श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 231–240

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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श्रध्यायः ४५ ] सूत्रस्थानम् । १७६ निम्बातसीक्कुसुम्भमूलकजीमूतकवृक्षककृतवेधना- । कम्पिल्लकहस्तिकर्णपृथ्वीका पीलुकरखेङ्गुदीशिनुसर्पप-सुवर्चलाविडङ्गज्योतिष्मतीफलतैलानि तीच्णानि लघु-न्युष्णवीर्याणि कनि कटुविपाकानि सराण्यनिलकफ-कृमिकुष्टप्रमेहशिरोरोगहराणि चेति ॥ ११५ ॥

नीम, अलसी, कुसुम्भ, मूली, देवदाली, कुटन, कोशातकी, आक, कवीला, हस्तिकर्ण ( लाल एरण्ड या पलाश ), काला जीरा, पीलु, करज, मुदी, सहजन फली, सरसों, सूर्यावर्त, विडङ्ग, मालकांगनी इनके फल अथवा बीज के तैल तीच्ण, पचने में हलके, उष्णवीर्य, रस और विपाक में कटु, मृदु विरेचक हैं तथा वायु, कफ, कृमि, कुष्ठ, प्रमेह तथा शिर के रोगों को नष्ट करते हैं ॥ ११५ ॥

वातन्नं मधुरं तेषु क्षौमं तैलं बलापहम् ।

· कटुपाकमचक्षुष्यं स्त्रिग्घोष्णं गुरु पित्तलम् ॥ ११६ ॥

कृमिन्नं सार्पपं तैलं कण्डूकुष्टापहं लघु ।

कफमेदोऽनिलहरं लेखनं कटु दीपनम् ॥ ११७ ॥

कृमिघ्न्नमिङ्गुदीतैलमीपत्तिक्कं तथा लघु ।

कुष्टामयकृमिहरं दृष्टिशुक्रवलापहम् ॥ ११८ ॥

विपाके कटुकं तैलं कौसुम्भं सर्वदोपकृत् ।

रक्तपित्तकरं तीच्णमचक्षुष्यं विदाहि च ॥ ११६ ॥

उक्त तैलों में अलसी का ( चौम ) तेल वातनाशक, मधुर, बलनाशक, विपाक में कटु, नेत्रों के लिये अहितकारी, स्निग्ध, - उष्ण, भारी और पित्तकारक होता है । सरसों का तेल कृमि, कण्डू और कुष्ठ को नष्ट करता है, पचने में हलका होता है, कफ, मेद और वात रोगों का नाशक है तथा लेखक, कटु और अग्नि का दीपक है | हिंगोट तेल - कृमिनाशक, कुछ तिक्त एवं हलका होता है, कुष्ट तथा कृमि रोगों को नष्ट करता है तथा दर्शनशक्ति, वीर्य और शरीर के वल को नष्ट करता है । कुसुम्भ तैल विपाक में कटु, सर्व दोषों का जनक, रक्तपित्त को बढाने वाला, तीच्ग, नेत्रों के लिये हानिकारी तथा शरीर में विदाह उत्पन्न करता है | ११६–११९ ॥ किराततिक्तका तिमुक्तकविभीतकनालिकेरको लातो-ढजीवन्तीप्रियालकर्बुदारसूर्यवल्लीत्रपुसैर्वारुककर्का स्कू-माण्डप्रभृतीनां तैलानि मधुराणि मधुरविपाकानि वातपित्तप्रशमनानि शीतवीर्याण्यभिष्यन्दीनि सृष्टवि -मूत्राण्यग्निसादनानि चेति ॥ १२० ॥

चिरायता, माधवीलता फल, बहेडे की गिरी, नारियल-गिरी, बैर, अखरोट, जीवन्ती, चिरोजी, कचनार, अर्कपुप्पी, खीरा, एर्वारक ( खीराभेद ), क्रुक, कोहड़ा आदि के फ -केतेरस और पाक में मधुर वायु और पित्त के प्रशामक, शीतवीर्यं, अभिप्यन्दी, मूत्र लाने वाले तथा पाचकानि के नाशक होते हैं ॥ १२० ॥

मधुक काश्मर्यपलाशतैलानि मधुरकषायाणि कफ पित्तशमनानि ॥ १२१ ॥

मगुआ, गम्भारी और पलाश ( ढाक ) के बीज के तैल मधुर, कपाय तथा कफ और पित्त के प्रशामक होते हैं ॥१२१ ॥

तुवरकभल्लातकतैले उष्णे मधुरकपाये तिक्तानुरसे वातकफकुष्टमे दोमेहकृमिप्रशमने उभयतो भागदोषहरे च ॥ तुवरक तथा भिलावें के तैल उष्ण, मधुर और कषाय, अनुरस में तिक्त एवं वात, कफ, कुष्ट, मेदोवृद्धि, प्रमेह और कृमि रोगों के प्रशामक तथा उभय ( ऊर्ध्व और अधः ) भाग के दोषों के नाशक होते हैं ॥ ११२ ॥

.. विमर्शः -- तुवरकनामौषधिः, एतत्परिचयस्तु - ' पत्रैस्तु केशरा-कारे. कलायसदृशं फले । वृक्षस्तुवरको नाम पश्चिमार्णंवतोरनः ॥ ’ इति तन्त्रान्तरीयः । आजकल गलित कुष्ठ ( Leprosy ) मैं तुवरक । तेल का प्रयोग अधिक करते हैं । सरलदेवदारुगण्डीरशिंशपागुरुसारस्नेहास्तिक्तकटु-कषाया दुष्टव्रणशोधनाः कृमिकफकुष्ठानिलहराश्च ॥ १२३ ॥

सरल, देवदार, गण्डीर, शीशम और अगुरु इनके सार भाग के निकाले हुये स्नेह तिक्त, कटु और कषाय होते हैं । दुष्टण का शोधन करते हैं तथा कृमि, कफ, कुष्ठ और वात रोगों को नष्ट करते हैं ॥ १२३ ॥

तुम्बीकोशाम्रदन्तीद्रवन्तीश्यामासप्तलानीलिकाक • म्पिल्लकशङ्खिनीस्नेहास्तिक्तकटुकषाया अधोभागदोपह-राः कृमिकफक्कुष्टानिलहरा दुष्टव्रणशोधनाश्च ॥ १२४ ॥

कडची तोम्बी, कोशात्र, दन्ती, द्वचन्ती, सप्तला, नीलिका, कम्पिल्लक और शङ्खिनी के तैल, कटु और कपाय रसयुक्त होते हैं तथा अधोभाग के मल, मूत्र, चातादि दोषों का हरण करते हैं एवं कृमि, कफ, कुष्ट और वातनाशक तथा दुष्टघण-शोधक होते हैं ॥ १२४ ॥

यतिक्तातैलं सर्वदोपप्रशमनमीपत्तितमग्निदीपनं लेखनं मेध्यं पथ्यं रसायनञ्च ॥ १२५ ॥

यवतिक्ता ( कालमेघ ) का तैल सब दोषों का प्रशमन करता है, कुछ तिक्त होता है, अभि का दीपन करता है, दोषों । का लेखन, मेघा के लिये हितकर, पथ्य और रसायन गुण युक्त होता है ॥ १२५ ॥

एकैपिकातैलं मधुरमतिशीतं पित्तहरमनिलप्रकोपणं श्लेष्माभिवर्द्धनं च ॥ १२६ ॥

एकैपिका ( कृष्णत्रिवृत् फल ) तैल स्वाद में मधुर, अति शीतप्रकृतिक, पित्त का हारक, वात का प्रकोपक एवं कफ-वर्द्धक होता है ॥ १२६ ॥

सहकारतैलमीषत्तितमतिसुगन्धि वातकफहरं रूक्षं मधुरकपायं रसवन्नातिपित्तकरून ॥ १२७ ॥

आनफल की गुटली का तेल अथवा आम के मौर ( पुप्पाडर ) या पत्तों का तैल कुछ तिक किन्तु अधिक सुगन्धिवाला, वात और कफ का नाशक, रूस, मधुर और कषाय होता है तथा रस की भांति अधिक पित्तकारक नहीं होता है ॥ ११७ ॥

फलोद्भवानि तैलानि यान्युक्तानीह कानिचित् ।

। गुणान् कर्म च विज्ञाय - फलानीव विनिर्दिशेत् ॥ १२८ ॥

पृष्ठ 232

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१८० सुश्रुतसहिता ।

यावन्तः स्थावराः स्नेहाः समासात् परिकीर्त्तिताः ।

सर्वे तैलगुणा ज्ञेयाः सर्वे चानिलनाशनाः ॥ १२६ ॥

सर्वेभ्यस्त्विह तैलेभ्यस्तिलतैलं विशिष्यते ।

निष्पत्तेस्तद्गुणत्वाच्च तैलत्वमितरेष्वपि ॥ १३० ॥

जिन जिन फलों के कुछ तैलों का वर्णन यहां नहीं किया गया है उन तैलों के गुणकर्म उनके फलों के समान ही सम • चना चाहिये । जो जो स्थावर स्नेह यहां सक्षिप्त रूप से वर्णित किये गये हैं वे सब तिलतैल के सामान्यगुणों से युक्त होते हैं अतः वे सब स्नेह वातनाशक हैं । सर्व प्रकार के तेलों की अपेक्षा तिलों का तैल प्रशस्त है । यद्यपि तैल संज्ञा तिलों से निकले स्नेहरूपी द्रव को ही है तथापि उन तिलातिरिक्त वानस्पतिक स्नेहों से भी तिलतैल के समान निप्पत्ति ( कार्य सिद्धि ) होने से तथा तिलतैल के गुणों के समान ही उन गुण होने से उनमें भी तैलत्व का आरोप किया गया है ॥ विमर्शः — चरक ने स्नेहों की दो योनि मानी है—- स्नेहाना द्विविधा योनि- सौम्य । स्थावरजङ्गमा । तैलगुणाश्चरके – नेल सयोगसस्कारात् सर्वरोगापह परम् । तैलप्रयोगादजरा निर्विकारा जितश्रमा ॥ आसन्नातित्रला सख्ये दैत्याधिपतय पुरा ॥ निप्पत्ति का अर्थ तैलनिष्कासन - समानता किया है जैसे — तिले यथा तैल निष्पद्यते चूर्णीकरणयन्त्रादिना तथा सर्पपादावपि स्नेहापकर्ष णात् । भवति च समाननिष्पत्तिकनया तच्छब्दता । ( शिवदाससेनः ) । ग्राम्यानूपौदकानाञ्च वसामेदोमज्जानो गुरूष्णम ' धुरा वातघ्नाः । जाङ्गलैकशफक्रव्यादादीनां लघुशीत-कपाया रक्तपित्तघ्नाः । प्रतुदविष्किराणां श्लेष्मघ्नाः । तत्र धृततैलवसामेदोमज्जानो यथोत्तरं गुरुविपाका वातहराश्च ॥ १३१ ॥

इतितैलवर्गः । गौ, अश्व, उष्ट्र आदि ग्राम्य, महिपादि आनूप तथा मत्स्यादि औदक प्राणियों की वसा, मेद और मजा भारी, उष्णप्रकृतिक, रस में मधुर तथा वातनाशक है तथा जंगल में घूमने वाले प्राणी, एक सुरवाले प्राणी तथा हिंस्रक प्राणियों की वसा, मेद् और मज्जा लघु, शीतल, कपाय तथा रक्तपित्त-हारक होती है 1 । कपोत, पारावतादि प्रतुद और लाव- तित्तिरादि fafter प्राणियों की वसा, मेढ और मज्जा कफनाशक होती है । घृत, तेल, वसा, मेदा और मजा ये यथोत्तर अधिक भारी एवं वातनाशनार्थ उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं ॥ १३१ ॥

विमर्श: - तैल बसा जा स्नेहोऽप्युक्तश्चतुर्विध । यहां भेद को और बढ़ाकर पांच स्नेह कर दिये हैं । तैल को Oil, वसा को Fat, मेद को Red Marrow, मजा को Yellow Marrow कहते हैं । स्थूला स्थिषु विशेषेण मज्जा त्वभ्यन्तराश्रिता । अथेनरेषु सर्वषु सरक्त मेद उच्यते ॥ स्नेह द्वन्यों का निर्माण ग्लिस्स्रीन और फेरि एसिठ के संयोग से होता है । जिसमें फेटि एसिट निम्न श्रेणी के हों उन्हें रासायनिक भाषा में तैल कहते हैं अत एव तैल पतले होते हैं । जिन में उपश्रेणी के फेटि एसिड हो उन्हें घसा कहते हैं जिससे वह गाढ़ी होती है । इति तैलवर्गः । अथ मधुवर्ग: -• मधु तु मधुरं कपायानुरसं रूक्षं शीतमग्निदीपनं वर्ण्य स्वयं लघु सुकुमारं लेखनं हृद्यं वाजीकरणं सन्धानं शोधनं रोपणं सङ्ग्राहि चक्षुष्य प्रसादनं सूक्ष्ममार्गा | नुसारि पित्तश्लेष्ममेदोमेहहिक्काश्वासकासातिसारच्छ-दितृष्णाकृमिविपप्रशमनं ह्लादि त्रिदोपप्रशमनञ्च । तत्तु लघुत्वात्कफन्नं पैच्छिल्यान्माधुर्यात्कपायभावाच्च वात · पित्तघ्नम् ॥ १३२ ॥

मधु ( शहद Honey ) रस में मधुर, अनुरस में कपाय, रुक्ष, शीत, अग्निदीपक, वर्ण बढानेवाला, बलवर्द्धक, पचने में हलका, सुकुमारताकारक, लेखन, हृदय के लिये हितकर, वाजीकरण, भग्नास्थिसन्धानकारक, दोपसशोधक, व्रणरोपक, संग्राहि, नेत्रों के लिये हितकर, प्रसादक, शरीर के सूक्ष्म स्त्रोतसों ( माग ) में प्रवेश करने वाला, पित्त, कफ, मेदोष्षृद्धि, प्रमेह, हिक्का, श्वास, कास, अतिसार, वमन, तृष्णा, कृमि और विष का प्रशमन करने वाला, हृदयाह्लादकारी तथा त्रिदोष का शामक है । वह शहद लघु होने से कफ को नष्ट । करता है तथा पिच्छिल, मधुर और कपाय रस होने से बात और पित्त को नष्ट करता है ॥ १३२ ॥

विमर्श -- मधु में द्राक्षाशर्करा या ग्लुकोज ७५ % प्रतिशत होता है एवं इक्षुशर्करा, लेन्यूलोज, प्रोटीड्स, गोंद, भोम, रञ्जन द्रव्य, फोर्मिक एसिड, सुगन्धिद्रव्य, लोहा, चूना, फोस्फरस, विटामिन्स, Diastatic ferment, जल और पुष्पों के पराग होते हैं । इसी तरह शरीर के उपयोगी सभी उपादान मधु में हैं । अग्निमान्द्य, ज्वर, चमन, तृपा, अम्लावस्था, विपम-यावस्था, मधुमेह, हृदयदौर्बल्य, हृदयावसाद ( Collapse ) में मधु अत्यन्त लाभकारी है । मधु की शर्करा ( Glucose ) का पाश्चात्यविज्ञान में बहुत आदर और उपयोग हो रहा है ।

पौत्तिकं भ्रामरं क्षौद्रं माक्षिकं छात्रमेव च ।

आर्घ्यमौद्दालकं दालमित्यष्टौ मधुजातयः ॥ १३३ ॥

मधु के भेद – पौत्तिक, भ्रामर, क्षौत्र, माक्षिक, छात्र, भार्घ्य, औद्दालक और दाल ये मधु की आठ जातियां होती हैं ॥१३३ ॥

विमर्श: - चरक ने केवल मधु की चार जातियां ही मानी हैं । माक्षिक भ्रामर क्षौद्र पौफिक मधुजानय । भावप्रकाशे पौत्तिका-द्यष्टनातिमधुलक्षणानि यथा - पौत्तिकम् - ' महत्य पिङ्गला यास्तु माक्षिका पुत्तिका स्मृता ' तद्भव सर्पिषा तुल्य मधु पौप्तिकम् । भ्रामरम् – ' किञ्चित्सूक्ष्मै प्रसिद्धेभ्य. पट्पदेभ्योऽलिभिश्चितम् । निर्मल स्फटिकाभ यत्तन्मधु भ्रामर स्मृतम् ॥ ' इति । क्षौद्रम् - ' मक्षिकाः कपिलाः सूक्ष्माः क्षुद्राख्यास्तत्कृत मधु । मुनिभि क्षौद्रमित्युक्त तद्व-| र्णात्कपिल भवेत् ॥ ' इति । माक्षिकम् – ' मक्षिका. पिङ्गवर्णास्तु महत्यो मधुमक्षिका । ताभि कृन तैलवर्णं माक्षिक परिकीर्तितम् ॥ ' इति । छात्रम् -'वरटाः कपिलाः पीता. प्रायो हिमवतो वने । कुर्वन्ति छत्रकाकारं तब्ज छात्र मधु स्मृतम् ॥ ' इति । आर्घ्यम् — ' तीक्ष्णतु-ण्डास्तु या. पीतवर्णी. षट्पदसन्निभाः । अयस्ता माक्षिका क्षेया आयं तत्कृतमुच्यते ॥ ' इति । औद्दालकन् - ' प्रायो वल्मीकमध्यस्थाः कपिला. स्वल्पकोटकाः । कुर्वन्ति कपिलं स्वल्पं तस्मादौद्दालक मधु ।

पृष्ठ 233

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श्रध्यायः ४५ ] सूत्रस्थानम् । १८१ इति । दालम् - ' इन्द्रनीलदलाकाराः सूक्ष्मा या मक्षिकाः शुभाः । वृक्ष कोटरमध्यस्थास्तज्जं दालमुदाहृतम् ॥ ' इति ।

विशेषात्पौत्तिकं तेषु रूक्षोष्णं सविषान्वयात् ।

वातासृपित्तकृच्छेदि विदाहि मदकृन्मधु ॥ १३४ ॥

पैच्छिल्यात् स्वादुभूयस्त्वाद् भ्रामरं गुरुसंज्ञितम् ।

चौद्रं विशेषतो ज्ञेयं शीतलं लघु लेखनम् ॥ १३५ ॥

तस्माल्लघुतरं रूक्षं माक्षिकं प्रवरं स्मृतम् ।

श्वासादिषु च रोगेषु प्रशस्तं तद्विशेषतः ॥ १३६ ॥

. स्वादुपाकं गुरु हिमं पिच्छिलं रक्तपित्तजित् ।

श्वित्रमेहकृमिघ्नं च विद्याच्छात्रं गुणोत्तरम् ॥ १३७ ॥

आये मध्वतिचक्षुष्यं कफपित्तहरं परम् ।

कषायं कटु पाके च बल्यं तिक्तमवातकृत् ॥ १३८ ॥

औद्दालकं रुचिकरं स्वयं कुष्ठविषापहम् ।

कषाय मुष्णमम्ल पित्तकृत् कटुपाकि च ।

छर्दिमेहप्रशमनं मधु रूक्षं दलोद्भवम् ॥ १३६ ॥

पौत्तिक मधु - सविष मक्षिकाओं से या विषैले पुष्पों के रस से बनने के कारण विशेषतया रूक्ष तथा उष्ण होता है एवं चायु, रक्त और पित्त को बढाता है तथा मेदोग्रन्थि आदि का छेदन करता है । यह मधु विदाह तथा मद जनक भी है । भ्रामरमधु — पिच्छिल होने से तथा अधिक मधुर होने से भारी होता है । क्षौद्रमधु - विशेषकर शीतल, लघु और लेखन होता है । माक्षिक मधु - चौद्रः मधु से भी हलका, रूक्ष तथा सबसे श्रेष्ठ है एवं श्वास - कासादि रोगों में विशेष कर प्रशस्त है । छात्रमधु - विपाक में मधुर, पचने में भारी, शीतल तथा पिच्छिल होता है एवं रक्तपित्त, श्वेतकुष्ठ, प्रमेह, कृमि इनको नष्ट करता है एवं अन्य की अपेक्षा गुणों में श्रेष्ठ माना गया है । मधु - नेत्रों के लिये अतीव लाभकारी, कफ और पित्त का नाशक, रस में कपाय, विपाक में कटु, बलकारक, तिक्त एवं कुछ वातकारी होता है । भद्दालकमधु रुचिवर्द्धक, स्वरहितकारी एवं कुष्ठ तथा विष का नाशक है । दालमधु —— कषाय, उष्ण, अम्ल, पित्तकारी, विपाक में कटु, मन तथा प्रमेह का शामक और रूक्ष होता है ॥१३४- १३ ९ ॥ विमर्श: -- विदाहिलक्षणम् - द्रव्यस्त्रभावादथ गौरवाद्वा चिरेण पाकं जठराग्नियोगात् । पित्तप्रकोप विदहत् करोति तदन्नपानं कथितं विदाहि || वृंहणीयं मधु नवं नातिश्लेष्महरं सरम् ॥ १४० ॥।

मेदःस्थौल्यापहं ग्राहि पुराणमतिलेखनम् ।

दोषत्रयहरं पकमाममम्लं त्रिदोषकृत् ॥ १४१ ॥

नवीन मधु - बृंहणकारी, अधिक कफ नाश नहीं करने वाला, कुछ दस्तावर होता है । पुराना मधु शरीर की बढी हुई मेदधातु तथा स्थौल्य को नष्ट करने वाला, ग्राहि और अति लेखक होता है । पकमधु - त्रिदोषों का नाशक होता है । तथा आम ( कच्चे घुसे को तोड़ कर निकाला हुआ ) मधु खट्टा होता है एवं त्रिदोषों को करता है । १४०-१४१ ॥ विमर्श: - मधुनः पुराणताकाल: --- मधुन. शर्करायाश्च गुट-त्याभिविशेषतः । एकसंवत्सरेऽतीते पुराणत्वस्मृतं बुधैः ॥ ( भावप्रकाश ) ||

तद्युक्तं विविधैर्योगैर्निहन्यादामयान् बहून् ।

नानाद्रव्यात्मकत्वाच्च योगवाहि परं मधु ॥ १४२ ॥

इस मधु को अनेक योगों के साथ प्रयुक्त करने से अनेक प्रकार के रोगों को नष्ट करता है एवं अनेक द्रव्यों ( पत्र, पुष्प ) से उत्पन्न होने से परं योगवाही है ॥ १४२ ॥

तत्तु नानाद्रव्यरसगुणवीर्यविपाकविरुद्धानां पुष्प-रसानां सविपमक्षिकासम्भवत्वाच्चानुष्णोपचारम् ॥१४३ ॥

वह मधु अनेक प्रकार के द्रव्यों के रस, गुण, वीर्य और विपाक की दृष्टि से परस्पर विरुद्ध ऐसे विविध पुष्पों के रस से उत्पन्न होने से तथा विषैली मक्षिकाओं द्वारा उत्पन्न होने से उष्णोपचार या उष्ण अवस्था के साथ संसर्ग रखने के योग्य नहीं है ॥ १४३ ॥

उष्णैर्विरुध्यते सर्वं विषान्वयतया मधु ।

उष्णार्त्तमुष्णैरुष्णे वा तन्निहन्ति यथा विषम् ॥१४४ ॥

तत्सौकुमार्याश्च तथैव शैत्यान्नानौपधीनां रससम्भवाच्च ।

उष्णैर्विरुध्येत विशेषतश्च तथाऽन्तरीक्षेण जलेन चापि ॥

मधु अपनी उत्पत्ति में विपसंसर्गजन्य होने से उष्ण अवस्थाओं के साथ विरुद्ध पड़ता है जैसे अग्नि या सूर्य के ताप से पीडित मनुष्य को उष्ण द्रव्यों के साथ उष्ण समय ( शरद्, ग्रीष्म व मध्याह्न ) में सेवन कराने से विष की तरह मार डालता है । मधु सुकुमार होने से, शीतल होने से और | अनेक प्रकार की ओषधियों के ( पुष्प ) रस से उत्पन्न होने से उष्ण द्रव्यों के साथ विरुद्ध पढ़ता है तथा विशेष कर आन्तरिक्ष जल के साथ भी विरुद्ध पड़ता है ॥ १४४–१४५ ॥

उष्णेन मधु संयुक्तं वमनेष्ववचारितम् ।

अपाकादनवस्थानान्न विरुध्येत पूर्ववत् ॥ ९ ४६ ॥।

वमन क्रियाओं के उष्ण जलादि द्रव्यों के साथ प्रयुक्त मधु पाक न होने से तथा शरीर में नहीं ठहरने से विरुद्ध नहीं होता है ॥ १४६ ॥

मध्वामात्परतस्त्वन्यदामं कष्टं न विद्यते ।

विरुद्धोपक्रमत्वात्तत् सर्वं हन्ति यथा विषम् ॥ १४७ ॥

मधु के अति सेवन से उत्पन्न आमावस्था अर्थात् अजी-र्णावस्था से बढ़ कर अन्य पदार्थों की भजीर्णावस्था कष्टदायिनी नहीं होती है क्योंकि आमादस्थानाशार्थ सर्व प्रकार के उपक्रम ( स्वेदन, उष्णपदार्थ सेवन ) मधु के विरुद्ध होने से विप की तरह ( वह मधु की आमावस्था ) मनुष्य को मार डालती है ॥ इति मधुवर्गः । अक्षुवर्ग: -इक्षवो मधुरा मधुरविपाका गुरवः शीताः स्निग्धा चल्या वृष्या मूत्रला रक्तपित्तप्रशमनाः कृमिकफकराश्चेति ॥ सभी इक्षुरस और विपाक में मधुर, पचने में भारी, शीत, स्निग्ध, बलकारक, वृष्य, मूत्र लाने वाले, रक्तपित्त के प्रशामक तथा कृमि और कफ को उत्पन्न करने वाले होते हैं ॥

पृष्ठ 234

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१८२ सुश्रुतसहिता ।

ते चाकविः । उद्यण-पौण्ड्रको मीरत्र्यैत्र वंशकः श्वेतपोरकः ।

न्वारन्तापसेक्षुकाः सुचिपत्रक्रः ॥ ११६ ॥

नेपाली दीर्घपत्रञ्च नीलपोरोऽय कोशकृन् । इत्येता जातयः स्यात्याद् गुगान् यान्यः परम् ॥ ' बेइ अनेक प्रकार के होते हैं, जैसे - पौन्डक, नीरक, कवक, कान्दार, तारखेड, कष्ट, सूचित्रक नेपाल, दीपक, नीलमेर और कोटा में स्यूट रूप से गन्ने की दातियां हैं । अब इसके नन्तर इनके गुवों का वन करते हैं । १४ ९ -१५० { der तथा कफ और वात को नष्ट करता है ॥ १४८ ॥

free fit या कुर्याउदा दृगन् । हृदि दाई यदि दचिराद ॥ इति, विि स्तुवदिनान्मम । वयादि गति । विवाह र

देनाडी ' इति ।

फाणितं गुरु मधुरमभिष्यन्द्र हणमवृष्यं त्रिदोषकृत्य ॥

फाति ( राय ) पाक में भारी, मधुर रसयुक्त, अभि ध्यन्दकारक, बृंहण, वृन्यतया त्रिदोषकारक होता है ॥ १५ ९ ॥ गुडः सारमधुरो नाविशीतः लिग्यो सूत्ररक्तशो-खुशीको मधुरः शिवो वृहनः श्लेष्मलः सरः । ' बनो नातिपित्तजिद्वातन्नो मेढककरो बल्यो वृष्यच ॥ अविदाही गुर्व्वध्यः पौण्ड्रको भीरकत्वया ॥ १५१ ॥

श्राभ्यां तुल्यगुगः किञ्चित्सन्नारो वंशको मतः ।

वंशत्रच्छ्त्रेतपोरन्तु किञ्चिदुष्ण स गता ॥ १५२ ॥

कान्तारतारसाविच वंशात मी ।

एवंरन्तु काटेर सेतु वातत्रकोषः ॥ १५३ ॥

सूचीपत्रो नीलपोरो नैरालो दीर्घत्रकः ।

गवताः कपिचन्त्राः सकगण विदाहिनः ॥ १५४ ॥

कोराकरो गुरु शीनो कंपिचक्षुगरहः ॥ १५५ ॥

पैन्द्रक तया नोकराम गर्छ, नर, Ferra, पुष्टिकर, कर दस्तावर, अविद्वहि, गुरु और कुछ होते हैं । बंध गया इन दोनों के समान गुणों वाला हिन्दु खारा होना है । देवपोरक बंग के समान गुरुवाका तया कुछ टम्प और नाम होता है । कान्तार तया तारखेड के समान ही गुर्गो वाले हैं । इसी प्रकार काटेड इन्हीं हिन्दु दान का करता है । पनीर और दीपक बार्द्धक free sog और विवाह उत्पन्न करते हैं । गुरु श्री दया रकपित्त और चय के नष्ट करता है | १२३-१४१

ती मधुरो मुझे मध्ये नवुर एव तु ।

त्रिषु विज्ञेय इन वो रसः ॥ १५६ ॥

सूल ( ) की तरफ चन्नीदा होता है, गुड हायु तथा मधुर होता है और अधिक नहीं होता है एवं निग्ध, सूत्र और रक्त का शोषक, पिचका अधिक चमन नहीं करने वाला, वातनाशक, मेदोवृद्धि, कृति और कफ करने वाला तथा बलवर्द्धक और वृप्य होता है ॥ १६० ॥

पित्तन्नो नधुरः शुद्धी वातन्नोऽसृ कुप्रसादनः ।

स पुरागोऽविगुगो गुडः पय्यतमः स्मृतः ॥ १६ ९ ॥

शुद्ध गुड पि ories, नर, बावनाशक, रक्तप्रसादक होता है तथा बही एक वर्ष का पुराना नबिक गुनकारी aur अन् परयकारक होता है ॥ १६६ ॥

नय festares शर्करा विमलजाता उत्तरोचरं । शीताः न्निग्याः शुरुवरा मधुरतरा वृष्या रक्तपिचप्रश-। मनाच ॥ १६२ ॥

| गुड से मत्स्यन्डिका, मत्स्यण्डिका से साण्ड और खाण्ड से रोवर साफ होनी है तथा उत्तरोत्तर शीत, लिग्व, अधिक गुरु, अधिक नथुर, वृष्य, रक्तपिच को प्रशमन करने वाढी तथा वृषाशामक होती है ॥ १६२ ॥

विमर्श: - श्री रतः सः विविर् उान्विः । द सन्ददे दनादन्नण्डी निगद्यते । इति । पाकोचर कार्ड न्वानरत विद्युदा गुडा लडिन् वदः सन्तः व्यरोचरं सैन्यादि-साधारण मीच होता है एवं भाग तथा ग्रन्थियों यया चथैषां वैमल्यं मधुरत्वं तथा तथा । स्वरदा होता है ॥ ३०३ ॥ स्नेहगौरवशैचानि सरत्वञ्च तथा तथा ॥ १६३ ॥

हीरो पित्तनिचरकः । इन पदायों की ि a नी हो कि निर्मता होती है । वक्त्रप्रह्लादनो वृष्यो दन्तनिपीडितो रसः ॥ १२७ ॥ उतनी ही अधिक मधुरता, लिग्वता, गुरखा, गीता और

दांतों से छीलकर दबा के निकाला हुआ सा कारख मसूत्रादि सारक गुण बढ़ने जाते हैं ॥ १६३ ॥

दाह नहीं करने वाला वक बात और रिच का नाशक, सुत्र के ' ल करने वाला पूर्व वृष्य होता है ॥ १४७ ॥

गुरुविदाही विन्मी त्रिवतु प्रकीर्त्तितः ।

को गुरूवर ग्विः सतीचाः तुन् ॥ १५ ॥

- चरी ( के ) से निकाला हु का रस पचने वाह विष्टन्त ( क्रज ) कारक होता है । अनि पर पकाया हुवा गन्ने का रस भारी, स्वरपरेचक, स्निग्न

यो यो मत्त्वरिङकाखण्डशर्करागां त्वको गुगः ।

तेन तेनैव निर्देषां विनात्रयो गुगः ॥ १६४ ॥

यदि, खण्ड तथा धर्करा का जो जो अपना निजी गुग होता है वहीं युग उनके विसावंग ( ऋत्रित रस या शर्बतों ) में समझना चाहिये ॥ ६१ ॥

सारस्थिता सुविमला निन्दारा च चया गया ।. तथा तथा गुणवती विज्ञेया शर्करा दुवैः ॥ १६५ ॥

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या १५ ] सूत्रस्थानम् । १८३ जैसे जैसे साफ होकर साररूप में मररहिन और चाररहित होती है पैसे से उसके गुण भी बहते पाते है ऐसा गश सेना नाहिये ॥ १६५ ॥

मधुशर्करा पुरतीसारी चादनी प्रमा दनी मधुर मधुरविपाना ॥ १६३ ॥

naa गमन और प्रतिमा को नष्ट करती है गया रुक्षेत्र या शरीर पर गाने में या तथा विपाक में भी मधुर होती है ॥ १६६ ॥

मधुरकपाया विधातुरमा मारी सरापेति ॥ १६७ ॥

पाम के सेना ( गुरवीन ) मीटी, बी, धनुरम में तिगतया फफ पो नष्ट करने वाली और र विरेषक होती है ॥ ९ ६७ ॥

यारत्यः शर्कराः प्रशेषाः सर्वा मगाशनाः ।

रक्तपित्तप्रशमनादिः ॥ १६८ ॥

भी गई है ये दाद शान्त करने को करने पारी नया मन, और दवा को करती है ॥ १६८ ॥

मधूकपुष्पोत्यं पाणितं वातपित्त छन् ।

कपनं मधुरं पापानं निगम ॥ १६ ९ ॥

महुये के पुष्पों में बनाया हुआ फारित रूट होता है, पात और पिनको पता है, फ नाशक तथा विपाक में मर और बाय एवं वग्नि ( Bladder को दूषित करता है ॥

अथ गद्यवर्गः-पित्तकरं ममलं रोचनदीपनम् ।

भेदनं कफवातघ्नं वस्तिरिशोधनम् ॥ १७० ॥

पाके लघु वितरणमिन्द्रियबोधनम् ।

विकास सृष्टवित्रं शृगु तस्य विशेषणम् ॥ १७१ ॥

सर्व प्रकार के मद्य पितजनक, अम्रमयुक्त, रोचक, अति दीपक, विरेषक, कफ और यान के नाशक, य के लिये हितकारी, मूत्राशय की शुद्धि करने वाले पचने में हलके, दाहजनक, गरम, तीग, ज्ञानेन्द्रियों के उरोज, कामि ( मन्धिबन्धविमोचक ), विटा और मूत्र को साफ लाने बाले होते हैं । अब इनके विशेष भेरों को सुनो ॥ १७०-१७१ ॥ विमर्श -टिक, माइक और गौह ये शाम मचके तीन भेद हैं । मद्य में लवण को छोड़ ने पांच रस होते हैं जिनमें अम्ल प्रधान होता है - मतस्याम्यभावस्य चत्वारोऽनुरसा. स्मृता । मपुर कषायथ तिक ' पदुरु एव च ॥ गुणाश्व दश

पूर्वोकाभिगुंगे । सर्वेषा मामलानामुपर्युपरि तिष्ठति ॥

( चरक ) इन्द्रियोधनः- दर्पण प्रीतिकरः पानागुणदर्शक । घामदासाना थाना ॥ ( वरक ) । मद्य के खास द्रम्य तथा उसमें पड़ने वाले प्रपदस्य एवं मद्य में उत्पन होने या जन्रोहोल ( Alonhol ) की गुण निर्भर करते हैं ।

माकमविदाहित्वान्मधुरान्नयतस्तथा ।

रक्तपितेऽपि सततं बुधैर्न प्रतिषिध्यते ॥

मधुरं तद्धि मचा फणायानुरसं लघु ।

लघुपाक सरं शोपविषमज्वरनाशनम् ॥

1 भाषा मेघनाद और मधुर मात्रा पर उनके १७२ ॥ १७३ ॥ रम प्रधान होने शापित में भी विद्वान् येच मया निषेध नहीं करते हैं । | यह मय मधुर, अनुरम में कषाय, हलका, विपाक में भीक तथा शोष और नियमन को नष्ट मरता है ॥ १८२-१०३ ॥ माहीकाल्पान्तरं किशित सार्जू बातकोपनम् ॥ तदेव विशदं राज्यं कफघ्नं कर्शनं लघु ॥ पायमधुरं हवं सुगन्धीन्द्रियबोधनम् ॥ १७४ ॥

पारमण - प्राणनिर्मित मद्य की अपेक्षा कुछ कम गुण पाला, कुछ धान का प्रकोपक, विशद, रचिकारक, फफनाशक, परने वारा, काय तथा मधुर रम मे युक्त, सुगन्धित और इन्द्रियोधक है ॥ ९ ७४ ॥

फामार्शोप्राणीको मूत्राघातानिलापहा ।

स्तन्यर कक्षयहिता सुग बृंहणदीपनी ॥ १७५ ॥

सुग - काम, अर्श, संग्रहणी, मृनाघात तथा वातविकार | को नष्ट करनी है तथा दुग्ध और रक्त की वीणता में हितकर, । पारीर- पुष्टिकर पूर्व पाचकामिरीपक होती है ॥ १८५ ॥

रोचकत्कुचितो दशूलप्रमर्दनी ।

प्रसन्ना कफवातार्शोविबन्धानाहनाशनी ॥ १७६ ॥

प्रमणा ( सुरामण्ट ) - चमन, अरुचि, हृदय तथा कुक्षि में चुभोने की सी पीदा, मूल, फफ, घात, भर्श, मलविन्ध राधा साफरा को नष्ट करती है ॥ १७६ ॥

फासाश महणीश्वासप्रतिश्यायविनाशनी ।

श्वेता मूत्रकफस्तन्यर कमांमकरी सुरा ॥ १७७ ॥

श्वेत वर्ग की सुरा - कास, अर्दा, सद्दग्रहणी, श्वास, प्रति-स्याय इन्हें नष्ट करती है तथा मूत्र, कफ, दुग्ध, रक्त और मांस को बढाती है ॥ १७७ ॥

पित्तलाऽल्पकफा रूक्षा यवैर्वातप्रकोपणी ॥ १७८ ॥

विष्टम्भिनी सुरा गुर्वी श्लेष्मला तु मधूलिका । रूक्षा नातिकफा वृष्या पाचनी चाक्षिकी स्मृता १७६ यव की सुरा - पित्तजनक, अल्प कफजनक, रूक्ष तथा वात-प्रकोपक होती है । मधूलिका - निष्टम्भ करने वाली, भारी तथा फफ घढाती है । बहे की सुरा - रूत, अधिक कफ नहीं करने पाटी, हृप्य तथा पाचक होती है ॥ १७८ ~ १७ ९ ॥ विमर्शः -- स्वल्पगोधूमो मध्यदेशे पोशी केति ख्याता, मर्कटाहस्त-तृण या तत्फलकिण्व मधूलकमिति उत्ण । गधूकफलमम्भूतसुरा मधूलिकेति सुश्रुतार्थसन्दी ग्नम् । त्रिदोषो भेद्यवृष्यच कोहलो वदनप्रियः ।

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१८४ सुश्रुतसहिता ।

ग्राह्यष्णो जगल ' पक्ता रूक्षस्तृट्कफशोफहत् ॥ १० ॥ ।

हृद्यः प्रवाहिका ss टोपदुर्नामानिलशोपहृत् ।

बकसो हृतसारत्वाद्विष्टम्भी वातकोपनः ॥

दीपनः सृष्टवित्रो विशदोऽल्पमदो गुरुः ॥ १८१ ॥

जी के सक्से वनाया हुआ कोहल- त्रिदोपजनक, भेदी, अवृष्य तथा रुचिकारक होता है । जगल ( मद्य के नीचे का भाग ) - प्राही, उष्ण, पाचक, रूक्ष, नृपानाशक, कफनाशक, शोधनाशक, हृदय के लिये हितकारी तथा प्रवाहिका, आटोप अर्श, वातरोग तथा शोप को नष्ट करता है । बक्स ( सुरा कल्क ) - निःसार हो जाने से विष्टम्भकारक, वातप्रकोपक, अग्नि-दीपक, विष्ठा और मूत्र का उत्पादक व सारक, विशद, अल्प मद करने वाला तथा भारी होता है ॥ १८०-१८१ ॥

कपायो मधुरः सीधुडः पाचनदीपनः ।

शार्क मधुरो रुच्यो दीपनो वस्तिशोधनः ॥ १८२ ॥

वातन्नो मधुरः पाके हृद्य इन्द्रियवोधनः ।

तद्वत् परसः सीधुर्वलवर्णकरः सरः ॥ १८३ ॥

शोफनो दीपनो हृद्यो रुच्यः श्लेष्मार्शसां हितः ।

कर्शनः शीतरसिकः श्वयथूदरनाशनः ॥ १८४ ॥

वर्णकृज्जरणः स्वर्यो चिवन्धन्नोऽर्शसां हितः । आक्षिकः पाण्डुरोगघ्नो व्रायः सङ्ग्राहको लवुः १८५

कपायमधुरः सीधु ' पित्तन्नोऽसृकप्रसादनः ।

जाम्बवो वद्धनिष्यन्दस्तुवरो वातकोपनः ॥ १८६ ॥

गुड से बनाई हुई सीधु ( मद्य ) - कपाय, मधुर, पाचन तथा दीपन होती है । शर्करा से बनी सीधु - मधुर, रुचिकारक, दीपक, मूत्रशोधक, वातनाशक, पात्र में मधुर, हृदय के लिये हितकर तथा इन्द्रियों की प्रबोधक है । उसी प्रकार गन्ने के पके रस की चनी सीधु - वलवर्द्धक, वर्णवर्द्धक, मृदुविरेचक, शोथनाशक, अग्निदीपक, हृद्य, रुचिकारक, कफ तथा अर्श रोग को नष्ट करने वाली होती है । गन्ने के कच्चे रस की बनी सीधु-शरीर को दुर्बल करने वाली, शोथ और उदर रोग नाशक, वर्णवर्द्धक, पाचक, स्वरहितकारी, विचन्धनाशक और अर्श में हितकर होती है । बड़े की बनी सीधु - पाण्डुरोग नाशक, व्रणों के लिये हितकारी, संग्राहक, पचने में हलकी, कपाय और तथा चिपनाशक, तिक्क, कपाय, शोफनाशक, तीक्ष्ण, मधुर तथा वायु को उत्पन्न नहीं करने वाला होता है । मैरेयमद्य-ater, कपाय, मदकारक होता है तथा अर्श, कफ, गुल्म, कृमि, मेदोवृद्धि और वात को नष्ट करता है एवं मधुर तथा गुरु होता है । गन्ने के रस से बनाया हुआ आसव बलवर्दक, पित्तनाशक, वर्णवर्द्धक और हय होता है ॥ १८७–१९ ० ॥

विमर्श: - मैरेयः - आसवस्य सुरायाथ द्वयोरेकत्र भोजने ।

सन्धान तद्विजानीयान्मैरेयमुभयाश्रयम् ॥

सीधुर्मधूकपुष्पोत्थो विदाह्यग्निबलप्रदः ।

रूक्षः कषायकद्वातपित्तप्रकोपणः ॥

निदिशेद्रसतश्चान्यान् कन्दमूलफलासवान् ॥ १६१ ॥

महुवे के पुष्पों से बनाया हुआ आसव - विदाहि और शरीर की पाचकानि तथा वल को बढाता है । रस में रूह तथा कपाय एवं कफनाशक तथा वातपित्तप्रकोपक होता है । इनके अतिरिक्त अन्य कन्द, मूल और फलों से बनाये हुये आसव के गुण उन कन्दादियों के रसों के गुणानुसार समझना चाहिये ॥ १ ९ १ ॥

नवं मद्यमभिष्यन्दि गुरु वातादिकोपनम् ।

अनिष्टगन्ध विरसमहृद्यन्न विदाहि च ॥ १६२ ॥

नवीन मद्य - अभिष्यन्द ( क्लेद ) कारक, गुरु, वातादिकों का प्रकोपक, खराव गन्धवाला, विकृत रसयुक्त, मन या हृदय को अप्रिय लगनेवाला तथा विदाह जनक होता है ॥१ ९ २ ॥

सुगन्धि दीपनं हृद्यं रोचिष्णु कृमिनाशनम् ।

स्फुटस्रोतस्कर जीर्ण लघु वातकफापहम् ॥ १६३ ॥

पुरान मद्य - सुगन्धयुक्त, अग्निदीपक, हथ, रुचिप्रिय, । कृमिनाशक, स्रोतसों को खोलनेवाला, लघु तथा वात और कफ को नष्ट करता है ॥ १ ९ ३ ॥

अरिष्टो द्रव्यसंयोगसंस्कारादधिको गुणैःः ।

बहुदोषहरश्चैत्र दोपाणां शमनश्च सः ॥ १६४ ॥

दीपनः कफवातन्नः सरः पित्ताविरोधनः ॥ शूलाध्मानोदरप्लीहन्त्रराजीर्णार्शसां हितः ॥ १६५ ॥

अरिष्ट- अनेक द्रव्यों के संयोग से तथा संस्कार होने से मधुर रसयुक्त, पित्तनाशक तथा रक्तप्रसादक होती है । जामुन | आसवापेक्षया गुणों में अधिक होता है तथा अनेक रोगों को की सीधु - मूत्र की मात्रा कम करने वाली, कपाय और बात-प्रकोपक होती है ॥ १८२-१८६ ॥ तीक्ष्णः सुरासवो हृद्यो मूत्रलः कफवातनुत् ॥ १८७ ॥

मुखप्रियः स्थिरमदो विज्ञेयोऽनिलनाशनः ।

लघुर्मध्वासवछेदी मेहकुष्ठविपापहः ॥ १८८ ॥

तिक्तः कपायः शोफन्नस्तीक्ष्णः स्वादुरवातकृत् ।

तीक्ष्णः कपायो मदकृद् दुर्नामकफगुल्महृत् ॥ १८६६ ॥

कृमिमेदोऽनिलहरो मैरेयो मधुरो गुरुः ।

4 बल्यः पित्तहरो वएर्यो हृद्यचक्षुरसासवः ॥ १६० ॥

नष्ट करनेवाला, अनेक दोषों का प्रशामक, अग्निदीपक, कफ-वातनाशक, मृदुविरेचक, पित्त को कुछ कम करनेवाला, तथा शूल, आध्मान, उदररोग, प्लीहावृद्धि, ज्वर, अजीर्ण और अर्श इन रोगों में हितकारी होता है । १ ९४-१९ ५ ॥

पिप्पल्यादिकृतो गुल्मकफरोगहरः स्मृतः ।

चिकित्सितेषु वयन्तेऽरिष्टा रोगहराः पृथक् ॥ १६६ ॥

अरिष्टासवसीधूनां गुणान् कर्माणि चादिशेत् ।

बुद्धया यथास्व संस्कारमवेच्य कुशलो भिषक् ॥ १ ९ ७ ॥

पिप्पल्यादि गण की ओषधियों से बनाया हुआ अरिष्ट * सुरासव --- तीक्ष्ण, हृद्य, मूत्रजनक, कफ और वात का । गुल्म तथा कफरोगों को नष्ट करता है । भिन्न भिन्न रोगों को नाशक, सुख को अच्छा लगने वाला, स्थिर मदकारी और वात | नष्ट करनेवाले अरिष्टों का वर्णन चिकित्सा स्थान में करेंगे । नाशक होता है । मध्वासव - हलका, दोपों का छेदक, मेह, कुष्ठ कुशल वैद्य नाना प्रकार के अरिष्ट, आसव और सीधु के भिम.

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श्रध्यायः ४५ ] सूत्रस्थानम् । १८५ free गुण तथा कर्मों का वर्णन अपनी बुद्धि के अनुसार उनके द्रव्य तथा संस्कारों को देखकर करे ॥ १ ९६-१९ ७ ॥

सान्द्रं विदाहि दुर्गन्धं विरसं कृमिलं गुरु ।

अहृद्यं तरुणं तीक्ष्णमुष्णं दुर्भाजनस्थितम् ॥ १६८ ॥

अल्पौषधं पर्युपितमत्यच्छं पिच्छिलञ्च यत् ।

तद्वयं सर्वदा मद्यं किञ्चिच्छेषं च तद्भवेत् ॥ १६६ ॥

सदोष मद्य - जो मद्य गाढा हो गया हो, विदाहकारक हो तथा जिसमें से खराव गन्ध आती हो, जिसका रस विकृत हो गया हो, जिसमें कीडे पड़ गये हों एवं पचने में भारी, अहृद्य, तीच्ण, उष्ण, खराव पात्र में रखा हुआ, शास्त्रोक्त । औषध प्रमाण से कम प्रमाण में बना हुआ, वासी, जलके समान अधिक स्वच्छ तथा चिपचिपा और पात्र के शेषभाग ( तले ) में बचा हुआ ऐसे मद्य को सर्वथा वर्जित कर देना चाहिये ॥ १ ९ ८ - १ ९९ ॥

तत्र यत् स्तोकसम्भारं तरुणं पिच्छिलं गुरु ।

कफप्रकोपि तन्मद्यं दुर्जरश्न विशेषतः ॥ २०० ॥

पित्तप्रकोप बहलं तीक्ष्णमुष्णं विदाहि च ।

फेनिलं पूति कृमिलं विरसं च यत् ॥ २०१ ॥

तथा पर्युषितवापि विद्यादनिलकोपनम् ।

सर्वदोषैरुपेतं तु सर्वदोषप्रकोपणम् ॥। २०२ ॥

इनमें से जिसमें औषध सम्भार ( मात्रा ) कम हो ऐसा मद्य तथा ताजा, चिपचिपा और भारी कफप्रकोपक होता है तथा वह विशेष कर दुर्जर होता है 1 । जो मद्य घन, तीक्ष्ण, उष्ण तथा विदाहजनक होता है वह पित्तप्रकोपक होता है तथा जो मद्य अहृद्य, स्वच्छ, पिच्छिल, कृमियुक्त, विरस तथा होता है वह वातप्रकोपक है, एवं सर्वदोषों से युक्त मद्य त्रिदोषप्रकोपक होता है ॥ २००-२०२ ॥ चिरस्थितं जातरसं दीपनं कफवातजित् । " " रुच्यं प्रसन्नं सुरभि मद्यं सेव्यं मदावहम् ॥ २०३ ॥

जो मद्य चिरकाल का ( पुराना ) हो, जिसमें रस उत्पन्न हो गया हो वह पाचकानि का दीपक, कफ और बात का नाशक, रुचि बढाने वाला, मन को प्रसन्न करने वाला, सुगन्ध

युक्त तथा मद ( नशे ) को उत्पन्न करने वाला होता है ।

उसीका सेवन करना चाहिये ॥ २०३ ॥

तस्यानेकप्रकारस्य मद्यस्य रसवीर्यतः ।

सौक्ष्म्यादौष्ण्याश्च तैक्ष्ण्याच्च विकासित्वाश्च वह्निना ॥

समेत्य हृदयं प्राप्य धमनीरूर्ध्वमागतम् ।

विक्षोभ्येन्द्रियचेतांसि वीर्यं मदयतेऽचिरात् ॥ २० ॥

रस और वीर्य के कारण अनेक प्रकार का मद्य अपने सूक्ष्म, उष्ण, तीक्ष्ण और विकासि गुणों से जठराग्नि के साथ मिलकर हृदय में जाके वहां से धमनियों द्वारा ऊपर ( मस्तिष्क की तरफ ) आकर इन्द्रियां और चित्त को प्रक्षुभित करके शीघ्र ही मनुष्य को मदयुक्त कर देता है ॥ २०४ - २०५ ॥ विमर्शः — मदकी तीन अवस्थाएं होती हैं — व्यवस्थश्च मदो

ज्ञेयः पूर्वी मध्योऽथ पश्चिम । पूर्वे वीर्यरतिप्रीतिहर्षमष्यातिवर्द्धनम् ॥ ।

२४० । प्रलापो मध्यमे मोहो युक्तायुक्तक्रियास्तथा । विसज्ञ पश्चिमे शेते नष्टकर्मक्रियागुण * ॥ ( १ ) हर्षणावस्था ( Stage of exortement ), ( २ ) प्रलापावस्था ( Stage of dehrium ) ( ३ ) विसंज्ञा-वस्था ( Stage of marcosis )

चिरेण श्लैष्मिके पुंसि पानतो जायते मद्ः ।

अचिराद्वातिके दृष्टः पैत्तिके शीघ्रमेव तु ॥ " २०६ ॥।

कफ प्रकृति वाले मनुष्य को मद्यसेवन का मद ( नशा ) देर से आता है । वात प्रकृति वाले मनुष्य को कुछ ही देर से तथा पित्तप्रकृतिवाले मनुष्य को शीघ्र ही मद्यपान का नशा आ जाता है ॥ २०६ ॥

सात्त्विके शौचदाक्षिण्यहर्षमण्डनलालसः ।

गीताध्ययनसौभाग्यसुरतोत्साहकृन्मदः ॥ २०७ ॥

राजसे दुःखशीलत्वमात्मत्यागं ससाहसम् ।

कलहं सानुबन्धं तु करोति पुरुषे मदः ॥ २०८ ॥

अशौच निद्रामात्सर्यागम्यागमनलोलताः ।

असत्यभाषणचापि कुर्याद्धि तामसे मदः ॥ २०६ ॥

सात्त्विक प्रकृति के मनुष्य में उत्पन्न मद ( नशा ) पवि-व्रता, चतुरता, हर्ष तथा शरीर को अलङ्कृत करने की इच्छा पैदा करता है एवं गायन, अध्ययन, कीर्तिक कार्य तथा सम्भोग करने में उत्साह उत्पन्न करता है । राजसप्रकृति के मनुष्य में उत्पन्न मद दुःख उठाने का कार्य करना, आत्मघात करने की इच्छा, साहस के कार्य तथा निरन्तर झगढा करने की प्रवृत्ति उत्पन्न करता है । तामस प्रकृति के मनुष्य में उत्पन्न | मद अपवित्र कार्य, निद्रा, मात्सर्य, अगम्या स्त्रियों के साथ सम्भोग करने की लोलुपता तथा असत्य भाषण करने में प्रवृत्त करता है ॥ २०७ - २० ९ ॥ विमर्शः -- प्रायः मद्यप्रकृतिदर्शक होता है अतः चोरी तथा हत्या करने वालों से यथार्थ बात जानेने के लिये उन्हें मद्यपान कराते हैं । चरक ने कहा है कि - सत्त्वसम्बोधक हर्षे मोहप्रकृति-दर्शकम् । हुताशः सर्वसत्त्वाना मद्य तूभयकारकम् ॥ प्रधानावर-मध्याना रूपाणा व्यक्तिदर्शकः । यथाग्निरेव सत्त्वाना मद्य प्रकृति-दर्शकम् ॥ ( चरकः ) । अन्यच्च — मदेन करणानान्तु भावान्यत्वे कृते सति । निगूढमपि भाव स्व प्रकाशीकुरुतेऽवश ॥ ( सुश्रुतः ) । साह-सकर्माणि - मनुष्यमारण स्तेय परदाराभिमर्षणम् । पारुष्यमनृत-चैव साहस पञ्चधा स्मृतम् ॥

रक्तपित्तकरं शुक्तं छेदि भुक्तविपाचनम् ।

वैस्वर्य्यं जरणं श्लेष्मपाण्डुक्रिमिहरं लघु ॥ २१० ॥

तीक्ष्णोष्णं मूत्रलं हृद्यं कफघ्नं कटुपाकि च ।

तद्वत्तदासुतं सर्वं रोचनश्च विशेषतः ॥ २११ ॥

शुक - रक्तपित्तकारक, दोपों या धातुओं का छेदक, भोजन का पाचक, स्वर को विकृत करने वाला, भामादिदोषों का पाचक एवं कफ, पाण्डु और कृमियों का नाशक तथा हलका, तीक्ष्ण, उष्ण, मूत्रजनक, हृद्य, कफनाशक और विपाक. कटु होता है । शुक्त सन्धान द्वारा कन्दादिक से साधित शुक भी उपर्युक्त शुक्त के सदृश ही गुणों वाले होते हैं किन्तु विशेष कर रुचिवर्द्धक होते हैं ॥ २१०-२११ ॥

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१८६ सुश्रुतसहिता । विमर्श: - शुक्लक्षणम् - यन्मस्त्वादि शुत्री भाण्डे सगुडो-द्रकाञ्चिकम् । धान्यराशौ त्रिरात्रस्थ शुक चुक्र तदुच्यते ॥

गौडानि रसशुक्तानि मधुशुक्तानि यानि च ।

यथापूर्वं गुरुतराण्यभिष्यन्दकराणि च ॥ २१२ ॥

गुड़ से बनाये हुये शुक्त, ऊख के रस से बनाये हुये शुक् तथा शहद से बनाये हुये शुक्त यथापूर्व गुरुतर तथा अभि यन्दकारक ' होते हैं ॥ २१२ ॥

विमर्शः -- गुडोद्भवानि शुक्तानि गौटानि - ' गुडाम्बुना सनैलेन

सन्धानं काञ्चिक तु यत् । कन्दशाकफलैर्युक्तं गुरुशुक्त तदुच्यते ॥

इति इक्षुरसादिकृतानि रसशुक्तानि गुटशुक्तवत्सन्धेयानि । मधु शुक्तानि - ' जम्बीरस्य फलरस पिप्पलीमूल्सयुतम् । मधुभाण्डे विनि-क्षिप्य धान्यराशौ निधापयेत् । त्र्यहेण तज्ज्ञातरस मधुशुक्तमुदाह-तम् ॥ ” इति ' ‘ मद्यशुक्तानि ’ इति पाठान्तरम् । तत्र तचक्षणम् - सर्व मद्य पञ्चरस कालान्तरवशाद्यदा । त्यक्त्वाऽन्यरसमम्टव याति शुक्त तदुच्यते ॥ ' इति । यथापूर्व सर्वापेक्षया गौड शुक्त गुरु अभिष्यन्द-कर चेनि भाव ।

तुषाम्बु दीपनं हृद्यं हृत्पाण्डुकृमिरोगनुत् ।

ग्रहण्यर्शोविकारघ्नं भेदि सौवीरकं तथा ॥ २१३ ॥

तुयोदक -- पाचकान्तिदीपक है एवं हृद्य तथा हृदय रोग, पाण्डुरोग और कृमिरोग को नष्ट करता है । सौवीरक-सङ्ग्रहणी तथा अर्श को नष्ट करता है और दस्तावर होता है ॥ २१३ ॥

विमर्श: - तुषाम्बुलक्षणम् -तुपाम्बुसथित ज्ञेयमामैर्विदलितैर्यवैः ।

सौवीरलक्षणम् - यवैस्तु निस्तुएँ पक्वैः सौवीर सन्धित भवेत् ॥

( शार्ङ्गधरः ) । गोधूमैरपि सौवीरमाचार्या केचिदूचिरे ।

घान्याम्लं धान्ययोनित्वान्जीवनं दाहनाशनम् ।

स्पर्शात्पानात्तु पवनकफतृष्णाहरं लघु ॥ २१४ ॥

तैक्ष्ण्याच्च निर्हरेदाशु कफं गण्डूषधारणात् ।

मुखवैरस्यदौर्गन्ध्यमलशोपक्लमापहम् ॥ २१५ ॥

दीपन जरणं भेदि हितमास्थापनेषु च ।

समुद्रमाश्रितानाञ्च जनानां सात्म्यमुच्यते ॥ २१६ ॥

धान्याम्ल ( काजी ) धान्य ( शालि, कोदो ) से वनी होने के कारण जीवन के लिये हितकर, स्पर्श करने से दाह-नाशक तथा पान करने से वायु, कफ और तृष्णा का नाशक और लघु है । तीच्ण होने से शीघ्र ही कफ को निकालती है । काञ्जी के गण्डूप धारण करने से सुख की विरसता, दुर्गन्ध, मल, शुष्कता और क्लम को नष्ट करती है । एवं यह काक्षी पाचकाग्निदीपक, पाचक, दस्तावर, आस्थापन वस्तियों में हितकर तथा समुद्र के तट पर रहने वाले मनुष्यों के लिये साम्य ( अनुकूल ) होती है ॥ २१४-२१६ ॥ विमर्श -धान्याम्ललक्षणम् - त्रान्यान्लं शालिचूर्णैश्च कोद्र-अदिकृतत्र यत् । इति मद्यवर्गः । अथ मूत्रवर्ग: -अथ मूत्राणि गोमहिपाजाविगजहयखरोष्ट्राणां तीक्ष्णान्युष्णानि कटूनि तिक्तानि लवणानुरसानि लघूनि शोधनानि कफवातकृमिमेदोविपगुल्मार्शउदरकुष्ठशो-फारोचकपाण्डुरोगहराणि हृद्यानि दीपनानि च सामा-न्यतः ॥ २१७ ॥

अव मूत्रों का विवेचन करते हैं- गाय, भैंस, बकरी, भेड़, हाथी, घोडा, गदहा और ऊंट इनके मूत्र साधारणतया तीच्ण, उष्ण, कटु, तिक तथा अनुरस में लवण होते हैं और हलके, शरीर ( मलों ) को शुद्धि करने वाले एवं कफ, वायु, कृमि, मेद, विप, गुल्म, अर्श, उदर, कुष्ठ, शोथ, अरुचि और पाण्डु इन रोगों को नष्ट करते हैं तथा हृद्य और पाचकानि के दीपक होते हैं । ये इन सब के सामान्य गुण होते हैं ॥ २ ९ ७ ॥

भवतश्चात्र-तत्सर्व कटु तीक्ष्णोष्णं लवणानुरसं लघु ।

शोधनं कफत्रातघ्नं कृमिमेदोविषापहम् ॥ २१८ ॥

अर्शोजठरमुल्मघ्नं शोफारोचकनाशनम् ।

पाण्डुरोगहरं भेदि हृद्यं दीपनपाचनम् ॥ २१६ ॥

सर्व प्रकार के मूत्र कटु, तीक्ष्ण, उष्ण तथा अनुरस में लवण, हलके, शरीर या मलों के शोधक, कफवातनाशक, कृमि, मेद और वियों के नाशक, अर्श, उदर तथा गुल्म के नाशक, शोथ, अरुचि और पाण्डु रोग के नाशक, दस्तावर, हृद्य, अग्नि के दीपक तथा आसदोषों के पाचक होते हैं ॥ २१८-२१९ ॥

गोमूत्रं कटु तीक्ष्णोष्णं सक्षारत्वान्न वातलम् ।

लध्वग्निदीपनं मेध्यं पित्तलं कफवातजित् ॥ २२० ॥

शूलगुल्मोदरानाहविरेकास्थापनादिषु ।

मूत्रप्रयोगसाध्येषु गव्यं मूत्रं प्रयोजयेत् ॥ २२१ ॥

गाय का मूत्र - कटु, तीक्ष्ग और उष्ण होता है तथा क्षार-युक्त होने से वातवर्द्धक नहीं होता है एवं यह लघु, अग्निदी-पक, मेध्य, पित्तजनक तथा कफवात का नाशक होता है । शूल, गुल्म, उदररोग, आनाह, विरेचनकर्म, आस्थापनवस्ति | एवं मूत्र के प्रयोग से ठीक होने वाले रोगों में गोमूत्र का प्रयोग करना चाहिये || २२०-२२१ ॥

दुर्नामोदरशूलेषु कुष्ठमेहा विशुद्धिषु ।

आनाहशोफगुल्मेषु पाण्डुरोगे च माहिषम् ॥२२२ ॥

भैंस का मूत्र - अर्ग, उदररोग, शूल, कुष्ठ, प्रमेह, वमन-विरेचनादि के ठीक न होने से उत्पन्न अशुद्धावस्था तथा आनाह, शोफ, गुल्म और पाण्डुरोग में प्रयुक्त होता | है ॥ २२२ ॥

कासश्वासापहं शोफकासलापाण्डुरोगनुत् ।

कटुतिकान्वितं छागमीषन्मारुतकोपनम् ॥ २२३ ॥

बकरी का मूत्र - कास, श्वास, शोफ, कामला, पाण्डु इन रोगों को नष्ट करता है तथा कटु और तिकरसयुक्त होता है और कुछ वायु को कुपित करता है ॥ २२३ ॥

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श्रध्यायः ४६ ] सूत्रस्थानम् । १८७

कासप्लीहोदरश्वासशोषवर्चोग्रहे हितम् ।

सक्षारं तिक्तकटुकमुष्णं वातघ्नमाविकम् ॥ २२४ ॥।

भेदी का मूत्र - कास, प्लीहावृद्धि, उदररोग, श्वास, शोष, विबन्ध में हितकारी है तथा यह चारयुक्त, तिक्त, कटु, उष्ण और वातनाशक होता है २२४ ॥

दीपनं कटु तीक्ष्णोष्णं वातचेतोविकारनुत् ।

आवं कफहरं मूत्रं कृमिदषु शस्यते ॥ २२५ ॥

घोडी का मूत्र - अग्निदीपक, कटु, तीक्ष्ण, उष्ण होता है । तथा वायु, चित्त ( मन ) के विकार और कफ को नष्ट करता है एवं कृमिरोग तथा ददु में प्रशस्त है ॥ २२५ ॥

सतिक्तं लवणं भेदि वातघ्नं पित्तकोपनम् ।

तीक्ष्णं क्षारे किलासे च नागं मूत्रं प्रयोजयेत् ॥ २२६ ॥

हस्तिनी का मूत्र — तिक्त तथा लवण रस युक्त होता है, एवं दस्तावर, वातनाशक पित्तप्रकोपक तथा तीक्ष्ण होता है । इसे क्षार कर्म और किलास ( श्वेत ) कुष्ठ में प्रयुक्त करना चाहिये ॥ २२६ ॥

गरचेतोविकारनं तीक्ष्णं ग्रहणिरोगनुत् ।

दीपनं गार्दभं मूत्र कृमिवातकफापहम् ॥ २२७ ॥

गदही का मूत्र गरविष तथा उन्मादादि चित्तविकारों को नष्ट करता है, तीक्ष्ण होता है, सङ्ग्रहणी के विकारों को करता है तथा अन का दीपक एवं कृमि, वात और कफ को नष्ट करता है ॥ २२७ ॥

शोफकुष्ठोदरोन्मादमारुतक्रिमिनाशनम् ।

अशनं कारभं मूत्रं मानुषं च विपापहम् ॥ २२८ ॥

ऊंटनी का मूत्र - शोथ, कुष्ठ, उदर रोग, उन्माद, मारुत

( वा विकार, कृमिरोग और अर्श को नष्ट करता है ।

मनुष्य का मूत्र - विषनाशक होता है ॥ २२८ ॥

विमर्शः - प्रायः सर्वत्र स्त्री जाति के प्राणियों का मूत्र व्यवहार में आता है किन्तु कुछ आचार्यों ने अष्टसूत्रों में चार पुरुष प्राणी तथा चार स्त्री प्राणियों के मूत्र के लेने का निर्देश करते हैं । खरेभोष्ट्रतुरगाणा पुसा मूत्र प्रशस्यते । गोऽजाविमद्दीपी-णाच स्त्रीणा मूत्र हित मतम् ॥

द्रवद्रव्याणि सर्वाणि समासात् कीर्त्तितानि तु ।

कालदेशविभागज्ञो नृपतेर्दातुमर्हति ॥ २२ ९ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने द्रवद्रव्यविज्ञानीयो नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥

- www इस तरह इस अध्याय में संक्षेप से सब द्ववदस्यों का वर्णन किया है । शीतोष्णादि काल तथा आनूप - जाङ्गलादि देश के विभाग को जानने वाला वैद्य इन्हें राजा के लिये भी प्रयुक्त कर सकता है ॥ २२ ९ ॥ इत्यायुर्वेदतत्त्वत्सन्दी पिकाभाषायां सूत्रस्थाने द्रवद्रव्यविज्ञा-यो नाम पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४५ ॥।

षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ।

अथातोऽन्नपानविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

भव इसके अनन्तर ' अन्नपानविधि ' नामक अध्याय की वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ धन्वन्तरिमभिवाद्य सुश्रुत उवाच - प्रागभिहितः प्राणिनां पुनर्मूलमाहारो बलवर्णौजसां च । स षट्सु रसेष्वायत्तः । रसाः पुनर्द्रव्याश्रयिणः । द्रव्यरसगुणवी -र्यविपाकनिमित्ते च क्षयवृद्धी दोषाणां साम्यश्च । ब्रह्मा-देरपि च लोकस्याहारः स्थित्युत्पत्तिविनाशहेतुः । आहारादेवाभिवृद्धिर्बलमारोग्यं वर्णेन्द्रियप्रसादश्च । तथा ह्याहारवैषम्यादस्वास्थ्यम् । तस्याशितपीतलीढखा-| दितस्य नानाद्रव्यात्मकस्यानेकविधविकल्पस्यानेकविध -प्रभावस्य पृथक् पृथग्द्रव्यरसगुणवीर्यविपाकप्रभावकर्मा-णीच्छामि ज्ञातुं, न ह्यनवबुद्धस्वभावा भिषजः स्वस्थानु-वृत्तिं रोगनिग्रहणश्च कत्तु समर्थाः । आहारायत्ताश्च सर्वप्राणिनो यस्मात्तस्मादन्नपानविधिमुपदिशतु मे भगवानित्युक्तः प्रोवाच भगवान् धन्वन्तरिः - अथ खलु वत्स सुश्रुत! यथाप्रश्नमुच्यमानमुपधारयस्त्र ॥ ३ ॥

प्रथम धन्वन्तरि भगवान् का अभिवादन करके सुश्रुत ने प्रन किया कि - ' आपने पूर्व के अध्याय में प्राणियों के जीवन का मूल ( प्रधान ) कारण भन्न है तथा उनके शरीर के बल और भोज का भी मूल कारण अन्न है तथा वह भन्न छ रसों के आधीन है तथा रस द्रव्यों के भाश्रित हैं । वातादि दोषों की क्षय, वृद्धि और समानता द्रव्यों के रस, गुण, वीर्य तथा विपाक के कारण होती रहती है । ब्रह्म आदि लोक की स्थिति, उत्पत्ति और विनाश ( प्रलय ) का कारण भी हार ही माना गया है एवं आहार ही से प्राणियों शरीर की वृद्धि, वल, आरोग्य, वर्णं तथा इन्द्रियों की प्रसन्नता होती रहती है तथा भाहार की विषमता से भस्वारथ्य ( रोग ) उत्पन्न होता है । अब मैं मोदकादि अशित, उदकादि पीत, मध्वादि लेख तथा लड्डू आदि खादित ( भक्ष्य ) ऐसे चार प्रकार के तथा अनेक द्रव्यों से बने हुये, अनेक खाद्य के भेदों में विभक्त तथा विविध प्रभाव वाले उस आहार के द्रव्यों के रस, गुण, वीर्य, विपाक और कर्म को पृथक् पृथक् जानना चाहता हूं क्योंकि इनके विना जाने वैद्य स्वस्थ पुरुष के स्वास्थ्य का संरक्षण तथा रोगी के रोग निग्रह ( विनाश ) करने में समर्थ नहीं हो सकते हैं । चूंकि आहार के आधीन ही संसार में सर्व प्राणी हैं इस कारण से अन्नपान - विधि का ही उपदेश करो ' ऐसा सुश्रुत से निवेदन करने पर भगवान् धन्वन्तरि कहने लगे कि हे वत्स सुश्रुत! जैसा तूने प्रश्न किया है उसी के अनुसार मैं जो कहता हूं उसे तुम धारण ( श्रवण ) करो ॥ ३ ॥

अथ शालिवर्गः । तत्र, लोहितशालिकलमकर्दमक पाण्डुकसुगन्धक-

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१८५ सहिता । शकुनाहृतपुष्पाण्डकपुण्डरीकमहाशालिशीतभीरुकरो-श्रपुष्पकदीर्घशुककाञ्चनकमहिषमहाशूकहायनकदूषकम-हाडूकप्रभृतयः शालयः ॥ ४ ॥

उनमें लालशालि, कल्म, कर्दमक, पाण्डुक, सुगन्धक ( वासुमती ), शकुनाहृत, पुप्पाण्डक, पुण्डरीक, महाशालि, शीतमील्क, रोध्रपुप्पक, दीर्घशूक, काञ्चनक, महिप, महा-शूक, हायनक, दूषक, महादूपक इत्यादि ये शालि के भेद होते हैं ॥ ४ ॥

-विमर्शः — ये हेमन्त में पकने वाले धान्य हैं । शकुनाहृत द्वीपान्तरात् समानीतो गहडेन महात्मना । शकुनान स शालि त्या गडापरनानक ।

मधुरा वीर्यतः शीता लघुपाका बलावहाः ।

पित्तन्नाल्पानिलकफाः स्निग्धा बद्धाल्पवर्चसः ॥ ५ ॥

शालि चावल - रस में मधुर, वीर्य में शीत, पचने में लघु बलदायक, पित्तनाशक, अल्पवात कफ के प्रकोपक, स्निग्ध तथा मल को अल्प और वद करने वाले होते हैं ॥ ५ ॥

तेषां लोहितक ' श्रेष्टो दोपन्नः शुक्रमूत्रलः ।

चक्षुष्यो वर्णबलकृत् स्वर्यो हृद्यस्तृपापहः ॥ ६ ॥

यो ज्वरहरचैव सर्वदोषविषापहः ।

तस्मादल्पान्तरगुणाः क्रमशः शालयेोऽवराः ॥ ७ ॥

उक्त शालि चावलों में लाल शालि- अच्छा होता है तथा वह दोषनाशक, शुक्र तथा मूत्र को बढ़ाने वाला, नेत्रों के लिये हितकारी, बल और वर्ण को करने वाला, स्वर के लिये हितकर, हृद्य, तृपानाशक, व्रग में लाभकारी, ज्वरनाशक, सर्व प्रकार के दोष तथा विपों को नष्ट करने वाला होता है । इस रक्तशालि के बाद मैं कहे हुये जो अन्य शालि हैं वे उत्तरो-तर गुणों में निकृष्ट हैं ॥ ६-७ ॥ पष्टिककाङ्गुकमुकुन्दकपीतकप्रमोदककाकलकासन-पुष्पकमहापष्टिक चूर्णककुरवक केदारप्रभृतयः पष्टिकाः || ८ || पष्टिक भेद - पष्टिक, कडक, मुकुन्दक, पीतक, प्रमोदक, काकलक, ललनपुष्पक, महापष्टिक, चूर्णक, कुरवक, केदारक आदि पष्टिक के भेद होते हैं ॥ ८ ॥

रसे पाके च मधुराः शमना वातपित्तयोः ।

. शालीनाञ्च गुणैस्तुल्या वृंहणाः कफशुक्रलाः ॥ ६ ॥

ये साठी चावल - रस और विपाक में मधुर, वात तथा पित्त के शामक, गुणों में शालि चावलों के तुल्य तथा बृंहण एवं कफ और वीर्य को उत्पन्न करने वाले होते हैं ॥ ९ ॥

विमर्श - साठी चावल ग्रीष्म ऋतु में पकते हैं ।

षष्टिकः प्रवरस्तेषां कषायानुरसो लवुः ।

मृदुः स्निग्धविदोपनः स्थैर्यकृद् बलवर्द्धनः ॥ १० ॥

विपाके मधुरो ग्राही तुल्यो लोहितशालिभिः ।

शेपास्त्वल्पान्तरगुणाः पष्टिकाः क्रमशो गुणैः ॥ ११ ॥

साठो चावलों में पष्टिक - अच्छा होता है तथा अनुरस मेंक्रॅपाय, पचने में लघु, मृदु, स्निग्ध, त्रिदोषनाशक, शरीर । को स्थिर करने वाला, बलवर्द्धक, विपाक में मधुर, मला को बांधने वाला तथा अन्य गुणों में रक्त शालि के सदृश होता है । पष्टिवर्ग के अन्य चावल क्रम से यथोत्तर हीनगुण वाले होते हैं ॥ १०-११ ॥ कृष्णत्रीहिशालामुखजतुमुखनन्दीमुखलावाक्षकत्वरि-तककुक्कुटाण्डकपारावतकपाटलप्रभृतयो ब्रीहयः || १२ || व्रीहि धान्य भेद -- कृष्णन्त्रीहि, शालामुख, जतुमुख, नन्दिमुख, लावाक्षक, त्वरितक, कुक्कुटाण्डक, पारावतक, । पाटल प्रभृति व्रीहि होते हैं ॥ १२ ॥

कषायमधुराः पाके मधुरा वीर्यतोऽहिमाः ।

अल्पाभिष्यन्दिनस्तुल्याः पष्टिकैर्वद्धवर्चसः ॥ १३ ॥

कृष्णत्रीहिर्वरस्तेषां कृपायानुरसो लघुः ।

तस्मादल्पान्तरगुणाः क्रमशो श्रीहयोऽपरे ॥ १४ ॥

व्रीहिधान्य - रस में कपाय तथा मधुर, विपाक में मधुर, वीर्य में उष्ण, स्वल्प क्लेदकारक, पष्टि चावलों के समान गुण वाले तथा मल को बांधने वाले होते हैं । इन ब्रीहिधान्यों में कृष्णव्रीहि - श्रेष्ठ होता है तथा वह अनुरस में कपाय एवं पचने में हलका होता है । कृष्ण व्रीहि से शेष सब त्रीहि यथोत्तर कम गुण वाले होते हैं ॥ १३-१४ ॥

दुग्धायामवनौ जाताः शालयो लघुपाकिनः ।

कषाया वद्धविण्मूत्रा रूक्षाः श्लेष्मापकर्षणाः ॥ १५ ॥

दग्ध भूमि में उत्पन्न हुये शालि चावल - पाक में लघु होते हैं तथा रस में कपाय एवं विष्ठा और मूत्र को बांधने वाले, रूत्र तथा कफ को नष्ट करते हैं ॥ १५ ॥

स्थलजाः कफपित्तन्नाः कपायाः कटुकान्वयाः किञ्चित्सतिक्तमधुराः पवनानलवर्द्धनाः ॥ १६ ॥

कैदारा मधुरा वृष्यावल्याः पित्तनिवर्हणाः ।

ईषत्कषायाल्पमला गुरवः कफशुक्रलाः ॥ १७ ॥

नागल देश में पैदा होने वाले शालि चावल - कफ और बात के नाशक, कपाय, स्वल्प कटु, तिक और मधुर तथा वायु और पाचकानि के वर्द्धक होते हैं । कैदार ( जल बहुल भूमि में होने वाले ) शालि चावल - मथुर, वृप्य, वलवर्द्धक, पित्तनाशक, कुछ कपाय, स्वल्प मलोत्पादक, पचने में भारी तथा कफ और वीर्य को पैदा करने वाले होते हैं ॥ १६-१७ ॥

रोप्यातिरोप्या लघवः शीघ्रपाका गुणोत्तराः ।

अदाहिनो दोषहरा बल्या मूत्रविवर्द्धनाः ॥ १८ ॥

शालयश्छिन्नरूढा ये रुक्षास्ते बद्धवर्चसः ।

तिक्ताः कषायाः पित्तन्ना लघुपाकाः कफापहाः ॥ १६ ॥

रोप्य ( एक चार उखाड़ कर अन्य भूमि में रोपे या लगाये हुये ) तथा अतिरोप्य ( कई बार एक स्थान से उखाड़ पचने कर अन्य वाले स्थान में लगाये हुये ) शालि चावल - लघु, जल्दी , गुणों में श्रेष्ठ, दाह नहीं करने वाले, दोपहारक, वलवर्द्धक तथा मूत्र को अधिक पैदा करने वाले होते हैं । पौधे को एक बार काट देने पर फिर से बढा होता है उसके