श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 31–40
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 31–40
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१६ विषयाः पृष्ठाङ्काः पूगफल ( सुपारी ) के गुण २०२ जावित्री, कर्पूर, जायफल, कोलक, लवन और लता कस्तूरी के गुण " प्रियाल, विभीत, कोल, आमलक, वीजपूर, शम्पाक और कोशात्र की मज्जओं के गुण 33 फलों की मज् अपने - अपने फलों के समान गुण करती हैं 23 farea को छोड़ कर अन्य फल पके ये अधिक गुणकारी होते हैं । 99 कच्चे वित्रफल के गुण " " वर्जनीय फल शाकवर्ग कूष्माण्डादि फल शाक २०२ कूष्माण्डादि के सामान्य गुण कृप्माण्ड, कालिन्द और अलाबू के गुण " पुलादि फल शाक 33 " शाकों के सामान्य गुण " त्रपुल, ऐर्वारुकऔर कर्कारुक के गुण २०३ । शीर्णवृन्त के गुण " पिप्पल्यादि कटुफल - शाक " 3 पिप्पल्यादि गण की शाकों के गुण माई तथा शुष्क पिप्पली, के 3+ आर्द्र तथा शुल्क मरिच के " " श्वेतमरिच के 93 " नागर ( शुण्ठी ) के गुण 3 आईक " 99 29 विविध जीरक के गुण; कारची तथा उपकुलिका के गुण " " हरे और सूखे धनिये के 19 33 जम्बीर, सुरल, सुमुख, अर्जक और " कासमर्दक २०४ शोभाञ्जन, लाल सहजन, सरसों का शाक, गण्डीर, चित्रक, तिलपर्णी के गुण मूली के भेद तथा उनके गुण " शाकों के पुष्प, पत्र और फल यथोत्तर भारी होते हैं " रसोन के गुण 29 पलाण्डु तथा क्षीरपलाण्डु के गुण " कला ( मटर ) शाक के गुण २०५ चुच्चु, जूही, तरुणी आदि शाकवर्ग " 3 " आदि शाकवर्ग के सामान्य गुण " ” शाक तथा जीवन्ती शाक के " 23 वृक्षादनी ( बन्दाल गुण 2 । विषय - सूची | विपया: पृष्ठाङ्काः | वट, पिप्पलाद धीरी वृक्षों के पत्तों केशाकों के गुण २०५ पुनर्नवादिवर्ग की शाकों के सामान्य गुण, तण्डुलीयक वर्ग की शार्के तथा गुण 33 तण्डुलीयक शाक के गुण, उपदिका " 29 99 वास्तूक 33 ", चिल्ली, पालकी और अश्वचला शाकों के गुण " मण्डूकपर्णी वर्ग की शार्के " 13 " 2 शाकों के सामान्य गुण 29 मण्डूकपर्णी शाक के गुण २०६ गोजिहा, सुनिषण्णक, बाकुची, मटर, मकोय, पटोलपन्न शाकों के गुण वृहतीफल के गुण " कर्कोटक तथा कारबेलक शाक के गुण ' अडूसा, बेंत, गिलोय निम्ब, पित्त-पापडा तथा चिरायता शाकों के गुण " " वरुण तथा पंवाढ शाक के गुण " " कालशाक, कुसुम्भशकि, नाडीशाक, और चारी शाक के गुण 29 लोणिकादि वर्ग को शार्के 33 " शाकवर्ग के सामान्य गुण ) कुन्तलिका, कुरण्टिका, राजक्षव, शटी, हरिमन्य ( चने ), मटर, पूतिकरञ्जपत्र तथा पान के गुण · कोविदारादि पुष्पशाक तथा इनके गुण २०६ अडूसा और अगस्त्य पुष्प के गुण 32 करील तथा लाल सहजन के पुष्पों गुण २०७ रक्तवृत्त ( बन्धूक ), नीम, मुष्कक, आक, असन तथा कुटज के गुण " कुमुट, कुवलय तथा उत्पल के गुण " सिन्धुवारपुप्प के गुण मालती तथा महिका पुष्प गुण 39 23 वकुल, पाटल, नागकेशर और कुङ्कुम के गुण | विपयाः पृष्ठाकाः अनुक्त पुष्प, कांटे, पत्र और अवरोह के गुण उनके निजी वृक्षलतादिकों के अनुसार होते हैं २०७ क्षवकादि उनिशाक तथा उनके सामान्य गुण 99 क्षवक तथा बांस के अंकुर के गुण 19 उद्वर्ग के प 9 पलालजात छुप के गुण इतुजात 33 " g 22 करीपजात 22 39 " वेणुजात छत्रक, 21 पृथिवी फोड़कर निकले छनक, के गुण " पिण्याक, तिलक्लक, स्थूमिका तथा शुष्क शाक के दोप 39 वटक ( बडे ) और सिण्डाकी ( कोढी ) के गुणदोप 33 सर्व शाकों के सामान्य गुण 31 वर्जित पत्रादि शाक २०८ कन्दवर्ग विदारीकन्द, शतावरी प्रभृति कन्दों के नाम २०८ कन्दों के सामान्य गुण विदारीकन्द के 39 • शतावर के 32 33 विस, सिंघाडे तथा गेरू के गुण, पिण्डालुक, सुरेन्द्रकन्द तथा बांस करीर के गुण 33 स्थूलकन्द, सुरणवन्द और माणककन्द के सामान्य गुण माणककन्द के गुण कुमुदोत्पलपद्मकन्द के गुण - दोप 23 वाराहकन्द के गुण 93 ताद, नारियल, खजूर की मस्तकमजा गुण 33 वर्जनीय कन्द " लग्ण वर्ग सैन्धवादि लवण तथा उनके सामान्य सैन्धवलवण गुण २० ९ के गुण 33 सामुद्र " 39 विढ " 32 39 सौवर्चल " " 39 23 रोमक " 7 " 39 23 33 23 arre, किंशुक और कुरण्टक 23 गुटिका 29 " मधुशिशु और करीर पुष्पों के के गुण " ऊपर, वालुकैल, शलमूलाकरोद्भूत. " 3 " लवणों के गुण "
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विषया पृष्ठाङ्कः यस्वर्जिकादितारवर्ग तथा उनके सामान्य गुण २० ९ स्वर्जिका चार और यवक्षार के गुण ऊपचार, पाकिमचार तथा टङ्कण गुण " सुवर्ण, रौप्य, ताम्र, त्रपु, सीसक मुक्ता, विद्रुम, वज्र, वैर्य और स्फटिकादि गुण " अनुक्त धान्य, मांस, फल और शार्क के गण उनके स्वाद तथा भूत गुणों के अनुसार होते हैं २१० धान्यवर्ग के श्रेष्ट द्रव्य 17 मांसवर्ग " 99 " g फलवर्ग 93 29 शाकवर्ग 99 " 11 गो का दुग्ध और घृत लवणों में 99 अन्य श्रेष्ठ द्रव्यों की प्रधानता 39 कृतान्न वर्ग छाजमण्ड के गुण पेया तथा विलेपी 97 मण्ड, पेया, विलेपी और यवागू के लक्षण पायस तथा कारा के गुण २११ घौन ओदन के गुण 33 23 सृष्टमण्डलकृत ' ओदन के गुण 13 स्नेह, मांस, कन्दादियोग से सिद्ध ओटन के गुण 99 सूप और शाकों के संस्कार विशेष से गुण विशेष " मांस के गुण सिद्धमांस के गुण 33 प्रदिग्ध मांस के गुण परिशुष्कमांस " 93 उल्लुप्तमांस की परिभाषा तथा उसके गुण २११-२१२ वह्निपक्क उल्लुप्त के गुण " 2 शूल्यमांस के 99 93 तलघृतसाधितमांस के गुण मांसरस के गुण " सौराव के " 99 उबाल कर रस निकाल दिये हुये दोप 33 श्वानिष्कमांस के गुण " वेसवार की परिभाषा तथा उसके गुण 33 मुयूष के गुण 29 ४ सु ० विषय - सूची | विषया पृष्ठाङ्काः रागपाडव के गुण २१२ | मसूरादिपञ्चक यूप गुण २१२-२१३ 33 " में मृद्दिकादि योग से गुणविशेष 22 पटोल तथा निम्ब यूप के गुण मूलकयूष के गुण 19 कुल्ल्थयूप के " दाडिमामलक यूप के गुण " मुगामलक यूप के " यव, कोल, कुलत्य यृप और सर्व-धान्यकृत ग्रुप के गुण खड, कालिक, दाडिमाम्ल, etro और तक्राम्ल के गुण " खट, यवागू, पाढव और पानक 93 खढ आदि की अकृत तथा कृत सज्ञा " गोरसधान्याम्लादि संस्कृता संस्कृत मांसरस के गुण 99 कपिलक्षण २१३ - २१४ शुकशाकविशेष कृतान्न तथा वटकों रागपाढव के गुण 99 रमाला तथा गुढयुक्त दधि के गुण 59 मन्थ के लक्षण तथा गुण 35 द्रव्यान्तर संयुक्त मन्य के गुण 99 गुढतपानक के 21 93 महीकापान के 99 " परुषककोलपानक के " • 39 पानकों की गुरुलाघवता में हेतु 39 भक्ष्य वर्ग भक्ष्य निर्देश 25 क्षीरकृतभचयों के गुण 99 घृतपूर ( घेवर ) के गुण गुदकृतभदयों के 33 मधुमस्तक, संयाव, अपूत्र और मोदकों के गुण २१ १५ सहक के गुण " | विप्यन्दन के 31 " सामित तथा फेनकादिक के गुण " | मुद्रादिवेसवार से भरे हुये सामित " गुण पाल, शष्कुली तथा पिष्टक के गुण " मुद्रादि वैदकृत मच्य के 23 भाकृतभचय के गुण 39 कूर्चिकाकृत भचय के गुण " " विरुधान्यकृतभचय गुण घृत निर्मित 33 99 तैलनिर्मित 11 39 33 फलमांसादिकृत " " 27 १७ । विपयाः पृष्ठाङ्काः कपाल एवं अङ्गारपक्क भक्ष्यों के गुण विशेष २१६ किलाटादि तथा कुल्माप भक्ष्यों के गुण २१५-२१६ वाट्य तथा धानोलुम्ब भक्ष्यों के गुण " स तथा उसकी पिण्डी और अवलेह के गुण " धानलाज तथा धानलाजकृत गुण 23 पृथुक के 11 " 3 कच्चे चांवलों का आटा, नवीन चावल और पुराने चांवलों के गुण " उक्तानुक्त धान्यों का उपसंहार " अनुपान वर्ग अम्ल तथा माधुर्य रस का प्रयोग " 3 अनुपानवर्ग के द्रव्य 29 अनुपानों में जल को श्रेष्ठता २१७ उष्णोदकादि अनुपान का विस्तार 29 पूर्वोक्त शास्यादि वर्गों के पृथक् २ अनुपान " मद्यपी तथा मांस का मद्य अनुपान " धूप, अध्व, भाष्य, स्त्री से क्षीणों का दुग्धानुपान कृशों को खरानुपान 99 स्थूलों को शहद जल का अनुपान 19 वातादि दोपप्रकृति - पुरुषों में भिन्न २ अनुपान 93 रक्तपित्ती को इक्षुरसानुपान शुकधान्यादि में वदराम्लानुपान " वैदलों में धान्याम्लानुपान 39 जाल और धन्वज मांसों में अनुपान विष्किर, प्रतुद, गुहाशय, प्रसह, पर्णमृग, विलेय, एकानेकशफ, फूलचर आदि के मांसों में भिन्न २ अनुपान निर्देश 99 महेन्द्र जल के " की प्रशंसा २१८ दोषानुसार उष्ण - शीतजलानुपान 99 सदोष, गुरु तथा अतिभुक्त में अनुपान से लाभ 39 अनुपान के सामान्य गुण 33 भोजन के आदि, मध्य एवं अन्त में प्रयुक्त अनुपान के गुण 23 अनुपान के न लेने से हानि " " 27 अयोग्य प्राणी 13 पीने के बाद वर्जनीय " 1
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१८ विषयाः पृष्ठाङ्काः गुरुलाघव चिन्ता में स्वभाव, संस्कार एवं मात्रा की प्रधानता २१८ मन्दकर्माग्नि व सुकुमारों में गुरु - ला-घवविचार तथा वली, दीप्ताग्नि और श्रमशील व्यक्ति में उक्त विचार अनावश्यक आहारविधि का वर्णन तथा योग्य महानस का लक्षण २१ ९ सिद्ध अन्न का रक्षण 13 विविध आहार की उपकल्पना ( परोसन विधि ) भोजन कराने योग्य स्थान 39 हितकारी भोजन लक्षण 33 रसानुसार पूर्व में मधुर, मध्य में अम्ल लवण पश्चात् शेपरस युक्त भोजन करें २२० प्रथम फलादिलक्षण 39 arrer का प्रथम सेवन 21 भोजन में भांवले को श्रेष्ठता मृणालादि का सेवन - समय किस प्रकार बैठ कर भोजन किया. जाय 19 समय पर मात्रापूर्वक किये हुये भोजन का फल 13 ऋतुभेद से भोजन का काल 39 काल भोजन के दोप 23 हीनमात्र और अतिमात्र भोजन के दोप " J सेवन करने योग्य भोजन २२१ निन्दित अन ययोत्तर मधुरतर भोजन सेवन करना चाहिये विषय - सूची विषयाः पृष्ठाङ्काः । भोजनकाल में गण्डूष करने के गुण २२१ । स्वादु अन के गुण स्वादु तथा अस्वादु भोजन के लक्षण " भोजन के बाद तथा मध्य में जल पीने का विधान 39 दांतों में फंसे हुये अन्न के निकालने की विधि " जीर्ण, विदग्ध और भुक्तमात्र में त्रिदोष वृद्धि 39 भोजन में वढे हुये कफ के नाशन का उपाय २२२ भोजनोत्तर कर्तव्य 39 भुक्तान्नस्थिरता के लिये मनःप्रिय शब्दादि विषयों का सेवन 39 | भोजनोत्तर जुगुप्सित शब्दादि विषयों का त्याग " " भोजनोत्तर व " " अतिमात्र सेवितं रसों के दोप 99 मन्दाग्नि में वार भोजन का निषेध " मन्दाग्नि में गुरु आहार का निषेध 33 पिष्टान्न का निषेध 33 लेद्य - पेयादि चतुर्विध आहार की यथोत्तर गुरुता 33 लघु गुरु द्रव्यों का मात्रा विचार 39 प्रभूत द्रवयुक्त शुष्कान्न सेवन में. दोषाभाव | शुकान्न सेवन में दोप २२३ अनविदाह के हेतु 39 शुक, विरुद्ध और विष्टम्भी अन्न को मन्द कर देते हैं । 99 विषयाः पृष्ठाङ्का अजीर्ण के आम, विदग्ध आदि चार भेद २२३ अजीर्ण के कारण 33 चतुर्विध अजीर्णो के लक्षण 33 अजीर्ण के उपद्रव 22 अजीर्ण की चिकित्सा 29 समशन, विपमाशन और अध्यशन के लक्षण " " विदग्धाजीर्ण की चिकित्सा २२४ आमाशयगत विदाह की चिकित्सा 99 अजीर्णशङ्का में शुण्ठी- अभया का प्रयोग " अजीर्ण में भी बुभुक्षा विनाशकारी होती है 99 विंशति गुणों के कर्म का वर्णनारम्भ " शीतोष्ण - निग्धादिदश गुणों के कर्म " द्रवादि दश गुणों के कर्म 99 आहार की गति ( परिवर्तन ) का वर्णन २२५ पाचभौतिक आहार के गुण " " आहारावस्थापाक से दोपवृद्धि पक्क आहार के मल तथा सार एवं सार से सर्वधातु - पोषण २२६ सप्तधातुओं के सप्त मल " दिन में हृदय की अधिक विकास-शक्ति होने से अजीर्ण होने पर भी भोजन विधान 33 रात्रि - अजीर्ण में भोजन निषेध आहारविधि आदि के सूत्र पाठ का फल " " सूत्रस्थान समाप्त 10060400-
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विषयाः पृष्ठाकाः 1 प्रथम अध्याय वातव्याधि निदान का उपक्रम २२७ प्रकृतिभूत एवं व्यापन्न वायु के स्थान, कर्म और रोगों के सम्बन्ध में प्रश्न 93 वायु का स्वरूपवर्णन " शरीर में विचरण करनेवाले वायु कर्म " अकुपित वात के कर्म २२८ वायु के नाम, स्थान, कर्म भेद से पांच प्रकार 93 स्थान भेद से वायु के नाम, प्राण वायु के स्थान और कर्म 39 उदान वायु के स्थान और कर्म " समान वायु के स्थान और कर्म २२ ९ यान वायु के 93 " 9 अपान वायु के 33 33 99 99 विकृत व्यान और अपान के 99 99 वायु की स्थान- विशेष से रोग-विशेषकारिता " वायु की धातुविशेषाश्रय से रोग-विशेषकारिता 99 सर्वाङ्गगत वायु के कार्य " } पित्तसंयुक्त कुपित वात के लक्षण २३० शोणितान्वित 99 11 " 2 पित्तावृत प्राण के ' " 33 कफावृत " 33 पित्त संयुक्त उदान के 93 कफावृत 33 23 " पित्तसंयुक्त समान 93 23 कफसंयुक्त 99 " 93 पित्तावृत व्यान 93 93 कफावृत 19 " " वातरक्त के प्रकोप के कारण " वातरक्त सम्प्राप्ति " वातादि दोष विशेष से वातरक्त के विशिष्ट लक्षण २३१ वातरक्त का पूर्वरूप " " हस्तपाद मात्र से आरम्भ होकर वातरक्त समग्र शरीर में व्याप्त हो जाता है 29 असाध्य वातरक्त के लक्षण 23 आक्षेपक के लक्षण 33 निदान - स्थान | विषयाः पृष्ठाङ्काः आक्षेपक भेद - अपतानक, दण्डापता-नक, धनुःस्तम्भ, अभ्यन्तरायाम और बाह्यायाम के लक्षण २३१ अभिघातज आक्षेप के लक्षण २३२ असाध्य अपतानक के कारण पक्षाघात की सम्प्राप्ति-तथा लक्षण 29 पक्षाघात का साध्यासाध्य-विचार 33 अपतन्त्रक की सम्प्राप्ति तथा लक्षण २३३ मन्यास्तम्भ के कारण तथा लक्षण " " अर्दित के कारण, सम्प्राप्ति, लक्षण तथा साध्यासाध्य- विचार " " गृध्रसी के लक्षण 35 विश्वाची के " २३४ क्रोष्टुकशीर्ष के लक्षण " अ और पहुचात के लक्षण 99 कलायखञ्ज के 93 " वातकण्टक के " 99 पाददाह के 99 " पादहर्ष के 23 99 अंसशोष और अववाहुक के लक्षण " " वाधिर्य की सम्प्राप्ति तथा,, कर्णशूल के लक्षण " " -मूक, मिन्मिन और गद्गद के लक्षण 3 तूनी तथा प्रतितूनी के लक्षण 39 आध्मान, प्रत्याध्मान, वाताष्ठीला, प्रत्यष्ठीला के लक्षण २३५ द्वितीय अध्याय अर्शी निदान का उपक्रम 11 अर्श के छ भेद " अर्श का निदान, सम्प्राप्ति और परिभाषा २३६ गुद का प्रमाण तथा त्रिवलियों का वर्णन " " वलित्रय का नाम 33 गुदौष्ठ की परिभाषा " 3 का पूर्वरूप " अर्श के सामान्य लक्षण " J वाताश के 33 39 पित्तार्श के 17 २३७ । विषयाः पृष्ठाङ्काः श्लेष्मार्श के लक्षण २३७ रकार्श के " 99 सन्निपातार्क्ष के 29 95 | सहजा के 93, अर्श की स्थानानुसार साध्या-साध्यता २३८ लिङ्गार्श की सम्प्राप्ति तथा लक्षण 93 योन्यर्श के लक्षण 19 नाभिगत अर्श के लक्षण - 33 कर्ण, नेत्र, वर्म, घ्राण तथा वक्त्रगत अर्श लक्षण 33 चर्मकील का सम्प्राप्ति तथा लक्षण II वातादि दोषों के आधिक्यानुसार विशेष लक्षण " मेदादित अर्श के विशेष लक्षण रोगानुसार है २३ ९ इन्द्रज अर्श तथा उसके छ भेद 35 अर्श की साध्यासाध्यता " J सर्व वलिन्यात अर्श असाध्य होता है " तृतीय अध्याय अश्मरी निदान का उपक्रम २१ ९ अश्मरी के चार भेद " " का कारण तथा सम्प्राप्ति 39 " " पूर्वरूप अश्मरी का पूर्व-रूपावस्था में सामान्य लक्षण 29 अश्मरी की रूपावस्था के लक्षण २४० श्लेष्माश्मरी का कारण, सम्प्राप्ति तथा लक्षण, पित्ताश्मरी की सम्प्राप्ति तथा लक्षण " " वाताश्मरी की सम्प्राप्ति तथा लक्षण " वातादि तीनों अश्मरियां बच्चों में ही होती हैं इसका कारण 31 शुक्राश्मरी के कारण, सम्प्राप्ति तथा लक्षण २४१ शर्करा और सिकता के लक्षण " मूत्रमार्ग - प्रवृत्त अश्मरी के वहां अटक जाने से उत्पन्न लक्षण " अश्मरी के आधारभूत वस्ति का स्थान, संस्थान, द्वार तथा सम्बन्धित अङ्ग 39 वस्ति में मूत्र कैसे और कहां से आता है आदि का विवेचन 4 39
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२० विषया पृष्ठाङ्काः । वस्ति में अश्मरी रोग की उत्पत्ति का वर्णन २४२ | नवघटपूरित जलावक्षेप समान वस्ति में मूत्रावक्षेप से अश्मरी की उत्पत्ति " वायु और विद्यदग्नि आकाश में ओले बनाते हैं तद्वत वस्ति में वात और पित्त कफ से अश्मरी नाते हैं I II वायु ही वस्तिगत रोगों का कारण है, 25 चतुर्थ अध्याय भगन्दरनिदान का उपक्रम २४३ । वातादिदोपों से कमशः शतपोनकादि पञ्चविध भगन्दरों की उत्पत्ति 99 भगन्दर की निरुक्ति 33 पिढका तथा भगन्दर 23 भगन्दर के पूर्वरूप 33 शतपोनक भगन्दर के कारण सम्प्राप्ति तथा लक्षण २४४ उष्ट्रग्रीव भगन्दर के कारण सम्प्राप्ति तथा लक्षण 33 . परिस्रावी, भगन्दर के कारण, सम्प्राप्ति और लक्षण 32 शम्बूकावर्त भगन्दर के कारण, सम्प्राप्ति और लक्षण उन्मार्गी भगन्दर के कारण, सम्प्राप्ति और लक्षण 35 भगन्दरेतर तथा भगन्दर पिका में भेद २४५ भगन्दरी पिढका के लक्षण भगन्दर का पूर्वरूप भगन्दर की कृच्छ्रसाध्यता और असाध्यता पश्र्चम अध्याय कुछ निदान का उपक्रम २४५ कुष्ठ के कारण तथा सम्प्राप्ति वर्णन 19 विषय - सूची वियाःप पृष्ठाङ्काः । एककुष्ठ और चर्मदल कुष्ठ लक्षण २४६ विसर्प कुष्ट के लक्षण 39 परिसर्प और सिम कुष्ठ के लक्षण विचर्चिका और विपादिका कुष्ठ के लक्षण 29 किटिभ और पामा कुष्ट के लक्षण 99 कच्छु और रकसा कुष्ठ के लक्षण 29 | कफ से अरुसिध्मादि, वात से परिसर्प तथा शेष पित्तज २४८ किलास कुष्ट का स्वरूप तथा उसके भेद 39 कुष्ट और किलास में भेद वातादि दोष से किलास के भेद तथा लक्षण 99 असाध्य कुष्टों के लक्षण 53 कुष्ठों में दोपानुसार लक्षण वैशिष्ट्य " | स्वचागत कुष्ट का कालातिक्रमण से धातुओं में प्रवेश होना २४ ९ धातुगत कुष्ठों के लक्षण 29 कुष्ठी माता - पिता की सन्तान भी कुष्ठ होती है 39 कुष्टों का साध्यासाध्य - विचार 93 991 | कुष्ठोत्पादक कर्म का जन्मान्तर तक अनुवन्ध लगा रहता है । पथ्यकर आहार - विहार तथा विशि पध से कुष्ठ रोग मुक्ति " 3 ओपसर्गिक रोगों के प्रसरण में प्रसङ्ग-स्पर्शादि कारण २५० षष्ठ अध्याय प्रमेह निदान का उपक्रम २५० " के कारण 99 " की सम्प्राप्ति 39 29 का पूर्वरूप २५१ कुष्ठका पूर्वरूप २४६ | सर्व प्रमेों के सामान्य लक्षण 33 सप्त महाकुष्ठ तथा एकादश क्षुद के नाम 99 सर्वकुष्ट त्रिदोष तथा क्रिमियुक्त होते हैं दोपभेद से कुष्टविशेष की उत्पत्ति 29 वातादि दोष से उत्पन्न सप्त महाकुष्ट जैसे अरुण, औदुम्बर, ऋष्य जिह्न, कपाल, काकणक, पुण्ड • रोक और ददु के लक्षण 39 स्थूलारुक और महाकुष्ट के लक्षण 29 प्रमेह तथा प्रमेह - पिडकाएं त्रिदोषज होती हैं 95 कफ से उदकेसुरादि दश प्रमेह 39 पित्त से नीलहरिद्रादि छः " 99 वात से सर्पिर्वसादि चार प्रमेह प्रत्येक दोष अन्य दोष तथा दुयों के साथ मिलकर प्रमेह पैदा करता है २५२ कफज दश प्रमेहों के क्रमशः लक्षण " पित्तज प्रमेहों के लक्षण 21 विपयाः पृष्ठाङ्काः वातज प्रमेहों के लक्षण २५३ कफज ” के उपद्रव " 9 पैत्तिक 33 99 " 1 वातिक " 19 99 | प्रमेहपिकाओं की उत्पत्ति शरा चिका, कच्छपिकादि दश पिढ काओं के नाम शराविका दश पिकाओं के लक्षण " प्रमेहानुसार ही 39 दोपों से उत्पन्न जानो २५४ असाध्य पिढका 99 वातज प्रमेहों की असाध्यता के कारण 39 प्रमेह रोगी के सामान्य लक्षण मधुमेह का लक्षण तथा उसकी असाध्यता " + मधुमेही स्थानासनशय्यास्वप्न को उत्तरोत्तर अधिक चाहता है । 29 | दोष, दूध्य तथा आहार - विहार के उत्कर्षापकर्षकृत सयोग विशेष से प्रमेहों की उत्पत्ति 39 प्रमेह उपेक्षा करने से असाध्य 21 सप्तम अध्याय उदरनिदान का उपक्रम २५५ धन्वन्तरि द्वारा सुश्रुत को उदर-रोगोपदेश 59 उदर रोगों के आठ भेद 99 " रोगों के कारण " 3 " " ” की सम्प्राप्ति उदररोग पूर्वरूप २५६ वातोदर के लक्षण " पित्तोदर के " 33 कफोदर के " 39 सन्निपातोदर के लक्षण 33 || प्लीहोदर के 39 " यकृद्दाक्युदर के " २५७ दोदर के 59 परिस्रावी उदर के " 99 जलोदर के लक्षण २५८ अष्टविध उदर रोगों के सामान्य लक्षण " 3 कालातिक्रम से सर्वोदर रोगों का जलोदर में परिवर्तन तथा असाध्यता 39 अष्टम अध्याय मूढगर्भनिदान का उपक्रम २५८
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विषयः पृष्ठाङ्काः गर्भ तु २५८ " के लक्षण २५ ९ ” के कील, प्रतिखुर, चीजक, परिव चार भेद " उक्त चार भेदों का खण्डन तथा मूढगर्भ की अनेकता का निर्देश २६० मूढगर्भ के उदयानुसार अन्य आठ भेद ", " असाध्य मूढगर्भ के लक्षण " 9 गर्भ के जनन में स्वभाव तथा काल, प्रकर्ष हेतु हैं २६१ अकालगर्म - विच्युति के कारण 23 ' गर्भस्राव तथा गर्भपात की परिभाषा " असाध्य मूढगर्भ के लक्षण 33 अन्तर्मृतगर्भ के लक्षण " मृत्यु के कारण २६२ मृतमाता के जीवित गर्म का लक्षण तथा उसको निकालने की विधि ” नवम अध्याय विधिनिदान का उपक्रम २६२ धन्वन्तरि द्वारा सुश्रुत के लिये विद्रधि लक्षणों का कथन 19 विधि रोग की सम्प्राप्ति, लक्षण, परिभाषा तथा भेद 99 पघि विधियों के लक्षणों का निर्देश 33 वातिकविद्रधि लक्षण ०६३ पैत्तिकविद्रधि 33 11 श्लैष्मिकविधि " दोषानुसार उक्तविद्रधियों के स्राव 19 साक्षिपातिक विधि के लक्षण 33 आगन्तु विद्रधि के कारण, सम्प्राप्ति तथा लक्षण " रक्तज विद्वधि के लक्षण 39 सन्निपातज विद्रधि असाध्य होती है । 99 आम्यन्तरिक विद्रधि के हेतु और सम्प्राप्ति 93 अन्तर्विद्वधि के स्थान 93 29 के लक्षण बाह्य और आभ्यन्तरविद्वधियों के अधिष्ठान भेद से लक्षण २६४ ममय विधियां सर्वावस्था में कष्टप्रद होती हैं विधियों के अवस्था भेद से साध्या-विचार 99 अन्तर्विद्रधियों के पकने पर उनके ara निकलने के मार्ग 27 रक्तज विद्रधि के कारण तथा लक्षण " रकन विद्रधि की मक्कल संज्ञा 22 - विधि और गुल्म में भेद " " के पाक में हेतु तथा गुश्म के न पकने का कारण विषय - सूची । विपयाः पृष्ठाङ्काः | स्थानानुसार तथा पक और त्रिदो-पज विद्रधि असाध्य होती है २६५ अस्थिगत विधि का कारण, सम्प्राप्ति तथा लक्षण " 3 दशम अध्याय विसर्प, नाडी, स्तनरोग निदान का उपक्रम २६६ विसर्पों का निदान, सम्प्राप्ति, लक्षण और निरुक्ति " वातिकविसर्प के लक्षण " पैत्तिक " 99 23 श्लैष्मिक " " " 3 सानिपातिक विसर्प के लक्षण 30 क्षतजन्य " विसर्पों का साध्यासाध्य विचार २६७ नाडीव्रण के निदान, सम्प्राप्ति, निरुक्ति तथा भेद " | वातिक एवं पैत्तिक नाढी रोग के लक्षण " कफज एवं द्वन्द्वज नाढी रोग के लक्षण " सान्निपातिक नाडी के लक्षण २६८ शल्यनिमित्तज नाडी के लक्षण स्तनरोग - वर्णन तथा नाढी - रोगा • नुसार ही उनके कारण - भेद आदि का निर्देश 21 कन्याओं को स्तन रोग नहीं होने तु " प्रजाता तथा गर्भिणी स्त्रियों को ही स्तन रोग होते हैं 33 स्तन्य ( दुग्ध ) की परिभाषा " " शुक्रप्रवृत्ति के समान ही स्त्रियों में स्तन्यप्रवृत्ति होती है " } वातादिदुष्ट स्तन्य के लक्षण २६ ९ शुद्ध स्तन्य ( दुग्ध ) के लक्षण 31 स्तन रोगों की सम्प्राप्ति 99 संक्षेप से स्तन रोगों के लक्षणों का अतिदेश एकादश अध्याय ग्रन्थि, अपची, अर्बुद तथा गलगण्ड निदान का उपक्रम २६ ९ ग्रन्थि के निदान, दूष्य, सम्प्राप्ति और लक्षण 33 वातज ग्रन्थि के लक्षण २७० पित्तज " 99 99 कफज " " 35 मेदोज ¨ सिराज ग्रन्थि के निदान, सम्प्राप्ति, लक्षण तथा साध्यासाध्य विचार " २१ । विपयाः अपची रोग के स्थान, निदान, सम्प्राप्ति, लक्षण और निरुकि २०० अर्बुद रोग के निदान, दूष्य, सम्प्राप्ति, लक्षण और भेद २७१ वातादि दोपज अर्बुद के ग्रन्थि के समान लक्षण होते हैं २७२ रक्तार्बुद के निदान, सम्प्राप्ति, लक्षण तथा साध्यासाध्य विचार " मांसार्बुद के लक्षण III अर्बुद के असाध्य लक्षण 99 अध्यर्बुद तथा द्विरर्बुद के लक्षण " 1 अर्बुद के पाकाभाव में कारण 99 गलगण्ड के निदान तथा सम्प्राप्ति " 33 लक्षण " वातिक गलगण्ड के लक्षण 93 कफज 39 99 19 मेदोज " " 7 २७४ असाध्य " 3 93 गलगण्ड का स्वरूप 23 द्वादश अध्याय वृद्धि, उपदंश, श्लीपद, के निदान की उपक्रम २०४ वृद्धि का निदान तथा उसके सात भेद 39 वृद्धि रोग की सम्प्राप्ति 93 19 ” के पूर्वरूप " 3 वातज, पित्तज और कफन वृद्धि के लक्षण 39 रक्तन और मेदोजवृद्धि के लक्षण २७५ मूत्रजवृद्धि के लक्षण आन्न्रवृद्धि, " " उपदंश रोगके निक्षन और सम्प्राप्ति २७७ उपदेश के भेद " 1 वातादि प्रत्येक उपदंश के लक्षण श्लीपद रोग के कारण, सम्प्राप्ति, परिभाषा और भेद २७ ९ वातज, पित्तज और कफज श्लीपद के लक्षण २८० श्लीपद के असाध्य लक्षण 93 " रोग में कफ की प्रधानता का निर्देश II श्लीपद जिन देशों में अधिक होत है उनका निर्देश श्लीपद के स्थान त्रयोदश अध्याय क्षुद्र रोगों के निदान का उपक्रम २८० चौवालीस क्षुद्र रोगों के भेद तथानाम " भनगल्लिका का लक्षण २८१
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III विषया qurg: यवमस्याका क्षण २८३ अन्धालजी को " " " " " विवृता का " कच्छपी का वक्ष्मीक का लक्षण " इन्द्रवृद्धा का " पनसिका - " 9 " पापाणाभि का लक्षण 59 जिलिगर्दभ " " " २८२ कक्षा 23 III विस्फोटक " 19 " अग्निरोहिणी " " तथा उसके द्वारा रोगी के का समय " चिप्प ( क्षतरोग, उपद्रव ) का लक्षण कुनख ( कुलीन ) का लक्षण III अनुशयी का लक्षण विदारिका का " शर्करा तथा शर्करा के लक्षण २८३ पामा, विचर्चिकों और रकसा के " 33 पाददारी का लक्षण करके 39 " अलस के * 35 " 9 " इन्द्रलुप्त ( साहित्य, ज्या ) के " लक्षण दारुण का लक्षण अपिका का २८४ " " मसूरिका का " " सुखदूषिका का लक्षण २८६ पद्मिनीकण्टक का " तु " " 99 मपक का 33 reates के ' " " 99 चर्मकील के २८७ यह का 23 नीलिका का 39 परिवर्तिका कारण, सम्प्राप्ति, लक्षण " अवपाटिका के लक्षण " " " शिका " निरुद्र गुद 33 99 अहिपतन का ".२८८ चुपणकच्छू का " " 3 गुदुश का " " विग्रुप - सूची faqen. gelat ' चतुर्दश अध्याय शूकदोष निदान का उपक्रम २८८ । " जन्य रोगों की सम्प्राप्ति, " सर्पपिका के लक्षण 19 अष्ठीलिका लक्षण २८ ९ प्रथित और कुम्भिका के लक्षण " " अलजी " मृदित ”, ” 33 संमूढपिढका और अवमन्थ के लक्षण " पुष्करिका के लक्षण स्पर्शहानि के " 93 उत्तमा के 99 शतपोनक के 99 स्वपाक और शोणितार्बुद के लक्षण " मांसार्बुद के लक्षण " 9 मांसपाक के " 19 विधि के 99 59 निकालक के " " शुकदोपों का साध्यासाध्य विचार 99 पञ्चदश अध्याय निदान का उपक्रम २८ ९ नका हेतु २ ९ ० " के दो प्रकार सन्धिमुक और फाण्डभुग्न 39 सन्धिमुक्त के भेद, सामान्य उक्षण_ " उस्पष्टादि छ ' सन्धि मुक्त भग्नों के लक्षण 33 काण्डमग्न के प्रकार २ ९ १ प्रत्येक काण्डभग्न के विशेष लक्षग २ ९ २ साध्यासाध्यता 39 मध्यम आयु में भग्न साध्य होता है २ ९ ३ अस्थिविशेष के अनुसार भग्न के प्रकार " पोडश अध्याय सुखरोगों के निदान का उपक्रम २ ९ ३ " की संख्या और आयतन 39 आयतन के अनुसार संख्या ओष्ठरोग वातज भोष्ट प्रकोप २ ९ ३ पित्तज " २ ९ ४ कफज " 99 सन्निपातज ओष्ठ प्रकोप 99 रक्तज और मांसज ओष्ठ प्रकोप " " दोज ओष्ठ प्रकोप इतज 99 33 " मूलगत रोग-शीताद लक्षण " " दन्तपुष्पुटक " निदान - स्थान समात faqe: पृष्टायाः दन्तचेष्ट के लक्षण २ ९ ४ सौपिर के " " 99 महासांपिर के " परिदर के 99 २ ९ ५ उपकुश के " विदर्भ के " " 33 23 अधिमास के " " दन्तनादी का लक्षण " दन्त रोग दालन I कृमिदन्तक I दन्तहर्ष I भञ्जनक I २ ९ ६ दन्तशर्करा 99 कपालिका श्यावदन्तक " " हनुम 19 जिहागत रोग | त्रिविधजिहाकण्टक के लक्षण " J भलास लक्षण २ ९ ७ उपजिहिका लक्षण " 3 तालुगत रोग refusat 9 तुण्डिकेरी और अधूप के लक्षण " " कच्छप और रक्तार्बुद के " मांससवात और तालुपुप्पुर के लक्षण " | तालुशोष और तालुपाक के लक्षण … कण्ठगत रोगों के नाम | कण्टरोहिणी के वातजादि भेद से लक्षण २ ९ ८ कण्ठशालूक लक्षण २ ९९ अधिजिहा के 29 चलय के " " 99 जलास के " " " एकवृन्द के 11 " 1 19 शनी के गिलायु " 3 " 3 99 घ ३०० स्वरघ्न के " " " मांसतान के " " 1 विदारी के , सर्वसर ( मुखपाक ) के लक्षण " मुखपाक के वातजादि भेद से लक्षण "
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शारीरस्थान- विषयसूची विषय पृष्टाक पहला अध्याय सृष्टि की उत्पत्ति का क्रम ३ महान और अहद्वार की उत्पत्ति 13 इन्द्रियों की उत्पत्ति a इन्द्रियों के प्रकार 33 तन्मात्रा विशेष और भूतों की उत्पत्ति " इन्द्रियों के विषय " 1 प्रकृति और विकृति ३ प्रकाशमान तेरह तत्त्वों का विवरण 25 जीवात्मा 22 प्रकृति और पुरुष का माध और वैधर्म्य * पुरुष के विषय में एकीय मन I स्थावर जगम भूत ग्रामों के लण भूत ही चिमोपयोगी है 27 अपनी भौनिक इन्द्रियों से अपने भौनिक इन्द्रियाय का ग्रहण ६ सम्मा की मांख्य मत में भिन्नता आत्मा के निस्यत्व में हेतु 27 आत्मा के के गुण 11 मन के गुण " " राजम मन के गुण ७ तामस मन के गुण 22 महाभूतों के गुण 11 आकाशादि भूतों में रहने वाले मादिगुण 13 उपहार दूसरा अध्याय शुक्र के दोष ९ वीर्य दोष के लक्षण " आर्त्तत्र की माध्यामाध्यता " कुणपगन्धि वीर्य की चिकित्सा १० ग्रन्थिभूत शुक्र की चिकित्सा " यदोष युक्त शुक्र की चिकित्सा 33 क्षीण रेनम की चिकित्सा पुगन्धि शुक्र चिकित्सा 33 सामान्य चिकित्मा II शुद्ध शुरू का लक्षण 3 तंत्र चिकित्सा 23 विषय पृष्टाव ग्रंथिभूत आय की चिकित्सा 33 दुर्गन्ध युद्ध आर्तव के लिए १२ वानादिदुष्ट आर्त्तवों की चिकित्सा " शुद्ध आर्त्तव का लक्षण 23 असुग्दर का लक्षण 22 अल्पोपद्रुत रक्त प्रदर की चिकित्सा १३ नष्टाव का कारण और चिकित्सा 29 श्रीणातंत्र की चिकित्सा 99 ऋतुकाल में वर्ज्य ऋतुकाल के नियम " इस प्रकार करने का फल १४ तत्पश्चान सन्तान के लिए feare कर्म करे हवन के बाद का कर्तव्य 19 उत्तरोत्तर रात्रियों में गमन करने से लाभ पुत्र पैदा होने के लिये दिन 13 ऋतुमती के साथ संभोग करने दोष १५ पुत्र की इच्छा रखने वालों के लिए प्रयोग 11 गर्म और अट्टर का साम्य 95 विधिपूर्वक गर्भधारण का फल 33 वर्णोत्पत्ति के कारण 33 तेजोधानु का नेत्र के ऊपर परिणाम १६ त्रियों का आर्तव शुक्र के साथ कैसे मिलना है 23 दोगों को उत्पत्ति १७ नपुसकों के प्रकार में आसेक्य नपुंसक " 2 सौगन्धिक नपुंसक 22 कुम्भीक नपुसक 39 ईक नपुंसक का लक्षण 29 पण्ड का लक्षण नारीपण्ड नपुंसकों की परिगणना शुक्र होने पर पण्ड क्यों १८ शुभाशुभ कार्यों का परिणाम 29 अनस्थ गर्भ 33 | विषय पृष्ठाङ्क स्वप्न में मैथुन से गर्भ १८ क्ल का वर्णन 13 विकून गर्भ " 3 दोइट को पूर्ति न होने से 39 विकून सन्तति उत्पन्न होने के कारण " गर्भ की मलोत्सर्ग क्रिया गर्भ रोता क्यों नहीं 22 गर्भ के लिए व्यवहार १ ९ स्वाभाविक कार्य " भूयिष्ठों का उत्पत्ति में कारण 39 कर्मानुसार जन्म की और अभ्यासा-मारगुणों की प्राि " तीसरा अध्याय -शुक्र और आर्तवों का वर्णन २० गर्भ की उत्पत्ति और उसके पर्याय " दिन - भेद में कारण " ऋतुकाल " ऋतुमती स्त्री के लक्षण २१ ऋतुकाल से भिन्न काल में योनि का संकोच = मासिक धर्म - रजोनिवृत्ति काल कन्या या पुत्र का उत्पत्ति काल सद्यो गर्भधारण के चिन्ह गृहीतगर्भा के उत्तरकालिक चिन्ह २२ गर्भधारण के बाद वर्जनीय २३ निषिद्ध सेवन से परिणाम 1 गर्भ का चार मास तक वृद्धिक्रम २४ दौर्हदों का परिणाम दौहृद से भावी सन्तान के गुणों की पहचान I २५ दौर्हृदों में कारण I गर्भ का पञ्चम महीने से वृद्धिक्रम I गर्भ का पोषण प्रकार २६ गर्मोत्पत्तिक्रम " गर्भ के पितृजादि लक्षण I I २७ गर्भ लिन निश्चय 33 सद्गुणी बालक के जन्म में कारण II विकृत अङ्ग - प्रत्यङ्गों में कारण 99
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विषय पृष्ठाङ्क चौथा अध्याय प्राण २८ स्वचाओं का वर्णन २ ९ कलावर्णन " 2 कला स्वरूप " प्रथम कला ३० ऊपर के प्रतानों के लिए दृष्टान्त " रक्तधरा कला 95 मास से रक्त कैसे निकलता है । इसका प्रमाण " मेदोधरा कला 19 गोक्त मेद का स्पष्टीकरण " श्लेष्मधरा कला का वर्णन श्लेष्मधरा कला का कार्य पुरीषधरा कला का वर्णन ३१ पित्तधरा कला " " शुक्रधरा कला 99 शुक्रव्यापकता के दृष्टान्त " शुक्रमार्ग हर्पजन्य शुक्रप्रादुर्भाव गर्भवती स्त्री के आर्तव न दीखने तथा पुष्ट स्तन और अपरा बनने में कारण ३२ यकृत, प्लीहा, फुफ्फुस और उपदुक की उत्पत्ति 39 आन्त्र, गुद और बस्तियों की उत्पत्ति " जिह्वा की उत्पत्ति " स्रोतों का विदारण और पेशियों का बनना 29 स्रायु और आशयों की उत्पत्ति " " वृक्क, वृपण और हृदय की उत्पत्ति " " हृदय का स्वरूप ३३ निद्रा ३४ | निद्रा का विषय 33 निद्रा तो बोध नहीं होने देती फिर दर्शन कैसे होता है । निर्विकार भूतात्मा की निद्रा में " 3 कारणता निद्रा के नियम तथा उनके परि " पालन न करने के दोप ३५ निद्रा के विषय में सग्रह श्लोक निद्रा नाश के कारण 29 निद्रा नाश हरण करने के उपाय 39 अतिनिद्रा की चिकित्सा " रात्रि जागरण ३६ | और दिवास्वप्न किसके लिये लाभप्रद तन्द्रा है " " का लक्षण विषयसूची | विषय पृष्ठाङ्क जृम्भा का लक्षण ३६ क्लम का लक्षण 99 आलस्य का लक्षण 39 उखलेश का लक्षण ३७ ग्लानि का लक्षण " 9 गौरव का लक्षण 29 मूर्च्छा, भ्रम, तन्द्रा और निद्रा के लक्षण " गर्भ की वृद्धि " J गर्भवृद्धि " नवदने वाले अग 39 नित्य बढ़ने वाले अन " " प्रकृति के भेद 29 प्रकृति चनने में कारण " " वात प्रकृति के लक्षण ३८ पित्त प्रकृति के लक्षण 99 कफ प्रकृति के लक्षण ३ ९ द्विदोपज और त्रिदोषज प्रकृति " प्रकृति स्थिर रहती है । " 9 प्रकृति बाधक न होने में दृष्टान्त " 3 अन्य आचार्य का मत " " सवका के लक्षण ४० राजस काय के लक्षण 39 तामस काय के लक्षण " उपसंहार ४१ पाँचवाँ अध्याय शरीर सज्ञा ४१ प्रत्यक्ष विभाग " भीतरी अङ्ग प्रत्यङ्गों का वर्णन ४२ अन्तस्थ अङ्ग - प्रत्यङ्गों की सख्या आशयों का वर्णन 39 " अत्रों की दीर्घता 29 स्रोतसों का वर्णन 99 कण्डराओ का वर्णन ४३ । जालों का वर्णन ” | कूचों का वर्णन 99 मांसरज्जुओं का वर्णन 33 53 संघात सीमन्त 31 29 अस्थियों की संख्या , शाखागत अस्थियों का परिगणन ४४ श्रोणि, पार्श्व, वक्षःस्थल और स्कन्ध प्रदेश की अस्थियाँ गर्दन और उसके ऊपर की हड्डियाँ " अस्थियों के प्रकार "४५ । शरीर धारण में अस्थियों की प्रधानता " | विपय पृष्ठाङ्क सन्धिय ४५ सन्धियों की सख्या ४६ शाखागत सन्धियां 99 कोष्ठगत सन्धियाँ " ऊर्ध्वजत्रुगत सन्धिय " सन्धियों के प्रकार सन्धियों के स्थान केवल हट्टियों में सन्धि ४७ नायु की सख्या " शाखागत स्नायु 39 = कोष्ठगत स्नायु = ऊर्ध्वजत्रुगत स्नायु = पेशियों का वर्णन = शाखागत पेशिया = कोष्ठगत पेशियां ४८ 21 उर्ध्वजत्रुगत पेशियां 2 | पेशियों के हद होने के कारण = खियों की पेशियां = पेशियों के स्वरूप = लिङ्ग भेद रहने पर भी सामान्य पेशी सख्या में समानता 99 मर्मादिकों के प्रकार ४ ९ 99 गर्भ स्थित शिशु की स्थिति शल्यज्ञान की आवश्यकता " 3 शवच्छेदन की आवश्यकता " शवच्छेदन की विधि ५० रमाका दर्शन 39 निःसन्देह ज्ञान के पश्चात् चिकित्सा करे. " छठा अध्याय मर्मों की सख्या तथा प्रकार ५० मर्म विभागों की सख्या ५१ देशभेद से मर्मों की सख्या 33 मांसादि मर्मों के नाम मर्मो के प्रकार " 3 35 सः प्राणहर मर्म ५२ कालान्तर प्राणहर मर्म विशल्यन मर्म वैकल्य र मर्म " 99 जाकर मर्म क्षिप्र मर्म का लक्षण " मर्म का लक्षण " मर्मों के साथ महाभूतों का सम्वन्ध अन्य आचार्यों का मत " उपर्युक्त विधान की पुष्टि ५३ शल्य चिकित्सा में मर्मों की रक्षा " करनी चाहिए " "
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विषयसूची m विषय पृष्ठाङ्क | कुपित कफ - पित्तों का लक्षण ५३ माँ का कार्य करने का काल ५४ सक्थि ( शाखाओं ) के मर्म और उन पर आघात होने पर होने वाले उपद्रव " पेट और छाती के मर्म तथा उनके चिह्न होने पर पैदा होने वाले उपनव ५५ पृष्ठ मर्म ५६ ग्रीवा के ऊपर मर्म 23 शाखा नष्ट होने से मृत्यु नहीं होती ५७ मम का प्राधान्य 23 मम में त्रिगुण, भूतात्मा आदि रहते है ५८ विविध ममों पर आघात होने से उत्पन्न होने वाले लक्षण मर्मों के विकार कृच्छ्रमाध्य होते हैं । सातवाँ अध्याय शिराओं की संख्या और दृष्टान्त सात सौ मिराओं का विवरण वातवह शिराओं का विभाग शेष शिराओं का विभाग ६० । शिराचारी अकुपित और कुपित वायु का कार्य 99 शिराचारी अकुपित तथा कुपित पित्त के कार्य 19 शिराचारी अकुपित और कुपित कफ कार्य 23 निज शिरागत भकुपित और कुपितरक्त के कार्य " प्रायः सभी शिराएं सब दोषों का वहन करती हैं 99 उपर्युक्त मत की पुष्टि के लिए उदाहरण या प्रमाण ६१ शिराओं का वर्ण विभाग 33 भवेध्य शिराओं का वेध करने से उपद्रव 99 सब शिराओं का परिगणन 29 अवेध्य शिराओं का परिगणन " शाखागत अवेध्य शिरायें 39 कोष्ठगत अवेध्य शिरायें ऊर्ध्वजत्रुगत शिरायें ६२ शिराओं को बिसतन्तुओं का दृष्टान्त " आठवाँ अध्याय किन लोगों का और किस दशा में शिरावेध न करे ६३ विषय पृष्ठाङ्क । सिरावेध कब करे? ६३ अवध्य सिराओं का भी वेध करने का समय " शिरावेध की विधि 19 शिरावेध क्च न करे? 29 भिन्न भिन्न स्थानों के लिए नियन्त्रण " विधि ६४ स्थान- भेदानुसार वेध विधि 33 | शिरावेधन काल " " सुविद्ध के लक्षण " अशुद्ध रक्त प्रथम भाने में दृष्टान्त ६५ शिराओं के न बहने के कारण 39 क्षोणादि व्यक्तियों में स्रावण " 3 पूर्णतया दूषित रक्त न निकाले " रक्त - निर्हरण का प्रमाण 33 किन किन रोगों में कहां कहां सिरावेध करे! 99 दुध केवी प्रकार 99 दुष्टवेध के प्रकारों के लक्षण 99 39 " अतिविद्धा का 99 " } कुचिता का 39 93 पिचिता का " " 23 ६७ अस्रुता का 99 अत्युदीर्णा का 33 " 2 अन्तेऽभिहिता का 39 " परिशुष्का का 22 99 कूणिता का " " 39 पिता का 99 " " 99 33 शस्त्रहता का " " 3 तिर्यग्विद्धा का 99 " 1 अपविद्धा का 39 अव्यध्या का " " " " " " " " 33 पुनः पुनः विह्ना का ", शिरावेध के उपद्रव, उपचार और उसका महत्व " " स्नेहन स्वेदनादि करने पर किन किन बातों को वर्ज्य करा चाहिये ६८ | रक्तनिर्हरण साधनों का स्थानानुकूल प्रयोग " " नवाँ अध्याय | धमनी विवरण ६ ९ विषय पृष्ठाङ्क धमनी प्रकार ६ ९ ऊपर जानेवाली धमनियाँ 99 अधोगामी धमनियों के कार्य 99 तिर्यग धमनियों के कार्य ७० धमनियों को मृणालों का दृष्टान्त 29 धमनियों की उत्पत्ति, कार्य और लय " 3 स्रोतों के मूली में विद्ध होने पर पैदा होने वाले लक्षण 29 स्रोत का लक्षण ७२ दसवाँ अध्याय - - gufge गर्भिणी के लिए सामान्य नियम ७३ विशेष नियम महीने महीने के हिसाब से 99 चौथे से सातवें महीने तक के नियम " " आठवें महीने से प्रसवपर्यन्त के नियम 39 नवम मास में सूतिकागार में रखे ७४ सूतिकागार - कैसा हो 99 प्रसूति के लक्षण 33 आसन्न प्रसूति के लक्षण = आसन्न प्रसूति के समय का कर्तव्य ७५ 5 प्रवाहण का विचार = गर्भ सीधा करे = गर्भ रुकने पर उपाय = चालक पैदा होने पर ७६ बालक का अभ्यंग स्नान आदि " = स्तन्य प्रवर्तन काल = शिशु को तीन दिन तक देने के पदार्थ " == सूतिका चिकित्सा सूतिका चिकित्सा ७७ प्रसूता के लिए व = सूतिका के विकार कष्टसाध्य = अपरा पतन न होने पर = मकल रोग लक्षण = मल्ल रोग की चिकित्सा ७८ 9 बालक की सेवा = नामकरण 2 धात्री नियुक्ति विचार 2 दुग्धपान विधि 2 अनेक दाइयों की नियुक्ति न करे 2 दूध पिलाने के पूर्व दूध निकालने की आवश्यकता ७ ९ स्तन्य नाश के कारण और उसके वर्धन के उपाय " 3 =