श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 261–270
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 261–270
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अध्यायः ४६ ] सूत्रस्थानम् । २०६ पोषणार्थं पोषण पदार्थों को जमा करती हैं जिससे ये कन्द बड़े तथा मनुष्यों के पोषण के लिये भी उपयोगी होते हैं । इनमें स्टार्च अधिक, खनिज अल्प तथा प्रोटीन और फैट अत्यल्प होते हैं । इनमें सेल्यूलोज होने से दस्त साफ लाने का गुण होता है । अथ लवणानि -सैन्धवसामुद्रविडसीवर्चलरोमकोद्भिदप्रभृतीनि
लत्रणानि ययोत्तरमुष्णानि वातहराणि कफपित्तकराणि ।
यथापूर्व स्निग्धानि स्वादूनि सृष्टमूत्रपुरीषाणि चेति ॥
- लवणों में सेन्वा, समुद्री, विड, सोंचर, रोमक, औद्भिद अमृति होते हैं 1 । ये ययोत्तर उष्ण, वातनाशक, कफपित्तकारक होते हैं तथा यथापूर्व विग्ध, स्वादु और मल तथा मूत्र के उत्पादक व प्रवर्तक होते हैं ॥ ३५४ ॥
विमर्श: - सिन्धु देश को खानों से सैन्धव निकलता है । इसे ( Bock salt ) कहते हैं । समुद्र के पानी को सूर्य किरणों । से सुखा कर बनाया सामुद्र, चिड या काला नमक कहते हैं । इसे कृत्रिम तौर से बनाते हैं । खाने का नमक ८२ भाग, आंवला १ भाग, बहेड़ा १ भाग, सजीखार १ भाग ले के सबको एकत्र जला के बनाते हैं । सौवर्चल या कालालोन । रोमक - यह राजस्थान की सांभर झील के पानी से बनाया जाता है । औद्भिद को सनीमिट्टी या रेहानमक भी कहते हैं । नमक को रासायनिक भाषा में सोडियम क्लोराइड तथा इसका सूत्र ( Na cl ) अंग्रेजी में कामन साल्ट भी कहते हैं ।
चक्षुष्यं सैन्ववं हृद्यं रुच्यं लब्वग्निदीपनम् ।
स्निग्धं समधुरं वृष्यं शीतं दोषन्नमुत्तमम् ॥ ३१५ ॥
सामुद्रं मधुरं पाके नात्युष्णमविदाहि च ।
भेदनं स्निग्धमीषच्च शूलघ्नं नातिपित्तलम् ॥ ३१६ ॥
संचारं दीपने सूक्ष्मं शूलहृद्रोगनाशनम् ।
रोचनं तीक्ष्णमुष्णं च विढं वातानुलोमनम् ॥ ३१७ ॥
लघु सौवर्चलं पाके वीर्योष्णं विशदं कटु ।
गुल्मशूलविबन्धन्नं हृद्यं सुरभि रोचनम् ॥ ३१८ ॥
रोमकं तीच्णमत्युष्णं व्यवायि कटुपाकि च ।
वातघ्नं लघु विष्यन्दि सूक्ष्मं विड्मेदि मूत्रलम् ॥३१६ ॥
लघु ती गोष्णमुत्क्लेदि सूक्ष्मं वातानुलोमनम् ।
सतिक्तं कटु सत्तारं विद्याल्लवणमौद्भिदम् ॥ ३२० ॥
कफवातक्रिमिहरं लेखनं पित्तकोपनम् ।
दीपनं पाचनं भेदि लवणं गुटिकाइयम् ॥ ३२१ ॥
ऊपसूतं बालुकैलं शैलमूलाकरोद्भवम् । लवणं कटुकं छेदि विहितं कटु चोच्यते ॥ ३२२ ॥ -सैन्धव लवण नेत्रों के हितकारी, हथ, रुचिवर्द्धक,
पचने में लवु, पाचकाप्ति का दीपक, स्निग्ध, मथुर, वृष्य, शीत और दोषनाशक तथा सर्वं लवणों में उत्तम ( सन्वव टवणानान् ) माना गया है । समुद्री लवग - विपाक में मधुर, अधिक उष्ण नहीं, दाह नहीं करने वाला, दस्तावर, कुछ स्निग्ध, शूलनाशक तया विशेष पिचवर्द्धक नहीं होता है । २७ सु ० विडलवण - नारयुक्त, अग्निदीपक, रुक्ष, शूल तथा हृदय रोग का नाशक, रुचिजनक, तीक्ष्ण, उष्ण तथा वात का अनुलोमन करता है । सौवर्चल लवण - विपाक में लघु, उष्णवीर्य, विशद, कटु, गुल्म, शूल और विबन्ध का नाशक, हृद्य, सुगन्धयुक्त तथा रुचिवर्द्धक होता है । रोमक लवण - तीक्ष्ण; अधिक गरम, प्रथम शरीर में फैल कर पश्चात् पार्क में परिणत होने वाला, विपाक में कटु, वातनाशक, लघु, विप्यन्दन-शील, सूक्ष्म, दस्त लाने वाला तथा मूत्रजनक होता है । औद्भिदलत्रण- लघु, वीक्ष्ण, उष्ण, छेडकारक, सूक्ष्म, वातानु-लोमक, तिक्त, कटु और क्षारयुक्त होता है । गुटिकालवण -कफवातनाशक, कृमिहर, लेखक, पित्तजनक, अभिदीपक, पाचक और दस्तावर होता है । ऊपसूत ( खारी मिट्टी से बनाया हुआ लवण ), वालुकेल ( रेगिस्तान के बालुका-प्रदेश से बनाया लवण ), शैलमूलाकरोद्भव ( पर्वतों की जड़ की आकर ( खानों ) से बनाया हुआ लवण ) ये सब लवण-कंटु, छेदक तथा विपाक में भी कटु होते हैं || ३१५–३२२ ॥ यवक्षारत्वर्जिकाक्षारोपक्षारपाकिमटङ्कणक्षारप्रभृतयः ॥ यवनार, स्वर्जिकाक्षार, ऊपचार, पाकिमक्षार; टंकण नार प्रमृति क्षार हैं ॥ ३२३ ॥
गुल्मार्शाग्रहणीदोषप्रतिश्यायविनाशनाः ।
क्षारास्तु पाचनाः सर्वे रक्तपित्तकराः सराः ॥ ३२४ ॥
उक्त क्षार - गुल्म, अर्गं, संग्रहणी तथा प्रतिश्याय को नष्ट करते हैं एवं सर्व चार - पाचक, रक्तपित्तकारक तथा दस्तावर होते हैं ॥ ३२४ ॥
विमर्श - - यवचार को भाण्डचार तथा दारु लवण भी कहते हैं । पाकिमचार को शुद्ध शोरा या कलमी शोरा कहते हैं । टंकण को सुहागा तथा अंग्रेजी में Borax कहते हैं ।
ज्ञेयौ वह्निसमा चारौ स्वर्जिकायावशूकजौ ।
शुक्रश्लेष्मविबन्धार्शोगुल्मप्लीहविनाशनौ ॥ ३२५- ॥
उष्णोऽनिलन्नः प्रक्लेदी चोषचारो वलापहः ।
मेदोन्नः पाकिमः क्षारस्तेषां वस्तिविशोधनः ॥३२६ ॥
विरूक्षणोऽनिलकरः श्लेष्मन्नः पित्तदूषणः ।
अग्निदीप्तिकरस्तीक्ष्णष्टङ्कणः क्षार उच्यते ॥ ३२७ ॥
सजी खार तथा यवचार - अग्नि के समान तीक्ष्ण होते हैं तथा शुक्र, कफ, विवन्ध, अर्ग, गुल्म और प्लीहा वृद्धि को नष्ट करते हैं । ऊपचार - गरम, वातनाशक, क्लेदकारक तथा बलनाशक होता है । पाकिमचार - मेदोनाशक तथा मूत्रल होता है । टंकण चार रूच, वातकारक, कफनाशक, पित्तदूषक, पाचकाग्नि को तेज करने वाला तथा तीच्ण होता है ॥
सुत्रर्ण स्वादु हृद्यञ्च बृंहणीयं रसायनम् ।
दोपन्त्रयापहं शीतं चक्षुष्यं विषसूदनम् ॥ ३२८ ॥
रूप्यमम्लं सरं शीतं सस्नेहं पित्तवातनुत् ।
तानं कषायं मधुरं लेखनं शीतलं सरम् ॥ ३२६ ॥
सतिक्तं लेखनं कांस्यं चक्षुष्यं कफवातजित् ।
वातकृच्छीतलं लोहं तृष्णापित्तकफापहम् ॥ ३३० ॥
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२१० सुश्रुतसहिता ।
कटु क्रिमिन्नं लवणं त्रपुसीसं विलेखनम् ।
मुक्ताविद्रुमवज्ञेन्द्रवैदूर्यस्फटिकादयः ॥ ३३१ ॥
चक्षुष्या मणयः शीता लेखना विषसूदनाः ।
पवित्रा धारणीयाश्च पाप्मालक्ष्मीमलापहाः ॥ ३३२ ॥
सुवर्ण - मधुर, हृद्य, बृंहण, रसायन, त्रिदोषनाशक, शीत, aftaara arr fav नाशक होता है । चांदी - अम्ल, सारक, शीत, स्निग्ध, पित्त तथा वात की नाशक होती है । बथुआ, चुच्चू, चिल्ली, कोमल मूली, मण्डूकपर्णी और जीवन्ती श्रेष्ठ होती है । दुग्धों तथा घृतों में गौ का दुग्ध तथा घृत श्रेष्ठ होता है । लवणों में सेन्धा नमक श्रेष्ठ होता है । अम्ल ( खट्टे ) पदार्थों में आंवला और अनार श्रेष्ठ होते. हैं । कटु ( चरपरे ) पदार्थों में पीपल और सौंठ श्रेष्ठ होती है । तिक्त पदार्थों में परवल और बैंगन श्रेष्ठ हैं । मधुर पदार्थों में घृत और शहद श्रेष्ठ होता है । कपाय द्रव्यों में सुपारी तथा फालसे श्रेष्ठ हैं । ऊंख ( गन्ने ) के बने पदार्थों में शर्करा ताम्र - कपाय, मधुर, लेखन, शीतल और दस्तावर होता । श्रेष्ठ होती है । पीने के द्रव्यों में मधु ( शहद ) तथा द्राक्षासव है । कांसा - तिक्त, लेखन, नेत्रों के लिये हितकारी तथा कफ-वातनाशक होता है । लौह - वातकारक, शीतल, वृषाहर और पित्त तथा कफ का नाशक होता है । रांगा और सीसा -कटु, कृमिनाशक, लवण और लेखक होते हैं । मोती, प्रवाल, हीरा, वैदूर्य, स्फटिक प्रभृति मणियां- नेत्रों के लिये हितकारी शीतल, लेखन, विपनाशक, पवित्र धारण करने लायक होती हैं तथा पाप, अलक्ष्मी और दोषों को नष्ट करती हैं ॥३२८-३३२ ॥ धान्येषु मांसेषु फलेषु चैव शाकेषु चानुक्तमिहाप्रमेयात् । आस्वादतो भूतगुणैश्च मत्वा तदादिशेद् द्रव्यमनल्पबुद्धिः । संसार के अन्दर पदार्थ अप्रमेय ( असंख्य, गिनने योग्य ) होते हैं इस लिये धान्य, मांस, फल और शाकों की दृष्टि जो यहां वर्णित नहीं किये गये हैं उन्हें चख कर रसानुसार तथा द्रव्य को आरम्भ करने वाले पृथिव्यादि पञ्चमहाभूतों के गुणानुसार अनल्प ( वहु ) बुद्धि वैद्य उन द्रव्यों के गुणों को जान लेवे ॥ ३३३ ॥
षष्टिका यवगोधूमा लोहिता ये च शालयः ।
मुद्राढकीमा धान्येषु प्रवराः स्मृताः । ॥ ३३४ ॥
लावतित्तिरिसारङ्गकुरङ्गेणकपिञ्जलाः ।
मयूरवर्मिकूर्माश्च श्रेष्ठा मांसगणेष्विह ॥ ३३५ ॥
दाडिमामलकं द्राक्षा खर्जूरं सपरूपकम् ।
राजादनं मातुलुङ्गं फलवर्गे प्रशस्यते ॥ ३३६ ॥
सतीनो वास्तुकश्चुच्चू
चिल्लीमूलक पोतिकाः ।
मण्डूकपर्णी जीवन्ती शाकवर्गे प्रशस्यते ॥ ३३७ ॥ ।
गव्य क्षीरं घृतं श्रेष्ठं, सैन्धवं लवणेषु च ।
धात्री दाडिममम्लेषु पिप्पली नागर कटौ ॥ ३३८ ॥
तिचे पटोलवार्त्ता के मधुरे घृतमुच्यते ।
क्षौद्रं, पूगफलं श्रेष्ठं कपाये सपरूपकम् ॥ ३३६ ॥
शर्करेक्षुविकारेषु पाने मध्वासवौ तथा ।
परिसंवत्सरं धान्यं, मांसं वयसि मध्यमे ॥ ३४० ॥
अपर्युपितमन्नं तु संस्कृतं मात्रया शुभम् ।
फलं पर्यागतं, शाकमशुष्कं तरुणं नवम् ॥ ३४१ ॥
धान्यों में - सांठी चावल, जौ, गेहूं, रक्कशालि, मूंग, अरहर, और मसूर श्रेष्ठ होते हैं । मांस वर्ग में - लाव, तीतर, सारङ्ग पक्षी, कुरन ( श्वेत हरिण ), एण ( कृष्ण हरिण कपिल, मोर, वर्मि ( मछली ) और कच्छप श्रेष्ठ होते हैं । फल वर्ग में - अनार, आंवला, दाख, खजूर, फालसा, खिरणी और बिजोरा नीयू श्रेष्ठ होते हैं । शाक वर्ग में सतीन ( मटर ), श्रेष्ठ होते हैं । एक साल का पुराना धान्य ( चावल ) तथा मध्यम ( युवा, प्रौढ ) आयु के पशु - पक्षी का मांस श्रेष्ठ होता है । अपर्युषित ( ताजा ) तथा मसाले डाल कर संस्कृत किया हुआ एवं उचित मात्रा में सेवित एवं पथ्यकर श्रेष्ठ होता है । फलों में पके हुये फल तथा शाकों में अंशुष्क ( हरी ) तरुण और ताजी शार्के श्रेष्ठ होती हैं ॥। ३३४-३४५ ॥ श्रथ कृतान्नवर्गः । "
अतः परं प्रवच्यामि कृतान्नगुणविस्तरम् ।
लाजमण्डो विशुद्धानां पथ्यः पाचनदीपनः ॥ ३४२ ॥
चावानुलोमनो हृद्यः पिप्पलीनागरायुतः ।
स्वेदाग्निजननी लध्वी दीपनी बस्तिशोधनी ॥ ३४३ ॥
त्तट्श्रमग्लानिहरी पेया वातानुलोमनी ।
विलेपी तर्पणी हृद्या प्राहिणी बलवर्द्धनी ॥ ३४४ ॥
पथ्या स्त्रादुरसा लघ्वी दीपनी क्षुत्तृषापहा ।
नस्तिसंशोधनी वृष्या ज्वरातीसारयोहिता ॥ ३४५ ॥
aur सन्तर्पणी वृष्या बृंहणी बलवर्द्धनी ।
शाकमांसफलैर्युक्ता विलेप्यम्ता च दुर्जरा ॥ ३४६ ॥
अब इसके अनन्तर कृतान्न ( सिद्ध किये हुये ) वर्ग के गुणों का विस्तृत वर्णन करते हैं । विरेचन - वमनादि से शुद्ध हुये मनुष्यों के लिये पिप्पली तथा झुण्ठी के चूर्ण के प्रक्षेप से युक्त लाजमण्ड - पथ्य, प्राचक, दीपक, वातानुलोमक तथा हृद्य होता है । ' पेया -- स्वेद तथा पाचकानि की जनक, लघु, दीपक तथा मूत्रविशोधक होती है एवं भूख, प्यास, थकावट और मन की ग्लानि की नाशक तथा वातानुलोमक होती है! विलेपी - तृप्तिजनक, हृद्य, दस्त को बांधने वाली, बल-वर्द्धक, पथ्य, मधुर रसयुक्त, हलकी, अतिदीपक तथा क्षुधा और प्यास की नाशक, बस्ति की शोधक, वृष्य तथा स्वर और अतिसार में हितकर है । शाक, मांस तथा फलों से युक्त उक्त मण्डादि यवागू पचने में कठिन होती है ॥ ३४२-३४६ ॥ विमर्श: -- पिप्पलीनागरा युतः - पढन परिभाषा से या कल्क - विधि से मिलित १ कर्ष पीपल और सोंठ लेकर १ स्थ जल में पकावें । भर्द्धश्वत होने पर छानकर उसी द्रव से पेयादि बनावें । यथा - यदप्सु श्रुतशीतासु षट्टङ्गादि प्रयुज्यते । कर्षमात्र । ततो द्रव्य साधयेत् प्रास्थिकेऽम्मसि । भर्द्धश्वतं प्रयोक्तव्य - पाने पेयादि-समिधो । अन्या -- कर्षांर्द्धं वा कणाशुण्ठयो कल्कद्रव्यस्य वा पलम् । विनीय पाचयेद्युक्तथा वारिप्रस्थेन, चापराम् ॥ सिक्यैर्विरहितो मण्डः पेया सिक्थसमन्विता ।..-विलेपी बहुसिक्था स्याद् यवागूर्विरलद्रवा ॥ ३४७ ॥
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श्रध्यायः ४६ ] सूत्रस्थानम् । २११ t rasta fear ( कर्णो ) से रहित मण्ड होता है । पैया सिक्य ( तण्डुल कण ) युक्त होती है तथा विलेपी-यवागू अधिक सिक्य से युक्त एवं अल्प द्रव ( गाठी ) होती है ॥ ३४७ ॥
विमर्शः चावलों से प्रायः मण्ड, पेया, विलेपी और यवागू, ऐसे चार पदार्थ तैयार होते हैं । ऐसी विचार धारा सी पड गई, जिससे यवागू मण्डादि से भिन्न होती है ऐसी प्रथा पड़ी हुई है । अनं पञ्चगुणे साध्य विलेपी तु चतुर्गुणै । मण्डश्चतुर्दशगुणे यवागू पड्गुणेऽम्भसि ॥ किन्तु चरक तथा वाग्भट ने यवागू को मण्डादि से पृथक् न मान कर मण्ड, पेया और विलेपी को यवागू के ही तीन भेद माने हैं । वाग्भट ने कृतान्न या ओदन के मण्ड, पेया और विलेपी ये ही तीन भेद लिखे हैं । यवागू का नाम भी नहीं है । ' मण्डपेयाविले-पीनामोदनस्य च लाघत्रम् ॥ मण्डादिपरिभाषा - जले चतुर्दशपले
तण्डुलानां चतु पलन् । विपचेत् स्रावयेन्मण्डं स भक्तो मधुरो लघु • ॥
नीरे चतुर्दशगुणे सिद्धो मण्डस्त्वसिक्थकः । लाजेर्वा तण्डुलैर्धृष्टे - । निमण्डः प्रकीर्तितः ॥ ( शार्ङ्ग ) । मण्डभेदा: -- मण्डस्तु त्रिविधो
ज्ञेय एकद्वित्रिपरिसुन ' । लाजेर्मृष्टरभृष्टश्च तण्डुलैः परिसंस्कृत ' ॥
पेया- चतुर्दशगुणे नीरे रक्तशाल्यादिभिः कृता । द्रवाधिका स्वल्प-सिक्था पेया प्रोक्ता भिषग्वरैः ॥ ( भावप्र ० ) । विलेपी --- चतुर्गु-गाम्बुसंसिद्धा विलेपी धनसिंक्थका । पृथग्द्रवेण रहिता ख्याता शिथिलमक्तिका ॥
विष्टम्भी पायसो बल्यो मेदः कफकरो गुरुः ।
. कफपित्तकरी बल्या कृशराऽनिलनाशनी ॥ ३४८ ॥
दुग्ध में पकाया हुआ ओदन ( खीर ) - विष्टम्भकारक, बलवर्द्धक, मेदा तथा कफ को बढ़ाने वाला तथा गुरु होता है । तिल, चावल, उड़द और मूंग की बनी खिचड़ी ( कृशरा ) -कफ और पित्त को करने वाली, बलवर्द्धक तथा वातनाशक होती है ॥ ३४८ ॥
तस्तु विमलः शुद्धो मनोज्ञः सुरभिः समः ।
स्विन्नः सुप्रस्रुतस्तूष्णो विशदस्त्वोद्नो लघुः ॥ ३४६ ॥
अघौतोऽप्रस्रुतोऽस्विन्नः शीतश्चाप्योदनो गुरुः ।
लघुः सुगन्धिः कफहा विज्ञेयो भृष्टतण्डुलः ॥ ३५० ॥
स्नेहैर्मासैः फलैः कन्दैर्वैदलाम्लैश्च संयुताः ।
गुरवो बृंहणा बल्या ये च क्षीरोपसाधिताः ॥ ३५१ ॥
' प्रथम धोकर विमल और शुद्ध करके सुगन्धित चावलों का ठीक पका हुआ तथा मांड निकाला हुआ एवं गरम तथा । विशद ( चिकनाई रहित ) ओदन ( भात ) लघु होता है । किन्तु बिना धोये हुये चावलों का भात जिसमें से मांड न निकाला हो तथा जिसे अच्छा स्विम्न न किया ( उवाला ) हो एवं जो ठंडा हो गया हो ऐसा ओदन ( भात ) पचने में भारी होता है । भाड़ में भूने हुये अथवा तुषसहित पका के कूट कर निकाले हुये ( भुजिया ) चावलों का भात पचने में हलका, सुगन्धयुक्त तथा ककहर होता है । घृतादि स्नेह, मांसरस, फल, कन्द, मूंग आदि की दाल, अम्ल पदार्थ तथा दुग्ध इनके साथ पकाये हुए चावल पचने में भारी, बृंहण तथा बलकर होते हैं ॥ ३४ ९ -३५१ ॥ सुनो निस्तुषो भ्रष्ट ईषत्सूपो लघुर्हितः ॥ ३५२ ॥
स्विन्नं निष्पीडितं शाकं हितं स्यात् स्नेहसंस्कृतम् ।
अस्विन्नं स्नेहरहितमपीडितमतोऽन्यथा ॥ ३५३ ॥
सुपों से रहित तथा कुछ भून कर पश्चात् स्विन्न ( उयाल ) कर बनाई हुई दाल पचने में हलकी तथा हितकर होती है । प्रथम स्विन्न कर पश्चात् निचोड़ के घृतादि स्नेह तथा मसालों से संस्कृत ( छोंक ) कर बनाई हुई शाक हितकारी होती है किन्तु विना उवाली, बिना निचोडी और घृतादि संस्कार रहित शार्के अहितकर होती हैं ॥ ३५२–३५३ ॥ विमर्श: चावलों का मांड तथा शाकों को पका के निचोड़ कर उनका रस फेंकना आधुनिक विज्ञान -दृष्टि से । अहितकर है । ऐसा करने से इन पदार्थों के खनिज पदार्थ, प्रोटीन और विटामिन निकल जाते हैं जिससे निर्बलता तथा । रोग होते हैं । हां रुग्ण मनुष्यों की मन्दाग्नि की दृष्टि से ऐसा करना किसी तरह कुछ अंश में ठीक है परन्तु स्वस्थ के लिये ऐसा न करें | मांसं स्वभावतो वृष्यं स्नेहनं बलवर्द्धनम् ॥ ३५४ ॥
स्नेहगोरसधाम्याम्ल फलाम्लकटुकैः सह ।
सिद्धं मांसं हितं बल्यं रोचनं बृंहणं गुरु ॥ ३५५ ॥
तदेव गोरसादानं सुरभिद्रव्यसंस्कृतम् ।
विद्यात्पित्तकफोद्रेकि बलमांसाग्निवर्द्धनम् ॥ ३५६ ॥
परिशुष्कं स्थिरं स्निग्धं हर्षणं प्रीणनं गुरु ।
रोचनं बलमेधाग्निमांसौजः शुक्रवर्द्धनम् ॥ ३५७ ॥
मांस - स्वभाव से ही वृष्य, स्नेहकारक तथा वलवर्द्धक होता है फिर उसे तैल - घृत आदि स्निग्ध पदार्थ, तक्रादि गोरस, काक्षी धान्याम्ल, दाडिमादि फलाम्ल तथा मरिचादि पदार्थों के साथ सिद्ध या संस्कृत कर देने से वह मांस हितकर, चलवर्द्धक, रुचिजनक, बृंहण और गुरुपाकी हो जाता है । वही मांस दही, छाछ आदि गोरस के मिलाने से तथा हिडु - मरि-चादि सुगन्धित द्रव्यों से सस्कृत कर देने से पित्त और कफ | का प्रकोपक तथा शरीर के बल, मांस और पाचकामि वर्द्धक हो जाता है । सूखा हुआ मांस- शरीर की स्थिरता का जनक, स्निग्ध, हर्पकर, तृप्तिकर, पचने में भारी, रोचक, वलकर, बुद्धिवर्द्धक, अग्निदीपक तथा भोज और शुक्र का वर्द्धक | होता है ॥ ३५४-३५७ ॥ विमर्श: - मांस के साथ दुग्ध सेवन वर्जित होने से गोरस से दधि - तक्रादि ही लेवें । शाकान्हपलपिण्याककुलस्थलवणामिपे. । करोरदधिमाषैश्च प्रायः क्षीर विरुद्धयते ॥ तथा ' गोरसो दधि तक्रञ्चे ' ति हेमकोप । परिशुष्क मांस - सिक्त बहुष्टते भृष्ट मुदुरुष्णाम्बुना मृदु । जीरकाद्यैर्धन मासं परिशुष्कं तदुच्यते ॥
तदेवोल्लुप्तपिष्टत्वादुल्लुप्तमिति पाचकाः ।
परिशुष्कगुणैर्युक्तं वह्नौ पक्कमतो लघु ॥ ३५८ ॥
तदेव शूलिकाप्रोतमङ्गारपरिपाचितम् ।
ज्ञेयं गुरुतरं किञ्चित् प्रदिग्ध गुरुपाकतः ॥ ३५६ ॥
उल्लुप्तं भर्जितं पिष्टं प्रतप्तं कन्दुपचितम् ।
परिशुष्कं प्रदग्धं च शूल्यं यच्चान्यदीदृशम् ॥ ३६० ॥
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२१२ सुश्रुतसहिता ।
मांसं यत्तैलसिद्धं तद्वीर्योष्णं पित्तकृद् गुरु ।
लघ्वग्निदीपनं हृद्यं रुच्यं दृष्टिप्रसादनम् ॥ ३६१ ॥।
अनुष्णवीर्य पित्तघ्नं मनोज्ञं घृतसाधितम् || ३६२ || -उस सूखे मांस को प्रथम खूब कूट कर ( उल्लुप्त मतिच्छिन्न पश्चात्पिष्ट तस्य भाव उल्लुप्तपिष्टत्वम् ) पश्चात् खूब पीस कर पिष्ट सा बनाने से सूपकार उसे ' उल्लुप्त ' कहते हैं तथा यह परिशुष्क मांस के गुणों वाला हो जाता है । इसी को वह्नि में पका । लेने से उससे भी लघु हो जाता है । इसी मांस को शूलिक ( लोह - शलाका ) पर लगा कर कोयले की अग्नि पर पका लेने से कुछ भारी हो जाता है । इसी को स्नेहधान्याम्ल तक्रादि से प्रदिग्ध कर देने पर विपाक में गुरु हो जाता है । उल्लुप्त, भर्जित, पिष्ट, प्रतप्त, कन्दुपाचित, परिशुष्क, प्रदिग्ध, शूल्य तथा इसी प्रकार से बनाया अन्यविध मांस एवं जो तैल में सिद्ध किया हुआ हो वह मांस- उष्णवीर्य, पित्तजनक और गुरु होता है तथा घृत से साधित मांस पचने में लघु, पाचकाग्नि दीपक, हृद्य, रोचक, दृष्टिप्रसादक, अनुष्णवीर्य, पित्तनाशक और मनोज्ञ ( चित्तप्रिय ) होता है ॥३५८-३६२ ॥ विमर्शः —— भर्जितादीना लक्षणन्— ' भर्तित स्याद् घृतादौ तु पिष्ट्वा यत्साधित पुन । अपूपादिकृत पिष्ट दधिटाडिनसौरमै । सिद्ध सान्यैस्तथाऽनाजीसामुद्रमरिचैरपि । अङ्गारादिषु यत्पक्व प्रतप्त तदु-दाहृतम् ॥ पिशित सौरभैलिप्स कन्दुपक्व मधुप्रभम् । राजिकाकल्क लिप्त च कन्दुपचितमुच्यते ॥ ' परिशुष्कमुक्तम् । ' तदेव गोरसादान प्रदि-ग्धमिति विश्रुतम् ' इति परिशुष्कलक्षणस्याग्रे वोध्यम् । ' हिट्गूद के परिक्षिप्तशूले निप्पीडित तेत. । सिक्त्वा सिक्त्वाऽम्बुधाराभिर्विधूमेऽनौ
प्रनापयेत् ॥ फलाम्लेनापि यत्पक्व शूल्य तत्सौरभान्वितम् ॥ इति ।
प्रीणनः प्राणजननः श्वासकासक्षयापहः ॥ ३६३ ॥
वातपित्तश्रमहरो हृद्यो मांसरसः स्मृतः ।
स्मृत्योजःस्वरहीनानां नरक्षीणक्षतोरसाम् ॥ ३६४ ॥
भग्नविश्लिष्टसन्धीनां कृशानामल्परेतसाम् ।
आप्यायनः संहननः शुक्रदो बलवर्द्धनः ।
स दाडिमयुतो वृष्यः संस्कृतो दोपनाशनः ॥ ३६५ ॥
मांसरस --तृप्तिकारक, प्राणननक, श्वास, कास, क्षय, वात, पित्त और थकावट का नाशक तथा हृद्य होता है एवं स्मृति, ओज तथा स्वर से हीन, ज्वर से क्षीण, चतयुक्त छातीवाले, अस्थिभग्न तथा सन्धिविश्लेपयुक्त, दुर्बल, अल्पवीर्य वाले ऐसे मनुष्यों के लिये हितकर तथा आप्यायन ( न्यूनता का पूरक ), संहनन ( शरीर - ढाढर्थकारक ), वीर्यजनक तथा बल-वर्द्धक होता है । उसी मांसरस में दाडिम ( अनार ) का रस · मिला कर कटुक्रादि तथा सुगन्धित द्रव्यों ( मसाल ) से संस्कृत कर दिया जाय तो हृप्य तथा दोपनाशक हो उबले हुये मांस का संस्कृत किया हुआ स्वच्छ रस होता है । अल्प रक्त वाले तथा क्षय के रोगियों में अच्छा लाभ करता है ।
यन्मांसमुद्धृतरसं न तत् पुष्टिबलावहम् ।
विष्टम्भि दुर्जरं रूक्षं विरसं मारुतावहम् ॥ ३६७ ॥
जिस मांस को उबाल कर रस निकाल लिया. हो वह पुष्टि और बल देने घाला नहीं होता है तथा विष्टम्भकारक, पचने में कठोर, रूप, रसहीन तथा वातवर्द्धक होता है ॥ ३६७ ॥
दीप्ताग्नीनां सदा पध्यः खानिष्कस्तु परं गुरुः ॥३६८ ॥
खानिष्क ( पीसा हुआ सूखा मांस ) - दीस अभिवालों के लिये सदा पथ्यकारक तथा पचने में भारी होता है ॥ ३६८ ॥
मांसं निरस्थि सुविन्नं पुनर्हषदि पेपितम् । -पिप्पलीशुण्ठिमरिचगुडसर्पिः समन्वितम् ॥ ३६६ ॥
ऐकध्यं पाचयेत्सम्यग वैसवार इति स्मृतः ।
वेसवारो गुरुः स्निग्घो बल्यो वातरुजापहः ॥ ३७० ॥
वेसवार - मांस को निरस्थि ( अस्थिरहित ) करके उबाल कर पुनः पत्थर ( सील ) पर पीस कर उसमें पीपल, सौंठ, काली मरिच, गुड तथा घृत उचित प्रमाण में मिला कर चुक पात्र में ठीक तरह से पका लेवे । इसे ' बेसवार ' कहते हैं ।, वैसवार - पचने में भारी, स्निग्ध, बलवर्द्धक तथा वात रोगों को नष्ट करता है ॥ ३६ ९ -३७० ॥? विमर्शः — सवारलक्षणम् -'अनस्थि पिशित पिष्ट स्विन्न | गुडष्टतान्त्रितम् । कृष्णामरिचसयुक्त वैसवार इति स्मृत ' || आत्रेयस्तु-' चित्रकं पिपलीमूल पिप्पलीच व्यनागरम् । धान्याकं रजनीश्वेततण्डु लाश्च समाशका 1 वेसवार इति ख्यात शाकादिषु नियोजयेत् ॥ ' इति ।
कन्नो दीपनो हृद्यः शुद्धानां व्रणिनामपि ।
- ज्ञेयः पध्यतमञ्चैव मुद्रयूपः कृताकृतः ॥ ३७१ ॥
कृत ( मसालों द्वारा संस्कृत ) तथा अकृत ( असंस्कृत ) मुद्गयूप - कफनाशक, अभिदीपक तथा हृद्य होता है एवं वमन-विरेचनादि से शुद्ध हुये मनुष्य तथा प्रणियों के लिये अत्यन्त पथ्य होता है ॥ ३७१ ॥-विमर्शः -- यूपः -- अष्टादशगुणे नीरे शिम्बीधान्यशृनो रसः ।
विरलान्नो धन. किञ्चित पेयातो यूप उच्यते ॥ ( भाव प्र ० ) ।
स तु दाडिममृद्वीकायुक्तः स्याद्रागखाडवः ।
रुचिष्यो लघुपाकश्च दोषाणां चाविरोधकृत् ॥ ३७२ ॥
यूप में अनार का रस तथा पीसे हुये मुनक्के का र । या कल्क मिला दिया जाय तो उसे ' रागपाडव ' कहते हैं । यह रोचक, पाक में लघु तथा वातादि दोषों का परस्पर अविरोधी जाते है ३६३-३६५ होता है ॥ २७२ ॥
प्रीणनः सर्वभूतानां विशेपान्मुखशोषिणाम् ।
क्षुत्तृष्णापहर: श्रेष्ठः सौरावः स्वादुशीतलः ॥ ३६६ ॥
सौराव ( शोरवा ) - सर्व प्राणियों के लिये तृप्तिकारक, तथा विशेषकर मुसशोपियों के लिये हितकर, क्षुधा और प्यास को नष्ट करने वाला, उत्तम स्वादु और शीतल होता है ॥ ३६६ ॥
विमर्शः - शोरवा - कफघ्न, दीपन तथा हय होता है । यह विमर्शः -- अन्योऽपि रागखाडव - आममान त्वचाद्दीन द्विवि खण्डित तत । ' सुपक्व च समुत्तार्य मरिचैवेन्दुवासितम् । स्थापित खिग्धमृद्भाण्डे रागसाहवसचितः ॥ अपि च- ' कथिनं तु गुडो-पेत सहकारफल नवम् । तैलनागरसयुक्त विशेयो रागसाडवः ॥ इति वोध्यः । । मसूरमुद्गगोधूमकुलत्थलवणैः कृतः । ·
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श्रध्यायः ४६ ] सूत्रस्थानम् । २१३
कफपित्ताविरोधी स्वाद्वातव्याधौ च शस्यते ॥ ३७३ ॥
कदाडिमैर्युक्तः स चाप्युक्तोऽनिलार्दिते ।
रोचनो दीपनो हृद्यो लघुपाक्युपदिश्यते ॥ ३७४ ॥
मसूर, मूंग, गेहूँ और कुल्थी इनका पृथक् पृथक् बनाया हुना लवणयुक्त यूप - कफ तथा पित्त का अविरोधी तथा वात-व्याधि में श्रेष्ठ होता है 1 । इन्हीं यूपों में यदि क्सिमिस का रस या कल्क तथा अनार का रस मिला दिया जाय तो वात रोगों से अर्दित ( पीडित ) रोगी के लिये हितकर होता है तथा रोचक, अग्निदीपक, हृद्य और पचने में हल्का होता है ॥
पटोलनिम्बयूपौ तु कफमेदोविशोषिणौ ।
पित्तन्नौ दीपनी हृद्यौ कृमिकुष्टज्वरापह ॥ ३७५ ॥
पटोल तथा निम्त्र का यूप - कफ और मेदा का शोषण करते हैं तथा पिचनाशक, अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकारी एवं कृमि, कुष्ठ तथा ज्वर के नाशक हैं ॥ ३७५ ॥
श्वासकासप्रतिश्यायप्रसेकारोचकज्वरान् ।
हन्ति मूलकयूपस्तु कफमेदोगलामयान् ॥ ३७६ ॥
मूली का यूप - श्वास, काम, प्रतिश्याय, ठाठादि का स्राव, अरुचि, ज्वर, कफरोग, मेदोरोग तथा गले के रोगों को नष्ट करता है || ३७६ ॥ कुलत्ययूपोऽनिलहा श्वासपीनसनाशनः तूणीप्रभूणी कासार्शी गुल्मोदावर्त्तनाशनः ॥ कुलयी का यूप - वातनाशक, श्वास तथा नाशक एवं तूगी, प्रतितूणी, कास, अर्ज, गुल्म का नाशक है ॥ ३७७ ॥
। ३७७ ॥ -पीनस रोग का तथा उदावतं j विमर्शः-- नूगी प्रभूणी च वातरोग । तत्र तूणी - प्रतूणी - लक्षण वक्ष्यति निदाने -'अधो या वेदना याति वर्चोमूत्राशयत्थिता | मिन्द-तीव गुदोपस्थं सा तूणीत्युपदिव्यते । शुद्रोपस्योत्थिता सैव प्रतिलोम
विसर्पिणी । वेगेः पकाशय यानि प्रतितृणीति सा स्मृता ॥ ' इति ।
दाडिमामलकैर्नृपो हृद्यः संशमनो लघुः ॥ ३७८ ॥
प्राणाग्निजननो मूर्च्छामेदोव्नः पित्तवातजित् ।
मुद्रामलकयूषस्तु माही पित्तकफे हितः ॥ ३७६ ॥
यवकोलकुलत्थानां ग्रूपः कन्योऽनिलापहः ।
सर्वधान्यकृतस्तद्वद् वृंहणः प्राणवर्द्धनः ॥ ३८० ॥
अनार तथा आंवलों के साथ बनाया हुआ मुनादि का यूप - हृद्य, दोषों का संशामक, पचने में हल्का, प्राण तथा पाचकानि का जनक एवं मूर्च्छा, मेदोरोग, पित्तरोग तथा वातरोगनाशक होता है । मृग - आंवले का यूष - दस्त को बांधने वाला तथा पित्त और कफ के रोग में हितकारी होता है । जौ, कोट ( यदर ) तथा कुल्पी इनका संयुक्त या पृथक् पृथक बनाया हुआ यूपॠण्ठ के लिये हितकारी तथा बात रोगों का नाशक है । उसी प्रकार सर्व प्रकार धान्यों से बनाया हुआ यूपण तथा प्राण शक्ति का चर्द्धक होता है ॥
खडकाम्बलिकौ हृद्यो तथा वातकफे हितौ ।
बल्यः कफानिलो हन्ति दाडिमाम्लोऽभिदीपनः ॥ ३८१ ॥
दध्यम्लः कफकृद्वल्यः स्निग्धो वातहरो गुरुः ।
तक्राम्लः पित्तकृत् प्रोक्तो विपरक्तप्रदूषणः ॥ ३८२ ॥
सढ और काम्बलिक यूप - हृद्य तथा वात और कफ के । रोगों में हितकर होते हैं । दाडिम के रस से खट्टा किया हुआ यूष- बलवर्द्धक तथा कफ और बात का नाशक होता है तथा अभि को दीप्त करता है । दही से खट्टा किया हुआ यूप - कफ-कारक, बलवर्द्धक, स्निग्ध, वात का नाशक तथा पचने में । भारी होता है । छाछ से सहा किया हुआ ग्रूप - पित्त का जनक तथा विप और रक्त का प्रकोपक होता है ॥ ३८१-३८२ ॥ विमर्श: - सटकान्वलिको यूपविशेषी । तत्र खटो द्विविध.-सतक्रशनीधान्य. सतकशाकश्च । तदुक्तम्- ' सनक्राणि शमीधान्यानि स्निग्धानि सग्राहकाणि सलानि ' इति । टटयोरभेदात् ' खल ' ' सट ' इति पर्यायी । सतकशाकस्तु - ' कपित्थतक्रचाङ्गेरी मरिचाजा-जिचित्रके । are s यूयोऽयमय काम्बल्किोऽपरः । दध्यम्ल-लवणस्नेद्दतिलमापुसमन्वित ' ॥ नल - ' तिल सुलुचित कृत्वा पिष्टं क्षीरे व्यहोपितम् | पंटे पूत पचेद्धीमानार्द्र कावापिते घृते ॥ मरिचा-जाजिसामुद्रैर्युक्त स्तिळखडो ' भवेत् ' | ' दधिमस्त्वन्त सिद्धस्तु यूपः काम्बलिकः स्मृत । पुनः सौवर्चलाजाजी वीजपूरकसीर मे । सयोज्य-मविनः स्वच्छ एव काम्बलिको भवेत् ॥ ' इति ।
खडाः खडयवाग्वच पाडवा: पानकानि च ।
एवमादीनि चान्यानि क्रियन्ते वैद्यवाक्यतः ॥ ३८३ ॥
अस्नेहलवणं सर्वमकृतं कटुकैर्विना ।
विज्ञेयं लवणस्नेहकटुकैः संयुतं कृतम् ॥ ३८४ ॥
सडयूप, खढयवागू, पाढव, पानक प्रभृति पेय पदार्थ वैद्य के कथनानुसार बनाये जाते हैं । इन सबको यदि स्नेह तथा लवण और कटुक ( सोंठ, मरिचादि मसालों ) के बिना बनाये जांय तो उन्हें ' अकृत ' कहते हैं तथा लवण, स्नेह और कटुक से संस्कृत कर बनाये जांय तो ' कृत ' कहलाते हैं ॥ सहा ' पूर्वोक्तलक्षणा, खटयूपसिद्धा यवाग्वः सहयवाग्व, पाडवा. = मधुराम्लद्रव्यकृना, तल्लक्षणम् – ' स्पष्टथम्लमधुरोऽस्पष्ट-कपायलवणोषणाः । अतिक्ता पाडवा: कोलकुलत्थवदरेः कृताः ॥ ' इति कोलकपित्यवदरैरिति पाठान्तरम् । पानकानि = द्राक्षाऽम्लि • काऽऽदिकृतानि पेयानि, तलक्षणम् - ' द्राक्षामधूकरार्जूरकारमयं, सप-रूपका ' । तुल्याचे कल्पित पून शीन कर्पूरवासितम् ॥ पानक पञ्च-साराख्य दातृष्णा निवर्तकम् । त्रिजातमरिचाथैस्तु संस्कृता. पानका स्तथा ॥ ' इति ।
अथ गोरसघान्याम्लफलाम्लैरन्वितं च यत् ।
यथोत्तर लघु हितं संस्कृतासंस्कृतं रसम् ॥ ३८५ ॥
गोरस ( दही, छाछ ), धान्याम्ल ( काञ्जी ) तथा फलाग्ल इनके साथ मिलाया हुआ तथा मसालों से संस्कृत तथा असंस्कृत मांसरस यथोत्तर पचने में हलका तथा हितकारी होता है || ३८५ ॥
दधिमस्त्वम्ल सिद्धस्तु यूपः काम्बलिकः स्मृतः ।
तिलपिण्याकविकृति शुष्कशाक विरूढकम् ॥ ३८६ ॥
सिण्डाकी च गुरूणि स्युः कफपित्तकराणि च ।
तद्वच वटकान्याहुर्विदाहीनि गुरुणि च ॥ ३८७ ॥
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सुश्रुतसंहिता । ३१४ दही का पानी तथा अन्य खटाई से सिद्ध किया हुआ द्रव्यसंयोगसंस्कारं ज्ञात्वा मात्रां च सर्वतः । यूप ' लिक ' कहलाता है । तिलों की खल के बने अनेक पानकानां यथायोगं गुरुलाघवमादिशेत् || ३६६ ॥ पदार्थ, शुष्कशाक, अधिक अङ्कुरित धान्य और सिण्डाकी- इति कृतान्नवर्गः । ये सब पचने में भारी तथा कफ और पित्त को पैदा करते हैं । चटक ( बड़े ) भी सिण्डाकी के समान ही होते हैं । किन्तु गुड से बनाया हुआ पानक खटाई युक्त हो अथवा खटाई विशेषतया विदाहजनक और गुरु होते हैं ॥ ३८६-३८७ ॥ रहित हो- पचने में भारी तथा मूत्रजनक होता है । उसी लघवो वृंहणा वृष्या हृद्या रोचनदीपनाः । गुड़ के पानक में खण्ड ( मिश्री ), किसमिस, शक्कर, अम्ल-रागषाडवाः ॥ ३८८ ॥ द्रव्य तथा मरिचादि तीक्ष्ण द्रव्य और हिम ( कर्पूर ) मिला
तृष्णामूर्च्छा भ्रमच्छर्दिश्रमन्ना | देने पर दोपरहित ( निरत्यय ) हो जाता है । मृद्वीका रसाला वृंहणी बल्या स्निग्धा वृष्या च रोचनी । ( किसमिस, मुनक्का या अहूर ) का पानक - थकावट को दूर स्नेहनं गुडसंयुक्तं हृद्यं दध्यनिलापहम् ॥ ३८ ९ ॥ करने वाला तथा मूर्च्छा, दोह और तृपा का नाशक होता रागपाढव - पचने में लघु, वलजनक, नृप्य, हृद्य, रोचक है । फालसे तथा वेरों का पानक- हृद्य तथा विष्टम्भजनक पाचकाग्निदीपक होते हैं तथा प्यास, मूर्च्छा, श्रम, वमन और थकावट को नष्ट करते हैं । रसाला - बृंहणी, बलकरी, स्निग्ध, वृप्य तथा रुचिकरी होती है । गुड मिश्रित दुही - शरीर में स्नेहन करने वाला, हृद्य तथा वातनाशक होता है ॥ ३८८-३८९ ॥ विमर्श: - राग. - ' सितारुचकसिन्धूत्यै सवृक्षा म्लपरूपके ' । जम्बू-फलरसंयुक्तो रागो राजिकया कृत ॥ इति । रसाला = शिखरिणी, तल्लक्षणम् -'सचतुर्जातकाजा जिस सितार्द्रकनागरम् । रसाला स्था-च्छिखरिणी सघृष्ट ससर दधि ' ॥ अपि च- ' अर्धाढक सुचिरपर्यु-पितस्य दन ' - सण्टस्य पोटशपलानि शशिप्रभस्य । सर्पि. पल मधु -पल मरिचं द्विकप - शुण्ठपा पलार्धमपि चार्धपल विडस्य || सूक्ष्मे पटे सुविमले मृदुपाणिघृष्टा कर्पूरधूलिसुरभीकृनमानसस्था । एपा वृकोदरकृना सरसा रसाला इति ' ।
' सक्तत्रः सर्पिपाऽभ्यक्ताः शीतवारिपरिप्लुताः ।
नातिद्रवा नातिसान्द्रा मन्थ इत्युपदिश्यते ॥ ३६० ॥
मन्थः सद्योबलकरः पिपासाश्रमनाशनः ।. साम्लस्नेहगुढो मूत्रकृच्छोदावर्त्तनाशनः ॥ ३ ९ १ ॥ शर्करेक्षुरसद्राक्षायुक्तः पित्तविकारनुत् ।
द्राक्षामधूकसंयुक्तः कफरोगनिबर्हणः ।
वर्गत्रयेणोपहितो मलदोपानुलोमनः ॥ ३६२ ॥
घृत मिटाये हुये तथा ठंढे पानी से भिंगोये ( साने ) हुये, न अधिक तथा न अधिक गाढ़े ऐसे सत्तुओं को ' मन्थ ' कहते हैं । मन्य— तुरन्त बलवर्द्धक एवं पिपासा तथा थकान का नाशक होता है । खटाई, स्नेह तथा गुड़ से युक्त मंथ - मूत्रकृच्छ्र और उदावर्त्त को नष्ट करता है । शर्करा, ऊख का रस तथा द्वाता से युक्त मन्थ - पित्तविकार को नष्ट करता है । द्वाचा तथा महुए के पुष्पों से युक्त मन्थ- कफरोग को नष्ट करता है । इन तीन ( साम्ल स्नेह गुढ शर्करेचुरस द्वाचा, द्वाचा, मधूक ) से युक्त मंथ - मल तथा दोषों का अनु-छोमन करता है । ३ ९०-३९ २ ॥ } गौडमम्लमनम्लं वा पानकं गुरु मूत्रलम् ॥ ३६३ ॥
तदेव खण्डमृद्वीका शर्करासहितं पुनः ।
साम्लं सतीच्णं सहिमं पानकं स्यान्निरत्ययम् ॥ २६४ ॥
मार्दीक तु श्रमहरं मूर्च्छादा हपापहम् ।
परूपकाणां कोलानां हृद्यं विष्टम्भि पानकम् ॥ ३६५ ॥
होता है । भिन्न भिन्न प्रकार के द्रव्यों के संयोग तथा संस्कारों का विचार कर पानकों की मात्रा तथा यथायोग्य गुरु और लघु का ज्ञान करना चाहिये ॥ ३ ९३–३९ ६ ॥
अथ भक्ष्यवर्ग. ।
वक्ष्याम्यतः परं भक्ष्यान् रसवीर्यविपाकतः ॥ ३६७ ॥
1 अब इसके अनन्तर रस, वीर्य और विपाक की दृष्टि से लड्डू आदि भचय पदार्थों का वर्णन करते हैं ॥ ३ ९ ७ ॥ 1
भक्ष्याः क्षीरकृता बल्या वृष्या हृद्याः सुगन्धिनः ।
दाहिनः पुष्टिकरा दीपनाः पित्तनाशनाः ॥ ३६८ ॥
तेषां प्राणकरा हृद्या घृतपूराः कफावहाः ।
वातपित्तहरा वृष्या गुरवो रक्तमांसलाः ॥ ३६ ९ ॥
' क्षीर ( दुग्ध ) से बनाये हुये ( खोये के लड्डू ) पदार्थ --| बलवर्द्धक, वृप्य, हृद्य, सुगन्धित, दाह नहीं करने वाले, शरीरपुष्टिकर, पाचकाग्निदीपक तथा पित्तनाशक होते हैं । इनमें से घृतपूर ( घेवर ) - प्राणशक्ति ( वायटेलिटी ) को बढ़ाने वाले, हृद्य, कफजनक, वातपित्तनाशक, वृष्य, पचने में भारी तथा रक्त और मांस के वर्द्धक होते हैं ॥ ३ ९८-३९९ ॥ विमर्श: - घृतपूरा.: = ' घेवर ' इति ख्याता । तल्लक्षणम् -' मर्दिता समिता क्षीरनारिकेर सितादिभि । अवगाझ घृते पक्को घृत-पूरोऽयमुच्यते ॥ समिता = गोधूमचूर्णम् । प्र॒कारान्तरम् — गॊधूम-चूर्ण सूक्ष्म च स्वच्छ तस्मिन् धृत क्षिपेत् । यावन्तत् पिण्डता गच्छेत् पश्चादुग्धे विमर्दयेत् । फेनयित्वा द्रवीभूते त सशब्देापात् । यावच्च व्याप्य तत्पात्र प्रसरेद घृतपूरक ' । यत्किञ्चित्तान्नता याते खण्डपक्के निमज्जयेत् ॥'इति ।
हा गौडा भया गुरवोऽनिलनाशनाः ।
अदाहिनः पित्तहराः शुक्रलाः कफवर्द्धनाः ॥ ४०० ॥
से बनाये हुए भय ( मालपुए, गुलगुले आदि ) पदार्थ - बृंहण, पचने में भारी, वातनाशक, अविदाही, पित्त-नाशक तथा शुक्र और कफ के वर्द्धक होते हैं ॥ ४०० ॥
मधुमस्तकसंयावाः पूपा ये ते विशेषतः ।
गुरवो वृंहणाचैव मोदकास्तु सुदुर्जराः ॥ १०१ ॥
मधुमस्तक ( मधुशीर्षक ), संयाव ( हलुवा ) तथा धूप | ( मालपुए ) ये पदार्थ विशेषतया पचने में भारी तथा बृंहण
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श्रध्यायः ४६ ] सूत्रस्थानम् । २१५ होते हैं एवं मोदक ( बेसन, आटे, मूंग के लड्डू ) -- पचने में कठिन होते हैं ॥ ४०१ ॥
विमर्शः —– ' समिता वेष्टिता मध्ये मधु दत्त्वा शृता घृते । मधु मस्तकमुद्दिष्टम् ' । अपि च- ' मधुलनेमध्ये वेष्टिताः समिताश्च याः । मधुमस्तकमुद्दिष्ट तस्याख्या परिमार्जनम् ॥ ' इति । मधुमस्तका एव मधुशीर्षका उच्यन्ते इति ढल्दण । तत्र मधुशीर्षकलक्षणमाह : -- विमर्च समिताचूर्णं नृदुपाक गुठान्वितम् । घृतावगा गुडिका वृत्तां त्वां सकेशरान् ॥ सौगन्धिकाधिवासा च कुर्यात्पूपलिका युधः । स एव सण्टसयाव सिताम्रानमपूरित । मातुद्रत्वचा चैव वैष्टिनो मधुशीर्षक ॥ ' इति । संयाय - सयावस्तु घृतक्षीरगुडगोधूम पाकजः ' | ' समिता घृतदुग्धेन मोदयित्वा सुशोभनाम् । पचेद् घृतो-तरे सण्डे क्षिपेद् भाण्डे नवे ततः । सयावोऽसौ युनभ्रूण, सण्डेला. मरिचार्द्रः ॥ इति ।
रोचनो दीपनः स्वर्यः पित्तन्नः पवनापहः ।
गुरुर्मृष्टतमश्चैव सदृकः प्राणवर्द्धनः ॥ ४०२ ॥
सक ( श्रीखण्ड समान पदार्थ ) रोचक, दीपक, स्वर-वर्द्धक, पित्तशामक, वातनाशक, पचने में भारी, अत्यन्त मीठा ( मृष्टतम ) और प्राणशक्तिका वर्द्धक होता है ॥ ४०२ ॥
विमर्श: - सहकलक्षणम् - लवद्गत्र्योपखण्डैस्तु दधि निर्मथ्य गालितम् । पक्वं दाठिमसयुक्त चन्द्रचूर्णावचूर्णितम् ॥ सदृक पाचका आहुः ।
यः सुगन्धिर्मधुरः स्निग्धः कफकरो गुरुः ।
वातापहस्तृप्तिकरो बल्यो विष्यन्दनः स्मृतः ॥ ४०३ ॥
विप्यन्दन- हृद्य, सुगन्धित, मधुर, स्निग्ध, कफजनक, पचने में भारी, वातनाशक, तृप्तिकारक तथा मलबर्द्धक होता है ॥ ४०३ ॥
विमर्शः - विप्यन्दनपरिचयः -- आमगोधूमचूर्णच सर्पि क्षीर-गुडान्वितम् । नातिसान्द्रो नातिघनो विष्यन्दो नाम नामतः ॥
बृंहणा वातपित्तघ्ना भच्या बल्यास्तु सामिताः ।
हृद्याः पथ्यतमास्तेषां लघवः फेनकादयः ॥ ४०४ ॥
सामित ( गेहूं के पिष्टके बने सर्व पदार्थ ) - शरीर पुष्टि -कर, वातपित्तनाशक, बलवर्द्धक, हृद्य तथा अतीव पथ्यकारक होते हैं । उनमें फेनक ( फीणी ) आदि पदार्थ अधिक हलके होते हैं ॥ ४०४ ॥
विमर्श: - फेनका – विमर्थ विमला शुका समिता नाति-शर्कराम् । सवेष्टनाय गर्भार्थं सरपाकं घृते पचेत् । फेनक फेनस-काशं सम्पूर्णशशिसन्निभम् ॥ ' इति ।
मुद्रा दिवेसवाराणां पूर्णा विष्टम्भिनो मताः ।
वेसवारैः सपिशितैः सम्पूर्णा गुरुवृौंहणाः ॥ ४०५ ॥
मुद्रादि सवार से भरे हुये सामित - विष्टम्भजनक होते हैं । मांसादि बेसवार से भरे हुये सामित - भारी तथा शरीर करती है ॥ ४०५ ॥ 1
पाललाः श्लेष्मजननाः, शष्कुल्यः कफपित्तलाः । वीणा: पैष्टिका भक्ष्याः कफपित्तप्रकोपणाः । " 1 - विदाहिनो नातिबला गुरवश्च विशेषतः ॥ ४०६ ॥ -पलल ( तिल चूर्ण ) से बने हुये पदार्थ ( पलल ) -कफ-जनक होते हैं तथा शष्कुली ( पूढियां ) - कफ और पित्त
उत्पन्न करती हैं । पिष्टक ( तण्डुल चूर्ण ) से बने पदार्थ ( पैष्टिक ) - उष्णवीर्य, कफपित्तप्रकोपक, विदाहकारक, अधिक चल नहीं देने वाले तथा विशेषकर पचने में भारी होते हैं ॥ ४०६ ॥
। वैदला लघवो भक्ष्याः कपायाः सृष्टमारुताः ॥ ४०७ ॥
विष्टम्भिनः पित्तसमाः श्लेष्मन्ना भिन्नवर्चसः ।
बल्या. वृष्यास्तु गुरवो विज्ञेया मापसाधिताः ॥ ४०८ ॥
दालों ( द्विदल धान्यों ) के भच्य पदार्थ - पचने में हलके, रस में कपाय, वातजनक, विष्टम्भकारक, पित्त को समान रखने वाले, कफनाशक तथा मल का भेदन करने वाले होते हैं । माप ( उड़द ) से बनाये हुये भक्ष्य पदार्थ -- बलवर्द्धक, वृष्य और पचने में भारी होते हैं ॥ ४०७-४०८ ॥
कूर्चिकाविकृता भक्ष्या गुरवो नाविपित्तलाः ।
विरूढककृता भच्या गुरवोऽनिलपित्तलाः ॥ ४०६ ॥
विदाहोत्क्लेशजनना रूत्ता दृष्टिप्रदूषणाः ।
हृद्याः सुगन्धिनो भया लघवो घृतपाचिताः ॥ ४१० ॥
वातपित्तहरा बल्या वर्णदृष्टिप्रसादनाः ।
विदाहिनस्तै कृता गुरवः कटुपाकिनः ॥ ४११ ॥
कूर्चिका ( दुग्ध के फटे हुए घन भाग ) से बने हुये ( गुलाब जामुन, रसगुल्ले आदि ) पदार्थ -- पचने में भारी । तथा अधिक पित्तजनक नहीं होते हैं । विरुढ ( अङ्कुरित ) धान्यों को पीसकर उनसे बनाये हुये भच्य पदार्थ - पचने में भारी, वातपित्तवर्द्धक, विदाह तथा उत्क्लेश पैदा करने वाले, | तथा दृष्टिदूपक होते हैं । घी में बनाये हुये भच्य पदार्थ-हथ, सुगन्धित, पचने में हलके, वातपित्तनाशक, बलवर्द्धक । तथा शरीर के रंग और दृष्टि के प्रसादक होते हैं । तैल से बनाये हुये भच्य पदार्थ - विदाहजनक, पचने में भारी, विपाक में कटु तथा गरम होते हैं एवं वायुनाशक तथा दृष्टिदूषक, पित्तजनक तथा त्वचा के दूषक होते हैं ॥ ४० ९ –४११ ॥ उष्णा मारुतदृष्टिघ्नाः पित्तलास्त्वक्प्रदूषणाः ॥ ४१२ ॥
फलमांसेक्षुविकृतितिलमापोपसंस्कृताः ।
भया बल्याश्च गुरवो बृंहणा हृदयप्रियाः ॥ ४१३ ॥
कपालाङ्गारपक्कास्तु लघवो वातकोपनाः ।
सुप वास्तवश्चैव भूयिष्ठं लघवो मताः ॥ ४१४ ॥
फलवर्ग, मांसवर्ग, इक्षुविकार तथा तिल, माप ( उड़द ) आदि डाल कर बनाये हुये भक्ष्य पदार्थ -- बलजनक, पचने में भारी, शरीर- पुष्टिकर तथा हृदय को प्रिय लगने वाले होते हैं । कपाल ( मिट्टी के ठीकरे ) या तवे पर बनाये हुये पदार्थ- पचने में लघु तथा वायुकोपक होते हैं । यदि ये ही पदार्थ खूब पके हुये तथा पापड़ के समान पतले हों तो पचने
में अत्यन्त हलके होते हैं ॥। ४१३ - ४१४ ॥
सकिलाटादयो भक्ष्या गुरवः कफवर्द्धनाः ।
कुल्माषा वातला रूक्षा गुरवो भिन्नवर्चसः ॥ ४१५ ॥
किला आदि से बनाये हुये भक्ष्य पदार्थ -- पचने में भारी
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सुश्रुतसंहिता । २१६ है । नूतन चावल - पचने में कठोर, रस होते हैं । कुल्माप - वायुकारक, रूच, गुरु तथा प्रमेह को होते नष्ट हैं करता तथा पुराने चावल - वृंहण, भग्न - संधानकारक तथा कफवर्द्धक में मधुर मल के प्रवर्तक होते हैं ॥ ४१५ ॥ और प्रमेहनाशक होते हैं ॥ ४२२ ॥
विमर्श: -- किलाटलक्षणम् - नष्टदुग्धस्य पक्वस्य पिण्डः प्रोक्तः - अर्द्धसिन्नाश्च गोधूमा अन्ये च किलाटकः । कुल्मापलक्षणम् चणकादय । कुल्मापा इति कथ्यन्ते ।
उदावर्त्तहरो वाट्यः कार्सपीनसमेहनुत् ।
लघवः कफमेदोविशोषणाः ॥ ४१६ ॥
धानोलुम्बास्तु भूने हुये यवादि से बनाया हुआ वाट्य - उदावर्त, कास, पीनंस तथा प्रमेह को नष्ट करता है । धान ( भूने हुये जी ) उलुम्ब ( अग्निपक चने = होरा ) - पचने में हलके तथा तथा और मेदोवृद्धि का शोषण करते हैं ॥ ४१६ ॥
कफ
सक्तत्रो बृहणा वृष्यास्तृष्णापित्तकफापहा ' ।
पीताः सद्यो बलकरा भेदिनः पवनापहाः ॥ ४१७ ॥
गुर्वी पिण्डी खराऽत्यर्थं लघ्त्री सैव विपर्ययात् ।
मृदुत्वादवलेहिका ॥ ४१८ ॥
सक्तूनामाशु जीर्येत पानी में एक दिन भिंगो कर सुखा के ओखली में खाण्ड फ्रूट भाद में भुनाये हुये जौ, गेहूं, चने को चक्की में पीस बनाये हुये सत्तू - शरीर - पुष्टिकर और वृप्य होते हैं तथा कर प्यास, पित्त और कफ को नष्ट करते हैं । इन्हें पानी में घोल कर लवण - मरिच मिला के अथवा शर्करा मिला के पीने से तुरन्त बल को बढ़ाते हैं, कुछ दस्तावर होते हैं तथा वायु को । नष्ट करते है । सक्त की अत्यन्त कठिन पिण्डी- पचने में भारी तथा मुलायम पिण्डी - लघु होती है । सक्तू का अवलेह - मुलायम होने से शीघ्र ही हजम हो जाता है ॥ ४१७-४१८ ॥
' लाजाश्र्धतिसारना दीपनाः कफनाशनाः ।
बल्याः कषायमधुरा लघवस्तु एमलापहाः ॥ ४१६ ॥
तृट्छर्दिदाहघर्मार्त्तिनुदस्तत्सक्तवो मताः । रक्तपित्तहराश्चैव दाहज्वरविनाशनाः ॥ ४२० ॥.
द्रव्यसंयोगसंस्कारविकारान् समवेक्ष्य तु । भोक्तृणां छन्दतोऽपि वा । यथाकारणमासाद्य स्युस्तदा सुनिपुणो भिपक् । भक्ष्यादयः प्रकल्प्याः
द्रव्यसंयोगसंस्कारविकारान् समवेच्य तु ।
अनेकद्रव्य योनित्वाच्छास्त्रतस्तान् विनिर्दिशेत् ॥ ४२३ ॥
इति भक्ष्यवर्गः । अनेक प्रकार के भयादि द्रव्यों के संयोग, घृत तैल तथा मसालों से संस्कार तथा अनेक रूप में बनाये हुये विकार ( खाद्यपेयादि पदार्थ ) किंवा विकार अर्थात् रोग इन्हे भली-' भांति देखकर तथा रोग या नीरोग आदि अवस्था या दोष-प्रकोप का भी विचार कर तथा भोकाओं की इच्छा का भी ध्यान रख के उन अनेक द्रव्यों की योनि ( उत्पत्ति ) भिन्न-भिन्न होने से शास्त्र के अनुसार ही उनके गुण दोपों तथा सेवनं करने के तरीकों का वर्णन करना चाहिये ॥ ४२३ ॥
अतः सर्वानुपानान्युपदेक्ष्यामः ।
अम्लेन केचिद्विहता मनुष्या-माधुर्ययोगे प्रणयीभवन्ति ।
- तथाऽम्लयोगे मधुरेण तृप्ता-स्तेपां यथेष्टं प्रवदन्ति पथ्यम् ॥ ४२४ ॥
अब इसके अनन्तर सर्व अनुपानों का वर्णन करते हैं । अधिक खट्टे पदार्थों के खाने से उद्वेजित हुये मनुष्यों को | माधुर्य ( मीठे ) पदार्थों का सेवन कराने से प्रसन्न हो जाते हैं उसी तरह अधिक मधुर पदार्थों से अतितृप्त या घवदाये हुए मनुष्यों को अम्लपदार्थ खिलाने से प्रसन्न हो जाते हैं । इसी के लिये एक दूसरे से विभिन्न पढ् रसो धान की खीलें वमन तथा अतिसार को नष्ट करती हैं, तरह पथ्यरूप उन में मनुष्यों प्रयोग करना शास्त्रकार कहते हैं ॥ ४२४ ॥
पाचकानि को दीप्त करती हैं, कफ को नष्ट करती हैं, बल बढ़ाती हैं, रस में कृपाय तथा मधुर होती है पचने में हलकी शीतोष्णतोयासवमद्ययूष-तथा तृषाशामक और मलनाशक होती हैं । लाजों का सत्त फलाम्लधान्याम्लपयोरसानाम् । तृपा, वमन, दाह तथा धर्म ( धूप ) की अर्ति ( पीड़ालू यस्यानुपानं तु हितं भवेद्य-लगना ) को नष्ट करता है तथा रक्तपित्त, दाह और, ज्वर तस्मै प्रदेयं त्विह मात्रया तत् ॥ ४२५ ॥
नष्ट करता है ॥ ४१ ९ -४२० ॥ व्याधिं च कालं च विभाव्य धीरे-पृथुका गुरवः स्निग्धा बृंहणाः कफवर्द्धनाः । द्रव्याणि भोज्यानि च तानि तानि ।
बल्याः सक्षीरभावात्तु वातघ्न्ना'भिन्नवर्चसः ॥ ४२१ ॥ सर्वानुपानेषु वरं वदन्तिः ।
चिठठे - पचने में भारी, स्निग्ध, बृंहण, कफवर्द्धक तथा दम्भः शुचिभाजनस्थम् ॥ ४२६ ॥
बलवर्द्धक होते हैं । उन्हें दुग्ध में भिंगो कर शर्करा मिला के लोकस्य जन्मप्रभृति प्रशस्तं खाने से वे वातनाशक तथा दस्तावर होते हैं ॥ ४२१ ॥, तोयात्मकाः सर्वरसाश्च दृष्टाः ।
सन्धानकृपिष्टमा मं ताडुलं कृमिमेहनुत् | संक्षेप एषोऽभिहितोऽनुपाने - 1
सुदुर्जरः स्वादुरसो वृंहणस्तण्डुलो नवः । - ष्वतः परं विस्तरतो विधाये ॥ ४२७ ॥
सन्धानकृन्मेहहरः पुराणस्तण्डुलः स्मृतः ॥ ४२२ ॥ शीतल जल, उष्ण जल; आसव, मध, यूप, फलाल,
कच्चे चावलों का आटा - भग्नसंधानकर तथा कृमि और धान्यालम्ब ( कांजी ), दुग्ध, मॉसरस इनमें से जिसके लिये
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श्रध्यायः ४६ ] सूत्रस्थानम् । २१७ तो अनुपान उपयुक्त हो उसके लिये उस अनुपान को यथा-प्रमाण से देना चाहिये । धीर ( विद्वान् ) वैद्य रोग, समय, औषध द्रव्य, भिन्न भिन्न प्रकार के भोज्य द्रव्य इन सबका विचार करके उन भोज्यों का सेवन करावे । सर्व प्रकार के अनुपानों में अच्छे पवित्र पात्र में रखा हुआ आकाशीय ( आन्तरिक्ष ) जल श्रेष्ठ अनुपान है । बहुधा जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त यह आन्तरिक्ष जल प्रशस्त अनुपान है क्योंकि अन्य प्रकार के दाडिमादि रस भी जल स्वरूप ही होते हैं । इस प्रकार अनुपानों के विषय में यह संक्षेप से कहा है, इसके अनन्तर विस्तृत वर्णन करेंगे ॥ १२५-१२७ ॥ विमर्श ' —– अनुपानगुण ' —— दोषवद् गुरु वा मुक्तमतिमात्रमथापि वा । यथोकेनानुमानेन मुखमन्नं प्रतीति ॥
उष्णोदकानुपानं तु स्नेहानामथ शस्यते ।
ऋते भल्लातकस्नेहात् स्नेहात्तौवरकात्तया ॥ ४२८ ॥
अनुपानं वदन्त्येके तैले यूषाम्तकालिकम् ।
शीतोदकं माक्षिकस्य पिष्टान्नस्य च सर्वशः ॥ १२६ ॥
दधिपायसमद्यार्त्तिविषजुष्टे तथैव च ।
केचित् पिष्टमयस्याहुरनुपानं सुखोदकम् ॥ ४३० ॥
भल्लातक तैल तथा तुवरक तैल को छोड़ कर अन्य [ सर्व प्रकार के स्नेहों के सेवन के पश्चात् उष्ण जल का अनुपान करना प्रशस्त है 1 । कुछ आचार्य कहते हैं कि तैलों के सेवन यूप तथा अम्ल कांजी का अनुपान करना चाहिये | शहद तथा पिष्टान्न के भक्ष्य के सेवन के पश्चात् शीतल जल का अनुपान करना चाहिये । दही तथा दुग्ध, से बने पदार्थों ( पायस = खीर ) के सेवन के पश्चात् तथा मद्य की पीड़ा ( मदात्यय ) तथा विष खा लेने पर तथा पिष्ट के बने हुये पदार्थों के सेवन के पश्चात् सुखोदक ( मन्दोष्ण जल ) पीना चाहिये ऐसा कुछ लोग कहते हैं ॥ ४२८-१३० ॥
पयो मांसरसो वाऽपि शालिमुद्गादिभोजिनाम् ।
युद्धाध्यातपसन्तापविषमद्यरुजासु च ॥ ४३१ ॥
भाषादेरनुपानं तु घान्याम्लं दधिमस्तु वा ।
मद्ये मद्योचितानां तु सर्वमांसेषु पूजितम् ॥ ४३२ ॥
अमद्यपानामुदकं फलाम्लं वा प्रशस्यते ।
क्षीरं धर्माध्वभाप्यस्त्रीक्लान्तानाममृतोपमम् ॥ ४३३ ॥
सुरा कृशानां स्थूलानामनुपानं मधूदुकम् ।
निरामयानां चित्रं तु भुक्तमध्ये प्रकीर्त्तितम् ॥ १३ ॥
स्निग्धोष्णं मारुते पज्यं, कफे सतोष्णमिष्यते ।
अनुपानं हितं चापि पित्ते मधुरशीतलम् ॥। ४३५ ॥
हितं शोणितपिचिभ्यः क्षीरमिक्षुरसस्तथा ।
अर्कशेलुशिरीषाणामासवास्तु विपार्त्तिषु ॥ ४३६ ॥
शालि चावल तथा मुद्गादि खाने वालों के लिये तथा युद्ध । और रास्ते चलने से थके हुये मनुष्यों के लिये एवं धूप, अग्निसन्ताप, विप और मद्य से पीडित पुरुषों को दुग्ध अथवा | को मांस खाने पर मद्य का ही अनुपान श्रेष्ठ होता है किन्तु जो मद्यपान न करते हों उन्हें मांससेवन पर जल अथवा फलाम्ल ( खट्टे फलों का रस ) का अनुपान करावे । धूप, मार्ग में चलने, अधिक भाषण देने तथा अधिक स्त्री - सम्भोग | से क्लान्त ( थके हुये या मुझये हुए ) मनुष्यों को दुग्ध का अनुपान अमृत के समान हितकारी होता है | दुर्बल पुरुषों के लिये सुरा तथा स्थूलों के लिये शहद मिश्रित पानी का अनुपान श्रेष्ठ होता है । निरामय ( स्वस्थ ) मनुष्यों को भोजन के मध्य ( बीच ) में चित्र अर्थात् स्निग्धरूक्षोष्ण - मधुरादि अनेकविध अनुपान कराना चाहिये । वात रोग में स्निग्ध तथा उष्ण अनुपान, कफप्रकृति या कफ रोगों में रूक्ष तथा उष्ण अनुपान एवं पित्त प्रकृति या पित्त के रोगियों में मधुर और शीतल पदार्थों का अनुपान प्रशस्त होता है । रक्तपित्त के रोगियों में दुग्ध तथा सांठे के रस का अनुपान तथा विप खाये हुये मनुष्यों को आक, गेलु ( लिसोड़ा ) और शिरस इनके आसवों का अनुपान हितकारी होता है ॥ ४३१–४३६ ॥
अतः परं तु वर्गाणामनुपानं पृथक् पृथक् ।
प्रवक्ष्याम्यानुपूर्व्येण सर्वेषामेव मे शृणु ॥ ४३७ ॥
अव इसके अनन्तर पूर्वोक शाल्यादि वर्ग के पदार्थों के पृथक् पृथक् अनुपान क्रम से कहता हूँ सो सुनो ॥ ४३७ ॥
तत्र पूर्वंसस्यजातीनां बदाम्लं, वैदलानां धान्या-म्लं, जङ्घालानां धन्वजानां च पिप्पल्यासवः, विष्कि-राणां कोलबद्रासवः, प्रतुदानां नीरवृक्षासवः, गुहाश-| यानां खर्जूरनालिकेरासवः, प्रसहानामश्वगन्धाऽऽसवः, पर्णमृगाणां कृष्णगन्धासवः, बिलेशयानां फलसारा-सवः, एकशफानां त्रिफलाऽऽसवः, अनेकशफानां खदिरासवः, कूलचराणां शृङ्गाटककशेरुकासवः, कोशवासिनां पादिनां च स एव, प्लवानामिक्षुरसा-सवः, नादेयानां मत्स्यानां मृणालासवः, सामुद्राणां तु मातुलुङ्गासवः, अम्लानां फलानां पद्मोत्प-लकन्दासवः, कपायाणां दाडिमवेत्रासवः, मधुराणां त्रिकटुकयुक्तः खण्डासवः, तालफलादीनां धान्याम्लम्; कटुकानां दूर्वानलवेत्रासवः, पिप्पल्यादीनां वदंष्ट्राय-सुकासवः, कूष्माण्डादीनां दार्वीकरीरासवः, चुच्चुप्रभृ-तीनां लोध्रासवः, जीवन्त्यादीनां त्रिफलाऽऽसवः, कुसु-म्भशाकस्य स एव, मण्डूकपर्यादीनां महापञ्चमूला-सवः, तालमस्तकादीनामम्लफलासवः, सैन्धवादीनां सुरासव आरनालं च, तोयं वा सर्वत्रेति ॥ ४३८ ॥
उनमें पूर्व कहे अन्नसमूह जैसे शूकधान्य, दुधान्य तथा शमीधान्यों का अनुपान, बदराम्ल तथा कलाय - मुद्दादि हिदुल धान्यों पर धान्याम्ल ( कांजी ) का अनुपान करना चाहिये । जङ्गाल ( एणादि ) तथा धन्व ( मरुस्थल ) देश में उत्पन्न ( वर्त्तकादि ) के मांस पर पिप्पल्यासव, विष्किरों के मांस पर मांसरस का अनुपान कराना चाहिये । उहदी आदि गरिष्ठ | कोल तथा वदर का आसव, प्रतुद के मांस पर वट, गूलर आदि पदार्थों के खाने पर काक्षी अथवा दही के ऊपर का पानी चीरो वृक्षों की छाल आदि से बने हुये आसव, गुहा में सोने ( मस्तु ) का अनुपान करना चाहिये । मद्यपान के अभ्यासियों | वाले ( शेर, चीता ) प्राणियों के माँस पर खर्जूरासन तथा २८ सु ०
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२१८ सुश्रुतसहिता । नारिकेलासव, प्रसह प्राणियों के मांसरम पर अश्वगन्धासव, पर्णमृग ( बन्दरादि ) के मांस पर कृष्णगन्धा ( शोभाञ्जन ) का आसव, विल में सोने वाले प्राणियों के सांस पर मृहीका दि फल तथा शालसारादि के सार का आसव, घोडे आदि एकशफ के प्राणियों के मांस पर त्रिफलासव, अनेक शफ ( खुर ) वाले प्राणियों के मांस पर सद्विरासव, जलाशयों के कूल ( तटों ) पर घूमने वाले प्राणियों के मांस पर सिंघाडे तथा कशेरुरु से बने हुये आसव, कोशवासी तथा पादिनों के मांस पर भी शृङ्गाटक- कशेरुकासव, जल में तैरने वाले के मांस पर इनु-रसासव, नदी के मत्स्यों के मांस पर मृणालासव, समुद्री महस्यों के मांस पर मातुलुङ्गामव, खट्टे फलों के खाने पर पद्मोत्पलकन्दासव, कपायफलों के साने पर दाडिमवेत्रासव, मधुर फलों के खाने पर त्रिकटुचूर्णयुक्त खण्डासच, तालफला-" दिकों के खाने पर धान्याम्ल ( काओ ), ' कटुफलों के खाने पर दूर्वा वेत्रासव, पिप्पल्यादिकों के खाने पर श्वदंष्ट्रावसुकासव, कूष्माण्डादि के खाने पर दाव ( दारुहरिद्रा ) और करीरफल का बना आसव, चुच्चुप्रभृति शाकों के खाने पर लोधासव, जीवन्यादिशाओं का त्रिफलासव, कुसुम्भशाक का भी त्रिफला -सच, मण्डूकपर्ण्यादि का बृहत्पञ्चमूलासव, तालमस्तकादि का अम्लफलासव, सैन्धवादि लवर्णों के लिये सुरासव तथा काक्षी का अनुपान उत्तम होता है । अथवा उक्त सर्व वर्गों के लिये जल का अनुपान श्रेष्ठ है ॥ ४३८ ॥
भवन्ति चात्र-सर्वेषामनुपानानां माहेन्द्रं तोयमुत्तमम् ।
सात्म्यं यस्य तु यत्तोयं तत् तस्मै हितमुच्यते ॥ ४३६ ॥
उगंवाते कफे तोयं पित्ते रक्ते च शीतलम् ॥ ४४० ॥
इस विषय में कहा है किं सर्वं अनुपानों में माहेन्द्र अर्थात् आन्तरिक्ष जल उत्तम अनुपान है । अथवा जिस व्यक्ति के लिये नदी, कुंए, तालाब आदि का जो भी जल साम्य ( अभ्यस्त या हितकारी ) हो वह उसके लिये अनुपान में पिलाना उत्तम है । वात और कफ की प्रकृति या रोगों में उष्ण जल तथा पित्त प्रकृति या पित्त के रोग एवं रक्त के रोगों में शीतल जल का अनुपान हितकर होता है ॥ ४३ ९ -४४० ॥
दोपवद गुरु वा भुक्तमतिमानमथापि वा ।
यथोक्तेनानुपानेन सुखमन्नं प्रजीर्यति ॥ ४४१ ॥
ढोपयुक्त, भारी, किंवा अधिक मात्रा में खाया हुआ भोजन उचित यथोक्त अनुपान से सुखपूर्वक पच जाता है ॥ ४४१ ॥
रोचन बृंहणं वृष्यं दोपसङ्घातभेदनम् ।
तर्पणं मार्दवकरं श्रमक्लमहरं सुखम् ॥ ४४२ ॥
दीपनं दोपशमनं पिपासाच्छेदनं परम् ।
वल्यं वर्णकरं सम्यगनुपानं सदोच्यते ॥ ४४३ ॥
अनुपान गुण - ठीक तरह से विचार कर प्रयुक्त किया हुआ अनुपान - रोचक, शरीरपुष्टिकर, नृत्य, दोपों के समूह का नाशक, तृप्तिकारक, मृदुता करने वाला, थकावट तथा क्लम का नाशक, सुखकारक, पाचकानि - दीपक, दोपों का शामक, प्यास का नाशक, बल तथा वर्ण को बढ़ाने वाला होता है ॥ ४४२-४४३ ॥
तदादौ कर्शयेत्पीतं स्थापयेन्मध्यसेवितम् ।
पश्चात्पीत बृंहयति तस्माद्वीदय प्रयोजयेत् ॥ ४४४ ॥
भोजन के पूर्व किया हुआ अनुपान शरीर को दुबला करता है । भोजन के मध्य मैं किया हुआ अनुपान शरीर को उसी अवस्था में स्थिर रखता है एवं भोजन के पश्चात् किया हुआ अनुपान शरीर को पुष्ट करता है अतएव विचार कर अनुपान का प्रयोग करना चाहिये ॥ ४४४ ॥
स्थिरतां गतमक्लिन्नमन्नमद्रवपायिनाम् ।
भवत्याबाधजननमनुपानमतः पिवेत् ॥ ४४५ ॥
जो मनुष्य भोजन के किसी भी योग्य समय में अनुपान नहीं करते हैं उनका अन्न आमाशय में स्थिर हो जाता है तथा क्लिन्न ( गीला ) नहीं होता है जिससे वह अन्न उदर में बाधा उत्पन्न करता है इस लिये भोजन के पश्चात् ' अनुपान अवश्य करना चाहिये ॥ ४४५ ॥
विमर्श: - वाग्भटाटी भोजने जलगन नियमा - भक्तस्यादौ नलं पीनमग्निसादं कृशाङ्गताम् । अन्ते करोति स्थूलत्वमूर्ध्वचा-माशयात् ककम् ॥ मध्ये मध्याङ्गता साम्य धातूना जरण सुराम् । ( अ सं ) । समस्थूलकृशा भक्तमध्यान्तप्रथमाम्बुपा. ' ( वाग्भटः ) ।
न पिवेच्छ्वासकासार्त्तो रोगे चाप्यूर्ध्वजनुगे ।
तोरस्कः प्रसेकी च यस्य चोपहतः स्वरः ॥ ४४६ ॥
पीत्वाऽध्वभाष्याध्ययनगेयस्वमान्न शीलयेत् ।
प्रदूष्यामाशयं तद्धितस्य कण्ठोरसि स्थितम् ॥
स्यन्दाग्निसादच्छर्धादीनामयाञ्जनयेद् बहून् ॥ ४४७ ॥
श्वास तथा कास पीडित, ऊर्ध्व जत्रु ( सुख, नासा, नेत्र, कर्ण, शिर ) के रोग, जिसकी छाती या फेफड़ों में क्षत ( घण ) हो, लाला तथा सेढा का स्त्राव होता हो, स्वरभग वाले - ऐसे मनुष्यों को अनुपान नहीं कराना चाहिये । अनुपान करने के पश्चात् मार्ग में चलना, जोर से भाषण देना, पढ़ना, गाना और सोना नहीं चाहिये । ऐसा करने से अनुपान आमाशय को दूषित कर कण्ठ तथा उर ' प्रदेश में स्थित होकर लालास्राव, अभिमान्य और ' वमनादि अनेक रोगों को पैदा करता है || ४४६ - ४४७ ॥
गुरुलाघवचिन्तेयं स्वभावं नातिवर्त्तते ।
तथा संस्कारमानान्नकालांश्चाप्युत्तरोत्तरम् ॥ ४४८ ॥
भक्ष्यादि पदार्थों के गुरु और लघु का विचार- उस पदार्थ या खाने वाले के स्वभाव एव उस भक्ष्य के संस्कार, मात्रा, अन्न के प्रकार तथा समय इन सब पर निर्भर करता है ॥ ४४८ ॥
विमर्श: - उत्तरोत्तरम् = स्वभावात्सस्कार सस्कारान्मात्रा मात्रा-तोऽन्नम् अन्नात्काल गुरुलाघव चिन्ता नातिवर्तते नातिक्रामतीत्यर्थं । ' नातिवर्तत ' इति क्रियापदमनुकृष्य सस्कारादावन्वयात् संस्कार नातिवर्तते, मात्रा नातिवर्तते, अन्न नातिवर्ततॆ, काल नानिवर्तते इति बोध्यम् । सस्कार नातिवर्तते, यथा स्वभावाद् गुरोरपि श्रीहेर्लाजा-लघव, लघोरपि शाले सस्कारात पिष्ट गुरु । आत्रेयोऽपि — ' गुरूणा लाघव विधात्सस्कारात्सविपर्ययम् । व्रीहेर्लाजा यथा च स्यु ' सक्तूना सिद्धपिण्टका ॥ इति । मन्दकर्मानलारोग्याः सुकुमाराः सुखोचिताः ।