श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 451–460
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 451–460
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अध्यायः २ चिकित्सास्थानम् १५ अत्यन्त वेदना उत्पन्न करता है । इसमें स्नेहपान तथा सेक शाखासु पतितांस्तिर्यक् प्रहारान् विवृतान् ( कोष्णस्नेहसेक ) उपयुक्त होता है । इन व्रणों में वेशवार सीव्येत् सम्यङ्निवेश्याशु भृशम् | तथा भलीभांति स्निग्ध ( घृत - तैल से युक्त ) कृशरा की सन्ध्यस्थीन्यनुपूर्वशः ॥३४ ॥
पुलटिश बांधनी चाहिये । धान्यस्वेद और स्निग्ध पदार्थों का बद्ध्वा वेल्लित केनाशु ततस्तैलेन सेचयेत् । लेप एवं वातघ्न औषधियों से सिद्ध स्नेहवस्ति का प्रयोग करना चर्मणा गोफणाबन्धः कार्यो, यो वा हितो भवेत् || ३५ || चाहिये ॥ २३-२५ ॥ हाथ - पैर आदि शाखाओं पर लगे हुए तिरछे और अधिक विमर्श - वेशवार -- वेशवारैर्निरस्थिस्विन्नस्निग्धपिष्टमासैः 1 खुले मुख वाले प्रहारों ( व्रणों ) में, सन्धि तथा अस्थियों को कृशरा · तिलतण्डुल- माषकृना यवागूः । उपनाहनं बन्धनम् । धान्य भली भाँति यथास्थान स्थित करके पूर्वोक्त विधि के अनुसार स्वेदो माषादिकोष्णधान्यस्वेद इत्येके, अन्ये तु धान्यं धान्याम्लम्- शीघ्र सीदे और वेल्लित बन्धन ( Spiral bracege ) से अम्लशब्दोत्तरपदलोपेन । ढल्हण
पिञ्चिते च विघृष्टे च नातिस्रवति शोणितम् ।
अगच्छति भृशं तस्मिन् दाहः पाकश्च जायते ॥ २६ ॥
तत्रोष्मणो निग्रहार्थं तथा दाहप्रपाकयोः ।
शीतमालेपनं कार्यं परिपेकश्च शीतलः ॥ २७ ॥
पिञ्चित और घृष्ट व्रण से रक्तस्राव अधिक नहीं होता । रक्तस्राव न होने के कारण अत्यधिक दाह तथा पाक होता है । इसमें व्रण की ऊष्मा तथा दाह और पाक को रोकने के लिए शीतल लेप एवं परिषेक का प्रयोग करना चाहिए ॥ २६-२७ ॥
पट्स्वेतेषु यथोक्तेषु छिन्नादिषु समासतः ।
ज्ञेयं समर्पितं सर्वं सद्योव्रणचिकित्सितम् ॥ २८ ॥
उपर्युक्त ६ प्रकार के छिन्न - भिन्न व्रणों की चिकित्सा संक्षेप में बतलाई गई है । इनका प्रयोग सद्योव्रण चिकित्सा में करना चाहिए ॥ २८ ॥
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि छिन्नानां तु चिकित्सितम् ॥२६ ॥
ये व्रणा विवृताः केचिच्छिर ' पार्श्वावलम्बिनः ।
तान् सीव्येद्विधिनोक्तेन बध्नीयाद्गाढमेव च ॥ ३० ॥
इसके आगे छिन्न व्रर्णों की चिकित्सा विधि का वर्णन करता हूँ | चौडे मुखवाले शिर और पंसवार्डो में स्थित व्रणों को कही गई विधि ( ऋजुग्रन्थित्वेन सेवन्यादिना ) के अनुसार सीना चाहिए तथा कसकर पट्टी बाँधनी चाहिए ॥ २ ९ -३० ॥
कर्णं स्थानादपहृतं स्थापयित्वा यथास्थितम् ।
सीव्येद्यथोक्तं तैलेन स्रोतश्चाभिप्रतर्पयेत् ॥ ३१ ॥।
( कटकर ) अपने स्थान से पृथक् हुए कान को यथा स्थान रखकर पूर्वोक्त विधि के अनुसार सीना चाहिए तथा तेल से ( वातघ्न औषध सिद्ध ) कानों को भर देना चाहिए ॥
कृकाटिकान्ते छिन्ने तु गच्छत्यपि समीरणे ।
सम्यनिवेश्य बध्नीयात् सीव्येञ्चापि निरन्तरम् ॥३२ ॥
आजेन सर्पिषा चैवं परिपेकं तु कारयेत् ।
उत्तानोऽन्नं समश्नीयाच्छयीत च सुयन्त्रितः ॥ ३३ ॥
ग्रीवा यदि कृकाटिकान्त प्रदेश ( गले का पिछला भाग ) तक कट गई हो और वायु भी बाहर निकल रहा हो तो उसे यथास्थान भली भाँति स्थापित कर चारों ओर से सीकर पट्टी बाँधनी चाहिए । बकरी के घी से परिषेक करना चाहिए ।
तथा उत्तान ( पीठ के बल लिटाकर भोजन कराना चाहिए ।
और यन्त्रों से बाँधकर सुलाना चाहिए ॥ ३२-३३ ॥
शीघ्र बाँधकर तैल ( वातघ्न औषध सिद्ध ) के द्वारा सिंचन करे । चमड़े से गोफणावन्धन Shing bandage ) अथवा नो बन्धन हितकर हो उसका प्रयोग करे ॥ ३४-३५ ॥
पृष्ठे व्रणो यस्य भवेदुत्तानं शाययेत्तु तम् ।
अतोऽन्यथा चोरसिजे शाययेत् पुरुषं त्रणे ॥ ३६ ॥
जिस व्यक्ति के पीठ में व्रण हो उसे पीठ के वल ( उतान ) तथा जिसे छाती में व्रण हुआ हो उसे पेट के बल लिटाना | चाहिए ॥ ३६ ॥
विमर्श - उत्तानं शाययेदिति दोषस्रुत्यर्थम्, अन्यथा अनिर्गच्छन् अन्तर्व्यवस्थियो दोष उत्सङ्ग कृत्वा विकरोति, अन्यथेति अधोमुख इत्यर्थः । उक्तञ्च ‘ ठरोव्रणी उत्तानशय्या परिहरेत् । पृष्ठव्रणी तु स्तनो-रोऽवष्टभ्य, दोषस्त्वन्यथा न प्रसिच्यते, अनिर्गच्छन् विकारान् उत्पादयति इतिजेब्जटः । गयी तु ' पृष्ठे व्रणो यस्य भवेदनुत्तान शयीत सः । अतोऽन्यथा चोरसिजे शयीत पुरुषो ब्रणै ' इति पठति, व्याख्यानयति च - अनुत्तानोऽवाङ्मुखः अधोमुख. शयीत, उर सिजेषु ory अन्यथा उत्तान एव शयीतेति ।
छिन्नां निःशेषतः शाखां दग्ध्वा तैलेन बुद्धिमान् ।
बध्नीयात् कोशबन्धेन प्राप्तं कार्यं च रोपणम् ॥ ३७ ॥
बुद्धिमान् वैद्य सम्पूर्ण रूप से कटी हुई शाखा तैल से जलाकर कोश बन्धन ( Sheath bandage तथा रोपण कर्म करे ॥ ३७ ॥
चन्दनं पद्मकं रोध्रमुत्पलानि प्रियङ्गवः ।
हरिद्रा मधुकं चैव पयः स्यादन्न चाष्टमम् ॥
तैलमेभिर्विपक्कं तु प्रधानं व्रणरोपणम् चन्दनं कर्कटाख्या च सहे मांसाह्वयाऽमृता हरेणवो मृणालं च त्रिफला पद्मकोत्पले को ( उष्ण ) ) से बाँधे ३८ ॥
।
॥ ३६ ॥
त्रयोदशाङ्गं त्रिवृतमेतद्वा पयसाऽन्वितम् ॥ ४० ॥
तैलं विपक्कं सेकार्थे हितं तु व्रणरोपणे ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि भिन्नानां तु चिकित्सितम् ॥४१ ॥
चन्दन, पद्माख, लोध्र, नील कमल, प्रियङ्गु, हल्दी, मुलेटी और आठवें द्रव्य दूध के साथ पकाया गया तेल व्रणरोपण के लिए उत्तम होता है । चन्दन, काकडासिंगी, मापपर्णी, मुद्गपर्णी, जटामांसी, गिलोय, रेणुकाबीज, खस, हरढ, बहेडा, भाँवला, पद्माख और नील कमल, इन तेरह औषधियों के कल्क के द्वारा घृत, वसा तथा मज्जा से युक्त तैल का पाक चतुर्गुण दुग्ध के साथ किया जावे । यह त्रयोदशाङ्ग तैल परिपेक एवं रोपण के लिए हितकर होता है । इसके आगे भिन्न a ण की चिकित्सा विधि का वर्णन किया जाता है ॥ ३८-४१ ॥
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१६ सुश्रुतसंहिता विमर्श - त्रिवृतमिति । त्रिभिर्वृतवसामनभिर्वृत तैल त्रिवृतम्, एतत् त्रयोदशाङ्ग तैलम् । गयी तु मज्जवर्ल्ड लेस्त्रिवृतमित्याह, तन्मते त्रिवृतं पयसा विपक्क नगरोपणमिति ।
भिन्नं नेत्रमकर्मण्यमभिन्नं लम्बते तु यत् ।
तन्निवेश्य यथास्थानमव्याविद्धसिरं शनैः ॥ ४२ ॥
पीडयेत् पाणिना सम्यक् पद्मपत्रान्तरेण तु ।
ततोऽस्य तर्पणं कार्यं नस्य चानेन सर्पिषा ॥ ४३ ॥
भिन्न नेत्र अवलोकन आदि अपने कार्यों के अयोग्य हो जाता है 1 । जो नेत्र भिन्न न होकर बाहर निकल भाया हो उसे शिराओं की स्थिति में विना वाधा पहुँचाये यथास्थान स्थापित कर, ऊपर कमल पत्र रखकर, हाथ से धीरे धीरे भली - भाँति दवावे । इसके पश्चात् आगे कहे जानेवाले घृत के द्वारा तर्पण ( नेत्रों में घृत भरना ) और नस्य कर्म करे ॥४२ ४३ ॥ आजं घृतं क्षीरपात्रं मधुक चोत्पलानि च ॥
जीवकर्षभकौ चैव पिष्ट्वा सर्पिर्विपाचयेत् ।
सर्वनेत्राभिघाते तु सर्पिरेतत् प्रशस्यते ॥ ४४ ॥
मुलेठी, नील कमल, जीवक और ऋषभक को पीस कर क्ल्क बनावे तथा एक आढक दूध में बकरी के घी का पाक करे । यह घृन सभी प्रकार के नेत्राभिघात के लिए उत्तम होता है ॥ ४४ ॥
उदरान्मेदसो वर्तिर्निर्गता यस्य देहिनः ॥ ४५ ॥
कषायभस्ममृत्कीर्णा बद्धवा सूत्रेण सूत्रवित् ।
अग्नितप्तेन शस्त्रेण च्छिन्द्यान्मधुसमायुतम् ॥ ४६ ॥।
बद्ध्वा व्रण सुजीर्णेऽन्ने सर्पिष. पानमिष्यते ।
स्नेहपानाद्यते चापि पयःपानं विधीयते ॥ ४७ ॥
शर्करामधुयष्टिभ्यां लाक्षया वा श्वदष्ट्रया ।
चित्रासमन्वित चैव रुजावाहविनाशनम् ॥ ४८ ॥
यदि मनुष्य के उदर से मेद की वर्ति बाहर निकल भावे तो शास्त्र जानने वाला वैद्य उस पर कपाय भस्म ( सर्जका र्जुनाढ्यस्तेपा भस्म क्षारः ) और काली मिट्टी का चूर्ण छिड़ककर सूत्र से बाँधे तथा मधु लगे हुए अग्नितप्त शस्त्र से काटकर पट्टी बाँध दे । रोगी के खाये हुए आहार का भली-भाँति पाचन हो जाने पर घृतपान करावे । स्नेहपान के अतिरिक्त दुग्धपान का विधान भी करना चाहिए । शर्करा, मुलेठी, लाख, गोखरू और एरण्ड से सिद्ध दूध पीडा और दाह को दूर करता है ॥ १५-४८ ॥ विमर्श - कषाया • सर्जकार्जुनाढ्य, तेषा भस्म क्षारः, मृत् कृष्णमृत् । चित्रा - एरण्डः । मेदवर्ति के छेदन में अग्नितप्त शस्त्र का विधान व्रण को पाक से बचाने के लिए किया गया है । बाहर निक्ली हुई मेदवर्ति जब अन्दर प्रविष्ट न हो अथवा प्रविष्ट होकर भी जो पुनः बाहर निकल आवे तव उसकी जड़ में सूत्र बाँधकर उपरी हिस्से को अग्नितप्त शस्त्र ( Cautery knife ) से काट देना चाहिए । वातप्रकोप से व्रण की रक्षा करने के लिए अन्न जीर्णं होने के बाद घृत अथवा औषध सिद्ध दुग्ध पान का विधान किया गया है । वृद्ध वाग्भट ने लिखा है- ' तक्षौद्रे च व्रणे बद्धे सुजीर्णेऽन्ने घृत पिवेत् । क्षीर वा चाचित्रालाक्षागोक्षुरकैः वनम् ।
आटोपो मरणं वा स्याच्छूलो वाऽच्छिद्यमानया ।
मेदोग्रन्थौ तु यतैलं वक्ष्यते तच्च योजयेत् ॥४६ ॥
मेदवर्ति का छेदन न करने पर, आटोप ( वायु से उदर गुडगुडाहट ), उदरशूल या मृत्यु भी हो सकती है । मेदग्रन्थि के लिए जिस तैल ( द्विकरञ्जतैल ) का कथन किया गया है उसका प्रयोग करना चाहिए ॥ ४ ९ ॥
त्वचोऽतीत्य सिरादीनि भित्त्वा वा परिहृत्य वा ।
कोष्ठे प्रतिष्ठितं शल्यं कुर्यादुतानुपद्रवान् ॥ ५० ॥
त्वचा को छेटकर शिरा आदि का भेदन करते हुए अथवा बचाकर कोष्ठ में प्रविष्ट हुआ शल्य पूर्वोक्त ( कोष्ठगते त्वाटो-पानाहविध्यादीन् ) उपद्रवों को उत्पन्न करता है ॥ ५० ॥
तत्रान्तर्लोहितं पाण्डुं शीतपादकराननम् ।
शीतोच्छ्वासं रक्तनेत्रमानद्धं च विवर्जयेत् ॥ ५१ ॥
रक्त से भरे हुए कोटवाले, श्वेतशरीर, ठण्ढे हाथ, पैर, मुख और श्वास से युक्त तथा लाल नेत्र और दोष एवं मल की रुकावट से पीडित रोगी को त्याग देना चाहिए ॥ ५१ ॥
आमाशयस्थे रुधिरे वमनं पथ्यमुच्यते ।
पक्वाशयस्थे देयं च विरेचनमसंशयम् ॥ ५२ ॥
आमाशय में रक्त एकत्रित होने पर वमन तथा पक्वाशय में एकत्रित होने पर निःशङ्क विरेचन का प्रयोग करना चाहिए ॥ ५२ ॥
आस्थापनं च निःस्नेहं कार्यमुष्णैर्विशोधनैः ।
यवकोलकुलत्थानां नि'स्नेहेन रसेन च ।
भुञ्जीतान्नं यवागूं वा पिबेत् सैन्धवसयुताम् ॥ ५३ ॥
( गोमूत्र आदि ) उष्ण विशोधन द्रव्यों से स्नेह रहित आस्थापन वस्ति का प्रयोग करना चाहिए । जौ, बेर और कुलथी के स्नेह रहित रस ( यूप ) के साथ अन्न का आहार अथवा सेंधा नमक मिश्रित यवागू, ( यबानू विरलद्ववा ) । पिलाना चाहिए ॥ ५३ ॥
अतिनिःस्रुतरक्तो वा भिन्नकोष्ठः पिवेदसृक् ॥ ५४ ॥
जिस मनुष्य के शरीर से रक्तस्राव अधिक हो गया हो अथवा कोष्ठ फट गया हो उसे ( रक्त की न्यूनता को पूरा करने के लिए ) रक्तपान करना चाहिए ॥ ५४ ॥
विमर्श - ( आजकल Blood transfusion का प्रयोग ऐसी स्थिति में किया जाता है । )
स्वमार्गप्रतिपन्नास्तु यस्य विण्मूत्रमारुताः ।
व्युपद्रवः स भिन्नेऽपि कोष्ठे जीवति मानव ॥ ५५ ॥
( शल्य विद्व ) जिस व्यक्ति का मल, मूत्र और वायु अपने मार्ग से प्रवृत्त होता हो तथा उपद्रव ( ज्वर, आध्मान आदि ) शान्त हो गए हों, वह मनुष्य कोष्ठ भिन्न होने पर भी जीवित रहता है ॥ ५५ ॥
अभिन्नमन्त्रं निष्क्रान्तं प्रवेश्यं नान्यथा भवेत् । · पिपीलिकाशिरोग्रस्तं तदप्येके वदन्ति तु ॥५६ ॥
यदि विना फटी हुई आंत बाहर निकल भाई हो तो उसे
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अध्याय २ ] चिकित्सास्थानम् १७ पूर्वस्थिति में अन्दर प्रवेश करना चाहिये । कुछ आचार्यों का ततस्तैलमिदं कुर्याद्रोपणार्थं चिकित्सकः | मत है कि ( फटी हुई भांत को ) चीटों के शिर ( मुख ) त्वचोऽश्वकर्णघवयोर्मोचकीमेषशृङ्गयोः से, फटे हुए दोनों सिरों को मिलाकर, पकड़वाकर आंत को अन्दर प्रविष्ट करना चाहिये ॥ ५६ ॥
विमर्श - ना यथेति । यथैव स्थितानि नथैव प्रवेश्यानि तेनैव प्रकारेणेत्यर्थं । अपरे तु अन्यथा व्याख्यानयन्ति यथा - अभिन्नाद-न्यथा अपरप्रकार भिन्नमन्त्र प्रवेश्य न भवेत् तथा च वृद्धवाग्भटः-' अभिन्नमन्त्र निष्क्रान्त प्रवेश्य न ह्यतोऽन्यथा ' इति । भिन्नमपि मतान्तरेण प्रवेश्यमिति निर्दिशन्नाह - पिपीलिका शिगेयस्तमित्यादि । तदपि भिन्नमपि, अन्त्र प्रवेश्यमिति सम्बन्धः । ( ढल्हण )
प्रक्षाल्य पयसा दिग्ध तृणशोणितपांशुभिः ।
प्रवेशयेत् कृत्तनखो घृनेनात शनैः शनैः ॥ ५७ ॥
तृण, रक्त और धूलि से लिप्त ( बाहर निकली हुई ) आंत को दूध से धोकर, घृत का लेपन करके, नाखून कटे हुए हाथ से ( चिकित्सक ) धीरे - धीरे अन्दर प्रविष्ट करे ॥५७ ॥
प्रवेशयेत् क्षीरसिक्तं शुष्कमन्त्रं घृताप्लुतम् ।
अङ्गुल्याऽभिमृशेत् कण्ठं जलेनोद्वेजयेदपि ॥ ५८ ॥
हस्तपादेषु संगृह्य समुत्थाप्य महाबलाः ।
भवत्यन्त. प्रवेशस्तु यथा निर्धुनुयुस्तथा ॥ ५६ ॥
तथाऽन्त्राणि विशन्त्यन्तः स्वां कलां पीडयन्ति च ।
व्रणाल्पत्वाद्बहुत्वाद्वा दुष्प्रवेशं भवेत्तु यत् ॥ ६० ॥
तदापाट्य प्रमाणेन भिपगन्त्रं प्रवेशयेत् ।
यथास्थानं निविष्टे च व्रणं सीव्येदतन्द्रितः ॥ ६१ ॥
सूखी हुई आंत को दूध से धोकर घृत का लेपन करके अन्दर प्रविष्ट करना चाहिए । ( यदि बाहर आई हुई आंत अन्दर प्रविष्ट न होती हो तो उसे यथास्थान करने के लिये तीन उपाय करे ) ( 1 ) अंगुलि से ( गले के अन्दर ) कण्ठ में स्पर्श करे, ( २ ) रोगी के ऊपर जल छिड़ककर उसे त्रास पहुँचावे, ( ३ ) वलवान व्यक्ति ( रोगी के ) हाथ - पैरों को दोनों ओर से पकड़कर ऊपर उठावें और इस प्रकार हिलावे कि भांत अन्दर प्रविष्ट हो जाय । इस प्रकार आंत प्रविष्ट होती हैं और अपनी कला ( मलधरा ) को अन्दर दवाती हैं । ( उदरपर ) व्रण का सुख छोटा अथवा व्रण की अधिकता होने से, आंत का अन्तः प्रवेश कठिन होने पर, वैद्य प्रमाण के अनुसार काटकर आंत को अन्दर प्रविष्ट करे । आलस्यरहित वैद्य आंत को यथास्थान स्थापित करके व्रण को सी दे ॥ ५८-६१ ॥
स्थानादपेतमादत्ते प्राणान् गुम्फितमेव वा ।
वेष्टयित्वा तु पट्टेन घृतसेकं प्रदापयेत् ॥ ६२ ॥
घृतं पिवेत् सुखोष्णं च चित्रातैलसमन्वितम् ।
मृदुक्रियार्थं शकृतो वायोश्चाधः प्रवृत्तये ॥ ६३ ॥
( यथास्थान स्थित न होने पर ) अपने स्थान से हटी हुई अथवा परस्पर उलझी हुई आंत घातक होती है । कपड़े से व्रण को बांधकर ( उष्ण ) घृत का सेक करे और मल में मृदुता लाने तथा वायु को अनुलोम करने के लिए एरण्डतैल-मिश्रित सुखोष्ण घृत पिलावे ॥ ६२-६३ ॥ ३ सु ० चि ० ॥ ६४ ॥
शल्लक्यर्जुनयोश्चापि विदार्याः क्षीरिणां तथा
बलामूलानि चाहृत्य तैलमेतैर्विपाचयेत् ।
व्रणं संरोपयेत्तेन वर्षमात्रं यतेत च ॥ ६५ ॥
इसके बाद चिकित्सक, व्रण - रोपण के लिए निम्नाङ्कित तैल का निर्माण करे । अश्वकर्ण ( अश्वकर्णः पूर्वदेशप्रसिद्धः, अश्वत्थ सदृशः ), धव, सेमल, काकडासिंगी, सलई, अर्जुन, विदारीकन्द और क्षीरिवृक्षों की छाल तथा खरेंटी की जड़ के कल्क से तैल पाक करके, व्रण का रोपण करे एवं एक वर्ष पर्यन्त रोगी को ( मैथुन, व्यायाम आदि से ) बचावे ॥६४-६५ ॥ पादौ निरस्तमुकस्य जलेन प्रोदय चाक्षिणी । ' प्रवेश्य तुन्नसेवन्या मुष्कौ सीव्येत्तत परम् ॥ ६६ ॥
कार्यो गोफणिकाबन्धः कट्यामावेश्य यन्त्रकम् ।
न कुर्यात् स्नेहसेक च तेन क्विद्यति हि व्रणः ॥ ६७ ॥
अण्डकोषों के बाहर निकल आने पर रोगी के पैरों तथा नेत्रों को जल से धोकर, अण्डकोषों को अन्दर प्रविष्ट करके, तुन्नसेवनी से सी देना चाहिये । कटिप्रदेश में लकड़ी का पट्ट ( Splint ) लगाकर गोफणिका - बन्धन ( Sling Bandage ) बाँधना चाहिये तथा स्नेह और सेक नहीं करना चाहिए । स्नेह - सेक करने से व्रण में क्लेद उत्पन्न हो जाता है ॥
कालानुसार्या गुर्वेलाजातीचन्दनपद्मकैः ।
शिलादार्व्यमृतातुत्थैस्तैलं कुर्वीत रोपणम् ॥ ६८ ॥
तगर, अगर, इलायची, चमेली, चन्दन, पद्माख, मैनसिल, दारूहल्दी, गिलोय और तूतिया के कल्क से सिद्ध तैल के द्वारा व्रण का रोपण करे ॥ ६८ ॥
शिरसोऽपहृते शल्ये बालवर्ति निवेशयेत् ।
बालवर्त्यामदत्तायां मस्तुलुङ्गं व्रणात् स्रवेत् ॥ ६६ ॥
हन्यादेनं ततो वायुस्तस्मादेवमुपाचरेत् ।
व्रणे रोहति चैकैक शनैर्बालमपक्षिपेत् ॥ ७० ॥
शिर में लगे हुए शल्य को निकालकर ( व्रण में ) बाल • वर्ति ( केश की वनी वत्ती ) प्रविष्ट करनी चाहिए । व्रण में बालवर्ति का प्रवेश न करने पर मस्तुलुङ्ग लगता है । मस्तुलुङ्ग के स्राव से कुपित हुआ मार डालता है, इसलिए उपर्युक्त चिकित्सा व्रण जैसे - जैसे भरने लगे एक - एक बाल धीरे रहना चाहिये ॥ ६ ९ -७० ॥ विमर्श - मस्तुलुङ्ग. - ' मस्तुलुङ्गमिति शिरसो घृताकार मस्तुलुङ्गमुच्यते ' ( डल्हण ) । का स्त्राव होने वायु रोगी को करनी चाहिये । धीरे निकालते
वलाधानं स्त्यान-गात्रादपहृतेऽन्यस्मात् स्नेहवति प्रवेशयेत् ।
कृते निः शोणिते चापि विधिः सद्यः क्षते हितः ॥७१ ॥
शरीर के अन्य अङ्गसे शल्य निकालकर स्नेहवतिं प्रविष्ट करनी चाहिए । व्रण को ( पाक से बचाने के लिए ) रक्त. रहित करके सद्यः तत के लिए कही गई विधि ( मधु, घृत आदि ) का प्रयोग करना हितकारक होता है ॥ ७१ ॥
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१५ सुश्रुतसहिता
दूरावगाढाः सूक्ष्माः स्युर्ये व्रणास्तान् विशोणितान् । 1
कृत्वा सूक्ष्मेण नेत्रेण चक्रतैलेन तर्पयेत् ॥ ७२ ॥
जो अधिक गहरे तथा सूक्ष्म ( बहुत छोटे ) हों उनको रक्तरहित करके सूक्ष्म नेत्र ( व्रणप्रक्षालन यन्त्र ) के द्वारा चक्रतैल से तर्पण करना चाहिये ॥ ७२ ॥
समङ्गां रजनीं पद्मां त्रिवर्गं तुत्थमेव च ॥ ७३ ॥
विडनं कटुकां पथ्यां गुडूचीं सकरञ्जिकाम् ।
संहृत्य विपचेत् काले तैलं रोपणमुत्तमम् ॥ ७४ ॥
मजीठ, हल्दी, पद्मा ( भार्गी ), त्रिवर्ग ( त्रिफला ), तूतिया, विडङ्ग, कुटकी, हरीतकी, गिलोय और करन को एकत्रित कर, इनके कल्क से सिद्ध किए गए तैल का व्रण-रोपण के समय प्रयोग उत्तम होता है ॥ ७३-७४ ॥ तालीशं पद्मकं मांसी हरेण्वगुरुचन्दनम् ॥
हरिद्रे पद्मबीजानि सोशीरं मधुकं च तैः ।
पक्कं सद्योत्रणेपूक्तं तैलं रोपणमुत्तमम् ॥ ७५ ॥
तासीशपत्र, पद्माख, जटामांसी, रेणुकावीज, अगर, चन्दन, हल्दी, दारुहल्दी, कमलगट्टा, खस और मुलेठी के कल्क के साथ पकाया गया तैल सद्यःत्रण के लिए उत्तम रोपण योग है ॥ ७५ ॥
क्षते क्षतविधिः कार्यः पिचिते भग्नवद्विधिः ।
घृष्टे रुजो विगृह्याशु चूर्णैरुपचरेद् व्रणम् ॥ ७६ ॥
क्षण में क्षतविधि ( मधु, घृत, तैल - अभ्यङ्ग आदि समस्त विधि ) तथा पिचितत्रण में भग्नसधानविधि ( बन्ध, सेक, रूक्ष भोजन आदि ) का प्रयोग करना चाहिए । घृष्टण की पीड़ा को ( मधु, घृत- सेक आदि से ) शीघ्र शान्त करके ( शाल, सर्जक, अर्जुन आदि के ) चूर्णं से ऋण का उपचार करना चाहिए ॥ ७६ ॥
विश्लिष्टदेहं पतितं मथितं हतमेव च ॥ ७७ ॥
वासयेत्तैलपूर्णायां द्रोण्यां मांसरसाशनम् ।
अयमेव विधिः कार्यः क्षीणे मर्महते तथा ॥ ७८ ॥
जिस मनुष्य के अङ्ग अपने स्थान से च्युत हो गए हों, जो ऊँचे स्थान से गिर पढा हो, कुचल गया हो, तथा जिसे चोट लगी हो, उसे तेल से भरी हुई द्रोणी ( लकडी का बना नौकृति पात्र ) में रखे और मासरस खिलावे । क्षीण एव ममं स्थान में चोट लगे हुए रोगी के लिए भी इसी विधि का प्रयोग करना चाहिए ॥ ७७-७८ ॥
रोपणे सपरीपेके पाने च त्रणिनां सदा ।
तैलं घृत वा संयोज्यं शरीरतूनवेक्ष्य हि ॥ ७६ ॥
मण रोगी के व्रणरोपण, परिपेक और पान में उसकी प्रकृति और ऋतु का विचार करके तेल अथवा घृत का प्रयोग सदा करना चाहिए ॥ ७ ९ ॥ विमर्श- यदि रोगी वात कफ प्रकृतिवाला हो और शिशिर आदि तुएँ हों तो तेल का तथा रक्त, पित्त प्रकृति वाला और शरद आदि ऋतुएँ हों तो घृत का प्रयोग करना चाहिए ।
घृतानि यानि वक्ष्यामि यत्रतः पित्तविद्रध ।
सद्योव्रणेषु देयानि तानि वैद्येन जानता ॥ ८० ॥
पित्तज विद्रधि के लिए जिन घृतों का वर्णन किया जायगा उनका उपयोग बुद्धिमान वैद्य को सद्यः व्रण में यत्नपूर्वक करना चाहिए ॥ ८० ॥
सद्यः क्षतत्रणं वैद्यः सशूलं परिषेचयेत् ।
सर्पिषा नातिशीतेन बलातैलेन वा पुनः ॥ ८१ ॥
शूलयुक्त सद्यः व्रण का परिपेक वैद्य किञ्चित् उष्ण घृत अथवा बलातैल से करे ॥ ८१ ॥
समङ्गां, रजनीं पद्मां पथ्या तुत्थं सुवर्चलाम् ।
पद्मकं रोधमधुकं विडङ्गानि हरेणुकाम ॥ ८२ ॥
तालीशपत्रं नलदं चन्दनं पद्मकेशरम् ।
मञ्जिष्टरलाक्षाच क्षीरिणां चापि पल्लवान् ॥ ८३ ॥
प्रियालबीजं तिन्दुक्यास्तरुणानि फलानि च ॥
यथालाभं समाहृत्य तैलमेभिर्विपाचयेत् सद्योव्रणानां सर्वेषामदुष्टानां तु रोपणम् ॥ ८४ ॥
मजीठ, हल्दी, भार्गी, हरीतकी, तूतिया, हुलहुल, पद्माख, लोध्र, मुलेठी, विटङ्ग, रेणुकाबीज, तालीशपत्र, खस, चन्दन, पद्मकेशर, मजीठ, खस, लाख तथा क्षीरिवृक्षों ( वट, गूलर आदि ) के पत्र, चिरौजी और तिन्दुक के कच्चे फल, इन द्रव्यों में जो उपलब्ध हों उन्हें एकत्रित कर इनके कल्क के साथ तैल पाक करे । यह तैल सभी प्रकार के शुद्ध सद्य. व्रणों का रोपण करता है ॥ ८२-८४ ॥
कषायमधुराः शीताः क्रियाः स्निग्धाश्च योजयेत् ।
सद्योव्रणाना सप्ताहं पश्चात् पूर्वोक्तमाचरेत् ॥ ६५ ॥
सद्यः व्रण में एक सप्ताह तक कपाय, मधुर, शीतल और स्निग्ध क्रिया तथा इसके पश्चात् पूर्वोक्त विधि ( द्वित्रणीय. चिकित्सा विधि ) का प्रयोग करना चाहिए ॥ ८५ ॥
दुष्टव्रणेषु कर्तव्यमूर्ध्वं चाधश्च शोधनम् ॥ ८६ ॥
विशोषणं तथाऽऽहारः शोणितस्य च मोक्षणम् ।
कपाय राजवृक्षादी सुरसादौ च धावनम् ॥८७ ॥
तयोरेव कपायेण तैल शोधनमिष्यते ।
क्षारकल्पेन वा तैलं क्षारद्रव्येषु साधितम् ॥ ८८ ॥
दूपित व्रणों में ऊर्ध्वं ( वमन शिरोविरेचन ) तथा अधः-शोधन ( विरेचन आस्थापन ) का प्रयोग, विशोषण, ( लघन ), आहार ( तिक्त, कटु, कपाय द्रव्य ) और रक्तमोक्षण करना चाहिए । व्रण धोने के लिए आरग्वधादि और सुरसादि गण के द्रव्यों का काथ तथा शोधन के लिए इन्हीं द्रव्यों के कपाय से सिद्ध तैल का प्रयोग हितकर होता है । अथवा क्षारपाक विधान के अनुसार क्षारोदक बना कर, क्षारद्रव्यों ( मुष्कक, पलाश आदि ) के कल्क के द्वारा सिद्ध किया गया तैल, व्रणशोधन के लिए प्रयोग में लावे ॥ ८६-८८ ॥
द्रवन्ती चिरबिल्वश्च दन्ती चित्रकमेव च ।
पृथ्वीका निम्बपत्राणि कासीसं तुत्थमेव च ॥ ८६ ॥
त्रिवृत्तेजोवती नीली हरिद्रे सैन्धवं तिलाः ।
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श्रध्यायः ३ ) चिकित्सास्थानम् e भूमिदम्व: सुबहा शुकारुया लाङ्गलाया ॥ ६० ॥
नेपाली जालिनी चैव मदयन्ती मृगादनी ।
मुधामूर्ककीटा रिहरितालकरञ्जिकाः ॥ ६१ ॥
यथोपपत्ति फर्नत्र्यं तैलमेतैस्तु शोधनम् ।
घृतं वा यदि वा प्राप्त कल्काः संशोधनास्तथा ॥६२ ॥
यन्ती ( दन्ती भेद ), कर, दन्ती, चित्रक, मंगरैला नीम के पत्ते, कासीम, तूतिया, निशोध, तेजोवनी ( माल । कांगनी ), नील के पत्ते, हल्दी, दारहल्दी, सेन्धानमक, तिल, भूमिस्टर ( गोरगमुण्डी ), सुहा ( गोधापदी ), शुकम्पा ( चर्मकार ), कलिहारी, नेपालरी ( मैनशिल ), जालिनी ( कटुतुन्बी ), मदयन्ती ( मेहदी ), मृगादनी ( इन्द्रायण की जय ), सेण्ट, सूर्या, मदार, बिट, हरिताल और पर, इनमें में जितने द्रव्य उपलब्ध हो उनके एक के साथ शोधन का पाक करे । अथना ( शोधन द्रव्यों से मिद ) गृम या मशोधन क्रकों का प्रयोग आवश्यकतानुसार हितकर होता है ॥ ८० - ९ २ ॥ सैन्धवत्रिवृदेरण्टपत्र कल्कस्तु वातिके ॥
त्रिदरिद्रामधुककल्कः पैत्ते तिलैर्युतः ।
कफजे निलने जोहान्तीस्वर्जिकचित्रकाः ॥ १३ ॥
सेन्धानमक, निशोथ और पुण्ड पत्र के एक का प्रयोग यान से दूषित, निशोध, हल्दी और मुलेठी के तिल! युक्त का प्रयोग पित्त में दूषित तथा निल, मालकांगनी, दन्ती, मजीमार और चित्रक j के एक का प्रयोग कफ से दूषित च के शोधन के लिए करना चाहिए ॥ ९ ३ ॥ दुष्णविधिः कार्यो मेहकुष्वपि ॥ ६४ ॥
प्रमेह और कुष्ठ उत्पन्न चणों की चिकित्सा मे भी दुष्ट. चिकित्सा विधि का प्रयोग करना चाहिए ॥ ९ ४ ॥
पविवः प्राक् प्रदिष्टो यः सद्योत्रणविनिश्चयः ।
नान: शक्यं परं वक्तुमपि निचितवादिभि ॥ १५ ॥
६ प्रकार के जिन सद्यचणों का उल्लेख पहले किया जा चुका है उनसे अधिक की गणना करने में नियमित वाणी बोलने वाले भी समर्थ नहीं हो सक्ते ॥ ९ ५ ॥
उपसर्गैर्निपातैश्च तत्तु पण्डितमानिनः ।
केचित् सयोज्य भापन्ते बहुधा मानगविताः ॥ ६६ ॥
अपने को पण्डित समझने वाले कुछ अभिमानी लोग, उपसर्ग ( प्र- परादयः ) और निपात ( घादय ) का संयोग करके इन्हें अनेक प्रकार का मानते है ॥ ९ ६ ॥
बहु तद्भापितं तेषां पट्स्वेवेवावतिष्ठते ।
विशेषा इव सामान्ये पट्लं तु परमं मतम् ॥ ६७ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने सद्योव्रण-चिकित्सितं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
जिस प्रकार सामान्य में विशेष का समावेश रहता है उसी प्रकार उनके अनेकविध कथन का इन्हीं ६ भेदों में अन्तर्भाव हो जाता है । अतः ( सद्यःण के ) ६ भेद हैं, यही श्रेष्ठ मत है ॥ ९ ७ ॥ विमर्श - उपसर्ग - परादव, ते संयोज्य भापन्ते, यथा सम्यक् छिन मन्दिन, सुष्ठु धिन मुच्छिन्नम्, अल्पं हि छिनमाच्छिन्न-मिनि, निपातैर्यथा - अनिकमाच्दिनमतिच्छिन्न, पूजिन छिन्न मु-नाम्, अन्य निमीपनिमाचिन्नमिति । विशेषा इव सामान्ये इनि । यथा हि कर्ममामान्ये गमनप्रमारणा कुळनादांना कर्मविशेषाणा-भवरोध तथा छेदसामान्ये सर्वपामेव सन्दिनपरिच्छिनातिच्छिन्ना-दीना छेदविशेषानामवगेन । ढल्हण इत्यायुर्वेदतस्रसन्दीपिका- भापाटीकायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः अथातो भमानां चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
इसके अनन्तर भन्नों की ( अस्थि और सन्धि भग्न ) चिकित्सा विधि का वर्णन किया जा रहा है, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत प्रभृति शिष्यों से कहा ) - ~ ॥ १-२ ॥
अल्पाशिनोऽनात्मवतो जन्तोर्वातात्मकस्य च ।
उपद्रवैर्वा जुष्टस्य भग्नं कृच्छ्रेण सिध्यति ॥ ३ ॥
अल्प आहार करने वाले, अजितेन्द्रिय ( अपय्यसेवी ), वातप्रकृति और उपद्रवों ( ज्वर, आध्मान, मुल - मूत्र का अवरोध ) से युक्त व्यक्ति का भग्न कष्टसाध्य होता है ॥ ३ ॥
लत्रणं कटुकं क्षारमम्लं मैथुनमातपम् ।
व्यायामं च न सेवेत भग्नो रूक्षान्नमेव च ॥ ४ ॥
रावण, कटु, क्षार, अम्ल, मैथुन, धूप, व्यायाम और रूक्ष अन का सेवन भनवाले व्यक्ति को नहीं करना चाहिये ॥
शालिर्मासरसः क्षीरं सर्पिर्यूपः सतीनजः ।
वृहण चान्नपान स्याद्देयं भग्नाय जानता ॥ ५ ॥
बुद्धिमान् वैद्य, भन से पीड़ित व्यक्ति को शालिचावल, मांसरस, दूध, घृत, सतीन ( वतुं कलाय ) का यूप और शरीर की वृद्धि करने वाले आहार तथा पेय का सेवन करावे ॥ ५ ॥
मधूकोदुम्बराश्वत्थपलाशककुभत्वचः ।
वंशसर्जवतानां च कुशार्थमुपसहरेत् ॥ ६ ॥
महुआ, गूलर, पीपल, पलाश, अर्जुन, बाँस, साल और वट की छाल का सग्रह कुशा के लिये ( Sphnt चाँधने के लिये ) करना चाहिए ॥ ६ ॥
विमर्श. - यहाँ कुशा शब्द का प्रयोग ( Splint ) के अर्थ में व्यवहृत किया गया है । ' कशार्थं मग्नबन्धनार्थं वशादिक प्रोच्यते ' ( ढल्हण ) । आधुनिक युग में भंग और भग्न को स्थिर रखने के लिए अनेक प्रकार की कुशायें प्रयोग में लाई जाती हैं । इन कुशाओं का निर्माण लकडी, चमड़ा, नमदा, गटापाच, और लोहशलाकाओं के द्वारा होता है । अन्य द्रव्यों की अपेक्षा लोह और लकड़ी की कुशा का व्यवहार अधिक होता है ।
आलेपनार्थं मखिष्ठां मधुकं रक्तचन्दनम् ।
शतधौत घृतोन्मिश्रं शालिपिष्टं च संहरेत् ॥ ७ ॥
मजीठ, मुलेठी, लालचन्दन और शतधौत घृत- मिश्रित
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२० सुश्रुतसंहिता शालिचावल का चूर्ण लेप के लिए संग्रह करना चाहिए ॥ ७ ॥
सप्ताहादथ सप्ताहात् सौम्येष्वृतुषु बन्धनम् ॥
साधारणेषु कर्तव्यं पञ्चमे पञ्चमेऽहनि ।
आग्नेयेषु त्र्यहात् कुर्याद्धमदोषवशेन वा ॥ ८ ॥
सौम्य ऋतुओं में सात सात दिन पर, साधारण ऋतुओं में पाँच पाँच दिन पर और आग्नेय ऋतुओं में तीन - तीन दिन पर अथवा भन्न के दोषों के अनुसार समय का विचार करके बन्धन बाँधना चाहिये ॥ ८ ॥
तत्रातिशिथिलं बद्धे सन्धिस्थैर्य न जायते ॥ ६ ॥
गाढेनापि त्वगादीनां शोफो रुक् पाक एव च ।
तस्मात् साधारणं बन्धं भग्ने शंसन्ति तद्विदः ॥ १० ॥ ।
agr ढीली पट्टी बाँधने से सन्धि में स्थिरता नहीं आती और गाढ़ बन्धन ( कसकर बाँधना ) भी खचा आदि में । शोथ, पीडा तथा पाक उत्पन्न कर देता है । इसलिये भग्न-वन्धन को जानने वाले भग्न में साधारण बन्धन को ही श्रेष्ठ समझते हैं ॥ ९ -१० ॥ न्यग्रोधादिकपायं तु सुशीतं परिपेचने ॥
पञ्चमूली विपक्क तु क्षीरं कुर्यात् सवेदने ।
सुखोष्णमवचार्य वा चक्रतैल विजानता ॥ ११ ॥
परिपेक के लिए न्यग्रोधादिगण के द्वव्यों का शीतल कपाय तथा वेदनायुक्त भग्न में लघुपञ्चमूल से सिद्ध दूध । अथवा सुखोष्ण चक्रतैल का प्रयोग बुद्धिमान् वैद्य को करना चाहिये ॥ ११ ॥
विमर्श: - ' चक्रल सच: पोडितोद्धृतमेके वदन्ति । अन्ये पुनरणुतैलकल्पेन गृहीतमपक्क तैल चक्रतैलमाहुः ॥ ' ( ढल्हण )
विभज्य कालं दोषं च दोपनौषधसंयुतम् ।
परिपेकं प्रदेहं च विदध्याच्छीतमेव च ॥ १२ ॥
दोप और काल का विभाग करके दोपन औषधयुक्त शीत या उष्ण परिषेक तथा प्रलेप का प्रयोग करना चाहिये ॥
गृष्टिक्षीरं ससर्पिष्क मधुरौपधसाधितम् ।
शीतलं लाक्ष्या युक्तं प्रातर्भन्नः पिवेन्नरः ॥ १३ ॥
मधुर औपधियों ( काकोल्यादिगण ) से सिद्ध, प्रथम प्रसव चाली गाय का ठण्ढा दूध, घृत और लाख का चूर्ण मिलाकर भग्न के रोगी को प्रातःकाल पिलाना चाहिये ॥ १३ ॥
सव्रणस्य तु भग्नस्य व्रणं सर्पिर्मधूत्तरैः ।
प्रतिसार्य कपायैस्तु शेपं भग्नवदाचरेत् ॥ १४ ॥
व्रण वाले भग्न में मधुघृतयुक्त ( न्यग्रोधादि गण के ) कृपा से प्रण का प्रतिसारण ( लेपन ) करके शेष विधान ( आहार आदि ) भग्न की भाँति करना चाहिये ॥ १४ ॥
प्रथमे वयसि त्वेवं भग्ने सुकरमादिशेत् ।
अल्पोपस्य जन्तोस्तु काले च शिशिरात्मके ॥ १५ ॥
प्रथम वयस ( चाल्य काल ) तथा अल्प दोष वाले व्यक्ति पुच शिशिर ऋतु का भग्न उपर्युक्त आहार और आचार के सेवन से सुससाध्य होता है ॥ १५ ॥
प्रथमे वयसि त्वेवं मासात् सन्धिः स्थिरो भवेत् ।
मध्यमे द्विगुणात् कालादुत्तरे त्रिगुणात् स्मृतः ॥ १६ ॥
उपर्युक्त आहार और आचार का सेवन करने पर बाक्ष्य काल का सन्धि - भग्न एक मास में, युवावस्था का दो मास में और वृद्धावस्था का तीन मास में स्थिर ( हद ) हो जाता है ।
अवनामितमुन्नोदुन्नतं चावपीडयेत् ।
आच्छेदतिक्षिप्तमधो गतं घोपरि वर्तयेत् ॥ १७ ॥
नीचे झुकी हुई अस्थि को ऊपर और ऊपर उठी हुई को नीचे दबाना चाहिये । अपने स्थान से दूर हटी हुई अस्थि को खीचकर तथा नीचे खिसकी हुई को ऊपर उठाकर यथा • स्थान करना चाहिये ॥ १७ ॥
आञ्छनैः पीडनैश्चैव सङ्क्षेपैर्बन्धनैस्तथा ॥ १८ ॥
सन्धोञ्छरीरे सर्वास्तु चलानप्यचलानपि ।
एतैस्तु स्थापनोपायैः स्थापयेन्मतिमान् भिषक् ॥ १६ ॥
बुद्धिमान् वै न ( खींचना ), पीड़न ( नीचे ऊपर दबाना ), संक्षेप ( सिकोडना ) तथा बन्धन आदि स्थापन उपायों के द्वारा शरीर की सभी चल और अचल सन्धियों को यथास्थान स्थापित करे ॥ १८-१९ ॥ विमर्श. - पीठन - पोटनग्रहणेन नमनोन्नमनपरिवर्तनानि गृणन्ते । सक्षेप सम्यक् प्रेरणमित्यर्थ. । गयी तु सक्षेपशब्देन आकुञ्चनमाह । हस्तपादकटी हनुगताः सन्धयश्चला तद्विपरीता अचलाः । सन्धीनिति बाहुल्येन निर्देश:, तेन काण्डभग्नानप्येतैरुपाय. स्थापयेत् ॥ ( ढल्हण )
उत्पष्टमथ विश्लिष्टं सन्धि वैद्यो न घट्टयेत् ।
तस्य शीतान् परीपेकान् प्रदेहांश्चावचारयेत् ॥ २० ॥
उत्पष्ट ( चूर्णित ), विश्लिष्ट ( अपने स्थान च्युत ) सन्धिको वैद्य न हिलावे और शीतल परिपेक तथा लेप का प्रयोग करे ॥ २० ॥
अभिघाते हृते सन्धिः स्वां याति प्रकृतिं पुनः ॥ घृतदिग्वेन पट्टेन वेष्टयित्वा यथाविधि पट्टोपरि कुशान् दत्वा यथावद्बन्धमाचरेत् ॥ २१ ॥।
अभिघात के कारण हुआ सन्धिभग्न अपनी पूर्वावस्था में पुन ' आ जाता है । घृतलिप्त वस्त्र ( पट्टी ) भग्न प्रदेश में विधिपूर्वक लपेट कर उस पर कुशा ( Sphnt ) रखे और भाँति ( कोश दाम आदि बन्धनों में जो उपयुक्त हो ) पट्टी बांधे ॥ २१ ॥
प्रत्यङ्गभग्नस्य विधिरत ऊर्ध्वं प्रवदयते ॥ २२ ॥
इसके आगे प्रत्येक अङ्ग ( अङ्गमङ्गं प्रति प्रत्यक्षं नखादीन् आरभ्य यावच्छिर इति ) के भग्न को चिकित्सा विधि कही जाती है ॥ २२ ॥
नखसन्धि समुत्पिष्टं रक्तानुगतमारया ।
ran थ्य सुते रक्ते शालिपिष्टेन लेपयेत् ॥ २३ ॥
कुचली हुई और दूषित रक्त से युक्त नखसन्धि मे आरा ) ( चर्मकाराख ) से छेदकर रक्त निकालने के पश्चात् पिसे हुए शालिचावल का लेप करना चाहिये ॥ २३ ॥
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श्रध्यायः ३ ] चिकित्सास्थानम्
भग्नां वा सन्धिमुक्तां वा स्थापयित्वाऽङ्गुलीं समाम् ।
अणुनाऽऽवेष्ट्य पट्टेन घृतसेकं प्रदापयेत् ॥ २४ ॥
टूटी हुई अथवा सन्धिच्युत अंगुलियों को समान रूप से स्थापित करके पतले चन्त्र की पट्टी लपेट कर घृत का सेक करना चाहिये ॥ २४ ॥
विमर्शः- अंगुलियों का भग्न अभिघात से उत्पन्न होता है और प्रायः संयुक्त होता है । संयुक्त भग्न में चर्म, पेशी तथा श्लैष्मिक क्ला आदि छिन्न हो जाती है । इसमें वायु का प्रवेश अस्थि तक होने लगता है । सन्धिच्युत होना आघात पर निर्भर रहता है ।
अभ्यन्य सर्पिषा पादं तलभग्नं कुशोत्तरम् ।
वस्त्रपट्टेन बध्नीयान्न च व्यायाममाचरेत् ॥ २५ ॥
पादतल में भग्न होने पर घृत की मालिश करके, कुशा रखकर, कपडे की पट्टी बाँधनी चाहिए और व्यायाम का निषेध कर देना चाहिये ॥ २५ ॥
अभ्यज्यायामयेज्जह्वामूरुं च सुसमाहितः ।
दत्त्वा वृक्षत्वचः शीता वखपट्टेन वेष्टयेत् ॥ २६ ॥
( जंघा और उसके भग्न में ) सावधान चिकित्सक, घृत की मालिश करके, जबा और ऊरुको खींचे तथा न्यग्रोधादि शीत वृक्षों की कुशा ( छाल की Splint ) रखकर कपडे की पट्टी बाँध दे ॥ २६ ॥
मतिमांञ्चकयोगेन ह्याञ्छेदूर्वस्थि निर्गतम् ।
स्फुटितं पिञ्चितं चापि बध्नीयात् पूर्ववद्भिषक् ॥ २७ ॥
वुद्धिमान् वैद्य स्थानच्युत ऊर्वस्थि को चक्रयोग से ( गोलाई में घुमाकर ) खींचे और फटी तथा कुचली हुई को यथास्थान स्थित करके उपर्युक्त विधि से बाँध दे ॥ २७ ॥
विमर्शः - चक्रयोगेनान्छेदिनि वर्त्तुलान् कुशान् दत्त्वा नाम यित्वा चक्रवत्रान्छेत् बध्नीयादित्यर्थः, गयी तु सभ्रमभ्रमाद वलवत्तर पुरुषो हस्तद्वयोपरि गृहीतपाणिपादयत्वात् तद्भूमणनवेन निरन्तर भ्रान्नत्य भन्नत्रतः पुरुषवायम्य चक्राकारोपलम्माद्युक्तश्चक्रयोग इत्याह । स्पर तथा गयदास ने अपना अभिमत ' चक्रयोग ' शब्द के लिये प्रकाशित किया है किन्तु ' चक्रयोग ' शब्द से ' गोलाई में घुमाकर ' अर्थ की ध्वनि ही निकलती है । mano Faitra f शरभग्न में सधान के समय पैर को बाहर की तरफ खींचकर गोलाई में घुमाते हैं । इस क्रिया से ऊर्वस्थि - शिर अपने स्थान पर स्थित हो जाता है ।
आच्छेदूर्ध्वमघो वाऽपि कटिभग्नं तु मानवम् ।
ततः स्थानस्थिते संघौ वस्तिभिः समुपाचरेत् ॥ २८ ॥
कभिन्न वाले व्यक्ति को ऊपर तथा नीचे की ओर खींच कर, सन्धि के यथास्थान स्थित होने पर बस्तियों ( स्नेहवस्ति ) से चिकित्सा करनी चाहिए ॥ २८ ॥
पर्शुकास्वथ भग्नासु घृताभ्यक्तस्य तिष्टतः ।
दक्षिणास्त्रथवा वामास्वनुमृज्य निवन्धनीः ॥ २६ ॥
ततः कवलिकां दत्त्वा वेष्टयेत् सुसमाहितः ।
तैलपूर्ण कटाहे वा द्रोण्यां वा शाययेन्नरम् ॥ ३० ॥
सावधान चिकित्सक पर्शुकाओं के भग्न में, घृत की | मालिश किए हुए रोगी को खड़ा करके दाहिने या वाम पार्श्व की निबन्धनी ( मांसरज्जु ) को मसले और refor | ( Cotton pad ) रख कर पट्टी बाँबे, इसके बाद रोगी को तेल से भरे हुए कढ़ाहे या द्रोणी में सुलावे ॥ २ ९ -३० ॥ विमर्शः - निबन्धनीः मासरब्जव इत्यर्थः, डल्दण | सुश्रुत । शारीर स्थान में चार बड़ी मांसरज्जुओं का उल्लेख है । ' महत्यो मासरब्जवश्चतस्रः पृष्ठवंशमुभयतः पेशीनिबन्धनार्थं द्वे बाह्ये आभ्यन्तरे च द्वे ।
मुसलेनोत्क्षिपेत् कक्षामांससन्धौ विसंहते ।
स्थानस्थितं चचनीयात् स्वस्तिकेन विचक्षणः ॥३१ ॥
बुद्धिमान वैद्य अंमसन्धि को स्थानच्युति में, कक्षा प्रदेश को मूसल से ऊपर उठावे और सन्धि के यथास्थान स्थित होने पर स्वस्तिक बन्धन ( Cross bandage ) बाँधे ॥
कोर्परं तु तथा सन्धिमङ्गुष्ठेनानुमार्जयेत् ।
अनुसृत्य ततः सन्धि पीडयेत् कूर्पराच्च्युतम् ॥ ३२ ॥
प्रसार्याकुञ्चयेच्चैनं स्नेहसेकं च दापयेत् ।
एवं जानुनि गुल्फे च मणिबन्धे च कारयेत् ॥ ३३ ॥
कूर्परसंधि का विश्लेप होने पर अँगूठे से मले । अंगूठे से मलने के बाद कूर्पर से पृथक हुई सधि को दवावे । हाथ फैलाकर सिकोडे और स्नेह की मालिश तथा सेक करे । जानु, गुल्फ और मणिबन्ध के विश्लेष में इसी चिकित्सा विधि का प्रयोग करना चाहिए ॥ ३२-३३ ॥
उभे तले समे कृत्वा तलभग्नस्य देहिनः ।
बध्नीयादामतैलेन परिपेक च कारयेत् ॥ ३४ ॥
मृत्पिण्डं धारयेत् पूर्व लवणं च ततः परम् ।
हस्ते जातबले चापि कुर्यात् पाषाणधारणम् ॥ ३५ ॥।
तलमग्न ( हथेली का भग्न ) वाले व्यक्ति की दोनों हथेलियों को मिलाकर बाँधे और आमतैल ( कोल्हू से निकले तेल ) का परिपेक करे । पहले हाथ मे मिट्टी का पिण्ड धारण करे । इसके बाद नमक का पिण्ड रखे और हाथ में शक्ति आने पर पत्थर का पिण्ड ग्रहण करे ॥ ३४-३५ ॥ विमर्शः - ' उमे नले ' शब्द का अर्थ जेजट तथा गयदास पृथक् - पृथक् रूप में किया है । जेज्जट का मत है — ' उमे तले इति एक पाणितल द्वितीय पादतलम्, इत्युभे तले इति जेज्जट. ' । गयी तु उमे अपि हस्ततले, तत्रैकस्य भने वामं दक्षिणेन, दक्षिण वामेन, उमयोस्तु भने तत्समेन काष्ठमयेन कृत्वा द्वे अपि बध्नीयादेवं ढा भवतीति । दोनों आचायों के अभिप्राय का अवलोकन करने पर ' गयदास ' की उक्ति ही उचित मालूम पड़ती है, क्योंकि किसी वस्तु को ग्रहण करने की शक्ति हाथ ही में है ।
श्लोक के आधे भाग में मृत्पिण्ड, लवण तथा पाषाण का
धारण हाथ में बल आने पर बतलाया गया है ।
सन्नमुन्नमयेत् स्विन्नमक्षक मुसलेन तु ॥
तथोन्नतं पीडयेच्च बध्नीयाद्गाढमेव च ।
ऊरुवञ्चापि कर्तव्यं बाहुभग्नचिकित्सितम् ॥ ३६ ॥
( अदकास्थि के विश्लेष में ) नीचे दबी हुई अक्षकास्थि को
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सुश्रुतसंहिता मूमल मै ऊपर उठाने तथा उपर उठी हुई को नीचे ढवावे और कस कर पट्टी | बाहुभन की चिकित्सा भी उरुभन्न की चिकित्सा विधि की भाँति करे ॥ ३६ ॥
ग्रीवायां तु विवृत्तायां प्रविष्टायामघोऽपि वा ।
अवटावथ हन्वोश्च प्रगृह्योन्नमयेन्नरम् ॥ ३७ ॥
ततः कुशां समं दत्त्वा वस्त्रपट्टेन वेष्टयेत् ।
उत्तानं शाययेच्चैनं सप्तरात्रमतन्द्रितः ॥ ३८ ॥
( ग्रीवा भग्न में ) ग्रीवा के टेडी होने तथा नीचे बैठ जाने पर रोगी को अवदु ( काटिकामागमन्त्री गर्नेऽवटुः ) और हनु । प्रदेश से पकड़ कर ऊपर उठाना चाहिए । इसके बाद समान कुणा ( Splint ) रख कर कपडे की पट्टी बाँधनी चाहिए । आलस्यरहित वैद्य ऐसे रोगी को सात दिन तक उत्तान ( पीठ के बल ) सुलावे ॥ ३४-३८ ॥ हन्वस्थिनी समानीय हनुसन्धौ विसंहते ॥ ३६ ॥
स्वेदयित्वा स्थिते सम्यक् पञ्चाङ्गीं वितरेद्भिषक् ।
बावन्नमधुरैः सर्पि ' सिद्धं नस्ये च पूजितम् ॥ १० ॥
हनुमंधि का विश्लेष होने पर हन्त्रस्थियों को आपस में मिलाकर भली - भाँति स्थित करे और स्वेदन करके पचाही वन्धन बाँधे । इसमेँ बातन ( विदारीगन्धादिगण ) और मधुर ( काक्रोल्यादि गण ) द्रव्यों से मि नस्य का प्रयोग रचन होता है ॥ ३ ९ -१० ॥
अभग्नांश्चलितान् दन्तान् सरक्तानवपीडयेन् ।
तरुणस्य मनुष्यस्य शीतैरापयेद्बहिः ॥ ११ ॥
सिक्त्वाऽम्बुभिस्ततः शीतैः सन्धानीयैरुपाचरेत् ॥
उत्पलस्य च नालेन क्षीरपानं विधीयते ।
नीर्णस्य तु मनुष्यस्य वर्जयेच्चलितान् द्विजान् ॥४२ ॥
युवा मनुष्य के भग्नरहित, हिलते हुए, रक्तयुक्त, दाँतों को दबाकर बाहर से शीतल लेप करे । ढाँतों का जल से सिंचन करके शीतल संघानीय द्रव्यों ( मधु, घृत, न्यग्रोधादि कषाय, कला, चूर्ण आदि ) के द्वारा चिकित्सा करे । रोगी को कमलनाल से दूध पिलावे । वृद्ध मनुष्य के हिलते हुए दाँत त्याज्य होते हैं अर्थात् चिकित्सा द्वारा उन्हें हर नहीं किया जा सकता ॥ ४१-२२ ॥ नासां सन्नां विवृत्तां वा ऋत्रीं कृत्वा शलाकया ॥ ४३ ॥
पृथस्नासिकयोर्नाड्यो द्विमुख्यौ संप्रवेशयत् ।
ततः पट्टेन संवैष्ट्य घृतसेकं प्रदापयेत् ॥ ४४ ॥
( अभिघात से ) बैठी हुई या टेडी नासिका को शलाका द्वारा ऊँची और सीधी करके दोनों नाक के छिद्रों में पृथक घूयकू दो मुख वाली नली प्रविष्ट कर, पट्टी बाँधे तथा घृत को सेक करे ॥ १३-२१ ll
भग्नं कर्णं तु बन्नीयान् समं कृत्वा घृतप्लुतम् ।
सद्य अनविधानं च ततः पश्चात् समाचरेत् ॥ १५ ॥
टूटे हुए कान को समान स्थिति में लाकर घृत लगावे और पट्टी बाँधे, फिर सद्यचन- चिकित्सा विधि ( मधु, घृत, अस्य श्रीनपरिषेक आदि ) का प्रयोग करें ॥ ४५ ॥
मस्तुलुङ्गाद्विना भिन्ने कपाले मधुसर्पिषी ।
दत्त्वा ततो निवध्नीयान् सप्ताहं च पिवेद्धृतम् ॥ ४६ ॥
कपाल भन्न होने पर यदि मस्तुलुङ्ग का स्त्राव न हो तो मधु और घृत रखकर पट्टी बांधे और ( रोगो को ) एक सप्ताह तक घृत पिलावे ॥ ४६ ॥
पतनादभिघाताद्वा शूनमङ्गं यदक्षतम् ।
शीतान् प्रदेहान् सेकच भिपक् तस्यावचारयेत् ॥ १७ ॥
गिरने अथवा चोट लगने से क्षत के बिना भी यदि अग में शोथ हो जाय तो उसका उपचार वैद्य को शीतल - लेप और सेक से करना चाहिये ॥ १७ ॥
अथ जङ्घोरुभग्नानां कपाटशयनं हितम् ।
कोलका बन्धनार्थं च पञ्च कार्या विजानता ॥ ४८ ॥
यथा न चलनं तस्य भग्नस्य क्रियते तथा ।
सन्रुभयतो द्वौ द्वौ तले चैकच कीलकः ॥ ४६ ॥
जंघा और करु ( काण्ड ) के भग्न में ' क्याट शयन ' हितकर होता है । बुद्धिमान् वैद्य को इसके लिये पांच कीलें लगानी चाहिये । सन्धियों की दोनों ओर दो २ तथा तल-प्रदेश में एक कोल लगावे, जिसमें रोगी भग्न प्रदेश को न हिला सके ॥ १८-४९ ॥
श्रोण्यां वा पृष्टवंशे वा वक्षस्यक्षकयोस्तथा ।
भग्नसन्धिविमोक्षेषु विधिमेनं समाचरेत् ॥ ५० ॥
सन्धीश्चिरविमुक्तांस्तु स्निग्धान् स्त्रिन्नान् मृदूकृतान् ।
उक्तैर्विधानैर्युद्धद्या च सम्यक् प्रकृतिमानयेत् ॥ ५१ ॥
श्रोणी ( कटि ), पृष्ठवंश, वक्ष अथवा अक्षक ( अंस-सन्धि ) के भग्न या सन्धिविश्लेष में इस विधि का प्रयोग करना चाहिये । दीर्घकालीन विश्लिष्ट सन्धियों को स्नेहन, स्वेदन के द्वारा मृदु बनाकर उपर्युक्त विधि और अपनी बुद्धि से यथास्थान स्थित करना चाहिये ॥ ५०-५१ ॥ विमर्शः -जवा और करु भन्न के रोगियों के लिए ' कपाट शयन विधि ' का निर्देश किया गया है । ऊर्वस्थि के भग्न में रोगी को लकड़ी के पटरे पर लिटाकर बङ्खग - सन्धि की दक्षिण और वाम दिशा में तथा जानुसन्धि की दोनों दिशाओं मैं एक एक कील पटरे में जड़ी जाती है और एक कील फैले हुए पैर के तलवे की ओर लगाई जाती है । जंघाभन्न मेँ गुल्फसन्धि की दोनों दिशाओं में दो दो कीलें तथा तलवे की और एक कील लगाई जाती है । इस प्रकार पांच कीलों के सम्बन्ध से इस यन्त्र का निर्माण होता है । यन्त्र के प्रयोग का । अभिप्राय है दीर्घ काल तक रोगी को गतिविहीन करना । गति अस्थिसन्धान में बाधक होती है । अतः रोगी की गति मैं अवरोध उत्पन्न करने के लिये उसे लकड़ी के पटरे पर लिटाकर कीलों के सहारे भग्न प्रदेश को अवरुद्ध कर दिया जाता है | आजकल इस विधि से समता रखने वाली जिस पद्धति का प्रयोग ऊर्वस्थि भग्न संधान के लिए किया जाता है उसे Prolonged extension कहते है । इस कार्य के लिए Thoma's Sphint का प्रयोग किया जाता है । युग परिवर्तन के फलस्व-रूप लौहालाका निर्मित इन कुशाओं ( Splint ) की आकृति
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श्रध्यायः ३ ] चिकित्सास्थानम् २३ ' कपाटशयन विधि ' से भिन्न भले ही हो, किन्तु दोनों विधियाँ समान रूप से एक लक्ष्य की ही पूर्ति करती हैं ।
काण्डभग्ने प्ररूढे तु विषमोल्वण संहिते ।
आपोध्य शमयेद्भग्न ततो भग्नवदाचरेत् ॥ ५२ ॥
यदि दीर्घकालीन का भग्न का संधान पूर्ण रूप से विषम स्थिति में ( ऊँचा - नीचा ) हो गया हो तो संन्धान का विश्लेषण करके ( संधान तोड़कर ) भग्न को समान रूप में स्थित करना चाहिये तथा भग्नसधानविधि की भांति चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ५२ ॥
विमर्श: - जब अस्थि के टूटे हुए भाग का संधान ठीक से नहीं होता तो दोनों भागों के मध्य में अन्तर रह जाता है । अथवा एक भाग दूसरे पर चढ़ जाता है । इस स्थिति में अस्थिसन्धान समान रूप से नहीं होता । अस्थिभन विपम रूप से जुड जाता है । उससे अह्न में विकृति भा जाती है । इस प्रकार के अस्थिसंधान को Mal union कहते हैं । ऐसी दशा में संधान को तोड़कर पुनः भग्नसंधान ठीक रूप में करना पड़ता है ।
कल्पयेन्निर्गतं शुष्कं व्रणान्तेऽस्थि समाहितः ।
सन्ध्यन्ते वा क्रियां कुर्यात् सत्रणे व्रणभग्नवत् ॥५३ ॥
( काण्ड भग्न में ) सावधान चिकित्सक, बाहर निकली तथा सूखी हुई अस्थि को व्रण के एक भाग अथवा व्रणयुक्त सन्धि के समीप से काट दे और व्रणभन्नविधि की भांति चिकित्सा करे ॥ ५३ ॥
ऊर्ध्वकाये तु भग्नानां मस्तिष्क्यं कर्णपूरणम् ।
घृतपानं हितं नस्यं प्रशाखास्वनुवासनम् ॥ ५४ ॥
शरीर के ऊर्ध्व भाग में भग्न होने पर शिरोवस्ति ( मस्तिष्क्य शिरोबस्निप्रकारः, स च लेहाक्तपिचुलोनानिमि ), कर्णपूरण ( कान में तेल डालना ), घृतपान और नस्य तथा शाखाओं ( जानुजद्वा - वाहुद्वय ) के भग्न में अनुवासन वस्ति हितकर होती है ॥ ५४ ॥
अत ऊ प्रवक्ष्यामि तैल भग्नप्रसाधकम् ।
रात्रौ रात्रौ तिलान् कृष्णान् वासयेदस्थिरे जले ॥ १५ ॥
दिवा दिवा शोषयित्वा गवां क्षीरेण भावयेत् ।
तृतीयं सप्तरात्रं तु भावयेन्मधुकाम्बुना ॥ ६ ॥
ततः क्षीरं पुनः पीतान् सुशुष्काचूर्णयेद्भिषक् ।
काकोल्यादिं सयष्ट्याह्व मञ्जिष्ठा सारिवा तथा ॥ २७ ॥
कुष्ठं सर्जरसं मांसीं सुरदारु सचन्दनम् ।
शतपुष्पां च संचूर्ण्य तिलचूर्णेन योजयेत् ॥ ५८ ॥
पीडनाथं च कर्तव्यं सर्वगन्धश्टत पयः ।
चतुर्गुणेन पयसा तत्तैलं विपचेद्भिषक् ॥ ५६ ॥
इसके आगे भग्नसंधानकारक तैल का वर्णन किया जाता है । वैद्य, प्रत्येक रात्रि में ( सातदिन ) काले तिलों को वहते जल में रखे और दिन में धूप में सुखा ले । इसी प्रकार तिलों को गोदुग्ध में ( सात दिन ) रात्रि में भिगोकर दिन में सुखा ले, तीसरी बार उसी प्रकार मुलेठी के काय की भावना दे । | और ( चौथी बार ) पुनः उपर्युक्त विधि दूध में भावना देकर तिलों का चूर्ण बना ले । ( इसके बाद ) वैद्य, काकोल्यादिगण, मुलेठी, मजीठ, सारिवा, कूठ, राल, जटा • मांसी, देवदारु, लालचन्दन और सौंफ का चूर्ण बनाकर तिल-चूर्ण के साथ मिलावे । तदनन्तर एलादिगण के ( सर्वगन्धा एलाय ) द्रव्यों से सिद्ध उष्ण दुग्ध में उपर्युक्त चूर्ण को गीला करके कोल्हू में पेरकर तैल निकाले और चतुर्गुण दुग्ध के द्वारा इस तैल का पाक करे ॥ ५५-५९ ॥
एलामंशुमती पत्रं जीवकं तगरं तथा ।
रोधं प्रपौण्डरीक च तथा कालानुसारि ( वा ) णम् ॥६० ॥
सैरेयक क्षीरशुक्लामनन्तां समधूलिकाम् ॥
पिष्ट्वा शृङ्गाटकं चैव पूर्वोक्तान्योपधानि च ।
एभिस्तद्विपचेत्तैल शास्त्रविन्मृदुनाऽग्निना ॥ ६१ ॥
शास्त्र को जानने वाला वैद्य, इलायची, अशुमती ( शालपर्णी ), तेजपात, जीवक, तगर, लोध्र, पुण्डे ( सुगन्ध द्रव्य ) तगर, कटसरैया, क्षीरविदारी, अनन्तमूल, मधूलिका ( मूर्वा ) और सिघाडा तथा पूर्वोक्त ( काकोल्या • दीनि शतपुष्पान्तानि ) औषधियों को पीसकर कल्क बनावे और उपर्युक्त विधि से निकाले गये तैल का ( चतुर्गुण दुग्ध में ) मन्दाग्नि से पाक करे ॥ ६०-६१ ॥ एतत्तैलं सदा पथ्यं भग्नानां सर्वकर्मसु ॥ ६२ ॥
आक्षेपके पक्षघाते तालुशोपे तथाऽर्दिते ।
मन्यास्तम्भे शिरोरोगे कर्णशूले हनुग्रहे ॥ ६३ ॥
वाधिर्ये तिमिरे चैव ये च खीपु क्षय गताः ।
पथ्यं पाने तथाऽभ्यङ्गे नस्ये बस्तिषु भोजने ॥ ६४ ॥
ग्रीवास्कन्धोरसां वृद्धिरमुनैवोपजायते ।
मुखं च पद्मप्रतिम ससुगन्धिसमीरणम् ॥ ६५ ॥
गन्धतैलमिदं नाम्ना सर्ववातविकारनुत् ।
राजार्हमेतत् कर्तव्यं राज्ञामेव विचक्षणैः ॥ ६६ ॥
अस्थि - भग्नों में पान, अभ्यङ्ग आदि के लिए यह तैल सदा हितकर होता है । आक्षेपक, पक्षवध, तालुशोप, अर्दित, मन्यास्तम्भ, शिरोरोग, कर्णशूल, हनुग्रह, वाधिर्य, तिमिर तथा अत्यन्त स्त्रीप्रसग से क्षीण व्यक्तियों के पान, अभ्यङ्ग, नस्य, वस्ति एवं भोजन में ( उपर्युक्त तैल ) हितकर होता है । इस तैल के सेवन से ग्रीवा, स्कन्ध और वक्षस्थल की वृद्धि ( पुष्टि ) होती है । मुख कमल के समान तथा सुगन्धित वायु से युक्त रहता है । इसका नाम गन्ध तैल है । यह सम्पूर्ण वातव्याधियों को नष्ट करता है । यह तैल राजाओं के योग्य है, इसका निर्माण बुद्धिमान वैद्यों को राजाओं के लिये ही करना चाहिये ॥ ६२-६६ ॥
त्रपुसाक्षप्रियालानां तैलानि मधुरैः सह ।
वसां दत्त्वा यथालाभ क्षीरे दशगुणे पचेत् ॥ ६७ ॥
स्नेहोत्तममिदं चाशु कुर्याद्भग्नप्रसाधनम् ।
पानाभ्यञ्जननस्येषु बस्तिकर्मणि सेचने ॥ ६८ ॥
खीरे के बीज ( त्रपुस कर्कटीमेट ), बहेडा और चिरौंजी का तेल तथा यथालाभ वसा लेकर दशगुने दूध में पकावे ।
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२४ सुश्रुतसहिता यह उत्तम स्नेह है और शीघ्र भग्नसन्धान करता है । इसका प्रयोग पान, अभ्यङ्ग, नस्य, वस्तिकर्म और परिपेक में करना चाहिये ॥ ६७-६८ ॥
भग्नं नैति यथापाकं प्रयतेत तथा भिपक् ।
पक्कमांससिरास्नायु तद्धि कृच्छ्रेण सिध्यति ॥ ६६ ॥
वैद्य को इसका प्रयत्न करना चाहिये कि भग्न में पाक न होने पावे क्योंकि मांस, शिरा और स्नायु में पाक होने पर भग्न कष्टसाध्य हो जाता है ॥ ६ ९ ॥
भग्नं सन्धिमनाविद्धमहीनाङ्ग मनुल्बणम् ।
सुख चेष्टा प्रचारं च संहित सम्यगादिशेत् ॥ ७० ॥
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने भग्नचिकित्सितं नाम तृतीयोऽध्याय ॥। ६ ॥ भन्नसन्धि पीड़ा से रहित हो, अन छोटा हुआ हो, भग्नस्थान समान ( ऊँचा - नीचा न होना ) हो और आक्खन, प्रसारण आदि चेष्टायें सुखपूर्वक होती हों तो समझना चाहिए कि भग्नसन्धान सम्यक् रूप से हुआ है ॥ ७० ॥
इत्यायुर्वेदतरवसन्दीपिकायां भापाटीकायां तृतीयोऽध्यायः ॥३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः अथातो वातव्याधिचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
इसके अनन्तर वातव्याधि की चिकित्सा विधि का वर्णन किया जा रहा है, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत-प्रभृति शिष्यों से ) कहा ॥ १--२ ॥
आमाशयगते वाते च्छयित्वा यथाक्रमम् ।
देयः पड्धरणो योग सप्तरात्रं सुखाम्बुना ॥ ३ ॥
आमाशयगत वात में क्रमानुसार वमन कराने के पश्चात् सुखोष्ण जल से सात दिन तक पढ्धरण योग का प्रयोग करना चाहिए ॥ ३ ॥
विमर्शः -- आमाशयगते छर्दन कफस्थानत्वात् । यथाक्रममिति । अत्र यथाक्रमशब्देन पूर्वकालापरकालकर्त्तव्यता सर्वा एव आक्षिप्ता स्नेहस्वेदनपानलैङ्किकर्षं गिकमानिककाय शुद्धिससर्ज्जुनभोजनादय । पट्धरण इति पण्णा चित्रकादीना वरणा मानविशेषा यत्र योगे स पड्धरणो योग । मुखाम्बुना ईषदुष्णाम्बुना । ( ढल्हण )
चित्रकेन्द्रयवे पाठा कटुकाऽतिविपाऽभया ।
वातव्याधिप्रशमनो योगः पड्धरणः स्मृतः ॥ ४ ॥
चित्र, इन्द्रव, पाठा, कुटकी, अतीस और हरीतकी योग को पढ्धरणयोग कहा गया है, यह वातव्याधि को शमन करने वाला योग है ॥ ४ ॥
पक्वाशयगते चापि देयं स्नेहविरेचनम् ।
वस्तयः शोधनीयाश्च प्राशाय लवणोत्तराः ॥ ५ ॥
पक्वाशयगत बात में स्नेह विरेचन, शोधनीयवस्ति तथा उपप्रधान आहार देना चाहिए ॥ ५ ॥
विमर्श: - स्नेहविरेचन तिल्वकमपिंरादिविरेचनम् । वस्तयः शोधनीयाश्चेति । ' शोधनद्रयनि क्वाथास्तत्कल्कस्नेहसयुताः ' इत्याद्या. । प्राशाश्च लवणोत्तरा इति । स्नेहलवण कल्याणकलवणादयः, अन्ये तु प्राश्यन्त इति प्राशा आहारा, न तु लेहाः । लवणोत्तरा लवणप्रधाना. ' ( ढल्हण )
कार्यो वस्तिगते चापि विधिर्वस्तिविशोधनः ।
श्रोत्रादिपु प्रकुपिते कायश्चानिलहा क्रमः ॥ ६ ॥
स्नेहाभ्यङ्गोपनाहाच मर्दनालेपनानि च ।
त्वङ्मांसासृक्सिराप्राप्ते कुर्याच्चासृग्विमोक्षणम् ॥ ७ ॥
वस्तिगत वात में, बस्ति को शुद्ध करने वाली विधि ( अश्मरा चिकित्सितोक ) का प्रयोग करना चाहिये । श्रोन्न आदि में ( आदिशब्दात् त्वग्घ्राण - जिहानेत्राणीन्द्रियाणि गृह्यन्ने ) वात का प्रकोप होने पर स्नेह, अभ्यङ्ग, उपनाह, मर्दन और आलेप आदि वातनाशक क्रमों का प्रयोग करना चाहिये । त्वचा, मांस, रक्त और शिरा में वायु का प्रकोप होने पर रक्तमोक्षण करना चाहिए ॥ ६-७ ॥
स्नेहोपनाहाग्निकर्मबन्धनोन्मर्दनानि च ।
स्रायुसन्ध्यस्थिसप्राप्ते कुर्याद्वायावतन्द्रितः ॥ ८ ॥
आलस्यरहित चिकित्सक, स्नायु, सन्धि और अस्थिगत वातप्रकोप में, स्नेह, उपनाह, अग्निकर्म, बन्धन और मर्दन का प्रयोग करे ॥ ८ ॥
निरुद्धेऽस्थान वा वायौ पाणिमन्येन दारिते ।
नाडीं दत्त्वाऽस्थनि भिषक् चूपयेत्पवन बली ॥ ६ ॥
( अस्थि मज्जागत वायु के प्रकोप में ) अस्थि में वायु के रुकने पर ( त्वचा, मांस आदि को शस्त्र से काटकर ) उसे आराशस्त्र से वेध कर ( पाणिमन्थेन आराशस्त्रेण ) उसमें दो मुखी नलिका लगावे और वलवान वैद्य वायु का चूपण करे ॥ शुक्रप्राप्तेऽनिले कार्य शुक्रदोपचिकित्सितम् । अवगाहकुटीकर्पूप्रस्तराभ्यङ्गबस्तिभिः 1180 11
जयेत् सर्वाङ्गज वातं सिरामोक्षैश्च बुद्धिमान् ।
एकाङ्गगं च मतिमाञ्छृङ्गैश्वावस्थित जयेत् ॥ ११ ॥
शुक्रवायु के प्रकोप में शुक्रदोष को दूर करने वाली चिकित्सा विधि का प्रयोग करना चाहिए । बुद्धिमान् वैद्य, अवगाह, कुटी, कर्पू और प्रस्तरस्वेद तथा अभ्यङ्ग, वस्ति एव रक्तमोक्षण के द्वारा सर्वाङ्गगत वायु का शमन करे । किसी अङ्ग विशेष में रुकी हुई वायु को बुद्धिमान् वैद्य सींग के द्वारा निकाले ॥ १०-११ ॥ विमर्शः - अवगाही - वातहर काथपूर्णद्रोण्यादिषु अवगाहो द्रव-स्वेदः । कुटी - चतुर्द्वारा भूमावारोपिताश्नीतविधूमाङ्कारवातहरद्रव-तिक्ता, सा चोष्मस्वेदः । कर्पू: - पुरुषायाममात्रनिखातदग्धावनि प्रदेशे वातहरद्रवसिक्के शयन स चोण्मस्वेदविशेष. | स्विन्नतुपधान्या-दिभिरास्तृनायां भूमौ परिशयनं प्रस्तरः ।
बलासपित्तरक्तैस्तु संसृष्टमविरोधिभिः ।
सुप्तिवाते त्वसृक्ष कुर्यात्तु बहुशो भिषक् ॥ १२ ॥
दिद्याश्च लवणागारधूमैस्तैलसमन्वितैः