श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 221–230
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 221–230
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श्रध्यायः ४५ ] सूत्रस्थानम् । १६६ उसे पीने के कार्य में नहीं ग्रहण करना चाहिये । किन्तु आश्विन मास में बरसने वाला सामुद्र जल भी गाड्न के समान दोष-रहित होने से पीने योग्य होता है । उभयप्रकारक जल में गाङ्ग जल प्रधान है । उसे आश्विन के मास में एकत्रित करना चाहिये । पवित्र तथा श्वेत वस्त्र को खुले मैदान में फैला कर उसके एक प्रदेश से चुभा कर शुद्ध पात्र में भर लेवे अथवा पक्के मकान को साफ छत से गिरा हुआ अथवा अन्य पवित्र पानों में प्रथम सञ्चित कर फिर सोने, चांदी या मिट्टी के बड़े पात्रों में रखना चाहिये । इस प्रकार से गृहीत तथा सुरक्षित जल को बारहों मास पीने के कार्य में लेना चाहिये । गाङ्ग जल के नहीं मिलने पर भौम जल कार्य में लेवे किन्तु भौम जल भी आकाश गुण अधिक भूमि का होना चाहिये । भौम जल सात प्रकार का होता है जैसे कुएं का, नदी का, तालाब का, तड़ाग का, झरने का, पृथ्वी को फोड़कर निकला हुआ ( सोते का ) और चुण्टी ( बिना बन्धे हुये ) का जल ॥ ७ ॥
विमर्शः - रामि. पततीति धारम् । उक्त च- ' धाराभिः पतितं तोय गृहीतं स्फीतवाससा । शिलाया वसुधायां वा धौताया पतितं च यत् ॥ सौवर्णे राजते ताम्रे स्फाटिके काचनिर्मिते । भाजने मृन्मये वाऽपि स्थापित धारमुच्यते ॥ ' इति । कार वर्षोपलोद्भवम् । ' करो वर्षोपले ' इति मेदिनी । तौषारम् = आन्तरिक्षजलनिचयजातम् ' । हैम । स्फटिक शिलाशकलसदृशहिमोद्भवम् । चरक में आन्तरिक्ष जल के गान और सामुद्र ऐसे भेद नहीं किये हैं । हारीतसहितोत्तसामुद्रजललक्षणम् - आविल समल
नीलं घन पीतमथापि वा । सक्षारं पिच्छिलचैव सामुद्र तन्निगद्यते ॥
वर्तमान में मकान की छतों के वर्षा जल को इकट्ठा करने के यन्त्र होते हैं. जिन्हें Robert's or gabb's rain water separator कहते हैं । ये शुद्ध पानी ही ग्रहण करते हैं । तंत्र वर्षास्वान्तरिक्षमौद्भिदं वा सेवेत, महागुण-त्वात् । शरदि सर्वं, प्रसन्नत्वात् । हेमन्ते सारसं ताडागं वा; वसन्ते कौपं प्रास्रवणं वा; ग्रीष्मेऽप्येवम्; प्रावृषि चौष्ट्यमनभिवृष्टं सर्वचेति ॥ ८ ॥
इनमें से वर्षा काल में आन्तरिक्ष अथवा औद्भिद जल को अधिक गुणयुक्त होने से सेवन करना चाहिये । शरद् ऋतु में सर्व प्रकार के जलों को सेवन कर सकते हैं क्यों कि अगस्त्यो । दु से सब जल प्रसन्न ( निर्मल ) हो जाते हैं । हेमन्त ऋतु । में सरोवर या तालाब का पानी पीना चाहिये । वसन्त ऋतु में कुंये अथवा झरने का पानी पीना चाहिये । ग्रीष्म ऋतु में भी यही जल पेय है । प्रावृट् ऋतु में चुण्टी ( अबद्ध कूप ) का तथा वर्षा के जल से अदूषित कोई भी जल पी सकते हैं ॥ ८ ॥
चिमर्शः -- चरके - शरदि हसोदकस्य सर्वश्रेष्ठता - दिवा सूर्योशुस न्तप्तं निशि चन्द्राशुशीतलम् । कालेन पक्च निर्दोपमगस्त्येनाविषी-कृतम् ॥ हसोदकमिति ख्यात शारद विमल शुचि । स्नानपानावगा -हेषु हितमम्बु यथाऽमृतम् ॥ दूषितवर्षाजलपान निषिद्धम् बलाहकाया. समदा कीटा लूताश्च खेचराः । तद्विषोत्सर्गससर्गादयाचं तत्तदा जलम् ॥
कीटमूत्रपुरीषाण्डशवको थप्रदूषितम् ।
तृणपर्णीकरयुतं कलुषं विषसंयुतम् ॥ ६ ॥
२२ सु ० योऽवगाहेत वर्षासु पिबेद्वाऽपि नवं जलम् | " स बाह्याभ्यन्तरान् रोगान् प्राप्नुयात् क्षिप्रमेव तु ॥ १० ॥
विषैले कीडों के मूत्र, मल, भण्डे तथा सडे गले किसी भी प्राणी के मुद्दों से दूषित एवं घास, वृक्षों के पत्ते तथा उत्कर ( कूटा ) से युक्त, कलुषित और विपयुक्त ऐसे वर्षा के पानी में जो व्यक्ति स्नान करता है अथवा उस वर्षा के नवीन जल को पीता है वह शीघ्र ही फोड़े, फुन्सी आदि बाह्य स्वग्रोग तथा अतिसार, कृमि आदि आभ्यन्तरिक रोगों को प्राप्त करता है ॥ विमर्श: - कण्डूकुष्ठादिकान् बाह्यरोगान्, कफगुल्मोदरामयाद्या-| भ्यन्तररोगान् । तदुक्तम्- ' स्नानेन त्वग्भवान् रोगान् कण्डूकुष्ठवि-सर्पकृत् । पानेन कफगुल्माना कृमीणा वरसम्भवान् । करोति विवि-धान् रोगान् ' इति । डाक्टरी में वनस्पतिज, खनिज या पार्थिव और प्राणिज ऐसी जल में तीन अशुद्धियां मानी हैं । वानस्पतिक अशुद्धि से अतिसार, खनिज अशुद्धि से मलावरोध, अग्निमान्द्य, अतिसार और गलगण्ड ( Goitre ) एवं प्राणिज अशुद्धि से Typhoid, ( आन्त्रिक ज्वर ) तथा अनेक प्रकार के कृमियों के रोग होते हैं । निम्न कृमि महत्व के हैं । Round worm ( गण्डूपदकृमि ), Thread worm ( सूत्रकृमि ), Tape worm ( चपटे कृमि ), Hook worm ( अङ्कुशमुख कृमि ), Whip worm ( प्रतोदकृमि ), और Guinea worm ( स्नायुक कृमि = नेहरुआ ) आदि । तत्र यत् पङ्कशैवालहटतृणपद्मपत्रप्रभृतिभिरवच्छन्नं शशिसूर्यकिरणानिलैर्नाभिजुष्टं गन्धवर्णरसोपसृष्टन तद्व्यापन्नमिति विद्यात् । तस्य स्पर्शरूपरसगन्धवीर्यवि-पाकदोषाः षट् सम्भवन्ति । तत्र, खरता पैच्छिल्य-मौष्ण दन्तग्राहिता च स्पर्शदोषः पङ्कसिकता शैवाल-बहुवर्णता रूपदोषः व्यक्तरसता रसदोषः; अनिष्ट-गन्धता गन्धदोषः यदुपयुक्तं तृष्णागौरवशूलकफप्रसे-कानापादयति स वीर्यदोषः यदुपयुक्तं चिराद्विपच्यते विष्टम्भयतेि आन्त-रिज्ञे न सन्ति ॥ ११ ॥
उक्त भौम जलों में जो जल कीचड़, शैवाल ( काई ), हटतृण ( जलकुम्भी ) और कमल के पत्ते इमसे व्याप्त हो, तथा जो चन्द्र और सूर्य की किरणों से और वायु से स्पृष्ट नहीं होता हो तथा जिसमें गन्ध आती हो । नीलपीत - हरितादिवर्ण युक्त हो और अन्यक्त रस न हो कर अम्ल, लवणादि रस युक्त हो गया हो उसे व्यापन्न ( विकृत ) समझना चाहिये । उस पानी के स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, वीर्य और विपाक ये छ दोष होते हैं । उनमें तीच्णस्पर्शता, पिच्छिलता, उष्णता और दन्तों को झकझना ये स्पर्श दोष हैं । कीचड, बालू, काई अथवा विविधवर्णता ये रूपदोष हैं । पड़सों में से किसी भी रस का पीते समय ज्ञान होना रस दोष है । खराब गन्ध आना गन्ध दोष है । जिस जल के पीने से प्यास अधिक लगे, शरीर में भारीपन प्रतीत हो, उदरादि या शरीर के किसी भाग में शूल चले तथा कफ अधिक गिरने लगे तो वीर्य दोष, समझना चाहिये । जिसके पीने से देर से हाजमा हो तथा उदर में मलादिकका विष्टम्भ हो उसे विपाक दोष कहते हैं । उपर्युक्त
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सुश्रुतसंहिता | १७० प्रकार के दोष आन्तरिक्ष जल में नहीं होते हैं ॥ ११ ॥
व्यापन्नस्य चाग्निकथनं सूर्यातपप्रतापनं तप्तायःपि-डसिकतालोष्ट्राणां वा निर्वापणं प्रसादनञ्च कर्त्तव्यं || नागचम्पकोत्पलपाटलापुष्पप्रभृतिभिश्चाधिवासनमिति दूषित जल शोधन - विकृत जल को अग्नि पर उबालना, सूर्य की धूप से खूब तपाना, तपे हुये लोहे के पिण्ड, बालू तथा मिट्टी या ईंट के पिण्डों को उस पानी में बुझाने से उसका प्रसादन ( शोधन ) हो जाता है एवं उस पानी को नागकेशर,
चम्पा के पुष्प, कमल, पाटला ( केतकी ) आदि पुष्पों से अधि ।
वासित ( सुगन्धित ) करना चाहिये ॥ १२ ॥
विमर्शः - जल को उबालने से उसमें स्थित सर्व विकारी जीवाणु तथा कृमि नष्ट हो जाते हैं तथा उसमें विलीन हुये अमोनिया आदि गैस उड़ जाते हैं खटिका तथा अन्य पदार्थ तली में अवक्षिप्त हो जाते हैं । सूर्य किरणों से भी जीवाणु नाशन होता है तथा नदी, तालाब, सरोवर आदि के जलों का शोधन सूर्य किरणों से ही होता है । तप्तायः पिण्डादिनिर्वापण का प्रयोग तृषा - शान्त्यर्थं रोगावस्था में करते हैं । तृषि जल मृदुद्धृष्टलोष्टोद्भवम् । ( वाग्भट ) । वर्तमान जलशोधन पद्धतियां-( १ ) भौतिक विधि में जल का तिर्यक पातन ( Distillation ), उत्क्कथन तथा Ultra - Violet ray's का प्रक्षेप । ( २ ) रासा यनिक विधि — में प्रक्षेपण ( Preonpitation ) जैसे चूना, फिट करी आदि जन्तुनाशनार्थं पोटेसियम परमैंगनेट, नीलतुत्य, क्लोरिन गैस आदि । ( ३ ) यांत्रिक निधारक ( Mechsmicalfiltration
सौवर्ण राज ताम्रे कांस्ये मणिमयेऽपि वा ।
पुष्पावतंसं भौमे वा सुगन्धि सलिलं पिवेत् ॥ १३ ॥
व्यापन्नं वर्जयेन्नित्यं तोयं यच्चाप्यनार्तवम् ।
दोषसजननं ह्येतन्नाददीताहितन्तु तत् ॥ १४ ॥
व्यापन्नं सलिलं यस्तु पिबतीहाप्रसाधितम् ।
श्वयथुं पाण्डुरोगन त्वग्दोषमविपाकताम् ॥ १५ ॥
श्वासकासप्रतिश्यायशूलगुल्मोदराणि च ।
अन्यान् वा विपमान् रोगान् प्राप्नुयादचिरेण सः ॥१६ ॥
सोने, चांदी, ताम्र, कांसा और मणि से वने पात्र अथवा मिट्टी से बने पात्र में पुष्पाधिवासित जल को रख कर पीना चाहिये | अच्छी ऋतु के विकृत जल को तथा वेमौसम में बरसे हुये जल को नहीं पीना चाहिये क्यों कि ऐसा जल दोपों को उत्पन्न करता है अतएव अहितकर होने से वर्जित है । जो व्यक्ति विकृत जल को शोधन किये विना पीता है वह शोथ, पाण्डुरोग, त्वचा के रोग, अजीर्ण, श्वास, कास, प्रतिश्याय, शूल, गुल्म, उदर तथा विभिन्न प्रकार के विषम रोगों को शीघ्र ही प्राप्त करता है ॥ १३–१६ ॥ तत्र सप्त कलुपस्य प्रसादनानि भवन्ति । तद्यथा -कतकगोमेदकविसग्रन्थिशैवालमूलवस्त्राणि मुक्ताम-णिचेति ॥ १७ ॥
कलुषित हुये जल को शुद्ध करने के लिये सात वस्तुएं हैं । जैसे निर्मली के फल, गोमेदमणि, कमल नाल, शैवालमूल, वख से छानना, ' मुक्ताप्रक्षेप तथा स्फटिक प्रक्षेप ॥ १७ ॥
विमर्शः — कतकफल जल के मलों को नीचे बैठा देता है । वस्त्र से छानने पर अपद्रव्य तथा जन्तु रहित हो जाता है । ‘ धनवस्त्रपरिस्रावै ' क्षुद्रजन्त्वभिरक्षणम् ' ॥ ( अ ० सं ० ) । ' वस्त्रपूत पिवेज्जलम् ' ( मनु ) । पञ्च निक्षेपणानि भवन्ति । तद्यथा - फलकं व्यष्ट-कं, मुञ्जवलयः, उदकमञ्जिका, शिक्यचेति ॥ १८ ॥
जल पात्र रखने के पांच साधन हैं । जैसे फलक ( सिम्ब-लादि का तखत ), त्र्यष्टक या त्रिपादिका ( Trypot ), मूंज | का घेरा ( अडूणे या इण्डवे ), उदकमल्लिका और शिक्य ( छींका ) ॥ १८ ॥
विमर्शः-- निक्षिप्यते स्थाप्यतेऽत्रेति निक्षेपणमासनम् ॥ सप्तशतीकरणानि भवन्ति तद्यथाः - प्रवातस्थापनम्, उदकप्रक्षेपणं, यष्टिका भ्रामणं, ' व्यजनं वस्त्रोद्धरणं, वालुकाप्रक्षेपणं, शिक्यावलम्बनञ्चेति ॥ १६ ॥
उबले हुये जल को ठण्ढा करने की सात विधियां हैं । वायु में जल पात्र को रखना, जलपात्र पर वाह्य पृष्ठ की ओर उठे पानी की धार छोड़ना, लकड़ी से पानी को हिलाना, पंखे से हवा करना, शीतल जल से भींगा कपदा रखना, जल में रेत छोड़ना या रेत में जलपात्र को गाढना तथा जलपात्र को छींके पर रखना ॥ १ ९ ॥
निर्गन्धमव्यक्तरसं तृष्णाघ्नं शुचि शीतलम् ।
अच्छं लघु च हृद्यञ्च तोयं गुणवदुच्यते ॥ २० ॥
जो जल गन्धरहित, मधुरादिरस जिसमें व्यक्त न हो, तृषा को मिटाने वाला, शुद्ध, शीतल, स्वच्छ, हलका तथा हृदय या मन में प्रसन्नता उत्पन्न • करने वाला जल अच्छे गुणों वाला कहा जाता है ॥ २० ॥
" - तत्र नद्यः पश्चिमाभिमुखाः पथ्याः, लघूदकत्वात् । पूर्वाभिमुखास्तु न प्रशस्यन्ते, गुरूदकत्वात् । दक्षिणा-भिमुखा नाऽतिदोषाः, साधारणत्वात् । तत्र सह्यप्र-भवाः कुष्ठं जनयन्ति, विन्ध्यप्रभवाः कुष्ठं पाण्डुरोगच, मलयप्रभवाः कृमीन्, महेन्द्रप्रभवाः श्लीपदोदराणि, हिमवत्प्रभवा हृद्रोगश्वयथुशिरोरोगश्लीपद्गलगण्डान्!, प्राच्यावन्त्या अपरावन्त्याश्चार्शास्युपजनयन्ति, पारिया-| त्रप्रभवाः पथ्या बलारोग्यकर्य इति ॥ २१ ॥
जो नदियां पश्चिमाभिमुख बहती हैं उनका जल हलका होने से वे पथ्यकर हैं । जो नदियां पूर्वाभिमुख बहती हैं उनका जल भारी होने से वे प्रशस्त नहीं हैं । जो नदियां दक्षिणाभि-मुख बहती हैं वे साधारण होने से अधिक दोपकारक नहीं हैं । जो नदियां सह्यपर्वत से निकलती हैं उनका जल कुष्ठ रोग पैदा करता है । विन्ध्य पर्वत से निकली नदियों का पानी कुछ और पाण्डुरोग को उत्पन्न करता है । मलयाचल से निकली नदियों का पानी कृमिरोग, महेन्द्र से निकली नदियों का पानी श्लीपद रोग, हिमालय से निकली नदियों का पानी हृदयरोग, शो शिरोरोग, श्लीपद तथा गलगण्ड रोग पैदा करता है । अन्वती
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श्रध्यायः ४५ ] सूत्रस्थानम् । १७१ ( उज्जयिनी ) प्रदेश से पूर्व तथा पश्चिम को बहने वाली नदियों का जल अर्श पैदा करता है । पारियात्र से निकली हुई नदियों का पानी पथ्यकारक, बलदायक और नीरोगता को करता है २१ विमर्शः - नदीजलों के विषय में वाग्भट तथा चरक का निम्न मत है - पश्चिमोदधिगा. शीघ्रवहा याश्चामलोदका । पथ्या समासात्ता नद्यो विपरीतास्त्वतोऽन्यथा ॥ उपलास्फालनाचेपविच्छेदैः खेदितोदका. । हिमवन्मलयोद्भूता. पथ्यास्ता एव च स्थिराः । कृमि-श्लीपदहत्कण्ठशिरोरोगान् प्रकुर्वते ॥
नद्यः शीघ्रवहा लव्यः प्रोक्ता याचामलोदकाः ।
गुर्व्यः शैवाल संच्छन्नाः कलुषा मन्दगाश्च याः ॥ २२ ॥
प्रायेण नद्यो मरुपु सतिक्ता लवणान्विताः ।
लव्यः समधुराचैव पौरुपेया बले हिताः ॥ २३ ॥
जिन नदियों का पानी तेज बहता है तथा जो निर्मल जल वाली होती हैं उन्हें या उनके जलको लघु जानो तथा जो काई, सिवार से आच्छन्न हों एवं मैली तथा मन्द गतियुक्त होती हैं उन्हें तथा उनके जल को भारी जानो । बहुधा मरुस्थल की नदियां तथा उनका पानी तिक्त, लवण, कुछ कपाय और मधुर रस युक्त एवं पाक में लघु तथा बलवृद्धि के लिये हितकारक होता है ॥ २२-२३ ॥ तत्र सर्वेषां भोमानां ग्रहणं प्रत्यूपसि, तत्र ह्यम-लत्वं शैत्यञ्चाधिकं भवति, स एव चापां परो गुण इति ॥ सर्व प्रकार के भूमिजलों को सूर्योदय के पूर्व ( उपाकाल ) ग्रहण करना चाहिये । प्रातः काल के जल में निर्मलता और शीतलता अधिक रहती है और ये ही जल के श्रेष्ठ गुण माने गये हैं ॥ २४ ॥
दिवार्ककिरणैर्जुष्टं निशायामिन्दुरश्मिभिः ।
अरूक्षमनभिष्यन्दिं तत्तुल्यं गगनाम्बुना ॥ २५ ॥
गगनाम्वु त्रिदोपन्नं गृहीतं यत् सुभाजने ।
बल्यं रसायनं मेध्यं पात्रापेक्षि ततः परम् ॥ २६ ॥
दिन में सूर्य की किरणों से तथा रात्रि में चन्द्रमा की किरणों से स्पृष्ट होता हो एवं रूक्षता से रहित हो तथा अभिष्यन्द ( क्लेद ) नहीं करता हो वह गगनाम्बु ( आन्त-रिक्ष ) के तुल्य गुणों वाला होता है । अच्छे पात्र में इकट्ठा किया हुआ आन्तरिक्ष जल त्रिदोषनाशक, बलवर्द्धक, रसायन और मेघा ( धारणाशक्ति ) वर्द्धक होता है । इसके अतिरिक्त जैसे पात्र में जल को सञ्चित किया जाय वैसे गुण या दोप उसमें उत्पन्न हो जाते हैं अतएव जल के गुणदोष पात्रापेक्षी होते हैं । भ्रष्ट पात्रमपेक्षते ॥ २५-२६ ॥ विमर्शः -- अनभिष्यन्दो- हृदयस्थान्न निर्यासवाद्दिस्रोतोमुखानि यद | मुक्त लिम्पति पैच्छिल्यादभिष्यन्दि तदुच्यते ॥ वैशद्यात् कफ-हन्तृत्वात्तान्येव विवृणोति यत् । तदुक्तमनभिष्यन्दि द्रव्य द्रव्यविशा रदै ॥ रसायनलक्षणम् - लाभपायो हि शस्तानां रसादीनां रसाय-नम् । ( चरक ) ।
रक्षोघ्नं शीतलं ह्रादि ज्वरदाहविषापहम् ।
चन्द्रकान्तोद्भवं वारि पित्तघ्नं विमलं स्मृतम् ॥ २७ ॥
चन्द्रकान्तमणि ( Moon stone ) का जल रक्ष ( निशा-चर या कृमि ) का नाशक, शीतल, हृदय को वाला, ज्वर, दाह तथा विपों का नाशक, पित्तघ्न होता है ॥ २७ ॥
विमर्शः — ' द्रवति च हिमरश्मा वुद्गते चन्द्रकान्त ' ।
मूर्च्छापित्तोष्णदाहेषु विषे रक्ते मदात्यये ।
भ्रमक्कमपरीतेषु तमके वमथौ तथा ॥
ऊर्ध्वगे रक्तपित्ते च शीतमम्भः प्रशस्यते ॥
आह्लाद देने और निर्मल ( भवभूतिः ) २८ ॥ शीतल जल मूर्च्छा, पित्त के रोग, उष्ण ( ग्रीष्म ) काल, शरीर में दाह, विपावस्था, रक्तविकार, मदात्यय, भ्रम, क्लम, तमकश्वास, वमन की इच्छा तथा ऊर्ध्वग रक्तपित्त में प्रशस्त होता है ॥ २८ ॥
पार्श्वशूले प्रतिश्याये वातरोगे गलग्रहे ॥ २६ ॥
आमा स्तिमिते कोठे सद्यः शुद्धे नवज्वरे ।
हिक्कायां स्नेहपीते च शीताम्बु परिवर्जयेत् ॥ ३० ॥
पार्श्वशूल, प्रतिश्याय, वातरोग, गले की जकडाहट, आध्मान, स्तिमित ( आम ) कोष्ठ में, चमन - विरेचनादि द्वारा सद्यः शुद्ध हुये में, नवज्वर में, हिक्का और घृत - तैलादि स्नेह पान करने पर शीतल जल का पीना वर्जित है ॥ २ ९ -३० ॥ नादेयं वातलं रूक्षं दीपनं लघु लेखनम् । तदभिष्यन्द मधुरं सान्द्रं गुरु कफावहम्
तृष्णाघ्नं सारसं बल्यं कषायं मधुरं लघु ।
ताडागं वातलं स्वादु कपायं कटुपाकि च ॥
वातश्लेप्महरं वाप्यं सत्तारं कटु पित्तलम् ।
सक्षारं पित्तलं कौपं श्लेष्मन्नं दीपनं लघु ॥
चौण्ट्यमग्निकरं रूक्षं मधुरं कफकृन्न च ।
॥ ३१ ॥
३२ ॥
३३ ॥
कफघ्नं दीपनं हृद्यं लघु प्रस्रवणोद्भवम् ॥ ३४ ॥
मधुरं पित्तशमनमविदाह्यौद्भिदं स्मृतम् ।
वैकिरं कटु सक्षारं श्लेष्मघ्नं लघु दीपनम् ॥ ३५ ॥
कैदारं मधुरं प्रोक्तं विपाके गुरु दोषलम् ।
तद्वत्पाल्वलमुद्दिष्टं विशेषाद्दोषलं तु तत् ॥ ३६ ॥
सामुद्रमुदकं विस्रं लवणं सर्वदोपकृत् ।
अनेकदोपमानूपं वार्यभिष्य॒न्दि गर्हितम् ॥
एभिर्दोषैरसंयुक्तं निरवद्यन्तु जाङ्गलम् । पाकेऽविदाहि तृष्णाघ्नं प्रशस्तं प्रीतिवर्द्धनम्
दीपनं स्वादु शीतच तोयं साधारणं लघु ।
कफमेदोऽनिलामघ्नं दीपनं बस्तिशोधनम् ॥
श्वासकासन्त्ररहरं पथ्यमुष्णोदकं सदा ।
३७ ॥
॥ ३८ ॥
३६ ॥
यत् क्वाथ्यमानं निर्वेगं निष्फेनं निर्मलं लघु ॥ ४० ॥
चतुर्भागावशेषन्तु तत्तोयं गुणवत् स्मृतम् ।
न च पर्युषितं देयं कदाचिद्वारि जानता ॥ ४१ ॥
अम्लीभूतं कफोत्क्लेश न हितं तत् पिपासवे ।
मद्यपानात्समुद्भूते रोगे पित्तोत्थिते तथा ॥ ४२ ॥
सन्निपातसमुत्थे च श्रुतशीतं प्रशस्यते ।
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सुश्रुतसंहिता । १७२ दाहातीसारपित्तासृङ्मूर्च्छामद्यविषार्त्तिषु ॥ ४३ ॥
शृतशीतं जलं शस्तं तृष्णाच्छदिभ्रमेषु च ।
स्निग्धं स्वादु हिमं हृद्यं दीपनं बस्तिशोधनम् ॥ ४४ ॥
वृष्यं पित्तपिपासाघ्नं नारिकेलोदकं गुरु ।
अरोचके प्रतिश्याये प्रसेके श्वयथौ क्षये ॥ ४५ ॥
मन्देऽग्नावुदरे कुठे ज्वरे नेत्रामये तथा ।
व्रणे च मधुमेहे च पानीयं मन्दमाचरेत् ॥ ४६ ॥
इति जलवर्गः । नदी का जल वातजनक, रूक्ष, अग्निदीपक, पचने में हलका और लेखन होता है किन्तु वह गाढा और मधुररसयुक्त हो तो अभिप्यन्दि, भारी और कफकारक होता है । सरोवर जल - प्यास को नष्ट करने वाला, बलवर्द्धक, कपाय और मधुर रसयुक्त तथा लघु होता है । तडागजल - वातजनक, स्वादु, कसैला और पाक होने पर कटु होता है । वावढीजल -वात-नाशक, कफहारक, खारा, कटु और पित्तवर्द्धक होता है । कूपजल - सारा, पित्तजनक, कफहारक, अग्निदीपक और लघु होता है । चुण्टीजल -अग्निवर्द्धक, रूत्त, मधुर होने पर भी नहीं बढाने वाला होता है । झरने का जल – कफ नाशक, अग्निदीपक, हृदय के लिये लाभकारी और लघु होता है । औद्भिद जल - स्वाद में मधुर, पित्तशामक और अविदाहि होता है । रेत से निकाला ( चिकिर ) जल- कटु, क्षारयुक्त, श्लेष्मनाशक, हलका और अग्निदीपक होता है । केदारजल-मधुर, पाक में गुरु तथा दोपवर्द्धक होता है । ऐसे ही गुण वाला पाल्वल ( पत्तों के ढेर वाले गढे का ) जल होता है किन्तु विशेषतया यह अधिक दोपकारक होता है । समुद्र जल -- आमगन्धी, खारा तथा सर्वप्रकार के दोषों का करने वाला होता है । आनूप जल — अनेक ढोपों से युक्त, अभिष्यन्दि तथा उपयोग करने में निन्दित है । जाइल देश का जल उक्त दोषों से रहित तथा प्रशस्त होता है । साधारण देश का जल विपाक में अविदाहि, प्यास को बुझाने वाला, प्रशस्त, मन को आह्लादित करने वाला, अग्नि का दीपक, स्वादु, शीतल और हल्का होता है । उष्ण जल —– कफ, मेदोरोग, वातरोग, आम-दोष का नाशक, अग्नि का दीपक, वस्ति का शोधक, श्वास, फास और ज्वर का नाशक तथा सदा पथ्यकारक होता है । जो कथित किया ( औटाया ) हुआ जल वेगरहित, फेनरहित, मलरहित, हलका तथा उबलकर चौथाई रहा हो वह जल गुणयुक्त होता है । स्वास्थ्य के ज्ञान रखने वाले वैद्य या परि-चारक को चाहिये कि रोगी अथवा स्वस्थ पुरुष को पीने के लिये रात का वासी जल कभी भी नहीं देना चाहिये । क्योंकि वह जल अम्लतायुक्त तथा कफ का उत्क्लेशकारक होता है अतएव नृपातुर के लिये हितकर नहीं है । अधिक मद्यपान से उत्पन्न रोगों में, पित्त के रोगों में तथा सन्निपात के रोग में श्रुतशीत ( उबाल कर ठंढा किया हुआ ) जल प्रशस्त होता है । दाह, अतिसार, पित्त और रक के रोग, मूर्च्छा, मथ और चिप के रोग, तृष्णा, वमन और भ्रम इन रोगों में तशीत जल उत्तम होता है । नारिकेल का पानी - स्निग्ध, मधुर, शीतल, हदय के लिये हितकर, अग्नि का दीपक, वस्ति का शोधक, वृष्यं, पित्त के रोग तथा प्यास को नष्ट करनेवाला और गुरु होता है । अरुचि, प्रतिश्याय, लार का टपकना, शोथ, चय, मन्दाग्नि, उदर रोग, कुष्ट, ज्वर, नेत्र के रोग, व्रण और मधुमेह में पानी कम पीना चाहिये ॥ ३१-४६ ॥ इति जलवर्गः । अथ क्षीरवर्गः ।
गव्यमाजं तथा चौष्ट्रमाविकं माहिषञ्च यत् ।
अश्वायाश्चैव नार्याश्च करेणूनाञ्च यत्पयः ॥ ४७ ॥
क्षीरवर्ग - में गाय, बकरी, ऊंटनी, औरत तथा हस्तिनी का दुग्ध उपयोग में विमर्श: - रासायनिक विश्लेषण करने | स्त्री के दुग्ध के समान तत्वों वाला होने से पिलाने के लिये बहुत दिया जाता है । तत्त्वकौषधिरसप्रसादं प्राणदं गुरु । मधुरं पिच्छिलं शीतं स्निग्धं श्लक्ष्णं भेडी, भैंस, घोड़ी, आता है ॥ ४७ ॥
पर गधी को दुग्ध आजकल वर्श्वो को सरं मृदु | सर्वप्राणभृतां तस्मात् सात्म्यं क्षीरमिहोच्यते ॥ ४८ ॥
उपर्युक्त अष्ट प्रकार का दुग्ध अनेक प्रकार की ओषधियों के रस का सारभाग है अत एव मनुष्यों के प्राणों का धारण करने वाला, भारी, मधुर, गाढा, शीतल, चिकना, श्लक्ष्ण, कुछ विरेचक और मृदु होता है इन्हीं अष्टगुणों के कारण दुग्ध सर्व प्राणियों के लिये सालय होता है ॥ ४८ ॥
तत्र सर्वमेव क्षीरं प्राणिनामप्रतिषिद्धं जातिसा-| त्म्यात् । वातपित्तशोणितमानसेष्वपि विकारेष्वविरु-द्धम् । जीर्णन्वरकासश्वासशोषक्षयगुल्मोन्मादोदरभू-छ भ्रममददाहपिपासाद्धस्तिदोपपाण्डुरोगग्रहणीदो-| पार्शःशूलोदावर्त्तातिसारप्रवाहिका योनिरोगगर्भास्रावर-। तपित्तश्रमक्लमहरं पाप्मापहं बल्यं वृष्यं वाजीकरणं रसायनं मेध्यं सन्धानमास्थापनं वयःस्थापनमायुष्यं जीवनं बृंहणं वमनविरेचनास्थापनं तुल्यगुणत्वाश्चौजसो वर्द्धनं बालवृद्धक्षतक्षीणानां क्षुद्व्यवायव्यायामकर्शिता-नाञ्च पध्यतमम् ॥ ४६ ॥
जन्म से ही दुग्ध सेवन करने का अभ्यास होने से मनुष्यों के लिये सर्व प्रकार के दुग्ध सेवन के लिये निषिद्ध नहीं हैं । वात, पित्त, रक्त तथा मानस रोगों में भी दुग्ध विरुद्ध नहीं होता है तथा जीर्णज्वर, कास, श्वास, शोष, क्षय, गुल्म, । उन्माद, उदररोग, मूर्च्छा, भ्रम, मदात्यय या मद, दाह, तृपा, हृद्रोग, मूत्ररोग, पाण्डु, ग्रहणी, अर्श, शूल, उदावर्त, अतिसार, प्रवाहिका, योनिरोग, गर्भस्राव, रक्तपित्त, श्रम तथा क्लम । इन रोगों को दुग्ध नष्ट करता है । दुग्ध पाप का नाशक, वल्य, वृप्य, वाजीकरण, रसायन, मेधावर्धक, भग्न अस्थि को जोड़ने वाला, निरूहण यस्ति के लिये उपयोगी, आयु को यथाप्रमाण स्थिर रखने वाला, आयु बढाने वाला, जीवनीय, शरीरपुष्टिकारक, वमनोपग, विरेचक, ओज के तुल्यगुण होने
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श्रध्यायः ४५ ] सूत्रस्थानम् । १७३ से उसका वर्द्धक तथा वालक, वृद्ध तथा ततक्षीणों के लिये तथा भूख, स्त्रीसंसर्ग और व्यायाम से कर्शित ( क्षीण ) हुये मनुष्यों के लिये अत्यन्त पथ्य होता है ॥ ४ ९ ॥ ^ विमर्शः - १ जीर्णज्वरलक्षणमाह - त्रिसप्ताह व्यतीतस्तु ज्वरो यस्तनुता गतः । प्लीहाग्निसाद कुरुते स जीर्णज्वर उच्यते ॥ ' इति । २ पाप्मापह = कार्पासनाद्यपहरणजन्य पापक्षयकरम् । तथा चैकाद-शाध्याये मनुः - ' कार्पासकोटजोर्णाना द्विशफैकशफस्य च । पक्षिगन्धौषधीना च रज्ज्वाश्चैव त्र्यह 1 पय III इति । वृष्यम् -- यत्किञ्चिन्मधुर स्निग्ध जीवन बृहण गुरु । हर्षण मनसश्चैव तत्सर्वं वृष्प्रमुच्यते ॥ वाजीकरणम् - येन नारीपु सामर्थ्य । वाजिवल्लभते नर । व्रजेच्चाभ्यधिक येन वाजीकरणमेव तत् ॥ ( चरक ) । बाल्यावस्था में प्रथम २-३ वर्ष तक दुग्ध जीवन का खास आधार है । संसार में दुग्ध के समान अन्य कोई खाद्य द्रव्य नहीं है । जन्म से मृत्युपर्यन्त किसी भी दशा में दुग्ध निषिद्ध नहीं है । शरीर - वर्धन के लिये जितने उपादान आवश्यक हैं वे सब दुग्ध में मौजूद रहते हैं । अत एव दुग्ध को पूर्णाहार माना गया है । दुग्ध में प्रोटीन, वसा या चरबी, दुरधशर्करा ( Caotoze ), चूना, सोडियम, पोटेशियम, मेग्नेशियम, लोह, गन्धक, फास्फरस, आयोडीन एवं सर्व वीटामीन विशेषतया ए ० डी ० ई ० होते हैं । ताजी हरी घास खानेवाले तथा सूर्य प्रकाश में घूमनेवाले पशुओं के दुग्ध में ये वीटामीन अधिक होते हैं । दुग्ध पचने में हलुका, पौष्टिक, आन्त्रस्थ जीवाणु तथा उनके विषों का नाशक है ।
अल्पाभिष्यन्दि गोक्षीरं स्निग्धं गुरु रसायनम् ।
रक्तपित्तहरं शीतं मधुरं रसपाकयोः ॥
जीवनीयं तथा वातपित्तघ्नं परमं स्मृतम् ॥ ५० ॥।
गाय का दुग्ध - अल्प अभिष्यन्दकारक, स्निग्ध, गुरु, रसायन, रक्तपित्तहारक, शीत, रस और पाक में मधुर, जीव-नीय तथा वातपित्तनाशक है ॥ ५० ॥
गव्यतुल्यगुणं वाजं विशेषाच्छोषिणां हितम् ।
दीपनं लघु सङ्ग्राहि श्वासकासास्रपित्तनुत् ॥ ५१ ॥
अजानामल्पकायत्वात् कटुतिक्तनिषेवणात् ।
नात्यम्बुपानाद्व्यायामात्सर्वव्याधिहरं पयः ॥ ५२ ॥
बकरी का दुग्ध - गाय के दुग्ध के समान गुणोंवाला किन्तु विशेषतया शोष ( राजयक्ष्मा ) के रोगियों के लिये हितकारक एवं अग्निदीपक, पचने में हलका, अतिसार में दस्त को बांधनेवाला तथा श्वास, कास और रक्तपित्त का नाशक है । बकरियों का शरीर स्वभावतः छोटा होता है तथा चे कटु और तिक्त रस वाले वृक्ष तथा वनस्पतियों के पत्ते खाती हैं एवं अधिक जल नही पीती हैं तथा सारे दिन इधर-उधर भ्रमण रूपी व्यायाम करती रहती हैं अत एव उनका दुग्ध सर्वरोगों का नाशक है ॥ ५१-५२ ॥,
रूक्षोष्णं लवणं किञ्चिदौष्ट्रं स्वादुरसं लघु ।
शोफगुल्मोदरार्शोघ्नं कृमिकुष्ठविषापहम् ॥ ५३ ॥
ऊंटनी का दुग्ध-- रूक्ष, उष्ण, स्वाद कुछ लावणिक ( खारा ), मधुर और लघु होता है तथा शोथ, गुल्म, उदर-रोग, अर्श, कृमिरोग, कुष्ठ तथा विष का नाशक है ॥ ५३ ॥
आविकं मधुरं स्निग्धं गुरु पित्तकफावहम् ।
पथ्यं केवलवातेपु कासे चानिलसम्भवे ॥ ५४ ॥
भेडी का दुग्ध - मधुर, स्निग्ध, गुरु, पित्त और कफ का वर्द्धक होता है एवं केवल वातप्रकोप तथा वातकास में पथ्य ( हितकारी ) होता है ॥ ५४ ॥
महाभिष्यन्द मधुरं माहिषं वह्निनाशनम् ।
निद्राकरं शीततरं गव्यात् स्निग्धतरं गुरु ॥ ५५ ॥
भैंस का दुग्ध - अत्यन्त अभिष्यन्दकारक, मधुर, पाच-काग्नि को मन्द करनेवाला, निद्राजनक, शीतल तथा गौ के दुग्ध की अपेक्षा अधिक स्निग्ध तथा भारी होता है ॥ ५५ ॥
उष्णमैकशफं बल्यं शाखावातहरं पयः ।
मधुराम्लरसं रूक्षं लवणानुरसं लघु ॥ ५६ ॥
एक शफवाले जानवर जैसे घोड़ी, गदही इनका दुग्ध उष्णप्रकृतिक, वलवर्द्धक, शाखा ( हस्त तथा पाद ) की वायु का नाशक, मधुर तथा अम्लरस युक्त, रूत, अनुरस में लवण तथा लघु होता है ॥ ५६ ॥
नार्यास्तु मधुरं स्तन्यं कषायानुरसं हिमम् ।
नस्याश्च्योतनयोः पथ्यं जीवनं लघु दीपनम् ॥ ५७ ॥
स्त्री का दुग्ध - रस में मधुर, अनुरस में कषाय, शीत-प्रकृतिक, नस्य तथा आश्च्योतन कर्म में हितकारक, जीवन शक्ति युक्त, लघु और पाचकाग्निदीपक होता है ॥ ५७ ॥
हस्तिन्या मधुरं वृष्यं कषायानुरसं गुरु ।
स्निग्धं स्थैर्यकरं शीतं चक्षुष्यं बलवर्द्धनम् ॥ ५८ ॥
हस्तिनी का दुग्ध - मधुर, वृष्य, अनुरस में कषाय, भारी, स्निग्ध, शरीर की स्थिरता को करनेवाला, शीतप्रकृतिक, नेत्रों के लिये हितकारी तथा बलवर्द्धक होता है ॥ ५८ ॥
प्रायः प्राभातिकं क्षीरं गुरु विष्टम्भि शीतलम् ।
रात्र्याः सोमगुणत्वाच्च व्यायामाभावतस्तथा ॥ ५६ ॥
दिवाकराभितप्तानां व्यायामानिलसेवनात् ।
वातानुलोमि श्रान्तिघ्नं चक्षुष्यं चापराह्निकम् ॥ ६० ॥
हुधा प्रातःकाल में निकाला हुआ दुग्ध गुरु, विष्टम्भ-कारक और शीतल होता है क्योंकि रात्रि के सोम ( चन्द्र ) गुण प्रधान होने से तथा जानवरों के चलने - फिरने व्यायाम के न होने से प्रभातकालीन दुग्ध उक्त गुर्वादि गुणों वाला होता है किन्तु दिन में पशुओं के सूर्य की धूप में चरने से, व्यायाम और वात का सेवन होने से सन्ध्या समय दुग्ध वात का अनुलोमक ( नाशक ), थकावट को दूर करने-वाला और नेत्रों के लिये हितकर होता है ॥ ५ ९ -६० ॥ पयोऽभिष्यन्दि गुर्वामं प्रायशः परिकीर्त्तितम् ॥६२ ॥
तदेवोक्तं लघुतरमनभिष्यन्दि वै शृतम् ।
वर्जयित्वा स्त्रियाः स्तन्यमाममेव हि तद्धितम् ॥ ६२ ॥
कच्चा दुग्ध प्रायः अभिष्यन्द ( क्लेद ) कारक और पचने में भारी होता है किन्तु उसी को उबाल लेने ( गरम करने ) | से अत्यन्त हलका और अभिष्यन्द नहीं करने वाला
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१७४ सुश्रुतसहिता । हो जाता है । खियों के दुग्ध को छोड़कर सर्व प्रकार के दुग्धों को गरम कर के पीना चाहिये क्योंकि स्त्री का दुग्ध कच्चा ही पीने सेहित करता है ॥ ६१–६२ ॥
धारोष्णं गुणवत् क्षीरं विपरीतमतोऽन्यथा ।
तदेवातिशृतं शीतं गुरु बृंहणमुच्यते ॥ ६३ ॥
धारोष्ण दुग्ध अमृत के समान गुणकारी होता है किन्तु इसके विपरीत अर्थात् बहुत देर से निकालकर रखा हुआ विप के समान हो जाता है । यदि उसी धारोष्ण दुग्ध को अधिक औटाकर शीत कर के पिया जाय तो बृंहण कार्य करता है ॥ ६३ ॥
विमर्शः - ' धारोष्णममृतोपमम् ' धारोष्ण दुग्ध न मिले तो उसे उबालकर ही पीना चाहिये । कुछ काल तक निकाल कर रखे हुये कच्चे दुग्ध में वायुमण्डल की खराव गैसें, धूलिकण तथा सूक्ष्म जीवाणु प्रविष्ट हो जाते हैं । उवाले हुये दुग्ध का जलांश कम हो जाता है । दुग्धशर्करा का कुछ अंश जल है ।ो जाते हैं । सेन्द्रिय फोस्फरस निरिन्द्रिय रूप में हो जाता है । चूने और मेग्नेशियम के लवण अवक्षिप्त हो जाते हैं तथा दुग्ध के फर्मेण्ट तथा जीवद्रव्य ( Vitamins ) के कुछ भागों का नाश हो जाता है अतः निशेष गुण की दृष्टि से धारोष्ण अधिक श्रेष्ठ होता है किन्तु कच्चे दुग्ध को पीने की अपेक्षा उबाला हुआ पीने से गुण कम कर सकता है किन्तु कच्चे दुग्ध की तरह भयङ्कर रोग नहीं कर सकता है ।
अनिष्टगन्धमम्लञ्च विवर्णं विरसञ्च यत् ।
व सलवणं तीरं यच्च विग्रथितं भवेत् ॥ ६४ ॥
इति क्षीरवर्गः । जिस दुग्ध में खराब गन्ध आती हो, जो दुग्ध खट्टा हो गया हो, जिस दुग्ध का वर्णं विकृत हो गया हो तथा स्वाद भी खराब हो गया हो और जो स्वाद में लवण हो एवं जिसमें गांठे पढ गई हों ( फट गया हो ) ऐसे दुग्ध को पीने के लिये वर्जित करना चाहिये ॥ ६४ ॥
विमर्शः - शुद्ध दुग्धपरीक्षा — काच के ग्लास में रखने से अपारदर्शक, श्वेतवर्ण, दुग्ध पात्र के तल में कोई अवक्षेप न हो, स्वाद में मधुर, किसी प्रकार की गन्ध से रहित, कुछ देर तक रखने से उस पर मलाई आती हो जिसका प्रमाण १२ प्रतिशत हो, उसके गुरुता ( Sp Gravity ) १०२७ से १०३४ हो, तो उसे शुद्ध या उत्तम दुग्ध जानो । गुरुता का मापन ( Lactometes ) से होता है जिससे केवल पानी की मिलावट का ज्ञान हो जाता है किन्तु उसमें चीनी या आरारोट का चूर्णं मिला दें तो पता नहीं चलता । दुग्धदुष्टि-अथ दधिवर्गः— दधि तु मधुरमनुमत्यमुचेति; तत्कषायानुरसं स्निग्धमुष्णं पीनसविषमज्वरातिसार । रोचकमूत्रकृच्छ्रका • पहं वृष्यं प्राणकरं मङ्गल्यश्च ॥ ६५ ॥
दही बहुधा मधुर, अम्ल और अधिक अम्ल इस तरह तीन प्रकार का होता है । दही अनुरस में कपाय, स्निग्ध और उष्णवीर्य होता है तथा पीनस, विषमज्वर, अतिसार, अरोचक, मूत्रकृच्छू तथा शरीर की कृशता को नष्ट करता है । वृप्यगुण-युक्त, प्राणशक्ति को बढानेवाला तथा पूजनादि कार्यों में । माङ्गलिक माना गया है ॥ ६५ ॥
विमर्शः - दही के वैज्ञानिकों ने निम्न गुण माने हैं । ( १ ) दही के चीराम्लजीवाणु विसूचिकादि जीवाणुओं को । नष्ट करते हैं । ( २ ) दही भान्त्र में मल की सड़न को रोकता है । ' मेचनीकाफ ' नामक वैज्ञानिक ने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रतिदिन दही सेवन करने से आन्त्रस्थ जीवाणु तथा उनका विष नष्ट होकर वृद्धावस्था देर से आती है । ( ३ ) पचन संस्थान के अनेक विकार जैसे - मन्दाग्नि, सङ्ग्रहणी में दही या तक अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुआ है । प्राचीन मुनियों ने दही तथा तक्र की वहुत महिमा लिखी है । ( १ ) ' तक्र शक्रस्य दुर्लमम् ' । ( २ ) न तक्रसेवी व्यथते कदाचिन्न तक्रदग्धाः प्रभवन्ति रोगाः । यथा सुराणाममृत हिताय तथा नराणा भुवि तक्रमाद्दु ॥ लेक्टिक एसिड बनानेवाले जीवाणुओं की क्रिया दुग्ध पर होने से दही बनता है । ये जीवाणु दुग्ध में अभिषङ्ग ( Fermentation ) उत्पन्न कर के दुग्धशर्करा को लेक्टिक एसिड में परिवर्तित कर देते हैं । इस अम्ल से दुग्ध की चरबी ( मेद या स्नेहांश ) और प्रोटीन जमकर दही बन जाता है । महाभिष्यन्दि मधुरं कफमेदोविवर्द्धनम् ।
कफपित्तकृदम्नं स्यादत्यम्नं रक्तदूषणम् ।
विदाहि सृष्टवि मूत्रं मन्दजातं त्रिदोषकृत् ॥ ६६ ॥
मीठा दही अत्यन्त अभिष्यन्द ( क्लेद ) कारक तथा कफ और मेदोधातु का वर्द्धक होता है । खट्टा दही कफ और पित्त को करता है तथा अधिक खट्टा दही रक्त को दूषित करता है । मन्दजात अर्थात् ठीक ठीक न जमा हुआ दही शरीर में विदाह करनेवाला तथा विष्ठा और मूत्र को पैदा करनेवाला या उनका निःसारक एवं त्रिदोषकारक होता है ॥ स्निग्ध विपाके मधुरं दीपनं बलवर्द्धनम् | · वातापहं पवित्रञ्च दधि गव्यं रुचिप्रदम् ॥ ६७ ॥
गाय का दही - स्निग्ध, विपाक में मधुर, अग्निदीपक, वलवर्द्धक, वात का नाशक, पवित्र और रुचिकारक होता है ॥
दध्याजं कफपित्तघ्नं लघु वातक्षयापहम् ।
दुर्नामश्वासकासेषु हितमग्नेश्व दीपनम् ॥ ६८ ॥
हेतु - ण पशु, स्तनों को पानी से साफ न करना, हाथों वकरी का दही - कफ और पित्त को नष्ट करनेवाला, की अशुद्धि, निकाल कर बिना ढके बहुत देर तक रखना, पचने में हलका, वात और क्षय रोग का नाशक तथा अ उसमें खराव पानी या चीनी मिलाना आदि । श्वास और कास में हितकर तथा पाचकाभि का दीपक होता है ॥
इति क्षीरवर्गः । विपाके मधुरं वृष्यं वातपित्तप्रसादनम् ।
बलासवर्द्धनं स्निग्धं विशेषादधि माहिषम् ॥ ६६ ॥
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श्रध्यायः ४५ ] सूत्रस्थानम् । १७५ भैंस का दही - विपाक में मधुर, वृप्य, वात और पित्त का शामक, कफ का वर्द्धक तथा विशेष कर स्निग्ध होता है ॥
विपाके कटु सक्षारं गुरु भेद्यौष्ट्रिकं दधि ।
वातमर्शासि कुष्ठानि कृमीन् हन्त्युदराणि च ॥ ७० ॥ ।
ऊंटनी का दही – विपाक में कटु, क्षारयुक्त, भारी तथा विरेचक होता है एवं वात, अर्श, कुष्ठ, कृमि और उदर रोगों को नष्ट करता है ॥ ७० ॥
कोपनं कफत्रातानां दुर्नाम्नां चाविकं दधि ।
रसे पाके च मधुरमत्यभिष्यन्दि दोषलम् ॥ ७१ ॥
भेड का दही कफ, वात और अर्श का प्रकोप करता है तथा रस और पाक में मधुर होता है एवं अत्यन्त अभिष्यन्दी तथा दोषवर्द्धक होता है ॥ ७१ ॥
दीपनीयमचक्षुष्यं वाडवं दधि वातलम् ।
रूक्षमुष्णं कषायञ्च कफमूत्रापहश्च तत् ॥ ७२ ॥
घोड़ी का दही - अनि का दीपन, नेत्रों के लिये अहितकर, वातवर्द्धक, रूत, उष्ण, कपाय तथा कफ और मूत्र के दोषों को नष्ट करता है ॥ ७२ ॥
स्निग्धं विपाके मधुरं बल्यं सन्तर्पणं गुरु ।
चक्षुष्यमयं दोषनं दधि नार्या गुणोत्तरम् ॥ ७३ ॥
स्त्री का दही - स्निग्ध, विपाक में मधुर, बलवर्द्धक, तृप्ति -कारक, भारी, नेत्रों के लिये अत्यन्त हितकर, दोषनाशक तथा गुणों में उत्कृष्ट होता है ॥ ७३ ॥
- लघु पाके बलासघ्नं वीर्योष्णं पक्तिनाशनम् ।
कषायानुरसं नाग्या दधि वर्चोविवर्द्धनम् ॥ ७४ ॥
हस्तिनी का दही- - पाक में लघु, कफनाशक, उष्णवीर्य, पाचनशक्ति का नाशक, अनुरस में कपाय तथा मल का • वर्द्धक होता है ॥ ७४ ॥
दधीन्युक्तानि यानीह गव्यादीनि पृथक् पृथक् ।
• विज्ञेयमेवं सर्वेषु गव्यमेव गुणोत्तरम् ॥ ७५ ॥
उक्त श्लोकों में गो आदि प्राणियों के जो पृथक् पृथक् दही वर्णित किये गये हैं उन सब में गाय का दही ही गुण की दृष्टि से श्रेष्ठ होता है ॥ ७५ ॥
वातघ्नं कफकृत् स्निग्धं वृंहणं नातिपित्तकृत् ।
कुर्याद् भक्ताभिलाषश्च दधि यत् सुपरिस्रुतम् ॥ ७६ ॥
कपड़े में बांधकर अच्छी प्रकार परिस्रुत किया हुआ दही वातनाशक, कफकारक, स्निग्ध और शरीर की पुष्टि ( बृंहण ) करनेवाला होता है तथा यह दही पित्त को अधिक नहीं बढाता है एवं भोजन में इच्छा उत्पन्न करता है ॥ ७६ ॥
शृतात् क्षीरात्तु यज्जातं गुणवद्दधि तत् स्मृतम् ।
... वातपित्तहरं रुच्यं धात्वग्निबलवर्द्धनम् ॥ ७७ ॥
अच्छी प्रकार वाले हुये दुग्ध से जो दही बनता है वह अधिक गुणकारी, वात तथा पित्त का नाशक, रुचिकारक एवं शरीर की धातुओं, अग्नि तथा बलको बढाता है ॥ ७७ ॥
दघ्नः सरो गुरुर्वृष्यो विज्ञेयोऽनिलनाशनः ।
वह्नेर्विधमनश्चापि कफशुक्रविवर्द्धनः ॥ ७८ ॥
दही के ऊपर का भाग ( सर ) पचने में भारी, वृष्य, वात का नाशक, पाचकानि का नाशक तथा कफ और शुक्र को बढाता है ॥ ७८ ॥
विमर्श: - सर स्नेहबहुल उपरितनाश । तथा च भावप्रकाशे-' दध्नस्तूपरि यो भागो धनः स्नेहसमन्वित । स लोके सर इत्युक्तो दघ्नो मण्डस्तु मस्त्विति ' ॥
दधि त्वसारं रूक्षश्च ग्राहि विष्टम्भि वातलम् ।
दीपनीयं लघुतरं सकषायं रुचिप्रदम् ॥ ७६ ॥
जिसमें से मक्खन या क्रीम निकाल लिया गया हो ऐसे दुग्ध का जमाया हुआ दही रूच, ग्राही, विष्टम्भी, वातजनक, अग्निदीपक, पचने में अत्यन्त हलका, कषायरस युक्त और रुचिप्रद होता है ॥ ७ ९ ॥
शरद्ग्रीष्मवसन्तेषु प्रायशो दधि गर्हितम् ।
हेमन्ते शिशिरे चैव वर्षासु दधि शस्यते ॥ ८० ॥
शरद्, ग्रीष्म और वसन्त ऋतुओं में प्रायः दही अधिक खाना ठीक नहीं है तथा हेमन्त शिशिर और वर्षा ऋतुओं में दही का सेवन श्रेष्ठ होता है ॥ ८० ॥
विमर्श: - रोगविशेषेण दधिनिषेधमाह चरक - ' रक्तपित्तकफो-त्येषु विकारेष्वहित च तत् । न नक्तं दधि मुञ्जीत न चाप्यघृत-शर्करम् ॥ नामुद्गसूप नाक्षौद्र नोष्ण नामलकैर्विना । जरासृक्षित-वीसर्पकुष्ठपाण्ड्वामयनमान् । प्राप्नुयात् कामला चोग्रा विधिं हित्वा दधिप्रियः ॥ इति ।
तृष्णाक्लमहरं मस्तु लघु स्रोतोविशोधनम् ।
अनुं कषायं मधुरमवृष्यं कफवातनुत् ॥ ८१ ॥
प्रह्लादनं प्रीणनञ्च भिनत्त्याशु मलञ्च तत् ॥
बलमावहते क्षिप्रं भक्तच्छन्दं करोति च ॥ ८२ ॥
दही का पानी ( मस्तु ) तृष्णा और क्लम को नष्ट करता है, पचने में लघु, स्रोतों का विशोधक तथा अम्लु, कषाय और मधुर होता है । यह वृष्य नहीं है तथा कफ और वात को नष्ट करता है । आत्मा, मन और इन्द्रियों को आादित करता है तथा तृप्त करता है मल का शीघ्र भेदन करता है, शीघ्र शरीर के बल को बढाता है और भोजन में रुचि करता है ॥ ८१-८२ ॥ विमर्श: -- मस्तु = द्विगुणवारियुत दधि । राजनिघण्टौ - ' तक्र त्रिभागदधिसयुतमम्वु धीरैरुक्त दधि द्विगुणवारियुत तु मस्तु ' इति ।
स्वाद्वमुमत्यमुकमन्दजातं तथा शृततीरभवं सरश्च ।
असारमेवं दधि सप्तधाऽस्मिन् वर्गे स्मृता मस्तुगुणास्तथैव ॥
- इति दधिवर्गः । इस दधिवर्ग में मीठा, खट्टा, अधिक खट्टा, मन्द, उबाले हुये दुग्ध का, सारयुक्त तथा असारयुक्त ऐसे सात प्रकार का
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१७६ सुश्रुतसहिता । दही और उसके गुण कहे हैं इसी तरह दही के मस्तु के भी गुण कहे हैं ॥ ८३ ॥
sara र्गः । अथ तक्रवर्गः: -तक्रं मधुरमनुं कषायानुरसमुष्णवीर्य लघु रूक्षमग्नि-दीपनं गरशोफातिसारग्रहणी पाण्डुरोगार्शः प्लीहगुल्मा-रोचकविषमज्वरतृष्णाच्छदिप्रसेकशूलमेदः श्लेष्मानिलहरं मधुरविपाकं हृद्यं मूत्रकृच्छ्रस्नेहव्यापत्प्रशमनमवृष्यञ्च । तक्र ( मट्ठा, छाछ ) मधुर, अम्ल, अनुरस में कपाय, वीर्य में उष्ण, हलकी तथा पाचकाग्नि को दीप्त करती है एवं गर । ( कृत्रिम विप ), शोफ, अतिसार, सङ्ग्रहणी, पाण्डुरोग, अर्श, प्लीहावृद्धि, गुल्मरोग, अरोचक, विषम ज्वर, तृष्णा, वमन, लार का टपकना, शूल, मेदोवृद्धि, कफरोग तथा वातरोग नाशक है । पाक में मधुर, हृदय के लिये हितकारी, मूत्रकृच्छ, अधिक स्नेह सेवनजन्य व्यापत्तियों को नष्ट करती है एवं वृष्य नहीं है ॥ ८४ ॥
विमर्शः - स्नेहव्यापद —तन्द्रा सोत्क्लेश आनाहो ज्वरः स्तम्भो विसंचता । कुष्ठानि कण्डू पाण्डुत्व शोफाशस्यरुचिस्तथा ॥ जठर ग्रहणीदोपा ' स्तैमित्य वाक्यनिग्रहः । शूलंमामप्रदोषाश्च जायन्ते स्नेहविभ्रमात् ॥ ( चरक ) । " मन्थनादिपृथग्भूतस्नेहमर्दोदकं च यत् ।
नातिसान्द्रद्रवं तक्रं स्वाद्वनं तुवरं रसे ।
यत्तु सस्नेहमजलं मथितं घोलमुच्यते ॥ ८५ ॥
मन्थन कर के जिसमे से स्नेह ( मक्खन ) निकाल लिया गया हो और दही से आधा पानी जिसमें मिला हुआ हो, जो न अधिक गाढी और न अधिक पतली हो तथा जो रस मधुर, अम्ल और कपाय हो उसे ' तक्र ' कहते हैं किन्तु जिस में दही में से मक्खन न निकाला गया हो तथा पानी भी नहीं ढाला गया हो और केवल मन्थनी से विलयन ( वोल ) वना दिया हो उसे ' घोल ' कहते हैं ॥ ८५ ॥
विमर्शः न्त्रान्तरे तक्रस्य त्रैविध्यमाह - रुक्षमर्दोद्धृतस्नेह
यनश्चानुदुघृत घृतम् । तत्र दोपान्निवल वित्त्रिविध तत्प्रयोजयेत् ॥
अपि च घोल्मथिततक्रोढन्विच्छच्छिकेतिनामभेदेन तद्भेदा उक्ता निघण्टी - ' घोलन्तु मथित तक्रमुदश्विच्छच्छिकाऽपि च । ससार निर्नल घोल मथित त्वसरॊदकम् ॥ तत्र पाइनल प्रोक्तमुदश्वित्त्वर्द्ध वारिकम् । छच्छिका सारहीना स्यात्स्वच्या प्रचुरवारिका ॥ ' इति ।
नैव तक्रं क्षते दद्यान्नोष्णकाले न दुर्बले ।
न मूर्च्छा भ्रमदाहेषु न रोगे रक्तपैत्तिके ॥ ८६ ॥
छत, गरमी का समय, दुर्बल मनुष्य, मूर्च्छा, भ्रम, दाह तथा रक्तपित्त इनमें तक्र का उपयोग नहीं करना चाहिये ॥८६ ॥
शीतकालेऽग्निमान्ये च कफोत्येष्वामयेषु च ।
मार्गावरोधे दुष्टे च वायौ तक्रं प्रशस्यते ॥ ८७ ॥
शीतकाल, अग्निमान्ध, कफ्जन्यरोग, स्रोतसों के मार्गा वरोध में तथा वायु की दुष्टि में तक प्रशस्त मानी गई है ॥८७ ॥ ।
तत् पुनर्मधुरं श्लेष्मप्रकोपणं पिंत्तप्रशमनच; अम्लं वातनं पित्तकरच ॥ ददं ॥ मधुर तक कफ का प्रकोप करती है और पित्त का शमन करती है । अम्ल तक्र वात को नष्ट करती है तथा पित्त को चढाती है ॥ ८८ ॥
वातेऽम्लं सैन्धवोपेतं, स्वादु पित्ते सशर्करम् ।
पिवेत्तक्रं कफे चापि व्योषक्षारसमन्वितम् ॥ ८६ ॥
वात के प्रकोप में सैन्धवलवणयुक्त अम्लत, पित्त के प्रकोप में शर्करायुक्त स्वादुतक तथा कफ के प्रकोप में सोंठ, मरिच, पिप्पली तथा यवक्षार इनका चूर्ण मिलाकर तक्र पीनी चाहिये ॥ ८ ९ ॥
ग्राहिणी वातला रूक्षा दुर्जरा तक्रकूर्चिका ।
तक्राल्लघुतरो मण्डः कूर्चिकादधितक्रजः ॥ ६० ॥
तक्रकूर्चिका ग्राहिणी ( कब्ज करनेवाली ), वातकारक, रूक्ष और दुर्जर होती है । कूर्चिकाभूत दही और तक्र से बनाया हुआ मण्ड तक्र से अधिक लघु होता है ॥ ९ ० ॥ 4 विमर्श: -- दध्ना तक्रेण वा सह पाकात् पृथग्भूत घनद्रवभाग क्षीर कूचिका । उपरितनः स्वच्छो भागो मण्ड. । कथम्भूत. कूर्चिका-दधितक्रन. कूचिकाभूत यद्दधि तक्र च ताभ्या जात इत्यर्थं । तदाह । निघण्टौ - ' दध्ना सह च यत्पक्व क्षीरं सा दधिकूर्चिका । तक्रेण पक्व यत्क्षीर सा भवेत्तक्रकूचिका ॥ ' इति ।
गुरुः किलाटोऽनिलहा पुंस्त्वनिद्राप्रदः स्मृत ' ।
मधुरौ बृंहणौ वृष्यौ तद्वत्पीयूषमोरटौ ॥ ६१ ॥
किलाट पचने में भारी, वातनाशक, पुंस्त्व तथा निद्वा लानेवाला होता है । इसी प्रकार पीयूष और मोरट स्वाद में मधुर, बृंहणकारक और नृप्य होते हैं ॥ ९ १ ॥ विमर्श: - किलाट कृचिकीभूतदुग्धस्य पिण्ड । तदुक्तम्-' नष्टदुग्धस्य पक्कस्य पिण्ट प्रोक्त किलाटक ' इति । ' क्षीर ' सद्यः प्रसूताया पीयूपमिति सचितम् । सप्तरात्रात्पर क्षीरमप्रसन्नस्तु मोरट ' ॥ सप्ताहात्परतो यावत्प्रसन्नता न गच्छति तावन्मोरट इत्यर्थ. । नवनीतं पुनः सद्यस्कं लघु सुकुमारं मधुरं कषाय-मीपदनं शीतलं मेध्यं दीपनं हृद्यं सङ्ग्राहि पित्तानिल-हरं वृज्यमविदाहि तयकासव्रणशोपार्शोऽर्दितापहं, चिरोत्थितं गुरु कफमेदोविवर्द्धनं बलकरं वृंहणं शोपन्नं विशेपेण बालानां प्रशस्यते ॥ ६२ ॥
नवनीत -- ( नवनीत नवोद्धृतम् ) दही से ताजा निकाला हुआ मक्खन पचने में हलका, शरीर को सुकुमार बनानेवाला, रस में मधुर, कषाय और कुछ खट्टा, शीतप्रकृतिक, मेधावर्द्धक, अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकारी, दस्त को बांधनेवाला, पित्त और वात का नाशक, वृष्य, ढाह नहीं करनेवाला, राज-यक्ष्मा, कास, व्रण, व्यवाय- शोक वार्द्धक्यादिजन्य शोष, अर्श और अर्दित नाशक है | निकालकर रखा हुआ अर्थात् पुराना मक्खन पचने में भारी, कफ और मेदा को बढानेवाला, बल-वर्द्धक, बृंहण, शोषनाशक तथा अधिकतया बालकों के लिये प्रशस्त होता है ॥ ९ २ ॥
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श्रध्याय ८४ ] सूत्रस्थानम् । १७७ चीरोत्थं पुनर्नवनीतमुत्कृष्टमेहमाधुर्ययुक्तमतिशीतं मौकुमार्यकरं चक्षुष्यं प्राहि रक्तपित्तनेत्ररोगहरं प्रसादनञ्च ॥ ६३ ॥
कर दुग्ध में निकाला हुआ मरचन अनीव स्निग्ध और मपुर तथा अधिक शीतल, शरीर को सुकुमार बनानेवाला, नेत्रों के लिये हितकारी, ग्राही, रक्तपित्त तथा नेत्ररोगों को हरनेवाला एवं शरीर, इन्द्रियां और मन को प्रसन्न करता है ॥ सन्तानिका पुनर्वातन्नी तर्पगी बन्या वृष्या स्निग्धा रुच्या मधुरा मधुरविपाका रक्तपित्तप्रमादनी गुर्वी च ॥ मन्नानिका - ( दूध के ऊपर की माई ) वाननाशिका, कारण, बल के लिये हितकर, वृष्य, स्निग्ध, रुचिवर्द्धक, स्वाद और पाक में मधुर, पित्त का प्रमादन ( संशमन ) करनेवाली तथा पचने में भारी होती है ॥ ९ ४ ॥
विकल्प एप दव्यादिः श्रेष्ठो गव्योऽभिर्वागिनः ।
विकल्पानवशिष्टांन्तु क्षीरवीर्यात्समादिशेत् ॥ १५ ॥
Baad | दही तक आदि का जो यह विश्व ( भेद ) वर्णित किया गया है वे दधि - तकादि गौ के श्रेष्ठ होते हैं । एवं जो क्षेत्र प्राणियों के दर, दरि और तम के भेद हैं उनके गुणधर्म उनके दुग्ध के वीर्य ( ग ) मे ही जान लेवें ॥ ९ ५ ॥ इति तवर्गः । अथ घृतवर्ग: -घृनं तु मधुरं सौम्यं मृदु शीतवीर्यमल्पाभिष्यन्दि । | अन्य प्राणियों के घृत के गुणों को अपेक्षा गोघृत सर्वोत्तम । गुण युक्त होता है ॥ ९ ० ॥
आजं घृतं दीपनीयं चक्षुष्यं बलवर्द्धनम् ।
कासे श्वासे नये चापि पश्यं पाके च तल्लवु ॥ ६८ ॥
अनावृत अग्नि का दीपक, नेत्रों के लिये हितकारी और बलवर्द्धक है तथा कास, श्वास और क्षय में भी पथ्य है । यह पाक में लघु होता है ॥ ९ ८ ॥
मधुरं रक्तपित्तन्नं गुरु पाके कफावहम् ।
वातपित्तप्रशमन सुशीतं माहिपं घृतम् ॥ ०६ ॥
माहित -- मधुर, रक्तपित्तनाशक, पाक में भारी, कफ-बर्द्धक, वायु और पित्त को शान्त करने वाला तथा शीतल है ॥
औट्रं कटु घृतं पाके शोफक्रिमित्रिपापहम् ।
दीपनं कफवातन्न कुष्टगुल्मोदरापहम् ॥ १०० ॥
ऊंटनी का घी - विपाक में कटु, शोफ, क्रिमि और विप का नाशक, अग्नि का दीपक, कफ - वात का नाशक एवं कुष्ठ, गुल्म तथा उदर रोगों को नष्ट करता है ॥ १०० ॥
पाके लव्याविकं सर्पिर्न च पित्तप्रकोपणम् ।
कफेऽनिले योनिदो शोये कम्पे च तद्धितम् ॥१०१ ॥
भेड़ी का घी - पचने में लघु होता है तथा पित्त का प्रकोप नहीं करता है एव कफविकार, वातविकार, योनि दोष, शोष और कप में हितकारी है ॥ १०१ ॥
पाके लघुणवीर्यञ्च कषायं कफनाशनम् ।
दीपनं बद्धमूत्रञ्च विद्यादैकशफं घृतम् ॥ १०२ ॥
एक शफ ( खुर ) वाले प्राणी जैसे घोड़ी, गदही आदि इनका घी पचने में हलका, उष्णवीर्य, स्वाद में कपाय, कफ का नाशक, अग्नि का दीपक तथा मूत्र को कम करता है ॥ १०२ ॥
स्नेहनमुदार्तोन्मादापस्मारशूलज्यरानाद्द्वातपित्तप्रशम- । चक्षुष्यमग्न्यं खीणान्तु सर्पिः स्यादमृतोपमम् | नमग्निदीपनं स्मृतिमतिमेघाकान्तिस्वरलावण्यसौकुमा-यजस्तेजोवलकर मायुष्यं वृष्यं मेध्यं वयःस्थापनं गुरु चक्षुष्यं लेोमाभिवर्द्धनं पाप्मालक्ष्मीप्रशमनं त्रिपहर रक्षोन्नञ्च ॥ ६६ ॥
घृत मजुर, सौम्य, मृदु, शीतवीर्य, अल्पक्लेदकारक, शरीर मैं स्नेहन करनेवाला तथा उदावर्त, उन्माद, अपस्मार, शूल, ज्वर, आनाह और बात तथा पित्त को शान्त करनेवाला, पाचकाग्नि का दीपक है एवं स्मृति, मति, मेघा, कान्ति, स्वर, व्टावण्य, सौकुमार्य, ओज, तेज और चल इन सबको चुडाना है तथा आयुवर्द्धक, वृष्य, मेध्य, वयस्थापक, पचने में भारी, नेत्रों के लिये हितकर, कफ को बढानेवाला, पाप तथा अलक्ष्मी ( दरिद्रता या कुरूपता ) का नाशक, विपों को नष्ट करनेवाला एवं राक्षसों ( या सूक्ष्म जीवाणुओं ) का नाशक है ॥ ९ ६ ॥
विपाके मधुरं शीतं वातपित्तविषापहम् ।
चक्षुष्यमग्रयं बल्यञ्च गव्यं सर्पिर्गुणोत्तरम् ॥ ६७ ॥ ।
गोघृत- विपाक में मधुर, शीतप्रकृतिक, वात, पित्त और विष का नाशक, नेत्रों के लिये हितकारी, बलवर्द्धक तथा २३० वृद्धि करोति देहाग्न्योर्लघुपाकं विपापहम् ॥ १०३ ॥
स्त्रीघृत - नेत्र रोगों के लिये अधिक हितकारी और अमृत के समान गुणकारी होता है । देह और पाचकानि की वृद्धि करता है, पचने में हलका होता है एवं विपों का नाशक है ॥
कपायं बद्धविण्मूत्रं तिक्तर्माग्निकरं लघु ।
हन्ति कारेणवं सर्पिः कफकुष्टविपक्रिमीन् ॥ १०४ ॥।
करेणु ( हस्तिनी ) का घी कपाय रस, विष्ठा और मूत्र बांधने वाला, तिक, पाचकाप्ति का बर्द्धक, पचने में हलका होता है तथा कफ, कुष्ठ, चिप और क्रिमि रोगों को नष्ट करता है ॥ १०४ ॥
क्षीरघृतं पुनः सम्प्राहि रक्तपित्तभ्रममूर्च्छाप्रशमनं नेत्ररोगहितञ्च ॥ १०५ ॥
चीरघृत अर्थात् कचे दुग्ध से निकाले हुये मक्खन से बनाया हुआ घी ग्राही होता है तथा रक्तपित्त, भ्रम और मूर्च्छा को शान्त करता है एवं नेत्र रोगों के लिये हितकारी है ॥ १०५ ॥
सर्पिर्मण्डस्तु मधुरः सरो योनिश्रोत्राक्षिशिरसां शूलघ्नो बस्तिनस्याक्षिप्रपूरणेषूपदिश्यते ॥ १०६ ॥
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१७८८ सुश्रुतसहिता । घी के ऊपर जमा हुआ स्वच्छ भाग रस में मधुर, दस्तावर एवं योनि, कर्ण, नेत्र तथा शिर के शूल को नष्ट करने वाला होता है तथा वस्ति नस्य और नेत्रपूरण कार्य में हितकारी कहा गया है ॥ १०६ ॥
सपः पुराणं सरं कटुविपाकं त्रिदोषापहं मूर्च्छा-मदोन्मादोदरज्वरगरशोषापस्मारयोनिश्रोत्राक्षिशिरःशू-लन्नं दीपनं बस्तिनस्याक्षिपूरणेषूपदिश्यते ॥ १०७ ॥
पुराना घी कुछ दस्तावर, विपाक में कटु, त्रिदोषों का नाशक, मूर्च्छा, मद, उन्माद, उदर रोग, ज्वर, गर ( कृत्रिम विप ), शोष, अपस्मार, योनिरोग या योनिशूल, कर्ण के रोग या शूल, नेत्र के रोग या शूल और शिर के शूल को नष्ट करता है । कायाग्नि को दीप्त करता है तथा वस्ति, नस्य और नेत्र. पूरण में प्रयुक्त होता है ॥ १०७ ॥
भवति चात्र-पुराणं तिमिर श्वासपीनसब्वरकासनुत् ।
मूर्च्छाकुष्ठ विषोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥
( एकादशशतचैव वत्सरानुषितं घृतम् । रक्षोघ्नं कुम्भसर्पिः स्यात् परतस्तु महाघृतम्
पेयं महाघृतं भूतैः कफघ्नं पवनाधिकैः ।
बल्यं पवित्रं मेध्यन्न विशेषात्तिमिरापहम् ॥
सर्वभूतहरचैव घृतमेतत् प्रशस्यते ॥ १११
इति घृतवर्ग: ।
१०८ ॥
॥ १०६ ॥
११० ॥
॥ ) पुराना घी - तिमिर, श्वास, पीनस, ज्वर, कास, मूर्च्छा, कुष्ठ, विष, उन्माद, ग्रहपीडा तथा अपस्मार का नाशक है । ( ग्यारह वर्ष से ले कर शत ( सौ ) वर्ष का पुराना घृत ' कुम्भ -सर्प ' कहलाता है तथा वह राक्षसों ( कृमि, जीवाणु, भूत प्रेतादि ) को नष्ट करता है । सौ वर्ष के बाद का घी ' महासर्पि कहलाता है । यह महाघृत वातरोग वाले या वातप्रकृति मनुष्यों द्वारा पीना चाहिये एवं यह कफ करता है, बलवर्द्धक, पवित्र और मेध्य है । विशेषतया तिमिर रोग को नष्ट करता है । सर्व प्रकार के भूर्ती ( क्रिमि तथा जीवाणुओं ) को नष्ट करने में प्रशस्त है ) ॥ १०८ - १११ ॥ विमर्शः -- पुराण घृत के विषय में अनेक मत हैं । ( १ ) वर्षा-दूर्ध्वं भवेदाज्य पुराणम् । ( भाव प्र ० ) । ( २ ) सर्पि पुराण विज्ञेय दशवर्षस्थितन्तु यत् । ( योगरत्नाकर ) । अन्यच - पुराणं दशवर्ष स्यात्प्रपुराणमत ' परम्।कुम्भधृत कालः - ( १ ) कौम्म दशाब्दिकम् । चरके चक्रपाणिः ) । ( २ ) शतवर्षस्थित यस्तु कुम्भसर्पिस्तदुच्यते । ( योगरत्नाकर ) । ( ३ ) हारीतसंहिता का मत है कि जैसे जैसे घी पुराना होता है वैसे २ उसमें गुण की वृद्धि होती रहती है-यथा यथा जरा याति गुणवत्स्यात्तथा तथा । इति घृतवर्गः । अथ तैलवर्गः: -तैलं त्वाग्नेयमुष्णं तीक्ष्णं मधुरं मधुरविपाकं बृंहणं प्रीणनं व्यवायि सूक्ष्मं विशदं गुरु सरं विकासि वृष्यं । त्वक्प्रसादनं शोधनं मेधामार्दवमांसस्थैर्यवर्णचलकरं चक्षुष्यं बद्धमूत्रं लेखनं तिक्तकषायानुरसं पाचनमनिल-| बलासक्षयकरं क्रिमिन्नमशितपित्तजननं योनिशिरः कर्ण-शूलप्रशमनं गर्भाशयशोधनञ्च तथा छिन्नभिन्नविद्धो-पिष्टच्युतमथितक्षत पिचितभग्नस्फुटित क्षाराभिदुग्धवि-निष्टदारिताभिहतदुर्भग्नमृगव्यालविदष्टप्रभृतिषु च परि-पेकाभ्यङ्गावगाहादिपु तिलतैलं प्रशस्यते ॥ ११२ ॥
तिलों का तैल आग्नेय, उष्ण, तीक्ष्ण, मधुर विपाक में भी मधुर, बृंहणकारक, इन्द्रियां, मन और आत्मा की तृप्ति करने वाला, व्यवायि अर्थात् शीघ्र शरीर में व्याप्त होने वाला, सुक्ष्म, विशद, पचने में भारी, दस्तावर, विकासि, वृष्य, स्वचा का प्रसादक, दोपों या शरीर का शोधक तथा मेघा, मृदुता, मांस की स्थिरता, वर्ण और वल को करने वाला, नेत्रों के लिये हितकारी, मूत्र का अवरोध करने वाला, लेखक, अनुरस में तिक्त और कपाय, आमदोषों का पाचक, वायु और कफ को नष्ट करने वाला, क्रिमिनाशक, खाने के बाद पित्त का जनक, योनि, शिर और कर्ण के शूल को शान्त करने वाला, गर्भाशय के दोषों का शोधक एवं छिन्न, भिन्न, विद्व, उत्पिष्ट, च्युत, मथित, क्षत, पिच्चित, भन्न, स्फुटित, क्षार तथा अग्नि से दग्ध, विश्लिष्ट, दारित, अभिहत, दुर्भग्न, भहिंस्र तथा हिंस पशुओं से दृष्ट प्रभृति दशाओं में परिषेक, अभ्यङ्ग तथा अवगाहन के लिये ' तिल तैल ' प्रशस्त होता है ॥ ११२ ॥ -विमर्श: --- तैलमिति । यद्यपि तेलशब्देन तिलेषु भवं तैल तिल-तैलमभिप्रेतम्, तथाऽपि वर्गेऽस्मिन्ने रण्डतैलादीनामपि वक्तव्यतया
| ' तिलादिस्निग्धवस्तूना स्नेहस्ते लमुदाहृत " इति पारिभाषिकं तैलमत्रा-भिप्रेतम् । आग्नेयम् = अग्निगुणवदुलम् । ' व्यवायी वाऽसिल दे व्याप्य पाकाय कल्पते ' इति वक्ष्यमाणलक्षण व्यवायि | विकासि = सर्वशरीरानुप्रवेशेन धातुसन्धिबन्धनविमोचकम् ।
तद्वस्तिषु च पानेषु नस्ये कर्णादिपूरणे ।
अन्नपानविधौ चापि प्रयोज्यं वातशान्तये ॥ ११३ 1
इस तिल तैल को वस्तिकर्म, पान, नस्य, कर्ण और नेत्र के पूरण, अनेक प्रकार के खाद्य तथा पेय पदार्थों के संस्कार तथा वात की शान्ति के लिये प्रयुक्त करना चाहिये ॥ ११३ ॥
एरण्डतैलं मधुरमुष्णं तीक्ष्णं दीपनं कटु कषायानु-रसं सूक्ष्मं स्रोतोविशोधनं त्वच्यं वृष्यं मधुरविपाकं वय स्थापनं योनिशुक्रविशोधनमारोग्यमेधाकान्तिस्मृति-बलकरं वातकफहरमधोभागदोषहरञ्च ॥ ११४ ॥
एरण्ड का तैल - मधुर, उष्ण, तीक्ष्ण, अभि का दीपक, रस में कटु, अनुरस में कषाय, सूक्ष्म, स्रोतोविशोधक, त्वचा के लिये हितकारी, वृष्य, विपाक में मधुर, आयु का स्थापक, योनि तथा शुक्र के दोषों का शोधक, शरीर की नीरोगतां, मेधा, कान्ति, स्मृति और बल को करने वाला, वायु और कंफ का नाशक एवं शरीर के मलाशय, मूत्राशय आदि अधोभागों के दोषों को हरने वाला कहा गया है ॥ ११४ ॥
विमर्श: --- एरण्डतैल सुकुमार कोष्ठ के मनुष्य, छोटे बच्चे, गर्भिणी स्त्री तथा वृद्धों के लिये विरेचनादि में प्रयुक्त करने पर अमृत सा कार्य करता है ।