श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 281–290

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

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श्रध्यायः १ ] निदानस्थानम् | २२ विमर्शः - ऊर्ध्वशब्देन नाभ्युर. कण्ठादीना भाषितगीतादावा-दिशब्देन प्रयलादीना च परिग्रह । तदुक्त चरके - ' उदानस्य पुन स्थानं नाम्युर. कण्ठ एव च । वाक्प्रवृत्तिप्रयत्नौ जोवलवर्णादि कर्म च ॥ ' इति । वाग्भटे - ' उरः स्थानमुदानस्य नासानाभिगलाश्चरेत् । इति ।

आमपक्वाशयचरः समानो वह्निसङ्गतः ।

सोऽन्नं पचति तनांश्च विशेपान्विविनक्ति हि ॥

गुल्माग्निसादातीसारप्रभृतीन् कुरुते गदान् ॥ १६ ॥

समान वायु - आमादाय ( Stomach ) तथा पक्वाशय ( बृहदन्त्र Large Intestine ) में गति करनेवाली समान नामक वायु अन्नपाक से उत्पन्न विशेष पदार्थों ( रस, दोप, मूत्रों ) को पृथक् पृथक् करती है तथा विकृत होने पर गुल्म, मन्दाग्नि, अतिसार आदि रोगों को पैदा करती है ॥ १६ ॥

कृत्स्नदेहचरो व्यानो रससंवहनोद्यतः ॥ १७ ॥

स्वेदासृक्स्रावणञ्चापि पञ्चधा चेष्टयत्यपि ।

क्रुद्धश्च कुरुते रोगान् प्रायशः सर्वदेहगान् ॥ १८ ॥

व्यान वायु- सारे शरीर में भ्रमण करनेवाली व्यान वायु रस के संवहन ( Cerculation ) में तत्पर रहती है तथा स्वेद और रक्त का विस्रावण करती है एवं गति, अपक्षेपण, उत्क्षेपण, निमेप, उन्मेष इन पांचों कमों का सम्पादन करती है तथा क्रुद्ध होने पर प्रायः सारे देह में होनेवाले रोगों को उत्पन्न करती है ॥ १७-१८ ॥ विमर्श:: - - a वाग्भट ने व्यान का स्थान हृदय माना है-' न्यानो हृदि स्थितः ' ( वाग्भटः ) । रस - संवहन से ( Blood cer-_culation ) या ( Lymph cerculaton ) दोनों का बोध होता 1 रक्तश्नावण— रक्त का स्राव करना अर्थात् रक्त जब धमनियों से केशिकाओं ( Capillares ) में पहुँचता है तो उनकी दीवारें अत्यन्त पतली होने से उनमें से रक्त, रस, प्राण वायु तथा अन्य पोषकतत्व स्त्रवित होकर भिन्न भिन्न शारीरिक अङ्गों को तृप्त करते रहते हैं इसलिये कहा है कि- ' स ( रस. ) तु व्यानेन विक्षिप्त. सर्वान् वातून् प्रतर्पयेत् ' ।

पक्काधानालयोऽपानः काले कर्पति चाप्ययम् ।

समीरणः शकृन्मूत्रशुक्रगर्भार्त्तवान्यधः ॥

क्रुद्धश्च कुरुते रोगान् घोरान् वस्तिगुदाश्रयान् ॥ १६ ॥

अपान वायु- पक्वाशय में रहती हुई योग्य समय में मल, । मूत्र, शुक्र, गर्भ तथा आर्तव को अधोमार्ग की ओर प्रेरित कर निकालती है तथा कुपित होने पर वस्ति और गुदा में भयङ्कर रोगों को उत्पन्न करती है ॥ १ ९ ॥

शुक्रदोषप्रमेहास्तु व्यानापानप्रकोपजाः ।

युगपत् कुपिताश्चापि देहं भिन्द्युरसंशयम् ॥ २० ॥

ब्यान तथा अपान वायु के प्रकोप से शुक्र दोष तथा प्रमेह उत्पन्न होता है तथा उक्त पांचों वात एक समय में कुपित हो जाने पर निश्चय ही सारे शरीर को नष्ट कर देते हैं ॥ २० ॥

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि नानास्थानान्तराश्रितः ।

बहुशः कुपितो वायुर्विकारान् कुरुते हि यान् ॥ २१ ॥

अव इसके अनन्तर अनेक स्थानों में जाकर विविध प्रकार से कुपित होकर जिन रोगों को उत्पन्न करती है उन्हें कहता हूँ ॥ २१ ॥

वायुरामाशये क्रुद्धश्छर्धादीन् कुरुते गदान् ॥ २२ ॥

मोहं मूर्च्छा पिपासां च हृदुग्रहं पार्श्ववेदनाम् ।

पक्काशयस्थोऽन्त्रकूजं शूलं नाभौ करोति च ॥ २३ ॥

कृच्छ्रमूत्रपुरी पत्वमानाहं त्रिकवेदनाम् ।

श्रोत्रादिष्विन्द्रियवधं कुर्यात् क्रुद्धः समीरणः ॥ २४ ॥

आमाशय में क्रुद्ध हुई वायु वमनादि अनेक रोगों को करती है तथा मोह, मूर्च्छा, पिपासा, हृदय की जकड़ाहट और पार्श्ववेदना को पैदा करती है । पक्वाशय में जाकर आन्त्रकूजन, | नाभिप्रदेश के इधर - उधर शूल ( Colic pain ), मूत्र तथा to के निकलने में कठिनाई, आफरा तथा त्रिकस्थान में पीढा करती है । श्रोत्र ( कर्ण ) आदि इन्द्रियों में कुपित वायु उनके कार्य का नाश कर देती है ॥ २२-२४ ॥

वैवर्ण्यं स्फुरणं रौक्ष्यं सुप्तिं चुमुचुमायनम् ।

त्वक्स्थो निस्तोदनं कुर्यात् त्वग्भेदं परिपोटनम् ॥ २५ ॥

व्रणश्व रक्तगो, ग्रन्थीन् सशूलान् मांससंश्रितः । तथा मेदः श्रितः कुर्याद् ग्रन्थीन्मन्दरुजोऽव्रणान् २६

कुर्यात्सिरागतः शूलं सिराऽऽकुञ्चनपूरणम् ।

स्नायुप्राप्तः स्तम्भकम्पौ शूलमाक्षेपणं तथा ॥ २७ ॥

हन्ति सन्धिगतः सन्धीन् शूलशोफौ करोति च ।

अस्थिशोपं च भेदं च कुर्याच्छूलं च तच्छ्रितः ॥ २८ ॥

तथा मज्जगते रुक् च न कदाचित् प्रशाम्यति ।

अप्रवृत्तिः प्रवृत्तिर्वा विकृतिः शुक्रगेऽनिले ॥। २ ९ ॥

हस्तपादशिरोधातूस्तथा सञ्चरति क्रमात् ।

व्याप्नुयाद्वाऽखिलं देहं वायुः सर्वगतो नृणाम् ॥

स्तम्भनाक्षेपणस्वापशोफशूलानि सर्वगः ॥ ३० ॥

त्वचा में कुपित वात- शरीर के रन का नाश शरीर में फढ़कन, रूक्षता, सुप्ति, चुमचुमाहट ( Tingling ), सूई चुभोने की सी पीडा, त्वचा का फटना तथा परिपोट रोग को पैदा करती है । रक्त में कुपित हुई वात अनेक व्रण उत्पन्न करती है तथा मांसगत कुपित वात - मांस में गांठें और शूल पैदा करती है । मेदोधातु में कुपित हुई वात- मन्द पीड़ा वाली तथा व्रणरहित गांठों को उत्पन्न करती है । सिरागत कुपित वात-सिराओं में शूल तथा सिराओं का आकुञ्चन ( कुटिलता: = varicosity of veins ) तथा सिराविस्तृति ( Phlebetasis ) पैदा करती है । स्नायुगत कुपित वात - शरीर का स्तम्भ ( जकढ़ाहट ) और शरीर में कम्प तथा शूल एवं आक्षेप ( Spasms ) पैदा करती है । सन्धिगत कुपित वात- सन्धि-नाश, सन्धियों में शूल और शोफ पैदा करती है । अस्थिगत कुपित वात- अस्थिशोप ( Osteoporosis ), स्थ अस्थिशूल पैदा करती है । मज्जागत कुपित बात - सर्वदा | होनेवाली पीड़ा तथा मज्जा का शोप पैदा करती है एवं शुक्र में कुपित हुई वात- शुक्र की भप्रवृत्ति ( रुकावट ) अथवा । अधिक प्रवृत्ति करती है । मनुष्य की सारी देह में कुपित हुई | वात - हस्त, पाद, सिर तथा रस - रक्तादि धातुओं में सवार

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२३० सुश्रुतसहिता । करती है तथा बाढ में सारे शरीर में व्याप्त हो जाती है जिससे । शरीर का स्तम्भ ( जकडाहट = Stiffness ), आक्षेप ( Conva • lsions ), सुप्ति या स्पर्शज्ञाननाश, शोथ और शूल पैदा होते हैं ॥ २५-३० ॥ विमर्शः -- नाधवनिदाने शुक्रगत कुपितवानरक्षणम् - क्षिप्र मुनति बध्नाति शुक्र गर्भमयापि वा । विकृतिञ्जनयेच्चापि शुक्रस्थ कुपितोऽनिल ||

स्थानेपूक्तेषु सम्मिश्रः सम्मिश्राः कुरुते रुजः ।

कुर्यादवयवप्राप्तो मारुतस्त्वमितान् गदान् ॥ ३१ ॥

उक्त स्थानों में पित्तादि के साथ संयुक्त हुआ कुपित वात-पित्तादिलक्षणयुक्त रोगों को उत्पन्न करता है तथा शरीर के

भिन्न भिन्न अह्नों में कुपित हुआ बात उन ( अ ) में नाना ।

प्रकार के रोग उत्पन्न करता है ॥ ३१ ॥

दाहसन्तापमूर्च्छाः स्युर्वाय पित्तसमन्विते ॥ ३२ ॥

शैत्यशोफगुरुत्वानि तस्मिन्नेव कफावृते ।

सूचीभिरिव निस्तोदः स्पर्शद्वेषः प्रसुप्तता ॥ ३३ ॥

शेपाः पित्तविकाराः स्युर्माते शोणितान्विते ।

प्राणे पित्तावृते छर्दाहचैवोपजायते ॥ ३४ ॥

दौर्बल्यं सदनं तन्द्रा वैवर्ण्य च कफावृते ।

उदाने पित्तसंयुक्ते मूर्च्छादाह भ्रमक्लमाः ॥ ३५ ॥

अस्वेदह मन्दोऽग्निः शीतस्तम्भौ कफावृते ।

समाने पित्तसयुक्ते स्वेददाहौण्यमूर्च्छनम् ॥ ३६ ॥

कफाधिकं च विण्मूत्रं रोमहर्पः कफावृते ।

अपाने पित्तयुक्ते दाौध्ये स्यादसृग्दरः ॥ ३७ ॥

अथः कायगुरुत्वं च तस्मिन्नेन कफावृते ।

व्याने पित्तावृते दाहो गात्रविक्षेपणं क्लमः ॥ ३८ ॥

गुरूणि सर्वगात्राणि स्तम्भनं चास्थिपर्वणाम् ।

लिनं कफावृते व्याने चेष्टाः स्तम्भस्तथैव च ॥ ३६ ॥

जब बात कुपित होकर पित्त के साथ मिल जाता है तब-शरीर में दाह, सन्ताप और मूर्च्छा ये पित्तढोपयुक्त लक्षण उत्पन्न होते हैं तथा कफ के साथ मिलने पर शरीर में शैत्य, शोथ और गुरुता ये लक्षण उत्पन्न होते हैं । रक्त के साथ मिश्रित कुपित वात - शरीर में सूई चुभोने की सी पीडा, स्पर्श द्वेष, अङ्गों में सुप्तता तथा पित्त के अन्य विकार उत्पन्न होते हैं । प्राणवायु के पित्त के साथ मिश्रित होने पर - वमन तथा दाह उत्पन्न होता है तथा कफ के साथ मिल जाने पर दुर्घटना, अनों में पीढ़ा, तन्द्रा और विवर्णताः ये लक्षण प्रगट होते हैं । उदान वायु के पित्तयुक्त होनेपर - मूर्च्छा, दाह, भ्रम और क्टम ये लक्षण उत्पन्न होते हैं एवं कफ के साथ सयुक्त होनेपर -पसीना न आना, शरीर में हर्प ( रोंगटे सडे होना ), अग्निमांद्य, शीत लगना तथा जकढाहर ये लक्षण प्रगट होते है । समानवायु के पित्तमयुक्त होनेपर पसीना आना, जलन होना, शरीर का उष्ण होना तथा मूर्च्छा ये लक्षण पैदा होते हैं तथा उसी के कफावृत होने पर मल और मूत्र में कफ ( Manas ) की अधिस्ता तथा रोमहर्ष उत्पन्न होता है । अपान वायु के पित्तसंयुक्त होनेपर - दाह, शरीर का गरम होना तथा स्त्रियों में रक्तप्रदर उत्पन्न हो जाता है एवं उसी के कफावृत होनेपर - नीचे के शरीर के अह्नों में भारीपन पैदा हो जाना है । व्यानवायु के पित्तावृत्त होनेपर - दाह, गात्र में विक्षेपण तथा क्लम ये लक्षण पैदा होते हैं एवं उसके कफावृत होनेपर - शरीर के सारे अङ्गों में भारीपन, अस्थियों की सन्धियों में जकड़न तथा हस्त- पाढादि अङ्गों की चेष्टा का स्तम्भ ये लक्षण पैदा होते हैं ॥ ३२-३९ ॥ विमर्श: - प्रकुपित वात का अन्न, पित्त तथा कफादि के साथ संसर्ग होने को आवरण कहते हैं । अष्टानसग्रह में इस के वाइस भेद लिसे है- ' इति द्वात्रिंशतिविध वायोरावरण बिंदु ' ( अ ० सं ० ) । एवं दाम्या दोपाम्था, रक्तादिभिः पद्मि धतुमि ', अन्नेन, मूत्रेण, विशा, सर्वधातुभिः पुनः प्राणादिपञ्चकस्य पित्तेन, तद्वत् कफेन, इति द्वाविंशतिविध वायोरावरणमुक्तम् । ( इन्दुः ) । वाग्भट ने वायु के अनेक आवरण माने हैं - वायो-रामरणवातो बहुभेद प्रवक्ष्यते । लिङ्ग पित्तावृते दाहस्तृष्णा शूल भ्रमस्तम || असृग्दारयतीति — असृग्दरः - रक्तप्रदर Metrorrhagia, रक्त प्रमाणमुत्क्रम्य गर्भाशयगता सिरा । रजोवहा समाश्रित्य रक्तमादाय तद्वज ॥ यस्माद्विवर्धयत्याशु रसभावाद्दिमानता । तस्मा-दसुन्दर प्राहुरेतत्तन्त्रविशारदा || असुन्दरलक्षण -- तदेवातिप्रसङ्गेन प्रवृत्तमनृतावपि । असृग्दर विजानीयादतोऽन्यद्रक्तलक्षणात् ॥ असृ-दरो भवेत् सर्व सागमर्द सवेदनम् ॥

प्रायशः सुकुमाराणा मिथ्याऽऽहारविहारिणाम् ।

शोकाच्च प्रमदामद्यव्यायामैश्चातिपीडनात् ॥ ४० ॥

ऋतुसाम्यविपर्यासात् स्नेहादीनां च विभ्रमात् ।

व्यवाये तथा स्थूले वातरक्तं प्रकुप्यति ॥ ४१ ॥

वातरक्तरोगकारण - प्रायः सुकुमार प्रकृतिवाले तथा मिथ्या आहार और विहार करनेवाले पुरुषों के तथा शोक से एवं स्त्री - सम्भोग, मद्यपान तथा व्यायाम इनके अधिक सेवन से ऋतु के विपरीत तथा साम्य के विपरीत आहार - विहार करने से स्नेहादिकों के अनुचित प्रयोग करने से, व्यवाय ( स्त्रीभोग ) न करनेवाले तथा स्थूल मनुष्य में वातरक्त का प्रकोप होता है विमर्शः - वातरक्त को ( Gout ) कहते हैं । चरक ने इसे ' आठ्यरोग ' कहा है क्योंकि स्थूल तथा सुखियों में अधिक होता है । अष्टाङ्गसङ्ग्रहकारने - आयरोग, खुड, वातवलास, वात-गणित तदाद्दुर्नामि । मुख्य कारण मद्य - मांस का अति सेवन, व्यायाम का अभाव, शोक, क्रोध, चिन्ता आदि मानसिक विकार है । बातरक्तकारणानि यथा- मिथ्याहारविहारिणाम् । लवणाम्ल-कटुवारस्निग्धोष्णाजीर्णभोजनैः । क्लिन्नशुष्काम्बुनानूपमासपिण्याक-मूलकै ॥ ( चरकः ) भजता विधिहीनच स्वप्न जागर मैथुनम् । ( अ.सं. ) । हस्त्यश्वोष्ट्रैर्गच्छतोऽन्यैश्च वायुः कोपं यातः कारणैः सेवितैः स्वैः । तीक्ष्णोष्णाम्लतारशा का दिभोज्यैः सन्तापाद्यैर्भूयसा सेवितैश्च ॥ ४२ ॥

क्षिप्रं रक्तं दुष्टिमायाति तच्च

वायोर्मार्ग संरुणद्ध याशु यातः ।

क्रुद्धोऽत्यर्थ मार्गरोधात् स वायु-रत्युद्रिक्तं दूपयेद्रक्तमाशु ॥ ४३ ॥

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श्रध्यायः १ ] निदानस्थानम् । २३१ तत् संपृक्तं वायुना दूपितेन तत्प्राबल्यादुच्यते वातरक्तम् । तद्वत् पित्तं दूषितेनासृजाऽऽक्तं श्लेष्मा दुष्टो दूपितेनामृजाऽऽक्तः ॥ ४४ ॥

सम्प्राप्ति — हाथी, घोड़ा, ऊंट पर बैठकर चलने से तथा अन्य शीत, रूक्षादि कारणों से वायु हृपित हो जाती है एवं तीक्ष्ण, उष्ण, अम्ल, क्षार, शाक आदि भोज्य पदार्थों के सेवन से एवं मन्तापादि के अधिक सेवन से शीघ्र ही रक्त दूषित हो जाता है तथा वह दूषित रक्त शीघ्र सन्चरण करनेवाले वायु के मार्ग का अवरोध कर देता है । इस तरह रक्त द्वारा मार्ग का निरोध होने से अत्यर्थ क्रुद्ध होकर अत्यन्त उद्रिक्त । ( दूषित ) हुये रक्त को शीघ्र ही दूषित कर देता है । इस तरह से दूषित वायु से मिला हुआ वह रक्त वायु को प्रबलता । होने के कारण वातरक्त कहलाता है । इसी तरह दूषित पित्त बात द्वारा दूषित रक्त के साथ सयुक्त होकर तथा दूषित कफ - वात द्वारा दूषित रक्त के साथ संयुक्त होकर वातरक्त ही । कहलाता है ॥ १२-११ || विमर्गः - ढाक्टरी में भी वातरक रोगी के रक्त का Uric Acid तथा यूरेटस की मात्रा बढ जाने से रक्त दूपित हो जाता है । ये दोनों पदार्थ मोडियम वाइ में पृथक् होकर अस्थि, सधि, संधिकला, बन्धन आदि में सचित होने लगता है ।

स्पर्शोद्विग्नो तोदभेदप्रशोप-स्वापोतो वातरक्तेन पादौ ।

पित्तासृग्भ्यामुप्रदाहौ भवेता-मत्यर्थोगौ रक्तशोफौ मृदू च ॥

कण्डूमन्तौ श्वेतशीतौ सशोफौ पीनस्तब्धौ श्लेष्म दुष्टे तु रक्ते सर्वेष्टे शोणिते चापि दोषाः स्वं स्वं रूपं पादयोर्दर्शयन्ति ॥ वायु और रक्त दुष्ट प्रधानता से यूरेटस के रूप , स्नायु, त्वचा ४५ ॥

।

४६ ॥

दोनों पावों में स्पर्श की तीव्र असहिष्णुता, सुई द्वारा चुमोने की सी वेदना, त्वचा के फटने की सी पीडा एवं शुष्कता तथा स्पर्शज्ञान की कमी प्रतीत होती है । पित्त तथा रक्त की दुष्टि की प्रधा नता से होने वाले वातरक्त में दोनों पांव तेज दाह, अधिक गरमी, लाल रन, सुजन तथा पिलपिलेपन से युक्त हो जाते हैं । इसी प्रकार कफ की दृष्टि से युक्त वातरक्त में दोनों पांत्र खुजली से युक्त, श्वेत, टण्ढे, शोथयुक्त, मोटे तथा स्तब्ध ( कडे = कठोर ) हो जाते हैं । सर्व दोषों से दूषित वातरक्त में विविध दोष अपने अपने लक्षण ( रूप ) पावों में प्रगट करते हैं ॥ ४५-१६ ॥ विमर्शः - उक्त स्थानिक लक्षणों के सिवाय निम्न सार्व • देहिक लक्षण भी होते हैं जैसे - उवर १०१ - १०२ तक, तृपा, जी मिचलाना आदि । रोग पैर के अझूठे को सन्धि, कभी २ गुल्फ सन्धि, जानुमन्धि, मणिबन्ध सन्धियों में भी विकृति होती है । पीढ़ा दिन में कम रात में अधिक होती है । मूत्र में यूरिक एसिड तथा यूरेट्स की राशि अधिक मिलती है । प्राग्रपे शिथिलो स्विन्नौ शीतलौ सविपर्ययौ । वैवर्ण्यतोद सुप्तत्वगुरुत्वौपसमन्वितौ ॥ ४७ ॥ •

पूर्वरूप में दोनों पांव गिथिल, स्वेदयुक्त, शीतल तथा कभी २ विपर्यय युक्त होते हैं तथा उनमें विवर्णता, सूई चुभोने की सी पीडा, सुतता, भारीपन और प ( दाह ) होता है ॥ ४७ ॥

पादयोर्मूलमास्थाय कदाचिद्धस्तयोरपि ।

आखोर्विपमिव क्रुद्धं तद्देहमनुसर्पति ॥ ४८ ॥

यह रोग बहुधा पांवों के अथवा हाथ के मूल ( अंगु-लियां, तल या गुल्फ मणिबन्ध ) का आश्रय लेकर क्रुद्ध होकर चूहे के विप के समान सारे देह में फैल जाता है ॥ ४८ ॥

विमर्श: - चरक तथा अष्टाङ्गसंग्रह में उत्तान ( Acute ) और गम्भीर ( Chornia ) ऐसे वातरक्त के दो प्रकार लिखे हैं - मासा मुत्तान तत्पूर्वं जायते तत । कालान्तरेण गम्भीर सर्वांन वातूनभिवेत् ॥ ( अ. सं. ) । इस रोग की उत्तम चिकित्मा न होने से कुछ दिन, मास या वर्ष • वाद दौरे आया करते है जिसके परिणाम में मनुष्य लंगडा हो जाता है । तथा अंगुलियां टेढी हो जाती हैं ।

आजानुस्फुटितं यच्च प्रभिन्नं प्रस्तुतं च यत् ।

उपद्रवैश्च यज्जुष्टं प्राणमांसऩयादिभिः ॥

शोणितं तदसाध्यं स्याद्या'यं संवत्सरोत्थितम् ॥ ४६ ॥

जिस वातरक्त में जानुपर्यन्त स्फुटन हो जाय तथा स्वचा - मांसादि विदीर्ण होकर उनसे रक्त, लसीका, पूय आदि का स्राव निकलने लगे तथा प्राण और मांसक्षय के उपद्रवों से युक्त हो उस वातरक्त को असाध्य समझना चाहिये एवं एक वर्ष पुराना होने पर याप्य समझना चाहिये ॥ यदा तु धमनीः सर्वाः कुपितोऽभ्येति मारुतः ॥ ५० ॥

तदाक्षिपत्याशु मुहुर्मुहुर्देहं मुहुश्वरः ।

मुहुर्मुहुस्तढाक्षेपादाक्षेपक इति स्मृतः ॥ ५१ ॥

जब कुपित वात शरीर की सब धमनियों में प्रविष्ट होता है तब बार बार आक्षेप होने लगता है । इस तरह बार बार आक्षेप के दौरे थाने से इस रोग को आक्षेपक कहते हैं ॥ विमर्श - आक्षेपक को क्न्चल्शन्स ( Convulsions ) कहते हैं । यह स्वयं खास बीमारी न होकर मस्तिष्क की खराबी का एक लक्षण है जो अन्य रोगों के लक्षण रूप में होता है । जैसे ---अपस्मार ( मृगी = इपिलेप्सी ), अपतन्त्रक ( योपापस्मार = Hysteria ), मस्तिष्कार्बुद, मस्तिष्क में होनेवाला रक्त ara और अन्तः शल्य ( Embolism ), मस्तिष्कावरण शोथ, सूत्रविषमयता ( Ureamia ) धनु स्तम्भ ( Tetanus ) तथा बच्चों के दन्तोद्भेद तथा उदर कृमि आदि में होता है । इसके साथ हाथ - पांवों का टेढ़ा होना, बतीसी बन्द होना, आँखें फाड़ फाढ कर देखना, नेत्र पुतली को इधर उधर फेरना आदि भी होते हैं ।

सोऽपतानकसंज्ञो यः पातयत्यन्तराऽन्तरा ।

कफान्वितो भृशं वायुस्तास्वेव यदि तिष्ठति ॥ ५२ ॥

स दण्डवत् स्तम्भयति कृच्छ्रो दण्डापतानकः ।

हनुग्रहस्तदाऽत्यर्थ सोऽन्नं कृच्छ्रान्निषेवते ॥ ५३ ॥

पृष्ठ 284

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२३२ सुश्रुतसहिता ।

धनुस्तुल्यं नमेद्यस्तु स धनुःस्तम्भसंज्ञकः ।

अङ्गुलीगुल्फजठरहृद्वनोगलसंश्रितः ॥ ५४

स्नायुप्रतानमनिलो यदाऽऽक्षिपति वेगवान् ।

त्रिष्टव्याक्षः स्तव्घहनुर्भग्नपार्श्वः कफं वमन् ॥

अभ्यन्तरं धनुरिव यदा नमति मानवः ।

तदाऽस्याभ्यन्तरायामं कुरुते मानतो वली ॥

वाह्यस्त्रायुप्रतानस्यो बाह्यायामं करोति च ।

॥

५५ ॥

५६ ॥

तमसाध्यं बुधाः प्राहुर्वनःकट्युरुभञ्जनम् ॥ ५७ ॥

अपनातक- जो कुपित वात रोगी को बीच बीच में गिराता है वह अपनातक है । यदि कफ से युक्त वायु उन धमनियों में अवस्थित रहती है तथा देह को दण्डे के समान स्तम्भित कर ( क ) देती है तब उसे दण्डापतानक कहते हैं तथा वह कृच्छ्रसाध्य है । यदि वातप्रकोप के कारण हनुसन्धि जकड़ जाय तथा अन्न का सेवन बड़े कष्ट से हो तो उसे हनुग्रह कहते हैं । जो कुपित बात मनुष्य को धनुष के समान टेढा कर देता है उसे धनुः स्तम्भ कहते हैं । जब बलवान् कुपित वात बहुठि, गुल्फ, उदर, हृदय, वक्ष तथा गले में मंत्रित होकर सिरा तथा जालों के प्रतान ( समूह ) को आक्षेपित करती है उस समय रोगी के नेत्र विष्टब्ध ( निश्चल ) हो जाते हैं, हनु स्तब्ध हो जाती है, पार्श्व भन्न हो जाता है । तथा कफ का चमन करता हुआ रोगी भीतर ( वन ) की और धनुष की तरह नम जाता है तब उसे अन्तरायाम कहते हैं । यही प्रकुपित वायु जब शरीर के बाह्य स्नायु समूह में स्थित होती है तब शरीर बाहर की ओर झुक जाता है उसे वाह्याचाम कहते हैं । यदि इसमें वक्ष, कटि तथा कल का भजन ( टूटना ) हो जाय तब उसे विद्वान् वैद्य असान्य कहते हैं ॥ ५२-५७ ॥ विमर्शः —— अपतानक को ( Tetanus ) कहते हैं । इसी के भेद दण्डापतानक ( Orthotonos ), धनु स्तम्भ, अन्तरायाम । ( Emprosthotonos ), बाह्यायाम ( Opisthotonos ) पार्श्वा बाम ( Pearothotonos ) नादि होते हैं । हनुग्रह को ( Lock ) Jaw or Trismus ) कहते हैं । अपनानक का कारण - इसका प्रधान कारण वेसीलस टिटेनी ( B. Tetani ) जीवाणु है तथा । घोड़ा की लीद गोचर तथा जमीन के उपर धूलि में रहता है । जीवाणु का प्रवेश प्राय क्षत से ही होता है । अर्थात् क्षत में धूलि, मिट्टी, गोवर आदि के जाने से जीवाणु भी साथ - साथ चला जाता है । खेतों पर, सड़क पर जो जत होते हैं उनमें बीवाणु जाने की सम्भावना अधिक रहती है । कभी - कभी । प्रसव या गर्भपातजन्य हृत से तथा बालकों के नालच्छेदन क्षत से नवजात लपतानक ( Tetanus Seoniatoram ) तथा कर्णच्छेदन क्षत से और अभिघात से अभिवातन नपतानक्र ( Traumstic Tetanus ) होता है । बिना लाघात के टत्पन्न लपतानक को अनभिघातन ( Idiopathic ) कहते हैं । सन्त्राहि - त द्वारा जीवाणु प्रविष्ट होकर अपनी संख्या को बढ़ाते हैं तथा चिप पैदा करते हैं जिसका असर ( Nerves ), सुवुन्ना तया मस्तिष्क पर होता है और चेष्टावह चातसूत्र ( Yotar Nerves ) द्वारा शरीर पेशियों का सोच करता है ॥ आप के दौरे हवा के झोंके तथा साधारण छूने से हो होने लगते हैं । पेशीसंकोच से रोगी को असरा वेदना होती है । वेद अधिक निकटता है । खाना, पीना, सांस लेना सभी में कठिनाई होती है ।

कफपित्तान्वितो वायुर्वायुरेव च केवलः ।

कुर्यादाक्षेपकं त्वन्यं चतुर्थमभिघातजम् ॥ ४८ ॥

कुपित कफ तथा पित्त से युक्त वायु अथवा केवल कुरित वात आवातजन्य चौथे आक्षेपक रोग को उत्पन्न करता है ।

गर्भपातनिमित्तश्च शोणितातिस्रवाच यः ।

अभिघातनिमित्तञ्च न सिध्यत्यपतानकः ॥ १६ ॥

गर्भपात से उत्पन्न रक्त के अधिक स्राव से उत्पन्न तथा आघात ( चोट ) से उत्पन्न अपतानक रोग ठीक नहीं होता है ॥

अघोगमाः सतिर्यग्गा धमनीरूर्ध्वदेहगाः ।

यदा प्रकुपितोऽत्यथं मातरिश्वा प्रपद्यते ॥ ६० ॥

तदाऽन्यतरपक्षत्य सन्धिबन्धान् विमोक्षयन् ।

हन्ति पनं तमाहुहिं पक्षाघातं भिपन्चराः ॥ ६१ ॥

यस्य कृत्स्नं शरीरार्धमकर्मण्यमचेतनम् ।

ततः पतत्यसून् चाऽपि जहात्यनिलपीडितः ॥ ६२ ॥

शुद्धवातहृतं पक्षं कृच्छ्रसाध्यतमं विदुः ।

साध्यमन्येन संसृष्टमसाध्यं नयहेतुकम् ॥ ६३ ॥

जब अत्यधिक प्रकुपित वायु नीचे जाने वाली, टेढी जाने वाली, और ऊपर सिर की ओर जाने वाली धमनियों में प्राप्त होता है तब दोनों में से किसी एक पक्ष ( शरीर का भाग ) के सन्धि बन्धनों को ( अपने गति केन्द्रों से ) पृथक कर उस पत्र का घात ( विनाश ) कर देती है । इस रोग को पिम्बर ( श्रेष्ठ वैद्य ) पदाघात न्हते हैं । जिस मनुष्य का सम्पूर्ण आधा शरीर कार्य रहित तथा अचेतन ( संवेदना रहित ) हो जाता है वह वात से पीडित रोगी बिछोने पर गिर जाता है अथवा रोग के बढने पर रोगी मर जाता है । केवल वातप्रकोप से जो पक्षाघात होता है वह कृन्दसाध्य होता है । जो पित्तादि अन्य दोषों से युक्त बात से पक्षाघात होता है वह साध्य होता है एवं जो रक्तकादि धातु के क्षय से पक्षाघात होता है वह असाध्य है ॥ ६०-६३ ॥ विमर्शः -- पक्षाघात को पत्रवध, पक्षघात, नर्दान वायु और हेमिप्लेजिया ( Hemiplegia ) कहते हैं । जब हस्तपाद आदि किसी एक नग का घात होता है उसे एका रोग मोनोप्लेजिया ( Monoplegia ) कहते हैं । पादं सङ्कोचयत्येकं हस्त वा तोटत् । एवमवरोगं त विद्यात् ॥ ( चरक ) । सर्वाङ्ग रोग को डायप्लीजिया ( Diplegia ) कहते हैं । हेतु - अक्सर फिरङ्ग, हृदयरोग, वृक्योग, वातरक्त, सीसविष, धमनीदार्घ्य, मस्तिष्क के अर्बुद, मद्य का अतिसेवन आदि कारण है । मस्तिष्क के दाहिने भाग का सम्बन्ध शरीर के वामाङ्गों से है तथा वामभाग का सम्बन्ध शरीर के दक्षिणाङ्गों से है एव मस्तिष्क के जिस भाग में विकृति होती है शरीर का उससे दूसरा अङ्ग धावयुक्त होता है । मस्तिष्क से तो वातसूत्र निकलते हैं तथा अट्ठों को जाते हैं उनका संबन्ध

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श्रध्यायः ४६ ] निदानस्थानम् । २३३ मस्तिष्क से टूट जाने से उनमें इच्छानुसार गति नहीं होती तथा उसी की संवेदना मस्तिष्क तक नहीं पहुंचती, यही पक्षाघात है ।

वायुरूर्ध्वं व्रजेत् स्थानात् कुपितो हृदयं शिरः ।

शङ्खौ च पीडयत्यद्गान्याक्षिपेन्नमयेच्च सः ॥ ६४ ॥

निमीलिताक्षो निश्चेष्टः स्तब्धातो वाऽपि कूजति ।

निरुच्छ्वासोऽथवा कृच्छ्रादुच्छ्वस्यान्नष्टचेतनः ॥६५ ॥ ।

स्वस्थः स्यादुद्धृदये मुक्ते ह्यावृते तु प्रमुह्यति ।

कफान्वितेन वातेन ज्ञेय एषोऽपतन्त्रकः ॥ ६६ ॥

अपतन्त्रक — कुपित वायु ऊपर की ओर जाकर हृदय, सिर तथा शङ्ख प्रदेश में प्रवेश करती है तथा उन अह्नों को पीडित करती है एवं उन्हें आक्षिप्त करती है नमा देती जिससे रोगी नेत्र वन्द कर लेता है, चेष्टारहित हो जाता है किंवा स्तब्धाक्ष ( निश्चल नेत्र ) होकर कबूतर के समान कूजन करता है । कभी श्वास - गति को बन्द कर लेता है अथवा कष्ट से श्वास लेता है एवं चेतना - रहित हो जाता है । जव हृदय वातवेग से रहित होता है तव स्वस्थ हो जाता है

और वातवेग से युक्त होता है तब फिर अस्वस्थ हो जाता है ।

यह अपतन्त्रक रोग कफयुक्त वात से उत्पन्न होता है ॥ ६४-६६ ॥

विमर्श: -- अपतन्त्रकको हिस्टेरिया ( Hysteria ) कहते हैं तथा स्त्री पुरुष दोनों को होता है । योपापस्मार गलत नाम है । वाग्भट ने अपतन्त्रक तथा अपतानक रोग को एक ही माना है । कपोन इव कुजेच्च नि सज्ञः सोऽपतन्त्रक ' । स एव चापतानाख्यः । चरक ने भी दोनों को माना है- वायुना दारुणं प्राहुरेके तदपनानकम् । ( च. सि. ९ ) माधवकर भी दोनों में अभेद मानते हैं ।

दिवास्वप्नासनस्थानविकृतोर्ध्वनिरीक्षणैः ।

मन्यास्तम्भं प्रकुरुते स एव श्लेष्मणाऽऽवृतः ॥ ६७ ॥

मन्यास्तम्भ - दिन में शयन करने से, ऊँची - नीची शय्या तथा तकिये पर गरदन रखने से टेढे या ऊपर की ओर । देखने से वही कुपित वात कफ से आवृत होकर मन्यास्तम्भ कर देता है ॥ ६७ ॥

विमर्श: - मन्यास्तम्भ को Torticols कहते हैं । यह ग्रीवापश्चात् सिरा या उरः कर्णमूलिका ( Sterno mastoid ) सोच से होता है । इसके वातज, आमवातन ( Bhenma • tic ), जन्मज Congenital तथा आक्षेपयुक्त ( Spasmodio ) ऐसे चार भेद होते हैं ।

गर्भिणीसूतिकाबालवृद्धक्षीणेष्वसृक्तये ।

उच्चैर्व्याहरतोऽत्यर्थ खादतः कठिनानि च ॥ ६८ ॥

हसतो जृम्भतो भाराद्विषमाच्छयनादपि ।

शिरोनासौष्ठचिवुकललाटे क्षणसन्धिगः ॥ ६६ ॥

अर्दयित्वाऽनिलो वक्त्रमर्दितं जनयत्यतः ।

arraft वक्त्रा ग्रीवा चाप्यपवर्त्तते ॥ ७० ॥

शिरश्चलति वाक्सङ्गो नेत्रादीनां च वैकृतम् ।

ग्रीवाचिबुकदन्तानां तस्मिन् पार्श्वे तु वेदना ॥ ७१ ॥ ।

यस्याग्रजो रोमहर्षो वेपथुनैत्रमाविलम् । ३० सु ०

। वायुरूर्ध्वं त्वचि स्वापस्तोदो मन्याहनुग्रहः ।

तमर्दितमिति प्राहुर्व्याधिं व्याधिविशारदाः ॥ ७२ ॥

क्षीणस्यानिमिषात्तस्य प्रसक्तं सक्तभाषिणः ।

न सिध्यत्यर्दितं गाढं त्रिवर्ष वेपनस्य च ॥ ७३ ॥

अर्दित - गर्भवती स्त्री, सूतिका, वालक, वृद्ध और क्षीण पुरुषों में रक्त का क्षय होने से एवं जोर से बोलने से, अत्यन्त कठिन पदार्थों को खाने से, हँसने तथा जंभाई लेने से, वो उठाने से तथा विषम स्थान में सोने से सिर, नासिका, ओष्ठ, चि ge ( ठोडी ), ललाट तथा नेत्र- सन्धियों में प्रकुपित वायु स्थित होकर वायु मुख को पीडित करके अर्दित रोग उत्पन्न करती है तथा इस रोग में मुख का आधा हिस्सा | टेढा हो जाता है और गरदन भी टेढी हो जाती है, सिर काँपता है, बोलने में रुकावट होती है तथा नेत्र, कान, नासा | आदि में भी विकृति उत्पन्न होती है तथा जिस पार्श्व में यह रोग होता है उस तरफ की ग्रीवा, ठोढी और दांतों में वेदना होती है । इसके पूर्वरूप में रोंगटे खड़े होना, कम्पन, नेत्रों का आविल ( आंसूयुक्त ) होना, वायु का ऊपर को वेग ( डकारें आदि ) होना, स्वचा में सुन्नता तथा सूई चुभोने की सी पीड़ा होना, मन्या और हनु की जकड़ाहट आदि लक्षण होते हैं । रोगों को जानने में विशारद ( चतुर ) ' वैद्य इस प्रकार के रोग को अर्दित कहते हैं । क्षीण हुये, नेत्रों को खोलने तथा बन्द करने की क्रिया से रहित, प्रसक्त ( निरन्तर ) अस्पष्ट बोलने वाले पुरुष का तथा गाढ ( भयङ्कर ) रूप में उत्पन्न एवं तीन वर्ष का पुराना तथा कम्पन लक्षण से युक्त पुरुष का अर्दित रोग भी ठीक नहीं होता है ॥ ६८-७३ ॥ विमर्श - अर्दित को Facial palsy Bell's Paralysis कहते हैं । मस्तिष्क से निकलने वाली सातवीं मौखिकी नाड़ी ( Facial nerve ) के घात होने से यह रोग पैदा होता है । ये नाड़ियां दो होती हैं । जिधर की नाडी का घात हो उधर मुख- पार्श्व की विकृति होती है । अष्टाङ्ग - सद्ग्रह ने इसे ' एकायाम ' कहा है तथा लोक में ' लकवा ' भी कहते हैं । चरक में इसे मुखार्धघातयुक्त पक्षाघात या मुखार्धघात का है ' अर्धे तस्मिन् मुखार्थे वा केवले स्यात्तदर्दितम् । पक्षाघात, रोहिणी ( Diphtheria ), प्रसूतज्वर, जलसंत्रास, पसीने में ठंढी हवा लगना आदि कई कारणों से होता है । पाणि प्रत्यङ्गुलीनां तु कण्डरा याऽनिलार्दिता । सक्थनः क्षेपं निगृह्णीयाद् गृध्रसीति हि सा स्मृता ७४ गृध्रसी - एडी तथा प्रत्येक पादाङ्गुलियों की कण्डरा जव वात से प्रकुपित होती हैं तथा टाग के प्रसारण ( सकोच. विस्तार गति ) को रोक देती है तब उसे गृध्रसी रोग कहते हैं ॥ ७४ ॥

विमर्श: - गृध्रसी को सियाटिका ( Souatica ) कहते हैं 1 सियाटिका नाडी नितम्व से पैर तक जाती है तथा उसमें वातरक्त, मधुमेह, पसीने में ठंढी हवा लगना, आघात, मोच आदि कारणों से विकृति होने पर पीडा नितम्ब से गुल्फसन्धि तक होती है तथा चरकादि ने भी ऐसा ही वर्णन किया है । स्फित्रपूर्वा कटिपृष्ठोरुजानुनद्वापदं क्रमात् । गृध्रसी स्तम्भरुक्तोदैर्गृ-हाति स्पन्दंते मुहुः ॥ ( च. वातव्याधिचि. )

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२३४ सुश्रुतसंहिता ।

तलं प्रत्यङ्गुलीनां तु कण्डरा चाहुपृष्ठतः ।

बाह्वोः कर्मक्षयकरी विश्वाचीति हि सा स्मृता ॥ ७५ ॥

विश्वाची - बाहुपृष्ट से लेकर हस्ततल की प्रत्येक अड्ड-लियों की कण्डराएं जब प्रकुपित वात से युक्त हो जाती है ।

तत्र वाहु के सकोच - विस्तार रूपी कर्म का तय हो जाता है ।

उसे विश्वाची रोग कहते हैं ॥ ७५ ॥

विमर्श — यह रोग Brachial Nerve तथा Brachial plexus की विकृति से होता है अतः इसे Brachial paralysis or erb's paralysis, or Mono plegia Brachialis कहते हैं ।

वातशोणितजः शोफो जानुमध्ये महारुजः ।

शिरः क्रोष्टुकपूर्व तु स्थूलः क्रोष्टुकमूर्धवत् ॥ ७६ ॥

क्रोष्टुकशीर्ष - जानु सन्धि में बात और रक्त की विकृति से उत्पन्न भयङ्कर पोढाकारी, शृगाल के सिर के समान मोटा जो शोध उत्पन्न होता है उसे क्रोष्टुकशीर्ष कहते हैं ॥ ७६ ॥

विमर्श: - क्रोष्टुकशीर्ष को Hydrops ( हाइड्रोप्स ) या Inflammed Knee ( इन्फ्लेम्ड नी ) कहते हैं । यह पूयमेह, उपदंश, आमवात, आघात आदि कारणों से होता है ।

वायुः कन्यां स्थितः सक्छनः कण्डरामाक्षिपेद्यदा ।

खञ्जस्तदा भवेज्जन्तुः, पङ्गुः सक्थ्नोर्द्वयोर्वधात् ॥७७ ॥ ।

खञ्ज तथा पढ्छु- प्रकुपित वायु कटि प्रदेश में स्थित होकर सक्थि ( टाङ्ग ) की कण्डरा ( सिरा स्नायु तथा नाडी Nerve ) को आक्षिप्त ( चलायमान ) कर देती है तब मनुष्य खक्ष ( लंगड़ा चलने वाला ) हो जाता है तथा दोनों टांगों की कण्डरा, सिरा, स्नायु और नाडियों के वध होने से पद्म ( लूला ) हो जाता है ॥ ७७ ॥

विमर्श: - खञ्ज को Mono plegia cruralis तथा पड्डु को Diplegia कहते हैं ।

प्रक्रामन् वेपते यस्तु खखन्निव च गच्छति ।

कलायत्रनं तं विद्यान्मुक्तसन्धिप्रबन्धनम् ॥ ७८ ॥

कलायलञ्ज - जो मनुष्य चलने के प्रारम्भ में कांपता है तथा लंगड़ाता हुआ चलता है तथा जिसके पादसन्धियों के वन्धन ढीले पड़ गये हों उसे कलायलअ कहते हैं ॥ ७८ ॥

विमर्शः – कलायखञ्ज को लेथेरिज्म ( Lathyrism ) कहते हैं । पहले इस रोग की उत्पत्ति में कलाय जाति की एक विशेष दाल का सेवन कारण माना जाता था किन्तु लव क्या ( अंक Vicis sativa ) नामक दाल के सेवन से होता है ।

न्यस्ते तु विषमं पादे राजः कुर्य्यात्समीरणः ।

वातकण्टक इत्येष विज्ञेयः खुडकाश्रितः ॥ ७६ ॥

वातकण्टक वुडक ( एढी ) में स्थित वात विषम ( ऊंची - नीची ) भूमि पर पांव रखने से उसमें वेदना करती है टसे वातकण्टक रोग कहते हैं ॥ ७ ९ ॥ विमर्शः -- चातकण्टक को स्प्रे डिल ( Sprain Ankle ) कहते हैं |

पादयोः कुरुते दाहं पित्तास्रुक्सहितोऽनिलः ।

विशेषतञ्चङ्क्रमणात्पाददाहं तमादिशेत् ॥ ८० ॥

पाददाह - पित्त तथा रक्त मिश्रित वायु विशेषकर चलने के समय में दोनों पावों में दाह उत्पन्न करती है उसे पा कहते हैं ॥ ८० ॥

हृप्यतश्चरणौ यस्य भवतश्च प्रसुमवत् ।

पाददर्पः स विज्ञेयः कफवातप्रकोपजः ॥ ८१ ॥

पादहर्ष - कफ और वायु के प्रकोप के कारण जिस मनुष्य के दोनों पांव हर्ष ( झनझनाहट ) से युक्त होते हों तथा स्पर्शज्ञान से रहित हो जाते हों उसे पादहर्ष कहते हैं ॥ ८१ ॥

अंसदेशस्थितो वायुः शोषयित्वाऽसबन्धनम् ।

सिराश्चाकुञ्च्य तत्रस्थो जनयत्यत्रबाहुकप् ॥ ८२ ॥

अवबाहुक - अंस ( स्कन्ध ) प्रदेश में स्थित वायु अंस. सन्धि के बन्धनों को शोपित कर अंसशोष रोग तथा वहीं पर स्थित होके स्कन्ध प्रदेश की सिराओं का सङ्कोचन करके अवबाहुक नामक रोग को पैदा करती है ॥ ८२ ॥

विमर्श -कुछ टीकाकारों ने इस श्लोक का अर्थ केवल अवबाहुक रोग वर्णन परक ही किया है । असमूलस्थितो वायु

सिराः सङ्कोच्य तत्रगाः । बाहुप्रसन्दिनहरं जनयत्यवबाहुकन् ॥

( अ. सं ) परन्तु ये अंसशोप और अवबाहुक दो रोग है अतः उनका अर्थ ठीक नहीं है ।

यदा शब्द वहं स्रोतो वायुरावृत्य तिष्ठति ।

शुद्धः श्लेष्मान्वितो वाऽपि वाधिर्यं तेन जायते ॥ ६३ ॥

वाधिर्य - जब शब्द वहन करने वाले स्रोतस ( अकुष्टिक नर्व ) में शुद्ध ( केवल ) वात अथवा कफान्वित वात अव • स्थित होता है तब उससे वाधिर्य रोग की उत्पत्ति होती है ॥८३ ॥

विमर्शः - वाधिर्य को डीफनेस ( Deafness ) कहते हैं । प्रथम कई मास तक कान बहता है जिससे वहां के Nerve का घात हो जाने से वाधिर्य हो जाता है । इसके सिवाय उपर्दश, टायफायड, स्मालपॉक्स ( शीतला ) नादि रोगों में भी बाधिर्य हो जाता है ।

हनुशङ्खशिरोग्रीवं यत्य भिन्दन्निवानिलः ।

कर्णयोः कुरुते शूलं कर्णशूलं तदुच्यते ॥ ८४ ॥

कर्णशूल - जिस मनुष्य के हनुसन्धि, शङ्खप्रदेश, सिर और ग्रीवा को भेदन करती हुई वायु कानों में शूल पैदा करती है उसे कर्णशूल कहते हैं ॥ ८४ ॥

विमर्श: - कर्णशूल को भोटेल्जिया ( Otalgia ) कहते हैं ।

आवृत्य सकफो वायुर्धमनीः शब्दवाहिनीः ।

नरान् करोत्यक्रियकान्मूकमिन्मिनगद्गदान् ॥ ८५ ॥

मूकमिन्मिनगद्गदत्व — कफ के सहित वायु शब्द को | वहन करने वाली धमनियों का अवरोध करके मनुष्यों को भाषणादि क्रियाहीन कर मूक ( गूंगा ), मिन्मिन ( अनु-नासिक स्वर वाला ) तथा गद्गद ( तुतला ) रोगों को पैदा करती है ॥ ८५ ॥

अघो या वेदना याति वर्चोमूत्राशयोत्थिता ।

भिन्दतीव गुदोपस्थं सा तूनीत्यभिधीयते ॥ ८६ ॥

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श्रध्यायः २ ] निदानस्थानम् ।

गुदोपस्थोत्थिता सैव प्रतिलोमविसर्पिणी ।

वेगैः पक्वाशयं याति प्रतितूनीति सा स्मृता ॥ ८७ ॥

तूनी, प्रतितूनी - चर्च ( मल ) के आशय तथा मूत्राशय से उत्पन्न पीढा नीचे को जाकर गुदा और मूत्रेन्द्रिय को फोड़ती हुई सी पीड़ा करती हो उसे तूनी कहते हैं । यदि गुदा और मूत्रेन्द्रिय से उत्पन्न हुई वही पीड़ा जब उलटी ( ऊपर को ) फैल कर वेग से पक्काशय में जाती है तब उसे प्रतितूनी कहते हैं ॥ ८६-८७ ॥ विमर्श: -- तूनी को वृक्कशूल ( Renal colic ' I तथा प्रति-तनी को आन्त्रशूल ( Intestinal colic ) आन्त्र कहा जा सकता है ।

साटोपमत्युग्ररुजमाध्म / तमुदरं भृशम् ।

श्रव्मानमिति जानीयाद्धोरं वातनिरोधजम् ॥ ८८ ॥

आध्मान – प्रकुपित अघो वायु के निरोध से भयङ्कर रूप में उत्पन्न हुये आटोप ( गुड़गुड़ शब्द ) के सहित अत्यधिक पीड़ायुक्त अत्यन्त फूले हुये ( मशक सहश ) उदर को आध्मान कहते हैं ॥ ८८ ॥

बिमर्शः – आध्मान को टिम्पेनाइटिस ( Tympanites ) । या मिडियोरिङम ( Meteorism ) कहते हैं । यह आन्त्र में वायु ( Gas ) के सञ्चय से होता है । आटोपः- आटोपो गुडगुडाशब्द प्रोको नठरसम्भवः । ( भाव प्र ० ) । त्रिमुक्तपार्श्वहृदयं तदेवामाशयोत्थितम् । प्रत्याध्मानं विजानीयात् कफव्याकुलितानिलम् || ८६ ] ] प्रत्याध्मान — यदि कफ वायु के कारण आध्मान की उत्पत्ति आमाशय से प्रारम्भ हो तथा पार्श्व और हृदय में पीड़ा उत्पन्न न करे अथवा मतान्तर से करे तो उसे प्रत्याध्मान कहते हैं ॥ ८ ९ ॥. विमर्शः – प्रत्याध्मान को गेस्ट्रो टिम्पेनाइटिज ( Gastro । tympanites ) कहते हैं ।

अष्टीलाबद्धनं ग्रन्थिमूर्व्वमायतमुन्नतम् ।

वाताष्टीलां विजानीयाद्बहिर्मार्गावरोधिनीम् ॥ ६० ॥

एनामेव रुजायुक्तां वातविण्मूत्ररोधिनीम् ।

प्रत्यष्टीलामिति वदेद्व्जठरे तिर्यगुत्थिताम् ॥ ६१ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने वातव्या-व्याधिनिदानं नाम प्रथमोध्यायः ॥ १ ॥

वाताष्ठीला — अष्ठीला के समान मोटी ( ठोस ), ऊपर को फैली हुई तथा ऊँची उठी हुई तथा बहिर्मार्ग का अवरोध करने वाली ग्रन्यि को वातष्टीला जाननी चाहिये तथा वही ग्रन्यि यदि पीड़ाकर एवं वात, विष्ठा और मूत्र का निरोध करने वाली और उदर में तिरछी उत्पन्न हुई हो तो उसे प्रत्यष्टीला कहते हैं ॥ ९ ० - ९ १ ॥ विमर्श - अष्टीलेति । अष्ठीला उत्तरापथे वर्तुलः पाषाणविशेष । इनि जेज्जटः, कर्मकाराणा वर्तुला दीर्घा टोहमाण्डीति गयदास २३५ चरक तथा वाग्भट ने इन दोनों का उल्लेख नहीं किया है । अष्टीला को ( Prostatic enlargement ) कहते हैं । इत्यायुर्वेदतत्त्वसन्दीपिकाभापाटीकायां वातव्याधिनिदानं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

द्वितीयोऽध्यायः ।

अथातोऽर्शसां निदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अव इसके अनन्तर अर्शोनिदान का वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्शः -- अर्श - अश्वित्प्राणान् शृणानीत्यर्श । अरिवत् प्राणिनो मासकीलने निविशन्ति यत् अशांसि तस्मादुच्यन्ते गुदमार्गनिरो-! घतः ॥ ( वाग्भटः ) ' अशीसोत्यधिमांसविकारा ' ( चरकः ) गुद • | नासादिको स्वचा के मांस में उत्पन्न हुए विकार को अर्श कहते हैं । दोषास्त्वङ्मासमेदासि सन्दूष्न विविधाकृतीन् । मासाङ्कुरानपा-नादौ कुर्वन्त्यशसि ताज ॥ ( माधवः ) साधारण किसी भी अह्न में हुये अर्श को पोलिपस ( Polypus ) कहते हैं, गुदा में उत्पन्न हुये अर्श के अधुरों को हीमोराइड्स या पाइल्स । ( Haemorrhoids or Piles ) कहते हैं । डाक्टरी में इन्हें मांसाहर न मान कर गुदा की सिराओं के अग्रभाग में रक्त-सचय होकर वे फूल जाते हैं उन्ही को अर्श कहते हैं । पडशसि भवन्ति वातपित्तकफशोणितसन्निपातैः सहजानि चेति ॥ ३ ॥

वात, पित्त, कफ, रक्त, इनका सन्निपात तथा सहज ऐसे ६ प्रकार के अर्श होते हैं ॥ ३ ॥

विमर्श - समासतस्तु द्विविधान्यशांसि सहजानि जन्मोत्तर • कालजानि च ' ( अ ० सं ० ) । सहज अर्श को आदिवल प्रवृत्त या कुलज अर्श भी कहते हैं । ' तत्रादिवलप्रवृत्ता ये शुक्रशोणित-दोषान्वया ' कुष्ठार्शप्रभृतयः ' डाक्टरी में अर्श की कुलजप्रवृत्ति नही मानते हैं । वाग्भट तथा चरक ने शुष्क और स्रावी भेद से अर्श के दो भेद किए हैं । ' शुष्कलाविविभेदाच ' ( वाग्भटः ) इनमें वात तथा कफ की अधिकता वाले शुष्क तथा रक्त और पित्त की अधिकता वाले स्त्रावी कहे जाते हैं । वानलेमोक्षणान्नाहु ' शुकासित । प्रात्रावीणि तथार्द्राणि रक्तपित्तोलणानि च ॥ ( च ० चि ० ) । डाक्टरी में वाह्य ( External ) तथा आन्त • रिक ( Internal ) ऐसे अर्श के दो भेद किये हैं । शुष्क या वाह्यार्श ( External piles ) ये गुदौष्ठ के बाहर पहिये के आरे की भांति चारों ओर रहते हैं । प्रत्येक मस्से के मध्य में एक सिरा होती है उसके चारों ओर सौत्रिक तन्तु होते हैं जो त्वचा से ढके रहते हैं । ये अर्श सूखे रहते हैं अत. इन्हें शुष्कार्श कहते हैं । जब ये रगढ़ से, शीतस्पर्श एवं अधिक बैठक, तीघ्र मलावरोध आदि कारणों से प्रकुपित व शोययुक्त हो जाते हैं तब रोगी को चलने - फिरने में कष्ट होता है । परिस्रावी या आन्तरिक या रक्तार्श ( Internal piles or bleeding piles ) ये गुदोष्ठ के भीतर तथा मध्य में अधिक सिराओं से युक्त होते हैं तथा चारों ओर सौत्रिकतन्तु होते हैं तथा सबसे ऊपर

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३३६ सुश्रुतसंहिता । श्लैप्मिक कला का आवरण चढा रहता है । प्रारम्भ में कोमल तथा बाद में रगड आदि से कठोर हो जाते हैं । शौच करते सुमय ये बाहर भी आ जाते हैं तथा इनसे ग्लेप्मा ( Inous ) और रक्त का स्राव होना है । तत्रानात्मवतां यथोक्ते. प्रकोपणैर्विरुद्धाध्यशनस्त्री-प्रसङ्गोत्कटुकासनपृष्ठयान वेगविधारणादिभिर्विशेषैः प्र कुपिता दोपा एकशो द्विशः समस्ताः शोणितसहिता वा यथोक्तं प्रसृताः प्रधानघमनीरनुप्रपद्याधो गत्वा गुढ़-मागम्य प्रदूष्य गुदवलीर्मासप्ररोहाञ्जनयन्ति, विशेषतो | मन्दाग्नेः, तथा तृणकाष्ठोपललोष्ठव खादिभिः शीतोदक-संस्पर्शनाद्वा कन्दाः परिवृद्धिमासादयन्ति तान्यर्शा-सीत्याचक्षते ॥ ४ ॥

पूर्व में कहे हुये प्रकोपक कारणों से एवं विरुद्ध भोजन, अध्यशन ( मुक्तस्योपरि भोजनम् ), स्त्री के साथ सम्भोग, उकडा आसन लगा कर बैठना, घोडे, बैल और ऊंट की पीठ पर सवारी करना और अधारणीय वेगों के धारण करने असं यमी पुरुषों के प्रकुपित हुये वातादि दोष अकेले, दो दो मिल-कर, समस्त दोष मिलकर या रक्त के सहित अनेक प्रकार से प्रसृत होकर शरीर की प्रधान धमनियों का आश्रय लेके उनके द्वारा नीचे जाकर गुद में आके गुदा की वलियों को दूषित करके उनमें मांस के अङ्कुर उत्पन्न करते हैं । मन्दाग्नि वाले मनुष्य में यह रोग विशेष रूप से उत्पन्न होता है मांसार ( मस्मे ) तृण, काष्ट, पत्थर, ढेला, वस्त्र रगढ़ से अथवा शीतल पानी के अधिक स्पर्श से प्राप्त होते हैं उन्हीं को अर्श कहा जाता है ॥ ४ ॥

— त्रिमर्शः —– उत्कटुकासन – ' गुहागिसमायोग सनम् ' अशहेतु. - प्रधान रूप से चिरकालिक कारण दस्त जाते समय प्रवाहण करने से एवं । तथा ये इत्यादि की परिवृद्धि को प्रादुरुत्कटुका-विन्ध के मूत्राश्मरी, अष्टीलावृद्धि, यकृददात्युदर, जलोदर तथा स्त्रियों में गर्भावस्था, गर्भाशय के अर्बुद आदि से अर्श उत्पन्न होता है । सम्प्राप्ति मलाशय की सिराओं की विकृति है । मलाशय की सिराएं लम्बाई की ओर होती हैं तथा उनमें कपाट नहीं होते हैं अतः प्रवाहणादि कारणों से इनमें रक भर जाता है तथा ये सिराएं फूल कर मस्से वन जाते हैं । तत्र स्थूलान्त्रप्रतिबद्धमर्द्धपञ्चाङ्गुलं गुदमाहुः तस्मिन् वलयस्तिस्रोऽध्यर्द्धाङ्गुलान्तरसम्भूताः प्रचा-हणी विसर्जनी संवरणी चेति ॥ ५ ॥

/ गुदवर्णन — शरीर में स्थूलान्त्र के आखिरी भाग के साथ मयुक्त अर्धयुक्त पांच ( 11 ) भड्डुल अथवा अर्धाङ्गुलरहित पांच ( । ) अड्डठ गुदा होती है । उसमें डेढ डेढ अङ्गुल के अन्तर पर प्रवाहणी, विसर्जनी तथा सवरणी नाम की तीन वलियां होती हैं ॥ ५ ॥

चतुरङ्गुलायताः सर्वास्तिर्यगेकाङ्गुलोच्छ्रिताः ।

शङ्खावर्तनिभाश्चापि उपर्युपरि संस्थिता ॥ ६ ॥

गजवालुनिभाश्चापि वर्णतः सम्प्रकीर्त्तिताः ।

रोमान्तेभ्यो यत्राध्यर्द्धा गुदौष्टः परिकीर्त्तितः ॥ ७ ॥

प्रथमा तु गुदौष्ठादङ्गुलमाने ॥ ८ ॥

उक्त तीनों वलियां मिलकर चार अड्गुल लम्बी, एक अङ्गुल टेढ़ी उभरी हुई एवं शङ्ख के आवर्त की तरह एक के ऊपर एक रहती हैं । इनका रङ्ग हाथी के तालु के समान कुछ काला -लाल होता है । रोम प्रान्तों से गुढौष्ठ डेढ यव ऊपर होता है तथा प्रथम संवरणीवली गुदौष्ट से एक अड्डुल दूर होती है ॥ ६८ ॥

विमर्श: -- अर्धपञ्चाङ्गुलम् - अर्द्धहीन पन्चाङ्गुलमर्द्धपञ्चाङ्गुल सा चतुरङ्गुलप्रमाणमित्यर्थं । वय्य. = गुढावयवभूतास्त्वक्सकोचा, तिन अध्यर्धागुलान्तरसम्भूता सार्धैकालान्तरिता, मलस्याधः पीटनात्प्रथमा प्रत्राहिणी, गुदविस्फारणेन मलविसर्जनाद् द्वितीया विसर्जनी, गुदसङ्कोचन्याख्य पेशीद्वयकृता चक्राकारा वलिस्तु सवर • णी नाम | आसामवस्थितिक्रममाद्दाष्टाङ्गहृये - ' वलय. प्रवाहणी तासा-मन्तर्मध्ये विसर्जनी | वाह्या सवरणी तस्या गुदोष्ठो वहिरडुले ॥ ' इति । यवाध्यर्थ. = सार्वो यवः, अड्डलस्य त्रियवप्रमाणत्वावर्षाङ्गुट-परिमितो देश इत्यर्थं । भौजेऽप्युक्तम्- ' रोमान्तेभ्यॊ यवाध्यर्थं गुदोष्ठ परिचक्षते । गुदोष्ठादगुल चैव प्रथमा ता वलिं विदु । साधका-मानेन अन्ये च परिकीर्तिते ॥ ' इति । प्रत्यक्ष शारीर में इस साढ़े चार अतुल लम्बे गुद के निम्न भाग किये हैं- गुदौष्ठ ( Anus ) गुदनलिका ( Anal canal ) और मलाशय ( Rectum ) का आखिरी इन्च भर हिस्सा वलियों को छल्ले, झुर्रियां या सल-वटै ( Transverse folds called Houston's valves ) कहते हैं । गुदौष्ठ से तीसरी वली तक गुदनलिका की लम्बाई चार अगुल होती है तथा इस चार अङ्गुल के स्थान में जो सिराएं होती हैं उन्हीं में अर्श होता है । तेपां तु भविष्यतां पूर्वरूपाणि - अन्नेऽश्रद्धा कृच्छा-त्पत्तिरम्लीका परिदाहो विष्टम्भः पिपासा सक्थिसदन-माटोपः कार्श्यमुद्भारवाहुल्यमक्ष्णोः श्वयथुरन्त्रकूजनं गुद-परिकर्तनमाशङ्का पाण्डुरोगग्रहणीदोषशोपाणां कास-श्वासौ बलहानि भ्रमस्तन्द्रा निद्रेन्द्रियदौर्बल्यं च ॥ ६ ॥

/ अर्श: पूर्वरूप - उत्पन्न होने वाले अर्श के पूर्वरूप की अवस्था में भोजन करने में अनिच्छा, कठिनाई से अन्न का पचना, खट्टी डकारें आना, जलन, पेट में अफारा होना, प्यास लगना, टांगों में थकावट, पेट में गुड़गुड़ शब्द होना, शरीर की कृशता, ढकारें अधिक आना, आंखों में सूजन, आंतों में कूजन, गुद में कैंची से कतरने की सी पीडा होना तथा पाण्डु, सङ्ग्रहणी तथा उदर रोग होने की शङ्का होना, एवं कास, श्वास, बलहानि, भ्रम, तन्द्रा, निद्रा तथा अन्य इन्द्रियों की । दुर्बलता आदि लक्षण होते हैं ॥ ९ ॥

जातेष्वेतान्येव लक्षणानि प्रव्यक्ततराणि भवन्ति ॥१० ॥

अर्श के उत्पन्न होने पर ये ही उक्त लक्षण अधिक स्पष्टरूप से प्रगट हो जाते हैं ॥ १० ॥

तत्र मारुतात्परिशुष्कारुणविवर्णानि विषममध्यानि कदम्बपुष्पतुण्डिकेरीनाडीमुकुलसूचीमुखाकृतीनि च भवन्ति । तैरुपद्रुतः सशूलं संहतमुपवेश्यते, कूटी-पृष्ठपार्श्वमेढ्रगुदनाभिप्रदेशेषु चास्य वेदना भवन्ति,

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श्रध्यायः २ ] निदानस्थानम् । २३७

गुल्माष्ठीलाप्लीहोदराणि चास्य तन्निमित्तान्येव भवन्ति, ।

कृष्णत्वङ्नखनयनदशनवदनमूत्रपुरीषञ्च पुरुषो भवति ॥ ।

वातारी - वायु की अधिकता से अर्श ( मस्से ) सूखे, लाल, काले - नीले, बीच में से नीचे - ऊंचे तथा कदम्ब के फूल के समान या वनकार्पास के फूल सदृश, अथवा नाडी ( नालिका ) के सदृश किंवा पुष्प के मुकुल के समान किंवा सूई के मुख के । समान तीखी नोक वाले होते हैं । इनसे पीडित मनुष्य शूल के । साथ सख्त मल का त्याग करता है तथा उस मनुष्य की कटि, पृष्ठ, पार्श्व, मेद, गुदा और नाभि के स्थानों में पीड़ा होती है । तथा उन्हीं से गुल्म, भष्ठीला तथा प्लीहा वृद्धि रोग उत्पन्न होते हैं एवं उस पुरुष की त्वचा, नख, नेत्र, दन्त, मुख, मूत्र और मल ये काले हो जाते हैं ॥ ११ ॥

पित्तान्नाग्राणि तनूनि विसर्पाणि पीतावभासानि यकृत् - प्रकाशानि शुकजिह्वासंस्थानानि यत्रमध्या निजलौ-कोवक्त्रसदृशानि प्रक्लिन्नानि च भवन्ति । तैरुपद्रुतः सदाहं सरुधिरमतिसार्यते, वरदाहपिपासामूर्च्छाचा-स्योपद्रवा भवन्ति, पीतत्वङ्नखनयनदशनवदनमूत्रपु - | रीषश्च पुरुषो भवति ॥ १२ ॥

पित्तार्श - अग्रभाग में नीले, पतले, फैलने वाले, कुछ पीलेपन से युक्त, यकृतं के समान चमकते हुये एवं तोते की जीभ के समान आकृति वाले, बीच में यव के सहरा मोटे, जलौका के सुख के समान स्वरूप तथा क्लेद ( स्राव ) युक्त होते हैं । इनमे पीडित मनुष्य दाह तथा रक्तयुक्त दस्ते करता है तथा ज्वर, दाह, पिपासा और मूर्च्छा ये उपद्रव होते हैं एवं उस पुरुष की त्वचा, नख, नेत्र, दन्त, मुख, मूत्र और मल पीले हो जाते हैं ॥ १२ ॥

श्लेष्मजानि श्वेतानि महामूलानि स्थिराणि वृत्तानि स्निग्धानि पाण्डूनि करीर पनसास्थिगोस्तनाका -राणि न भिद्यन्ते न सन्ति कण्डूबहुलानि च भव-न्ति । तैरुपद्रुतः सश्लेष्माणमनल्पं माँसधावनप्रकाश-मतिसार्यते, शोफशीतज्वरारोचका विपाक शिरोगौरवा -णि चास्य तन्निमित्तान्येव भवन्ति, शुक्लत्वनखनयन-दशनवदनमूत्रपुरीपश्च पुरुषो भवति ॥ १३ ॥

श्लेष्मार्श — श्वेत, मूलभाग में मोटे, कठिन, गोल, चिकने, वर्ण में पाण्डु तथा करीर ( मरुस्थल द्रुम ) फल और कटहल की गुठली एवं द्वाता के स्वरूप के होते है एवं न तो फूटते हैं और न रक्तादि का स्रवण करते हैं एवं उनमें खुजली अधिक चलती है । श्लैष्मिक अर्श से पीड़ित मनुष्य कफयुक्त, मांस के धावन के समान अधिक मात्रा में मल का उत्सर्ग करता है तथा अर्श के ही कारण शरीर में शोथ, शीतज्वर, अरुचि, मन्दाग्नि तथा सिर में भारीपन ये उपद्रव उत्पन्न होते हैं एवं उस मनुष्य की त्वचा, नख, नेत्र, मुख, मूत्र और मल श्वेत वर्ण के हो जाते हैं ॥ १३ ॥

रक्तजानि न्यग्रोधप्ररोहविदुमकाकणन्तिका फलसह शानि पित्तलक्षणानि च यदाऽवगाढपुरीषप्रपीडितानि भवन्ति तदाऽत्यर्थं दुष्टमनल्पमसृक् सहसा विसृजन्ति, तस्य चातिप्रवृत्तौ शोणितातियो गोपद्रवा भवन्ति ॥ १४ ॥

रक्तार्श - वट के अड्डर, मूंगा तथा गुञ्जा फल के समान लाल वर्ण के तथा पित्त के लक्षणों से युक्त होते हैं । जब मनुष्य बढ़ी सख्ती से मल त्याग करता है तब उसके मल की रगड़ से पीडित ( घर्पित ) हो कर अत्यधिक मात्रा में दूषित रक्त का सहसा स्राव करते हैं । उस रक्तस्रुति या रक्तार्श के अधिक बढने पर रक्त के अधिक स्रवण रूपी अतियोग से उत्पन्न उप-द्रव होते हैं ॥ १४ ॥

विमर्श - उपद्रवा शोणितवर्णनीये प्रागुक्ता. - ' तदतिप्रवृत्तं शिरोऽभितापमान्ध्यमधिमन्थतिमिरप्रादुर्भाव धातुक्षयमाक्षेपक पक्षा-घातमेकाङ्गविकार तृष्णादाही हिक्का कास श्वासं पाण्डुरोग मरण चापा-दयति ' इति । स्थानिक उपद्रवों में मलाशय शोथ ( Proctitis ), गुद विद्रधि ( Reotal abscess ), भगन्दर ( Anal fistula ), गुद-चर ( Anal fissure ), गुद का केन्सर ( Cancer ) ये मुख्य हैं अत एव भर्श की चिकित्सा में देरी नहीं करनी चाहिये । तेषा प्रशमने यलमाशु कुर्याद्विचक्षण । तान्याशुहि गुद वद्ध्वा

कुर्याद्वद्धगुदोदरम् ॥ ( चरकः ) ।

सन्निपातजानि सर्वदोषलक्षणयुक्तानि ॥ १५ ॥

सन्निपातज अर्श सर्व दोपों के लक्षणों से युक्त होते हैं ॥१५ ॥

विमर्श: - चरक ने सभी अर्शों को सान्निपातिक माना है ---पश्चात्मा मारुत पित्त कफो गुदवलित्रयम् । सर्वं एव प्रकुप्यन्ति गुद जाना समुद्भवे ॥ अशसि खलु जायन्ते नासन्निपतितैस्त्रिभि ' । दोषॆ-र्दोषविशेषान्तु विशेष कल्प्यतेऽर्शसाम् ॥ ( च, चि. अ. १४ ) । सहजानि दुष्टशोणित शुक्रनिमित्तानि, तेषां दोषत-एव प्रसाधनं कर्त्तव्यम् । विशेषतश्चैतानि दुर्दर्शनानि परुषाणि पाण्डूनि दारुणान्यन्तर्मुखानि । तैरुपद्रुतः कृशोऽल्पभुक् सिरासन्ततगात्रोऽल्पप्रजः क्षीणरेताः तामस्वरः क्रोधनोऽल्पाभिप्राणः परमलसश्च तथा घ्राण-शिरोऽक्षिनासाश्रवणरोगवान्, सततमन्त्रकूजाटोपहृद-योपलेपारोचकप्रभृतिभिः पीड्यते ॥ १६ ॥

सहजा - ये गर्भाधान के समय माता के दुष्ट रक्त ( Ova ) पिता के दुष्ट ( Spermetozoa ) के कारण उत्पन्न होते हैं । इन सहजाशों में भी दोषों के अनुसार ही प्रसाधन ( भेद ) करना चाहिये अथवा दोपों के अनुसार ही प्रसाधन ( चिकित्सा ) की जानी चाहिये । ये अर्श विशेषतया कठि नता से दिखाई देने वाले, स्पर्श में कठोर, वर्ण में पाण्डु, दारुण । ( दुःखदायी ) तथा अन्तर्मुख ( या अन्तर्बली में ) होते हैं । इनसे पीड़ित मनुष्य दुर्वल, अल्प भोजन करने वाला, शरीर पर सिराओं के उभार से युक्त, कम सन्तान वाला, क्षीणवीर्य, दुर्बल स्वर, क्रोधी, अल्प पाचकानि युक्त तथा नासा, शिर, नेत्र और कानों के रोग से पीडित एवं निरन्तर आन्त्र में कूकू शब्द, तथा आटोप ( गुड़गुड़ाहट ), होना तथा हृदय पर भारीपन, अरुचि आदि लक्षणों से पीड़ित रहता है ॥ १६ ॥

विमर्श: - सहजार्श को Congenital piles कहते है ।

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२३८ सुतसहिता | डाक्टरी में सहजारी नहीं माना है । अन्तविद्रधिवद दु खेन दृश्यन्ते लोमा ( Condyloma ), ग्रेन्युलोमा ( Granuloma ) तथा इति दुर्दर्शनानि । हाराणचन्द्रस्तु दुर्दर्शनान्यनिदीर्घादिनो भय- | पॉलिपस ( Polypus ) इन रोगों में हो सकता है । वाग्भट ने राणि, ‘ सहनान्यर्शसि कानिचित्रणूनि कानिचिन्महान्ति कानिचिद्दी -र्धाणि च ' इत्यात्रेय इत्याह ।

भवति चात्र-वाह्यमध्यवलिस्थानां प्रतिकुर्याद्धिपग्वरः ।

अन्तर्बलिसमुत्थानां प्रत्याख्यायाचरेत् क्रियाम् ॥ १७

इस विषय में कहा है कि जो अर्श बाह्य ( संवरणी वली-जो कि Spinoterani नामक दो पेशियों से बनी है ) वली तथा मध्यम ( चिम्पर्जनी ) वली में होते हैं उनका प्रतीकार ( चिकित्मा ) करना चाहिये तथा जो अन्तर्वली ( प्रवाहणी ) मैं हो उनकी चिकित्सा ( निपेध करके या असाध्य कह कर ) करनी चाहिये ॥ १७ ॥

विमर्शः - असाध्य रोग की चिकित्सा करने से वदनामी होती है - अर्थविद्यायशोहानिमुनको मसग्रहन् । प्राप्नुयात्रियत वैद्यो योऽमाध्य समुपाचरेत् । ( च. ) । चरके असाध्याशलक्षणानि यथा — हस्ते पादे मुखे नाभ्या गुदै वृपणयोस्तथा । चौथो हत्पार्श्वशूल च यस्यामाध्योऽर्शमो हि स ॥ हन्पार्श्वशूल सम्मोहरविरहस्य रुग्ज्वरः । तृष्णा गुदस्य पाकश्च निहन्युर्गुदनातुरम् ॥ ' इति । अर्श के भयङ्कर होने पर गुदपाक हो के रक्त में विपके मिलने से विषमयता ( Toxaemis ) तथा पूय के मिलने से पूयमयता ( Pyaemia ) हो कर अनेक उपद्रव होने से असाध्यता होती है । आधुनिक शस्त्र कर्म से अशं की असाध्यता अधिकतर नहीं रही है । प्रकुपितास्तु दोषा मेढ्मभिप्रपन्ना मांसशोणिते प्रदूष्य काण्डं जनयन्ति, ततः कण्डूयनात् क्षतं समुप जायते, तस्मिंश्च चते दुष्टमांसजाः प्ररोहाः पिच्छिल-रुधिरस्राविणो जायन्ते कूर्चकिनोऽभ्यन्तरमुपरिष्टाद्वा, ते तु शेफ विनाशयन्त्युपन्नन्ति च पुंस्त्वम् | योनिमभि-प्रपन्नाः सुकुमारान् दुर्गन्धान् पिच्छिलरुधिरस्राविण -श्छत्राकारान् करीराञ्जनयन्ति, ते तु योनिमुपन्नन्त्या-तवं च ॥ १८ ॥

लिगा -- प्रकुपित हुये वातादि दोष मेढ ( लिङ्ग ) में जा कर चहां के मांस तथा रक्त को दूषित कर उसमें प्रथम खुजली पैदा करते हैं । खुजलाने से वहां चत ( वाच = Ulcer ) बन जाता है तथा उम क्षत में कूर्च के आकार के शिश्न की सुपारी ( मणि ) पर या चर्म के ऊपर दूपित मांस के अडर पैदा होते तथा उनसे लसदार रक्कका स्राव होता है तथा अधिक चढ़ कर वे अङ्कुर लिन तथा पुस्त्व को नष्ट कर देते हैं तथा स्त्री के योनि में कुपित हुये वातादि दोष वहां के मांस तथा रक्त को दूषित कर कोमल, दुर्गन्ध युक्त, चिपचिपे रक्त का स्राव करने वाले तथा छत्र के आकार के अङ्कुर उत्पन्न करते हैं । ये अङ्कुर योनि तथा आर्त्तव का विनाश कर देते हैं ॥ १८ ॥

विमर्श: - ढाक्टरी में अर्श ( Piles ) का स्थान गुदा ही माना है तथा लिङ्गादि पर होने वाली अडर स्वरूप की विकृति । का समावेश पेपिलोमा ( Papilloma ), चार्ट ( Wart ), काण्टि इन्हें लिनार्श कहा है । आयुर्वेद में गुढा के अतिरिक्त मेढ, नामि • स्थानों में भी अर्श होना लिखा है । मेादिष्यपि वक्ष्यन्ते

यथास्व नाभिजानि च । गण्डूपदास्यरूपाणि पिच्छिलानि मृदूनि च ॥

नाभिमभिप्रपन्नाः सुकुमारान् दुर्गन्धान पिच्छि ॥ लान् गण्डूपदमुखसदृशान् करीराञ्जनयन्ति । त-एवोर्ध्वमागताः श्रोत्राक्षिघ्राणवदनेप्यर्शास्युपनिर्वर्तय-न्ति । तत्र कर्णजेषु वाधिर्यं शूलं पूतिकर्णता च, नेत्रजेषु वर्मावरोधो वेदना स्रावो दर्शननाशश्च घ्राणनेपु प्रति-| श्यायोऽतिमात्रं क्षवथुः कृच्छ्रोच्छ्वासता पूतिनस्यं सानुनासिकवाक्यत्वं शिरोदुःखं च । वक्त्रजेषु कण्ठी-ष्ठतालूनामन्यतम स्मिंस्तैर्गद्दवाक्यता रसाज्ञानं मुखरो-गाश्च भवन्ति ॥ १६ ॥

प्राप्त हुये वातादि दोष कोमल, दुर्गन्धित, चिप-चिपे, गण्डूपद ( केंचुएं ) के मुख के आकार के करीरों ( अङ्कुरों ) । को पैदा करते हैं । वे ही वातादि दोष दशरीर के ऊर्ध्व भाग में आकर कर्ण, नेत्र, नासा और मुख इन स्थानों में अर्श उत्पन्न करते हैं । कर्णजन्य अर्श होने पर बहरापन, शूल तथा पूर्ति -| कर्णता ये रोग उत्पन्न होते हैं । नेत्र में अर्श होने पर वर्क्स की गति में बाधा, पीढ़ा, स्त्राव तथा दर्शन - शक्ति का नाश ये लक्षण उत्पन्न होते हैं । नासा में अर्श उत्पन्न होने पर प्रति-या ( काम ), अधिक छींके आना, कठिनता से सांस लेना, नासा - दौर्गन्ध्य, अनुनासिक वाक्यों का उच्चारण और शिर में पीढा ये लक्षण उत्पन्न होते हैं । मुम्न में कण्ठ, ओष्ठ तथा तालु इनमें से किसी एक अङ्ग पर अर्श उत्पन्न होने से गद्गद ( अस्पष्ट ) वाक्य का उच्चारण, रस का ठीक ज्ञान न होना तथा अन्य मुख-रोग उत्पन्न होते हैं ॥ १ ९ ॥ व्यानस्तु प्रकुपितः श्लेष्माणं परिगृह्य वहिः स्थिरा-णि कीलवदर्शासि निर्वर्त्तयति, तानि चर्मकीलान्यर्शा-सीत्याचक्षते ॥ २० ॥

/ चर्मकील - प्रकुपित व्यान वायु कफ साथ संयुक्त होकर त्वचा के बाह्य प्रदेश पर स्थित तथा कोल के समान अर्श उत्पन्न करता है उस अर्श को चर्मकील कहते हैं ॥ २० ॥

विमर्शः - ज्यानो गृहीत्वा श्लेष्माण करोत्यर्शस्त्वचो वहि । कीठोपम स्थिरसर चर्मकीलन्तु तद्विदु ॥ ( माधव नि. ) ।

भवन्ति चात्र-तेषु कीलेषु निस्तोदो मारुतेनोपजायते ।

श्लेष्मणा तु सवर्णत्वं ग्रन्थित्वं च विनिर्दिशेत् ॥ २१ ॥

पित्तशोणितजं रौक्ष्यं कृष्णत्वं शुक्लता तथा ।

समुदीर्णखरत्वं च चर्मकीलस्य लक्षणम् ॥ २२ ॥

वात दोष की अधिकता होने से उन चर्मकीलों में सूई चुभोने की सी पीडा होती है तथा कफ दोष की अधिकता से उनका कफ के समान श्वेत रङ्ग तथा ग्रन्थि समान आकार का होता है । पित्त और रक्त की दृष्टि से उनमें कालापन तथा