

इन पञ्चमूलों में गोखरू, छोटी कटेरी, बढी कटेरी, पृश्नि-पर्णी और विदारीगन्धा ( शालपर्णी ) यह लघु पञ्चमूल है ॥६७ ॥

कपायतिक्तमधुरं कनीयः पञ्चमूलकम् ।

वातघ्नं पित्तशमनं बृंहणं बलवर्द्धनम् ॥ ६८

' लघु पञ्चमूल ' कपाय, तिक्त और मधुर होता है तथा बात को नष्ट करता है, पित्त का शमन करता है, बृंहण है और शरीर केवल को बढाता है ॥ ६८ ॥

( ३४ ) बिल्वाग्निमन्थटिटुकपाटला: काश्मर्य-श्वेति महत् ॥ ६६ ॥

बिल्व, अरणी, सोनापाठा, पाढल और गम्भारी ये द्रव्य ' बृहत्पञ्चमूल ' कहलाते हैं ॥ ६ ९ ॥ सतिक्तं कफवातघ्नं पाके लध्यग्निदीपनम् मधुरानुरसचैव | पञ्चमूलं महत् स्मृतम् ॥ ७० ॥

' बृहत्पन्नमूल ' तिक्त होता है, कफ और वात को नष्ट करता है, पाक में लघु होता है, अग्नि का दीपक है तथा अनुरस में मधुर होता है ॥ ७० ॥

विमर्शः - अनुरस - व्यक्त शुष्कस्य चादौ च रसो द्रव्यस्य लक्ष्यते । विपर्ययेणानुरस ' । ( चरक ) । अन्यच्च — अनुरसस्तु रसे •

नाभिभूतत्वादव्यक्तो व्यक्तो वा किञ्चिदन्ते ॥ ( अ ० सं ० ) ।

अनयोर्दशमूलमूच्यते ॥ ७१ ॥

उपर्युक्त लघु और महत् पञ्चमूल मिलकर दशमूल कहलाते हैं ॥

गणः श्वासहरो ह्येष कफपित्तानिलापहः ।

आमस्य पाचनश्चैव सर्वज्वरविनाशनः ॥ ७२ ॥

यह दशमूलगण श्वासनाशक, कफ, पित्त और वात का शामक, आमढोपों का पाचक तथा सर्वप्रकार के ज्वरों का नाशक है ॥ ७२ ॥

( ३५ ) विदारी सारिवारजनीगुडूच्योऽजशृङ्गी चेति । वल्लीसंज्ञः ॥ ७३ ॥

' वल्लीपञ्चमूल ' में विदारीकन्द, सरिवन, हरिद्रा, गिलोय और मेढासीङ्गी ये द्रव्य हैं तथा इन्हें वल्लीसंज्ञक पञ्चमूल कहते है ॥ ७३ ॥

( ३६ ) करमर्दन्त्रिकण्टकसैरीयकशतावरीगृधनख्य-इति कण्टकसंज्ञः ॥ ७४ ॥

' कण्टकपञ्चमूल ' में करोंदा, गोखरू, पियावासा, शतावरी और गृधनखी ( वदरवृक्ष ) ये द्रव्य हैं तथा इन्हें कण्टक संज्ञक पञ्चमूल कहते हैं ॥ ७४ ॥

रक्तपित्तहरौ तौ शोफत्र यविनाशनौ ।

सर्वमेहहरौ चैव शुक्रदोषविनाशनौ ॥ ७५ ॥

उक्त ' वल्लीपञ्चमूल ' तथा ' कण्टकपञ्चमूल ' ये दोनों गण रक्तपित्त को नष्ट करते है तथा तीनों प्रकार के ( वातिक, पैत्तिक और श्लैष्मिक ) शोथ को नष्ट करते हैं एवं सर्व प्रकार के प्रमेहों के नाशक और शुक्र के दोपों के संहारक होते हैं ॥७५ ॥

( ३७ ) कुशकाशनलदर्भकाण्डेका इति तृणसं -ज्ञक ॥ ७६ ॥

' तृणपञ्चमूल ' में कुश, काश, नरसल, दर्भ और काण्डेक ( सांठा ) ये द्रव्य होते हैं तथा इन्हें तृणसंज्ञक पञ्चमूल कहते हैं ॥

मूत्र दोपविकारञ्च रक्तपित्तं तथैव च ।

अन्त्यः प्रयुक्तः क्षीरेण शीघ्रमेव विनाशयेत् ॥ ७७ ॥

यह अन्तिम ' तृणपञ्चमूल ' दुग्ध के साथ प्रयुक्त करने से मूत्र दोपों को तथा रक्तपित्त को शीघ्र ही नष्ट करता है ॥७७ ॥

विमर्शः - चरकीय तृणपञ्चमूलम् - शरेक्षुदर्भकाशाना शालीना मूलमेव च ।

एपां वातहरावाद्यावन्स्यः पित्तविनाशनः ।

पञ्चकौ श्लेष्मशमनावितरौ परिकीर्त्तितौ ॥ ७८ ॥

उक्त पांच प्रकार के पञ्चमूलों में से ' आदि के लघु तथा महत्पञ्चमूल विशेषकर वातनाशक हैं तथा अन्तिम तृणपच-मूलक पित्तनाशक है तथा शेष दो वल्ली और कण्टक पञ्चमूल । कफ के शामक हैं ॥ ७८ ॥

पृष्ठ 200

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री, पृष्ठ 200 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रध्यायः ३ ९ ] सूत्रस्थानम् । १४७ विमर्शः - वल्ली जपञ्चमूलगुगा - वहीनं पञ्चमूलन्नु प्रशस्तं कफ-नाशनम् । सृष्टसूत्रानिलहरं वृष्यमिन्द्रियबोधनम् ॥ कण्टकपञ्चमूल-गुणाः - कण्टकान्यं पञ्चमूलं कफानिल्हर परम् । मधुरानुरसचैव पक्वाशयविशोधनन् ॥ त्रिवृतादिकमन्यत्रोपदेक्ष्यामः ॥ ७६ ॥

' त्रिवृतादिगग ' का अन्य स्थान पर वर्णन करेंगे ॥ ७ ९ ॥

समासेन गणा ह्येते प्रोक्तास्तेपान्तु विस्तरम् ।

चिकित्सितेषु वक्ष्यामि ज्ञात्वा दोषबलाबलम् । ८० ॥

संक्षेप से यहां पर उक्त गणों का वर्णन किया है । आगे चिकित्सा स्थान के अध्यायों में दोपों के बलावल के अनुसार इनका विस्तार से वर्णन करेंगे ॥ ८० ॥

एभिर्लेपान् कषायांश्च तैलं सपपि पानकान् ।

प्रविभज्य यथान्यायं कुर्वीत मतिमान् भिषक् ॥ ८१ ॥

" मतिमान् वैद्य उक्त गुणों में कह हुये द्वन्यों से यथाविधि । लेप, कषाय, तैल, वृत और पानक आदि योग बनाकर जिस रोग में जो उचित हो उसे वहां प्रयुक्त करे ॥ ८१ ॥

धूमवर्णानिलक्लेदैः सर्वर्तुध्वनभिद्रुते ।

ग्राहयित्वा गृहे न्यस्येद्विधिनौषघसङ्ग्रहम् ॥ = २ ॥

ओषधिरक्षण व्यवस्था - शास्त्र की विधि के अनुसार ओषधियों को उखाड़ कर धूआं, वर्षा, वायु और जल इनसे खराब न होने वाले एवं सर्व ऋतुओं में भी अनुकूल ऐसे मकान में ओषधिसंग्रह ( स्थापन ) करना चाहिये ॥ ८२ ॥

समीक्ष्य दोषभेदांश्च मिश्रान् भिन्नान् प्रयोजयेत् ।

पृथङ् मिश्रान् समस्तान् वा गणं वा व्यस्तसंहतम् ॥ ३ ॥।

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने द्रव्यसङ्ग्रहणीयो नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥

दोषों के भेदों का भलीभांति विचार करके उनमें दोष मिश्रित हैं अथवा भिन्न ( पृथक ) हैं ऐसा ठीक तरह से ज्ञान कर ओषधियों का या उक्त गणों का पृथक् योग, मिश्रित योग अथवा गण की समस्त ओषधियां का प्रयोग करना । चाहिये । अथवा गण की एक, दो, तीन या चार औषधियों को पृथकू या अन्य गग की ओषधियों के साथ संयुक्त कर प्रयोग करना चाहिये ॥ ८३ ॥

इत्यायुर्वेदतत्त्वसन्दीपिकाभाषायां सूत्रस्थाने द्रव्यसंग्रह-णीयो नामाष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ३८ ॥

-mwimm

एकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ।

श्रथातः संशोधनसंशमनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब इसके अनन्तर संशोधन तथा संशमनीय अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्गः - सशोधनलक्षण यथा वाग्भटे - यदीरये द्वहिर्दोषान् पञ्चथा शोधनञ्च तत् ॥ संशननलक्षणम् - न शोधयति यद्दोषान् समान्नोदोरयत्यपि । समीकरोति विषमान् शमनम् ( वाग्भट ) । मदनकुटजजीमूत के क्ष्वाकुधामार्गवकृत वेधनसर्पप-विडग पिप्पली करम पुन्नाडकोविदारकर्बुदारारिष्टाश्वग न्धाविदुलबन्धुजीवकश्वेताशणपुष्पीविम्वीवचामृगेर्वारु-श्चित्रा चेत्यूर्ध्वभागहराणि । तत्र, कोविदारपूर्वाणां फलानि । कोविदारादीनां मूलानि ॥ ३ ॥

ऊर्ध्वभाग - दोपहर द्रव्य या वामक द्वन्य — मैनफल, कूडा, देवदाली, कड़वी तुम्बी, धामार्गव ( पीतपुप्पा कोशातकी ), कृतवेधन ( कोपातकी का भेद ), श्वेत सरसों, वायविडङ्ग, पीपल, करञ्ज, चक्रमर्द, कचनार, कर्बुदार ( लिसोड़ा ), निम्ब, असगन्ध, विदुल ( वेतस ), बन्धुजीवक ( गुलदुपहरिया ), सफेद वचा, शणपुष्पी ( वन्यशण ), विम्बी ( कुन्दरु ), वचा, मृगेर्वारु ( इन्द्रवारुणी ) और चित्रा ( द्रवन्ती ) ये द्वन्य वमन द्वारा ऊर्ध्वभाग अर्थात् आमाशय, फेफड़े, श्वासमार्ग, नासामार्ग और शिर इनमें स्थित कफादि दोषों का हरण करने वाले हैं । इन द्रव्यों में से कोविदार से पूर्व ओषधियों के फल तथा कोविदार से चित्रा तक की ओपधियों की जड़ वमनार्थ प्रयुक्त करनी चाहिये ॥ ३ ॥

त्रिवृताश्यामादन्तीद्रवन्तीसप्तलाशङ्खिनीविपाणिका-गवाक्षीच्छगलान्त्री स्रुक्सुवर्णक्षीरिचित्रक किणिहीकुश-काशतिल्वककम्पिल्लकरम्यकपाटलापूगहरीतक्यामलक-विभीतकनीलिनीचतुरङ्गुलैरण्डपूतीकमहावृक्षसप्तच्छ-दार्क ज्योतिष्मती चेत्यधोभागहराणि । तत्र तिल्वक-पूर्वाणां मूलानि । तिल्वकादीनां पाटलान्तानां त्वचः ।

कम्पिल्लकफलरजः । पूगादीनामेरण्डान्तानां फलानि ।

पूतीकारग्वधयो पत्राणि । शेषाणां क्षीराणीति ॥ ४ ॥

अधोभाग दोपहरद्रव्य अथवा विरेचक द्वन्य - लाल निशोथ, काली निशोथ, दन्ती, द्रवन्ती, सप्तला ( सातला सेहुण्ड ), शङ्खिनी ( यवतिक्ता, कालमेघ ), विपाणिका ( वृश्चिकाली, मेढासीगी ), गवाक्षी ( इन्द्रवारुणी ), छ्गलान्त्री ( विधारा ), स्रुक् ( थूहर ), स्पर्णक्षीरी ( सत्यानाशी ), चित्रक, किणही ( अपामार्ग ) कुश, काश, तिल्वक ( लोध ), कवीला, रम्यक ( वकायन या पटोलमूल ), पाटला, सुपारी, हरड़, आंवला, बहेडा, नील, चतुरङ्गुल अमलतास ), एरण्ड, पूतिकरञ्ज, महावृक्ष ( सेहुण्ड ), सप्तपूर्ण, आक और ज्योतिष्मती ( माल-कांगनी ), ये ओषधियां विरेचन द्वारा अधोभाग के ( वात मल, मूत्रादि ) दोषों का हरण करती हैं । इनमें से तिल्वक से पूर्व की ओषधियों की जड़ें लेनी चाहिये तथा तिक्वक से पाटला तक की ओषधियों की छालें लेवें और कम्पिल्लक के | फल के ऊपर सञ्चित हुई रज ग्रहण करे तथा सुपारी से लेकर एरण्ड तक के द्रव्यों के फल ग्रहण करे और पूतिक तथा भारग्वध ( अमलतास ) के पत्र तथा शेष ओषधियों का । वीर विरेचनादि कार्य में ग्रहण करना चाहिये ॥ ४ ॥

विमर्शः -- अमलतास के व्यवहार में फली के गूदे का