श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 311–320
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 311–320
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श्रध्यायः ८ ] निदानस्थानम् । २५६ स्त्री - सम्भोग, तांगा, रथ आदि यान तथा ऊंट, अश्व आदि वाहन पर सवारी, मार्ग में चलना, पांव के फिसलने से गिर पढना, ऊंचे से गिरना, भीड़ मे दबना, जोर से दौढना, उदर पर चोट लगना, ऊंचे - नीचे विस्तरे पर सोना, ऊकडे बैठना, अधिक उपवास करना, मल - मूत्रादि के वेगों को रोकना, अत्य-धिक रूच, कटु, तिक्त रस वाले द्रव्यों का खाना, शोक करना, चारों का अधिक सेवन, मरोड के साथ दस्ते लगना, वमन और विरेचन, झूलना, अजीर्ण, गर्भ गिराने वाले द्रव्यों का सेवन करना आदि कारणों से गर्भ अपने बन्धन ( गर्भाशय सम्बन्ध ) से छूट जाता है जैसे कि लकडी या पत्थर की चोट से फल अपने वृन्त ( ढण्टल ) के बन्धन से छूट जाता है ॥ ३ ॥
विमर्शः -- नाते - वनेऽनेनेति न्यनम् । अर्थात् गर्म गर्भाशय में चारों ओर से बंधा हुआसा रहता है । हाराण चन्द्रजी ने वन्धन का अर्थ नाभिनादीबन्ध ( Umbilical Cord ) किया है परन्तु गर्भ फल मूढगर्भ में भी अपने नाभि aisa से पृथक नहीं होता है । अतः बन्धनान्मुच्यते का अर्थ गर्भशय्या से पृथक् होना करना ही श्रेष्ठ है । स विमुक्तबन्धनो गर्भाशयमतिक्रम्य यकृत्प्लीहा-न्त्रत्रिवरैरवस्रंसमानः कोष्ठसङ्क्षोभमापादयति, तस्या जठरसङ्घोभाद्वायुरपानो मूढः पार्श्ववस्तिशीर्पोदरयोनिशू लानाहमूत्रसङ्गानामन्यतममापाद्य गर्भ च्यावर्यात तरुण शोणितस्रावेण । तमेव कदाचिद्विवृद्धमसम्यगागतमप त्यपथमनुप्राप्तमनिरस्यमानं विगुणापानसम्मोहितं गर्भ मूढगर्भमित्याचक्षते ॥ ४ ॥
उक्त कारणवश बन्धनों ( गर्भशय्या सम्बन्ध ) से युक्त हुआ गर्भ गर्भाशय से निकल कर माता के यकृत, प्लीहा और आन्त्र जो कि गर्भवृद्धिजन्य दबाव से ऊपर उठ गये थे इनके साथ या इनके विवर ( अन्तराल = अवकाश ) से नीचे की ओर गिरता हुआ कोष्ठ ( उदर ) में संक्षोभ उत्पन्न करता है । उस स्त्री के जठर के प्रक्षोभ से अपान वायु मूढ ( क्रियाहीन ) हो कर पार्श्व, वस्ति, शीर्ष, उदर और योनि में शूल, आनाह । तथा मूत्र की रुकावट इनमें से किसी एक रोग ( उपद्रव ) को उत्पन्न कर स्राव के साथ तरुण गर्भ को गिरा देती है । वही गर्भ कुछ काल बाद बंद कर अनुचित तरीके से अव तरित होकर अपत्यपथ ( योनिनलिका ) में आकर बाहर न निकले और अपानवायु के वैगुण्य से मूर्च्छित हो जाता है तब उसे मूढगर्भ कहते हैं ॥ ४ ॥
विमर्श: -- ' च्यावयति नरुण ' से गर्भस्राव ( Abortion ) का वर्णन है क्योंकि इसमें गर्भ अयोग्य तरीके से आने पर भी रक्तस्राव के साथ निकल जाता है रुकता नहीं किन्तु कुछ मास के पश्चात् स्थिर शरीर होने पर गर्भपात होता है वही अयोग्य रीति से आने पर मूढगर्भ होता है । चार मास तक गर्भस्राव । तथा बाद में छठे मास तक गर्भपात होता है । आचतु ततो
मासात्प्रन्नवेद् गर्भविद्रवः । तत स्थिरशरीरस्य पान पञ्चमपष्ठयो ॥
मूढगर्भ पांच मास से प्रसवकाल ( नवम - दशम आदि ) तक कभी भी अयोग्य रीति से आने पर गर्भाशयग्रीवा में अटक जाने से होता है । सर्वावयवसम्पूर्णा मनोनुद्धया दिसयुन । विगु णापानसमूढो मूढगर्भोऽभिधीयते ॥ मूढगर्भ को माल प्रेजेण्टेशन ऑफ दी फीटस ( Mal - presentation of the Foetus ) अथवा Abnormal delivery कहते हैं । डॉक्टरी में इसका कारण अभी तक जाना नहीं गया है— The cause of abno • rmal presentation is not easy to ditermine and in many cases no satisfactory reason can be given ( Ten, T. Midwifery ) । गर्भाशय में गर्भस्थितिः - आभु-ग्नोऽभिमुखः शेते गर्मी गर्भाशये स्त्रिय ॥ स योनिं शिरसा याति स्वभावात्प्रसवम्प्रति ॥ ( सु ० शा ० ५ ) । ' गर्भस्तु मातु ' पृष्ठाभिमुस. ऊर्ध्वशिरा सङ्कुच्याद्गान्यास्ते जरायुवृत कुक्षौ । स चोपस्थितकाले । जन्मनि प्रसूतिमारुतयोगात् परिवृत्यावाक्शिरा निष्क्रामत्यपत्यपथेन । पा प्रकृति, विकृति पुनरतोऽन्यथा । ( च ० शा ० अ ० ६ ) । गर्भस्तु सलु मातु पृष्ठाभिमुसो ललाटे कृताञ्जलि समुचिताङ्गो गर्भकोष्ठे दक्षिणपार्श्वमाश्रित्यावतिष्ठते पुमान्, वाम स्त्री, मध्यं नपुसकस्य । ( अ ० सं ० शा ० २ ) गर्भ का शिर आगे को वक्ष पर झुका रहता है, रीढ आगे की ओर मुडी रहती है । दोनों जांघें उदर पर और टांगें जांघों पर मुड़ी रहती हैं । दोनों भुजाएं छाती पर एक दूसरे पर मुड़ी रहती हैं । प्रसूति समय के कुछ मा पूर्व उसका सिर नीचे हो जाता है तथा नितम्ब ऊपर हो जाते हैं तथा सिर के वल ही जन्म लेता है अर्थात् प्रथम सिर, पश्चात् ग्रीवा, कन्धे, ऊदूर्ध्व शाखाएं, उदर, नितम्ब तथा नीचे की शाखाएं इस क्रम से बाहर निकलता है । इस तरह शीर्पाम के द्वारा जन्म लेना Vertex presentation ) स्वाभा-विक तथा सरल प्रकार है अन्य अङ्गों से जन्म लेना विकृति या मूढगर्भ कहा जाता है । कारण - अपत्यमार्ग की विकृति-जैसे सकुचित वस्तिगुहा ( Contracted Pelvis ), गर्भाशय के अर्बुद, गर्भ की भरवाभाविक स्थिति, तथा गर्भ की अनेक विकृतियां जैसे युग्मगर्भ ( Twins ), जलशीर्ष ( Hydro cephalus ) । ततः स कीलः प्रतिखुरो बीजकः परिघ इति । तत्र, ऊर्ध्वबाहुशिरः पादो योनिमुखं निरुणद्धि कील इव स कीलः । निःसृतहस्तपादशिराः कायसङ्गी प्रतिखुरः । यो निर्गच्छत्येकशिरोभुजः स बीजकः । यस्तु परिघ -इव योनिमुखमावृत्य तिष्ठेत् स परिघः । इति चतुर्विघो भवतीत्येके भापन्ते ॥ ५ ॥
मूढगर्भ भेद - अपान वायु की विगुणता से कील, प्रतिखुर, वीजक और परिघ ये मूढगर्भ के चार भेद होते है । इनमें जो गर्भ हस्त, सिर और पांव को ऊपर रखकर योनि मार्ग को कील की तरह अवरुद्ध कर देता है उसे कील कहते हैं । गर्भ के हाथ, पैर तथा सिर निकल जायँ किन्तु शरीर के मध्यभाग से योनि को रोक देता है उसे प्रतिखुर कहते हैं । जिस गर्भ का एक हाथ और शिर बाहर निकल आवे उसे बीजक कहते हैं । जो गर्भ परिध ( आगल ) की तरह ( Transvers Position से ) आकर योनिमुख को रोक लेता है उसे परिध कहते हैं । इस प्रकार चार प्रकार का मूढगर्भ होता है ऐसा कई एक आचार्य मानते हैं ॥ ५ ॥
विमर्श: - कील को माधवकर ने संकीलक नाम से कहा है - तेषूद्वाहुचरणे शिरसा च योनिं सद्गी च यो भवति कील-काव स कील || भोजोऽपि - ऊदूर्ध्वबाहुशिर पादो रुन्ध्याधोनिमु
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२६० सुश्रुतसहिता । वन्तु य । प्रतितीलीण्नस्थित्या न च कीटकनि ॥ यह चेष्ट वेक एण्ड साइड प्रेजेण्टेशन ( Chest, back and side presentation ) है । प्रतिखुर को Presentation of the head with two hands and two legs कहते हैं । ' दृध्ये सुरैः प्रनिपुर स हि कायसङ्गी ' ( माघवः ) । इयें नपादशिरोमि प्रति सुरः । सुरसाधर्म्यात् । सुरशन्न हस्तपादावुच्येते । ( विजयर चितः ) । अन्नात्पार्श्वनी वाऽपि नयनाकुखिनोऽपि वा । यो नि'नृत्य मुन्त्र योने Í य. प्रतिगुरम्तु स ॥ बीजक ( Head presentation with one or two hands prolapsing; - ' गच्छेट भुजद्वय-शिग स च बीजकाग्य ' ( माधव ) । अन्यच - योनिद्वारातु निगं
धश्चक सचिभुजः । तमायनिक नाम मूढगर्भचिकित्सका ॥
( भोजः ) । परिध ( Transverse presentation ) ' योनी नि. स परिध परिषेण तुल्य ' ( माधवः ) । योनिमावृत्य वस्ति-ष्ठेत् परियो गोपुर यथा । तथाऽन्नर्गर्भमायान्त विद्यात् परिवस तिम् ॥ ( भोजः ) । तत्तु न सम्यक्; कस्मात्? स यदा विगुणानिलप्र-पीडितोऽपत्यपथमनेकधा प्रतिपद्यते तदा सङ्ख्या हीयते ॥ उपर्युक्त चतुर्विध भेद ठीक नहीं है क्योंकि जब विगुण ( विलोम ) अपानवात से पीडित वह गर्भ अपत्यमार्ग में अनेक प्रकार में जाता है तब संख्या ( चतुष्टय प्रकार ) की निश्चित नहीं रह सकती है ॥ ६ ॥
विमर्शः - असंख्य होते हुए भी मूढगर्भ का सङ्कलन तीन वर्गों में विभक्त है । ' समानता अपि सा भवति शिरसो वैगुण्यात्रमयोर्नघनस्य वा ( सुश्रुतः ) । समासनन्तु त्रिविधा गतिर्दथ्वां, निरंख् न्युब्ना च । ( अ ० सं ० ) । शिरोगति या न्युजगति को Caphale presentation अंसगति या तिर्यग गति को Shoulder, or Transverse presentation, जघन-गति या कर्ध्वगति को Pelvic presentation कह सकते हैं । तत्र, कचिद् द्वाभ्यां सक्थिभ्यां योनिमुख प्रतिप-द्यते । कञ्चिदामुग्नैकसक्थिरेकेन । कश्चिदामुनसक्थि-शरीरः स्फिग्देशेन तिर्यगागतः । कचिदुरः पार्श्वपृष्टाना- | मन्यतमेन योनिद्वारं पिधायावतिष्ठते । अन्तःपार्श्वा-पवृत्तशिराः कश्चिदेकेन बाहुना | कश्चिदासुनशिरा बाहुद्वयेन । कचिदाभुग्नमध्यो हस्तपादशिरोभिः । कश्चिदेकेन सक्छना योनिमुखं प्रतिपद्यतेऽपरेण पायुम्
' ।
इत्यष्टविधा मूढगर्भगतिरुद्दिष्टा समासेन ॥ ७ ॥
मूढगर्भमेद - ( १ ) इनमें कोई गर्म दोनों टांगों से योनि-मुग में आता है । ( २ ) कोई गर्म एक टांग को संकुचित करके एक ही टांग से योनिमुख में उतरता है । ( ३ ) कोई गर्भ टांगों और शरीर को देना करके स्फिग ( नितम्ब या फूला ) भाग से तिरछे रूप में आता है । ( ४ ) कोई छाती, पाव, और पृष्ठ इनमें से किसी एक हिस्से से आकर योनिद्वार को अव करके स्थित हो जाता है । ( 2 ) कोई गर्म शिर को अन्दर या पार्श्व की ओर झुकाकर एक बाहु से आता है । ( ६ ) कोई गर्भ सिर को टेढा करके दोनों बाहुओं से आता है । ( s ) कोई मध्यभाग को टेवा करके हाथ, पैर और सिर से नाता है । ( e ) कोई एक टांग से पायु को दबा कर दूसरी टांग मे योनिमुस की ओर आता है । इस तरह संचेप से ये आठ प्रकार की मूढगर्भ की गतियां कही गई हैं ॥ ७ ॥
विमर्शः - सुश्रुत की इन अष्टविधगतियों को निम्न रूप से समझनी चाहिये -- ( 1 ) स्फिक्पाटोदय ( Fall breech: pre । seutation with inpection ) । ( २ ) पादोदय या जानूद्रय | ( Foothing or free presentation ) । ( ३ ) डिय ( Pra • | nk breech presentation ) । ( १ ) पार्श्वावतरण ( Transre = ree presentation ) । ( ५ ) अंशहस्तस्कन्धोदय ( Tran.ner ce presentation with prolapse of the hand ) । ( ६ ) जटि • लोढय तथा ( ७ ) जटिलोदय प्रतिपुर ( Complex or Compou | nd presentations ) 1 ( ८ ) पाढजानूदयौ ( Tost and knee presentations ) । वाग्भट ने मानव तथा आठवें मूह गर्म को विष्कम्भ नाम से लिया है - पानियों को मुग्न प्रपद्यते । पादेन योनिमेकेन नुग्नोऽन्येन गुढज य ॥ विष्क मी नाम नौ सूही शनदारणमते । मानवनिदाने अष्टविधगनित्र-न यथा- ' भुग्नोऽनिलेन विगुणेन तत स गर्भ सख्यामत्रौत्य बहुग नमुपैनि योनिम् । द्वार निन्ध्य शिरमा जठरेण वश्चित् कश्चिच्छरीर परिवर्तिनकुब्जने । केन कश्चिदपरन्तु सुजद्वयेन निर्म तो मवति कोऽन्य । पार्श्वापवृत्तगतिरेनि तथैव कवि-दित्यष्टना गतिरिय सपरा चतुर्थी ॥ तत्र, द्वावन्त्यावसायौ मूढगर्भी, शेपानपि विपरीते-न्द्रियार्थाक्षेपकयोनिभ्रंशसंवरणमकल्लश्वासका सभ्रमनि-पीडितान् परिहरेत् ॥ ८ ॥
पूर्वोक आठ मूढगर्भ के प्रकारों में से अन्तिम दो प्रकार असाध्य होते हैं तथा शेष में भी यदि स्त्री इन्द्रियों के अर्थ ग्रहण करने में असमर्थ हो गई हो तथा आक्षेप, योनिभ्रंश, योनिसवरण ( योनिसकोच ), मस्कत, श्वाम, कास और भ्रम ये लक्षण हों तो उनकी चिकित्सा न करें ॥ ८ ॥
विमर्श - विपतिन्द्रियान - वैपरीत्येन हीनानियोगेनानु-| भूना शब्दादयोऽयां । सस्थेम्धो विकृत यस्त्र द्यानमिन्द्रियसश्रयन् । आटच्येतानिमित्तेन लक्षण मरणस्य तत् ॥ ( चरकः ) । गर्भाक्षेप रोग को eclampsias कह सकते हैं । गर्भवती के छठे माह के बाद से प्रसव समय तक तथा उसके पांच दिन तक होता रहता है । उक्षण - धनुःस्तम्भ के समान दौरे आते हैं । इसमें शिर तथा मुस को पेशियों का संकोच, आंखों का फिरना, नासाकम्प, दांत बन्द करना, सांस में रुकावट तथा शरीर का टेढा होना आदि लक्षण होते हैं । प्रतिदिन कई बार दौरे आते हैं । दस से अधिक दौरों का आना रोग की कृच्छ्रसाध्यता का सूचक है । योनिसंवरण ( Stenosis and Atresis of the Cervix or vagina ) या गर्भाशय - सङ्कोच या आक्षेप ( Tetanus uteri or Clorie spasm of the uterus ) । तन्त्रान्तरीययोनिसंवरणवर्णनं यथा - ' बालान्यश्न-पानानि श्राम्यधर्म प्रनागरन् । अल सेवमानाया गर्भिण्या योनिमा-गंग ॥ मातरिश्वा प्रकुपितो योनिद्वारस्य सवृतिम् । कुरुते रुद्धमार्ग-खात्पुनरन्नर्गतोऽनिल ॥ निरणयाशयद्वार पीडयन् गर्भमस्थितिम् । निरवदनोच्छ्वासो गर्म श्राशु विपद्यते । बढा मंरद्धहृदया नाशय-त्याशु गर्मिणीम् । योनिसारण विद्याद् व्याधिमेन सुदारणम् ॥ अन्तकप्रनिम घोरं नारमेत चिकित्सितम् । मक्कल ( Complete
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अध्याय ः ८ ] निदानस्थानम् । २६१ tonic or Tetanic contraction of the uterus ) मूढगभ को बाहर निकालने के लिये गर्भाशय में होने वाले प्रवल सङ्कोचनों के कारण यह मक्कल नामक तीव्रशूल होता है । यद्यपि सुश्रुत के १० वें अध्याय में ' प्रजातायाश्च नार्या ' अर्थात् ' प्रजाता स्त्री के गर्भाशय में अपरा का कुछ हिस्सा रह जाने से अथवा सुतरक्त जम जाने से होता है ' ऐसा लिखा है तथा । माधवनिदान मधुकोष - व्याख्या में भी ' मक्लो रक्तमारुतज शूलविशेष ' लिखा है तथापि अप्रजाता में भी होता है ( प्रजा-तायाश्चेत्यत्र चकारादप्रजाताया अपीति उल्हण ) | गर्भाशय में प्रसवोत्तर होनेवाली वेदना या शूल ( मक्कल ) को After pains कह सकते हैं । आन्त्रगतवायु तथा मूत्रसंग से होने वाली प्रसवोत्तरवेदना को False apler pains कहना चाहिये । अष्टाङ्गसंग्रह में मक्कल्ल को मर्कल नाम से लिखा है । मूढगर्भे अन्यासाध्यलक्षणानि – गर्भको पपरासङ्गो मक्लो योनिसवृतिः । हन्यात स्त्रिय मूढगर्भे ययोक्ताश्चाप्युपद्रवा ॥ ( सु. सू. ३३ ) ।
भवन्ति चात्र-कालस्य परिणामेन मुक्तं वृन्ताद् यथा फलम् ।
प्रपद्यते स्वभावेन नान्यथा पतितुं ध्रुवम् ॥ ६ ॥
एवं कालप्रकर्षेण मुक्तो नाडीविबन्धनात् ।
गर्भाशयस्थो यो गर्भो जननाय प्रपद्यते ॥ १० ॥
जिस तरह समय के परिणाम के कारण पक्व फल अपने वृन्त ( डण्ठल ) से मुक्त हो के गिर जाता है उसी प्रकार कालपरिणाम तथा स्वभाव से गर्भाशयस्थ गर्भ अपने बन्धनों से पृथक होकर जन्म ग्रहण करता है । विना काल पूरा हुये फल तथा गर्भ दोनों अपने अपने स्थानों से गिर नहीं सकते हैं यह ध्रुव ( निश्चय ) जानो ॥ ९ –१० ॥ विमर्श:: - - वृन्त फल के गिरने में काल - परिणाम तथा परिपाक इन दो कारणों के सिवाय पृथिवी का गुरुत्वाकर्षण भी तीसरा कारण है जो फल को अपनी ओर खिंचता रहता है - प्राकृष्टिशक्तिश्च मही तथा यत् स्वस्थ गुरु साभिमुस स्वशक्त्या । आकृष्यते तत्पततोव भाति । इसे पृथ्वी की आकर्षणशक्ति ( Force of gravitation ) कहते हैं । गर्भाशय में गर्भ को स्थिति गर्भशय्या तथा नामिनाढी पर निर्भर है । नाभि नाडी का सम्बन्ध अपरा से तथा अपरा गर्भाशय की भीतरी दीवाल से लगी रहती है तथा गर्भाशय अपनी रक्तवाहिनियों द्वारा उस स्त्री के हृदय से सम्बन्धित रहता है । अस्य नाभ्या प्रतिवद्धा नाही, नाढ्य | मपरा, तस्या मातृहृदय, ततो मातृहृदयादा-हाररसो धमनीभि स्यन्दमानोऽपरामुपैति । ततः क्रमान्नामिं, ततश्च स पुनर्गर्भस्य पक्काशये स्त्रकायाग्निना पच्यमान प्रसादवाहुल्याडा-त्वादिपुष्टिकर ' सम्पद्यते ॥ ( अ सं. ) । प्रसव के समय अपरा गर्भाशय से अलग होने लगती है । तथा गर्भाशय का तीव्र सङ्कोच गर्भ को बाहर निकालता है । कारण – ( १ ) गर्भाशयग्रीवा विस्तार, ( २ ) अपरा का गर्भाशय से विच्छेद न होना, ( ३ ) कार्बन डायोक्साइढ गैस की वृद्धि रक्त में अन्तिम दिनों में होती है जिससे nerves तथा मस्तिष्क केन्द्र उत्तेजित हो के गर्भाशय - सङ्कोच करते हैं । ( ४ ) मासिकधर्म के समय की हलचल - अर्थात् मासिकधर्म गर्भस्थिति में रुका रहने पर भी उसके होने की प्रतिमास की अवधि का समय कुछ हलचल करता है । ( ५ ) गर्भोत्पन्न कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं जो nerves तथा मस्तिष्क केन्द्र पर प्रभाव ढाल के गर्भाशय का सङ्कोच हैं । ये सब नियत समय पर क्यों होते है इसका कुछ उत्तर नहीं है केवल ' स्वभावेन नान्यथा ' यही उत्तर हो सकता है ।
कृमिवाताभिघातैस्तु तदेवोपद्रुतं फलम् ।
पतत्यकालेऽपि यथा तथा स्याद्गर्भविच्युतिः ॥ ११ ॥
गर्भविच्युति - जिस प्रकार कृमि, वात ( का झोंका ) और आघात हुन कारणों से वही फल अकाल में बिना पके ही गिर जाता है उसी तरह कृमि ( जीवाणु ) से मिथ्या आहार विहारजन्य प्रकुपित वात से एवं उदर पर आघात तथा चिन्ता - शोकादि मानसिक आघातों से गर्भ अपने स्थान से गिर जाता है ॥ ११ ॥
आचतुर्थात्ततो मासात् प्रस्रवेद् गर्भविच्युतिः ।
ततः स्थिरशरीरस्य पातः पञ्चमषष्ठयोः ॥ १२ ॥
गर्भस्राव तथा गर्भपात -- गर्भधारण दिन से चतुर्थ मास तक गर्भ के नष्ट होने को गर्भस्राव ( Abortion ) कहते हैं तथा उसके बाद पांचवें और छठे मास में स्थिर ( हस्तपा -दादि अङ्गों से युक्त तथा घन ) शरीर के नष्ट होने को गर्भपात ( Miscarriage ) कहते हैं ॥ १२ ॥
विमर्शः - ढाक्टरी में अपरा के पूर्ण बनने तक गर्भाव कहते हैं । भोज तीन मास तक गर्भस्राव मानता है- ' भातृती-यात्ततो मासाद् गर्भ स्रवनि शोणितम् ' । मतान्तर - अन्ये तु पञ्चमप-प्रयोरेव पात, सप्तमादिषु दॊषयैगुण्याद्विप्रसव. ।
प्रविध्यति शिरो या तु शीताङ्गी निरपत्रपा ।
नीलोद्धतसिरा हन्ति सा गर्भ स च तां तथा ॥ १३ ॥
असाध्यमूढगर्भलक्षण -- जो स्त्री शिर को अधिक हिलाती हो या पटकती हो, जिसके हस्तपादादि अङ्ग शीतल हो गये हों, जो बेहोश होने से स्वाङ्गरक्षण में असमर्थ होने से निरपत्रपा ( लज्जारहित ) सी मालूम पडे तथा जिसकी नसें ( सिराएं Ven तथा धमनियां Arteriese ) नीली और उभरी हुई दीखती हों वह गर्भ को मार डालती है तथा वह मृत बालक उसको मार डालता है ॥ १३ ॥
गर्भास्पन्दनमावीनां प्रणाश ' श्यावपाण्डुता ।
भवत्युच्छ्वास पूतित्वं शूलं चान्तर्मृते शिशौ ॥ १४ ॥
अन्तर्मृतगर्भलक्षण — उदर में गर्भ ( हृदय ) का स्पन्दन नहीं होना, आवी ( प्रसवपीड़ा ) का विनाश, चेहरे तथा शरीर पर श्यावता ( कालापन ) लिये पाण्डुवर्णता, श्वास में बदबू आना तथा वस्ति, गर्भाशय एवं उदरादि में शूल ये अन्तर्मृतगर्भ के लक्षण हैं ॥ १४ ॥
विमर्शः - चरके अन्तर्मृतगर्भलिङ्गानि यथा -- यदा सोऽन्त-मृतो गर्भे शूनो वस्तिरिवातत । उत्क्षिप्यन्त इवाङ्गानि मूत्रवस्तिश्च मिद्यते ॥ क्लोमप्लीहा यकृच्चैव फुफ्फुस हृदय तथा । गर्भेण पीडित पित्तादूर्ध्वं प्रक्रामति स्त्रिय ॥ सा सूयते मुहूर्त्ताच्च कृच्छ्रश्वासा च जायते । पूतिगन्धस्तथा स्वेदो जिह्वा तालु च शुष्यति ॥ वेपते भ्राम्यति
तथा जीवितञ्चोपरुध्यते । एतैलिंग विजानीयान्मृत गर्भं चिकित्सकः ॥
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II सुश्रुतसंहिता |
मानसागन्तुभिर्मातुरुपतापैः प्रपीडितः ।
गर्भा व्यापद्यते कुन व्याधिभिश्च प्रपीडितः ॥ १५ ॥
गर्मसृत्युकारण —– माता के शोकादि मानमिक एवं आधा वादि गगन्नुक कारणजन्य दुखों ( उपतापों ) से अधिक पीड़ित नया माता के ज्चरादि रोगों में पांडित गर्म वृद्धि में ही मर जाता है ॥ १७ ॥
विमर्श - डाक्टरी में गर्म की अन्तर्मृत्यु के निम्न कारण माने हैं- ( 1 ) माना के रोग - फिरत, ब्रुक में सूजन, गर्भाक्षेप ( Eclampsis ), तेज बुखार, राजयच्मा, पान्डुरोगादि । ( 2 ) पिता के रोग - फिरङ्ग, सीसविष, राजयक्ष्मा । ( ३ ) गर्भ के विकार - अपरा ( Placenta ), गर्भावरण तया नामि-नाडी इनमें ठीक तरह से रक्तसञ्चार न होना, ( 2 ) आवात-गर्भवती के दर पर चोट ।
बस्तमारविपन्नायाः कुक्षिः प्रत्पन्दते यदि ।
तत्क्षणाज्जन्मकाले तं पाटयित्वोद्धरेद्भिषक् ॥ १६ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने मूढगर्भनिदानं नाम ऋष्टमोऽध्यायः । 2 गाड कर सारे हुए वस्त्र ( बकरे ) के समान मारी ( मरी ) हुई स्त्री की कुक्षि यदि स्पन्दन करती हो तो टसी समय तत्काल उस कुड़ि का उत्पादन ( भेदन ) कर उस तांचित बजे को निकाल लेना चाहिये ॥ १६ ॥
विमर्श: - चारों ने इस श्लोक के भिन्न भिन्न अर्थ किये हैं । इन्हग सन्नान् । एतेन श्रीवामनेना-वाग्भट ने रा नानार्थि ' के स्थान में ' बलिद्वारे विनाया । ऐमा पाठान्तर माना है तथा अरगत टीका में लिखते हैं- ' गर्मिया मृताना वृद्धि ज्यन्त चतिः प्रदेशे? बन्निद्वारे; कट्टा १ चम्मकाले गर्भप्रसवोन्मुखे काटे, ना कुशल वैद्य शत्र निन्नानन् पानला शिशु वामुदरेत् । हाराचन्द्र भी ' तिद्वारा ऐसा हो पाठान्तर मानते हैं किन्तु भिन्नाय वाला अर्थ करते हैं यथा - हलका अ थिने प्रसनले विना वृता की कुद्धिः प्रस्यन्दने, वहि नदाद वस्तिहारे दस्ति द्वार vietter from गर्ममुद्धरेत् इति व्याननति । अर्थात् ' बस्तिहारे ' इसे द्वितीया द्विवचन कर्म माना है । वाग्भट ने ' स्नेहनन् बस्तिारे ' सप्तम्येक वचन माना है । बांगेकर जी ने इसका तात्पर्यार्थ किया है कि । प्रसव के समय अपत्यमार्ग या कदि तंग होने से जीवित गर्म अटक जाता है तब उसे अपन्यमार्ग से न निकाल कर पेट में वीरा ( Cae: srean sect'on ) लगा के निकाल लेना चाहिये । इन्होंने ' चिपथा ' का अर्थ ' मृना ' न करके मृतसमान यातना भोगने वाली जीवित न्त्री किया है क्योंकि उन्होंने गर्भ की मृत्यु न होकर माता की मृत्यु होना असम्भव माना है । मृत गर्म को न निकालने से या निकालते समय अपत्यमार्ग के दूषित ( Septic ) हो जाने से कालान्तर में मृत्यु हो सकती है ऐसा माना है । यह area का na star-नोपेश्वेत नृनं गर्भ मुहूर्त्तमपिण्डिन । मग कर्तव्य छैनन्न-विजानना ॥ मृने चोत्तानाया सयिन्यानागतमनुलोममेत्राब्टेव । | जीवित गर्म हो तो उसे निम्न उपायों से निकाले - जीत्रति गर्भे मनिका निर्हरणे प्रयत्नेन । निशम्ये अवमान मन्त्रारम्भृणु-औवधानि च विन्ध्याद् ययोक्तानि । शस्त्रद्वारणनिषेध: -सचेतन शस्त्रे न कथन वारयेत् । दार्यमाणो हि जननी-मान्मानन धानयेत् । अपि तु कुक्षिपाटनद्वारा जीवन्त गर्न निर्हरेत् । इत्यायुर्वेदतवसन्दीपिकामापायां मूढगर्भनिदानं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ 7
I
नवमोऽध्यायः ।
अथातो विद्रधीनां निदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके अनन्तर यहाँ से विद्रधियों के निदान का वर्गन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥
सर्वामरगुरुः श्रीमान्निमिनान्तर भूमिपः ।
शिष्यायोगच निखिलमिदं विद्रधिलक्षणम् ॥ ३ ॥
देवताओं के गुरु गोभा से युक्त, आयुर्वेदोपदेश के निमित्त काशिराज के कुछ में भूमिपालक के रूप में अवतीर्ण हुये भगवान् धन्वन्तरि ने शिष्य सुश्रुत के लिये वक्ष्यमाण सम्पूर्ण विधिलक्षणों को कहा ॥ ३ ॥
विमर्श ' - निमिचान्नरभूमि तस्नात्व पृथिवी याहि काशीनध्ये नृपो भव । प्रतीकारान रोगानामायुर्वेद प्रजाशय ॥ ( भागवतम् )
त्वप्रक्तमांसमेदांसि प्रदूष्यास्थिसमाश्रिताः ।
दोषाः शोफं शनैर्घोरं जनयन्त्युच्छ्रिता भृशम् ॥ १ ॥
महामूलं रुजावन्तं वृत्तं चाप्यथवाऽऽयतम् ।
तमाहुर्विद्रधिं वीरा विज्ञेयः स च पड्विधः ॥ ५ ॥
पृथग्दोषैः समस्तैश्च क्षतेनाप्यसृजा तथा ।
परागामपि हि तेषान्तु लक्षणं सम्प्रवक्ष्यते ॥ ६ ॥
/ विवि सम्प्राप्ति - मिथ्याहारविहारों से अत्यन्त ( भृशं ) कुपित ( उच्छ्रित ) हुये वातादि दोष प्रथम त्वचा, रक्त, मांस और मेदोधातु को दूषित करके अस्थि के अन्दर आश्रित होकर धीरे धीरे भयङ्कर गोथ उत्पन्न करते हैं । जब यह शोथ महा-मूल ( अस्य्यादि गम्भीर धातु - समाश्रित ), पीडायुक्त, गोल अथवा आयत ( दीर्घ, फैला हुआ ) हो जाता है तब विद्वान् उसे विधि कहते हैं । पृथक - पृथक दोषों से तीन तथा तीनों मिलित दोपों से एक, चत से एक तथा रक्त से एक ऐसे वह विद्रधि छ प्रकार की होती है । अब उन छहों के लक्षण कहे जाते हैं ॥ १-६ ॥ विधिः- ' विनोति विद्रधिः तथा च चरक नप्तैः गलैर्नया मध्ये करिव दह्यते । स वै शोत्रविदाहित्वाद्विद्रधीत्यभिवीयते ॥ दुष्टरकातिमात्रत्वात् स वै शीघ्र विदह्यने । ततः शीत्रविदाहित्वाद्रि-बीत्यभिवयते ॥ विद्रधि को एसीस ( Abscess ) कहते हैं । तया प्रत्यक्ष है । मृतगर्भ हो तो उसे तुरन्त निकालना सम्मत यह शोध की पावस्था है । आमावस्या में इसे शोथ या चाहिये- Inflamation ही कहेंगे । वाह्य तथा आभ्यन्तरभेद से दो
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श्रध्यायः ९ ] निदानस्थानम् । २६३ प्रकार की होती है यथा — विद्रर्थेि द्विविधामाद्दुर्वाह्मामाभ्धन्तरीं तथा । ( चरकः ) ।
कृष्णोऽरुणो वा परुषो भृशमत्यर्थवेदनः ।
चित्रोत्थानप्रपाका विद्रधिर्वातसम्भवः ॥ ७ ॥
वातिक विद्रधि - रंग में काली, कुछ लाल, कठोर, अधिक पीढ़ाकर, अनेक प्रकार से उठने तथा पकने वाली होती है ॥७ ॥
पक्कोदुम्बरसङ्काशः श्यावो वा स्वरदाहवान् ।
क्षिप्रोत्थानप्रपाका विद्रधिः पित्तसम्भवः ॥ ८ ॥
~ पैत्तिक विद्वद्धि -- पके हुए गूलर फल के समान, कुछ श्याव, ज्वर और दाहयुक्त तथा जल्दी उठने और पकने वाली होती है ॥ ८ ॥
शरावसदृशः पाण्डुः शीतः स्तव्धोऽल्पवेदनः ।
चिरोत्थानप्रपाकश्च सकण्डुश्च कफोत्थितः ॥ ६ ॥
कफज विधि - शराब के समान फैली हुई, पाण्डु, शीत, कडी, अल्पपीडाकर, देर से उठने तथा पकने वाली और कण्डयुक्त होती है ॥ ९ ॥
तनुपीतसिताञ्चैषामास्रावाः क्रमशः स्मृताः ॥ १० ॥
इन विधियों का स्त्राव कम से वातिक का पतला या थोड़ा, पैत्तिक का पीला और श्लैष्मिक का श्वेत होता है ॥ १० ॥
नानावर्णरुजात्रावो घाटालो विषमो महान् ।
विषमं पच्यते चापि विद्रधि. सान्निपातिकः ॥ ११ ॥
~ सान्निपातिक विधि — अनेक प्रकार के रंग, पीड़ा और स्राव वाली, घाटाल ( उभरी हुई ), टेढ़ी - मेढी, बढी तथा विषमरूप से पकने वाली होती है ॥ ११ ॥
विमर्श - वटा कृत्तटिकेोच्छ्रितपार्थोऽस्यास्तीनि घाटाल. ॥
तैस्तैर्भावैरभिहते क्षते वाऽपध्यसेविनः ।
क्षतोष्मा वायुविसृतः सरक्तं पित्तमीरयेत् ॥ १२ ॥
स्वरस्तृष्णा च दाहश्च जायते तस्य देहिनः ।
एष विद्रधिरागन्तुः पित्तविद्रधिलक्षणः ॥ १३ ॥
~ आगन्तुक विद्वधि— काष्ठ, लोष्ट, पाषाण आदि से चोट लगने पर या क्षत होने पर तथा मिथ्या आहार - विहार सेवन करने वाले को वायु से प्रेरित क्षत की उष्णता रक्तसहित पिचको कुपित कर देती है जिससे ज्वर, प्यास तथा दाह उत्पन्न होता है । यह पित्तज विद्रधि के लक्षणों वाली साग-न्तुक विद्रधि है ।
कृष्णस्फोटावृतः श्यावस्तीत्रदाहरुजाकरः ।
पित्तविद्रधिलिङ्गस्तु रक्तविद्रधिरुच्यते ॥ १४ ॥
रहनविद्रधि --- काले फोडे - फुन्सियों से युक्त, श्याव, तीव्र दाह, पीडा तथा ज्वर वाली एवं पित्तज विद्रधि के लक्षणों से युक्त रविद्रधि होती है ॥ १४ ॥
उक्ता विद्रवयो ह्येते तेष्वसाभ्यन्तु सर्वज्ञः ।
आभ्यन्तरानतस्तूर्ध्व विद्रधीन् परिचक्षते ॥ १५ ॥
— असाध्य विद्रधि - ये छ प्रकार की विधियां कह दी है । इनमें सान्निपातिक विद्रधि जसाध्य होती है । अब इसके मनन्तर आभ्यन्तरिक विद्रधियों का वर्णन करते हैं ॥ १५ ॥
गुर्वंसात्म्यविरुद्धान्नशुष्क संसृष्टभोजनात् ।
अतिव्यवायव्यायामवेगाघातविदाहिभिः ॥ १६ ॥
पृथक् सम्भूय वा दोषाः कुपिता गुल्मरूपिणम् ।
वल्मीकवत्समुन्नद्धमन्तः कुर्वन्ति विद्रधिम् ॥ १७ ॥
अन्तर्विद्रधिवर्णन -गरिष्ठ, असात्म्य, विरुद्ध, शुष्क तथा पथ्यापथ्य मिलित भोजन से एवं अधिक स्त्रीसम्भोग, व्यायाम और अवारणीय वेगों के रोकने से तथा दाहजनक पदार्थों के खाने से अलग अलग या मिले हुये कुपित द गुल्म ( गोले ) के स्वरूप की और वल्मीक के समान ऊंची उठी हुई अन्तविधि को पैदा करते हैं ॥ १६-१७ ॥ विमर्श - अष्टाङ्गसग्रहे वाह्यान्तविद्रधिस्वरूपन्- ' बाह्योऽत्र तत्र
तत्राने दारुगो ग्रथितोन्नत ' । बान्तरो दारुगतरो गम्भीरो गुल्मत्रदन ॥
। वल्मीकवत्समुच्छ्रायी शीत्रवात्यग्निशस्त्रवत् ' ।
गुढे बस्तिमुखे नाभ्यां कुक्षौ बहुगयोस्तथा ।
वृक्कयोर्यकृति प्लीहि हृदये क्लोम्नि वा तथा ॥ १८ ॥
यह अन्तर्विद्रधिगुदा, बस्तिमुख, नाभि, कुक्षि, वंक्षण, वृक्क, यकृत, प्लीहा, हृदय तथा क्लोम में होती है ॥ १८ ॥
। विमर्श:: -- -- चरक ने भी अन्तर्विद्रधि के ये ही स्थान माने हैं । वाग्भट ने इन स्थानों में वाह्य विद्रधि होना भी लिखा है । वस्तुतस्तु चरको बाह्य रोगमागों में उत्पन्न बाह्यविधि तथा मध्यम और आभ्यन्तरीय रोगमागों में उत्पन्न अन्तर्विद्वधि माननी चाहिये । अथवा स्वचा, मांस, स्नायु में उत्पन्न । तथा अन्तः शरीर में उत्पन्न अन्तर्विद्रधि हो सकती है - वह्या-स्त्वक्स्नायुमांसोत्थाः कम्डरामा महारज । अन्त. शरीरे मासाटक प्रविशन्ति यत्रा मलाः ॥ तदा सज्ञायते ग्रन्थिर्गम्मीरस्थ सुदारुण ॥ ( च. सू १७ ) । निम्न विधियां नाभ्यन्तरिक विधियां हैं-यकृत् विद्रधि ( Liver abscess ), प्लीहविद्रधि ( Splenic abscess ), सपूय हृदयशोथ ( Parulent pericarditis ), वृक्कविद्रधि ( Perinephritic abscess ), Lumber abscess, gefagfa ( Ischio - rectal abscess ), Prostatic abscess, दक्षिण वक्षणविद्रधि ( Appendicular abscess ), वंक्षणविद्रधि ( Psoas abscess Subphrenic abscess, peritonsillar abscess, | lung abscess, Brain abscess क्लोम शब्द को भिन्न भिन्न | विद्वानों ने प्रसनिका ( Pharynx ), पित्ताशय ( Gall bla-| dder ), अग्न्याशय ( Pancreas ), श्वासनलिकाएं ( Bronchi ), बलप्रपा ( Cysterna Chyli ), आदि अर्थों में माना है किन्तु क्लोम से पित्ताशय का ग्रहण करना अधिक प्रमाणों से सिद्ध है । क्लोम च यक्कृश्च, क्लोम कालखण्डा ( यकृता ) दथलात् स्थितं दक्षिणपार्श्वस्थं निलमिति प्रसिद्धन् । ( ढल्हण ) । तिल्न्तु शोणित-विम्वं दक्षिणाश्रित यकृत्समीपे क्लोमकं भवति । ( शार्ङ्गधर टीका ) । अरस्तु दक्षिणे भागे हृदयात क्लोन निष्ठनि । जलवाहि-तिरामूलं नृष्णाच्छादनकृन्मतम् ॥ ' इति । दाहोर्द्वयोर्नध्ये वक्षम्नन्नध्ये हृदय तत्पार्श्वे क्लोन पिपासास्थानमिनि वैद्या । आादि । विशेष वर्णन घाणेकर जी की सुश्रुत टीका शा. अ में पे.नं. ११४ देखें ॥ तेषां लिङ्गानि जानीयाद्वाह्यविद्रधिलक्षणैः ।
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I सुश्रुतसहिता ।
यामपक्वैपणीयाच पक्कापक्कं विनिर्दिशेत् ॥ १६ ॥
इन अन्तर्विद्रधियों के ढोपज लक्षण बाह्यविद्रधिलक्षणों के ढोपन लक्षणों के अनुसार ही जानने चाहिये तथा इनके पक और अपक के लक्षण आमपकेपणीय नामक सूत्र स्थान के १७ वें अध्याय से जान लेने चाहिये ॥ १ ९ ॥ अधिष्टानविशेषेण लिङ्गं शृणु विशेषत ॥ २० ॥
अब इन विधियों के अधिष्ठान - विशेष के अनुसार जो विशिष्ट लक्षण होते हैं उन्हें सुनो ॥ २० ॥
गुदे चातनिरोधस्तु वस्तौ कृच्छ्राल्पसूत्रता ।
नाभ्यां हिक्का तथाऽऽटोपः कुक्षौ मारुतकोपनम् ॥ २१ ॥
कटीपृष्टग्रहस्तीत्रो मोत्ये तु विद्रधौ ।
वृक्कयोः पार्श्वसङ्कोचः प्लोह्रद्युच्छ्वासावरोधनम् ॥ २२ ॥
सर्वाग्रहस्तोत्रो हृदि शुलच दारुणः ।
श्वासो यकृति तृष्णा च पिणसा क्लोमजेऽधिका ॥ २३ ॥
गुहा के अन्दर विधि होने से वात ( तथा मल ) का अवरोध, बस्ति में होने मे मूत्रत्याग में कठिनाई तथा मूत्र की अक्षता, नाभि में होने से हिक्का तथा आटोप, कुति में हो सो वायु का प्रकोप, वंक्षण में हो तो कमर और पीठ को ती जकड़न, वृद्धों में होने से पार्श्वसङ्कोच, प्लीहा में होने से श्वास में रुकावट, हृदय में होने से सारे शरीर में तीच जकड़न तथा हृदय में दारंग शूल, यकृत में हो तो श्वास और प्यास तथा क्लोम में विधि होने से श्वास के सिवाय प्यास अधिक लगना ये लक्षण होते हैं ॥ २१-२३ ॥ चिमर्गः - चरको विशिष्टलक्षणानि – ' स्निजाया कृच्छ्रपूति-सूनवर्चस्व, कुक्षिजाना कुचिराश्रन्नगसशुल, बनाया सक्थि सार, वृकजार्या पृष्टकटिग्रह, नत्र प्रधानमर्मजाया ( हृन्यजाया ) या नमक मोरकामश्वामा, क्लोमजाया पियामामुख-श्रीषगलना । ( च. सू. अ. १७ ) । हाराणचन्द्र जी ने अपनी सुश्रुत में ' य ' के स्थान में ' बुक्कयो ' ऐसा पाठान्तर मान कर उसका अर्थ हृदयावरण किया है । ' उक्की नाम दे हृदया चरणे ' ।
आमो वा यदि वा पक्को महान वा यदि वेतर ' ।
स मर्मात्थितश्चापि विद्रधिः कष्ट उच्यते ॥ २४ ॥
/ माध्यामाध्यन्त्रण - मर्मस्थान में उत्पन्न विद्रधि चाहे आम ( क्ची ) हो या पक हो, बढ़ी हो या छोटी हो सब कष्ट-माध्य होती है ॥ २१ ॥
नाभेरुपरिजाः पक्ना यान्त्यूर्ध्वमितरे त्वधः ।
जीवत्यो निःस्रुतेषु स्तेपृध्यं न जीवति ॥ २५ ॥
नामिति ये तेषु भिन्नेषु वाह्यतः ।
जीवेत्कदाचित् पुरुषो नेतरेषु कदाचन ॥ २६ ॥
नावनिर्गममार्ग - नाभि से ऊपर अर्थात् यकृत् क्लोम - प्लीहा-ग्रहणी, आमाशय, हृदय आदि में होने वाली विद्रवियां पकने पर ऊपर की ओर जा कर मुख - नामादि से झरती हैं किन्तु नाभि से नीचे वृक्कयति वंक्षण गुदा में हो कर पकने वाली विधियां नीचे के गुढ़ा और मूत्र मार्ग से झरती हैं । इनमे नीचे की ओर द्रुत होने वाली विधियों में मनुष्य ठीक हो जाता है किन्तु ऊपर मुखादि से स्रुत होने वाली विधियों में जीवित नहीं रह सकता है । हृदय, नाभि और वस्ति को छोड़ कर अन्य स्थानों में होने वाली विधियां यदि भाग्यवश बाहरी त्वचा में विदीर्ण हो ( फूट ) जाती हैं तब मनुष्य कदा-चित् जीवित रह सकता है किन्तु इतर अर्थात् हृदय, नाभि और वस्ति की विधियों में ( चाहे वे बाहर भी फूटें तो भी ) मनुष्य कभी भी जीवित नहीं रह सकता ॥ २५-२६ ॥ विमर्श: -- चरक ने नाभिज विधि का स्त्रवण उभयमार्ग से माना है— पक्त्रप्रभिन्नानासु मुसात् स्राव स्त्रवनि, अधोजासु गुदा, उभयतस्तु नाभिजानु ' ( च ० सू ० अ ० १७ ) तथा यही भाव हारीत के भी हैं - प्रभिन्नेषु मुखान्नगणा प्रवर्ततेऽसृक्स • हितोऽपि पू. अव प्रभिन्नेषु च पायुमार्गाद् द्वाभ्या प्रवृत्तिस्त्विह नाभिजेषु ॥ ( हारीतः ) । माधव ने विद्रधियों को निम्न उपद्रव होने पर असाध्य मानी है - आध्मात वद्धनिष्यन्द छर्दिहिकातृपान्वितम् । रुजाश्वाससमायुक्त विद्रधिर्नाशयेन्नरम् । विद्रधीनां भोजोकसाध्यासाध्यविचारः -- ' असाध्यो मर्मंनो शेय ’ पवो s पक्वश्च विद्रधि । सन्निपातोत्थितोऽप्येव पक्ा तु वस्तिन । वग्जो नामेरो यश्च साध्यो मर्मसमीपजः । अपक्वश्चैव पक्चश्च साध्यो नोपरिनाभिज. ॥ ' इति ।
स्त्रीणामपप्रजातानां प्रजातानां तथाऽहितैः ।
दाहवरकरो घोरो जायते रक्तविद्रधिः ॥ २७ ॥
अपि सम्यक् प्रजातानामसृक् कायादनिःसृतम् ।
रक्त विद्रधिं कुर्यात् कुक्षौ मक्कल्लसंज्ञितम् ॥ २८ ॥
सप्ताहान्नोपशान्तश्चेत्ततोऽसौ सम्प्रपच्यते ॥ २६ ॥
रविधि - अपनात अर्थात् गर्भस्राव और गर्भपात होने पर तथा प्रजात अर्थात् योग्य समय पर प्रसव होने पर जो स्त्रियां अहितकर आहार - विहार करती हैं उससे उनके ढाह तथा ज्वर को करने वाली घोर ( भयङ्कर ) रक्तविद्रधि होती है तथा योग्यरूप से प्रसव होने पर भी जिन स्त्रियों के शरीर ( गर्भाशय ) से अशुद्ध रक्त पूर्ण रूप से नहीं निकलता है तब वह रक्त कुचि ( गर्भाशय ) मैं मल्लसंज्ञक रक्तविद्वधि पैदा करता है । यदि मक्कल विधि सात दिन में शान्त न हो तो फिर पक जाती है ॥ २७-२९ ॥ विशेषमथ वक्ष्यामि स्पष्टं विद्रधिगुल्मयोः ।
तुल्यदोप समुत्थानाद्विद्रघेर्गुल्मकस्य च ।
कस्मान्न पच्यते गुल्मो विद्रधिः पाकमेति च ॥ ३० ॥
इसके अनन्तर विद्रधि और गुल्म के भेद ( विशेषता ) को स्पष्ट रूप से कहता हूं । विद्रधि और गुल्म दोनों समान दोष से उत्पन्न होते हैं फिर क्या कारण है कि गुल्म पकता नहीं है तथा विधि पकती है ॥ ३० ॥
न निवन्धोऽस्ति गुल्मानां विद्रधिः सनिबन्धनः ।
गुल्माकाराः स्वयं दोपा विद्रधिर्मासशोणिते ॥ ३१ ॥
( गुल्म विद्रधिभेद - ( १ ) गुल्मों का निबन्ध ( मांस - रक्तादि दूप्यों का मूल या बन्धन ) नहीं होता है किन्तु ि निबन्धसहित होती है । ( २ ) गुल्म में वातादिदोष स्वयं गुल्म ( गोले ) के स्वरूप में हो जाते हैं किन्तु विधि मांस | और रक्त में बनती है अर्थात् मांस और रक्त स्वयं पक कर
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सुश्रुतसंहिता | २६६ दशमोऽध्यायः । | अथातो विसर्पनाडीस्तनरोगनिदानं व्याख्यास्यामः ॥१ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अव इसके अनन्तर विसर्प, नाडी तथा स्तन रोग के निदान का वर्णन करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ त्वङ्मांसशोणितगताः कुपितास्तु दोषाः सर्वाङ्गसारिणमिहास्थितमात्मलिङ्गम् । कुर्वन्ति विस्तृतमनुन्नतमाशु शोफं तं सर्वतो विसरणाच्च विसर्पमाहुः ॥ ३ ॥
मिथ्या आहार - विहार से कुपित हुये वातादि दोष त्वचा, ( तथा लसीका ), मांस और रक्त में जाकर सर्व अह्नों में फैलने वाले, किसी एक जगह स्थित नहीं रहने वाले, अपने अपने वातादि दोपों के लक्षणों से युक्त, विस्तृत तथा अल्प उभार वाले शोथ को शीघ्र पैदा करते हैं । सारे शरीर में चारों ओर विसर्पित होने ( फैलने ) के कारण उसे विसर्प कहते हैं ॥ ३ ॥
विमर्श. - विसर्प के दूष्यों में लसीका का पाठ होने से स्वरूपी आश्रय ग्रहण से स्वगाधित लसीका भी गृहीत होती है जैसा कि माधवकर ने कहा है - रक्त लसीका स्वङ् मास दूष्प दोषास्त्रयो मला । विसर्पाणा समुत्पत्तौ विज्ञेया सप्त धातन । विसर्प शरीर के बाहर अन्दर सभी तरफ फैलता है अतः इसे सर्वाङ्गसारी कहा है - हि थित चितचान्तस्तथा चोभयसथित । विसप वलमेतेषा क्षेय गुरु नयोत्तरम् ॥ इहास्थितम् - इह उत्पत्ति स्थाने अस्थिनमस्थिरम् । दूसरे स्थान पर आक्रमण करते समय पूर्व स्थान को छोड देता है यह इसमें विशेषता है । विसर्प संज्ञा — विविध सर्पति यतो विसर्पस्तेन सहित । परिसर्पोऽथवा नाम्ना सर्वत परिसर्पणात् ॥ ढाक्टरी में इसे इरिसीपेलस ( Erysipelas ) कहते हैं । इस रोग का प्रधान कारण Streptococus erysipelatis है जो कि क्षत द्वारा त्वचा में प्रविष्ट हो के रोग को पैदा करता है ऐसे को क्षतज विसर्प ( Tramatio ) कहते है तथा चत के सूक्ष्म होने पर उसका ज्ञान न होते हुए भी विसर्प उत्पन्न हो उसे दोपज या Idiopathic निसर्प कहते हैं । सहायक कारण — घुक्क तथा यकृत् के रोग, मद्य का अतिपान, सील तथा गन्दे मकानों में रहने से तथा मासूरिक और आन्त्रिक, ज्वर में उपद्रव के रूप में होता है! जीवाणु प्रथम स्वचा, वहां से लसीका में जाकर चारों ओर फैलते हैं जिससे उस स्थान में सूजन, लालिमा और दाह होता है | कुछ जीवाणु तथा उनके विप के रक्त में प्रविष्ट होने से ज्वर, बेचैनी आदि सार्वदेहिक लक्षण भी होते हैं ।
वातात्मकोऽसितमृदुः परुपोऽद्गमर्द-सम्भेदतोदपवनज्वर लिद्गयुक्त ' ' ।
गण्डैर्यदा तु विपमैरतिदूपितत्वा-द्युक्तः स एव कथितः खलु वर्जनीयः ॥ ४ ॥
चातिक त्रिसर्प- काला, मुलायम तथा खुरदरा होता है तथा भङ्गों में वेदना, फूटनी, सूई चुभोने की सी पीड़ा तथा वातज्वर के लक्षणों से युक्त होता है किन्तु जब लसीका, रक्त तथा मांसादिकों के अधिक दूषित होने से वही विसर्पविषम गण्ड ( विस्फोटों ) से युक्त होता है तव वह चिकित्सा दृष्टि से वर्जनीय है ॥ ४ ॥
विमर्श: गण्डै. - अग्निदग्धदेशसदृशै. स्फोटैर्युक्त इति सम्ब • न्धस्तदुक्तम्- " अग्निदग्ध व स्फोटै शीघ्रगत्वाद द्रुत सच । मर्मा नुसारी वीसर्प स्याद्वातोऽतिबलस्तत ॥ " पित्तात्मको द्रुतगतिर्व्वरदाहपाक-स्फोटप्रभेदबहुलः क्षतजप्रकाशः । दोषप्रवृद्धिहत मांस सिरो यदा स्यात् स्रोतोजकर्दमनिभो न तदा स सिध्येत् ॥ ५ ॥
पित्तात्मक विसर्प - शीघ्र फैलने वाला एवं ज्वर, दाह, पाक तथा अनेक प्रकार के फोढे फुन्सियों से युक्त तथा रक्त के समान लालवर्ण सा होता है । किन्तु जब दोपों के अधिक बढ़ने से मांस तथा सिराएं नष्ट होकर कृष्णाञ्जन के समान । कर्दम ( कीचढ ) से युक्त होता है तब वह चिकित्सा से ठीक-नहीं होता है ॥ ५ ॥
श्लेष्मात्मकः सरति मन्दमशीघ्रपाकः स्निग्धः सितश्वयथुरल्परुगुप्रकण्डुः । सर्वात्मकस्त्रिविधवर्णरुजोऽवगाढ. पको न सिध्यति च मांससिराप्रणाशात् ॥ ६ ॥
श्लेष्मात्मक विसर्प — धीरे धीरे फैलता है, जल्दी पकता नहीं है तथा चिकना, श्वेतशोययुक्त, अल्प पीडादायी किन्तु तीव्र कण्डु वाला होता है तथा सर्वात्मक या सान्निपातिक विसर्प - तीनों दोषों के रूप ( कृष्ण - पीत - सित ) और वेदनाओं ( तोद, दाह, कण्डु ) से युक्त एवं गम्भीर धातुगत होता है तथा पक जाने पर मांस और सिराओं का विनाश कर देने से ठीक नहीं होता है ॥ ६ ॥
सद्यः क्षतत्रणमुपेत्य नरस्य पित्तं रक्तञ्च दोपबहुलस्य करोति शोफम् । श्यावं सलोहितमतिज्वरदाहपाकं स्फोटैः कुलत्थसदृशैरसितैश्च कीर्णम् ॥ ७ ॥
क्षतजन्य विसर्प - बढ़े हुए दोपों से युक्त मनुष्य के पित्त और रक्त सद्यःक्षत से उत्पन्न हुये व्रण में जाकर शोफ पैदा करते हैं जो कि कुछ श्यात्र ( काला ), रक्तवर्ण, तीव्रज्वर, दाह और पाक से युक्त एवं कुलस्थी के स्वरूप के काले फोड़ों से युक्त होता है ॥ ७ ॥
विमर्श: - सद्य. दत व्रण - शखप्रहार, शस्त्रकर्म, प्रसव के समय, नाभिनालच्छेदन के समय तथा मसूरिका का टीका लगाने पर आदि अनेक प्रकार से सद्यःक्षत होता है और सावधानी या सफाई न करने से इस समय विसर्पजनक जीवाणु प्रवेश हो सकते हैं । भोज ने क्षतज विसर्प का निम्न वर्णन किया है -- शस्त्रप्रहारैस्तैस्तैस्तु व्याडदन्तनखैरपि । क्षते-वाऽप्यथवा भग्ने हुदोपस्य देहिन. | रक्त पित्तञ्च बहुल व्रणमाशु । प्रपद्यते । कुरुतस्ते समेते तु व्रणशोथ सुदारुणम् ॥ आचित तनुवि-
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श्रध्यायः १० ] निदानस्थांनम् । ३६७ ate: कृष्णैः पीतकसन्निये । पित्तवीसर्पवल्गि तस्य शेष विनिर्दि-शेत् ॥ चरक ने विसर्प के सात भेढ़ माने हैं उनमें क्षतविसर्प का वर्णन स्वतन्त्र नहीं आता है- ' सप्त विसर्पा इति, वातपित्त-कफाग्निकर्तृमनन्थिसन्निपाताख्या. ' किन्तु विसर्प के निदान लिखने में व्रत का उल्लेख अवश्य किया है— प्रत्यादानाद्दिवग-स्वप्नादजीर्णाव्यशनात क्षनात् । वववन्यप्रपतनाद् दृष्ट्रादन्तनखक्ष-ताद । डाक्टरी में सभी विसर्प चतज ही होते हैं । चरकोछ अग्नि, कर्म तथा ग्रन्थिक विसपों का वर्णन सुश्रुत में नहीं । है तो भी वे प्रायः वातादिदोपन ही होते हैं - भाग्नेयो वात-पित्ताम्या ग्रन्थ्याख्य. कफवातज । यस्तु कर्तनको घोरः स पित्त-कफसम्भव | अग्निविसर्पलक्षणम् - मातपित्तं प्रकुपितमतिमात्र स्वहेतुमिः । परस्परं लब्बवलं दहदू गात्र विसर्पति ॥ तदुताणदातुरः सर्वशरीरमङ्गारैरिवाकीर्यमाणं मन्यने । अग्निदग्धप्रकारैश्च स्फोर्टर-पीते ॥ ( चरक ) । इसका समावेश सुश्रुत के वातज विसर्प में करना चाहिये | कर्डमविसर्पलक्षणम् गभीरपाक प्राज्योष्मा
सृष्ट क्लिन्नोऽवदीर्यते । पङ्कवच्चीर्णमासश्च सहस्नायुसिरागण ॥ ।
शत्रगन्धी च वीसर्गः कर्डनाख्यमुशन्ति तन् ॥ ( अ ० सं ० ) । यह त्वचा तथा उपत्वचा में गम्भीर पाक होने से होता है । अतः इसे Cellulo - cutaneous arysipelas कह सकते हैं । यह सुश्रुत के पित्तजविसर्प में समाविष्ट हो सकता है । ग्रन्थिचि सर्पलचणम् — दूषयित्वा दीर्घाणुवृत्तम्यूडखरात्मनाम् । ग्रन्थीना कुरते नाला सरक्तां तीव्ररुग्ब्वरान् ॥ ( अ ० सं ० ) । अयञ्च ग्रन्थि-विसर्पः सुश्रुतेऽपचीसंशया पठ्यते । ऐसा मधुकोप, व्याख्या में लिखा है । किन्तु इन दोनों में ग्रन्थियों के सिवाय अन्य तुल्यता नहीं है अतएव चिन्त्य है । सिध्यन्ति वातकफपित्तकृता विसर्पाः सर्वात्मकः क्षतकृतश्च न सिद्धिमेति । पैत्तानिलावपि च दर्शितपूर्व लिङ्गौ सर्वे च मर्मसु भवन्ति हि कृच्छ्रसाध्याः ॥ ८ ॥
साध्यासाध्यविचारः -- वात, कफ और पित्त से उत्पन्न विसर्प योग्य चिकित्सा से ठीक हो जाते हैं किन्तु त्रिदोषज एवं चतजन्य त्रिसर्प असाध्य हैं । पूर्व में कहे लक्षणों से युक्त पैत्तिक तथा वातिक एवं मर्म स्थानों में उत्पन्न हुये सर्व प्रकार के विसर्प कृच्छ्रसाध्य होते हैं ॥ ८ ॥
विमर्शः - भोजमतेन साध्यासाध्यतावस्तु क्षनजस्तेषा सन्निपातात्तु यो भवेत् । मियजा जानता त्याच्या सर्व एव तु मर्मजाः ॥ चरके साध्यासाध्यता - वहिर्मागत्रिनं साध्यमसाध्यमु-भवातिन् । विसर्प ढारुग विद्यात् सुकृच्छ्र त्वन्तराश्रयम् ॥ यस्य सर्वाणि विज्ञानि बलवद्यस्य कारणम् । यस्य चोपद्रवा कष्टा मर्मगो चश्च हन्ति सः ॥ विसर्पोपद्रवा - ज्वरातिसारी वमथुस्त्वङ्मासढरण क्लमः । अरोचकाविपाकौ च विसर्पाणानुपद्रवा ॥ मस्तिष्कावरण शोय ( Meningitis ), अन्तर्हृदयावरणशोथ ( endocarditis ) जीवाणुमयता ( Septicaemia ), तथा विषमयता ( Toximia ) होने पर विसर्प असाध्य होता है । शोफं न पक्कमिति पक्कमुपेक्षते यो यो वा त्रणं प्रचुरपूयमसाधुवृत्तः । अभ्यन्तरं प्रविशति प्रविदार्य तस्य स्थानानि पूर्वविहितानि ततः स पूयः ॥ ६ ॥
तस्यातिमात्रगमनाद्गतिरित्यतश्च नाडीव यवहति तेन मता तु नाडी । दोपैस्त्रिभिर्भवति सा पृथगेकशश्च सम्मूच्छितैरपि च शल्यनिमित्ततोऽन्या ॥१० ॥
अनुचित ( शास्त्रविपरीत ) कर्म करने वाला वैद्य पके हुये शोफ को भी अपक्व समझ कर उपेक्षा कर देता है अथवा जो वैद्य अधिक पूय वाले व्रण की उपेक्षा कर देता है तब वह पूय पूर्वविहित स्थानों को विदीर्ण करके भीतर की ओर गम्भीर स्थानों ( आशयों या धातुओं ) में प्रवेश करता है । इस तरह इस पूय के भीतर की ओर अधिक मात्रा में गमन करने से गति संज्ञा तथा नाड़ी अर्थात् नाली में जल वहने की तरह पूय के बहने से नाडी कहलाता है । नाडीभेद - वातादि पृथक् पृथक् दोषों से तीन तथा सन्निपात से एक एवं दो दो दोषों से तीन एवं शल्य के कारण एक ऐसे नाडी के आठ भेद होते हैं ॥ ९ -१० ॥ विमर्श: - नाडी को सायनस ( Sinus ) या फिस्चुला ( Fistula ) कह सकते हैं । सायनस उसे कहते है जिसका एक मुख बाह्य वचा पर खुलता हो तथा दूसरा मुख पाक-स्थान से सम्बन्धित हो । दो पाकस्थानों को मिलाने वाली नाडी भी सायनस होती है । फिस्चुला उसे कहते हैं जिसकी नाढी दो भाशयों को या आशय और बाह्यत्वचा को मिलाती हो तथा सहज ( Congenital ) या जन्मोत्तर ( Acquired ) हो जैसे भगन्दर वस्ति और योनि को मिलाने वाली नाडी ( Vesico vaginal Fistula ) तथा वस्तिमलाशय नाडी ( Recto - Vesical Fistula ) आदि । नाडीव्रणकारण - ( १ ) पाकस्थान में शस्त्रकर्म के समय सूत्र, रेशम, हड्डी का टुकडा रह जाने से, ( २ ) पूय का पूर्ण निर्हरण न होने से, ( ३ ) a णयुक्त अंग को विश्राम ( Rest ) न मिलने से, ( ४ ) तय • लत्रण ( Taburcular ulcer ) से, ( ५ ) रोगी के दुर्बल होने से, ( ६ ) त्रण के आस - पास तान्तवधातु ( Fibrous tissue ) अधिक होने से तथा ( ७ ) बाह्यत्वचा के सैल व्रण-| सुख के भीतर उत्पन्न होने से एवं ( ८ ) मूत्र, मल और पृथ कात्रण के साथ सम्पर्क होने से नाडीव्रण बनता है । भेद - कुछ आचार्यों ने नाही के पांच भेद होते हैं ऐसे इस श्लोक का किया है । अन्ये तु - त्रिभिर्दोषैः पृथक् तिस्रः व्याख्यान , एकश. सम्मूच्तिरन्या सान्निपातिकी, शल्यनिमित्ता च पञ्चमोति पञ्चैव नाव्य इत्येव व्याख्यामाहु । तत्रानिलात्परुपसूक्ष्ममुखी सशूला फेनानुविद्धमधिकं स्रवति चपायाम् 1 वृत्तापतोदसदनज्वरभेदहेतुः पित्तात् ॥ ११ ॥
पीतं स्रवत्यधिकमुष्णमहःसु ज्ञेया कफाद्बहुघनार्जुनपिच्छिलास्रा रात्रिस्रुतिः स्तिमितरुक्कठिना सकण्डुः । दोषद्वयाभिहितल नणदर्शनेन तिस्रो गतीर्घ्यतिकरप्रभवास्तु विद्यात् ॥ १२ ॥
वात से उत्पन्न नादी स्पर्ग में कठोर, सूक्ष्म मुख वाली तथा शुलयुक्त होती है एवं रात्रि के समय फेनयुक्त स्राव
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III सुश्रुतसहिता । आयम्यते व्यध्यत एति तोदूं प्रत्यस्यते कृत्यत एति भेदम् । कृष्णोऽमृदुर्बस्तिरिवाततश्च भिन्नः स्रवेच्चानिलजोऽस्रमच्छम् ॥ ४ ॥
चातिक ग्रन्थि — सींच कर लम्बी सी होती है, पीढा देती है, सूई सी चुभती है, सींच कर फेंकी सी जाती है, कर्तन या छेदन होने सी तथा भेद को प्राप्त होती है एवं वर्ण में काली, स्पर्श में कढी तथा द्रव सी भरी वस्ति ( मशक ) के समान तनी हुई होती है तथा फूटने पर स्वच्छ स्राव बहाती है ॥ ४ ॥
विमर्श: - ढल्हण ने अस्त्र का अर्थ रक्त किया है परन्तु साव अर्थ ही उपयुक्त है । दन्दह्यते धूपयति चोपवांश्च
पापच्यते प्रज्वलतीव चापि ।
रक्तः सपीतोऽप्यथवाऽपि पित्ता-निः सवेदुष्णमतीव चास्रम् ॥ ५ ॥
पैत्तिक ग्रन्थि - अत्यन्त दाह करती है, धूंआं सा निकालती है या सन्ताप करती है, पकती है, जलती हुई सी प्रतीत होती
है एवं वर्णं में लाल या पीली होती है तथा फूटने पर अत्यन्त ।
उस्राव बहाती है ॥ ५ ॥
शीतोऽविवर्णोऽल्परुजोऽतिकण्डूः पापाणवत्संहननोपपन्नः । चिराभिवृद्धिश्च कफप्रकोपाद भिन्नः स्रवेच्छुक्लघनं च पूयम् ॥ ६ ॥
कफ ग्रन्थि - स्पर्श में शीत, प्राकृतिक वर्णयुक्त अथवा ईपरिकृत वर्णयुक्त, अल्प वेदना चाली, अधिक कण्डुयुक्त, पाषाण के समान कड़ी तथा देर से चढने वाली फूटने पर श्वेत और गाढा पूय बहाती है ॥ ६ ॥
शरीरवृद्धिक्षयवृद्धिहानिः स्निग्धो महानपरुजोऽतिकण्डूः । मेदः कृतो गच्छति चात्र भिन्ने पिण्याकसर्पिःप्रतिमं तु मेदः ॥ ७ मेदोग्रन्थि - शरीर की वृद्धि के साथ बढती होती है तथा ॥ है तथा शरीर के क्षय के साथ घटती है एवं स्पर्श में स्निग्ध, आकार में बढी, tree पीढा तथा अधिक कण्टुकारिणी होती है तथा फूटने पर तिलकी खुली और घृत के समान मेद का स्राव बहाती है ॥७ ॥
व्यायामजातैरबलस्य तैस्तै-राक्षिप्य वायुर्हि सिरामतानम् । सम्पीड्य सङ्कोच्य विशोष्य चापि ग्रन्थि - करोत्युन्नतमाशु वृत्तम् ॥ ८ प्रन्थिः सिराजः स तु कृच्छ्रसाध्यो-भवेद्यदि स्यात्सरुजचलश्च । अरु स एवाप्यचलो महांश्च मर्मात्थितश्चापि विवर्जनीयः ॥ ६ ॥ ॥ सिराज ग्रन्थि - भिन्न भिन्न प्रकार के व्यायाम के कारण हीन पुरुष की प्रकुपित वायु सिराओं के समूह को आि करके सिकोद कर तथा सुसा के शीघ्र ही उठी हुई तथा गोलाकृति की ग्रन्थि पैदा करती है हमे सिराज प्रन्थि कहते हैं । यदि यह ग्रन्थि पीढ़ायुक्त और चल हो तो कृच्छ्रमाध्य होती है और यदि वही पीद्वारहित, अचल, महान् तथा मर्म प्रदेश पर उत्पन्न हो तो वर्जित ( माध्य ) समझनी चाहिये ॥ विमर्श: - सिराजग्रन्थि एन्यूरिज्म ( Aneurism ) कह • लाता है । इसके दो भेद होते हैं । ( १ ) पूर्णविस्फार ( Fasiform ) तथा अपूर्ण विस्कार ( Saoulated aneurism ) । कारण- ~ रक्तवाहिनियों की दीवाल का कमजोर होना भी एक कारण है । यह धमनियों में, धमनी और मिराओं में तथा आघातजन्य ( Trammatio ) ऐसे तीन प्रकार से होता है । वस्तुतस्तु गांठदार अनेक रोग हो सकते हैं -- स ग्रन्थिग्रंथनात् स्मृतः ' ( अ ० स ० ) । चरक ने मांसग्रन्थि रोग भी माना है ' ग्रन्थि महामासभवः ' । अष्टाङ्गसग्रह ने ग्रन्थिरोग नौ प्रकार का माना है- पाल्मासमेदोऽस्विसिरावणमना नव । मांसग्रन्यिलक्षण-मासद्वेषितं मास माहारेर्यन्थिमावहेत् । स्निग्ध महान्त कठिन मिरान कफाकृतिम् ॥ रक्तग्रन्थिलक्षणम् - द्रोपेर्दुष्टेऽसृजि ग्रन्थि •
भवेन्मूर्द्धरम् जन्तुषु । सिरामासन सश्रित्य स स्वापः विश्वलक्षण. ॥
अस्थिग्रन्यिलक्षणम् -मस्थिमगाभिघानाभ्यामुन्नतानत तु यत् । सोऽस्थिग्रन्थिः ॥ व्रणग्रन्थिलक्षणम् - अरू रूढमात्रे वा व्रणे सर्व-रसाशिन | सार्द्धं वा बन्नरहिते गात्रेमाभिहतेऽथवा ॥ वातात. मत दुष्ट सशोध्य ग्रथित व्रणम् । कुर्यात् सदाहः कण्डूमान् व्रण-ग्रन्थिरय स्मृत • ॥ भोज ने ग्रन्थि के पांच भेद माने है -- वैतान-रुजो ग्रन्थीन् मर्मजानचला स्त्यजेत । कपोलगलमन्यासु दुश्चिकि रस्याश्च सन्धिषु ॥ हन्त्रस्थिकत्तात्क्षकबाहुसन्धि-मन्यागपचितं तु मेदः । ग्रन्थि स्थिरं वृत्तमथायतं वा fari atarraat करोति ॥ १० तं ग्रन्थिभिस्त्वामलकास्थिमात्रै-मत्स्याण्डजालप्रतिमैस्तथाऽन्यैः । अनन्यवणैरुपचीयमानं चयप्रकर्षादपचीं वदन्ति ॥ ११ ॥
कण्डूयुतास्तेऽल्परुजः प्रभिन्नाः स्रवन्ति नश्यन्ति भवन्ति चान्ये । मेदःकफाभ्यां खलु रोग एप सुदुस्तरी वर्षगणानुबन्धी ॥ १२ ॥
अपची वर्णन - हत्वस्थि, कक्षा, अक्षकास्थि ॥ तथा बाहु इनकी सन्धियों एवं मन्या और गला इन प्रदेशों में सचित हुआ कफ और मेद ( चरबी ) ग्रन्थि रोग को पैदा करते हैं । यह ग्रन्थि स्थिर, गोल, चौड़ी, चिकनी तथा अल्प पीड़ा युक्त होती है । इस प्रकार आंवले की अस्थि के आकार की अनेक प्रन्थियों के उत्पन्न होने से अथवा मछलियों के अण्डों के जाल ( समूह ) के सदृश अन्य छोटी छोटी तथा स्वचा के समान वर्ण की अनेक ग्रन्थियों के उपचित होने से तथा चय ) ( समय ) के प्रकर्ष ( आधिक्य ) के कारण इन्हें अपची कहा
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श्रध्यायः ११ ] निदानस्थानम् । २७१ जाता है । ये ग्रन्थियां खुजली से युक्त एवं अल्प वेदना वाली वृत्तं स्थिरं होती हैं तथा फूटने पर स्राव बहाती हैं । इस तरह कुछ मन्दरुजं महान्त-ग्रन्थियां नष्ट हो जाती हैं तथा कुछ नई निकल आती हैं । मनल्पमूलं चिरवृद्ध द्यपाकम् ॥ १३ ॥
इस तरह मेद तथा कफ के कारण उत्पन्न हुआ यह रोग कुर्वन्ति मांसोपचयं तु शोफं अत्यन्त दुःसाध्य होता है तथा कई वर्षों तक बना रहता है ॥ तदर्बुदं शास्त्रविदो वदन्ति | विमर्शः -- भोज ने प्रथम कक्षा - चंक्षणादि स्थानों में अपची वातेन पित्तेन कफेन चापि होना लिखा है तथा वही माला के रूप में होती है तब उसे रक्तेन मांसेन च मेदसा च ॥ १४ गण्डमाला कहा है । ' वातपित्तकफा वृद्धा मेदश्चापि समाचितम् । तन्जायते तस्य च लक्षणानि ॥ जमयो ' कण्डराः प्राप्य मत्त्याण्डसदृशान् बहून् । कुर्वन्ति ग्रथिता - ग्रन्थेः समानानि सदा भवन्ति स्तेभ्यः पुन प्रकुपितोऽनिलः । तान् दोषानूर्ध्वगो वक्ष कक्षामन्या- अर्बुदनिदान - शरीर ॥ १५ ॥
गलाश्रिताः ॥ व्यामिश्रदोषनातस्य कृच्छ्रसाध्या- प्रकीर्तिता । तासा वातादि दोष मांस को के किसी भी प्रदेश में वढे हुये वातोदरा रूक्षा वातवेदनयाऽन्विता ॥ क्षिप्रपाकसमुत्थाना दूषित कर के गोल, स्थिर, अल्पपीड़ा ढाहयुक्ता युक्त, बड़ा, गम्भीर धातुओं में फैला हुआ, धीरे धीरे बढने तु पैत्तिको । गूढा वा पाककठिना कफात्स्निग्धाऽत्ररुकरा ॥ मेदोऽ धिका ग्लैष्मिकी च विशेषादतिमार्दवा । अपची कण्ठमन्यानु कक्षा-वङ्क्षणसन्धिषु ॥ तां तु मालाकृतिं विधात् कण्ठहृड्नुसन्धिषु । गण्ट मालां विजानीयाद्रपचीतुल्यलक्षणान् ॥ ' चरक ने गले के पार्श्व में एक ग्रन्थि का होना गलगण्ड तथा अनेक गण्डों के होने से गण्ड माला का होना लिखा है ॥ यथा - भेद कफाच्छोणितसञ्चयोत्थो गण्डत्य ( गल्स्य ) पार्श्वे गलगण्ड एकः । स्याद् गण्डमाला वहुभिश्च गण्डैदाँप्तानले यूनि वलान्विते च । साध्या. स्मृना पीनसपार्श्व-मूलकासञ्चरच्छर्दियुतास्त्वसाध्या । भावप्रकाश ने कक्षांसमन्या-गलवंक्षण में प्रथम गण्डमाला होना लिखा है तथा उनके पक कर फूट के वहने पर अपची नाम रखा है यथा - कर्कन्धु-कोलामलकप्रमाणैः कक्षासमन्यागलवक्षणेषु । मेद कफाम्या चिर मन्दपाकैः स्याद् गण्डमाला बहुभिश्च गण्डै • ॥ ते ग्रन्थय केचिदवाप्त पाका · स्रवन्ति नत्र्यन्ति भवन्ति चान्ये । कालानुबन्ध चिरमादधाति सैवापचीति प्रवदन्ति केचित् ॥ इस तरह भोज ने प्रथम अपची और बाद में उसी से गण्डमाला, चरक ने गलपार्श्व में गलगण्ड तथा अनेक गण्डों को गण्डमाला और भावप्रकाश ने प्रथम गण्डमाला तथा उनके पक के फूट कर बहने पर अपची नाम दिया है । डाक्टरी मत से अपची को Chronic tuberculous lymphadenitis या स्क्रोफुला ( Sorofula ) कहते हैं । इसका प्रधान कारण क्षय का जीवाणु माना गया है । इस रोग में शरीर की लसीकाग्रन्थियां ( Lymphatic glands ) विकृत होकर बढने लगती हैं, पकती हैं और फूट कर पूय वहाती हैं फिर नई पकती फूटती हैं ऐसे वर्षों तक यह रोग पिण्ड नहीं छोड़ता है अत एव वाग्भटकार ने दूर्वा का उपयुक्त उदाहरण दिया है । ग्रथा - ' गण्डमालापची चेय दूर्वेव क्षयवृद्धिभाक् - दूर्वावत् क्षयवृद्धियुक्ता दूर्वाप्रतानवदत्यन्ताभावो न भवतीत्यर्थं । ( इन्दुः ) ॥ जब राजयक्ष्मा के लक्षण अधिक बढ जाते हैं तब यह असाध्य हो जाता है — पीनसपार्श्वशूलकासञ्चरच्छर्दिथुनास्त्वसाध्या ( चरकः ) । केवल गले की ग्रन्थियों के वढने को कण्ठमाला या गण्डमाला कहते हैं । चरक ने गले के पार्श्व में उत्पन्न वाला, कभी भी नहीं पकने वाला और मांस के उपचय ( वृद्धि ) । से युक्त ऐसे शोफ को पैदा करते हैं । आयुर्वेद शास्त्र के ज्ञाता विद्वान् इस शोफ रोग को अर्बुद कहते हैं । यह बात से, पित्त से, कफ से, मांस से और मेद से उत्पन्न होता है तथा ग्रन्थ के समान इसके लक्षण होते हैं ॥ १३-१५ ॥ विमर्श: - अर्बुद को ट्यूमर ( Tumour ) या नियोप्लाज्म । ( Neoplasm ) कहते हैं । इन श्लोकों में अर्बुद का स्वरूप या परिभाषा, अर्बुद के कारण तथा भेदों का वर्णन किया गया है । अर्बुद की आधुनिक परिभाषा या व्याख्या - शरीर की किसी भी धातु में उसकी अत्यन्त वृद्धि से अर्बुद हो सकते हैं । यह एक प्रकार की स्थानिक अतिवृद्धि होती है जिसका शरीर में कोई विशेष कार्य नही होता है और न कोई अन्त ही होता है । उनकी वृद्धि भी शरीर को वृद्धि पर निर्भर नहीं करती । वह व्रणशोथ से भिन्न होता है क्योंकि व्रणशोध क पाक में होता है । वातिक संस्थान का जिस पर कुछ भी नियन्त्रण नहीं होता है उसे अर्बुद कहते हैं । कारण - अभी तक पूर्णतया किसी वास्तविक कारण का पता नहीं लगा है । सम्भव है कई प्रकार की दशाएं या कारणकलाप मिलकर अर्बुद उत्पन्न करते हों । कुछ विद्वानों का मत है कि कभी कभी भ्रूणावस्था की धातुओं के कुछ भाग उसी दशा में रह जाते हैं उनका विकास नहीं होता है अत एव उनमें वृद्धि करने की अत्यन्त क्षमता होती है । जब किसी कारण ये उत्तेजित हो जाते हैं तब इनकी अतिवृद्धि के कारण अर्बुद उत्पन्न होता है । ' तत्रस्थाश्च विलम्बेरन् भूयो हेतुप्रतीक्षिण ' पैतृक प्रभाव अर्बुद को कहां तक उत्पन्न कर सकता है इसमें सन्देह है किन्तु ऐसे परिवार देखने में भाते हैं जिनमें कैंसर या अन्य अर्बुद अधिक व्यक्तियों को आक्रान्त करते हैं । इसी प्रकार कुछ सामान्य अर्बुद भी एक ही परिवार की कई सन्ततियों में निरन्तर उत्पन्न होते देखे गये हैं । व्यवसाय से इसकी उत्पत्ति का कोई विशेष सम्बन्ध नहीं प्रतीत होता है । बहुत से रोगियों में अर्बुद किसी आघात के पश्चात् उत्पन्न होते देखे गये गण्ड के ही अनेक होने पर गण्डमाला कहा यह ठीक है परन्तु है ( मुष्टिप्रहारादिभिरर्दितेऽङ्गे ) । ओष्ठ, जिह्वा, स्तन, आमाशय जो गले के मध्य में गलगण्ड रोग होता है वह भिन्न है उसे गर्भाशय ग्रीवा तथा त्वचा के अर्बुद इसी प्रकार उत्पन्न होते ग्वाइटर ( Goiter ) कहते हैं । निवद्ध श्वयथुर्यस्य मुष्कवलम्बते हैं । कुछ विद्वानों ने विशेष प्रकार के पराश्रयियों को संक्रामक गले । महान् वा यदि वा हस्वो गलगण्ड तमादिशेत् ॥ ( भाव प्र ० ) । रोगों की तरह अर्बुदोत्पत्ति में कारण माना है किन्तु अन्वेषण गानप्रदेशे क्वचिदेव! दोषाः तथा प्रयोगों से उनकी धारणा का समर्थन नहीं हुआ है । सम्मूच्छिता मांसमभिप्रदूष्य | अर्बुदों के भेद - शरीर पर प्रभाव की दृष्टि से इनके दो