श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 271–280

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 271–280

पृष्ठ 271

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श्रध्याय ४६ ] सूत्रस्थानम् । ३१६

जन्तवो ये तु तेषां हि चिन्तेयं परिकीर्त्यते ॥ ४४६ ॥

बलिनः खरभच्या ये ये च दीप्ताग्नयो नराः ।

कर्मनित्याश्च ये तेषां नावश्यं परिकीर्त्यते ॥ ४५० ॥

इति सर्वानुपानवर्गः । जो विशेष कर्म ( परिश्रम - कार्य ) नहीं करते हैं, जिनकी पाचकानि मन्द हो, जिनका आरोग्य ( स्वास्थ्य ) ठीक न हो जो सुकुमार तथा आराम के अभ्यासी हों उन प्राणियों के लिये भचयादि पदार्थों के गुरु - ला ar का विचार किया जाता है किन्तु जो बलवान् हों, जो खर ( चने, मकई, ज्वार आदि दुर्जर ) पदार्थ खाते हौं तथा जिनकी अग्नि प्रदीप्त हो और जो रात - दिन परिश्रम का कार्य करते हों उनके लिये द्रव्यों के गुरु - लाघव के विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है ॥

अथाहारविधिं वत्स! विस्तरेणा खिलं शृणु ।

आप्तान्त्रितमसङ्कीर्ण शुचि कार्य महानसम् ॥ ४५१ ॥

तत्राप्तैर्गुणसम्पन्नमन्नं भच्यं सुसंस्कृतम् ।

शुचौ देशे सुसंगुप्तं समुपस्थापयेद् भिषक् ॥ १५२ ॥

त्रिपन्नैरगदैः स्पृष्टं प्रोक्षितं व्यजनोदकैः ।

सिद्धैर्मन्त्रैर्हतविपं सिद्धमन्नं निवेदयेत् ॥ ४५३ ॥

हे वत्स! अब सम्पूर्ण आहार - विधि को विस्तार से कहता हूं सो सुनो । महानस ( रसोई घर ) - हित चाहने वाले नोकरों से युक्त, सङ्कीर्णता ( स्थानतंगी ) से रहित तथा पवित्र होना चाहिये । उस रसोई घर में हितकारी रसोइयों द्वारा अच्छी प्रकार से संस्कृत ( सिद्ध ) किया हुआ एवं गुणों से युक्त भोजन को महानस वैद्य पवित्र स्थान में छिपा कर सुरक्षित रखे । फिर विपनाशक ओषधियों से हुआ कर जलयुक्त पंखे से प्रोतित कर तथा सिद्ध मन्त्रों से भोजन के विप - प्रभाव को नष्ट कर सिद्ध हुये अन्न को राजा या अन्य गृहबन्धुओं को परोसना चाहिये ॥ ४५१-४५३ ॥

वक्ष्याम्यतः परं कृत्स्नमाहारस्योपकल्पनाम् ।

घृतं कार्ष्णायसे देयं पेया देया तु राजते ॥ ४५४ ॥

फलानि सर्वभक्ष्यांश्च प्रदद्याद्वै दलेषु च ।

परिशुष्कप्रदिग्धानि सौवर्णेषु प्रकल्पयेत् ॥ ४५५ ॥

प्रद्रवाणि रसांश्चैव राजतेपूपहारयेत् ।

कट्वराणि खडांश्चैव सर्वान् शैलेषु दापयेत् ॥४५६ ॥

दद्यात्ताम्रमये पात्रे सुशीतं सुतं पयः । पानीयं पानकं मद्यं मृन्मयेषु प्रदापयेत् ॥ ४५७ ॥!

काचस्फटिकपात्रेषु शीतलेषु शुभेषु च ।

दद्याद्वैदूर्यपात्रेषु रागपाडवसट्टुकान् ॥ ४५८ ॥

पुरस्ताद्विमले पात्रे सुविस्तीर्णे मनोरमे ।

सूदः सूपौदनं दद्यात् प्रदेहांश्च सुसंस्कृतान् ॥ ४५६ ॥

फलानि सर्वभक्ष्यांश्च परिशुष्काणि यानि च ।

तानि दक्षिणपार्श्वे तु भुञ्जानस्योपकल्पयेत् ॥ ४६० ॥

प्रद्रवाणि रसांचैव पानीयं पानकं पयः ।

खडान् यूपांश्च पेयांश्च सव्ये पार्श्व प्रदापयेत् ॥ ४६१ ॥

सर्वान् गुढविकारांश्च रागपाडवसट्टकान् ।

पुरस्तात् स्थापयेत् प्राज्ञो द्वयोरपि च मध्यतः ॥ ४६२ ॥

एवं विज्ञाय मतिमान् भोजनस्योपकल्पनाम् ।

भोक्तारं विजने रम्ये निःसम्पाते शुभे शुचौ ॥ ४६३ ॥

सुगन्धपुष्परचिते समे देशेऽथ भोजयेत् ॥ ४६४ ॥

अब इसके अनन्तर आहार की सम्पूर्ण उपकल्पना अर्थात् परोसने आदि विधि का वर्णन करता हूं । घृत — कृष्ण लोह के पात्र में परोसना चाहिये । पेय पदार्थ - चांदी के पात्र में, फल तथा सर्व प्रकार के भक्ष्य पदार्थ - ढाक, केला आदि के पत्रों पर परोसना चाहिये । सूखे तथा दही छाछ से प्रदिग्ध पदार्थ- सुवर्ण के पात्र में परोसे । द्रवपदार्थ तथा माँस - फलादि रस - चांदी के पात्र से देवें । कट्वर ( तक्र ) तथा खढयूषों को पत्थर की कटोरियों में परोसे । अच्छी प्रकार उबाल कर ठीक रूप से शीतल किया हुआ जल - ताम्बे के पात्र में सर कर देना चाहिये । अथवा पानी, पानक और मर्योों को मिट्टी के बने हुये क्टोरों में भरकर देवें । अथवा शीतल और शुभ्र | काच और स्फटिक के पात्रों में पानी, पानक और मद्य भर कर देवे एवं राग पाठव और सहक को वैडूर्य के विचित्र पात्रों में रख कर परोसे । सामने के निर्मल तथा चौड़े और मनोहर पात्र ( कटोरी ) में सूप ( दाल ) तथा थाली में चावल तथा चटनी, रायता आदि सुसस्कृत लेहा पदार्थ परोसे । फल, सर्व प्रकार के भचय तथा अन्य सूखे ( पापड़ फली ) पदार्थ - भोजन करने वाले के दक्षिण पार्श्व में रखने चाहिये । अधिक द्रव पदार्थ, मांसादि रस, पीने का पानी, पानक ( पना ), दुग्ध, खड, यूप और अन्य पेय पदार्थों को भोक्ता के वामपार्श्व में रखे । गुड के बने हुये सर्व प्रकार के पदार्थ, रागपाडव और सट्टक इन्हें भोक्ता के सम्मुख तथा अन्य दायें - बायें रखे पदार्थों के मध्य में बुद्धिमान, परोसने वाला परोसे । इस प्रकार बुद्धिमान वैद्य अथवा पर्यवैपक ( रसोइया ) भोजन की परोसकारी करके भोक्ता को एक तरफ, रमणीक, बाधारहित, शुभ, पवित्र, सुगन्धित पुष्पों से रचित समान प्रदेश में बिठाकर भोजन करावे ॥ ४५४ - ४६४ ॥ विमर्श. -- परिशुल्कमांसम् - सिक्त बहुघृते भृष्ट मुहुम्णाम्बुना मृदु । जीरकाद्यर्धन मास परिशुष्क तदुच्यते ॥ प्रदिग्धमांसं - तदेव गोरसादाम प्रदिग्धमिति विश्रुतम् । कट्वरलक्षणम् - सौवीराम्लमथा-त्यम्ल काजि कट्वर विदु । अन्ये तु तदधोभाग तक्र वा ह्यम्लता गतम् । सस्नेह दधिन तक्रमाहुरन्ये तु कट्वरम् । रागः -- सिता-रुचकसिन्वृत्यैः सवृक्षाम्लपरूपकैः । जम्बूफलर सैयुंक्तो रागो राजि-कया कृतः ॥ सट्टकम् – लबन व्योपसण्डैस्तु दधि निर्मथ्य गालि तन् । दाडिमवीनसयुक्त चन्द्रचूर्णावचूर्णितम् । सट्टकन्तु प्रमोदास्य नलादिमिरुदाहृतन् ॥

विशिष्टमिष्टसंस्कारैः पथ्यैरिष्टै रसादिभिः ।

मनोज्ञं शुचि नात्युष्णं प्रत्यप्रमशनं हितम् ॥ ४६५ ॥

स्वाभीष्ट कल्पनाविधि से बनाया हुआ तथा पथ्यकर और अनुकूल रसादियों से युक्त, मनोज्ञ, पवित्र, न अधिक उष्ण तथा तुरन्त का बना भोजन हितकर होता है ॥ ४६५ ॥

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सुश्रुतसंहिता । २२० रसौ । हृत. ॥ ' इति । सात्म्य हितकारि, लघु, स्निग्ध, क्षिप्र नातिद्रुत नाति-पूर्वं मधुरमश्नीयान्मध्येऽम्ललवणौ || ४६६ || विलम्बितम्, तथा चात्रेयः - ' नातिद्रुतमश्नीयात् तथा नातिविलम्बित-पञ्चाच्छेषान् रसान् वैद्यो भोजनेष्ववचारयेत् महनीयात् ' इति । उष्ण द्रवोत्तर द्रवप्रधानम्, बुभुक्षित. भोजनकाले भोजन विधि - भोजन में प्रथम मधुर पदार्थों का सेवन बुभुक्षित, अकाले बुभुक्षानिपेधं स्वयमेव वक्ष्यति - ' भवत्यकालेऽपि करना चाहिये । मध्य में अम्ल तथा लवण रस वाले पदार्थ तदा वुभुक्षा या मन्दबुद्धिं विषवन्निहन्ति ' । मात्रावत, न त्वमात्रावत्; खाने चाहिये । अन्त में शेष कटु - तिक्तादि रसों वाले पदार्थों अन्यथाऽशुभ स्यात् । तदुक्त चरके - ' त्रिविध कुक्षी स्थापयेदवकाशाश का सेवन करना चाहिये ॥ ४६६ ॥ माहारमुपयुआन " तथवा- एकमवकाशाश मूर्त्तानामाहारविकाराणामेक

विमर्शः --- पकाशयादिगत वातशान्त्यर्थ प्रथम मधुर रस, द्रवाणामेक पुनर्वातपित्तश्लेष्मणाम्, एतावतीं पाहारमात्रामुपयुञ्जानो पित्ताशयगत पित्त तथा अग्न्याशयस्थ अग्निदीप्त्यर्थं मध्य में नामात्राहारज किञ्चिदशुभ प्राप्नोति । अपीडन भवेत्कुक्षे पार्श्वयोर-अम्ल, लवण रस और भोजन के अनन्तर उत्पन्न होने वाले कफ विपाटनम् । अन्नंन हृदयावाधो जठरस्य तु गौरवम् ॥ प्रीणन चक्षु-के शमनार्थं अन्त में कटु - तिक्तोपणादि रसप्रधान द्रव्यों के रादीनां शमन क्षुत्पिपासयोः । उच्छ्वासश्वासहास्यादिकथासु सुस-सेवन का विधान किया गया है । वर्तनम् । सुखेन परिणाम स्यादन्ने भुक्ते दिवा निशि ' ॥ आदौ फलानि भुञ्जीत दाडिमादीनि बुद्धिमान् । ततः पेयांस्ततो भोज्यान् भक्ष्यांश्चित्रांस्ततः परम् ४६७ बुद्धिमान् भोक्ता भोजन में प्रथम दाडिमादि फलों का सेवन करे उसके पश्चात् पेय पदार्थ तथा उनके बाद अन्त में विविध भोज्य और भक्ष्य पदार्थों का सेवन करे ॥ ४६७ ॥

धन पूर्वं समश्नीयात् केचिदाहुर्विपर्ययम् ॥ ४३८ ॥

आदावन्ते च मध्ये च भोजनस्य तु शस्यते ।

निरत्ययं दोषहरं फलेष्वामलकं नृणाम् ॥ ४६६ ॥

मृणाल विसशालूककन्देक्षुप्रभृतीनि च ।

पूर्व योज्यानि भिषजा न तु भुक्ते कदाचन ॥४७० ॥

भोजन में प्रथम घन पदार्थों का सेवन करना चाहिये । कई आचार्य इसके विपरीत भोजन के प्रथम द्रव पदार्थों के सेवन का उपदेश करते हैं । भोजन के आदि ( प्रथम ), भोजन के अन्त तथा भोजन के मध्य में किसी प्रकार की बाधा न करने वाला तथा सर्वदोषनाशक तथा फलों में श्रेष्ठ आंवले के फलों को या उसके चूर्ण को सेवन करना मनुष्यों के लिये प्रशस्त है । मृणाल ( कमल नाल ), बिस ( भिस या कमलतन्तु ), कन्द तथा इन्तु ( सांठे ) प्रभृति

काले भुक्तं प्रीणयति सात्म्यमन्नं न बाधते ।

लघु शीघ्रं व्रजेत् पार्क स्निग्घोष्णं बलवह्रिदम् ॥ ४७२ ॥

क्षिप्रं भुक्त समं पाकं यात्यदोषं द्रवोत्तरम् ।

सुखं जीर्यति मात्रावद्धातुसाम्यं करोति च ॥ ४७३ ॥

योग्य समय में किया हुआ भोजन - देह, इन्द्रियां तथा आत्मा और मन को तृप्त करता है । सात्म्य अन्न चाहे कैसा भी हो वह मनुष्य को बाधा नहीं पहुँचाता है । हलका भोजन शीघ्र ही पच जाता है । तथा स्निग्ध और उष्ण भोजन शरीर केवल तथा पाचकानि को बढ़ाता है । न जल्दी तथा न धीरे-धीरे उचित रीति से चबा कर खाया हुआ भोजन समानरूप से पच जाता है । द्रवप्रधान भोजन अदोष ( दोपों को न बढ़ाता हुआ ) भामाशयादि में चला जाता है या पच जाता है, मात्रापूर्वक खाया हुआ भोजन सुखपूर्वक पच जाता है तथा रस - रक्तादि धातुओं को समान रखता है ॥ ४७२–४९ ३ ॥

अतीवायतयामास्तु क्षपा येष्वृतुषु स्मृताः ।

तेषु तत् प्रत्यनीकायं भुञ्जीत प्रातरेव तु ॥ ४७४ ॥

येषु चापि भवेयुश्च दिवसा भृशमायताः ।

तत्कालविहितमपराद्धे प्रशस्यते ॥ ४७५ ॥

पदार्थों का उपयोग सदा भोजन के पूर्व करना चाहिये । वैद्यतेषु

रजन्य दिवसाचैव येषु चापि समाः स्मृताः ।

इन पदार्थों का सेवन भोजन के पश्चात् न करावे ॥४६८-४७० ॥

सुखमुच्चैः समासीनः समदेहोऽन्नतत्परः ।

काले सात्म्य लघु स्निग्धं क्षिप्रमुष्णं द्रवोत्तरम् ।

बुभुक्षितोऽन्नमश्नीयाद् मात्रावद्विदितागमः ॥ ४७१ ॥

सुखपूर्वक उच्चासन पर बैठकर, देह को समावस्था में ( सीधी ) रख कर एव अन्न सेवन में चित्त लगाता हुआ स्वास्थ्यशास्त्र के नियमों को जानने वाला बुभुक्षित ( सुधी ) मनुष्य योग्य समग्र में साक्ष्य ( अभ्यस्त तथा स्वहितकर ), पचने में हलका, घृतादि से स्निग्ध, उष्ण तथा द्रवप्रधान ऐसा भोजन मात्रापूर्वक न अधिक धीरे और न अधिक जल्दी किन्तु आहिस्ते आहिस्ते ठीक चवा कर भोजन करे ॥ ४७१ ॥

विमर्शः - अन्यन्त्र, भोजनविधिर्यथा - ' अजल्पन्न हसन् तन्मना भुश्खोत ' इति । काले = नित्यगे आवस्थिके च द्विविधे काले, तत्र नित्यग -‘याममध्ये न भोक्तव्य यामयुग्म न लङ्घयेत् । याममध्ये कृत्वा सममहोरात्रं तेषु भुञ्जीत भोजनम् ॥ ४७६ ॥

हेमन्त - शिशिरादि जिन ऋतुओं में अधिक लम्बे आयाम ( प्रहर ) वाली रात्रियां होती हैं उन ऋतुओं में तत्काल - चल-प्रवृत्त दोषों के प्रतीकार के अनुसार ध र भजन प्रातःकाल ही कर लेना चाहिये तथा जिन ऋतुओं ( ग्रीष्म तथा प्रावृटू ) में दिन अत्यन्त लम्बे ( मोटे ) हैं उनमें उस काल के अनुसार द्रव, लघु तथा शीतल भोजन अपराह्न में खाना चाहिये । जिन ऋतुओं ( शरद और वसन्त ) में रात्रि और दिन समान होते हैं उन ऋतुओं में अहोरात्र का समान भाग ( विभाजन ) करके मध्याह्न में भोजन कर लेना चाहिये ॥

प्राप्तातीतकालं वा हीनाधिकमथापि वा ।

अप्राप्तकाले भुञ्जानः शरीरे ह्यलघौ नरः ॥ ४७७ ॥

तांस्तान् व्याधीनवाप्नोति मरणं वा नियच्छति । रसोत्पत्तिर्यामयुग्माद् बलक्षय ॥ ' इति । आवस्थिक - क्षुत्सम्भवति अतीतकाले भुञ्जानो वायुनोपहतेऽनले ॥ ४७८ ॥

पक्षेषु रसदोपमलेषु च । काले वा यदि वाऽकाले सोऽन्नकाल उदा- कृच्छ्राद्विपच्यते भुक्तं द्वितीयश्च न काङ्क्षति ।

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श्रध्यायः ४६ ] सूत्रस्थानम् । २२१

दीनमात्रमसन्तोपं करोति च बलक्षयम् ॥ ४७१ ॥

आलस्यगौरवाटोपसादांच कुरुतेऽधिकम् ।

तस्मात् सुसंस्कृतं युक्त्या दोषैरेतैर्विवर्जितम् ॥ ४८० ॥

यथोक्तगुणसम्पन्नमुपसेवेत भोजनम् ।

विभव्य दोषकालादीन् कालयोरुभयोरपि ॥ ४८१ ॥

अप्राप्त काल तथा अतीत काल में भोजन भी नहीं करना चाहिये एवं हीन मात्रा में तथा अधिक मात्रा में भोजन नहीं करना चाहिये । अप्राप्त काल में भोजन करने वाला मनुष्य । शरीर के हलके नहीं होने में मिन्नभिन्न अजीर्ण, विसूचिकादि रोगों को प्राप्त करता है अथवा कभी कभी मृत्यु तक को प्राप्त करता है । अतीत काल में भोजन करने वाले का अन्न वायु वृद्धि से पाचकानि के नष्ट होने के कारण कष्ट से पचता है । तया दूसरे ( रात्रि के ) समय भोजन करने की इच्छा नहीं होती । अल्पमात्रा में किया हुआ भोजन असन्तोष ( अनुप्ति ) करता है तथा शरीर के बल को भी क्षीण करता है | अधिक मात्रा में किया हुआ भोजन - आलस्य, भारीपन, आटोप तथा अग्निमान्य इन्हें अधिक करता है इसलिये उत्तम विधि से संस्कृत किया हुआ तथा युक्तिपूर्वक और उपर्युक्त दोषों से रहित एवं शास्त्रीय अन्नके गुणों से सम्पन्न एवं दोष तथा काला-दिकों का विभाग करके दोनों समय भोजन करना चाहिये || विमर्श -अधिकमांजने मनुरपि दोपनाह - ' अनारोग्यमना-युभ्यमन्त्रर्ग्यं चानिमोजनम् । अयुष्यं लोकविद्दिष्टं तस्मात्तत्परिवर्ज चेत् ॥ ' इति । ' सायं प्रातद्विज्ञानीनानशन स्मृनिनोदिनम् । नान्तरा भोजनं कुर्यादग्निहोत्रसमो विधिः ॥ '

अचोक्षं दुष्टमुत्सृष्टं पाषाणतृणलोष्टवन् ।

हि व्युषितमस्वादु पूति चान्नं विवर्जयेत् ॥ ४८२ ॥

चिरसिद्धं स्थिरं शीतमन्नमुष्गीकृतं पुनः ।

अशान्तमुपदग्धं च तथा खादु न लक्ष्यते ॥ ४८३ ॥

निन्दितान्न – अत्रोच ( अपवित्र ), विषादि से दुध, स्वाकर शेष छोड़ा हुआ ( शृंडन ), पाषाण, तृण तथा मिट्टी के लोष्ट ( ढेले ) से व्याप्त, विष्ट ( चित्त विपरीत ), व्युषित ( रात का बासी ), बेस्वाद, दुर्गन्धित, ऐसे को वर्जित कर देना चाहिये एवं जो बहुत समय से बनाकर रखा हुआ हो, स्थिर ( सख्त ), टण्डा, फिर से गरम किया हुआ, अशान्त ( अधिक गरम ), जला हुआ तथा जो स्वादु नहीं खाता हो उसे भी वर्जित कर देना चाहिये ॥ १८२-१८३ ॥

यद्यत् स्वादुतरं तत्तद्विद्वद्ध्यादुत्तरोत्तरम् ।

प्रचालयेदङ्किरात्वं भुञ्जानस्य मुहुर्मुहुः ॥ ४८४ ॥

विशुद्धरसने तस्मै रोचतेऽन्नमपूर्ववत् ।

स्वादुना तस्य रसनं प्रथमेनातितर्पितम् ॥ १८५ ॥

न तथा स्वादयेदन्यत्तस्मात् प्रक्षाल्यमन्तरा! सौमनस्यं बलं पुष्टिमुत्साहं हर्षणं सुखम् ॥ ४८६ ॥

स्वादु सञ्जनयत्वन्नमत्वादु च विपर्ययम् । भुक्त्वाऽपि चन् प्रार्थयते भूयस्वत् स्वादु भोजनम् ४८७ भोक्ता को जो जो मध्य पदार्थ अधिक स्वादु हो उन्हें उत्तरोत्तर परोसने चाहिये । अर्थात् प्रथम कम स्वाद की, । उसके बाद अधिक स्वाद की और उसके भी बाढ़ और अधिक स्वाद की वस्तु दे । भोजन करते समय एक प्रकार की या रमवाली वस्तु खा लेने के बाद तथा दूसरे रस की वस्तु खाने के पूर्व मुख को जल के द्वारा कुरला करके साफ कर लेना चाहिये क्योंकि ऐसा करने से मुख तथा रसना साफ हो जाती है । जिससे बाद में खाया हुआ अन्न पूर्व से भी अधिक रुचिकर प्रतीत होने लगता है । प्रथम खाये हुये स्वादु पदार्थ से अधिक तर्पित जिह्वा दूसरे पदार्थ से वैसी तर्पित नहीं हो सकती इसलिये दोनों के मध्य में मुख का प्रचालन कर लेना आवश्यक है । स्वादु अन्न - मन की प्रसन्नता, शरीर का बल, पुष्टि, उत्साह, हर्ष और सुख को उत्पन्न करता है तथा अस्वादु अन्न इससे त्रिपरीत होता है । पूरा भोजन करने के बाद भी जिस पदार्थ को खाने की इच्छा होती हो उसे स्वादु भोजन कहते हैं ॥ १८१–१८७ ॥ अशितश्चोदकं युक्त्या भुखानश्चान्तरा पिवेत् ॥ ४८८ ॥

दन्तान्तरगतं चान्नं शोधनेनाहरेच्छनैः ।

कुर्यादनिर्हतं तद्धि मुखस्यानिष्टगन्धताम् ॥ ४८६ ॥

भोजन कर लेने पर तथा भोजन के मध्य में युक्तिपूर्वक स्वल्प मात्रा में जल पीना चाहिये । दांतों के बीच में घुसे हुये अन्न को किसी चांदी या ताम्र की पतली शलाका से या नीम के तिनके से धीरे धीरे निकाल लेना चाहिये । यदि इसे न निकाला जाय तो मुख में दुर्गन्ध पैदा कर देता है ॥२८८-४८९ ॥ विमर्श: - भोजन के पूर्व या अन्त में जल पीने से पाचक रस दुर्बल हो जाते हैं अतः मध्य में थोड़ा सा जल आवश्यकता हो तो पीना चाहिये | अच्छा हो कि भोजन के एक दो या तीन घण्टे के बाद थोड़ा थोड़ा जल पिया करे । भोजनान्ते विषं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम् । अत्यम्बुवानान्न विपच्यतेऽन्न निरम्बु-पानाच स एव दोषः । तस्मान्नरो वह्निविवर्धनाय मुहुर्मुहुवरि पिवेदभूरि ॥ ( भावप्र ० ) । दांतों में फॅसे अन्न को न निकालने से वहां सड़न होने लगती है । मुख से बदबू आने लगती है । दांतों की जड़ खराब होकर उस पर शर्करा ( Terter ) जमने लगती है तथा मसूड़ों में पूयजनक जीवाणु अपना निवास करके दन्तवेष्ट ( Pyorrhoes ) नामक रोग पैदा कर देता है जिससे धीरे धीरे ढाँत भी गिरने लगते हैं । इसका पूय तथा जीवाणु दिप थोड़ा थोड़ा लाला के साथ या खाद्य - पेय के साथ आमाशय में जाता है जिससे मन्दाग्नि रोग हो जाता है और खून भी पृय व विप के मिलते रहने से हलका सा ज्वर रहने लगता है तथा दिन - प्रतिदिन स्वास्थ्य गिरने लगता है । अतएव भोजन के बाद अन्नकणों को निकाल कर टीक तरह से नल द्वारा मुख साफ कर लेना चाहिये । वाग्भट तो भोजन के बाद भी दन्तधावन करना बताते हैं- प्रातर्भुक्त्वा च मृद कषायकटुतिक्तकन् । भक्षयेद्दन्तपवन दन्तमांसान्यवाधयन् ।

जीर्णेऽन्ने वर्द्धते वायुर्विदग्धे पित्तमेव तु ।

भुक्तमात्रे कफञ्चापि तस्माद् भुक्तेरितं कफम् ॥ १६० ॥

धूमेनापोह्य हृद्यैर्वा कषायकटुतिक्तकैः ।

पूगकङ्कोलकर्पूर लवङ्गसुमनः फलैः ॥ ४६१ ॥

कटुतिक्तकपायैर्वा मुखवैशद्यकारकैः ।

ताम्बूलपत्रसहितैः सुगन्धैर्वा विचक्षणः ॥ ४६२ ॥

पृष्ठ 274

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२२२ सुश्रुतसहिता । अन्न के पच जाने पर वायु बढ़ती है तथा विदग्धावस्था । ( पाकावस्था ) में पित्त बढ़ता है एवं भोजन करने के बाद कफ बढ़ता है इसलिये भोजन के बाद उत्पन्न हुये या उत्पन्न होने वाले कफ को धूम - पान के द्वारा अथवा कपाय, कटु ( चरपरे ), तिक्त ( कडवे ) जैसे - सुपारी, कंकोल, कपूर, लौंग जायफल ( जावित्री, इलायची, दालचीनी ) आदि हृद्य पदार्थों के सेवन द्वारा किंवा ताम्बूल पत्र के साथ दूसरे सुगन्धित कटु, तिक्त, पाय तथा मुख को स्वच्छ करने वाले द्रव्यों से विचक्षण ( बुद्धिमान् ) मनुष्य उसे ( कफ को ) नष्ट करे ॥ विमर्श: - आयुर्वेद का धूमपान औपधों से बनता है अतः उसका प्रयोग ठीक है किन्तु वर्तमान में जो वीड़ी, सिगरेट आदि का प्रचार अत्यधिक बढ़ गया है वह देश के लिये तथा स्वास्थ्य के लिये घातक है । तमाखू में निकोटीन नामक सारी चिप होता है वह धीरे २ शरीर में जमा होकर । भयङ्कर नुकसान पहुंचाता है । धूम्रपान से फेफड़े के रोग कास, श्वास, उरःक्षत तथा क्षय सरीखे धन और प्राणों के नाशक रोग पैदा होते हैं अत एव इसे सर्वथा वर्जित करना चाहिये ।

भुक्त्वा राजवदासीत यावदन्नक्लमो गतः ।

ततः पादशतं गत्वा वामपार्श्वेन संविशेत् ॥ ४६३ ॥

शब्दरूपरसान् गन्धान् स्पर्शाश्च मनसः प्रियान् ।

भुक्तवानुपसेवेत तेनान्नं साधु तिष्ठति ॥ ४६४ ॥

शब्दरूपरसाः स्पर्शा गन्धाश्चापि जुगुप्सिताः ।

अशुच्यन्नं तथा भुक्तमतिहास्यं च वामयेत् ॥ ४६५ ॥

शयनं चासनं वाऽपि नेच्छ्रेद्वाऽपि द्रवोत्तरम् ।

नाग्न्यातपो न प्लवनं न यानं नापि वाहनम् ॥ ४६६ ॥

भोजन करने के बाद जब तक अन्न का क्लम ( भारीपन ) न गया हो तब तक ५-१० मिनिट राजा के समान अर्थात् सीधा सीना, शिर और कमर करके बैठना चाहिये । इसके अनन्तर सौ पांवडे इतस्ततः भ्रमण कर वापस आके वामपार्श्व से अर्थात् बांईं करवट लेट जाना चाहिये । भोजन किया हुआ मनुष्य मन को प्रिय लगने वाले गायन या वच्चों के कर्णप्रिय शब्द, अच्छे रूप, रस, गन्ध और स्पर्श का सेवन करे जिससे ' उसका साया हुआ अन्न भली प्रकार से आमाशयादि में ' रहता है तथा ठीक पचता है । मन को अप्रिय लगने वाले शब्द, रूप, रस, स्पर्श तथा गन्ध, खराव तथा ज्यादा मात्रा में खाया हुआ अन्न एवं भोजन के समय या पश्चात् अधिक हँसना - ये अन्न का वमन करा देते हैं । भोजन के अनन्तर अधिक देर तक सोना, बैठना, अधिक पतली वस्तु का पीना, अग्नि और धूप का सेवन, पानी में तैरना, जोर से चलना तथा घोड़े आदि पर बैठना - ये सब वर्जित करना चाहिये ॥ विमर्श -- भोजन के अनन्तर कम से कम एक मुद्दत्तं ( ४८ मिनट ) अवश्य आराम करना चाहिये । व्यायामञ्च व्यवायञ्च धावन यानमेव च । युद्ध गीतञ्च पाठश्च मुहूर्त मुक्तवाँ स्स्यजेत् ॥ भुक्त्वोपविशतस्तन्द्रा शयानस्य तु पुष्टता । आयुश्च -ङ्कममाणस्य मृत्युर्धावति बाबत ॥ ( योग २० ) । आयुर्वेद के ये उक्त वाक्य अक्षरशः सत्य व पूर्ण वैज्ञानिक है । भोजन के बाद शारीरिक तथा मानसिक आराम अत्यावश्यक है; कहा भी है — Sut a while after bunner | पाचन के समय और आमाशयादि पाचनसंस्थान की तरफ पाचक रसों के अधिक स्त्राव कराने के लिये रक्तसञ्चार अधिक आरम्भ हो जाता है । तथा त्वचा मस्तिष्क की तरफ रक्त कम जाता है जिससे ठट लगना तथा तन्द्रादि लक्षण होते हैं । यदि भोजन के बाद श्रम किया जाय तो रक्त उन अह्नों में अधिक जाने लगेगा और पाचन ठीक न होगा । भोजन के अनन्तर दौड़ना, व्यायाम करना, मैथुन करना प्राणघातक हैं । ' मृत्युविति वाचत. ' ।

न चैकरससेवायां प्रसज्येत कदाचन ।

शाकावरान्नभूयिष्ठमम्लं च न समाचरेत् ॥

एकैकशः समस्तान् वा नाध्यश्नीयाद्रसान् सदा ॥ ४६७ ॥

सदा एक ही प्रकार के रस के सेवन में आसक्त नहीं होना चाहिये तथा अधिक शाक, अवर ( कुत्सित ) भन्न और अम्ल पदार्थ अधिक मात्रा में नहीं खाने चाहिये । एक एक अथवा समस्त रसों को भी अधिक प्रमाण में सदा सेवन नहीं करने चाहिये ॥ ४ ९ ७ ॥

प्राग्भुक्ते त्वविविक्तेऽग्नौ द्विरन्नं न समाचरेत् ।

पूर्वमुक्ते विदग्वेऽन्ने भुञ्जानो हन्ति पावकम् ॥ ४६८ ॥

मात्रागुरुं परिहरेदाहारं द्रव्यतश्च यः ।

पिष्टान्नं नैव भुञ्जीत मात्राया वा वुभुक्षितः ॥ ४६६ ॥

द्विगुणं च पिवेत्तोयं सुखं सम्यक् प्रजीर्यति ।

पेयाद्यभक्ष्याणां गुरु विद्याद्यथोत्तरम् ॥। ५०० ॥

गुरूणामर्द्धसौहित्यं लघूनां तृप्तिरिष्यते ॥ ५०१ ॥

पूर्वं या प्रातःकाल के प्रथम भोजन के पश्चात् जब तक पाचकानि शुद्ध या तीचण न हो जाय दुबारा संध्या को अन्न नहीं देना चाहिये क्योंकि पूर्व का खाया हुआ अन्न विदग्ध ( अधपचा ) होने पर दुवारा भोजन करने वाला मनुष्य अपनी पाचकानि को नष्ट करता है । मात्रा से भारी अर्थात् अधिक प्रमाण में और द्रव्य की दृष्टि से भारी आहार को वर्जित कर देना चाहिये । पिष्टान्न या गरिष्ठ पदार्थ नहीं खाने चाहिये अथवा क्षुधा पीडित मनुष्य मात्रापूर्वक ही उन्हें सेवन करे तथा उन्हें खाने पर द्विगुण जलपान करे । ऐसा करने से वे पिष्टान्न ( गरिष्ठ पदार्थ ) सुख से पच जाते हैं । पेय, लेह्य ( मधु, श्रीखण्ड ), अद्य ( खाद्य जैसे चावल ) तथा भक्ष्य ( लड्डू, चने आदि ) ये उत्तरोत्तर एक दूसरे से भारी होते, हैं । जो पदार्थ भारी होते हैं उन्हें आधी तृप्ति तक सेवन करना चाहिये तथा जो लघु होते हों उन्हें पूर्ण तृप्ति तक की मात्रा में खा सकते हैं ॥ ४ ९८-१०१ ॥ विमर्शः - गुरु पिष्टमय द्रव्य तण्डुलान् पृथुकानपि । न जातु मुक्तवान् खादेन्मात्रा खादेद् बुभुक्षितः ॥ द्रव्यापेक्षया च त्रिभाग-सौहित्यमर्धसौहित्य वा गुरूणामुपदिश्यते ( चरकः ) । 15

द्रवोत्तरो द्रवश्चापि न मात्रागुरुरिष्यते ।

द्रवाढ्यमपि शुष्कं तु सम्यगेवोपपद्यते ॥ २०२ ॥

विशुष्कमन्नमभ्यस्त न पार्क साधु गच्छति ।

पिण्डीकृतमसंक्लिन्नं विदाहमुपगच्छति ॥ ५०३ ॥

" स्रोतस्यन्नवहे पित्तं पक्तौ वा यस्य तिष्ठति ।

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श्रध्यायः ४६ ] सूत्रस्थानम् । २२३

विदाहि भुक्तमन्यद्वा तस्याप्यन्नं विदह्यते ॥ ५०४ ॥

शुष्कं विरुद्धं विष्टम्भ वह्निव्यापदमावहेत् ॥ ५०५ ॥

द्रव जिसमें अधिक हो ऐसे पदार्थ तथा केवल द्रव पदार्थों को प्रमाण ( मात्रा ) से गुरु ( अधिक ) रूप में नहीं सेवन करने चाहिये किन्तु द्रव की आध्यता ( अधिकता ) से युक्त सूखे पदार्थ अच्छी प्रकार से पचते हैं । केवल विशुष्क भन्न का सेवन करने से वह ठीक रूप से नहीं पचता है । पिण्ट रूप में किया हुआ तथा द्रवादि से गीला नहीं किया हुआ अन्न सेवन करने से विदाह को प्राप्त हो जाता है । अन्नवाहक स्रोतस ( Stomach ) में तथा पित्त के स्थान से यकृत् Laver तथा सञ्चय - दृष्टि से Gall कार्यकारण - दृष्टि से ग्रहणी ( Deodenum ) में जाता है उस दशा में खाया हुआ विदाही अन्न अन्न दोनों विदग्ध हो जाते हैं । शुष्कभोजन, तथा म्भ ( ज, शूल, आनाह ) करने जठराग्नि को नष्ट कर देता है ॥ ५०२-५०५ ॥ ( निर्माणदृष्टि Bladder और जब पित्त रुक तथा भविदाही | विरुद्ध भोजन वाला भोजन

आमं विदग्धं विष्टब्धं कफपित्तानिलैखिभिः ।

अजीणं केचिदिच्छन्ति चतुर्थ रसशेषतः ॥ ५०६ ॥

कफ की दृष्टि से भमाजीर्ण, पित्त की दृष्टि से विदग्धाजीर्ण तथा बात की दुष्टिष्टधाजीर्ण होता है । कई आचार्य एक चौथा रसशेषाजीर्ण भी मानते हैं ॥ ५०६ ॥

अत्यम्चुपानाद्विपमाशनाद्वा

सन्धारणात् स्वप्नविपर्ययाच्च ।

कालेऽपि सात्म्यं लघु चापि भुक्त-मन्नं न पार्क भजते नरस्य ॥ ५०७ ॥

ईष्याभयक्रोधपरिक्षतेन

लुब्धेन रुग्दैन्यनिपीडितेन ।

प्रद्वेषयुक्तेन च सेव्यमान-मन्नं न सम्यक् परिणाममेति ॥ ५०८ ॥

अधिक जल पीने से, विषम भशन ( भोजन ) करने से, अधारणीय वेगों के धारण करने से, सोने में अनियमितता करने से, योग्य समय में तथा लघु भोजन करने पर भी वह क तरह से नहीं पचता है । ईर्ष्या, भय तथा क्रोध से व्याप्त, लोभी तथा रोग और दीनता से युक्त एवं मात्सर्य युक्त पुरुष के द्वारा सेवन किया हुआ अन्न ठीक तरह से नहीं पचता है ॥ ५०७ - ५०८ ॥ माधुर्यमन्नं गतमामसंज्ञं विदग्धसंज्ञं गतमम्लभावम् । किञ्चिद्विपकं भृशतोदशूलं विष्टव्धमानद्धविरुद्धवातम् ॥ ५० ९ ॥ उद्गारशुद्धावपि भक्तकाङ्क्षा न जायते हृद्गुरुता च यस्य । रसावशेषेण तु सप्रसेकं चतुर्थमेतत् प्रवदन्त्यजीर्णम् ॥५१० ॥

कफ के प्रभाव से माधुर्य को प्राप्त अन्न आमाजीर्ण-संज्ञक, पित्त के कारण अम्लता को प्राप्त अन्न विदग्धाजीर्ण-संज्ञक एवं जब वायु के कारण कुछ पका हुभा तथा पेट में अत्यन्त सूई चुभोने की सी पीड़ा और शूल होता है तथा वात का अवरोध हो जाता है या वायु खुल कर नहीं सरती है तब उसे विष्टब्धाजीर्ण संज्ञक कहते हैं । डकार के शुद्ध होने पर भी भोजन करने की आकांक्षा न होती हो तथा हृदय में जब भारीपन एवं मुख में पानी, थूक या लार भरी रहती हो तब उसे चतुर्थ रसशेपाजीर्ण कहते हैं ॥ ५० ९ -५१० ॥ विमर्शः - आमाद्यजीर्णलक्षणानि - तत्रामे गुरुतोत्वलेद शोयो । गण्डाक्षिकूटयो । उद्गारश्च यथामुक्तमविदग्न प्रवर्तते ॥ विष्टब्धे शूलमाध्मान विविधा वातवेदना । मलवाताप्रवृत्तिश्च स्तम्भो मोहोऽ-ङ्गनीडनम् ॥ विदग्धे भ्रमतृमूर्च्छा पित्ताञ्च विविधा रुजः । उद्गा-रश्च सधूमाम्ल ' स्वेदो दाहश्च जायते । रसशेपोऽन्नविद्वेपो हृदया-शुद्धिगौरवे ॥ ( अ सं ) । अजीर्णभेदाः - माधवकर ' ने अजीर्ण के ६ भेद लिखे हैं- आम विदग्ध विष्टब्ध कफपित्तानिलैस्त्रिभिः । अजीर्ण केचिदिच्छन्ति चतुर्थं रसशेपत ' ॥ अजीर्णं पञ्चम केचिन्निर्दोष दिनपाकि च । वदन्ति पष्ठ चाजीर्णे प्राकृत प्रतिवासरम् ॥

मूर्च्छा प्रलापो वमथुः प्रसेकः सद्नं भ्रमः ।

उपद्रवा भवन्त्येते मरणं चाप्यजीर्णतः ॥ ५११ ॥

मूर्च्छा, प्रलाप, वमन, लालादिनाव, अह्नों का टूटना या उनकी निर्वलता या ग्लानि तथा भ्रम ये अजीर्ण के उपद्रव होते हैं । कभी कभी अजीर्ण से मृत्यु भी हो जाती है ॥५११ ॥

तत्रामे लङ्घनं कार्य विदग्धे वमनं हितम् ।

विष्टब्धे स्वेदनं पथ्यं रसशेपे शयीत च ॥ ५१२ ॥

अजीर्णचिकित्सा सूत्र - आमाजीर्ण में लधन, विदग्धा-जीर्ण में वमन, विष्टव्धाजीर्ण में स्वेदन और रसशेषाजीर्ण में शयन हितकारी होता है ॥ ५१२ ॥

वामयेदाशु तं तस्मादुष्णेन लवणाम्बुना कार्यं चानशनं तावद्यावन्न प्रकृतिं भजेत् ॥ लघुकायमतश्चैनं लङ्घनैः समुपाचरेत् । यावन्न प्रकृतिस्थ स्याद्दोषतः प्राणतस्तथा अजीर्ण के रोगी को शीघ्र ही उष्णजल में कर वमन कराना चाहिये तथा जब तक अजीर्ण प्रकृतिस्थ न हो जाय तब तक अनशन या चाहिये । इस तरह काया के हलकी होने तक

।

५१३ ॥

॥ ५१४ ॥

लवण मिला ठीक न होकर. लंघन करना और रोगी के दोषदृष्टि से एवं प्राण ( जीवन ) दृष्टि से प्रकृतिस्थ होने तक लंघन द्वारा उपचार करना चाहिये ॥ ५१३ - ११४ ॥

हिताहितोपसंयुक्तमन्नं समशनं स्मृतम् ।

बहु स्तोकमकाले वा विज्ञेयं विषमाशनम् ॥ ५१५ ॥

अजीर्णे भुज्यते यत्त तद्ध्यशनमुच्यते ।

त्रयमेतन्निहन्त्याशु बहून् व्याधीन् करोति वा ॥ ५१६ ॥

हित तथा अहितकर दोनों प्रकार के पदार्थ संयुक्तकर भोजन करना ' समशन ' कहलाता है तथा कभी अधिक मात्रा या कभी अल्पमात्रा में और वे समय में भोजन करना ' विषमाशन ' कहलाता है । पूर्वं खाये भोजन के ठीक तरह से न पचने पर फिर दुबारा जो भोजन कर लिया जाता है

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२२४ सुश्रुतसहिता । ' अध्यशन ' कहते हैं । ये तीनों प्रकार के भोजन शीघ्र ही मनुष्य को मार डालते हैं अथवा अनेक प्रकार के ( विसूचिका, अल-सक, विलम्बिकादि ) रोग उत्पन्न करते हैं ॥ ११५-५१६ ॥ अन्नं विदग्धं हि नरस्य शीघ्रं

शीताम्बुना वै परिपाकमेति ।

तद्धयस्य शैत्येन निहन्ति पित्त-माक्लेदिभावाच्च नयत्यधस्तात् ॥ ५१७ ॥

पित्त की दृष्टि से मनुष्य का विदुग्ध हुआ अन्न शीतल जल पान से शीघ्र ही परिपाक को प्राप्त होता है कारण कि वह शीतल जल अपने शैत्यभाव से प्रकुपित पित्त को नष्ट कर देता है तथा अपने आर्द्रभाव से उसे नीचे दस्त के द्वारा निकाल देता है ॥ ५१७ ॥

विद्यते यस्य तु भुक्तमात्रे दह्येत हृत्कोष्ठगलं च यस्य । द्राक्षाऽभयां माक्षिकसम्प्रयुक्तां लीढ्वाऽभयां वा स सुखं लभेत । ५१८ ॥ जिस मनुष्य के भोजन के बाद ही हृदय, कण्ठ और गले में जलन होने लग जाय उसे मुनक्का तथा हरड़ के चूर्ण को शहद के साथ घटाने से अथवा केवल हरड़ के चूर्ण को शहद के साथ चाटने से वह सुख को प्राप्त करता है ॥ भवेदजीर्णं प्रति यस्य शङ्का स्निग्धस्य जन्तोर्बलिनोऽन्नकाले प्रातः स शुण्ठीमभयामशङ्को भुत सम्प्राश्य हितं हितार्थी ॥ स्वल्पं यदा दोपविबद्धमामं लीनं न तेजःपथमावृणोति । भवत्यजीर्णेऽपि तदा बुभुक्षा सामन्दबुद्धिं पिवनिहन्ति ॥ ५१८ ॥ | ५ ९ ६ ॥ ५२० ॥ बलवान् तथा स्निग्ध शरीर वाले जिस मनुष्य को भोजन के समय अजीर्ण की शङ्का हो जाय तब वह निज हितार्थ सोंठ के चूर्ण के सहित हरड़ के चूर्ण को शङ्कारहित होकर सेवन करके हितकर भोजन कर लेवे । जब दोपों से विवद्ध हुआ थोड़ा सा भोजन का आमांश अन्नादिवाहक स्रोतों में लीन होकर पित्त के मार्ग को नहीं रोकता है तव अजीर्ण होने पर भी भूख लगी रहती है किन्तु वह झूठी भूख उस मन्द बुद्धि वाले मनुष्य को विप के समान मार डालती है ॥

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि गुणानां कर्मविस्तरम् ।

कर्मभिस्त्वनुमीयन्ते नानाद्रव्याश्रया गुणाः ॥ ५२१ ॥

अब इसके अनन्तर दृश्य में रहने वाले गुणों के कर्म का विस्तार से वर्णन करते हैं । नाना द्रव्यों के आश्रित गुणों का ज्ञान उनके कर्म से ही अनुमेय ( ज्ञेय ) होता है ॥ ५२१ ॥

ह्लादनः स्तम्भनः शीतो मूर्च्छातृस्वेददाहजित् ।

उष्णस्तद्विपरीतः स्यात् पाचनश्च विशेषतः ॥ ५२२ ॥

स्नेहमार्दवकृत् स्निग्धो बलवर्णकरस्तथा ।

रूक्षस्तद्विपरीतः स्याद्विशेपात् स्तम्भनः खरः ॥। ५२३ ॥

पिच्छिलो जीवनो बल्यः सन्धानः श्लेष्मलो गुरुः ।

विशदो विपरीतोऽस्मात् क्लेदाचूपणरोपणः ॥ ५२४ ॥

दाहपाककरस्तीक्ष्णः स्रावणो, मृदुरन्यथा ।

साटोपलेपबलकृद् गुरुस्त र्पणबृंहणः ॥ ५२५ ॥

लघुस्तद्विपरीतः स्याल्लेखनो रोपणस्तथा ।

दशाद्याः कर्मतः प्रोक्तास्तेपां कर्मविशेपणैः ॥

दशैवान्यान् प्रवक्ष्यामि द्रवादीस्तान्निबोध मे ॥५२६ ॥

द्रव्याश्रित शीत गुण - उष्णता से पीड़ित मनुष्यों को सुख पहुचाने वाला, स्तम्भक तथा मूर्च्छा, तृष्णा, स्वेद और द्वाह को नष्ट करता है किन्तु उष्ण गुण - शीतगुणों से विपरीत होता है और विशेषकर पाचक होता है । स्निग्ध गुण - शरीर में स्निग्धता तथा मृदुता का जनक एवं देह के बल और वर्ण को बढ़ाता है | रुक्षगुण - स्निग्ध के विपरीत होता है परन्तु वह विशेषकर अतिसारादि में स्तम्भन कार्य करता है तथा खर • स्पर्शयुक्त होता है । पिच्छिलगुण - जीवन शक्ति का वर्द्धक, बलजनक, भग्नास्थियों का संधान करने वाला कफ-कारक और भारी होता है । विशद गुण- इससे विपरीत होता है तथा क्लेद का शोषण करने वाला एवं व्रण का रोपक होता है । तीक्ष्ण गुण- दाह, पाक और व्रणादि से स्राव कराता है किन्तु मृदुगु - इससे विपरीत होता है । गुरु गुण - साद ( ग्लानि ), उपलेप ( देह में मलवृद्धि ) तथा वल को बढ़ाता है तथा शरीर, इन्द्रियां, मन और आत्मा को तृप्त करने वाला तथा देह का पोषक होता है किन्तु लघुगुण - इसके विपरीत लेखन करने वाला एवं व्रण का रोपक होता है । इस तरह आदि के दशगुण उनके विशिष्ट कर्मों के अनुसार कह दिये हैं । अव द्रवादि अन्य दश गुणों का वर्णन करता हूँ उन्हें सुनो ॥ ५२२-५२६ ॥ विमर्शः - द्रवादीन् = द्रवसान्द्रक्ष्णकर्कश सुगन्ध दुर्गन्धसरमन्द-व्यवायि विकास्याशुकारिसूक्ष्मगुणान् ।

द्रवः प्रक्लेदनः, सान्द्रः स्थूलः स्याद् बन्धकारकः ।

लक्ष्णः पिच्छिलवज्ञेयः कर्कशो विशदो यथा ॥ ५२७ ॥

सुखानुबन्धी सूक्ष्मश्च सुगन्धो रोचनो मृदुः ।

दुर्गन्धो विपरीतोऽस्माद्धृल्लासारुचिकारकः ॥ ५२८ ॥

सरोऽनुलोमनः प्रोक्तो, मन्दो यात्राकरः स्मृतः ।

व्यवायी चाखिल देहं व्याप्य पाकाय कल्पते ॥ ५२६ ॥

विकासी विकसन्नेवं धातुबन्धान् विमोक्षयेत् ।

आशुकारी तथाऽऽशुत्वाद्धावत्यम्भसि तैलवत् ॥ ५३० ॥

सूक्ष्मस्तु सौक्ष्म्यात् सूक्ष्मेषु स्रोतःस्वनुसरः स्मृतः ।

गुणा विंशतिरित्येवं यथावत्परिकीत्तिताः ॥ ५३१ ॥

द्रवगुण - शरीर में छेद करने वाला है । सान्द्रगुण- देह को स्थूल करने वाला तथा वन्धन ( उपचय ) कारक है । गुण - पिच्छिल के समान होता है तथा कर्कशगुण - विशद के समान होता है । सुगन्धगुण - सुख का जनक, सुषम, रोचक, तथा मृदु होता है । दुर्गन्धगुण- इसके विपरीत होता है तथा हृल्लास और अरुचिकारक होता है । सरगुण- वातादि का अनुलोमक

पृष्ठ 277

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श्रध्यायः ४६ ] सूत्रस्थानम् । २२५ होता है तथा सन्दगुण - देह की यात्रा को करने वाला है । : न्यवायी गुण - प्रथम समस्त शरीर में व्याप्त होकर पश्चात् परिपक्क होता है । विकासीगुण - अपक्वावस्था में ही समग्र शरीर में फैलकर मद्य तथा विष के समान शरीर की धातुओं को तथा सन्धिबन्धनों को शिथिल करता है । आशुकारी गुण - जल में ढाले हुये तैल की तरह अपनी शीघ्रगति से समस्त शरीर । में फैलता है । सूक्ष्मगुण - अपनी सूक्ष्मता से शरीर के सूक्ष्म । स्रोतों में प्रविष्ट करता है । इस तरह इन बीस गुणों का यथावत् वर्णन कर दिया है ॥ ५२७-१३१ ॥ विमर्शः — यद्यपि गणना के नाम से सुश्रुत वीस गुणों का नाम लेता है किन्तु इन अन्तिम द्रवादि गुण दश न होकर वारह हैं अतएव असठी सुश्रुत का पाठ अन्य ही होना चाहिये था । वाग्भट भी वीस गुण ही मानता है जैसे- गुरुमन्दहिम-स्निग्धश्लक्ष्णसान्द्रनृदुस्थिरा ॰ । गुणा. सुसूक्ष्मविशदा विंशतिः सवि-पर्यया ' ॥ चरक ने भी बीस गुण लिखे हैं यथा - विंशतिगुणो गुरुलबुशीनोष्णस्निग्धरूचमन्दनीगस्थिरसरमृदुकठिन विशदपिच्छिल-श्लक्ष्णखरसूक्ष्मस्थूलसान्द्रत्वानुगमात् ॥ श्रीभावमिश्र: - सुश्रुते तु गुणा एते विंशतिस्तान् श्रुवे शृणु । गुरुर्लघु स्निग्धरुक्षौ तीक्ष्णः श्लक्ष्णः स्थिरः सरः ॥ पिच्छिलो विशदः शीत उष्णश्च मृदुकर्कशौ । स्थूल सूक्ष्मो द्रव ' शुष्क आशुर्मन्द. स्मृता गुणा ॥ ' इति । ' पूर्व व्याप्याखिल कायं ततः पाक च गच्छति । व्यवायि तद्यथा भङ्गा फेनं चाहिसमुन्द्र वम् ॥ ' इति । ' सन्धिवन्धांस्तु शिथिलान् यत्करोति विकासि तत् ।

विश्लेयौनश्च धातुभ्यो यथा क्रमुककोद्रवा ॥ ' इति ।

सम्प्रवक्ष्याम्यतश्चोर्ध्वमाहारगतिनिश्चयम् ॥ ५३२ ॥

अब इसके अनन्तर आहार की गति के निश्चय के विषय में वर्णन करता हूँ ॥ ५३२ ॥

विमर्शः — आहार की गति या परिवर्तन फूड मेटावोलिज्म ( Food metabolism ) है।शरीर में एनाबोलिज्म ( Anabolism ) या रचनात्मक क्रिया तथा केटावोलिज्म ( Katabolism ) या विनाशात्मक क्रिया करके दो कार्य होते रहते हैं । ये दोनों क्रियाऍ साथ साथ चलती रहती हैं । प्रथम क्रिया से सेवित-खाद्य द्रव्यों के रस - रक्तादि वन कर शरीर की वृद्धि, क्षतिपूर्ति और रक्षा होती है । द्वितीय क्रिया से शारीरिक धातुओं में Co2 गैस, जल, अमोनिया यूरिया आदि अनुपयोगी त्याज्य पदार्थ बन कर स्वेद, मूत्र और प्रश्वास बाहर निकलते हैं ।

पञ्चभूतात्मके देहे ह्याहारः पाञ्चभौतिकः ।

विपक्कः पञ्चधा सम्यग्गुणान् स्वानभिवर्द्धयेत् ॥ ५३३ ॥

पृथिवी आदि पञ्च महाभूतों से बने हुये देह में गया हुआ पाञ्चभौतिक आहार पाचक पित्त या अग्नि ( पाचक रसों ) द्वारा ठीक तरह से पक होकर अपने अपने गुण वाले शारीरिक अङ्ग या धातुओं को बढ़ाता है ॥ ५३३ ॥

विमर्शः -- आयुर्वेद देह को पञ्चभूतनिर्मित मानता है । पाश्चात्त्यविज्ञान समस्त पदार्थों को नब्बे तत्वों ( Elements ) से बना मानते है जिनमें से शरीर में २३ मूल तत्व पाये जाते । हैं । आक्सिजन, कार्बन, हैड्रोजन, नैट्रोजन, फोस्फोरस, चुना, गन्धक, क्लोरीन, सोडियम, लोह, पुटेशियम, मेग्नेशियम तथा फ्लोरिन ये मुख्य है । देह में प्रोटीन, फेट, कार्यों हैड्रेट, २६ सु ० साल्ट और जल ये पांच मुख्य हैं तथा देह - पोषणार्थं भोजन में भी ये पञ्च तत्व अवश्य होने चाहिये | आयुर्वेद आहार को पाञ्चभौतिक मानता है किन्तु डाक्टरी इन्हीं प्रोटीनादि पांच तथा विटामिन से युक्त आहार को मानते है । चरके अन्नपरिपाकक्रियावर्णनम् - अन्नमादानकर्मा तु प्राण कोष्ठ प्रकर्षति । तद् द्रवैर्भिन्नसघात स्नेहेन मृदुता गतम् ॥ समानेनावधूतोऽग्निरुदर्यं पवनेन तु । काले मुक्त समं सम्यक् पचत्यायुर्विवृद्धये ॥ एव रस-मलायान्नभाशयस्थमध स्थित । पचत्यग्निर्यथा स्थाल्यामोदनायाम्यु तण्डुलम् ॥ अन्नस्य भुक्तमात्रस्य पड्सस्य प्रपाकतः । मधुरात्प्राक् कफोद्भावाद फेनभूत उदीर्यते ॥ परन्तु पच्यमानस्य विदग्धस्याम्ल-भावत । आशयाच्च्यवमानस्य पित्तमच्छमुदीर्यते ॥ पक्काशयन्तु । प्राप्तस्य शौष्यमाणस्य वहिना । परिपिण्डितपक्वस्य वायु स्य भावत ॥ अन्नमिष्ट चुपकृतमिष्टैर्गन्धादिभि पृथक् । देहे प्रीणाति गन्धादीन् घ्राणादीनीन्द्रियाणि च ॥ भौमाप्याग्नेयवायव्या पक्षी-" माणः सनाभसा ' । पञ्चाहारगुणान् स्त्रान् स्वान् पार्थिवादीन् पचन्ति हि ॥ यथास्व स्वच पुष्यन्ति देहद्रव्यगुणा पृथक् । पार्थिवाः पार्थिवानेव शेषाः शेषाञ्च कृत्स्नश || सप्तभिर्देहधातारो द्विविधाश्च पुनः पुनः । यथास्वमग्निभि पाक यान्ति किट्टप्रसादवत् ॥ ( च. ग्रहणीचिकित्सा ) । डाक्टरी में भाहार के कार्बोहैड्रेट का पाचन मुख ' के लालारस से तथा वहां से आमाशय में जाने पर आमाशयिक रस ( Gastric juice ) द्वारा पाचन तथा वहां से ग्रहणी में जाने पर भोजन के फेट, प्रोटीन तथा कार्बोहैड्रेटस का पाचन यकृत् तथा पित्ताशय से आये हुये पित्त ( Bile ), अग्न्याशय ( Pancrease ) से आये हुये अग्निरस ( Panorato juice ) एवं आन्त्रिक रस ( सकस इण्टेटिक्स ) के द्वारा होता है । इस प्रकार सम्यक् पचे हुये भोजन का द्रवांश या रसांश ग्रहणी से आगे क्षुद्रान्त्र में पहुंचता है । इद्वान्त्र की दीवारों में लगी हुई रसाकुरिकाएं ( Vilh ) फेट के | पाचन से बने हुये सारभूत रसांश का शोषण कर रस प्रपा ( Cisterna chyle ) में जाता है तथा वहां से रसकुल्या में और रसकुल्या से भक्षका धरा सिरा ( Subolavian vein ) के रक्त में मिल जाता है । पचे भोजन के प्रोटीन तथा शर्करा जातीय पदार्थ के सूक्ष्मरसांश प्रतिहारिणी सिरा की सूक्ष्म शाखा द्वारा प्रथम यकृत् में तथा वहां से अधरा महासिरा में होते हुये हृदय के दक्षिणालिन्द में पहुच जाते हैं । रसों से बचे हुये शेप स्थूल भाग वृहदन्त्र में घूमते हुये मल के रूप मॅ गुद द्वारा बाहर निकल जाते हैं ।

अविदग्धः कफं पित्तं विदुग्धः पवनं पुनः ।

सम्यग्विपको निस्सार आहारः परिबृंहयेत् ॥ ३३४ ॥

अविदग्ध ( मधुरावस्था को प्राप्त ) आहार कफ को बढ़ाता है । विदग्ध ( अम्लावस्था को प्राप्त ) आहार पित्त को चढ़ाता है तथा ठीक तरह से पकने पर ( रसादि के शोषण से बचा हुआ ) निःसार ( मल या किट्टरूपी ) आहार वायु को बढ़ाता है ॥ ५३४ ॥

विमर्श: - आहार के प्रथम कफ बनाने का तात्पर्य लाला रस को उत्तेजित करना तथा विदग्धावस्था में पित्त बनाने का तात्पर्य Bile को उत्तेजित करना एवं पाकानन्तर बृहदन्त्र में जाकर वायु बनाने का तात्पर्य वहां सदन से Gases बनती हैं ऐसे समन्वय समझना चाहिये ।

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२२६ सुश्रुतसंहिता ।

विण्मूत्रमाहारमलः सारः प्रागीरितो रसः ।

स तु व्यानेन विक्षिप्तः सर्वान् धातून् प्रतर्पयेत् ॥ ५३५ ॥

पचे हुये आहार का मल- विष्ठा और मूत्र हैं तथा सार-भाग रस कहलाता है । यह रस व्यान वायु से प्रेरित होकर शरीर की समस्त रस - रक्तादि धातुओं को तृप्त करता रहता है । विमर्श: - सारमलमूत्र निर्माणगमनवर्णनं शार्ङ्गधरे यथा -आहारस्य रस सार सारहीनो मलद्रव । सिराभिस्तज्जल नीत | वस्तौ मूत्रत्वमाप्नुयात् ॥ तत् किट्ट च मल शेय तिष्ठेत्पक्वाशये च तत् । बलिन्त्रितयमार्गेण यात्यपानेन नोदितम् ॥ ' इति । अन्यच -तत्राच्छ किट्टमन्नस्य मूत्र विद्याद् धन शकृत ( वाग्भटः ) । इस तरह आयुर्वेद मूत्र को मल की तरह आंत्र में बनना मानते । हैं तथा आन्त्र से सूक्ष्म स्रोतसों द्वारा यह मूत्र बस्ति में पहुंचता है तथा वृक का कार्य चरवी को पुष्ट करने ( बनाने ) ET मानता है । ' वृक्कौ पुष्टिकरौ प्रोक्तो जठरस्थस्य मेदस ' किन्तु डाक्टरी मत से वृक्क के सेल वृक्कीयधमनी द्वारा वृक्क में गये हुये रक्त से यूरिआ, यूरिक एसिड तथा व्याज्य जलीयांश को पृथक् कर देते हैं तथा ये पदार्थ दो गविनियों Uretors ) द्वारा मूत्राशय में पहुच कर मूत्र संज्ञा को प्राप्त होते हैं । वस्तुतस्तु वेद में यह वर्णन स्पष्टता है जिसे गुरुवर्य गणनाथसेन जी प्रत्यक्ष शारीर में स्पष्ट लिखा है । यदान्त्रेषु गविन्योर्यद् यद्वस्तावधिसश्रितम् । मूत्रमेव तदुच्यता बडिवलौनिसज्ञकम् ॥ ध्यान वायु हृदयस्थ प्राणवायु का ही एक भेद है । ‘ न्यानो हृदि स्थित ' ( वाग्भटः ) रस तथा रस-संवहन ( Blood ceroulation ) का कार्य करती है । ' रससव-नोत ' ( सुश्रुतः )

कफः पित्तं मलः खेषु स्वेदः स्यान्नखरोम च ।

नेत्रविट् च स्नेह धातूनां क्रमशो मला. ॥ ५३६ ॥

सप्तधातुओं की उनमें रहने वाली सात भग्नियों से पाक होने पर उनसे क्रमशः चनने वाले मल जैसे - रस का कफ, रक्त का पित्त, मांस का कर्णनासादिस्रोतसस्थित मल, मेद का स्वेद, अस्थि का नख तथा रोम तथा मज्जा का नेत्र मल और त्वचा का स्नेहांश ये इन धातुओं के मल होते हैं ॥ ५३६ ॥

विमर्श - वाग्भट ने ओज को शुक्र का मल बतलाया है । कफ पित्त मल सेपु प्रस्वेदो नखरोम च । स्नेहोऽक्षि त्वग्विशामोजो धातूना क्रमशो मला || परन्तु अष्टाङ्गसग्रहकार ने ओज को शुक्र का मल न मानकर सार माना है ' शुक्रस्य सारमोज अत्यन्तशुद्धतयाऽस्य मलाभाव ॥ सुश्रुत के टीकाकार ढल्हण ने भी शुद्ध सोने को तपाने से जैसे उसमें से मल नहीं बनता है तद्वत् शुक्र के पाक होने पर उससे स्थूल भाग शुक्र तथा उसका स्नेह भाग भोज होता है । अर्थात् भज को शुक्र का मल न मान कर स्नेह माना है - स्वाग्निभि पच्यमानेषु मल पट्सु रसादिपु । न शुक्रे पच्यमानेऽपि हेमनीवाक्षये मल ॥

दिवा विबुद्धे हृदये जाग्रतः पुण्डरीकवत् ।

अन्नमक्लिन्नधातुत्वादजीर्णेऽपि हितं निशि ॥ ५३७ ॥

हृदि सम्मीलिते रात्रौ प्रसुप्तस्य विशेषतः ।

क्लिन्नविस्रस्तधातुत्वादजीर्णे न हितं दिवा ॥ ५३८ ॥

दिन में जागते हुये मनुष्य का हृदय कमल के समान विकसित रहता है इस लिये धातुओं में क्लेद न होने से रात्रि ( सायङ्काल ) के समय अजीर्ण होने पर भी अन्न का सेवन करना हितकर ही होता है किन्तु रात्रि में विशेष कर सोये हुये मनुष्य के हृदय के सम्मीलित ( अल्प कार्य कर ) हुये रहने से एवं धातुओं के क्लेदयुक्त तथा शिथिल हुई रहने से अजीर्ण हो जाने पर दूसरे दिन प्रातः काल भोजन करना हितकर नहीं है | १३७-५३८ ॥ विमर्श: - चरक में यह विषय अच्छे रूप से समझाया है । प्रातराशे त्वजोर्णेपि सायमाशी न दुष्यति । दिवा प्रबुध्यतेऽ-कण हृदय पुण्डरीकवत् ॥ तस्मिन् विबुद्धे स्रोतासि स्फुटत्व यान्ति सर्वशः । व्यायामाच्च विचाराच्च विक्षिप्तत्वाच्च चेतस ॥ न क्लेदमुपगच्छन्ति दिवा तेनाऽस्य धातवः । अक्किन्नेष्वन्नमासिकमन्य-तेषु न दुष्यति ॥ अविदग्ध इव क्षीरे क्षीरमन्यद्विमिश्रितम् । रात्रौ तु हृदये म्लाने सवृतेष्वयनेषु च ॥ यान्ति कोष्ठे च विक्केद सवृते देहधातव । छिन्नेष्वन्यदपक्त्रेषु तेष्वासिक्त प्रदुष्यति ॥ विदग्धेषु पय. "

स्वन्यत्ययस्तप्तेष्विवार्पितम् । नैशेष्पाहारजातेषु नाविपक्केषु बुद्धिमान् ॥

तस्मादन्यत् समश्नीयात पालयिष्यन् बलायुपी । ( च ० ग्रहणी-चिकित्सा ) । इमं विधिं योऽनुमतं महामुने र्नृपर्पिमुख्यस्य पठेद्धि यत्नतः । स भूमिपालाय विधातुमौषध महात्मनां चार्हति सुरसत्तमः ॥ ५३६ ॥

इति भगवता श्रीधन्वन्तरिणोपदिष्टायां तच्छिष्येण महर्षिणा सुश्रुतेन विरचितायां सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने षट्चत्वारिंशत्तमो-ऽध्यायः ॥ ४६ ॥

axes राजा तथा ऋषियों में प्रधान महामुनि भगवान् धन्वन्तरि द्वारा मानी हुई इस आहारविधि को जो यत्नपूर्वक पढ़ता है वह विद्वानों में श्रेष्ठ वैद्य राजा तथा अन्य श्रेष्ठ महात्माओं की चिकित्सा करने में योग्य होता है ॥ ५३ ९ ॥ इत्यायुर्वेदतध्वसन्दी पिकाभाषायां सूत्रस्थाने -पट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४६ ॥

७ इति सूत्रस्थानं समाप्तम्. -4® Sagit

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अथ निदानस्थानम् ।

प्रथमोऽध्यायः ।

अथातो वातव्याधिनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब इसके अनन्तर ' वातव्याधिनिदान ' का वर्णन करते ६, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ विमर्शः – ' रोगनादो परीक्षेत ' इत्युक्तेर्हेतु लक्षणप्रतिपादक नदानस्थानमारभ्यते — अथेति ' दिस पड्डु कफः पशुः पद्म at धातवः । वायुना यत्र नीयन्ते तत्र वर्धन्ति मेघवत् ॥ ' युक्त्या टोपे वातस्य प्राधान्यात् प्रथमं वातव्याधिनिदानमधि-करोति । वातजनितोऽसाधारणव्याधिर्वातव्याधिराक्षेपकादिस्तस्य निदा-वातव्याधिनिदानम् । निर्दिश्यते व्याधिरनेनेति निदानं विप्र-कृष्टसन्निदृष्टमेदेन व्याध्युत्पत्तिहेतुभूतनित्यर्थं । विप्रकृष्टं – विरुद्धा रादि, सन्निकृष्टवानादि । अपि च - नि निश्चयनिपेनयोः ' इति वररुचेरुपसर्गसूत्रेणं निशब्दस्य निश्चयार्यकत्वाद् व्याधिकरण निदानमित्यर्थः । रोगाणा निद्रानं पञ्चविधमित्याह माधवकरः --' निदानं पूर्वरूपाणि रूपाण्युपशवस्तथा । सम्प्राप्तिश्चेनि विज्ञान रोगाणां पञ्चधा स्मृतम् ॥ निमित्तहेत्वायतनप्रत्ययोत्थान • कारणैः । निद्राननाहुः पर्यायः प्राप येन लक्ष्यते ॥ इति । शार्ङ्गबरे वातव्याधेरशीतिर्भेदा उक्ता. - ' अशीतित्रतजा रोगा कथ्यन्ते मुनिभाषिना ' इति । चत्वारिंशच्च पैत्तिका । विंशति श्लेग्ननाः प्रोक्ताः । निदान शब्द के दो अर्थ होते हैं । प्रथम । रोगों के कारण Cause को निदान कहते हैं तथा द्वितीय अर्थ रोगों के निर्णय करने के तरीकों ( उपायों ) को निदान ( Diagnosis ) कहते हैं ।

धन्वन्तरिं धर्मभृतां वरिष्टममृतोद्भवम् ।

चरणावुपसवगृह्य सुश्रुतः परिपृच्छति ॥ ३ ॥

वायोः प्रकृतिभूतस्य व्यापन्नस्य च कोपनैः ।

स्थानं कर्म च रोगांश्च वढ़ मे वदतां वर! ॥ ४ ॥

धर्म मानने वाले या जानने वालों में श्रेष्ठ तथा समुद्र-मथन के समय अमृत कलश हस्त में लेकर उत्पन्न हुये धन्वन्तरि भगवान् को महर्षि सुश्रुत उनके चरण छूकर प्रश्न । करने लगे । हे भाषण देने वालों में श्रेष्ठ भगवन्! आप प्राकृतिक वायु के तथा अनेक कारणों से कुपित हुये वायु के स्थान कर्म तथा रोगों को मेरे लिये कहो ॥ ३-४ ॥ विमर्श: -- समुद्रमन्थनसमये स्मृतेन सह उद्भव उत्पत्ति-यस्य तन् । जैसा कि विष्णुपुराण में लिखा है- मन्यान मन्दर कृत्वा नेत्रं कृत्वा च वासुकिन् । ततो मयितुमारब्धा मैत्रेय । तरसाऽनृतन् । तनो धन्वन्तरिर्देव ध्वेनाम्बरधरः स्वयन् । विभ्रन्क । मण्डलु, पूर्णमनृतस्य समुत्थित '! जैसे यहां वातरोग - वर्णनार्थ अध्याय: लिखा है उसी प्रकार पित्त तथा कफ के रोगों के लिये अध्याय क्यों नहीं लिखा इसका उत्तर विजयरचितजी मधुक्रोप में देते हैं यथा — ' एव व्यवस्थिते वातव्याधिवद् पिक्षु कफव्याधी कस्मान्नोक्तौ? उच्यते - वायोरतिबलत्वेनाशुकारित्वेन च गरीयस्त्वात्तद्विकाराणा दुःसाध्यत्वादाश्वेवात्ययकरत्वाद्विशिष्टचिकि • त्सात्वाद्वातव्याध्यमिवान न तु कफपित्तव्याध्यभिवानम् । अत एव चरक - सुश्रुतादिष्वपि वातरोगाध्याय एव निर्दिष्टो न तु पित्तकफ | रोगाध्यायः ।

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्राब्रवीद्भिषजां वरः ।

स्वयम्भूरेप भगवान् वायुरित्यमिशब्दितः ॥ ५ ॥

स्वातन्त्र्यान्नित्यभावाच्च सर्वगत्वात्तथैव च } सर्वेषामेव सर्वात्मा सर्वलोकनमस्कृतः ॥ ६ ॥

स्थित्युत्पत्तिविनाशेषु भूतानामेप कारणम् ।

अव्यक्तो व्यक्तकर्मा च रूक्षः शीतो लघुः खरः ॥ ७ ॥

तिर्यग्गो द्विगुणश्चैव रजोबहुल एव च ।

अचिन्त्यवीर्यो दोषाणां नेता रोगसमूहराट् ॥ ८ ॥

आशुकारी मुहुश्वारी पचाघानगुदालयः ।

देहे विचरतस्तस्य लक्षणानि निवोध मे ॥ ६ ॥

सुश्रुत के वचन को सुनकर वैद्यों में श्रेष्ठ धन्वन्तरि कहने लगे कि यह वायु अपने कार्य में स्वतन्त्र होने से, नित्य होने से तथा सर्वत्र व्याप्त होकर रहने से आकाश की तरह स्वयम्भू तथा भगवान् अर्थात् अणिमादि ऐश्वर्य - गुणयुक्त है । यह सब प्राणियों को चैतन्य ( प्राणवायु ) देने की दृष्टि से । उन सबकी आत्मा है तथा उन सर्वो से नमस्कृत है । स्थावर तथा जनम भूतों की स्थिति ( रक्षा ), उत्पत्ति तथा विनाश मैं भी यही कारण है । यह अव्यक्त अदृश्य = रूपरहित ) होते हुये भी व्यक्त कार्य करता है तथा यह रूच, शीत, लघु और खरगुणों से युक्त है तथा तिर्यग् ( टेढा ) चलने वाला, शब्द - स्पर्श रूपी द्विगुणों से युक्त, त्रिगुणात्मक होते हुये भी रजोगुण की प्रधानता वाला, अचिन्त्य -शक्ति - सम्पन्न, दोष, धातु तथा मलों का इतस्ततः सञ्चरण कराने वाला, रक्त पित्त-कफजन्य अन्य सब रोगों में राजा ( प्रधान ), आशु ( शीघ्र ) हो अच्छा - बुरा कार्य करने वाला, सदैव गतियुक्त तथा विशेष रूप से पक्वाशय ( बृहन्त्र ) तथा गुदा मँ ( विकून रूप से ) रहने वाला है । धन्वन्तरि कहते है कि अब शरीर में विचरण ( प्रसर ) करते हुये वायु के लक्षणों को मेरे से सुनो ॥ ५ - ९ ॥ विमर्शः -- द्विगुण = स्पर्शशब्दद्वितयगुणयुक्त । तथा च मनु -' परस्परानुप्रवेशाद्धारयन्ति परस्परम् । गुण पूर्वस्य पूर्वस्य धारयन्त्युत्तरोत्तरम् ॥ ' इति । अपि च- ' महाभूतानि ख वायु

रग्निराप क्षितिलथा । शब्दः स्पश्च रूपं च रसो गन्नश्च तद्गुणा ॥

। तेषामेकगुण पूर्वो गुणवृद्धि ' परे परे । पूर्व ' पूर्वगुनश्चैव क्रमतो गुणिषु स्मृत ॥ ' इति । रनोबहुल = त्रिगुणन्वेऽपि प्रवर्तकत्वाद्वज प्रधान ' । साट्ल्ये - ' सत्व लघु प्रकाशकनिष्टनष्टम्भक चलश्च रजः ' इति । । दोषाणां नेता – पिक्षु पशु कफः पशुः पद्गत्रौ मळभानवः ।

पृष्ठ 280

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२२८ सुश्रुतसहिता ।

वायुना यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति मेववत् ॥ ( शार्ङ्गधरः ) ॥

रोगसमूहराट् —– विभुत्वादाशुकारित्वाद्व लित्वादन्यकोपनात् । स्त्रात न्याद् बहुरोगत्वाद्दोषाणा प्रवलोऽनिल || शाखागता कोष्ठगताश्च रोगा मर्मोर्ध्व सर्वावयवा गजाश्च । ये सन्ति तेपा न तु कश्चिदन्यो वायो पर जन्मनि हेतुरस्ति ॥ ( चरक - सिद्धि ० अ ० १ )

दोषधात्वग्निसमतां सम्प्राप्ति विषयेषु च ।

क्रियाणामानुलोम्यं च करोत्यकुपितोऽनिलः ॥ १० ॥

अकुपितवातकार्य - अकुपित वात दोष, धातु तथा अग्नि की समता रखने वाला, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इन पांच विषयों में मन को चक्षुरादि इन्द्रियों के साथ संयुक्त कराने वाला तथा शरीर की श्वासप्रश्वास, पाचन - रक्तसञ्चर-णादि क्रियाओं तथा पञ्चकर्मेन्द्रियों की वचनादि क्रियाओं को ठीक ठीक रूप से करने वाला है ॥ १० ॥

विमर्शः —— चरकोक्तत्रातकर्माणि - ' वायुस्तन्त्रयन्त्रधर, प्रवर्तकश्चे-ष्टानामुच्चावचाना, नियन्ता प्रणेता च मनसः सर्वेन्द्रियाणामुद्यो नकः, सर्वेन्द्रियाणामभिवोटा, सर्वशरीरधातुव्यूहकर, सन्धानकर ' शरीरस्य, प्रवर्तको वाच, प्रकृति शब्दस्पर्शयोः, श्रोत्रस्पर्शनयो-र्मूल, हर्पोत्साइयोर्योनि •, समीरणोऽग्ने, दोपसशोपण, क्षेप्ता वहि-र्मलाना, स्थूलाणुस्रोतसा भेत्ता, कर्ना गर्भाकृतीनाम्, आयुपोऽनुप्रवृ-तिप्रत्ययभूतो भवत्यकुपित ' । ( च. सु. अ. १२ ) । इस तरह यह निर्विवाद है कि जो कार्य Nervous System का है वही कार्य बात का है । Brain या मस्तिष्क इसका मुख्य केन्द्र है । यहीं से शरीरानों को चेष्टावह ( Motor nerves ) सूत्र द्वारा आज्ञाएं जाती है तथा समस्त शरीर से सांवेदनी सूत्र ( Sensory nerves ) द्वारा यहां ही समाचार प्राप्त होते हैं । वास्तव में आयुर्वेदिक वात मस्तिष्क से समस्त शरीर में इन्हीं सूत्रों में शक्ति के रूप में दौड़ता रहता है जैसे बिजली । घर ( Power house ) से बिजली ठोस तारों में होकर सारे नगर में जाकर बत्तियों को जलाती हैं इस लिये Brain ( मस्तिष्क या शिर ) को मानव राजधानी का राजा या शासक ( King or Ruler ) कह सकते हैं - प्राणा प्राणभृता

यत्र श्रिता सर्वेन्द्रियाणि च । तदुत्तमाङ्गमगाना शिर इत्यभिधीयते ॥

( चरकः ) ।

यथाऽग्निः पञ्चधा भिन्नो नामस्थानात्मकर्मभिः ।

भिन्नोऽनिलस्तथा ह्येको नामस्थानक्रियामयैः ॥ ११ ॥

प्रागोदानौ समानश्च व्यानश्चापान एव च ।

स्थानस्था मारुताः पञ्च यापयन्ति शरीरिणम् ॥ १२ ॥

जिस तरह ' व्रणप्रश्नाध्याय - सूत्रस्थान ' में नाम, स्थान तथा क्रियाओं के कारण अग्नि ( पित्त ) के पाचकरञ्जकालाचक-भ्राजक्साधक रूप से पांच भेद किये गये हैं उसी तरह एक प्रकार का वायु - नाम, स्थान, क्रिया तथा रोगों के कारण पांच प्रकार का होता है । प्राण, उदान, समान, ध्यान और अपान ये पांच प्रकार के वायु अपने अपने विशिष्ट स्थानों में स्थित होकर किंवा अपनी स्वाभाविक स्वरूप ( साम्यावस्था ) में रद्दकर आत्मा या प्राणियों के देह को धारण करती है ॥११- १२॥ विमर्श - प्राणेति । प्रागनिति प्रागयतीति वा प्राण उद् म्यंमनिनीन्युदान, मुक्तपीते समं नयतीनि समानः, बीर्यवत्कर्म कुर्वन् विगृह्य वाऽनितीति व्यान, मूत्रपुरीपाद्यपनयन्नवोऽनितीत्यपानः । शार्ङ्गधरे सुश्रुतातिरिक्त क्रमो दृश्यते । तद्यथा - ' अपानः स्यात्स-मानश्च प्राणोदानौ तथैव च । व्यानश्चेति समीरस्य नामान्युक्तान्य-नुक्रमात् ॥ ' इति । ' हृदि प्राणो गुदेऽपान ' समानो नाभिसस्थितः । उदानः कण्ठदेशे स्याद् व्यान. सर्वशरीरग • ॥ इति । हृदि उर स्थाने एषा क्रमशो व्यापाराः – ' अन्नप्रवेशन मूत्राद्युत्सर्गोऽन्नविपाचनम् । भाषणादिनिमेपादि तद्वयापारा क्रमादभो ॥ ' इति ।

वायुर्यो वक्त्रसञ्चारी स प्राणो नाम देहधृक् ।

सोऽन्नं प्रवेशयत्यन्तः प्राणांश्चाप्यवलम्बते ॥

प्रायशः कुरुते दुष्टो हिक्काश्वासादिकान् गदान् ॥ १३ ॥

प्राणवायु- मुख में विचरण करने वाली प्राणवायु है तथा वह देह को धारण करती है । अन्न को शरीर के अन्दर आमा • शय, ग्रहणी आदि स्थानों में पहुँचाती है तथा प्राणों का अवलम्बन ( धारण ) करती है मिथ्या आहार - विहारादि से कुपित हुई यह वायु प्रायः हिका, श्वास आदि रोगों को उत्पन्न करती है ॥ १३ ॥

विमर्शः -- त्रातस्य स्थानमेतद् विस्तरतो वोद्धधम् । सङ्क्षेपतस्तु व्रणप्रश्ने ' वात ' श्रोणिगुदसश्रय ' इत्युक्तम् । वक्त्रसञ्चारित्वम-स्योपलक्षणम् । तेन मूर्धौर कण्ठनासिका अपि “ प्राणस्य स्थानमिति डल्हण । तथा चाष्टाङ्गसङ्ग्रहे — ' तत्र प्राणो मूर्धन्यवस्थितः कण्ठो-रवरो बुद्धीन्द्रियहृदयमनोधमनीधारणष्ठो वनक्षवयूद्गारश्वासोच्छ्वा-सान्नप्रवेशादिक्रिय. ॥ इति । शार्ङ्गधर में प्राण वायु का वर्णन - नाभिस्थ प्राणपवन स्पृष्ट्वा हृकमलान्तरम् । कण्ठाद्दद्दि-विनिर्याति पातु विष्णुपदामृतम् ॥ पीत्वा चाम्वरपीयूष पुनरायाति । वेगतः । प्रीणयन्देहमखिल जीवयश्क्षठरानलम् ॥ प्रत्यक्ष में यह होता है कि सारे शरीर की तोड़फोड़ निर्माण रूपी हलचलों से बनी हुई दूषित वायु ( Co2 ) सिरागत रक्त के साथ २ हृदय में आकर वहाँ से वापस धमनियों द्वारा फेंफडों में चली जाती है तथा फेफडों से श्वास - पथद्वारा बाहर निकल जाती है एवं बाहर की शुद्ध वायु जिसमें ओक्सिजन होने से प्राण-वायु - विष्णुपद ( आकाश ) का अमृत या अम्वर ( आकाश ) का पीधूप कहलाती है, श्वास मार्ग ( Tracoes ) द्वारा फेफड़ों में आती है और रक्त में मिलकर उसे शुद्ध ( लाल सुर्ख ) बना देती है । अतएव मैंने ' नाभिस्थ प्राणपवन ' की जगह ' देहस्थो दूषितो वायु ' एवं ' कण्ठाद्वहिर्याति ' की जगह ' फुफ्फुसाभ्या वहिर्याति ' ऐसा परिवर्तन किया है । उपनिपदि प्राणवातवर्णनम् -' कस्मिन्नद्दमुत्कान्ते उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठितेऽहं प्रतिष्ठास्यामीति स प्राणमसृनत् । यथा सैन्धवोऽश्वः शङ्कुमुत्पाट्य

धावति तद्वत्प्राणो रुद्ध सन् सर्वान् वायुन्नुत्पाव्य प्रयाणकाले धावति ।

उदानो नाम यस्तूर्ध्वमुपैति पवनोत्तमः ॥ १४ ॥

तेन भाषितगीतादिविशेपोऽभिप्रवर्त्तते ।

ऊर्ध्वजत्रुगतात् रोगान् करोति च विशेषतः ॥ १५ ॥

उदान वायु- सर्व वातों में श्रेष्ठ उदान वायु वह है जो ऊपर को गति करती हो तथा इस गायन आदि विशेष कार्य होते हैं तथा यही कुपित होकर जन ( Clavaole bone ) के ऊपर नेत्र, नासा, मुख, कर्ण, शिर । आदि में रोगों को उत्पन्न करती है ॥ १४-१५ ॥