श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 251–260

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

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श्रध्यायः ४६ ] सूत्रस्थानम् । १६६

लवलं दीपनं हृद्यं मातुलुङ्गमुदाहृतम् ।

त्वक् तिक्ता दुर्जरा तस्य वातक्रिमिकफापहा ॥१४६ ॥

स्वादु शीतं गुरु स्निग्ध मांसं मारुतपित्तजित् ।

मेध्यं शूलानिलच्छर्दिकफारोचकनाशनम् ॥ १५० ॥

दीपनं लघु सङ्ग्राहि गुल्मार्शोघ्नं तु केसरम् ।

शूलाजीर्णविबन्धेषु मन्देऽनौ कफमारुते ॥

अरुचौ च विशेषेण रसस्तस्योपदिश्यते ॥ १५१ ॥

विजौरा निम्बू - लघु, अम्ल, अग्निदीपक तथा हृद्य होता है तथा उसकी त्वचा ( छिलका ) - तिक्त, पचने में भारी एवं वात, कृमि और कफ को नष्ट करती है । उसका गृदा - मधुर, शीतल, पचने में भारी, स्निग्ध, वात तथा पित्त का शामक, बुद्धिवर्द्धक तथा शूल, वात, चमन, कफ और अरुचि का नाशक है । उसका केसर - पाचकाग्निदीपक, लघु, संग्राही तथा गुल्म और अर्श का नाशक है । उसका रस - शूल, अपचन, विबन्ध, अग्निमान्य, कफ तथा वात के रोग एवं अरोचक में विशेष रूप से प्रयुक्त होता है ॥। १४ ९ -१११ ॥ -पित्तानिलकरं बालं पित्तलं वद्ध केसरम् | हृद्यं वर्णकरं रुच्यं रक्तमांसबलप्रदम् ॥ १५२ ॥

कषायानुरसं स्वादु वातघ्नं बृंहणं गुरु ।

पित्ताविरोधि सम्पकमा शुक्रविवर्द्धनम् ॥ १५३ ॥

आम्रगुण - चाल अर्थात् कच्चा आम्रफल जिसमें गुठली न पढी हो- पित्त तथा वायु को पदा करता है । बद्धकेसर अर्थात् जिसमें गुठली हो गई हो - पित्त उत्पन्न करता है । पका हुआ आम्रफल - हृद्य, वर्णकारक, रुचिवर्द्धक तथा रक्त, मांस और ' वल को बढाने वाला, अनुरस में कपाय, रस में मधुर, वात-नाशक, वलवर्द्धक, पचने में भारी, पित्त का विरोध ( विशेष वर्द्धन ) न करने वाला तथा शुक्रवर्द्धक होता है ॥ १५२ - १५३ ॥

बृंहणं मधुरं बल्यं गुरु विष्टभ्य जीर्यते ।

आम्रातकफलं वृष्यं सस्नेहं श्लेष्मवर्द्धनम् ॥ १५४ ॥

त्रिदोपविष्टम्भकरं लकुचं शुक्रनाशनम् ।

अम्लं तृष्णापहं रुच्यं पित्तकृत् करमर्दकम् ॥ १५५ ॥

वातपित्तहरं वृष्यं प्रियालं गुरु शीतलम् ।

हृद्यं स्वादु कपायाम्लं भव्यमास्यविशोधनम् ॥१५६ ॥

पित्तश्लेष्म हरं ग्राहि गुरु विष्टम्भि शीतलम् ।

पारावतं समधुरं रुच्यमत्यग्निवातनुत् ॥ १५७ ॥

दोपहरं नीपं प्राचीनामलकं तथा ।

वातापहं तिन्तिडीकमामं पित्तबला सकृत् ॥

ग्राह्युष्णं दीपनं रुच्यं सम्पक्कं कफवातनुत् ।

तस्मादल्पान्तरगुणं कोशाम्रफलमुच्यते ॥

अम्लीकायाः फलं पक्कं तद्वेदितु केवलम् अम्लं समधुरं हृद्यं विशदं भक्तरोचनम् ॥ वातघ्नं दुर्जर प्रोक्तं नारङ्गस्य फलं गुरु । तृष्णाशूलकफोत्क्लेशच्छदिश्वासनिवारणम्

वातश्लेष्मविबन्धघ्न्नं जम्बीरं गुरु पित्तकृत् ।

१५८ ॥

१५ ९ ॥

| १६० ॥ ॥ १६१ ॥

ऐरावतं दन्तशठमम्लं शोणितपित्तकृत् ॥ १६२ ॥

आम्रातक फल ( अम्बाडा ) - बृंहण, मधुर, बलवर्द्धक, पचने में भारी, भांतों में विष्टम्भ ( वायु, तोद शूल ) हो कर पचने वाला तथा वृष्य, स्निग्ध और कफत्रर्द्धक होता है । लकुच फल ( बडहल ) - त्रिदोपजनक, विष्टम्भकारक और वीर्यनाशक होता है । करोंदा - अम्ल, तृपानाशक, रुचिवर्द्धक और पित्त-कारक होता है । पियाल ( चिरोंजीफल ) - चात तथा पित्त का नाशक, वृष्य, पचने में भारी तथा शीतल होता है । भव्य ( कमरख ) - हृदय के लिये हितकर, मधुर, कपाय, अम्ल, । मुख का शोधक, पित्त तथा कफ का नाशक, दस्त वांधने वाला, पचने में भारी, विष्टम्भकारक और शीतल होता है । पारावत- मधुर, रुचिकारक तथा अत्यग्नि ( भस्मक रोग ) तथा वात का नाशक होता है । नीप ( कदम्ब ) फल - कृत्रिमविष का नाशक होता है तथा पानी आंवला भी इसी के समान गुण कारक होता है । तिन्तिढी का कच्चा फल - वातनाशक, पित्त तथा कफ को करने वाला होता है तथा पका हुआ - ग्राही, उष्ण-वीर्य, दीपन तथा रुचिवर्द्धक होता है कफ और वात को नष्ट करता है । कोशाम्रफल - इससे कुछ कम गुणों वाला होता है । अम्लीका ( इमली ) का पका हुआ फल - गुणों में तिन्तिडी • फल के समान ही होता है परन्तु भेदक ( दस्तावर ) होता है । नारङ्गफल ( सन्तरा ) -अम्ल, मधुर, हृद्य, विशद, भोजन में रुचि बढाने वाला, वातनाशक, दुर्जर और भारी होता है । जम्बीर ( नीचू ) - तृषा, शूल, कफ, जी मिचलाना, वमन, श्वास, वात, कफ और मलविबन्ध को नष्ट करने वाला, पचने में भारी तथा पित्तजनक होता है । ऐरावन तथा दन्तशठ ( गोदढा नीबू ) - खट्टा तथा रक्तपित्तजनक होता है ॥१५४-१६२ ॥ विमर्श - इन दाडिमादि वर्ग के फलों में साइट्रिक, टार्ट-रिक, मेलिक, आक्जेलिक अम्लों के होने से खट्टापन तथा टेनिन, गैलिन आदि भम्लों के होने से कसैलापन होता है । इन फलों में विटामिन सी ० खास होता है । जो कि स्कर्वी रोग का प्रतिबन्धक है । ये फल भोजन को पचाते हैं । इनका सेवन अत्यावश्यक है । + क्षीरवृक्षफलजाम्बवराजादनतोदनशीतफलतिन्दुक-बकुलधन्वनाश्मन्तकाश्वकर्णफल्गुपरूपकगाङ्गे रुकीपुष्कर-वर्तविल्वविम्बीप्रभृतीनि ॥ १६३ ॥

कषायरसाधिक्य वाले फल -जैसे न्यग्रोध, उदुम्बर, पीपल, पाखर और वेतस इन क्षीरवृक्षों के फल तथा जामुन, राजादन ( खिरणी ), तोदन, शीतफल, तिन्दुक, बकुल ( मौलसिरी ), धामन, अश्मन्तक, अश्वकर्ण, फल्गु ( अञ्जीर ), फालसा, गंगोठ ( नागवला ), पुष्करवर्ति, विल्व, विम्बी प्रभृति हैं ॥ १६३ ॥

फलान्येतानि शीतानि कफपित्तहराणि च ।

सङ्प्राहकाणि रूक्षाणि कषायमधुराणि च ॥ १६४ ॥

उक्त न्यग्रोधादि के फल- शीतल, कफपित्तनाशक, ग्राही, रूक्ष, कपाय और मधुर होते हैं ॥ १६४ ॥

क्षीरवृक्षफलं तेषां गुरु विष्टम्भि शीतलम् ।

कषायं मधुरं साम्लं नातिमारुतकोपनम् ॥ १६५ ॥

अत्यर्थं वातलं ग्राहि जाम्बवं कफपित्तजित् ।

पृष्ठ 252

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२०० सुश्रुतसंहिता ।

स्निग्धं स्वादु कपायं च राजादनफलं गुरु ॥ १६६ ॥

कपायं मधुरं रूक्षं तोदनं कफवातजित । अम्लोष्णं लघु सङ्ग्राहि स्निग्धं पित्ताग्निवर्द्धनम् १६७

आमं कपायं सङ्ग्राहि तिन्दुकं वातकोपनम् ।

विपाके गुरु सम्पक्कं मधुरं कफपित्तजित् ॥ १६८ ॥

मधुरं च कपायं च स्निग्धं सङग्राहि बाकुलम् ।

स्थिरीकरं च दन्तानां विशदं फलमुच्यते ॥ १६६ ॥

सकपार्थं हिमं स्वादु धान्वनं कफवातजित् ।

तद्वद् गाङ्गेरुकं विद्यादश्मन्तकफलानि च ॥ १७० ॥

वृक्षों के फल- गुरु, विष्टम्भकारक, शीतल, कपाय, मधुर तथा अम्ल होते हैं तथा वायु का अधिक प्रकोप नहीं करते हैं । जामुनफल- अत्यन्त चातकारक, दस्त को बांधने वाला तथा कफ और पित्त को नष्ट करता है । राजादन ( खिरनी ) का फल - स्निग्ध, मधुर, कपाय और भारी होता है । तोदनफल - कपाय, मधुर, रूक्ष, कफवातशामक, अम्ल, उष्ण, लघु, ग्राही, स्निग्ध, पित्तजनक तथा अग्निवर्द्धक है । कच्चा तिन्दुकफल - कसैला, ग्राही तथा वातप्रकोपक होता है और पका हुआ - विपाक में गुरु, मधुर, क्फ तथा पित्त का नाशक होता है । वकुल का फल - मधुर, कपाय, स्निग्ध, संग्राही, दांतों को दृढ करने वाला तथा विशद होता है । धामन फल-कपाय, शीत, मधुर तथा कफ और पित्त का नाशक होता है । धामन फल के गुणानुरूप ही गागेरक तथा अश्मन्तक फलों के गुण जानो ॥ १६५-१७० ॥ विमर्श - भारत में प्राचीन काल से जामुन की गुठली का प्रयोग मधुमेह तथा बहुमूत्र में करते है । वर्तमान विज्ञान ने जामुन के बीज में जम्बूलाइन ( Tombulne ) नामक एक ग्लूकोसाइड प्राप्त किया है जो कि मधुमेह में शर्करा तथा मूत्र राशि को कम करता है । अब ढाक्टर भी जामुन की गुठली कासव मधुमेह में तथा विल्व इक्सट्रेक्ट का अतिसार में प्रयोग करने लग गये हैं ।

विष्टम्भ मधुरं स्निग्धं फल्गुजं तर्पणं गुरु ।

अत्यम्लमीपन्मधुरं कपायानुरसं लघु ॥ १७१ ॥

वातघ्नं पित्तजननमामं विद्यात् परूषकम् ।

तदेव पक्कं मधुरं वातपित्तनिवर्हणम् ॥ १७२ ॥

विपाके मधुरं शीतं रक्तपित्तप्रसादनम् ।

पौष्करं स्वादु विष्टम्भ बल्यं कफकरं गुरु ॥ १७३ ॥

फल्गु ( अंजीर ) फल - विष्टम्भकारक, मधुर, स्निग्ध, तृप्ति कर तथा पचने में भारी होता है । कच्चा परूपक ( फालसा ) -अत्यन्त खड्डा, कुड़ मीठा, अनुरस में कृपाय, पचने में हलका, वातनाशक तथा पित्तजनक होता है । वही फालसा पक जाने पर - मधुर, वातपित्तनाशक, विपाक में मधुर, शीतल तथा रक्तपित्तप्रसादक होता है । पौष्कर ( तालाब होने वाले सिंघाडे या कमल के फल ) - रस में मधुर, विष्टम्भजनक, वलवर्द्धक, कफकारक और गुरु होते हैं ॥ १७१-१७३ ॥

कफानिलहरं तीक्ष्णं स्निग्धं सङ्ग्राहि दीपनम् ।

कटुतिक्तकपायोष्णं बालं बिल्वमुदाहृतम् ॥ १७४ ॥

विद्यात् तदेव सम्पर्क मधुरानुरसं गुरु ।

विदाहि विष्टम्भकरं टोपकृत पूतिमारुतम ॥ १७५ ॥

कच्चा बिल्व फल - कफ और वात का नाशक, तीक्ष्ण, स्निग्ध, संग्राही, अग्निदीपक, कटु, तिक्त और कपाय तथा उष्ण होता है किन्तु चही पक जाने पर अनुरम में मधुर, पचने में भारी, विदाहजनक, विष्टम्भकारक, दोपजनक तथा दुर्गन्धित वायु पैदा करता है ॥ १७४- १७१ ॥

बिम्बीफलं सावकर्ण स्तन्यकृत् कफपित्तजित् ।

तृड्दाहज्वरपित्तासृकूकासश्वासऩयापहम् ॥ १७६ ॥

चिम्बीफल ( कुन्दरु ) तथा अश्वकर्ण दुग्धवर्द्धक, कफ और पित्त को नष्ट करने वाले तथा नृपा, दाह, ज्वर, रक्तपित्त, कास, । श्वास और क्षय को नष्ट करते है ॥ १७६ ॥

तालनालिकेरपनसमौचप्रभृतीनि ॥ १७७ ॥

स्वादुपाकरसान्याहुर्वातपित्तहराणि च ।

बलप्रदानि स्निग्धानि बृंहणानि हिमानि च ॥१७८ ॥

ताल, नारियल, कटहल, मोचा ( केला ) आदि फल - रस और विपाक में मधुर, वातपित्तनाशक, बलदायक, स्निग्ध, बृहण तथा शीतल होते हैं ॥ १७७-१७८ ॥

फलं स्वादुरसं तेपां तालजं गुरु पित्तजित् ।

तद्वीजं स्वादुपाकं च मूत्रलं वातपित्तजित् ॥ १७६ ॥

नालिकेरं गुरु स्निग्ध पित्तन्नं स्वादु शीतलम् ।

बलमांसप्रदं हृद्यं बृंहणं वस्तिशोधनम् ॥ १८० ॥

पनसं सकपायं तु स्निग्ध स्वादुरसं गुरु ।

मौचं स्वादुरसं प्रोक्तं कपायं नातिशीलम् ।

रक्तपित्तहरं वृष्यं रुच्यं श्लेष्मकरं गुरु ॥ १८ ९ ॥

इनमें ताल का फल - मधुर रस वाला, पचने में भारी और पित्तनाशक होता है । उसका बीज - विपाक में मधुर, मूत्र-| जनक तथा वात - पित्तनाशक है । नारियल का फल - पचने में भारी, स्निग्ध, पित्तनाशक, मधुर, शीतल, वल और मांस का वर्द्धक, हृद्य, वृहण तथा बस्ति ( मूत्राशय ) का शोधक होता है । पनस ( कटहल ) फल - कसैला, स्निग्ध, स्वादुरसयुक्त तथा, पचने में भारी होता है । केवल रस में मधुर और कपाय होता है तथा अधिक शीतल नहीं होता है एवं रक्तपित्त नाशक, वृष्य, रुचिजनक, कफकारक तथा भारी होता है ॥ विमर्श: - तालवर्ग के फलों में स्टार्च, शर्करा अधिक मात्रा में तथा अल्पमात्रा में फेट, प्रोटीन एवं जीवद्रव्य भी होते हैं । नारिकेल फल क्षय रोग में अमेरिका तथा भारत में प्रयुक्त

होता है । बृंहण गुरु शीतलम् । दाहचतक्षयहर रक्तपित्तप्रसादनम् ॥

( वाग्भटः ) । केले में शर्करा, फेट, प्रोटीन, चूना, क्षार, लौह, । फास्फोरिक एसिड तथा विटासिन बी ० और सी ० होते हैं ।

। अतिसार, प्रवाहिका में केला सङ्ग्राही पथ्य है ।

द्राक्षाकाश्मर्यखर्जूरमधूकपुष्पप्रभृतीनि ॥ १८२ ॥

रक्तपित्तहराण्याहुर्गुरूणि मधुराणि च ।

तेषां द्राक्षा सरा स्वर्या मधुरा स्निग्धशीतला ॥ १८३ ॥

रक्तपित्तज्वरश्वासतृष्णादहितयापहा । हृद्यं मूत्रविबन्धघ्नं पित्तासु ग्वातनाशनम्

पृष्ठ 253

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अध्यायः ४६ ] सूत्रस्थानम् । २०१

केश्यं रसायनं मेध्यं काश्मर्य फलमुच्यते ॥ १८४ ॥

क्षतक्षयापहं हृद्यं शीतलं तर्पणं गुरु ।

रसे पाके च मधुरं खार्जूरं रक्तपित्तनुत् ॥ १८५ ॥

वृंहणीयमहृद्यं च मधूककुसुमं गुरु ।

वातपित्तोपशमनं फलं तस्योपदिश्यते ॥ १८६ ॥

द्राक्षा, गम्भारी, खर्जूर, महुवे के पुष्प तथा फल प्रभृति -रक्तपित्तनाशक, गुरु और मधुर होते हैं । इनमें से द्राक्षा-दस्तावर, स्वर को बढ़ाने वाली, मधुर, स्निग्ध, शीतल है तथा रक्तपित्त, ज्वर, श्वास, तृष्णा, दाह तथा क्षय को नष्ट करती है । गम्भारी फल- हृद्य, मूत्रावरोधनाशक, रक्तपित्त और वातरोग का नाशक, केशों के लिये हितकारी, रसायन तथा बुद्धिवर्द्धक होता है । खजूर ( छुहारा तथा पिण्डखजूर ) - क्षत और क्षय का नाशक, हृद्य, शीतल, तृप्तिकारक, गुरु तथा रस और विपाक में मधुर होता है । महुवे के पुष्प - जो कि सूखने पर मुनक्के से ( फलोपम ) हो जाते हैं - वलवर्द्धक होते हैं एव हृदय के लिये अहितकारी और पचने में भारी होते हैं तथा महुवे के फल - वात और पित्त के शासक होते हैं ॥ १८२-१८६ ॥ वातामाक्षोडाभिषुकनिचुलपिचुनिको चकोरुमाणप्र-भृतीनि ॥ १८७ ॥

बादाम, अखरोट, अभिषुक ( काजू ), निचुल ( चिलगोजा ), पिचु, निकोचक ( पिस्ता ), उरुमाण ( नासपाती ) प्रमृति शुष्क मेवे वर्ग के फल हैं ॥ १८७ ॥

पित्तश्लेष्महराण्याहुः स्निग्धोष्णानि गुरूणि च ।

वृंहणान्यनिलन्नानि बल्यानि मधुराणि च ॥ १८८ ॥

ये मेवे - पित्त और कफ के नाशक, स्निग्ध, उष्ण, गुरु, बृंहण, वातनाशक, वलवर्द्धक तथा मधुर होते हैं ॥ १८८ ॥

विमर्शः - इन मेवों में १५-२० प्रतिशत प्रोटीन, ५०-६० फेट, ९ - १२ प्रतिशत कार्बोहाईड्रेट, ३-५ प्रतिशत सेल्यूलोज, १ प्रतिशत खनिजक्षार तथा ४-५ प्रतिशत जलीयांश होता है । इनमें कार्बोहाइड्रेट कम होने से मधुमेही के लिये हितकारी तथा फेट और प्रोटीन अधिक होने से मांसवद् बृंहण हैं ।

कषायं कफपित्तघ्नं किञ्चित्तिक्तं रुचिप्रदम् ।

हृद्यं सुगन्धि विशदं लवलीफलमुच्यते ॥ १८६ ॥

वसिरं शीतपाक्यं च सारुष्करनिबन्धनम् ।

विष्टम्भि दुर्जरं रूक्षं शीतलं वातकोपनम् ।

विपाके मधुरं चापि रक्तपित्तप्रसादनम् ॥ १ ९ ० ॥

हरफा रेवडी के फल - कषाय, कफपित्तनाशक, कुछ तिक्त, रुचिदायक, हृद्य, सुगन्धयुक्त और विशद होते है । वसिर ( सूर्यभक्ता ) के फल, शीतपाक्य ( चला के फल ) और भरुष्कर ( भल्लातक फल ) या उसका निवन्धन ( डंठल ) -विष्टम्भजनक, पचने में कठिन, रूक्ष, शीतल, वातप्रकोपक, विपाक में मधुर तथा रक्तपित्तशामक होते हैं ॥ १८ ९ - १ ९ ० ॥ विमर्शः — लवलीफलपरिचयः – प्रनस्निग्धा हरिताशुपुप्रनाट सदृक्छदा । सुगन्निमूला लवली पाण्डुकोमलनल्कला ॥ २६०

शीतं कषायं मधुरं टक मारुतकृद्- गुरु ।

स्निग्घोष्णं तिक्तमधुरं वातश्लेष्मन्नमैजुदम् ॥ १६१ ॥

शमीफलं गुरु स्वादु रूक्षोष्णं केशनाशनम् ।

गुरु श्लेष्मातकफलं कफकृन्मधुरं हिमम् ॥ १६२ ॥

करीराक्षिकपीलूनि तृणशून्यफलानि च ।

स्वादुतिक्तकटूष्णानि कफवातहराणि च ॥ १६३ ॥

तिक्तं पित्तकरं तेषां सरं कटुविपाकि च ।

तोष्णं कटुकं पीलु सस्नेहं कफवातजित् ॥ १६४ ॥

टक ( नीलकपित्थ ) - शीतल, कषाय, मधुर, वातवर्द्धक और भारी होता है । इड्डुदी फल- स्निग्ध, उष्ण, कटु, मधुर और वातकफ नाशक होता है । शमी का फल - भारी, मधुर, रूत, उष्ण तथा केशनाशक होता है । लिसोड़ा फल - भारी, कफ-कारक, मधुर और शीतल है । करीर, आतिक, पीलु और तृणशून्य ( मल्लिका ) के फल- मधुर, तित, कटु, उष्ण तथा कफ और वात के नाशक होते हैं । उनमें से पीलुफल - रस में कटु, पित्तजनक, दस्तावर, विपाक में कडु, तीच्ण, उष्ण, रस में कटु, स्नेहांशयुक्त तथा कफ और वात के नाशक होते हैं ॥ आरुष्करं तौवरकं कषायं कटुपाकि च ॥ १६५ ॥

उष्णं क्रिमिन्वरानाहमेहोदावर्त्तनाशनम् ।

कुष्ठगुल्मोदरार्शोघ्नं कटुपाकि तथैव च ॥ १६६ ॥

करञ्जकिंशुकारिष्टफलं जन्तुप्रमेहनुत् ।

अङ्कोलस्य फलं विस्रं गुरुश्लेष्महरं हिमम् ॥ १६७ ॥

रूक्षोष्णं कटुकं पाके लघु वातकफापहम् ।

तिक्तमीषद्विषहितं विडङ्गं कृमिनाशनम् ॥ १६८

तौवरक फल -- आरुष्कर ( व्रणकारक ), कषाय, विपाक में कटु, उष्णवीर्य तथा कृमि, ज्वर, आनाह, प्रमेह तथा उदावर्त का नाशक होता है । करभ, ढाक ( पलास ) और नीम के फल - कृमि, प्रमेह, कुष्ठ, गुल्म, उदर तथा भर्श के नाशक एवं विपाक में कटु होते हैं । वायविडङ्ग - रूप, उष्ण, विपाक में कटु, पचने में हलकी, वात तथा कफ की शामक, कुछ तित, विषज रोगों में हितकारी तथा कृमिनाशक होती है ॥१ ९१-१९ ८ ॥ विमर्श: - तुवरक का विशेष प्रयोग कुष्ठ में, पलाशवीजों का गोलकृमि ( Round worm ) तथा विडङ्ग का प्रयोग चपटे कृमि ( Tape worm ) में आयुर्वेद तथा डाक्टरी दोनों मैं करते हैं ।

व्रण्यमुष्णं सरं मेध्यं दोषघ्नं शोफकुष्ठनुत् ।

कषायं दीपनं चाम्लं चक्षुष्यं चाभयाफलम् ॥ १ ९ ६ ॥

भेदनं लघु रूक्षोष्णं वैस्वर्यक्रिमिनाशनम् ।

चक्षुष्यं स्वादुपाक्याक्षं कषायं कफपित्तजित् ॥ २०० ॥

अभया ( हरढ़ ) फल- व्रण में हितकारी, उष्ण, दस्तावर, मेधाहितकर, दोषनाशक, ' शोफ और कुष्ठ का नाशक, कपाय, अग्निदीपक, अम्ल तथा नेत्रों के लिये हितकारी है । आ ( बहेड़ा का ) फल- दस्तावर, लघु, रूत्त, उष्ण, स्वर को विकृत करने वाला, कृमिनाशक, नेत्रहितकारी, विपाक में मधुर, कषाय एवं कफ तथा पित्त को नष्ट करता है । १ ९९ -२०० ॥

पृष्ठ 254

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२०२ सुश्रुतसंहिता ।

कफपित्तहरं रूक्षं वक्त्रक्लेदमलापहम् ।

कषायमीपन्मधुरं किञ्चित् पूगफलं सरम् ॥ २०१ ॥

जातीकोशोऽथ कर्पूरं जातीकटुकयोः फलम् ।

ककोलकं लवङ्गं च तिक्तं कटु कफापहम् ॥ २०२ ॥

लघु तृष्णापहं वक्त्रक्लेददौर्गन्ध्यनाशनम् ।

सतिक्तः सुरभिः शीतः कर्पूरो लघु - लेखनः ॥ २०३ ॥

तृष्णायां मुखशोपे च वैरस्ये चापि पूजितः ।

लता कस्तूरिका तद्वच्छता बस्तिविशोधनी ॥ २०४ ॥

पूगफल ( सुपारी ) -- कफ और पित्त का नाशक, रूक्ष, मुख का क्लेद तथा मल का नाशक, रस में कपाय तथा कुछ मधुर और दस्तावर होता है । जातीकोश ( जावित्री ), कर्पूर, जाय-फल, लताकस्तूरी फल, कक्कोलक ( क्यूवेव आफिसिनेलिस् ) तथा लवङ्ग - ये तिक्त ( कडवे ), कटु ( चरपरे ), कफनाशक, पचने में लघु, तृपानाशक, मुख की क्लिन्नता तथा दुर्गन्ध को नष्ट करनेवाले हैं । इनमें कर्पूर - कडवा, सुगन्धि, शीतल, लघु तथा लेखन होता है तथा तृपा, मुख की खुश्की एवं अरुचि में . लाभकारी है । इसी प्रकार लताकस्तूरी - कर्पूर के समान गुण • कारी तथा शीतल एवं वस्तिशोधक होती है । २०१–२०४ ॥

प्रियालमज्जा मधुरो वृष्यः पित्तानिलापहः ।

बैभीतको मदकरः कफमारुतनाशनः ॥ २०५ ॥

क्वायमधुरो मज्जा कोलानां पित्तनाशनः ।

तृष्णाच्छनिलघ्नश्च तद्वदामलकस्य च ॥ २०६ ॥

वीजपूरकशम्याकमज्जा कोशाम्रसम्भवः ।

स्वादुपाकोऽग्निबलकृत् स्निग्घः पित्तानिलापहः ॥२०७ ॥

यस्य यस्य फलस्येह वीर्य भवति यादृशम् ।

तस्य तस्यैव वीर्येण मज्जानमपि निर्दिशेत् ॥ २०८ ॥

प्रियालमजा ( चिरौञ्जी ) - मधुर, घृप्य तथा वातपित्त नाशक होती है । वहेढे फल की मज्जा - मदकारक तथा वात कफनाशक होती है । कोल ( बदरी फल ) की मज्जा -कपाय, मधुर, पित्तनाशक, तृपाशामक, वमननाशक तथा वातहर होती है । आंवले के फल को मजा भी कोलमजा के समान गुण चाली होती है । वीजपूर तथा शम्याक ( अमलतासफली ) की मजा तथा कोशात्र मज्जा - विपाक में मधुर, पाचकानि तथा वलकी वर्द्धक, स्निग्ध एवं पित्त तथा वात की नाशक होती है । जिस जिस फल का जैसा जैसा वीर्य होता है उसी के अनुरूप उसकी मज्जा को भी जानो ॥ २०५ -२०८ ॥ फलेषु परिपक्कं यद् गुणवत्तदुदाहृतम् ।

बिल्वादन्यत्र विज्ञेयमामं तद्वि गुणोत्तरम् ।

ग्राह्युष्णं दीपनं तद्धि कषायकटुतिक्तकम् ॥ २०६ ॥

व्याधितं कृमिजुष्टं च पाकातीतमकालजम् ।

वर्जनीयं फलं सर्वमपर्यागतमेव च ॥ २१०

इति फलवर्गः । बिल्वफल को छोड़ कर अन्य सब फलों में पके हुये फल प्रशस्त गुणयुक्त होते हैं किन्तु बिल्वफल कच्चा ही गुण युक्त होता है | कच्चा बिल्वफल - कब्ज ( विबन्ध ) करने वाला, उप्ण, दीपन, कपाय, कटु और तिक रस युक्त होता है । जो फल रोगयुक्त, कृमिव्याप्त, अधिक पका ( सदा गला ) हुआ, बिना मौसम के लगा हुआ और बिना पका हुआ हो ऐसे सर्व प्रकार के फलों को त्याग देना चाहिये ॥। २० ९ -११० ॥ विमर्श: - वर्जितफलानि - हिमानिलोष्णदुर्वात याललालादि • दूषितम् । जन्तुजुष्ट जले मग्नमभूमिजमनार्त्तत्रम् ॥ ( वाग्भटः ) ।

अथ शाकत्रर्गः ।

शाकान्यत ऊर्ध्वं वक्ष्यामः । तत्र पुष्पफलालावुका-लिन्दकप्रभृतीनि ॥ २११ ॥

अव इसके अनन्तर विविध प्रकार को शाकों का वर्णन करते हैं । उनमें पुष्पफल ( कोहदा ), भलावु ( लौकी या तुम्बी ), कालिन्दक ( तरबूज ) प्रभृति का शाक ॥ २११ ॥

पित्तन्नान्यनिलं कुर्युस्तथा मन्दकफानि च ।

सृष्टमूत्रपुरीपाणि स्वादुपाकरसानि च ॥ २१२ ॥

उक्त शाक - पित्तनाशक, वातकारक, किञ्चित्कफकारक, मूत्र और मल को पैदा करने वाली तथा रस और विपाक में मधुर होती है ॥ २१२ ॥

पित्तघ्नं तेषु कूष्माण्डं बालं मध्यं कफावहम् ।

शुक्लं लघुष्णं सचारं दीपनं वस्तिशोधनम् ॥ २ ९ ३ ॥

सर्वदोपहरं हृद्यं पथ्यं चेतोविकारिणाम् ।

दृष्टिशुक्रक्षयकरं कालिन्दं कफवातकृत् ॥ २१४ ॥

अलावुर्भिन्नविका तु रूक्षा गुर्व्यतिशीतला ।

तिक्ताला रहृद्या तु वामिनी वातपित्तजित् ॥ २१५ ॥

इनमें कच्चा कूष्माण्ड - पित्तनाशक, मध्य ( अधपका ) वृष्माण्ड - कफकारक तथा शुक्ल या पका हुआ कुष्माण्ड - पचने में हलका, उष्ण, क्षारयुक्त, अग्निदीपक तथा वस्ति का शोधक ( मूत्रल ) होता है एवं सर्व दोषों का नाशक, हृदय के लिये हितकारी तथा चित्त के विकार ( मानस रोग जैसे उन्माद, अपस्मार, संन्यास, मूर्च्छा ) वालों के लिये परम पथ्य है । कालिन्द ( तरबूज ) - दृष्टि तथा शुक्र का नाशक एवं वात और कफ का जनक है । अलावु दस्तावर, रूक्ष, पचने में भारी तथा अधिक शीतल होती है । कडवी तुम्बी - हृदय के लिये अहितकर, वमनकारक तथा वात और पित्त को नष्ट करती है ॥ २१३–२१५ ॥ त्रपुसैर्वारुकर्का रुकशीर्णवृन्तप्रभृतीनि ॥ २१६ ॥

पुस ( खीरा ), एर्वारुक ( ककड़ी ), कर्कारुक ( ककड़ी भेद ), शीर्णवृन्त प्रभृति भी फलशाक हैं ॥ २१६ ॥

स्वादुतिक्तरसान्याहुः कफवातकराणि च ।

सृष्टमूत्रपुरीपाणि रक्तपित्तहराणि च ॥ २१७ ॥

वालं सुनीलं त्रपुरं तेषां पित्तहरं स्मृतम् ।

तत्पाण्डुकफकृज्जीर्णमम्लं वातकफापहम् ॥ २१८ ॥

एर्वारुकं सकर्कारु सम्पक्कं कफवातकृत् ।

सतारं मधुरं रुच्यं दीपनं नातिपित्तलम् ॥ २१६ ॥

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श्रध्यायः ४६ ] सूत्रस्थानम् । २०३

सचारं मधुरं चैव शीर्णवृन्तं कफापहम् ।

भेदनं दीपनं हृद्यमानाहा ष्ठीलनुल्लघु ॥ २२० ॥

ये फलशाक - स्वादु, तिक्त ( कड़वे ), कफ तथा वात के जनक मूत्र और मलको उत्पन्न या प्रवर्तित करने वाले तथा रक्तपित्त-नाशक होते हैं । इनमें कच्ची नीली ककड़ी - पित्तनाशक होती है तथा ठीक तरह से पकी हुई श्वेत ककडी कफ करने वाली तथा अधिक पकी हुई ( जीर्ण ) - खट्टी होती है तथा वात और कफ को नष्ट करती है । एर्वारुक तथा कर्कारु अधिक पकने पर-कफ और वात को करती हैं तथा क्षारयुक्त, मधुर, रुचिवर्द्धक, afoetus और अधिक पित्तवर्द्धक नहीं होती हैं । शीर्णवृन्त ( ककढी ) - क्षारयुक्त, मधुर, कफनाशक, दस्तावर, अग्नि-दीपक, हृद्य एवं अफारा तथा अष्टीला वृद्धि ( Enlargement of Prostate ) को नष्ट करती है तथा पचने में लघु होती है ॥ । पिप्पलीमरिचशृङ्गवेरार्द्रकहिङ्गुजीरककुस्तुम्बुरुज म्चीरसुमुखसुरसार्जकभूस्तृणसुगन्धक कासमर्दककालमा । लकुठेरकत्तवकखरपुष्पशिग्रुमधुशिग्रुफणिज्भकसर्पपरा-जिकाकुलाहलावगुत्थगण्डीरतिलपर्णिकावर्षा भूचित्रक -मूलकलशुनपलाण्डुकलायप्रभृतीनि ॥ २२१ ॥

पिप्पली, मरिच, सोंठ, भदरख, हींग, जीरा, कुस्तुम्बुरु ( धनियां ), जम्बीरी नीबू, सुमुख ( वन तुलसी ), सुरसा ( तुलसी ), अर्जक ( तुलसी भेद ), भूस्तृण ( रोहिप ), सुगन्धक ( गन्धतृण ), कम्पौदी, कालमाल ( काली तुलसी ), कुठेरक ( तुलसी भेद ), तवक ( नकलिक्नी ), खरपुप्प ( मरुवक ), सहजना, लालसहजना, फणिज्झक ( मरुआ ), सरसों, राई, ' कुलाहल, अवगुत्य ( लाल चिरमू ), गण्डीर ( सूरण ), तिलपर्णिका ( लाल चन्दन या चोरक ), पुनर्नवा, चीता, मूली, लहसुन, प्याज और कलाय ( मटर ) ये सब शाक बनाने को तथा इनमें बहुत से ( धनियां, जीरा, हींग आदि ) द्रव्य शाकों के संस्कार ( छ कने ) के काम में आते हैं ।

कट्टन्युष्णानि रुच्यानि वातश्लेष्महराणि च ।

कृतान्नेपूपयुज्यन्ते संस्कारार्थमनेकधा ॥ २२२ ॥

ये पिप्पल्यादि द्रव्य - रस में कटु, उष्णप्रकृतिक, रुचि-वर्द्धक, वात तथा कफ को नष्ट करने वाले होते हैं तथा इनमें से कई द्रव्यों का कृतान्न अर्थात् शाक या अन्य अन्न के खाद्य पेय पदार्थ बनाने में संस्कार करने के लिये ( मसाले के रूप में प्रयुक्त होते हैं ॥ २२२ ॥

तेषां गुर्वी स्वादुशीता पिप्पल्यार्द्रा कफावहा । शुष्का कफानिलनी सा वृष्या पित्ताविरोधिनी २२३

स्वादुपाक्यार्द्रमरिचं गुरु श्लेष्मप्रसेकि च ।

कटूष्णं लघु तच्छुष्कमवृष्यं कफवातजित् ॥ २२४ ॥

नात्युष्णं नातिशीतं च वीर्यतो मरिचं सितम् ।

गुणवन्मरिचेभ्यश्च चक्षुष्यं च विशेषतः ॥ २२५ ॥

नागरं कफवातघ्नं विपाके मधुरं कटु ।

वृष्योष्णं रोचनं हृद्यं सस्नेहं लघु दीपनम् ॥ २२६ ॥

कफानिलहरं स्वर्य विबन्धानाहशूलनुत् ।

कद्रूष्णं रोचनं हृद्यं वृष्यं चैवार्द्रकं स्मृतम् ॥ २२७ ॥

लघुष्णं पाचनं हिङ्गु दीपनं कफवातजित् ।

कटु स्निग्धं सरं तीक्ष्णं शूलाजीर्णविबन्धनुत् ॥२२८ ॥

तीक्ष्णोष्णं कटुकं पाके रुच्यं पित्ताग्निवर्द्धनम् ।

कटु श्लेष्मा निलहरं गन्धाढ्यं जीरकद्वयम् ॥ २२६ ॥

कारवी करवी तद्वद्विज्ञेया सोपकुञ्चिका ।

भक्ष्यव्यञ्जनभोन्येषु विविधेष्ववचारिता ॥ २३० ॥

आर्द्रा कुस्तुम्बरी कुर्यात् स्वादुसौगन्ध्यहृद्यताम् ।

सा शुष्का मधुरा पाके स्निग्धा तृड्दाहनाशनी ।

दोपनी कटुका किञ्चित् तिक्ता स्रोतोविशोधनी ॥२३१ ॥

इनमे गीली पिप्पली - पचने में भारी, रस में मधुर, शीत-वीर्य तथा कफवर्द्धक होती है । सूखी पीपल - कफ और वात को नष्ट करने वाली, वृज्य तथा पित्त की अविरोधिनी होती है । गीली काली मरिच - विपाक में मधुर, गुरु तथा कफ का नाव कराने वाली होती है । सूखी काली मरिच कटु, उष्ण, लघु, अवृष्य तथा कफ और वात को नष्ट करती है । श्वेत मरिच ( सहजन के बीज ) - वीर्य में न तो अधिक उष्ण होती है तथा न शीत एवं अन्य मरिचों की अपेक्षा अधिक गुण-कारी एवं नेत्रों के लिये हितकारी होती है । शुण्ठी - कफ तथा वात को नष्ट करने वाली, विपाक में मधुर, कटु, वृप्य, उष्ण, रुचिकारक, हृद्य, स्निग्ध, लघु तथा पाचकाग्निदीपक होती है । अदरख - कफ और वात का नाशक, स्वर के लिये हितकारी तथा विबन्ध, आफरा और उदरशूल को नष्ट करता है एवं कटु, उष्ण, रोचक, हृद्य तथा घृप्य होता है । हींग - हलकी, उष्ण, पाचन, दीपन, कफ तथा वात का नाशक, कटु, स्निग्ध, दस्तावर तथा तीक्ष्ण होती है एवं शूल, भजीर्ण और विबन्ध को नष्ट करती है । श्वेत तथा काला ये दोनों जीरे - तीक्ष्ण, उष्ण, विपाक में कटु, रुचिजनक, पित्तवर्द्धक, अग्निदीपक, कटु, वात - कफनाशक, और अच्छी गन्ध से युक्त होते हैं । कारवी ( सूक्ष्म जीरा ) करवी ( सूक्ष्म कृष्ण जीरक ) तथा उपकुञ्चिका ( काली जीरी ), या कलौंजी ये तीनों जीरे के समान ही गुण वाले होते है । हरा धनियां - अनेक प्रकार के भक्ष्य - ( मोदकादि ), व्यञ्जन ( शाकादि ) और भोज्य ( अन्न यवागू, दाल आदि ) पदार्थों में अनेक प्रकार से प्रयुक्त करने पर उनमें स्वादुता, सुगन्धिता और हृदयप्रियता उत्पन्न करता है । वह धनिया सूखने पर विपाक में मधुर तथा स्निग्ध, तृपा और दाह को नष्ट करने वाला, दोषनाशक, कटु, कुछ तिक्त ( कढ़वा ) तथा स्रोतसों का शोधक होता है ॥ जम्बीरः पाचनस्तीक्ष्णः कृमिवातकफापहः ॥ २३२ ॥

सुरभिर्दीपनो रुच्यो मुखवैशद्यकारकः ।

कफानिलविषश्वासकासदौर्गन्ध्यनाशनः ॥ २३३ ॥

पित्तकृत् पार्श्वशूलघ्नः सुरसः समुदाहृतः ।

तद्वत्तु सुमुखो ज्ञेयो विशेषाद् गरनाशनः ॥ २३४ ॥

कफघ्ना लघवो रूक्षास्तीक्ष्णोष्णाः पित्तवर्द्धनाः ।

कटुपाकरसाश्चैव सुरसार्जकभूस्तृणाः ॥ २३५ ॥

नश्वरी नीबू - पाचक, तीच्ण तथा कृमि वात और कफका

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२०४ सुश्रुतसहिता । नाशक, -सुगन्धयुक्त, अग्निदीपक, रुचिजनक एवं मुख को । साफ करता है । सुरसा ( तुलसी ) - कफ, वात, विष, श्वास, कास तथा दुर्गन्ध की नाशक, पित्तकारक तथा पार्श्वशूलनाशक होती है । सुमुख भी तुलसी के समान ही है किन्तु विशेषकर विप को नष्ट करती है । सुरसा, अर्जक तथा भूस्तृण ये-कफनाशक पचने में हलके, रूक्ष, तीचग, उष्ण, पित्तवर्द्धक तथा रस और विपाक में कटु होते हैं ॥ २३२-२३५ ॥

मधुरः कफवातघ्नः पाचनः कण्ठशोधनः ।

विशेषतः पित्तहरः सतिक्तः कासमर्दकः ॥ २३६ ॥

कटुः सक्षारमधुरः शिग्रुस्तिकोऽथ पिच्छिलः ।

1 मधुशिग्रुः सरस्तिक्तः शोफन्नो दीपनः कटुः ॥ २३७ ॥

विदाहि वढविण्मूत्रं रूचं तीक्ष्णोष्णमेव च ।

त्रिदोषं सार्षपं शाकं गाएडीरं वेगनाम च ॥ २३८ ॥

चित्रकस्तिलपर्णी च कफशोफहरे लघू ।

वर्षाभूः कफवातन्नी हिता शोफोदरार्शसाम् ॥ २३६ ॥

कासमर्द ( कसौंदी ) - मधुर, कफवातनाशक, पाचक, कण्ठशोधक, विशेषकर पित्तहारक तथा कटु रसयुक्त होता है । शोभाजन - कटु, क्षारयुक्त, मधुर, विक्क और पिच्छिल होता है । लाल सहन - दस्ताचर, तिक, शोफनाशक, अग्नि दीपक और कटु होता है । सरसों का शाक, ग्राण्डीर और वेगनाम ये - विदाहकारक, मल तथा मूत्र के अवरोधक, रूक्ष, तीच उष्ण और त्रिदोपजनक होते हैं । चित्रक तथा तिल - पर्णी - कफ और शोफ को नष्ट करती है । पचने में हलको होती है । पुनर्नवा - कफ और वात को नष्ट करती है तथा शोफ, उदर रोग और अर्श रोग में लाभदायक होती है ॥२३६-२३९ ॥ ।

कटुतिकरसा हृद्या रोचनी वह्निदीपनी ।

सर्वदोपहरा लघ्त्री कष्ठया मूलकपोतिका ॥ २४० ॥

महत्तद् गुरु विष्टम्भ तीक्ष्णमामं त्रिदोपकृत् ।

तदेव स्नेहसिद्धं तु पित्तनुत् कफवातजित् ॥ २४१ ॥

त्रिदोपशमनं शुष्कं विषदोषहरं लघु ।

विष्टम्भ वातलं शाकं शुष्कमन्यत्र मूलकात् ॥ २४२ ॥

मूल कपोतिका ( छोटी मूली ) -कटु, विक, हथ, रुचिकारक, ' अग्निदीपक, सर्वदोषनाशक, लघु तथा कण्ठ शुद्ध करती है । अग्नि पर नहीं पकाई हुई बड़ी मूली- विष्टम्भकारक, तीच्ण और त्रिदोषजनक होती है । उसी । मूली को तैल या वृत द्वारा अग्नि पर पकाने पर पित्त को नष्ट करने वाली तथा कफ और वात को नष्ट करती है । सुखी मूली - त्रिदोषशामक, विपदोषनाशक और लघु होती है । मूली के सिवाय अन्य सब सूले शाक- विष्टम्भकारक तथा वातजनक होते हैं । पंच पत्रं च फलं तथैव यथोत्तरं ते गुरवः प्रदिष्टाः " तेषां तु पुष्पं कफपित्तहन्तृ फलं निहन्यात् कफमारुतौ च ॥ २५३ ॥

शाकों के अथवा मूली के या किसी के भी पुप्प, पत्र और फल ये यथोत्तर एक दूसरे से पचने में भारी होते हैं । उनमें से पुप्प - कफ तथा पित्त का नाश करते हैं और फल - कफ और वात को नष्ट करते हैं ॥ २४३ ॥

विमर्श: - यहां पर पुप्प, पत्र, फल ये प्रकरण वश से मूली के ही ग्रहण करना अधिक प्रशस्त है । राजनिघण्टु में लिखित मूलक- पुष्पादि गुण ' तत्पुष्प पनि तत्फलं कफवात्-नित् ' भी यहां इस लोक में मूली के ही पुष्प - पत्रादि के गुणों का सङ्केत करते हैं । स्निग्धोगतीच्णः कटुपिच्छिलच

गुरुः सरः स्वादुरसञ्च बल्यः ।

वृष्यश्च मेधास्वरवर्णचक्षु-नास्थिसन्धानक रसोनः ॥ २४४ ॥

हृद्रोगजीर्णज्वरकुनिशूल-विबन्धगुल्मारुचिकासशोफान् ।

दुर्नामकुष्टानलसादजन्तु -समीरणश्वासकफांश्च हन्ति ॥ २४५ ॥

रसोन ( लहसुन ) - स्निग्ध, उष्ण, तीक्ष्ण, कटु, पिच्छिल, भारी, दस्तावर, रस में मथुर, बलवर्द्धक, नृप्य होता है । तथा मेघा, स्वर, वर्ण तथा नेत्र के लिये हितकारी और टूटी अस्थि का सन्धान करता है तथा हृद्रोग, जीर्णज्वर, कुक्षि-शूल, विबन्ध, गुल्म, अरचि, कास, शोफ, अर्श, कुष्ठ, अग्नि • मान्द्य, कृमि, वातरोग, श्वास और कफ के रोगों को नष्ट

करता है । २४४–६४५ ॥

विमर्श: - पित्तावृत तथा रक्तावृत बात के सिवाय अन्य सब वात रोगों में रसोन ( १ ) उत्तम माना गया है । पित्तरक्तविनिर्मुक्तनमस्तावरणावृते । शुद्धे वा विद्यते वाय न द्रव्य लशुनात् परम् ॥ ( वाग्भट. ) । पाश्चात्य चिकित्सक रसोन को टिंचर या सीरप के रूप में यक्ष्मा तथा फुप्फुस विद्रधि आदि फेफड़े प्रयुक्त करते हैं । नात्युष्णवीर्योऽनिलहा कटुश्च तीक्ष्णो गुरुनातिकफावहश्च । बलावहः पित्तकरोऽथ किञ्चित् पलाण्डुरग्निं च विवर्द्धयेत्तु ॥ स्निग्धो रुचिष्यः स्थिरधातुकर्त्ता चल्योऽथ मेघाकफपुष्टिदा । स्वादुर्गुरुः शोणितपित्तशस्तः श्वास, कास, के विकारों में २४६ ॥ स पिच्छिल तीरपलाण्डुरुक्तः ॥ २४७ ॥

पलाण्डु ( प्याज ) - ज्यादा उष्णवीर्य नहीं होता है । बात को नष्ट करता है एवं कटु, तीच्ण, गुरु, अधिक कफ नहीं करने वाला, बलवर्द्धक, कुछ पित्तकारक और अग्नि को बढ़ाता ( १ ) रसोन एकरसविरहिन पन्चरसो लशुन इत्यर्थ. । तदुक्त भावप्रकाशे- ' पञ्चभिश्च रसैर्युक्त रसेनाम्लेन वर्जिन । तस्माद्रसोन इत्युक्तो द्रव्याणा गुणवेदिभि ॥ कटुकश्चापि मूलेषु तिक्त पत्रेषु सस्थित । नाले कपाय उद्दिष्टो नालाने स्वण स्मृत ॥ दीजे तु । मधुर प्रोक्तो रसस्तद्गुणवेदिभिः । '

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याः ४६ ] सूत्रस्थानम् । II है । चीरपला डु लिग्व -, रुचिकारक, रस - रक्तादि धातुओं । को हट ( स्थिर ) बनाने वाला, बलवर्द्धक, मेघा, कफ और शरीर- पुष्टि का जनक, नथुर, गुरु, रक्तपित्त में प्रशस्त तथा पिच्छिल होता है ॥ २४६–२१७ ॥

कलायशाकं पित्तन्नं कफन्नं वातलं गुरु ।

कषायानुरसं चैव विपाके मधुरं च तत् ॥ २४८ ॥

मदर का शाक -- पित्त - कफनाशक, वातकारक, गुरु, अनु-रक्ष में कपाय तथा विपाक में मधुर है ॥ २४८ ॥

चुच्चूयूथिकातरुगीजीवन्तीविस्त्रीतिकानन्दीभल्ला-तकच्छगलान्त्रीद्वृत्तादनीफखीशाल्मली गेलुवनस्पतिप्रस-वशगकर्बुदारकोविदारप्रभृतीनि ॥ २४६ ॥

चुच्चू, जूही, तरी ( सेवती गुलाब ), जीवन्ती, कुन्दर, नन्दी, भल्लातक, छ्गलान्त्री ( विवारा ), वृक्षादनी ( बंदा ), फक्षी ( भारंगी ), सेमल, गेलु ( लिसोड़ा ), वनस्पतियों के प्रसव अर्थात् कोमल पत्र, अग, कर्बुदार ( श्वेत कचनार ), कोविदार ( रककचनार ) प्रभृति होते हैं ॥ २४ ९ ॥ पायादुतितानि रक्तपित्तहराणि च! कफन्नान्यनिलं कुर्युः सङ्ग्राहीणि लघूनि च ॥ २५० ॥

ये चुच्चू - यूथिकादि शाक - कपाय, स्वादु और तित

होती है या रक्तपित्त को नष्ट करती हैं एवं कफनाशक हैं ।

वानवर्द्धक हैं तथा दस्त को बांधने वाली और ठयु होती हैं ॥

लवुः पाके च जन्तुन्नः पिच्छिलो व्रणिनां हितः ।

कपायनघुरो ग्राही चुच्चूलेपां त्रिदोषहा ॥ २५१ ॥

चक्षुच्या सर्वोपनी जीवन्ती समुदाहृता ।

वृक्षादनी गहरा फजी स्वल्पवला मता ॥ २५२ ॥

क्षीरवृक्षोत्पलादीनां कपायाः पल्लवाः स्मृताः ।

शीताः सङ्ग्राहिणः शस्ता रक्तपित्तातिसारिणाम् ॥२५३ ॥

इनमें चुच्चूनाक - विपाक में ट्यू, कृमिनाशक, पिच्छिल, ब्रगो पुरुषों के लिये लानकारी, कपाय, मधुर, दस्त बांधने । बाली तथा त्रिनोपनाशक होती है । जीवन्ती शाक - नेत्रों । के लिये हितकारी तथा सर्वदोषनाशक है । वृक्षादनी ( बांदा ) -वावनामक तथा फची शान स्वरुप बलकारक होती है | पीपल, बढ़ आदि दुग्ध वाले वृक्ष तथा कमल आदि के पते-रस में कसैले, शीत, सङ्ग्राही तथा रक्तपित्त और अतिसार के रोगियों के लिये श्रेष्ट होते हैं ॥ २५ ९ -२५३ ॥ पुनर्नत्रात्ररुगतर्कार्युरवूक्वत्साद्नीबिल्वशाकप्रभृतीनि ॥ सांठी, वरुण, अरणी, उस्बूक ( एरण्ड ), वत्सादनी ( गिलोय ) तथा विश्वशाक इत्यादि ॥ २५४ ॥

उज्गानि स्वादुतिकानि वातप्रशमनानि च ।

तेषु पौनर्नवं शाकं विशेपाच्छोफनाशनम् ॥ २५५ ॥

चे आर्के – उष्ण, मवुर, त्रिक ( कड़वी ) तथा वातनाशक होती हैं । इननें पुनर्नवा का. शाक- विशेषतया शोथनाशन के दिये श्रेष्ठ है ॥ २५५७ ॥

त्रिम —पुनर्नवा पर वैज्ञानिक अन्वेषण होकर सिद्ध हुना कि इसका वृद्ध पर प्रभाव होने से मूत्र - प्रवृत्ति अधिक होकर शरीर में सञ्चित विप नष्ट होते हैं । जिससे शोथ भी नष्ट

हो जाता है ।

तण्डुलीयकोपोदिकाऽश्वचलाचिल्लीपालङ्कयावास्तू-कप्रभृतीनि ॥ २५६ ॥

चौलाई, पोईशाक, अश्ववला ( मेथी ), चिल्ली ( बथुला मेद ), पालक, चास्ट्रक ( बथुआ ) प्रवृति धार्के होती हैं ॥ २५६ ॥

सृष्टमूत्रपुरीषाणि सत्तारमधुराणि च ।

मन्दवातकफान्याहू रक्तपित्तहराणि च ॥ २५७ ॥

ये शार्क -मूत्र तथा मल की प्रवृत्ति करने वाली, चारयुक्त, मथुर, त्रात तथा कफ स्वल्प करने वाली तथा रक्तपित्तनाशक होती हैं ॥ २५७ ॥

मधुरो रसपाकाभ्यां रक्तपित्तमदापहः ।

तेषां शीवतमो रूक्षस्तण्डुलीयो विपापहः ॥ २५८ ॥

स्वादुपाकरसा वृष्या वातपित्तमदापहा ।

उपोदिका सरा न्निग्धा वल्या श्लेष्मकरी हिमा ॥ २५६ ॥

कटुविपाके कृमिहा मेवाग्निवलवर्द्धनः ।

सक्षारः सर्वदोषघ्नो वास्तूको रोचनः सरः ॥ २६० ॥

चिल्ली वास्तूकवञ्ज्ञेया पालङ्कया तण्डुलीयवत् ।

वातकृद् वद्धविएसूत्रा रूक्षा पित्तकफे हिता ।

शाकमाश्ववलं रूतं वद्धविण्मूत्रमारुतम् ॥ २६१ ॥

इनमें तण्डुलीयक ( चौलाई ) शाक - रस तथा विपाक मैं मधुर, रक्तपित्त तथा मद का नाशक, रूक्ष एवं विषनाशक होती है । पोई का शाक- विपाक और रस में मधुर, वृष्य, वात, पिच तथा मद का नाशक, दस्तावर, स्निग्ध, बलवर्द्धक, कफकारक और ठंडी होती है | वास्तूक शाक- विपाक में कटु ( चरपरी ), कृमिनाशक, मेघा, अग्नि तथा बल को बढ़ाने बाली, क्षारयुक्त, सर्वदोपनाशक, रुचिवर्द्धक और दस्तावर होती है । चिल्ली की शाक भी गुणों में बथुए के समान होती है तथा पाठक शाक चौलाई की तरह गुण करती है किन्तु वातजनक, विष्टा और मूत्र को बांधने वाली, रूक्ष तथा पिच और कफ के रोगों में हितकारी होती है । नाश्ववल ( मेथी की ) शाक- रूक्ष है तथा मल, मूत्र और वायु का निरोध करती है ॥ मण्डूकपर्णीसप्तलासुनिषण्णक सुवर्चला पिप्पलीगुडू-चीगोजिह्वाकाकमाचीप्रपुन्नाडावल्गुजसतीनवृहतीकण्ट-कारिकाफलपटोलार्चाकुकारवेल्लककटुकिका केवुकोरु-वूकपर्पटककिराततिक्तकर्कोटकारिष्टको शातकीबेन्नकरी-राटरूपकार्क पुष्पीप्रभृतीनि ॥ २६२ ॥

मण्डूकपर्णी, सप्तला, सुनिपष्णक ( चौपतिया ), सुवर्चला ( हुलहुल ), पीपल, गिलोय, गोजिह्वा ( वनगोभी ), मकोय, yas ( चक्रमर्द ), लवल्गुज ( बाकुची ), सतीन ( मटरभेद ), बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी, पटोल, बैंगन, करेला, कुटकी, केबुक, उरुचूक ( रकरण्ढ ), पित्तपापड़ा, चिरायता, ककोड़ा, नीम, तरोई, बेंत की कोंपल, अडूसा, अर्क पुष्पी प्रमृति शार्क हैं ॥ २६२ ॥

रक्तपित्तहराण्याहुर्हृद्यानि सुलघूनि च ।

कुष्टमेहन्वरश्वासकासारचिहराणि च ॥ २६३ ॥

पृष्ठ 258

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२०६ सुश्रुतसहिता । साधारणतया ये शार्के - रक्तपित्तनाशक, हृद्य तथा लघु होती हैं और कुष्ट, प्रमेह, ज्वर, श्वास, कास और अरोचक को नष्ट करती हैं ॥ २६३ ॥

कपाया तु हिता पित्ते स्वादुपाकरसा हिमा ।

लब्धी मण्डूकपर्णी तु तद् गोजिह्विका मता ॥ २६४ ॥

अविदाही त्रिदोपन्नः सङ्ग्राही सुनिपष्णकः अवल्गुजः कटुः पाके तितः पित्तकफापहः ईपत्तिक्तं त्रिदोपन्नं शाकं कटु सतीनजम् । नात्युष्णशीतं कुष्टनं काकमाच्यास्तु तद्विधम्

कण्डुकुष्टकृमिन्नानि कफवातहराणि च ।

फलानि बृहतीनां तु कटुतिक्तलघूनि च ॥

कफपित्तहरं ब्रण्यमुष्णं तिक्तमवातलम् ।

॥। २६५ ॥

|| २६६ ॥

२६७ ॥

पटोलं कटुकं पाके वृष्यं रोचनदीपनम् ॥ २६८ ॥

मण्डूकपर्णी का शाक - कपाय, पित्तरोग में लाभकर, विपाक और रस में मधुर, शीतल तथा हलकी होती है । गोजिहा ( गार्जुआ ) का शाक भी गुणों में मण्डूकपर्णी के समान होती है । सुनिपण्णकशाक - दाह नही करने वाली, त्रिदोष नाशक तथा दस्त बांधती है । बाकुची शाक- विपाक में कटु, रस में तिक तथा पित्त और कफ को नष्ट करती है । सतीन ( मटर ) शाक - कुछ तित, त्रिदोषनाशक तथा कटु होती है तथा न अधिक उष्ण और न अधिक रंडी एवं कुष्ट-नाशक होती है । मकोय का शाक - भी गुणों में इसी के समान है । बढी तथा छोटी कटेरी के फल - कण्डु, कुष्ठ, कृमि, कफ तथा वात को नष्ट करने वाले तथा कटु, तिक्त और लघु होते हैं । पटोल पत्र - कफ और पित्त का नाशक, व्रण के लिये हितकर, उष्ण, तिक्त, बात नहीं करने वाले, विपाक में कटु, घृष्य, रुचिकारक तथा अग्निदीपक होते हैं । २६४–२६८ ॥ कफवातहर तिक्तं रोचन कटुकं लघु ॥ वार्ताकं दीपनं प्रोक्तं जीणं सक्षारपित्तलम् । तद्वत् कर्कोटकं विद्यात् कारवेल्लकमेव च आटरूपकवेत्राग्रगुडूचीनिम्त्रपर्पटाः । किराततिक्तसहितास्तिक्ताः पित्तकफापहाः कफापहं शाकमुक्तं वरुणप्रपुनाडयोः । रूनं लघु च शीतं च वातपित्तप्रकोपणम्

दीपनं कालशाकं तु गरदोपहर कटु ।

कौसुम्भं मधुरं रूचमुष्णं श्लेष्महरं लघु ॥

वातलं नालिकाशाकं पितन्नं मधुरं च तत् ग्रहण्यशविकारनी साम्ला वातकफे हिता उष्णा कपायमधुरा चाङ्गेरी चाग्निदीपनी ॥ || २६६ ॥ ॥ २७० ॥

॥ २७१ ॥

२७२ ॥ । | २७३ || बैंगन - कफवातनाशक, तिक, रोचक, कटु, लघु और अग्निदीपक होता है । पक्क बैंगन - कुछ क्षारयुक्त तथा पित्त-जनक होता है । ककोडे तथा करेले भी बैंगन के समान हो होते हैं । अडूसा, बेंत के अग्रभाग, गिलोय, नीम, पित्तपापडा और चिरायता - ये रस में तिक्त ( कड़वे ) हैं तथा पित्त और कफ को नष्ट करते हैं । वरुण तथा पंवाढ की शाक - कफ-नागक, रूक्ष, हलका, शीतल तथा वातपित्त - प्रकोपक होती है । कालशाक - अग्निदीपक, गरदोषनाशक तथा कटु होती है । कुसुम्भशाक - मधुर, रूत, उष्ण, कफनाशक और यु होती है । नाढीशाक - वातजनक, पित्तनाशक तथा मधुर होती है । घानेरी शाक - ग्रहणी तथा अर्श को नाशक, अम्ल वात तथा कफ के लिये हितकारी, उष्ण, पाय, मधुर और अग्निदीपक होती है || २६ ९ -२७३ ॥ लोणिका जातुकन्त्रिपर्णिका पत्तुर जीव कसुवर्चलाडुदुर-कक्कुतुम्बककुठिञ्जरकुन्तलिका कुरण्टिकाप्रभृतयः || २७४ || लोणिका, जासुक ( श्वेत शालपर्णी ), त्रिपणिका ( चनका र्पासी या दुग्धिका ), पत्तर, जीवक, सुवर्चला, दुदुरक, कुतुम्बक, कुठिञ्जर, कुन्तलिका ( नील पियावांसा ), कुरंटिका ( पीठा पियावांसा ) प्रभृति शाक होती हैं ॥ २७४ ॥

स्वादुपाकरसाः शीताः कफन्ना नातिपित्तलाः ।

लवणानुरसा रूक्षाः सज़ारा वातलाः सराः ॥। २७५ ॥

ये शाक - रस और विपाक में मधुर, शीतल, कफनाशक, अधिक पित्त नहीं बढाने वाली, अनुरस में लवण, रूक्ष, क्षार युक्त, वातकारक तथा दस्तावर होती है ॥ २७५ ॥

स्वादुतिता कुन्तलिका कपाया सकुरण्टिका ।

साहि शीतलं चापि लघु दोपापहं तथा ।

राजतवकशाक तु शटीशाक च तद्विधम् ॥ २७६ ॥

स्वादुपाकरसं शाकं दुर्जरं हरिमन्थजम् ।

भेदनं मधुरं रूक्षं कलायमतिवातलम् ॥ २७७ ॥

स्रंसनं कटुकं पाके लघु वानकफापहम् ।

शोफन्नमुष्णवीर्य च पत्र पूतिकरञ्जजम् ॥ २७८ ॥

ताम्बूलपत्रं तीच्णोष्ण कटु पित्तप्रकोपणम् ।

सुगन्धि विशदं तिक्तं स्वयं चातकफापहम् ॥ २७६ ॥

संसनं कटुकं पाके कपायं वह्निदीपनम् ।

वक्त्रकण्डूमलक्लेद्दौर्गन्ध्यादिविशोधनम् ॥ २८० ॥

इनमें कुन्तलिका - मधुर तथा तिक्त है । कुरण्टिका - कसैली होती है । राजचचकशाक - दस्त बांधने वाली, शीतल, लघु तथा त्रिदोषनाशक होती है । शटीशाक इसी के समान है । हरि-मन्थ ( चने ) की शाक - रस और विपाक में मधुर तथा पचने में कठोर होती है । मटरगाक - दस्तावर, मधुर, रूक्ष तथा वायु को अधिक बढाती है । पूतिकरञ्जपत्रशाक - दस्तावर, विपाक में कटु, लघु, वातकफनाशक, शोथहर तथा वीर्य में उष्ण होती है । पान - तीचग, उष्ण, कटु, पित्तप्रकोपक, विशद, तिक्त, स्वरहितकारी, वातकफनाशक, दस्तावर, विपाक में कटु, कपाय एवं पाचकाग्निदीपक होता है तथा मुख की खुजली । मल, क्लेद और दौर्गन्ध्य को नष्ट करता है ॥ २७६–२८० ॥ अथ पुष्पवर्गः— कोविदारशणशाल्मलीपुष्पाणि मधुराणि मधुर-विपाकानि रक्तपित्तहराणि च 1 वृपागस्त्ययोः पुष्पाणि तिक्तानि कटुविपाकानि क्षयका सापहानि २८१ कचनार, शण और सेमल के पुष्प - स्वाद में मधुर तथा विपाक में भी मधुर और रक्तपित्तनाशक होते हैं । अट्टसा और B

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श्रध्यायः ४६ ] सूत्रस्थानम् । २०७ अगस्त्य के पुप्प - तिक्त, विपाक में कटु तथा क्षय और कास नाशक होते हैं ॥ २८१ ॥

आगस्त्यं नातिशीतोष्णं नक्तान्धानां प्रशस्यते ॥ अगस्त्य के पुष्प - न अधिक उष्ण तथा न अधिक ठण्ढे होते हैं तथा नक्तान्ध्य ( रतौंधी Night blindness ) वाले के लिये प्रशस्त होते हैं ॥ २८२ ॥

करीरमधुशिग्रुकुसुमानि कटुविपाकानि वातहराणि ।

सृष्टमूत्रपुरीषाणि च ॥ २८३ ॥

करीलतथा लाल सहजने के पुष्प - विपाक में कटु, वातहारक तथा मलमूत्र के प्रवर्तक होते हैं ॥ २८३ ॥

रक्तवृक्षस्य निम्वस्य मुष्ककार्कासनस्य च ।

कफपित्तहरं पुष्पं कुष्ठघ्नं कुटजस्य च ॥ २८४ ॥

सतिक्तं मधुरं शीतं पद्मं पित्तकफापहम् ।

मधुरं पिच्छिलं स्निग्धं कुमुदं ह्रादि शीतलम् ।

तस्मादल्पान्तरगुणे विद्यात् कुत्रलयोत्पले ॥ २८५ ॥

रक्तवृक्ष ( चन्धूक ), नीम, मुष्कक ( मोखा ), आक, असन तथा कुटज के पुष्प - कफपित्तनाशक और कुष्टव्न होते हैं । कमल - तित, मधुर, शीतल तथा कफ और पित्त को नष्ट करने वाला है । कुमुद - मधुर, पिच्छिल, स्निग्ध, महादजनक तथा ठंढा होता है । कुचलय तथा उत्पल कुमुद से गुणों में कुछ अल्प होते हैं || २८४-२८५ ॥

सिन्धुवारं विजानीयाद्धितं पित्तविनाशनम् ।

मालतीमल्लिके तिक्ते सौरभ्यात् पित्तनाशने ॥ २८६ ॥

सुगन्धि विशदं हृद्यं वाकुलं पाटलानि च ।

श्लेष्मपित्तविषघ्नं तु नागं तद्वच्च कुङ्कुमम् ॥ २८७ ॥

चम्पकं रक्तपित्तघ्नं शीतोष्णं कफनाशनम् ।

किंशुकं कफपित्तघ्नं तद्वदेव कुरण्टकम् ॥ २६८ ॥

मधुशिकरीराणि कटुश्लेष्महराणि च ।

यथावृत्तं विजानीयात् पुष्पं वृक्षोचितं तथा ॥ २८६ ॥

सिन्धुवार ( निर्गुण्डी ) के पुप्प - ठण्डे तथा पित्तविनाशक होते हैं । मालती ( चमेली ) और मल्लिका के पुप्प - तिक्त होते हैं एवं सुगन्धियुक्त होने से पित्त नष्ट करते हैं । बकुल ( मौल. सिरी ) और पाटला के पुष्प - सुगन्धयुक्त, विशद और हृद्य होते हैं । नाग ( चम्पे के पुष्प अथवा नागकेशर ) - कफ - पित्त-नाशक तथा विषनाशक होते हैं । नाग के अनुसार ही केशर के गुण होते हैं । चम्पे के पुष्प - रक्तपित्तनाशक, समशीतोष्ण और कफनाशक होते हैं । पलासपुष्प - कफ और पित्त को नष्ट करते हैं । कुरण्टक के फूल भी इन्हीं के समान गुणकारी होते हैं । लाल सहजन की कोंपलें - कटु होती हैं तथा कफ को नष्ट करती हैं । अत्र जिन वृक्षों के पुष्पों के गुणधर्म का यहां उल्लेख नहीं किया गया है उन्हें उनके वृक्षों के गुणों के अनुसार समझना चाहिये तथा अन्य जो कांटे, पत्र, अवरोह आदि होते हैं उनके गुण भी उनके वृक्षों के समान जाने ॥। २८६-२८९ ॥ क्षत्रककुलेव ( च ) रवंशकरीरप्रभृतीनि कफहराणि सृष्टमूत्रपुरीषाणि च ॥ २६० ॥।

क्षवक ( छत्रक ), कुलेवर तथा वंश -करीर प्रभृति - कफ-नाशक एवं मल और मूत्र के प्रवर्तक हैं ॥ २ ९ ० ॥ विष्यन्दि वातलं नातिपित्त श्लेष्मकरं च तत् ॥२६१ ॥

वेणोः करीराः कफला मधुरा रसपाकतः ।

विदाहिनो वातकराः सकपाया विरूक्षणाः ॥ २६२ ॥

इनमें से चवक कृमिजनक, विपाक में मधुर, पिच्छिल, कफादि का स्राव करने वाला, वातजनक तथा अधिक पित्त और कफ को नहीं करने वाला है । बांस के अङ्कुर - कफवर्द्धक, रस और विपाक में मधुर, विदाहजनक, वातकारक, कपाय तथा रूत होते हैं ॥ २ ९१–२९ २ ॥ उद्भिदानि पलालेक्षुकरीपवेणुक्षितिजानि । तत्र पलालजातं मधुरं मधुरविपाकं रूक्षं दोपप्रशमनं च । इक्षुजं मधुरं कषायानुरसं कटुकं शीतलं च । तद्वदेवोष्णं कारीपं कषायं वातकोपनं च । वेणुजातं कपायं वात-कोपनं च । भूमिजं गुरु नातिवातलं भूमितश्चास्या-नुरसः ॥ २६३ ॥

भूमि या अन्य वस्तु को फोड़ कर पैदा होने वाले ( उद्भिद ) निम्न हैं । जैसे पलाल ( पुआल ), इक्षु के छोतरे ( रस निकालने पर शेष छिलके ), करीप ( सुखा गोवर ), वां और पृथिवी इन्हें फोड़कर या इनके ढेर में पैदा होने कादि का ग्रहण होता है । पलाल में उत्पन्न क्षुप - रस और विपाक में मधुर, रूक्ष तथा दोषशामक होते हैं । इनु के कचरे में उत्पन्न छत्रकादि क्षुप - मधुर, अनुरस में कपाय, कटु और शीतल होते हैं । करीप ( गोवर ) में उत्पन्न होने वाले क्षुप ( छत्रक ) - इनुजन्य छत्रक के तुल्य गुणों में होता है किन्तु उष्ण, कपाय और वातल होता है । बांस की लकडी में उत्पन्न छत्रक - कपाय तथा वातकोपक होता है । पृथ्वी फोड कर उत्पन्न हुआ छत्रक - पचने में भारी, अधिक वायु नहीं करने

वाला तथा भूमि के अनुसार इसके अनुरस एवं गुण होते हैं ।

पिण्याकतिलकल्कस्थू णिका शुष्कशाकानि सर्वदोष-प्रकोपणानि ॥ २६४ ॥

पिण्याक ( सरसों - अलसी आदि की खल ), तिलक्ल्क या तिलों की खल, स्थूणिका ( तिलकल्क से बने बड़े ) तथा सुखी शाकें सर्व दोषों को प्रकुपित करते हैं ॥ २ ९ ४ ॥

विष्टम्भिनः स्मृताः सर्वे वटका वातकोपनाः ।

सिडाकी बातला सार्द्रा रुचिप्याऽनलदीपनी ॥२६५ ॥

सर्व प्रकार के वटक ( वडे ) - विष्टम्भजनक तथा वायु को कुपित करते है और मूली, आलू आदि से बनी पकोड़ी ( सिण्डाको ) - वातजनक होती है तथा भाई अर्थात्, ताजी पकोडी - रुचिकारक और अग्नि को दीप्त करती है ॥ २ ९ ५ ॥

विड्भेदि गुरु रूक्षञ्च प्रायो विष्टम्भि दुर्जरम् ।

सकषायं च सर्व हि स्वादु शाकमुदाहृतम् ॥ २६६ ॥

सर्व प्रकार के शाक - दस्तावर, पचने में भारी, रुक्ष, प्रायः विष्टम्भकारक, दुर्जर तथा कुछ कपाय रसंयुक्त होते है ॥२ ९ ६ ॥ पुष्पं पत्रं फलं नालं कन्दाश्च गुरवः क्रमात् ॥ २६७ ॥

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२०८ सुश्रुतसहिता । पुष्प, पत्र, फल, नाल और कन्द ये शाक उत्तरोत्तर एक दूसरे से गुरु होते हैं ॥ २ ९ ७ ॥

कर्कशं परिजीर्ण च कृमिजुष्टम देशजम् ।

वर्जयेत् पत्रशाकं तद् यदकालविरोहि च ॥ २६८ ॥

जोशाक कर्कश, नीर्ण ( पुराना ), कीड़ों से खाया हुआ, अपवित्र भूमि में उत्पन्न तथा वे मौसम में पैदा हुआ हो उसे वर्जित कर देना चाहिये ॥ २ ९ ८ ॥ विमर्श: - यद्यपि कुछ प्राचीन ग्रन्थों में शाकों की निन्दा को है ' शाकेषु सर्वेषु वसन्ति रोगा ' तथापि शाक निम्न गुणयुक्त होती हैं । प्रायः शाकों में प्रोटीन तथा मेद - अस्यल्प होते हैं । इनमें खनिज क्षार होते हैं जो कि शरीर में उत्पन्न अम्लों को निर्वार्य कर रक्त क्षारीयता बनाये रखते है । रक्तक्षारीयता के अल्प होने से अम्लरक्तता ( Acidos1s ) रोग हो जाता है । शाकों का ( Cellulose ) आन्न्रगति को बढ़ा कर मल प्रवृत्ति करता है अतः शाक विबन्धनाशक होती हैं । पोटेशियम के लवण शाकों में होने से मूत्रल होते है अतः शाक अश्मरी में हितकर है । शाकों में विटामीन सी ० अधिक होता है । इनमें कार्बोहैड्रेट कम होने से मधुमेही को दे सकते हैं । शाकों से अन्न की रुचि बढ़ती है । अथ कन्दवर्गः । कन्दानत ऊर्ध्वं वक्ष्यामः -- विदारीकन्दशतावरी बिसमृणालशृङ्गाटककशेरुकपिण्डालुकमध्वालुकहस्त्या-लुककाष्ठालुकरक्तालुकेन्दीवरोत्पलकन्दप्रभृतीनि || २६ || अब इसके अनन्तर कन्दों का वर्णन करते हैं । विदारीकन्द, शतावर, विस ( पद्मजढ ), मृणाल ( कमलनाल ), सिघाडा, कशेरु, पिण्डालु, मध्वालु हस्स्यालु, काष्टालुक, शङ्खालुक, रक्तालुक, इन्दीवर ( नील कमल ), उत्पल ( श्वेत या लाल कमल ) प्रभृति के कन्द होते हैं ॥ २ ९९ ॥

रक्तपित्तहराण्याहुः शीतानि मधुराणि च ।

गुरूणि बहुशुक्राणि स्तन्यवृद्धिकराणि च ॥ ३०० ॥

ये कन्द - रक्तपित्तनाशक, शीतल, मधुर, पचने में भारी, वीर्य को अधिक बढ़ाने वाले तथा दुग्धवृद्धिकारक होते हैं ॥

मधुरो बृंहणो वृष्यः शीतः स्वर्योऽतिमूत्रलः ।

विदारीकन्दो बल्यस्तु पित्तवातहरश्च सः ॥ ३०१ ॥

वातपित्तहरी वृष्या स्वादुतिता शतावरी ।

महती चैव हृद्या च मेधाग्निबलवद्धिनी ॥ ३०२ ॥

ग्रहण्यर्शोविकारनी वृष्या शीता रसायनी ।

कफपित्तहरास्तिक्तास्तस्या एवाङ्कुराः स्मृताः ॥ ३०३ ॥

इनमें विदारीकन्द - मधुर, बृंहण, वृप्य, शीत, स्वरहितकारी, अतिमुत्रजनक, बलवर्द्धक तथा पित्त और वात का नाशक होता है । शतावर वात और पित्त की नादाक, हृप्य, मधुर और तिक्त होती है 1 । बड़ी शतावर हृदय के लिये हितकर, मेधा, वाचकानि तथा वल को बढ़ानेवाली, संग्रहणी तथा अर्श की नाशक, घृप्य, शीतल तथा रसायन होती है । शतावर के अर - कफ और पित्त के नाशक तथा तिक्त होते हैं ॥

अविदाहि विसं प्रोक्तं रक्तपित्तप्रसादनम् ।

विष्टम्भि दुर्जरं रूक्षं विरसं मारुतावहम् ॥ ३०४ ॥

गुरु विष्टम्भशीतौ च शृङ्गाटककशेरुकौ ।

पिण्डालुकं कफकरं गुरु वातप्रकोपणम् ॥ ३०५ ॥

सुरेन्द्रकन्दः श्लेष्मन्नो विपाके कटु पित्तकृत् ।

वेणोः करीरा गुरवः कफमारुतकोपनाः ॥ ३०६ ॥

विस - विदाह नहीं करने वाला, रक्तपित्त का प्रसादक, विष्टम्भकारक, पचने में कठिन, रूक्ष, स्वादरहित तथा वात-जनक होता है । सिंघाड़े तथा कशेरू - पचने में भारी, विष्टम्भ-कारक और ठण्ढे होते हैं । पिण्डालुक - कफजनक, भारी तथा वातपित्त का प्रकोपक होता है । सुरेन्द्रकन्द ( जगली सुरण ) -कफनाशक, विपाक में कटु तथा पित्तकारक होता है । बांस के करीर - भारी तथा कफ और वायु के प्रकोपक होते हैं ॥ स्थूलसूरणमाणकप्रभृतयः कन्दा ईपत्कषायाः कटुका रूक्षा विष्टम्भिनो गुरवः कफवातलाः पित्तहराव ३०७ स्थूलकन्द, सूरणकन्द, माणकन्द, प्रभृति कन्द- कुछ कपाय, कटु, रूक्ष, विष्टम्भकारक, पचने में भारी, कफ और वायु को बढ़ाने वाले तथा पित्तनाशक होते हैं ॥ ३०७ ॥

माणकं स्वादु शीतं च गुरु चापि प्रकीर्त्तितम् ।

स्थूलकन्दस्तु नात्युष्णः सूरणो गुदकीलहा ॥ ३०८ ॥

माणकन्द - मधुर, शीतल और गुरु होता है तथा स्थूल-कन्द- ज्यादा उष्ण नहीं होता है तथा सूरणकन्द अर्श को नष्ट करता है ॥ ३०८ ॥

कुमुदोत्पलपद्मानां कन्दा मारुतकोपनाः ।

कषायाः पित्तशमना विपाके मधुरा हिमाः ॥ ३०६ ॥

वाराहकन्दः श्लेष्मघ्नः कटुको रसपाकतः ।

मेहकुष्ठक्रिमिहरो बल्यो वृष्यो रसायनः ॥ ३१० ॥

कुमुद, उत्पल और पद्म इनके कन्द - वात को प्रकुपित करने वाले, रस में कपाय, पित्त के शामक, विपाक में मधुर और शीतल होते हैं । वाराहकन्द - कफ का नाशक, रस तथा विपाक में कटु होता है एवं प्रमेह, कुष्ठ और कृमियों का नाशक, बलवर्द्धक, वृष्य तथा रसायन होता है ॥ ३० ९ - २१० ॥ तालनारिकेलखर्जूरप्रभृतीनां मस्तकमज्जानः ॥ ३११ ॥

स्वादुपाकरसानाहू रक्तपित्तहरांस्तथा ।

शुक्रलाननिलन्नांश्च कफवृद्धिकरानपि ॥ ३१२ ॥

ताद, नारियल तथा खजूर प्रभृति वृक्षों के सिर की मज्जा ( गिरी ) - रस और विपाक में मधुर, रक्तपित्तनाशक, वीर्य को बढ़ाने वाली, वातनाशक तथा कफवृद्धिकारक होती है ॥

बालं ह्यनार्त्तवं जीर्णं व्याधितं कृमिभक्षितम् ।

कन्दं विवर्जयेत् सर्वं यो वा सम्यङ् न रोहति ॥३१३ ॥

जो कन्द कच्चा ( वाल ) हो, बेमोसम का हो, अधिक पुराना हो गया हो, किसी रोग से युक्त एवं कीड़ों से खाया हुआ हो तथा जिसे बोने पर ठीक न उग सकता हो, उसे वर्जित कर देना चाहिये ॥ ३१३ ॥

विमर्शः -- प्रायः वनस्पतियां इन कन्दों तथा मूलों में अपने