श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 301–310

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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श्रध्यायः ५ ] निदानस्थानम् । २४६ प्रन्थियां फूट कर चण चन जाती हैं । अंगुलियां, मुस, कर्ण, नासा में होने से वे गलते जाते हैं । यह पित्तकफज कुष्ठ हो सकता है । ३. मिश्र ( Mixed ) प्रकार ही अधिक मिलता है । ' नच फिजिस्ति कुष्ठमेकदोषप्रकोपनिमित्तम् ' ( चरकः ) । असाध्यकुष्ठलक्षणम् - अस्याचे वारस्थायामुद्रवा कुष्ठिनं स्पृशन्ति तद्यथा प्रसत्रणमङ्गभेद, पतनान्यङ्गावयवाना, तृष्णाज्वरातिसारदाह दौर्बल्यारोचका विपाकाश्च तद्विधमसाध्य विद्यात् । ( च. नि ) । निदाने साध्यासाध्यविचारः - साध्य स्वग्रक्तमासस्थ वातश्लेष्मा विकत यत् । मेदसि द्वन्द्वजं याप्य वयं मज्जास्थिसश्रितम् ॥ कृमिवृद्दाहमन्दाग्निमयुक्तं यत्त्रिदोषजम् । प्रभिन्नं प्रस्तुताद्गश्च रक्तनेत्रं इतस्वरम् ॥ पद्मकर्मगुणातीत कुछ इन्तीह मानवम् ॥

भवन्ति चात्र-यथा वनस्पतिर्जातः प्राप्य कालप्रकर्षणम् ।

अन्तर्भूमिं विगात मूलैर्दृष्टिविवर्द्धितैः ॥ १६ ॥

एवं कुष्ठं समुत्पन्नं त्वचि कालप्रकर्षतः ।

क्रमेण धातून् व्याप्नोति नरस्याप्रतिकारिणः ॥ २० ॥

जिस तरह उत्पन्न हुई वनस्पति ( वृक्ष ) काल की अधि. । कता से तथा वृष्टि से बढ़ कर जठों के द्वारा भूमि के भीतर जम ( फैल जाती है उसी प्रकार से प्रथम त्वचा में उत्पन्न हुआ कुष्ठ चिकित्सा नहीं करने से कुछ समय के पश्चात् क्रम रक्तमांसादि धातुओं में व्याप्त हो जाता है ॥ १ ९ –२० ॥ बिमर्शः — कुष्ठ किसी भी प्रकार का हो किन्तु उसकी सर्व प्रथम उत्पत्ति त्वचा से ही सुप्ति, मण्डलोत्पत्ति और वर्णभेद के रूप में प्रारम्भ होती है— कुष्ठेषु प्रथमं वच्यवश्यं वैकृतं भवति विशेषेण पश्चाद्वैशेषिकी दुष्टि कालप्रकर्षाद्रक्तादिषु भवति । ( चक्रपाणिः ) ।

स्पर्शहानिः स्वेदनत्वमीपत्कएदूश्च जायते ।

वैव रूक्षभावश्च कुष्ठे त्वचि समाश्रिते ॥ २१ ॥

त्वस्यापो रोमहर्षश्च स्वेदस्याभिप्रवर्त्तनम् ।

कडूर्विपूयकश्चैव कुष्टे शोणितसंश्रिते ॥ २२ ॥

बाहुल्यं वक्त्रशोपश्च कार्कश्यं पिडकोद्गमः ।

तोदः स्फोटः स्थिरत्वं च कुष्ठे मांससमाश्रिते ॥ २३ ॥

दोर्गन्ध्यमुपदेहश्च पूयोऽथ क्रिमयस्तथा ।

गात्राणां भेदनं चापि कुठे मेदः समाश्रिते ॥ २४ ॥

नासाभङ्गोऽतिरागश्च चते च क्रिमिसम्भवः ।

भवेत् स्वरोपघातच ह्यस्थिमज्जसमाश्रिते ॥ २५ ॥

कौण्यं गतिक्षयोऽङ्गानां सम्भेदः चतसर्पणम् ।

शुक्रस्थानगते लिङ्गं प्रागुक्तानि तथैव च ॥ २६ ॥

स्वगादिगत कुष्ठ लक्षण - त्वचा में कुष्ठ के उत्पन्न होने पर स्पर्शहानि, स्वेद आना, कुछ कण्डू, विवर्णता तथा रुक्षता ये लक्षण होते हैं । कुष्ट के रक्त में होने से त्वचा में सुन्नता, रोमहर्ष, पसीने का अधिक आना, खुजली चलना तथा दुर्ग-न्धित पूय का निकलना ये लक्षण उत्पन्न होते हैं । कुष्ठ के मांसधातु में होने से शरीर में मोटापन, मुखशोष, कर्कशता, शरीर पर पिढकोत्पत्ति, सूई चुभोने की सी पीड़ा, त्वचा में या शरीर में दरारें पड़ना और स्थिरता ये लक्षण पैदा होते ३२ सु ० हैं । मेदोधातु में कुष्ठ के आश्रित होने पर शरीर में दुर्गन्धि तथा मलवृद्धि, पय, कीडे पढना, शरीराह्नों का भेदन ( विदारण ) होना ये लक्षण होते हैं । अस्थि तथा मज्जा में कुष्ठ के उपस्थित होने पर नासाभङ्ग, नेत्रों में लाली, व्रण में कृमियों की उत्पत्ति तथा स्वरभद्ग ये लक्षण होते हैं । शुक्र स्थान में कुष्ट के संश्रित होने पर कौण्य ( अङ्गुलिवैकल्य ), चलनक्रियानाश, अट्ठों में पीडा अथवा भेद ( विदार ), क्षत ( व्रण ) का फैलना तथा पूर्व में कहे हुये लक्षण होते हैं २१-२६

स्त्रीपुंसयोः कुष्ठदोपाद दुष्टशोणितशुक्रयोः ।

यदपत्यं तयोर्जातं ज्ञेयं तदपि कुष्ठितम् ॥ २७ ॥

अनुवंशपरम्परा - कुष्ठ दोष से खी के शोणित ( अन्त-रार्तव = ( Ora ) तथा पुरुष के शुक ( कीट ) के दूषित होने पर उनसे जो सन्तान पैदा होती है वह कुष्ठप्रकृतिक होती है ॥ विमर्श - पुरुष के वीर्य ( शुक्रकीट ) में कुष्ठ होने से वह पण्ढ तथा स्त्री के वोजग्रन्थि ( Overy ) या अण्ड ( Ora ) पर कुछ प्रभाव होने से वह बन्ध्या हो जाती है - यदा स्त्रीपुस-यो कुष्ठिनोबजमुपहत स्थात्तदा तयो प्रजा नोत्पद्यते इति उण. । दुष्ट शुक्रमार्तव वा सर्वथा बोजत्वानुपघातादपत्यजनकं, परन्तु विकृतं जनयतीति द्रष्टव्यमिति विजयरक्षित । किन्तु इन भट्ठों पर प्रभाव हो तो कुष्टी माता - पिता के सन्तान हो सकती है । जात-मात्र सन्तान कुष्टी नहीं हो सकती है किन्तु उन माता - पिता के सम्पर्क में रहने से बच्चों में कुष्ट होता है । यदि जन्मते ही बच्चे पृथक कर दिये जांय तो उनमें रोग नहीं हो सकता । ' नैवं नहि प्रमेहिना जात इत्येतावता उत्पन्नमात्र एव प्रमेही भवति किं तर्हि कालवशेन, दुष्टेरभिव्यक्त्या तथा कुष्ठिजातस्य । कुष्ठन् ( मधुकोपव्याख्या ) ।

कुष्ठमात्मवतः साध्यं त्वप्रक्तपिशिताश्रितम् ।

मेदोगतं भवेद्याप्यमसाध्यमत उत्तरम् ॥ २८ ॥

आत्मवान् ( जितेन्द्रिय ) मनुष्य के स्वचा, रक्त और मांस में उत्पन्न कुष्ठ साध्य होता है तथा मेदोधातु में चले जाने पर याप्य होता है तथा इनसे उत्तर ( आगे ) की धातुओं ( अस्थि मज्जा और शुक्र ) में जाने पर असाध्य हो जाता है ॥ २८ ॥

ब्रह्मस्त्रीसज्जनवधपरस्वहरणादिभिः ।

कर्मभिः पापरोगस्य प्राहुः कुष्ठस्य सम्भवम् ॥ २६ ॥

कुरहेतु - त्राह्मण, स्त्री और सज्जन ( साधु, महात्मा ) पुरुषों की हत्या एवं दूसरे के धन को अपहरण आदि कम से इस पापजन्य कुष्ठ रोग की उत्पत्ति होती है ॥ २ ९ ॥

म्रियते यदि कुठेन पुनर्जातेऽपि गच्छति ।

नातः कष्टतरो रोगो यथा कुष्ठं प्रकीर्त्तितम् ॥ ३० ॥

यदि कोई कुष्ठ रोगी मर जाता है तब वह दूसरे जन्म में भी कुष्ठ रोग से ग्रस्त होता है इस लिये जैसा यह कुष्ठ खराब रोग कहा गया है वैसा दूसरा कष्टदायी कोई रोग नहीं है ॥३० ॥

आहाराचारयोः प्रोक्तामास्थाय महतीं क्रियाम् ।

ओषधीनां विशिष्टानां तपसा निपेवणात् ॥

यस्तेन मुच्यते जन्तुः स पुण्यां गतिमाप्नुयात् ॥ ३१ ॥

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२५० सुश्रुतसहिता । कुष्टमोक्षोपायल -- जो व्यक्ति उचित तथा पय्यकर आहार और बिहार में महान् श्रद्धा करके उसका सेवन करने से तथा विशिष्ट ओषधियों और तपश्चर्या के सेवन करने से इस कुष्ट रोग से मुक्त हो जाता है वह उत्तम गति को प्राप्त होता है ॥३१ ॥

विमर्श ' कुष्ठ रोग दुष्ट कर्म तथा दोष जन्य व्याधि है जैसा कि कहा है - पथाशास्त्रं विनिगनो यथाविधि चिकित्सिन । न गर्न यानि यो व्याधि सज्ञेय कर्मजो युधैः ॥ अन्यच्च - कर्मना व्यावर केत्रिदोषना ' मन्ति चापरे । र्म्मद्रोषोइवाथान्ये । ( उतं. न. १० ) । अतः इस लिये इसकी चिकित्सा भी कर्म तथा दोष दोनों को नष्ट करने वाली होनी चाहिये - ' कर्मदोरजयकृता तेना सिद्धिर्विधीयते । अन्यत्रका कर्मकृता दोषना स्वत्व-मेन । कर्मत्रोपोद्भवा यान्ति को अयन ॥ इसी लिये कुष्ठ की तपश्चरण द्वारा कर्म क्षय एवं तुवरक, खदिर, रसमाणि क्यादि द्वारा ढोपचयकारक चिकित्सा लिखी है ।

प्रसङ्गाद्गात्रसंस्पर्शान्निश्वासात्सहभोजनाम् ।

सहशय्याऽऽसनाच्चापि वस्त्रमाल्यानुलेपनात् ॥ ३२ ॥

कुएं वरन शोषञ्च नेत्राभिष्यन्द एव च ।

औपसर्गिकरोगाश्च सङ्क्रामन्ति नरान्नरम् ॥ ३३ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां निदानत्याने कुष्ठनिदानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

-cra 30-औौपसर्गिक रोगप्रसारण हेतु — रोगग्रस्त स्त्री का स्वस्थ पुरुष के तथा रोगग्रस्त पुरुष का स्वस्थ स्त्री के साथ मैथुन करने से ( कुष्ट, उपदंश, पूयमेह ), शरीर के संस्पर्श से ( कुष्ट, शीतला ), श्वास में श्वास मिलाने से ( राजयच्मा, न्यूमोनिया, रोहिणी, कुक्कुर खांसी ), सहभोजन से ( मोतीझरा, अतिसार, हैना ), साथ में सोने से ( कुष्ठ, शीतला ), रोगी के वस्त्र, माला तया लगाये हुये चन्दन इनके सेवन से कुष्ठ ( कुष्ठ, चेचक ) ज्वर,

शोष ( राजनचमा ), नैत्राभिप्यन्द तथा अन्य औपसर्गिक रोग ।

एक मनुष्य मे दूसरे मनुष्य को संक्रान्त होते हैं ॥ ३२-३३ ॥

विमर्श -- अनुलेपन का अर्थ धारण है - उपानहौ च वासच धृतनन्यैर्न धापयेत् । दग्बीना जं करणमेव च । ( मनुः ) । औपमर्गिक ctions ) रोग रोगों को हृत की बीमारियां या संक्रामक ( Infe कहने हूँ । मयूरिकाश्च गैनान्त्यो ग्रन्यिवीस एव च । व्याविनेत्रनात् उन्द्वंशुश्च बन्दूवाषा औग्नर्गिकसंगुन ॥ अन्यच्च - लकाहारश । प्रानशी गाः । सर्वे सचारिणो नेत्रत्वग्विकारा विद्ये-पद्र!! ( अ ० सं ० ) । बाडूशा सूनोन्माभगन्दरा साथ संगति नगन्नरम् ' । औप-लगक्षिरोगास्नारगजवक्ष्ननरिका ॥ ( भाव प्र ० ) । अन्यक्ष-संत्रामन्ति नगन्नरन् । दर्शनात् र्शनाद्दानात् ॥ ( उरन्त्र ' ) । ' नत्र नासारन्त्रानुगतेन श्वामुक्रसत्रनिद्रयाना ', स्वगिन्द्रियगनैन ररिका बाना वायुना टन्न । एवञ्च - वान राचार्योऽनि विश्वनि- ' अन्नाकं शरीराणि व्रण-इन्वेन अन्ननादिद्वारेण वा प्रविष्टा ं डाक्टरी में रोग फैलने या प्रवेश के स्वचा, श्वासपय और मुन्त ये तीन स्वच्चा तथा ने उपदंश फिरल, पूरमेह, धनुर्वात, विसर्प प्रधान, जमारा मार्ग हैं है ॥ एथा मसूरिका । श्वासय मे न्यूमोनिया, राजनच्मा , कुकुरम्बांसी, रोहिणी, रोमान्तिका, एन्फ्लु-, फुफ्फुस प्लेग । मुख ( खाद्य - पेय ) द्वारा - हैजा, मोतीझरा, डिसेण्टरी ( अतिसार ), आदि । कीटदंग से जैसे पिस्सू के काटने से प्लेग, मच्छर काटने से मलेरिया, श्लीपद, पीतज्वर तथा डेंग्यूफीवर, मत्कुग तथा जुओं के काटने से टायफम फीवर आदि । यह कीटदंश स्वरमार्ग के अन्तर्गत ही है । कुष्ठ का प्रसार मैथुन से, सहशयन मे, उसके वस्त्र - पात्र के इस्तेमाल करने से, उसकी सेवा करने के | कारण सम्पर्क में आने से त्वचा में रगढ हो कर चत से जीवाणु अन्य मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट होते हैं । कुष्ठी के नासानाव, उसके व्रणों के स्राव या पूय में रोग के जीवाणु होते हैं । अच्छा हो कि कुष्ठियों को अलग आश्रम बना के वहां रख दिया जाय । प्रायः मन्दिरों के बाहर एवं पवित्र नदियों ( गंगा, यमुना, सरयू ) के तटों पर तथा धार्मिक कुम्भादि मेलों पर कुष्टी भोजन - वस्त्रादि मांगने के लिये इकट्ठे होते हैं । यदि इन्हें एक स्थान में वसा कर वस्त्र - भोजन का प्रबन्ध कर दें तो कुष्ठ रोग के फैलने को रोका जा सकता है । भारत में आसाम, बिहार, युक्तप्रान्त, पञ्जाव, काठियावाड़, मध्यप्रान्त, राजपूताना आदि प्रान्तों में कुष्ठभवन बने हैं । उन्हीं में सर्व कुष्ठियों को भेज देने का प्रवन्ध राज्य तथा जनता की ओर से होना कानून न आवश्यक है । इत्यायुर्वेदतत्त्वसन्दीपिकाभाषायां कुष्टनिदानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

षष्ठोऽध्यायः ।

अथातः प्रमेहनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

ययोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब इसके अनन्तर प्रमेह - निदान का वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्शः - प्रकर्षेण मेहतीति वा प्रकर्षेण मेहनमिति प्रमेद्द् । प्रमेह को Anomlies of urinary seoretion कहते हैं । दिवास्वप्नाव्यायामालस्यप्रसक्तं शीतस्निग्धमधुरमे-द्यद्रवान्नपानसेविनं पुरुषं जानीयात् प्रमेही भविष्यतीति ॥ प्रमेह कारण - दिन में शयन करने वाले, व्यायाम न करने मेदो वाले तथा आलस्ययुक्त पुरुष को एवं शीतल, स्निग्ध, मधुर बटुक तथा अधिक पतले मन्त्र और पान का सेवन करने वाले मनुष्य को प्रमेह होगा ऐसा जान लेना चाहिये ॥ ३ ॥

विमर्शः -- पुरुषमिति कथनेन खीणां प्रमेहा न भवन्ति । तथा च तन्त्रान्तरे - ' रनः प्रसेकान्नारीणां मासि मासि विशुद्धयति । सर्व शरीरं दोषाञ्च न प्रमेहन्त्यत ' स्त्रिय ॥ ' इति एततु न युक्तन्, नर्वतन्त्राप्रसिद्धेः प्रत्यक्षविरोवाच्चेति ढल्हण । प्रमेहत्य चरकोत निदानं यथा - यश्च कश्चिदिभिरन्योऽपि म्ननैडोमूत्रसञ्चननः सर्वः स निद्रानविशेषः । बहुद्रवश्लेष्मा दोषविशेषः । बहुबद्धं मेदो मासं च शरीरखद ' शुक्र शोणित च वसा मला सख्यान इति दूष्यविशेष. । अन्यच्च आत्यासुख स्वप्नसुखं दधीनि ग्राम्यौदकानूपरसा पयांसि । नवान्नपान गुटबैकृनच प्रमेहेतुः । कच्च सर्वम् ॥ ( माघवः ) । तस्य चैवंप्रवृत्तस्यापरिपक्वा एव वातपित्तश्लेप्माणो

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श्रध्यायः ६ ] निदानस्थानम् । २५१ यदा मेदसा सहेकत्वमुपेत्य मूत्रत्राहिस्रोतांम्यनुसृत्यावो गत्वा बन्तेर्मुखमाश्रित्य निर्भिद्यन्ते तदा प्रमेहान् जनयन्ति ॥ ४ ॥

सम्प्राति — ऊपर में कहे हुये प्रमेहजनक आहार - विहार का सेवन करने वाले मनुष्य के अपरिपक ( आम ) चात, पित्त और कफ जब मेदोधानु के साथ संयुक्त होकर मूत्रवाहक स्रोतों ( वृद्ध, गविनियां और बस्ति ) का अनुसरण कर नीचे की तौर जा के बस्ति के मुख को घेर कर वहीं स्थिति कर देते हैं तब प्रमेहों को उत्पन्न करते हैं ॥ ४ ॥

निमर्श ' निम्धिन्ने – निःसरन्ति, अन्ये तु विनिर्भिद्यन्त इति पटिया व स्थिति कुर्वन्ति इनि व्याख्यानमन्ति । अपरे अनिद्रव त्वं यान्ति इत्याहु । ( नि ० मं ० ) न्यायचन्द्रिकाया - विनिर्मि-घन्टे प्रति वा कुर्वन्नीति यावत् । तेन स्थान-संत्र्य तेषां तु पूर्वरूपाणि - हस्तपादतलदाह: स्निग्धपि च्छिलगुरुना गात्रागां मधुरशुक्कसूत्रता तन्द्रा सादः पिपासा दुर्गन्धञ्च श्वासस्तालुगलजिहादन्तेषु मलोत्प तिर्जटिलीभावः केशानां वृद्धिश्च नखानाम् ॥ ५ ॥

पूर्वरूप- मेहों की पूर्वरूपावस्था में रोगी के हस्ततल तया पाइतल में दाह, नहों में चिकनाई, चिपचिपापन तथा भारीपन, मूत्र में मधुर तया न होना, एवं तन्द्रा, साद ( थकावट ), पिपासा, शरीर पर दौर्गन्ध्य, श्वास की अ तथा तालु, गला, जिला और दांतों में मल की उत्पत्ति, केशों का जटिलीभाव ( परस्पर गुथ जाना ) एवं नामूनों की वृद्धि आदि लग होते हैं ॥ ५ ॥

विमर्श - चन्द्रादीनामलक्ष्य प्रानूप पाणिवादयो । दा

विना देहे तृट् स्वाहास्य जानते ॥ ( माघवः ) ।

तत्रात्रिलप्रभूतमूत्रलक्षणाः सर्व एव प्रमेहाः ॥ ६ ॥

सामान्य लक्षण - कलुषित तथा अधिक सूत्र का निक • टना यह लक्षण सर्व प्रकार के प्रमेहों में होता है ॥ ६ ॥

विमर्श: - सामान्य लक्षन तेपा प्रभूनाविलसूचना ' ( वाग्भट ) ।

सर्व एव सर्वदोषसमुत्याः सह पिडकाभिः ॥ ७ ॥

प्रमेहपिडकाएँ तथा सर्व प्रकार के प्रमेह सर्व दोषों ( त्रिदोष ) से उत्पन्न होते हैं ॥ ७ ॥

विमर्श: - मेह बीस होते हैं तथा वात, पित्त और कफ ये तीन दोष हैं एवं मेदोधानु, रक्त, शुक्रादि दृष्य होते हैं । का सपिच पचनश्च दोषा मंटोनशुकाम्युवनालसीका । मज्जा रसीजः पिचिनन्न दूप्याः प्रमेहिणा विंशतिरेव मेहा ' ॥ ( माधवः ) । तत्र, कफाद्बुदकेक्षुवालिकासुरासिकताशनैर्लवणपि-टसान्द्रशुक्रफेनमेहा दश साव्याः, दोषदूष्याणां सम-क्रियत्वात् ॥ ८ ॥

उनमें कफ से उदकमेह, इक्षुमेह, सुरामेह, सिकतामेह, शनमेह, लवगमेह, पिष्टमेह, सान्द्रमेह, शुक्रमेह और फेनमेह ये दद्दा प्रमेह उत्पन्न होते हैं तथा इनमें दोष और दृष्यों की चिकित्सा समान होने से ये साध्य होते हैं ॥ ८ ॥

विमर्श: - सुश्रुत की तरह चरक तथा वाग्भट ने भी कफजन्य प्रमेह दश ही माने हैं किन्तु उन्होंने उनके कहीं - कहीं नाम बदल दिये हैं । जैसे चरक में सान्द्रप्रसादमेह, शुक्रमेह, शीतमेह और लालामेह एवं वाग्भट में लवणमेह और फेनमेह की जगह शीत मेह और लालामेद्द नाम दिये है । कफजमेह साध्य हैं क्योंकि दोष ( क्फ ) तथा दूप्य ( मेटो - मजा ) दोनों ही रुक्ष तथा उष्ण होते हैं और कटु तिक्त और कृपाय से शान्त होते है अतः चिकित्सा समान है तथा प्रमेहाँ से ढोप तथा दूयों का तुल्य होना सुखसाध्यना का लक्षण भी माना है - अरे तुरय-दोष व प्रमेहेतुना । रक्तगुर पुगाच मुनसाध्यस्य लक्ष-णन् ॥ चरक ने भी लिखा है कि ' ते दश प्रमेहा साधा | समा-नगुणमेड स्थानकवाद, कफस्य प्राधान्यात्, समक्रियत्वाच्च ' कफके श्वेत, शीत, मूर्त, पिच्छिल, अच्छ, स्निग्ध, गुरु, मधुर, सान्द्र, प्रसाद, मन्द ये गुण होते हैं तथा इन्हीं गुणों में से एक या अनेक गुण परस्पर तरतम भेद से मिलकर देश प्रमेहों को उत्पन्न करते हैं जैसे- नत्र होनाशीने गुन्ड कमेह, मधुरशीताभ्यामिक्षुमेह, सान्द्रपिच्छिलाभ्या सान्द्रमेह, अच्छेन पित्तानुरागिणा सुरामेहः, शुक्लेन पिष्टमेह, वेनस्निग्ाम्या शुक्रः सान्द्रसूर्नाम्यां सिर्फ • नामेह, गुरमधुरशीनं. शीनमेह, सान्द्रमूर्ताच्या शनैर्न, पिच्छि न लालाह । दशाधिककफज मे इशका निरसन -'ननु यथा देश-निर्गुनेश मेहान् करोति तथा मसर्गविकन्यान्तरेगान्यानपि कुनो न करोनीति नाशङ्कनीय, भावन्वभावत्यापर्यनुयोज्यत्वाद्, अदृष्ट • कल्पनायाश्चानर्हत्वाद । ( मधुकोपव्यारया ) । पित्तान्नीलहरिद्राऽम्लक्षारमजिटाशोणितमेहाः पड़ याप्याः, दोपदूष्याणां विषमक्रियत्वात् ॥ ६ ॥

पिचजप्रमेह - पित्त से नीलमेह, हरिद्रामेह, अम्लमेह, चार-मेह, मञ्जिष्टामेद तथा रक्तमेह ये छ प्रमेह उत्पन्न होते हैं । तथा दोष और दूष्यों की क्रिया ( चिकित्सा ) विषम ( परम्पर प्रतिकूल ) होने से याप्य माने गये है ॥ ९ ॥

विमर्श: -- दोषोऽत्र पित्त दूप्या मेद प्रभृतयस्तेपान्, विधमक्रिय-सात = पित्तमेद्रमो परस्पर विन्द्धक्रियत्वात, पित्तस्य यद् मधुरशी-तादि पथ्य, तन्मेदसोऽपथ्य, मेदसो यत्कटुकादि पथ्य, तत् पित्तस्या-पथ्यमिति भाव । चरके याध्यत्वस्य हेत्वन्तरमपि दर्शिनम् — सर्व एव ते याप्या समृष्टदोषमेद न्धानकत्वात ' इति । चरक और वाग्भट ने अम्लमेह के स्थान पर कालमेह ( Brown and black_urins or carboluria ) कहते हैं । मूत्र में कालापन के कई कारण हैं जैसे पुरानी कामला Indican uria,, Melanuria, Alkaptonuria, आदि मूत्ररोगों में मूत्र का रङ्ग काला हो जाता है । वातात्सर्पिर्वसाक्षौद्रहस्तिमेहाश्चत्वारोऽसाध्यतमाः, महात्यचिकत्वात् ॥ १० ॥

वातजप्रमेह - वातप्रकोप से सर्पिर्मह, वसामेह, चौद्रमेह तथा हस्तिमेह ये चार प्रमेह उत्पन्न होते हैं तथा ये धातुओं का अधिक विनाश करने से अत्यन्त असाध्य हैं ॥ १० ॥

विमर्शः — महात्य विकत्वात् = आप्यायनार्हप्रचुरतरमज्जप्रभृति-सारतरथा तुक्षयकत्वात् । ' विरुद्धोपक्रमत्याच्च ' इति, अत्रापि सम्बध्यते । तदुक्तं चरके - ' श्रमाश्चतुरः प्रमेहान् वातजानसाध्यानाचक्षते भिषज ', महात्यचिकत्वाद्विन्द्धोपक्रमत्वाच्चेति ' इति । तेनाथ यद्वायो ' खिग्धादि

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२५२ सुश्रुतसंहिता । पथ्य, तन्मेदसोऽपथ्यमित्यादिस्तदर्थो बोध्य । मधुर रस और स्निग्ध गुण दोनों वातशामक हैं परन्तु दोनों ही दूप्य मेद को बढाते हैं अत यहां भी विपम क्रिया होने से वातजप्रमेह असाध्य होते हैं । तत्र, वातपित्तमेदोभिरन्वितः श्लेष्मा श्लेष्मप्रमे-हाञ्जनयत्ति, वातकफशोणितमेदोभिरन्वितं पित्तं पित्त-प्रमेहान्, कफपित्तवसामज्जमेदोभिरन्वितो वायुर्वात प्रमेहान् ॥ ११ ॥

इनमें वायु, पित्त और मेद से युक्त कफ पूर्वोक्त उदक मेहादि दश कफप्रमेहों को पैदा करता है वात, कफ ये दोष तथा रक और मेदो धातु पूर्वोक्त इन दूष्यों के साथ मिलकर पित्त पूर्वोक्त नीलमेहादि छ प्रकार के प्रमेहों को उत्पन्न करता है । इसी प्रकार कफ, पित्त इन दोषों तथा वसा, मज्जा और मेद इन टूप्पों से युक्त वायु पूर्वोक्त चार वातप्रमेहों को उत्पन्न । करता है ॥ ११ ॥ P

तन्त्र, श्वेतमवेदनमुद्कसदृशमुदकमेही मेहति । इक्षुरसतुल्यमिक्षुबालिकामेही । सुरामेही सुरातुल्यम् । सरुजं सिकताऽनुविद्धं सिकतामेही । शनैः सकफं मृत्स्नं शनैर्मेही । विशदं लवणतुल्यं लवणमेही । हृष्टरोमा पिष्टरसतुल्यं पिष्टमेही । आविलं सान्द्रं सान्द्रमेही । शु॒क्रतुल्यं शुक्रमेही । स्तोकं स्तोकं सफेनं फेनमेही मेहति ॥ १२ ॥

कफजप्रमेहलक्षण – उदकमेह वाला व्यक्ति श्वेत, वेदना-रहित तथा जल के समान मूत्र का त्याग करता है । इक्षुमेह बाला व्यक्ति ऊख के रस के समान मूत्र त्यागता है । सुरामेह वाला व्यक्ति सुरा के समान ( लाल - पीला जलन युक्त ) मूत्र त्यागता है । सिकतामेह वाला व्यक्ति पीड़ा के सहित तथा कफ से बनी छोटी छोटी बालुका ( रेत ) के कर्णों से युक्त मूत्र त्यागता है । शनैर्मेह वाला व्यक्ति धीरे धीरे तथा कफ-मिश्रित व चिकना मूत्र त्यागता है । लवणमेहग्रस्त व्यक्ति स्वच्छ तथा नमक के ( घोल के ) समान मूत्र त्यागता है । पिष्टमेहग्रस्त व्यक्ति रोमानयुक्त हो के पिष्टरस ( जल में घोले हुए आटे ) के समान मूत्र त्यागता है । सान्द्रमेहग्रस्त व्यक्ति कलुपित ( गन्दला ) तथा गाढा मूत्र त्यागता है । शुक्रमेहग्रस्त व्यक्ति शुक्र के समान मूत्र त्यागता है । फेनमेह से ग्रस्त व्यक्ति थोदा थोड़ा तथा फेन ( लाग ) युक्त मूत्र स्यागना है ॥ १२ ॥

विमर्शः - उदकमेहलक्षणम् -अच्छ बहु सित शीत निर्गन्धमुद कोपमन् । मेद्दत्युदकमेहेन किचिदाविलपिच्छिलम् ॥ इसे बहु मूत्रमेह ( Polyuria ) कह सकते हैं । इस के दो भेद हैं । 1 ) स्थायी उदकमेह वृक्कशोथ एवं धमनीदा से होता तथा पिटईटरी ( Patuntary ) ग्रन्थि की खराबी से होता है हमे ढायबेटिज इन्सोपीडस ( Diabetes Insipidus ) कहने हैं । ( २ ) अस्थायी उदकमेह चाय, कोको तथा दूद्वपदार्थों के अधिक सेवन एवं भय तथा मानसिक उत्तेजना से होता है । इनुमेहलक्षणम् --- इक्षो रसमिवात्यर्थं मधुर चक्षु मेहतः । इस में मूत्र में शर्करा आती है अतः इसे ग्लायको-सूरिया ( Glycosuria ) कहते हैं । वृक्क की शर्कराबन्धन मर्यादा के अल्प होने से होनेवाले इनुमेह को ( Renal glycosuris ) कहते हैं । ( ३ ) सुरामेह -- फास्फेट यूरिया हो सकता है । गन्ध की दृष्टि से ( Acetonnria ) हो सकता है । सिकतामेह को ( Passing of gravel ) कह सकते हैं । ' मूर्त्ताणून सिकतामेही सिकतारूपिणो मलान् ' पथरी के टूटने पर उसके छोटे २ कण मूत्र में आते हैं । शनैर्मेह — मन्देन मूत्रेण शनै प्रमेह. । पिष्टमेह —— के लक्षण वाला मूत्र अल्यूमिन, पूय, अथवा काईल मूत्र में आने से होता है । श्लीपद के कारण मूत्र में काईल आता है इसे कायल्यूरिया ( Chylars ) कहते हैं । सान्द्रमेह - ' यस्य पर्युपित मूत्र सान्द्रीभवति भाजने ' ( चरकः ) । मूत्र में फायब्रिन या पीव के आने से ऐसा होता है । शुक्रमेह - शुक्रसदृश मूत्र का रंग हो तो अल्ब्यू. मिन्यूरिया ( Albuminuria ) तथा शुकमिश्र मूत्र आता हो तो स्पर्मेटरिया ( Spermaturia ) कहना चाहिये । वृकरोग, पाण्डुरोग, यकृद्दाल्युदर, सगर्भावस्था आदि के कारण मूत्र # अन्यूमिन आता है । फेनमेह को न्यूमाथ्यूरिया ( Pneuma • turia ) कह सकते हैं । अत ऊर्ध्वं पित्तनिमित्तान् वक्ष्यामः - सफेनमच्छं नीलं नीलमेही मेहति । सदाहं हरिद्राऽऽभं हरिद्रामेही । असुरसगन्धमनुमेही । स्रुतक्षारप्रतिमं क्षारमेही । मञ्जि-ठोदकप्रकाशं मञ्जिष्ठामेही । शोणितप्रकाशं शोणितमेही मेहति ॥ १३ ॥

पित्तप्रमेहलक्षण -- अब इस के अनन्तर पित्त के कारण होने वाले प्रमेहों को कहते हैं । नीलमेहग्रस्त व्यक्ति फेनयुक्त, निर्मल तथा नीले रंग का मूत्र त्यागता है । हरिद्रा मेहग्रस्त व्यक्ति जलन के सहित हल्दी के रंग का सा मूत्र त्यागता है । अम्लमेहग्रस्त व्यक्ति अम्लरस एवं अम्लगन्धयुक्त मूत्र त्यागता है । चारमेहग्रस्त व्यक्ति स्रुतक्षार या छारोदक के समान मूत्र व्यागता है । मञ्जिष्ठामेहग्रस्त व्यक्ति मजीठ के क्वाथ के समान वर्ण का मूत्र त्यागता है तथा शोणितमेही शोणित ( रक्त ) के समान मूत्र त्यागता है ॥ १३ ॥

विमर्श: - नीलमेह को इण्डिकन्यूरिया ( Indican uria ) कहते हैं क्यों कि इस में रोगी के मूत्र में अन्न्रगत अल्ब्यूमिन की सड़ान से उत्पन्न इण्डिकन आता रहता है । में पित्त मञ्जिष्ठामेह को कोल्यूरिया ( Cholaria ) कहते हैं । मूत्र का विलीरुबिन ( Bilirubin ) रंग आने से मञ्जिष्ठो -दक समान पीत मूत्र हो जाता है । कामला में ऐसा प्रमेह होता है । मूत्र में युरोविलीन की राशि अधिक होने से भी पीत वर्ण हो जाता है और उसे यूरोविलीन्यूरिया ( Uroa bulanaria ) कहते हैं । अम्लमेह मूत्र में यूरिकाम्ल तथा यूरे ट्स अधिक आने से होता है तथा इसे लिथ्यूरिया ( Lathura ) कहते हैं । चारमेह को ( Alkalinuria ) कहते हैं । इस का कारण मूत्रवेग का रोकना, प्रोस्टेट वृद्धि, मूत्रमार्ग -सङ्कोच, फास्फेट की अधिकता तथा जीर्ण वस्तिशोय है । ' गन्धवर्णरस-स्पर्श क्षारेण क्षारतीयवत् ' हारिद्रमेह को हीमोग्लोविन्पूरिया | ( Haemoglobinnrs ) कहते हैं तथा रक्तमेह को हीमारथूरिया

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श्रध्यायः ६ ] निदानस्थानम् । २५३ ( Haematuris ) कहते हैं । वृक्कार्बुद वृक्काश्मरी, मलेरिया, ही मोकायलिया, पर्च्यूरा, स्कर्वी आदि में ऐसा होता है । अत ऊर्ध्व वातनिमित्तान् वक्ष्यामः सर्पिः प्रकाशं सर्पिर्मेही मेहति । वसाप्रकाशं वसामेही । क्षौद्ररसवर्ण ' क्षौद्रमेही । मत्तमातङ्गचदनुप्रबन्धं हस्तिमेही मेहति ॥ १४ ॥

अब इस के अनन्तर बात के कारण उत्पन्न होने वाले प्रमे ' हो का वर्णन करते हैं । सर्पिर्मेही घृत के समान मूत्र त्यागता ' है । वसामेही वसा ( फेट ) के सदृश मूत्र त्यागता है । चौद्र-मेही शहद के समान रस और रंग का मूत्र स्यागता है । हस्ति-मेही मतवाले हस्ती की तरह निरन्तर मूत्र व्यागता है ॥ १४ ॥

विमर्श: - सर्पिर्मंह तथा वसामेह को Pyuria अथवा Lipuria कह सकते हैं । क्षौद्रमेह को मधुमेह या डायबेटिज मेलिटस ( Diabetes Mellitus ) कहते हैं । मूत्र में मधु या Glucose की उपस्थिति ही मधुमेह है । शालिपिष्टमय पदार्थ शरीर में जाकर पाचन द्वारा ( Glucose ) में बदल जाते हैं । रक्त में जब शर्करा की राशि अधिक हो जाती है तब यह रोग होता है तथा प्रधानतया अग्न्याशय के लेंगरईसद्वीप में बनने वाले इन्स्यूलीन के न बनने से यह रोग होता है । इन्स्यूलीन पेशियों को शर्करा का खर्च करने तथा यकृत् को उस का सञ्चय करने में मदद देता है किन्तु इस के न बनने से रक्तस्य शर्करा का स्वाभाविक प्रमाण अधिक होकर मूत्र द्वारा बाहर निकलने लगती है । हस्तिमेह को फाल्स इन्कण्टि-स ऑफ यूरिन कह सकते हैं । हस्तो मत्त इवाजन मूत्र वेग-विवर्जितम् । सलसोक विदद्धश्च हस्तिमेही प्रमेहति ॥ ( वाग्भटः ) । इसका कारण सुषुम्नास्थित मूत्रकेन्द्रघात, वस्तिघात, अश्मरी, प्रोस्टेट ग्रन्थिवृद्धि आदि है । मनिकोपसर्पणमालस्यं मांसोपचयः प्रतिश्यायः शैथिल्यारोचकाविपाकाः कफप्रसेकच्छर्दिनिद्राकासश्वा-साचेति श्लेष्मजानामुपद्रवाः, वृषणयोरवदरणं बस्तिभेदो मेढ्रतोदो हृदि शूलमनीकाज्वरातीसारारोचका वमथुः परिघूमायनं दाहो मूर्च्छा पिपासा निद्रानाशः पाण्डु-रोगः पीतविण्मूत्रनेत्रत्वं चेति पैत्तिकानाम् । हृद्ग्रहो लौल्यमनिद्रा स्तम्भः कम्पः शूलं बद्धपुरीषत्वं चेति वातजानाम् । एवमेते विंशतिः प्रमेहाः सोपद्रवा-व्याख्याताः ॥ १५ ॥

प्रमेहोपद्रव -मक्षिकाओं का प्रमेही पर तथा उस मूत्र पर बैठना, आलस्य, स्थूलता, प्रतिश्याय, भङ्गशैथिल्य, अरुचि, अपचन, कफस्राव, वमन, निद्वाधिक्य, कास, श्वास ये श्लेष्मज प्रमेहों के उपद्रव हैं । दोनों कृपणों ( अण्डकोषों ) का फटना, बस्ति का फटना, लिड्न में सूई चुभोने की सी पीड़ा, हच्छूल, अम्लिका ( खट्टी डकारें आना ), ज्वर, अति सार, अरोचक, वमन, डकार में धूआं आना, दाह, मूर्च्छा, प्यास, निद्रानाश, पाण्डु रोग, एवं मल, मूत्र तथा आंखों इन में पीलापन होना आदि पित्तजन्य प्रमेहों के उपद्रव हैं । हृदय की जकड़ाहट, हरएक रस चखने की लालसा, भनिद्रा, शरीर का स्तम्भ ( अकड़ जाना ): - शरीर में कम्पन, शूल, गाढा दस्त आना ये वातजन्य प्रमेहों के उपद्रव हैं । इस तरह इन बीस प्रकार के प्रमेहों तथा इन के उपद्रवों का वर्णन कर दिया गया है ॥ १५ ॥

विमर्शः -- मक्षिक्रोपसर्पणमनेन शरारे मूत्रे च मक्षिकाभिस-रणं वोद्धव्य तदुक्त चरके - ' पट्पदपिपीलिकाभिश्च शरीरमूत्राभिस-रणम् । सोपद्रवा. —चरको कोपद्रवा यथा — उपद्रवास्तु खलु प्रमे-हिणा तृष्णाऽतीसः रज्वरदाहदौर्बल्यारोचका विपाका. पूतिमासपिटकाऽ-लजीविद्रध्यादयश्च तत्प्रसङ्गाद्भवन्ति । तत्र, वसामेदोभ्यामभिपन्नशरीरस्य त्रिभिर्दोषैश्चा-नुगतधातोः प्रमेहिणो दश पिडका जायन्ते । तद्यथा-शराविका, सर्षपिका, कच्छपिका, जालिनी, ' विनता, पुत्रिणी, मसूरिका, अलजी, विदारिका, विद्रधिका चेति ॥ प्रमेहपिडका वर्णन- --वसा तथा मेदोधातु से व्याप्त शरीर वाले एवं प्रकुपित वातादि तीनों दोर्षो से आक्रान्त धातुवाले प्रमेही के शरीर में दश पिढकाएं उत्पन्न होती हैं । उन के नाम - शराविका, सर्पपिका, कच्छपिका, जालिनी, विनता, पुत्रिणी, मसूरिका, अलजी, विदारिका तथा विद्वधि ॥ १६ ॥

विमर्श: - प्रमेहपिढकाओं को कार्बहिल ( Carbuncle ) कहते हैं । इनका मुख्य कारण मधुमेह, इचुमेह तथा वसामेह है । उपेक्षयाऽस्य जायन्ते पिढका सप्त दारुणा । मासलेब्ववकाशेषु मर्मस्वपि च सन्धिषु ॥ विना प्रमेहमप्येता जायन्ते दुष्टमेदसः ॥ ( चरकः ) । चरक ने इनके सात भेद माने हैं । कई छोटी छोटी फुन्सियां आपस में मिलकर एक चालनी के समान छेदों वाला व्रण वन जाता है । तथा उससे पूय निकलता है और उसमें स्टेफिलोकोकस पायोजीनस आरस जीवाणु होते हैं । इसके स्थान ग्रीवा के पीछे, पीठ, स्कन्ध, ओष्ठ, चेहरा और नितम्ब होते हैं ।

शरावमात्रा तद्रूपा निम्नमध्या शराविका ।

गौरसर्पपसंस्थाना तत्प्रमाणा च सार्षपी ॥।

सदाहा कूर्मसंस्थाना ज्ञेया कच्छपिका बुधैः जालिनी तीव्रदाहा तु मांसजालसमावृता ॥ महती पिडका नीला पिडका विनता स्मृता । महत्यल्पाचिता ज्ञेया पिडका सा तु पुत्रिणी

मसूरसमसंस्थाना ज्ञेया सा तु मसूरिका ।

१७ ॥

।

१८ ॥

॥ १६ ॥

रक्ता सिता स्फोटवती दारुणा त्वलजी भवेत् ॥ २० ॥

विदारीकन्दवद् वृत्ता कठिना च विदारिका ।

विद्रघेर्लक्षणैर्युक्ता ज्ञेया विद्रधिका वुधैः ॥ २१ ॥

पिडका लक्षण - शराव ( सकोरा या तश्तरी ) के समान तथा वैसी आकार वाली एवं मध्यभाग में दबी हुई शराविका होती है । श्वेत सरसों की आकृति और प्रमाण वाली सर्पपिका, दाहयुक्त एवं कच्छपपृष्ठ स्वरूप की कच्छपिका, मांसजाल से बिरी हुई तथा तीव्र दाहयुक्त जालिनी, नीले वर्ण की तथा आकार में बड़ी विनता, आकार में बढी किन्तु छोटी छोटी फुन्सियों से युक्त पिडका पुत्रिणी, मसूर के समान आकृति वाली मसूरिका एवं लाल, काली, फुन्सियों से व्याप्त तथा दारुण दुःखदायिनी अलजी और विदारीकन्द की तरह गोल तथा कठिन विदारिका एवं विद्रधि के लक्षणों वाली विद्वानों द्वारा विद्वधिका कही जाती है ॥ १७–२१ ॥

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२५४ सुश्रुतसंहिता । विमर्शः- कच्छपिकालक्षगम् — अवगाढा तिंनिस्तोदा महावास्तु- सामान्य लक्षण से प्रमेह का होना ज्ञात होता है इसी तरह परिग्रहा । श्लक्ष्णा कच्छपपृष्ठाभा पिडका कच्छपी मता ॥ जालिनी लक्षणम् - स्तब्धा सिराजालवती स्निग्धस्रावा महाशया । रुजा निस्तोद • बहुला सूक्ष्मच्छिद्रा च जालिनी || ( चरकः ) । अन्यत्रापि - परस्पराभि-सम्बन्धात् पिढका चैकदेशना । पित्तोत्कटा दाहवती भृशरुग्जा लिनी | मता ॥ सर्पपिकालक्षणम् - सर्पची सर्पपाभाभिः पिडकाभिश्चिता भवेत् । अलनोलक्षणम् - दहति त्वचमुत्थाने तृष्णा मोहज्वरप्रदा ।

विसर्पत्यनिश दु साद्दहत्यग्निरिवालनी ॥ ( चरकः ) ।

ये यन्मयाः स्मृता मेहास्ते पामेतास्तु तत्कृताः ॥ २२ ॥

जिन दोषों से जो प्रमेह उत्पन्न हुये हीं उन्हीं दोपों से इन प्रमेहपिढकाओं को पैदा हुई जाननी चाहिये ॥ २२ ॥

विमर्श: - चरक ने सात के अतिरिक्त भी पिडकाएं मानी है । तथा उनकी भी दोपानुसार चिकित्सा कही है - तथान्या पिड-का. सन्ति रक्तपीतासितारुणा । पाण्डुरा. पाण्डुवर्णाश्च भस्मामा मेच-कप्रमा • ॥ मृद्दयश्च कठिनाश्चान्या स्थूला. सूक्ष्मास्तथाऽपरा । मन्द-वेगा महावेगा. स्वल्पमूला महारुज ॥ ता बुद्ध्या मारुतादीना यथास्वै-हेतुलक्षणेः । ब्रूयादुपचरेच शु प्रागुपद्रवदर्शनात् ॥

गुदे हृदि शिरस्यंसे पृष्ठे मर्मणि चोत्थिताः ।

सोपद्रवा दुर्बलाग्नेः पिडकाः परिवर्धयेत् ॥ २३ ॥

असाध्य पिडकाएं — कृश मनुष्य के गुदा, हृदय, शिर, स्कन्ध, पीठ तथा मर्मस्थान में उत्पन्न एव उपद्रवों से युक्त पिकाओं की चिकित्सा न करें ॥ २३ ॥

विमर्शः --- वर कोक्त पिडको पद्रवा नृट्कासमाससङ्कोच मोहहि कामदन्वरा । विसर्पमर्मसरोधा. पिटकानामुपद्रवा ॥

कृत्स्नं शरीरं निष्पीड्य मेदोमज्जवसायु॑तः ।

अधः प्रक्रमते वायुस्तेनासाध्यास्तु वातजाः ॥ २४ ॥

असाध्यवातजप्रमेह -- वायु सारे शरीर को निचोड कर मेद, मज्जा और वसा के साथ नीचे वस्ति प्रदेश की तरफ जा कर प्रमेह उत्पन्न करती तथा मूत्र के साथ इन धातुओं को उत्सर्गित करता है अतएव वातज प्रमेह असाध्य होते हैं ॥ २४ ॥

विमर्श: -- अष्टाङ्ग संग्रहकार ने भी इन्हें इसी तरह असाध्य माना है- ' वायुर्वसादीन् धातून् शरीरस्य परमसारभूतान् वस्ति-माय मूत्रेण सह विसृजति, तस्माद्वातजा असाध्याः । क्षीणेपु धातुपु महात्मतया विरद्धोपक्रमत्वाच्च ' । जातप्रमेही मधुमेहिनो वा न साध्य • रोग स हि वीजदोषात् । ये चापि केचित्कफजा विकारा भवन्ति ताश्चापि वदन्त्यसाध्यान् ॥ ( भावप्र ० ) ।

प्रमेहपूर्वरूपाणामाकृतिर्यत्र दृश्यते ।

किञ्चिच्चाप्यधिक मूत्रं तं प्रमेहिणमादिशेत् ॥ २५ ॥

कृत्स्नान्यर्द्धानि वा यस्मिन् पूर्वरूपाणि मानवे ।

प्रवृद्धमूत्रमत्यर्थं तं प्रमेहिणमादिशेत् ॥ २६ ॥

जिस मनुष्य में प्रमेह के पूर्वरूप के लक्षण दिखाई देने गे तथा मूत्र की राशि भी कुछ अधिक हो जाय उसे प्रमेही समझना चाहिये । जिस मनुष्य में प्रमेह के पूर्वरूप के पूरे या आधे लक्षण दिखाई देने लगें तथा मूत्र की मात्रा भी अत्यधिक जाय उसे प्रमेही समझना चाहिये ॥ २५-२६ ॥ प्रमेह के पूर्वरूप - लक्षणों ( हस्तपाद - दाहादि ) के विना केवल मूत्र का हारिद्र वर्ण मात्र होने से प्रमेह नहीं समझना चाहिये । हारिद्रवर्णं रुधिरच मूत्र विना प्रमेहस्य हि पूर्वरूप. । यो मूत्रयेत न वदेत्प्रमेह रक्तस्य पित्तस्य हि स प्रकोप । ( च ० प्रमेहचि ० ) ।

पिडकापीडितं गाढमुपसृष्टमुपद्रवैः ।

मधुमेहिनमाचष्टे स चासाध्यः प्रकीर्त्तितः ॥ २७ ॥

असाध्य मधुमेह लक्षण - प्रमेहपिडकाओं से अत्यधिक पीडित तथा पूर्वोक्त उपद्रवों से युक्त प्रमेही को मधुमेहग्रस्त कहा जाता है तथा वह असाध्य होता है ॥ २७ ॥

स चापि गमनात् स्थानं स्थानादासनमिच्छति ।

आसनाद् वृणुते शय्यां शयनात् स्वप्नमिच्छति ॥ २८ ॥

मधुमेही चलने से खडे रहना, खड़े रहने से बैठना और बैठने से लेटना तथा लेटने से निद्रा लेना अधिक अच्छा मानता है ॥ यथा हि वर्णानां पञ्चानामुत्कर्षापकर्षकृतेन संयो-गविशेपेण शबलव कपिलकपोतमेचकादीनां वर्णाना-मनेकेपामुत्पत्तिर्भवति, एवमेव दोषधातुमलाहारविशे-पेणोत्कर्षापकर्षकृतेन संयोगविशेषेण प्रमेहाणां नाना-करणं भवति ॥ २६ ॥

जिस तरह श्वेत, हरा, काला, पीला और लाल इन पांच रंगों को हीनाधिक मात्रा में मिला कर किये गये संयोग विशेष से शवल ( कर्बुर = चितकबरा ), वभ्रु ( पिङ्गलवर्ण ), कपिल, कपोत ( कबूतर सा ) और मेचक ( श्याम ) वर्णों ( रंग = Colours ) की उत्पत्ति होती है वातादि दोप, रक्तादिधातु, विण्मूत्रस्वेदादिमल यादि आहार इनके हीनाधिक संयोग विशेष से । अनेक भेद उत्पन्न होते हैं ॥ २ ९ ॥ भवति चात्र-सर्व एव प्रमेहास्तु कालेनाप्रतिकारिणः । आदि अनेक उसी प्रकार तथा खाद्यपे-प्रमेहों के भी मधुमेहत्वमायान्ति तदाऽसाध्या भवन्ति हि ॥ ३० ॥

इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने प्रमेहनिदानं नाम पष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

coxers सर्व प्रकार के प्रमेहों की प्रारम्भावस्था में चिकित्सा न करने से वे मधुमेह का रूप धारण कर लेते हैं तथा इस अवस्था में असाध्य हो जाते हैं ॥ ३० ॥

विमर्श: - प्रमेह मधुमेह में कैसे परिवर्तित होते हैं यह चरक में बताया है - तेरावृतगतियुरोज आदाय गच्छति । यदा वस्ति तदा कृच्छ्रो मधुमेहः प्रवर्तते । वाग्भट ने मधुमेह का स्वरूप तथा सर्व प्रमेहों को मधुमेह से ही माना है - मधुर यच मेहेषु प्रायो मस्त्रिव मेहति । सर्वेऽपि मधुमेहाख्या माधुर्याच्च तनो-रतः । किन्तु ढाक्टरीमत से सर्व प्रमेह भिन्न भिन्न कारणादि से होने से मधुमेह में परिवर्तित नहीं हो सकते । इत्यायुर्वेदतच्चसन्दीपिकाभापायां प्रमेहनिदान विमर्श -- पूर्व में दन्तादीना मलाढ्यत्वम् एव पाणि - पाददाह नाम पष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

ये प्रमेह के पूर्वरूप के लक्षण एवं प्रभृताविलमुत्रता इस

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श्रध्यायः ७ ] निदानस्थानम् । २५५

सप्तमोऽध्यायः ।

अयात उदरागां निदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब इसके अनन्तर उदर रोगों के निदान का वर्णन करते है जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ विमर्श - उदर ( Abdomine ) शब्द से रोग के स्थान का तथा रोग के खास लक्षण उत्मेघ का ज्ञान होता है यह उदर शब्द की विशेषता है । जैसा कि कहा है - थ्यतद्धर्मना-म्याच तत्समीपतनाऽपि च । तत्साहचर्याच्च शब्दानां वृत्तिरेषा चतुर्विधा ॥ उदगेत्सेधकारण- नं ० १ मेदोवृद्धि - मेद का सचय होने से टदर फूलता है । अन्य स्थानों में भी मेदोवृद्धि के लक्षण होते हैं— ' चस्तिगुरम्ननः ' । नं ० २ वात - के आंतो में समय होने से भी उदरोत्सेध होता है । पेट पर अलुटिनाइन करने से ढोल सदृश निनाद ( प्रतिध्वनि सुनाई देता है । ' आहनानान्दृतिशब्दवद् ' । नं ० ३ नल - उदरावरण की गुहा में जल के सन्चित होने से भी उदरोध होता है । नं ० ४ मल - के समय से जीर्णविबन्ध होने पर उदरो रसेघ होता है । साथ में सिर दर्द, मन्दाग्नि, आध्मान आदि त्रण होते हैं । नं ० ५ यकृत, प्लीहा, वस्ति, गर्भाशय इनके बढ़ने से या इनमें अर्बुद आदि होने से भी उदरोल्पेध होता है । नं ० ६ दुष्ट घातकव्रण या केन्सर ( Cancer ) - उदर के आवरण में इस व्रण के होने से पर भी उदरोत्सेध होता है । उदररोगों के निदान में इतनी अवस्थाओं का आवश्यक है । धन्वन्तरिर्घर्मभृतां वरिष्टो राजर्षिरिन्द्रप्रतिमोऽभवद्यः । ब्रह्मर्पिपुत्रं विनयोपपन्नं शिष्यं शुभं सुश्रुतमन्त्रशात् सः धर्मं जानने वालों में श्रेष्ठ एवं ज्ञानैश्वर्यादि राजा तथा आयुर्वेद के ज्ञान में इन्द्र के समान विचार करना ॥ ३ ॥

में ऋषियों के ऐसे धन्वन्तरि भगवान् का अवतार हुआ था तथा इन धन्वन्तरि ने विनयो पपन्न तथा शिष्यरूप से उपस्थित ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत को टदरादि रोगों के विषय में उपदेश दिया ॥ ३ ॥

पृथक्समस्तैरपि चेह दोषैः प्लीहोदरं बद्धगुदं तथैव । आगन्तुकं सप्तममष्टमन्न कोदरचेति वदन्ति तानि ॥ ४ ॥ -उदररोग भेद - वातोदर, पितोदर तथा कफोदर ऐसे

पृथक् पृथक् दोषों से तीन तथा तीनों दोषों से मिलित चौथा सन्निपातोदर, पांचवां प्लीहोदर, छठां बद्धगुदोदर, सातंवां आगन्तुक चतोदर एवं आठवां दकोदर ( जलोदर ) ऐसे आठ उदररोग कहे जाते हैं ॥ ४ ॥

विमर्शः पृथग्ोषै मनन्तैश्च प्लीहबद्धक्षतोडकै । सम्भवन्त्युद-राष्टौ । ( माधवः ) । प्लीहोदर में ही यकहाल्युटर का समा-देश है । वामभाग में प्लीहोदर तथा दक्षिण भाग में यकृद्दा-ल्युदर होता है । सत्र्यान्यपार्श्वे यकृति प्रवृद्ध ज्ञेयं यकृद्दाल्युदरं | नदेव ॥ ( माधवः ) । सुदुर्बलाग्नेरहिताशनस्य संशुष्कपूत्यन्ननिपेवणाद्वा । स्नेहादिमिध्याचरणाच्च जन्तो-वृद्धिं गताः कोष्टमभिप्रपन्नाः । गुल्माकृतिव्यञ्जितलक्षणानि कुर्वन्ति घोराण्युदराणि दोषाः ॥ ५ ॥

उदररोग कारण - दुर्बल पाचकाग्नि मनुष्य के मिथ्या आहार करने से तथा सूखे और सड़े - गले वासी ( अम्ल के सेवन करने से स्नेहन, स्वेदन तथा वमनादि पञ्चकमों के मिथ्या-रूप से प्रयोग करने से प्रकुपित वातादि दोष कोष्ट ( उदर ) में जाकर गुल्म ( गोले ) के समान आकृति के तथा स्पष्ट लक्षणयुक्त भयङ्कर उदर रोगों को पैदा करते हैं ॥ ५ ॥

विमर्गः - प्रायः उदर तथा सर्व रोगों का कारण अनीर्ण और मलिन अन्न सेवन है - रोगा सर्वेऽपि नायन्ते सुतरामुद-राणि च । अजीर्णोन्नलिनैश्चान्नैर्जायन्ते मलसञ्चयात् ॥ चरकोक | उदररोगहेतुः - अतित चितदोषाणा पापं कर्म च कुर्वतान् । उदराण्यु-पनायन्ते मन्दाग्नीना विशेषत ॥ कोष्टादुपस्नेहवदन्नसारो निःसृत्य दुष्टोऽनिलवेगनुन्नः । त्वचः समुन्नम्य शनैः समन्ताद् विवर्द्धमानो जठरं करोति ॥ ६ ॥

उदररोग सम्प्राप्ति — दूषित हुआ अन्न का सारभूत रस-भाग वायु के वेग से प्रेरित होके आहार के पाक के प्रधानाधारभूत कोष्ठ ( ग्रहणी = Deodinum ) से जैसे नूतन मृत्तिकावट के सूक्ष्म छिद्रों से स्नेह भाग बाहर स्रवित होता हुआ दिखाई देता है उसी तरह बाहर ( उदरगुहा में ) निकल कर उदर की त्वचा को चारों ओर से उन्नत करके धीरे धीरे बढता हुआ उदर रोगों को उत्पन्न करता है ॥ ६ ॥

विमर्शः --- दूधा स्वेदाम्बुवाहीनि दोषा स्रोतासि सञ्चिताः । प्राणाग्न्यपानान् सन्दूष्य जनयन्त्युदरं नृणाम् । ( माधवः ) । स्रोतसां दूषणादामात् संक्षोमादतिपूरणात् । वाह्या ' सिराः प्राप्य तदा कफा -सृपितानि संदूषयतोह - वायुः ॥ तैर्वद्धमार्ग स यदा विसर्पन्नुत्सेध-किं श्वयथुं करोति । ( चरकः ) । नीरोगावस्था में अन्न रस जो कि रक्त के साथ मिला हुआ होता है स्रोतसों ( केशिकाओं ) की पतली दीवारों से चू चू कर शरीराह्नों का पोषण करके पुनः लसीकावाहिनियों द्वारा रक्त में मिल जाता है । रोगा-वस्था में उन स्रोतसों की दीवारों की स्रवणक्षमता अधिक हो जाती है जिससे रक्त से रस का अधिक स्रवण होकर उन स्थानों में उत्सेध या शोथ उत्पन्न होता है । इस तरह लसी-कावाहिनियों से लसीका ( Lymph ) अथवा रक्तवाहिनियों से रक्तरस ( Plasms ) जिन जिन अवकाश युक्त स्थानों में इकट्ठा होता है. उनके नाम भिन्न भिन्न रख दिये है जैसे

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२५६ सुश्रुतसहिता । उदर में जलोदर ( Aartis ), छाती में जलोरस ( Hydrothorax ), फुफ्फुसावरण में उरस्तोय ( प्लूरिसी Pleurisy ), मस्तिष्क गुहाओं में जलमस्तिष्क ( Hydrocephlus ), वृपण में जलवृपण ( Hydrocele ), हृदयावरण में ( Cardium ) आदि नाम रखे गये हैं । तत्पूर्वरूपं वलवर्णकाङ्क्षा-वलीविनाशो जठरे हि राज्यः । जीर्णापरिज्ञानविदाहवत्यो बस्तौ रुजः पादगतश्च शोफः ॥ उदररोग पूर्वरूप- उदर रोगों की पूर्वावस्था Hydroperi ७ ॥ में वल, वर्ण भोजनादि आकांक्षा और उदर त्वचा की साधारण वलियों ( सलवटों ) का नाश, पेट पर नीली रेखाएं निकल भाना, भोजन के पचने या न पचने का ज्ञान नहीं होना, गले में दाह, वस्ति ( मूत्राशय ) में पीढा तथा पावों में सूजन आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं ॥ ७ ॥

विमर्शः - झीयते वलत. शश्वच्छ्वसित्यल्पेऽपि चेष्टिते । ( अ ० सं ० ) । ' नीर्गाजीर्णं न वेत्ति च ' ( चरकः ) । जठराग्नि से यहां । Enlarged Superficial veins का ग्रहण करना चाहिये । सङ्गृह्य पार्श्वोदरपृष्ठनाभी र्यवर्द्धते कृष्णसिरावनद्धम् । सशूलमानाहवदुग्रशब्दं सतोदभेदं पवनात्मकं तत् ॥ ८ ॥

वातोदर — में पार्श्व, उदर, पीठ तथा नाभि का आश्रय लेकर काली सिराओं के उभारसहित तथा शूल, आनाह, उग्र शब्द एवं सूई चुभोने की सी पीड़ा तथा भेदने की सी पीडासहित उदर की वृद्धि होती है । इन लक्षणों के हानि से उसे वातोदर कहते है ॥ ८ ॥

यच्चोपतृष्णान्वरदाहयुक्तं पीतं सिरा भान्ति च यत्र पीताः । पीताक्षिविण्मूत्रनखाननस् पित्तोदरं तत्त्वचिराभिवृद्धिः ॥ ६ ॥

पित्तोदर में चोप, तृष्णा, ज्वर, दाह से युक्त तथा पीला उदर हो जाता है एवं जिस पर पीली सिराओं का ' भान होता हो तथा जिसके नेत्र, विष्ठा, मूत्र, नख और मुख पीले रन के प्रतीत होते हों तथा जल्दी ही जिसका आविर्भाव हुआ हो उसे पित्तोदर कहते हैं ॥ ९ ॥

यच्छीतलं शुक्लसिराऽवनद्धं गुरु स्थिरं शुक्लन खाननस्य । स्निग्धं महच्छोफ्युतं ससादं कफोदरं तत्तु चिराभिवृद्धि ॥ १० ॥

कफोदर में उदर स्पर्श में ठंडा, श्वेत सिराओं से व्याप्त, भारी तथा स्थिर ( कड़ा ) होता है तथा उन मनुष्यों के नस और सुख भी श्वेत हो जाते हैं । उदर पर चिकनाई, महान शोय तथा अवसाद ( अंग ग्लानि ) के लक्षण दिखाई देते हैं तथा रोग की वृद्धि या प्रकटन देर से होता है । ऐसे टागों के होने पर उसे कफोदर कहते हैं ॥ १० ॥

स्त्रियोऽन्नपानं नखरोममूत्र-विडार्त्तवैर्युक्तमसाधुवृत्ताः । यस्मै प्रयच्छन्त्ययो गरांश्व दुष्टाम्बुदूषीविषसेवनाद्वा ॥ ११ तेनाशु रक्तं कुपिताश्च दोषाः कुर्वन्ति घोरं जठरं त्रिलिङ्गम् । तच्छीतवाताभ्रसमुद्भवेषु विशेषतः कुप्यति दह्यते च ॥ स चातुरो मूर्च्छति सम्प्रसक्तं ॥ १२ ॥ पाण्डुः कृशः शुष्यति तृष्णया च । प्रकीर्त्तितं दूष्युदरं तु घोरं प्लीहोदरं कीर्तयतो निबोध ॥ १३ ॥

सन्निपातोदर - असाधुओं ( दुष्टों ) का सा वर्ताव करने वाली स्त्रियां नख, रोम, मूत्र, विष्ठा, रज से युक्त अन्न या पेय पदार्थ खिला देती हैं तथा दुश्मन गर ( संयोगज कृत्रिम ) विष दे देते हैं उससे एवं दूषित पानी और दूपीविप के सेवन करने से शीघ्र ही रक्त तथा वातादि दोप कुपित होकर भयङ्कर त्रिदोषलक्षणयुक्त उदर रोग को उत्पन्न कर देते हैं । यह उदर रोग शीत और वायु से तथा अधिक मेघाच्छादित दिन में विशेषरूप से कुपित होता है तथा जलन पैदा करता है इस तरह इस सन्निपातोदर से पीड़ित रोगी वार वार मूच्छित हो जाता है तथा पाण्डु और दुर्बल हो जाता है, प्यास से सुखता है इस तरह इस भयङ्कर दूप्योदर का वर्णन किया है । भव आगे प्लीहोदर का वर्णन मुझसे सुनो ॥११- १३ ॥ विमर्श: - स्त्रियः - स्त्रीग्रहणमत्रोपलक्षण तेनान्येऽपि सन्निहिता अविवेकिनो ग्राह्या इति ढल्हण | अष्टाङ्गसग्रहे गरविषलक्षण यथा-‘ नानाप्राण्यङ्गशमलविरुद्धौषधिभस्मनाम् । विषाणा चाल्पवीर्याणा योगो गर इति स्मृत । कृत्रिम गरस तु क्रियते विविधौषधै । जीर्ण विषघ्नौषधिभिर्हतं वा दावाग्निवातातपशोषित वा । स्वभावतो वा गुणविप्रहीन विष हि दूषीविषतामुपैति ॥ दूषोविषकारणानि चरके-दुर्बलाग्नेरपथ्याम - विरोधिगुरुभोजने । भेलसहितायामपि समश्नतः | सर्वरसान् मिथ्याहारविहारिण । तथा नानावेदनाद्यमुदर सान्निपाति-| कम् । स्त्रीणा दूष्योदरं नाम जायते सान्निपातिकम् ॥ त्रिदोषकोपनैस्तैस्तै • स्त्रीदत्तैश्च रजोमलैः । ( अं ० सं ० ) । दूष्योदरपरिभाषा – रक्त दूष्य दूषयित्वा भवतीति दूष्योदर किंवा परस्परं दूषयन्तीति दोषा एव दूष्यास्तैः कृनमुदरमिति । ( श्रीकण्ठदन्तो मधुकोपे ) । विदाद्यभिष्यन्दिरतस्य जन्तोः प्रदुष्टमत्यर्थमसृक् कफश्च । प्लीहाभिवृद्धिं सततं करोति प्लीहोदरं तत् प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥ १४ ॥

प्लीहोदर - विदाहकारक तथा अभिष्यन्दी वस्तुओं के अधिक खाने वाले मनुष्य का रक्त और कफ प्रबलरूप से कुपित होकर निरन्तर प्लीहा को बढ़ाते रहते हैं इसी को तज्ज्ञ । वैद्य प्लीहोदर कहते हैं । प्लीहा वामपार्श्व में बढ़ती है तथा इसके बढ़ने से रोगी विशेष रूप से ग्लानियुक्त रहता है तथा मन्दज्वर, मन्दाग्नि, कफ और पित्त के लक्षणों वाले उपद्रवों

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श्रध्यायः ७ ] निदानस्थानम् । २५७

से ' युक्त, क्षीणवल और अधिक पाण्डु वर्ण का हो जाता है ॥

विमर्श: - ' विदाहिद्रव्यमुद्गारमम्ल कुर्यात्तथा तृपाम् । हृदि दाह च जनयेत्पाक गच्छति तच्चिरात् ॥ ' वैच्छिल्या गौरवाद द्रव्य रुदुद्ध्वा रसवहा सिरा । धत्ते यद् गौरव तत्स्यादभिष्यन्दि यथा दधि ॥ ' इति । प्लीहा उदरवामपार्श्वस्थस्तस्य क्रमेणाभिवृद्धिम् । ' तस्य प्लीहा कठिनोऽष्ठ | लेवादी वर्धमान कच्छपसंस्थान उपलभ्यते, स चोपेक्षित क्रमेण कुक्षिं जठरमग्न्यधिष्ठानं च परिक्षिप नुदरमभि निर्वर्तयति ' इति चरकः । प्लीहावृद्धि ( Chronio enlargement of the spleen ) के मुख्य कारण - जीवाणुओं से होने वाले रोग जैसे पुराना मलेरिया, काला अजार, हजकीन्स रोग तथा फिरङ्ग, सिरोसिस ऑफ् दी लिवर ( Currhosis of the Liver ), प्लीहा के अर्बुद, रक्तके रोग जैसे- श्वेत कणवृद्धि ( Lenkaemia ), प्लैहिक पाण्डुरोग ( Splenic anaemin ) तथा दुष्टपाण्डुरोग ( Pernioious anaemia ) भादि । इन रोगों के सिवाय रक्त के दूषित हो जाने से रक्त में रोगों के जीवाणुओं के प्रविष्ट होने से प्लीहा का कार्य भी बढ़ जाता है तथा इस चढे हुये कार्य को पूर्ण करने के लिये प्लीहा वृद्धि हो जाती है । वामे च पार्श्वे परिवृद्धिमेति विशेषतः सीदति चातुरोऽत्र मन्दज्वराग्निः कफपित्त लिङ्ग-रुपद्रुतः क्षीणबलोऽतिपाण्डुः सव्येतरस्मिन् कृति प्रदु की भी धीरे धीरे

।

॥ १५ ॥

ज्ञेयं यकृद्दाल्युदरं तदेव ॥ १६ ॥

यकृद्दाल्युदर - सन्य ( वाम ) से इतर ( दक्षिण ) पार्श्व में यकृत के प्रदुष्ट होने से उसी को यकृद्दाल्युदर कहते हैं ॥ १६ ॥

विमर्श: - यकृद्दालयति भेदयतीति यकृद्दाल्युदरम् । इसे Enlargement of the liver or enlarged liver कहते हैं । आयुर्वेद में प्लीहोदर को ही यकृद्दाल्युदर कहा है जैसे--' तदेव प्लीहोदर यकृद्दाल्युदर ज्ञेयम् क्व ज्ञेयमित्याह - यकृति कालखण्डे-किंभूते प्रदुष्टे ' इति टल्हणः । भावप्रकाशेऽपि — प्लीहोदरस्यैव भेदो यकृद्दाल्युदर तथा । चरकेऽपि - तुल्यहेतुलिङ्गौषधत्वात्तस्य प्लीहजठरएवा-वरोध इत्येतद्यकृ प्लीहोदर विधात् ' डाक्टरी में भी प्लीहावृद्धि के कारणभूत रोगों में बाद में यकृत् भी बढ़ता देखा गया है । यस्यान्त्रमन्नैरुपलेपिभिर्वा बालाश्मभिर्वा सहितैः पृथग् वा । सनीयते तत्र मलः सदोषः क्रमेण नाड्यामिव सङ्करो हि ॥ १७ ॥

निरुध्यते चास्य गुदे पुरीषं निरेति कृच्छ्रादपि चाल्पमल्पम् । हृन्नाभिमध्ये परिवृद्धिमेति तच्चोदरं विट्समगन्धिकं च ॥ १८ ॥

प्रच्छर्दयन् बद्धगुदी विभाव्य-स्ततः परिस्राव्युदरं निबोध ॥ १६ ॥

* इसकी भाषा पूर्व के श्लोक १४ के साथ है । ३३ सु ० बद्धगुदोदर -- जिस मनुष्य की आंत चिपचिपे अन्न, वाल अथवा छोटे छोटे अश्म ( पत्थर कंकर ) से व्याप्त हो गई हो तथा जैसे नाली में धीरे धीरे कूड़ा कर्कट ( संकर ) इकट्ठा । होता रहता है वैसे ही उस आंत में वातादि दोपों के स साथ मेल सचित होता रहता है । इस तरह उस मनुष्य की गुदा में मल का निरोध हो जाता है तथा थोडी थोड़ी मात्रा में बड़ी कठिनाई से निकलता है एवं हृदय और नाभि के मध्य में उदर ( आंतें फूलता है तथा दस्त के समान वदवू-दार वमन होता है । इन लक्षणों से बद्धगुद का निदान करना चाहिये । इसके बाद परिस्रावी उदर का लक्षण सुनो ॥१७-१९ ॥ विमर्शः - चरके वद्धगुदोदरवर्णन यथा - ' पदमवाले सहान्नेन भुक्तवद्वायने गुदे । उदावतैस्तथाऽशभिरन्त्रसम्मूर्च्छनेन वा । अपानो मार्गसरोधाद् धात्वग्निं कुपितोऽनिल । वर्च पित्तकरान् रुद्ध्वा जनयत्युदर तत ॥ डाक्टरी में वद्धगुदोदर को ( Pelvi- reotal constipation ) कहते हैं । मन्त्रमार्ग में अवरोध होने के कारण यह रोग । उत्पन्न होता है । अवरोध निम्न कारणों से होता है - ( १ ) वालाश्मादि तथा कठिन मल ( Due to hard and bulky faeces ) | ( २ ) मलाशय या गुदभाग का संकोच ( Stricture of the Rectum or Anus ) । ( ३ ) स्फिक्टर एनाई नामक मांसपेशी सङ्कोच ( Spasm of the spinctor ani or enterospasm ) । ( ४ ) अर्श ( Haemorrhoids ) । ( ५ ) आन्त्र-दौर्वल्य ( Due to weakness of the intestine ) । ( ६ ) तात्कालिक आन्त्रिकावरोध ( Aonte Intestinal obstruotion ) ही कारण चरक के उक्त पक्षमत्रालैः सहान्नेन से कहे गये हैं । शल्यं यदन्नोपहितं तदन्त्रं । भिनत्ति यस्यागतमन्यथा वा । तस्मात् स्रुतोऽन्त्रात् सलिलप्रकाशः स्रावः स्रवेद्वै गुदतस्तु भूयः ॥ २० ॥

नाभेोदरमेति वृद्धि निस्तुद्यतेऽतीव विदह्यते च । एतत् परिस्रा व्युदरं प्रदिष्टं दकोदरं कीर्तयतो निबोध ॥ २१ ॥

परिस्रान्युदर - अन्न के साथ खाया मत्स्यकण्टकादिरूपी शल्य अथवा टेढा आया हुआ शल्य भन्त्र का भेदन कर देता है तथा उस भिन्न भांत से जल के समान रंग रूपवाला स्रवित ( चुभा ) हुवा स्राव पुनः गुदा से बाहर चूता ( निकलता ) है तथा कुछ स्राव के उदर गुहा में चले जाने से नाभि के नीचे उदर फूल जाता है तथा सुई चुभोने की सी तीव्र पीड़ा होती है एवं उदर में दाह होता है । इसको परिस्रावी उदर कहते हैं । अब भागे दकोदर का वर्णन करता हूं सो सुनो ॥ २०-२१ ॥ विमर्शः -- मधुकोष व्याख्या में लिखा है कि विलोम ( टेढा ) भाया हुआ शल्य आन्त्रभेदक होता है सीधा नहीं होता - विलोमेनागतमन्त्र भिनत्ति, ऋज्वागत हि शल्यमपि नान्त्र-भेदकम् । अन्यथा वेति जृम्भणात्यशनाभ्यामन्त्र भिद्यते ( मधुकोषः ) । चरकेऽपि - शर्करा वृणलोष्ठास्थिकण्टकेरन्नसयुतै । भिद्येतान्त्र यदा

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२५८ सुश्रुतसहिता । भुक्तैर्नृम्भयाऽत्यशनेन वा ॥ आन्त्रच्छेट का कुछ स्राव आन्त्र । ही में जाने से वह गुदमार्ग से बाहर निकलता है तथा शेष नाव आन्त्र के बाहर उदर गुहा ( Abdominal cavity ) में स्रवता है जो नाभि के नीचे के हिस्से में इक्ट्ठा होकर उटर की वृद्धि करता है । यही भाव अष्टाङ्गसंग्रह में लिखा है -शेष चापूर्य जटर जठर घोरमावहेन् । वर्धते तो नामे । परिस्स्रा | वीर को छिद्रोदर या नतोदर भी कहते हैं - छिद्रोदरमिति प्राहु परिस्रावोति चापरे । ( अ ० सं ० ) । ढाक्टरी आन्त्रछेदज उदरावरणशोथ ( Pentonitis due to of the bowel ) है | यः स्नेहपीतोऽप्यनुवासितो वा वान्तो विरिक्तोऽप्यथवा निरूढः पिवेज्जलं शीतलमाशु तस्य स्रोतांसि दुष्यन्ति हि तद्वहानि स्नेहोपलिप्तेष्वथवाऽपि तेषु दकोदरं पूर्ववदभ्युपैति ॥ २३ ॥

स्निग्धं महत्सम्परिवृत्तनाभि भृशोन्नतं पूर्णमिवाम्बुना च । यथा दृतिः क्षुभ्यति कम्पते च शब्दायते चापि दकोदरं तत् ॥ मत से यह perforation || २२ || | २४ ॥ दकोदर -- जिसने स्नेहपान किया हो, अनुवासनवस्ति ली हो, वमन किया हो, विरेचन लिया हो अथवा निरूहण वस्ति ली हो और उसके बाद तुरन्त ही शीतल जल पीले तो उसके जलवाहक स्त्रोतस दूषित हो जाने से जलोदर हो जाता है । अथवा उन स्रोतसों के स्नेह द्वारा उपलिप्त होने पर शीतल जल पी लेने से भी पहले के परिस्राव्युटर की भांति आन्त्र से या जलवाहक स्रोतसों से रस चू चू कर उदरगुहा में सचित हो के जलोदर हो जाता है । जलोदर में ऊपर से पेट चिकना, आकार में बडा, भीतरी जल के दबाव से नाभि का गर्त नष्ट होकर सपाट होना अथवा नाभि का उलट कर बाहर की ओर हो जाना तथा उदर अत्यधिक उठा हुआ प्रतीत होना ये लक्षण होते हैं तथा इनके सिवाय जैसे जल से पूर्ण भरी हुई मशक चुभित होती है, कम्पन करती है तथा शब्द करती है उसी तरह उदर भी क्षुभित होता है, हिलता है, गति करता है तथा शब्द करता है, इसको ढकोदर कहते हैं ॥ २२-२४ ॥ विमर्श: - जलोदर या दकोटर को एसाइटिस ( Ascites ) कहते हैं । इसकी उत्पत्ति के डाक्टरी में ६ कारण हैं । ( नं ० १ ) यकृद्ववृद्धि के कारण प्रतिहारिणी महासिरा ( Portal vein ) के रक्तपरिभ्रमण में बाधा । ( नं ० २ ) हृदय के रोग जैसे भाई-ट्रल स्टिनोसिस आदि । ( नं ० ३ ) वृक्क के विकार - Chronic and aIute nephritis ( नं ० ४ ) उदरावरण शोध ( Peritonitis ) । ( नं ० ५ ) रक्त के रोग । ( नं ० ६ ) रसप्रवाह का ठीक न होना । इन कारणों के अनुसार जलोदर भी ६ प्रकार का होता है । प्रतिहारिणी सिरावरोधजन्य जलोदर में अग्नि-मान्य, यकृष्ठोहा वृद्धि, हृद्रोगज में हत्कम्पन तथा पादशोय, शृह्णविकृतिजन्य में समस्त शरीर तथा विशेषरूप से अक्षिपः एक के नीचे और पार्वों पर शोथ तथा मूत्र में कास्ट मिलना आदि लक्षण मिलते हैं । जलोटर के निदान ( Diagnosis ) के लिये तीन परीक्षायें हैं जैसे - ( १ ) कम्पनपरीक्षा ( Fluctuation test ) उदर पर अड्गुलियों द्वारा आघात करने से उदर थलथलाता या कांपता है । ( २ ) क्षोभपरीक्षा ( Percussion test ) - एक पार्श्व में हाथ रख कर दूसरे पार्श्व पर हस्त से आघात करने पर भीतरी जल में उत्पन्न क्षोभ पूर्व हस्त को प्रतीत होगा । ( ३ ) शब्द परीक्षा ( Percussion ) जल पूर्ण मशक पर आघात करने की भाति उदर पर आघात करने से मन्द Dall ) शब्द सुनाई देता है | ' तोय पूर्णइतिस्पर्शशब्दप्रक्षो भवेपथु ' ऐसा अष्टाङ्गसंग्रह में भी लिखा है । आध्मानं गमनेऽशक्तिर्दोवल्यं दुर्बलाग्निता ।

शोफः सदनमङ्गानां सगो वातपुरीपयोः ।

दाहस्तृष्णा च सर्वेषु जठरेषु भवन्ति हि ॥ २५ ॥

लक्षण - आध्मान, चलने में असमर्थता, दुर्बलता, मन्दाग्नि, शोथ, अगों की ग्लानि, अधोवात तथा मल में रुकावट, दाह और प्यास ये सामान्य लक्षण सर्व प्रकार के उदर रोगों में होते हैं ॥ २५ ॥

अन्ते सलिलभावं हि भजन्ते जठराणि तु ।

सर्वाण्येव परीपाकात्तदा तानि विवर्जयेत् ॥ २६ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने उदरनिदानं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

ac सर्व प्रकार के उदर रोग अधिक समय बीतने पर सलिल-भाव ( जलोदरता ) को प्राप्त हो जाते है उस अवस्था में उन की चिकित्सा वर्जित है ॥ २६ ॥

विमर्शः - असाध्योदरलक्षणानि - जन्मनैवोदर सर्व प्रायः कृच्छ्र-तम मतन् । बलिनस्तदजाताम्यु यत्तसाध्य नवोत्थितम् ॥ पक्षाद्दद्धगुद तूदूर्ध्व सर्व जातोदक तथा । प्रायो भवत्यभावाय छिद्रान्त्र चोदर नृणाम् ॥ शूनाच कुटिलोपस्थमुपन्नितनुत्वचम् । वलशोणितमासा-निपरिक्षीणञ्च वर्जयेत् ॥ पार्श्वभङ्गान्न विद्वेषशोफानी सारपीटितम् । विरिक्त चाप्युदरिण पूर्यमाण विवर्जयेत् ॥ ( भावप्रकाशः ) इत्यायुर्वेदतत्त्वसन्दीपिकाभापायामुदरनिढानं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

C अष्टमोऽध्यायः अथातो मूढगर्भनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब इसके अनन्तर मूढगर्भ निदान का वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१-२ ॥ ग्राम्यधर्मयानवाहनाध्वगमनप्रस्खलनप्रपतनप्रपीड-नधावनाभिघातविपमशयनासनोपवासवेगाभिघाताति-रूक्षकटुतिक्तभोजनशोकातिनारसेवनातिसारखमनवि-रेचनप्रेङ्खोलनाजीर्णगर्भशातनप्रभृतिभिर्विशेपैर्वन् धना-| न्मुच्यते गर्भः, फलमिव वृन्तबन्धनादभिघातविशेषैः ॥