श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 441–450
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 441–450
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अध्याय चिकित्सास्थानम् के उष्णा मे परिषेक करना चाहिए । जल सिंचन से जिस प्रकार अनि शान्त होती है उसी प्रकार परिपेक से दोपानि का सहसा शमन होता है ॥ १७-१८ ॥ विमर्श - शोय का लक्षण करते हुए सुश्रुत ने लिया है— ' तैः प्रति सभी विषमो वा त्वद्मासस्यायी दोषसघानः शरीरैकदेशोत्थितः शोफ युध्यते । ' अर्थात् वातादि दोपों का समूह शरीर के किसी भाग की त्वचा तथा मांग मे स्थित हो कर जन सम, विषम, मोटा या गांठदार उभार उत्पन्न कर देता है तो वह ' शोध ' कहलाता है । शोथ आघात से भी उत्पन्न होना है । शोध में धातुओं की रचना और उनकी शक्ति नष्ट नहीं होती । जीवाणुजन्य शोय तथा अन्य प्रकार ने उत्पन्न हुए शोध में भिन्नता होती है । जीवाणुओं की संख्या वृद्धि के साथ ही जीवाणु शोय चढता जाता है, किन्तु अन्य प्रकार के शोध में ऐसे लक्षण नहीं होते । वस्तुतः जीवाणुओं और धानुओं के संघर्ष के फलस्वरूप जो परिवर्तन होता है, उसे ‘ शोय ' कहते हैं । शोथ की शान्ति के लिए ' परिपेक ' मयः फलदायक प्रयोग है । दोपों के प्रकोप के अनुसार अनेक द्रव्यों का उल्लेख परिषेक के निमित्त किया गया है । जहाँ वातज और कफज शोथ में परिषेक के लिए etreate का प्रयोग है वहीं पित्तज शोध के लिए शीतल काय का भी विधान किया गया है । पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान में भी उष्ण तथा शीत सेक का विधान है । शोध के समय रक्तनलिकायें फैल जाती हैं, उनमें रक्त प्रवाह की मात्रा बढ़ जाती है । कुछ समय के पश्चात् रक्तप्रवाह में शिलिता भाती है और अन्त में वह बिलकुल रुक जाता है । ऐसी अवस्था में एकत्रित रक्त को उस भाग से हटाना आवश्यक होता है, जिसमें वहाँ शुद्ध रक्त का संचार हो सके । इस क्रिया के लिए उष्ण सेक का प्रयोग हितकर होता है । उष्णता के प्रयोग से रक्त नलिकाओं का प्रसार होता है । एकत्रित रक्त दूसरे भाग में हट जाता है तथा नवीन रक्त के संचार के लिए मार्ग प्रशस्त हो जाता है । उष्ण परिपेक के लिए रबर की थैली ( Ice bag ) मे उष्ण जल भर कर लग स्थान पर रखा जाता है । शीत परिपेक में रबर की थैली मे बर्फ भर कर रुग्ण स्थान पर रखते है । शीतपरिषेक का प्रभाव उष्ण परिपेक से सर्वथा उल्टा होता है । शीत परिपेक रक्तवाहिनियों को संकुचित करने के लिए किया । जाता है । पित्तज शोथ में शीत परिपेक का विधान इसी अर्थ की सिद्धि के लिए किया गया है । वातज शोथ में परिषेक के लिए धान्याम्ल तथा कफज शोथ में मुरा और शुक्त का निर्देश है | इनके लक्षण निम्न प्रकार में है - ( 1 ) धान्याम्ल -( धान्यान्डं वाकिम्, टल्हण ) ' कुल्मापधान्यमण्टादिमन्धित कालिक विदु ' ( शा ० अ ० १० ) कुल्माप ( आधे उबले हुए गोधूम आदि ) धान तथा माण्ड आदि का सुन्धान ( पात्र मुत्रबन्धन ) कर रस देने से जो अम्ल पदार्थ तैयार होता है । उका ( धान्याल ) कहते है । ( २ ) सुरा - ' परिपक्कान्न-सन्धानसमुत्पन्ना मुर्रा जगु. ( शा ० अ ० १० ) यह एक प्रकार का मद्य विशेष है । ( ३ ) शुक्त - ' कन्दमूलफलादीनि सनेहलवणानि च । यत्र द्र्वेऽभिपूयन्तै तच्छुतमनिषीयते ॥ ( शा ० अ ० १० ) अभियन्ते- शब्द का तात्पर्य है ( सूयन्ते सन्मानीभूतानि क्रियन्ते ) कन्द के मूल भादि द्रव्यों को द्रव पदार्थों में सन्धान | कर रखना । अभ्यद्गस्तु दोषमालोक्योपयुक्तो दोपोपशमं मृदुतां च करोति ॥ १६ ॥
४. अभ्यक ( मालिश ) - दोषों को समझ कर प्रयुक्त किया या अभ्यन दोष ( शोथ ) को शान्त करता है तथा कोमल | बनाता है ॥ १ ९ ॥
स्वेटविम्लापनादीनां क्रियाणां प्राक् स उच्यते ।
पश्चात् कर्मसु चादिष्टः स च विस्रावणादिपु ॥ २० ॥
अभ्यन का विधान स्वेद, विम्लापन आदि क्रियाओं के पूर्व तथा विश्रावण आदि क्रियाओं के पश्चात् किया गया है ॥
रुजावतां दारुणानां कठिनानां तथैव च ।
शोफानां स्वेदनं कार्य ये चाप्येवंविधा व्रणाः ॥२१ ॥
५ वे – पीडायुक्त, दारुग ( वायु से रूक्ष ) और कडे शोधों में तथा इन लक्षणों से युक्त व्रणों में स्वेदन करना चाहिए ॥ २१ ॥
स्थिराणां रुजतां मन्दं कार्यं विम्लापनं भवेत् ।
अभ्यज्य स्वेदयित्वा तु वेणुनाड्या ततः शनैः ॥२२ ॥
विमर्दयेद्भिषक् प्राज्ञस्तलेनाङ्गुष्ठ केन वा ।
शोफयोरुपनाहं तु कुर्यादामविदग्धयोः ॥ २३ ॥
अविदुग्धः शमं याति विदग्धः पाकमेति च ।
निवर्तते न यः शोफो विरेकान्तैरुपक्रमैः ॥ २४ ॥
तस्य संपाचनं कुर्यात् समाहृत्योपधानि तु ।
दवितक्रसुराशुक्तधान्याम्लैर्योजितानि तु ॥ २५ ॥
स्निग्धानि लवणीकृत्य पचेदुत्कारिकां शुभाम् ।
सैरण्डपत्रया शोफं नाहयेदुष्णया तया ॥ २६ ॥
६ विम्लापन ( शोथ का विलयन ) ७. उपनाह ( पुलटिस ) और ८. पाचन - कठिन तथा मन्द वेदना वाले ( शोथ ) में विम्लापन ( अङ्गुली आदि से मसल कर शोथ मिटाना ) करना चाहिए । बुद्धिमान वैद्य ( शोध स्थल की ) मालिश तथा स्वेदन कर बांस की पतली डाली, हथेली या अगूठे से धीरे - धीरे मसले । आम ( अपक्क ) और विदग्ध ( अर्धपक ) शोथों में उ करना चाहिए । इससे अविदग्ध ( आम ) शोथ की शान्ति तथा विदग्ध ( अर्धपक्क ) शोथ का पूर्ण पाक होता है । ( अपतर्पण से लेकर ) विरेचन तक की क्रियाओं से जिस शोथ की शान्ति न हो उनका ( १ ) पाचन मिश्रक अध्याय मे निर्दिष्ट भोपधियों के द्वारा करना चाहिए । ( पाचन औषधियों को ) दही, मट्ठा, सुरा, शुक्त और काक्षी में मिला, ( घृत-तेल से ) खिग्ध करके, नमक ढाल कर, सुन्दर ( २ ) उस्कारिका पकावे । इसे एरण्डपत्र के साथ गरम - गरम शोथ पर बाँधे । विमर्श - ( १ ) पाचन भोपधियाँ - गणमूलकशित्रूणा फलानि -तिलसर्पपाः । शक्तव. किण्वमतसी द्रव्याण्युष्णानि पाचनम् ॥ ( सु ० सू ० भ ० ३७ ) ( २ ) उत्कारिका - ( लप्सिकाकृति., अन्ये पूपटिकाकृतिमाहुः ) ( टल्हूण ) । हितं सम्भोजनं चापि पाकायाभिमुखो यदि ।
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सुश्रवसंहिता वेदनोपशमार्थाय तथा पाकशमाय च ॥ २७ ॥
अचिरोत्पतिते शोफे कुर्याच्छ्रोणितमोक्षणम् ।
सशोफे कठिने श्यामे सरके वेदनावति ॥ २८ ॥
संख्ये विपमे चापि व्रणे विस्रावणं हितम् ।
सविषे च विशेषेण जलौकोभिः पदैस्तथा ॥ २६ ॥
९. विस्रावण ( रक्तमोक्षण ) -- यदि शोथ पक रहा हो तो । ( रोगी को ) यथेष्ट भोजन करावे । तत्काल उत्पन्न हुए शोथ मैं, वेदना की शान्ति तथा पाक से बचने के लिए, रक्त मोक्षण करना चाहिए । शोथयुक्त, कठिन, श्याम अरुण वर्ण के रक्त और वेदना वाले तथा विशाल मूल वाले - उंचे नीचे व्रण में विस्रावण हितकर होता है । विपयुक्त ( शोथ ) में तो विशेष कर जलौका तथा प्रच्छान विधि से रक्तमोक्षण करना चाहिए ॥
वेदनायाः प्रशान्त्यर्थं पाकस्याप्राप्तये तथा ।
' सोपद्रवाणां रूक्षाणां कृशानां व्रणशोषिणाम् ॥ ३० ॥
यथास्वमौपधैः सिद्धं स्नेहपानं विधीयते ।
उत्सन्नमांसशोफे तु कफजुष्टे विशेषतः ॥ ३१ ॥।
संक्लिष्टश्या ( ध्या ) मरुधिरे व्रणे प्रच्छर्दनं हितम् ।
वातपित्तप्रदुष्टेषु दीर्घकालानुबन्धिषु ॥ ३२
विरेचन प्रशसन्ति व्रणेषु व्रणकोविदाः अपाकेषु तु रोगेषु कठिनेपु स्थिरेषु च स्नायुकोथादिपु तथा च्छेदन प्राप्तमुच्यते अन्तः पूयेष्ववक्त्रेषु तथैवोत्सङ्गवत्स्वपि
गतिमत्सु च रोगेषु भेदनं प्राप्तमुच्यते ।
बालवृद्धा सहक्षीणभीरूणां योपितामपि ॥
मर्मोपरि च जातेषु रोगेपूतेषु दारणम् । सुप पिण्डिते शोफे पीडनरुपपीडिते पाकोदवृत्तेपु दोपेषु तत्तु कार्यं विजानता सुपिष्टैर्दारणद्रव्यैर्युक्तः क्षारेण वा पुनः ॥ ॥
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॥ ३३ ॥
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॥ ३४ ॥
३५ ॥
|| ३६ ||
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३७ ॥
१०. लेहपान ११ वमन १२ विरेचन १३ छेदन १४ भेदन और १५ दारण - वंदना की शान्ति और पाक से बचाने के लिए ( प्रणित के ) उपद्रवों ( कम्प, छींक, पक्षवध आदि ) से युक्त, रूत, कृश और व्रण से क्षीण मनुष्य को निर्दिष्ट औषधियों से सिद्ध स्नेहपान कराना चाहिए । उभरे हुए मांस वाले, विशेष कर कफ से युक्त शोथ में तथा कुछ काले रक्त वाले, व्रण में चमन कराना हितकर होता है । वायु पित पित्तप्रधान तथा पुराने व्रणों में विरेचन का विधान चण पण्डितों ( Surgeons ) के विचार से उत्तम होता है । जिस रोग ( व्रण ) में पाक न हो ( मेद, कफ, ग्रन्थि, मासकन्द आदि ) अथवा जिसमें अल्प पाक हो, ( वल्मीक आदि ) कहा हो, अचल हो तथा स्नायु ( शिरा, धमनी आदि ) के कोथ ( सहन Gangrene ) में छेदन करना चाहिए । अन्दर पूय वाले तथा विना मुख वाले एवं सोसले और गतिशील व्रण में भेटन करना उपयुक्त होता है । बालक, वृद्ध, असहनशील, क्षीण, कायर, स्त्री तथा मर्म के ऊपर उत्पन्न हुए व्रण में, दारण कर्म के लिए कथित व्रण में, पिण्डीभूत शोध में और जिस व्रण में त्वचा मैं पाक हो गया हो, व्रणोपचार को जानने वाला वैद्य पीडन द्रव्यों ( मिश्रक अध्याय में पठित ) से व्रण का ( १ ) पीडन कर भली भाँति पिसे हुए ( २ ) दारण द्रव्य अथवा क्षार ( प्रतिसा रणीय क्षार ) द्वारा दारण कर्म करे ॥ ३०-३७ ॥ 1 विमर्श: - पीडन कर्म के लिए पीडन द्रव्यों को पीस कर, के मुख पर लेप कर, सुखा देना चाहिए । लेपके सूखने पर त्वचा में संकोच होने से व्रण पर भार पड़ता है । इस क्रिया को ' पीडन ' कहते हैं । इससे पूय के एकत्रित होने में सहायता प्राप्त होती है । ( १ ) पीडन द्रव्य - द्रव्याणा पिच्छिला-नान्तु त्वमूलानि प्रपीडनम् । यवगोधूममापाणां चूर्णानि च समासतः ॥ ( २ ) दारण द्रव्य - चिरविल्वोऽग्निको दन्ती चित्रको हयमारक । कपोतगृध्रकङ्कार्णा पुरीपाणि च दारणम् ॥ क्षारद्रव्याणि वा यानि क्षारी वा दारण परम् ॥ ( सु ० सू ० अ ० ३७ )
कठिनान् स्थूलवृत्तौष्ठान् दीर्यमाणान् पुनः पुनः ।
कठिनोत्सन्नमांसांश्च लेखनेनाचरेद्भिषक् ॥ ३८ ॥
समं लिखेत् सुलिखितं लिखेन्निरवशेषतः ।
वर्त्मनां तु प्रमाणेन समं शस्त्रेण निर्लिखेत् ॥ ३६ ॥
क्षौमं प्लोतं पिचुं फेनं यावशूकं ससैन्धवम् ।
कर्कशानि च पत्राणि लेखनार्थे प्रदापयेत् ॥ ४० ॥
१६ लेखन Scraping - कठिन ( मांस से हीन ), मोटे और गोल किनारे वाले, बार बार फूटने वाले तथा कडे एवं उन्नत मांस वाले व्रण में वैद्य को लेखन करना चाहिए । ( कठिन व्रणों में ) सम लिखेत् अर्थात् न तो अधिक और न न्यून लेखन कर्म करे । ( मोटे और गोल किनारे वाले व्रणों मे ) सुलिखितम् अर्थात् अधिक लेखन करे । ( वार वार फूटने वाले घणों में ) निरवशेषत. अर्थात् सम्पूर्ण रूप से लेखन कर्म करे और ( कडे तथा उन्नत मांस वाले व्रण में ) वर्त्मना प्रमाणेन समम् अर्थात् व्रण द्वारा अधिकृत चतुर्दिक भाग में समान रूप से शस्त्र द्वारा लेखन कर्म करे । लेखन कर्म के लिए क्षौम ( क्षीमम् - अतसीवस्त्रम् ) प्लोत ( कपड़ा Gauze ), पिचु ( रुई Cotton ), फेन ( समुद्र फेन ), यवक्षार, सेन्धा नमक और खुरदरे पत्तों का प्रयोग करना चाहिए ॥ ३८-४० ॥
नाडीव्रणान् शल्यगर्भानुन्मार्ग्युत्सङ्गिनः शनैः ।
करीरबालाडु लिभिरेपण्या वैषयेद्भिषक् ॥ ४१ ॥
१७ एषण Probing - नाडीव्रण, शल्ययुक्त व्रण, उन्मार्गी or ( भगन्दर ) तथा खोखले व्रण में, करीरकीनाल, वाल अङ्गुलि अथवा एषणी ( धातुनिर्मित ) से वैद्य को धीरे धीरे एपण कर्म करना चाहिए ॥ ४१ ॥
नेत्रवर्त्मगुदाभ्याशनाड्योऽवत्राः सशोणिताः ।
चुच्चू पोदकजैः श्लक्ष्णैः करीरैरेपयेन्तु ताः ॥ ४२ ॥
दृष्टिपथ और गुदा के समीप वाले तथा छोटे मुस वाले रक्तयुक्त नाडीव्रणों में चुच्चू ( शाक विशेष ), पोई और करीर के चिकने नाल से एपण कर्म करना चाहिये ॥ ४२ ॥
संवृतासंवृतास्येषु व्रणेषु मतिमान् भिषक् ।
यथोक्तमाहरेच्छल्यं प्राप्तोद्धरणलक्षणम् ॥ ४३ ॥
१८ आहरण - बुद्धिमान् वैथ, खुले हुये तथा चन्द मुस ) वाले व्रणों से ( सूत्र स्थान में ) कही गई शल्य निकालने की
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श्रध्यायः १ ] चिकित्सास्थानम् विधि के अनुसार निःशल्य लक्षण की प्राप्ति पर्यन्त शल्य का आहरण ( बाहर निकालना ) करे ॥ ४३ ॥
विमर्श: -- ' प्राप्तोरणलक्षणम् ' से तात्पर्य है निःशल्य के लक्षण का । निःशल्यलक्षण - भल्पबाधमशूनञ्च नीरुजं निरु-पद्रवम् । प्रमन्नं मृदुपर्यन्त निराघट्टमनुत्तमम् ॥ एषण्या सर्वतो दृष्ट्व यथामार्गं चिकित्सकः । प्रसाराकुञ्चनान्नूनं निःशल्यमिति निर्दिशेत् ॥ ( सु. सू. अ. २६ )
रोगे व्यधनसाध्ये तु यथोद्देशं प्रमाणता ।
शस्त्रं निदध्याद्दोपं च स्रावयेत् कीर्तितं यथा ॥ ४४ ॥
१ ९. व्यधन -००. विस्रावण – वेधसाध्य रोगों ( दकोदर, मूत्रवृद्धि आदि ) में उद्देश्य की सिद्धि के लिए प्रमाण के अनुसार शस्त्र का प्रयोग करे और निर्दिष्ट विधि के अनुसार दोषों ( पूय आदि ) को बाहर निकाले ॥ ४४ ॥
विमर्श - शस्त्र प्रयोग की विधि व्याधि के अनुसार-' टकोदरोद्दिष्टं प्रमाणमङ्गुष्ठोदरप्रमाणमवगाढम् । विद्रध्यादिषु पुन महत्स्वपि च पाकेषु यद्गुलान्तरं त्र्यनुलान्तरं वा शस्त्रनिपातनम् । ( ढल्हण )
अपाकोपद्रुता ये च मांसस्था विवृताश्च ये ।
यथोक्तं सीवनं ते कार्यं सन्धानमेव च ॥ ४५ ॥
२१. सीवन २२. सन्धान — पाक्जन्य उपद्रवों से रहित, मांस में स्थित तथा खुले हुये मुख वाले ( व्रणों ) का कथित विधि के अनुसार सीवन और सन्धान करना चाहिये ॥ ४५ ॥
पूयगर्भानणुद्वारान् व्रणान्मर्मगतानपि ।
यथोक्तैः पीडनद्रव्यैः समन्तात् परिपीडयेत् ॥ १६ ॥
२३. पोटन - पूय से युक्त, छोटे मुख वाले तथा मर्म में स्थित व्रणों के ऊपर ( सूत्र स्थान में कथित ) पीटन द्रव्यों का लेप लगा कर चारों ओर से पीठन करना चाहिये ॥ १६ ॥
शुष्यमाणमुपेक्षेत प्रदेहं पीडनं प्रति ।
न चाभिमुखमालिम्पेत्तथा दोपः प्रसिच्यते ॥ ४७ ॥
पीडन कर्म के लिये ( व्रण पर लगे हुये ) प्रलेप को सूखने देना चाहिये । ( छोटे मुख वाले व्रण में ) व्रण के मुख पर लेप नहीं लगाना चाहिये । ( व्रण का मुख खुला रहने से ) इस प्रकार दोप ( पूय ) स्वयं बाहर निकलता रहता है ॥ ४७ ॥
तैस्तैर्निमित्तैर्बहुधा शोणिते प्रस्तुते भृशम् ।
कार्यं यथोक्तं वैद्येन शोणितास्थापनं भवेत् ॥ १८ ॥
२४. शोणितास्थापन — शिरावेध आदि भिन्न - भिन्न कारणों से रक्त की प्रवृत्ति अधिक होने पर पूर्वकथित शोणिता-स्थापन विधि के द्वारा वैद्य को रक्तप्रवाह रोकना चाहिये ॥ विमर्श. - शोणितास्थापन विधि - चतुर्विधं यदेतद्धि रुधि-रस्य निवारणम् । सन्धानं स्कन्दनं चैव पाचनं दद्दनं तथा ( सु. सू. अ. १४ )
दाह्पाकज्वरवतां व्रणानां पित्तकोपतः ।
रक्तेन चाभिभूतानां कार्य निर्वापणं भवेत् ॥ ४६ ॥
२५ निर्वापण - पित्तप्रकोप के कारण दाह, पाक, ज्वर तथा रक्त से आक्रान्त व्रणों में निर्वापण करना चाहिये ॥ १ ९ ॥
यथोक्तैः शीतलद्रव्यैः क्षीरपिष्टैर्धृताप्लुतैः ।
दिह्यादबहलान् सेकान् सुशीतांश्चावचारयेत् ॥ ५० ॥
पूर्वकथित ( मिश्रक अध्याय में ) शीतल द्रव्यों को दूध के साथ पीसकर, घृत मिला, ( व्रणस्थान पर ) पतला लेप और शीतल सेक करे ॥ ५० ॥
विमर्श: - निर्वापण - निर्वापण नाम पित्तरक्तत्रणस्य पच्य-मानस्य ज्वरेणाभिभूतस्य औपधादिभिर्वेदनोपगमः । अर्थात | पित्तरक्त से उत्पन्न, पकने वाले तथा ज्वर से युक्त घण में औषधि आदि के प्रयोग से पीड़ा की शान्ति करना निर्वापण कहलाता है ।
ब्रणेषु क्षीणमांसेषु तनुत्राविष्वपाकिषु ।
तोदकाठिन्यपारुष्यशूल वेपथुमत्सु च ॥ ५१ ॥
वातन्नवर्गेऽम्लगणे काकोल्यादिगणे तथा ।
स्नैहिकेपु च बीजेपु पचेदुत्कारिकां शुभाम् ॥ ५२ ॥
२६. उत्कारिका - क्षीण मांस वाले, पतले नाव वाले, न पकने वाले तथा चुभने की सी पीडा, कडापन, रूक्षता, शूल और कम्प से युक्त व्रणों में, वातघ्न वर्ग ( भद्रदार्वादि ), अम्लगण ( सौवीर, तुपोदक आदि ), काकोल्यादिगण तथा तेल वाले बीजों ( तिल, तीसी, रेडी आदि ) से सुन्दर उत्कारिका पकाकर स्वेदन करे ॥ ५१-५२ ॥ विमर्शः -- उस्कारिकानिर्माण विधि - वातघ्न वर्ग और काकोल्यादिगण की औषधियों तथा स्नेह वाले बीजों को समान भाग में लेकर चतुर्गुण भम्लगण के साथ मिला, पेया के समान, न तो बहुत पतली और न गाढ़ी उत्कारिका ( लप्सी ) बनानी चाहिये ।
तेपां च स्वेदनं कार्य स्थिराणां वेदनावताम् ।
दुर्गन्धानां क्लेदवतां पिच्छिलानां विशेषतः ॥ ५३ ॥
स्थिर ( अचल ) वेदनायुक्त, दुर्गन्धित, सडे गले हुये और विशेषकर लसीले व्रणों का स्वेदन करना चाहिये ॥ ५३ ॥
कपायैः शोधन कार्यं शोधनै. प्रागुदीरितैः । अन्तः शल्यानणुमुखान् गम्भीरान् मांससंश्रितान् ५४ २७. कपाय - अन्दर शल्य तथा छोटे मुख वाले, गहरे और मांस में स्थित व्रणों का शोधन, पूर्वकथित शोधन कपायों के साथ करना चाहिये ॥ ५४ ॥
विमर्शः -- शोधनकपाय - शङ्खिन्यकोठसुमन ' करवीरसुवर्चलाः । शोधनानि कषायाणि वर्गश्चारग्वधादिकः ॥ ( सु. सू. भ. ३७ )
शोधनद्रव्ययुक्ताभिर्वर्तिभिस्तान् यथाक्रमम् ।
पूतिमांसप्रतिच्छन्नान् महादोषांश्च शोधयेत् ॥ ५५ ॥
२८ वर्ति और २ ९. कल्क- शोधनद्रव्यों से युक्त वर्ति के द्वारा यथाक्रम से ( सूक्ष्म, स्थूल, स्थूलतर और स्थूलतम ) दुर्गन्धित मांस से ढके हुए और अत्यन्त दूषित ( वात कफ से ) व्रणों का शोधन करना चाहिये ॥ ५५ ॥
विमर्श: - यहाँ ' महादोषान् ' शब्द का प्रयोग विशेष अर्थ मैं किया गया है । वैसे तो बहुवचनान्त होने के कारण इस शब्द से तीनों दोपों के अर्थ का ही बोध होता है, किन्तु यहाँ
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५ सुश्रुतसंहिता व्रणशोधन का प्रसङ्ग उपस्थित है और पित्त की शुद्धि के लिये शोधनद्रव्य - सिद्ध घृत के प्रयोग का पृथक् निर्देश किया गया है, अत वात, कफ से दूषित अर्थ में ही ' महा दोपान् ' शब्द चरितार्थ हो रहा है । सशोधनवर्ति तथा कल्क निर्माण के लिये ओषधियों का उल्लेख मिश्रक अध्याय में किया गया है ।
कल्कीकृतैर्यथालाभं वर्तिद्रव्यैः पुरोदितैः ।
पित्तप्रदुष्टान् गम्भीरान् दाहपाकप्रपीडितान् ॥ ५६ ॥
कार्पासीफलमिश्रेण जयेच्छोधनसर्पिपा ।
उत्सन्नमांसानस्निग्धानल्पस्रावान् व्रणांस्तथा ॥ ५७ ॥
सर्पपस्नेहयुक्तेन धीमांस्तैलेन शोधयेत् ।
तैलेनाशुध्यमानानां शोधनीयां रसक्रियाम् ॥ ५८ ॥
व्रणानां स्थिरमांसानां कुर्याद् द्रव्यैरुदीरितैः ।
कपाये विधिवत्तेषां कृते चाधिश्रयेत् पुनः ॥ ५६ ॥
सुराष्ट्रजां सकासीसां दद्याच्चापि मनःशिलाम् ।
हरितालं च मतिमांस्ततस्तामवचारयेत् ॥ ६० ॥
मातुलुङ्गरसोपेतां सक्षौद्रामतिमर्दिताम् ।
ady दत्त्वा तां तिष्ठेत्रींस्त्रींश्च दिवसान् परम् ॥ ६१ ॥
३० सर्पि ३१. तैल ३२. रसक्रिया— पूर्वकथित वर्तिद्रव्यों में से जितनी सुलभ हों उनके क्रक के द्वारा ऋणों का शोधन करना चाहिये । पित्त से दूषित, गहरे, दाह तथा पाक से पीडित व्रणों के शोधन के लिए बिनौले के क्ल्क से सिद्ध घृत का प्रयोग करना चाहिये । उठे हुए मांस वाले, रूक्ष तथा अल्प स्राव युक्त व्रणों का शोधन ( शोधनद्रव्यों से सिद्ध ) सरसों और तिल के तेल से बुद्धिमान वैद्य को करना चाहिये । ( शोधनद्रव्य सिद्ध ) तैल से जिन घणों की शुद्धि न हो तथा जो स्थिर मांस वाले हों, उनकी शान्ति के लिये पूर्वकथित द्रव्यों से शोधनीय रसक्रिया का प्रयोग करना चाहिये । रस-क्रिया के लिये कथित औषधियों के कपायनिर्माण विधि के अनुसार बने हुये क्वाथ को पुनः पकाकर उसमें फिटकिरी, कासीस, मैनसिल और हरिताल मिलावे, तथा विजौरे नीबू के रस एव मधु के साथ भली भाँति रगड कर बुद्धिमान वैद्य प्रयोग करें । व्रण में रसक्रिया का प्रयोग तीन तीन दिन पर करना चाहिये ॥ ५६-६१ ॥ विमर्श - शोधन द्रव्य - वृहती कण्टकारी च हरिताल मनः शिला । शोधनानि च योज्यानि तैले द्रव्याणि शोधने ॥ ( सु ० सू ० अ ० ३७ ) रसक्रिया की औषधियों को एक बार व्रण पर रसने के बाद तीसरे दिन बदल देना चाहिए । इससे अधिक दिन व्रण पर औषधि नहीं रखनी चाहिए अन्यथा अधिक दिन तक रसक्रिया का प्रयोग होने मे ' व्रण वस्तु ' के फटने की आशका रहती है । रसक्रिया की औषधियाँ - सालसारादिसारेषु पटोलत्रिफलामु च । रसक्रिया विधातव्या शोधनी शोधनेषु च ॥ ( सु ० सू ० अ ० ३७ )
मेदोजुष्टानगम्भीरान् दुर्गन्धांश्चूर्णशोधनैः ।
उपाचरेद् भिषक् प्राज्ञः श्लक्ष्णैः शोधनवर्तिनैः ॥ ६२ ॥
३३. अवचूर्णन - बुद्धिमान वैद्य, मेद से युक्त, अल्प गहराई वाले ( उत्तान ) और दुर्गन्धित व्रणों का उपचार शोधनद्रव्यों के तथा शोधनवर्ति की औषधियों के चिकने चूर्ण से करे ॥६२ ॥
शुद्धलक्षणयुक्तानां कपायं रोपणं हितम् ।
तत्र कार्य यथोद्दिष्टेद्रव्यैवैद्येन जानता ॥ ६३ ॥
शुद्ध व्रणों में रोपण कपाय का प्रयोग हितकर होता है । बुद्धिमान वैद्य इस कार्य के लिए पूर्वकथित द्रव्यों ( वटादि वर्ग ) से सिद्ध कपाय का प्रयोग करे ॥ ६३ ॥
अवेदनानां शुद्धानां गम्भीराणां तथैव च ।
हिता रोपणवर्त्यङ्गकृता रोपणवर्तयः ॥ ६४ ॥
वेदनारहित, शुद्ध और गहरे घणों में रोपण द्रव्यों ( सोमलता, गुडूची, अश्वगन्धा आदि ) से निर्मित रोपणवर्ति का प्रयोग हितकर होता है ॥ ६४ ॥
अपेतपूतिमांसानां मांसस्थानामरोहताम् ।
कल्कः संरोहणः कार्यस्तिलजो मधुसंयुतः ॥ ६५ ॥
दुर्गन्धित मांग से रहित तथा मांसल स्थान में स्थित होने पर भी न भरने वाले व्रणों में रोपण मधुमिश्रित तिल-. कल्क का प्रयोग करना चाहिए ॥ ६५ ॥
स माधुर्यात्तथोपण्याच्च स्नेहाच्चानिलनाशनः ।
कषायभावान्माधुर्यात्तिक्तत्वाच्चापि पित्तत् ॥ ६६ ॥
औष्यात् कपायभावाच्च तिक्तत्वाश्च कफे हितः ।
शोधयेद्रोपयेच्चापि युक्तः शोधनरोपणैः ॥ ६७ ॥
यह तिलकल्क मधुर, उष्ण और स्निग्ध होने से वायु का नाश करता है । कषाय, मधुर और तिक्त होने के कारण पित्त को दूर करता है तथा उष्ण, कपाय और तिक्त होने से कफ में हितकर है । शोधन और रोपण औषधियों के साथ मिलाकर प्रयुक्त किया गया ( तिलकल्क ) शोधन और रोपण करता है ॥ ६६-६७ ॥
निम्बपत्रमधुभ्यां तु युक्तः संशोधनः स्मृतः ।
पूर्वाभ्यां सर्पिपा चापि युक्तश्चाप्युपरोपणः ॥ ६८ ॥
निम्बपत्र और मधु के साथ मिलाकर प्रयुक्त किया गया ( तिलकल्क ) व्रण का सशोधन करता है तथा frana, मधु और घृत से युक्त तिलकल्क का प्रयोग व्रण का रोपण करता है ॥ ६८ ॥
तिलवद्यवकल्कं तु केचिदाहुर्मनीपिणः ।
शमयेदविदग्धं च विदग्धमपि पाचयेत् ॥ ६६ ॥
कुछ आचार्य तिलकलक के समान यव ( जौ ) कल्क को भी मानते है । इसके प्रयोग से अपक घण शान्त होते हैं तथा अल्पपक व्रणों का पाचन होता है ॥ ६ ९ ॥
पक्कं भिनत्ति भिन्नं च शोधयेद्रोपयेत्तथा ।
पित्तरक्तविपागन्तून् गम्भीरानपि च व्रणान् ॥ ७० ॥
रोपयेद्रोपणीयेन क्षीरसिद्धेन सर्पिपा ।
कफवाताभिभूतानां व्रणानां मतिमान् भिषक् ॥७१ ॥
कारयेद्रोपणं तैलं भेपजैस्तद्यथोदितैः ।
अवन्ध्यानां चलस्थानां शुद्धानां च प्रदुष्यताम् ॥७२ ॥
द्विहरिद्रायुतां कुर्याद्रोपणार्थी रसक्रियाम् ।
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अध्याय ' १ ] चिकित्सास्थानम् समानां स्थिरमांसानां त्वकस्थानां रोपणं भिषक् ॥ चूर्णं विदध्यान्मतिमान् प्राक्स्थानोतो विधिर्यथा ७३ यह पके हुए व्रणों को फोडता है और फूटे हुए व्रणों का शोधन तथा रोपण करता है । पित्त, रक्त और विष से उत्पन्न तथा आगन्तुक एवं गहरे वर्णों का रोपण, रोपणीय द्रव्यों से सिद्ध दुग्ध के द्वारा निकाले गए घृत से करना चाहिए । बुद्धिमान वैद्य को कफ और वात से भाक्रान्त व्रणों का रोपण पूर्वोक्त ( रोपणीय ) औषधियों से सिद्ध तेल के द्वारा करना चाहिए । जिन व्रणों में पट्टी बाँधना निषिद्ध है ( पित्त, रक्त, विप तथा अभिघात से उत्पन्न व्रण ) तथा जो सन्धि-स्थान पर स्थित है एवं शुद्ध होने पर भी जिनमें पुनः दोपो-त्पत्ति हो जाती है उन वर्णों के रोपण के लिए हल्दी और दारूहल्दी से युक्त रसक्रिया करनी चाहिए । समान, कठिन मांस वाले तथा त्वचा में स्थित व्रणों के रोपण के लिए सूत्र-स्थान में कही गई विधि के अनुसार औषधियों के चूर्ण का प्रयोग बुद्धिमान वैद्य को करना चाहिए ॥ ७०–७३ ॥ विमर्श. - प्राक्स्थानोको विधिः- प्राक्स्थाने सूत्रस्थाने उक्तो-विधि ' येन प्रकारेण । स च प्रकार. ' किंशुकत्रिफलारो मि'त्यादिना निर्दिष्टः । ( डल्हण ) रोपण चूर्ण: - कनुका त्रिफला रोघ्र कासीस श्रवणाहया । धवाश्वकर्णयोस्त्वक् च रोपण चूर्णमिष्यते ॥ ( सु. सू. भ. ३७ ) शोधनो रोपणचैव विधिर्योऽयं प्रकीर्तितः ॥ ७४ ॥
सर्वव्रणानां सामान्येनोको दोषा विशेषतः ।
एष आगमसिद्धत्वात्तथैव फलदर्शनात ॥ ७५ ॥
मन्त्रत्रत् संप्रयोक्तव्यो न मीमांस्यः कथञ्चन ।
स्वबुद्धया चापि विभजेत् कषायादिषु सप्तसु ॥७६ ॥
भेषजानि यथायोगं यान्युक्तानि पुरा मया ।
आद्ये द्वे पञ्चमूल्यौ तु गणो यश्चानिलापहः ॥ ७७ ॥
स वातदुष्टे दातव्यः कषायादिषु सप्तसु ।
न्यग्रोधादिर्गणो यस्तु काकोल्यादिश्च यः स्मृतः ॥७८ ॥
तौ पित्तदुष्टे दातव्यौ कषायादिषु सप्तसु ।
आरग्वधादिस्तु गणो यश्वोष्णः परिकीर्तितः ॥
तौ कफदुष्टे तु संसृष्टे संयुता गणाः ॥ ७६ ॥
जिस शोधन - रोपण विधि का वर्णन किया गया है, वह दोषसामान्य से सभी प्रकार के ( शारीरिक और आगन्तुक ) व्रणों के लिए सामान्य विधि है । शास्त्र ( चिकित्सा शास्त्र ) में प्रसिद्ध तथा आरोग्य प्रदान करने वाली इस ( शोधन-रोपण ) विधि का प्रयोग मन्त्र की भाँति बिना किसी विचार ( तर्क - वितर्क ) के करना चाहिए । जिन औपधियों का कथन मैंने पहले किया है उनका विभाजन १. कषाय, २ वर्ति, ३० कल्क, ४ सर्पि, ५. तैल, ६ रसक्रिया और ७. चूर्ण में योग के अनुसार वैद्य को अपनी बुद्धि से भी करना चाहिए । प्रारम्भ में कहे गए वातघ्न लघु और बृहत् पञ्चमूल गण का प्रयोग सप्तकपायों ( कषाय, वर्ति, कल्क आदि ) में बात से दूपित व्रणों के लिए करना चाहिए । जिन न्यग्रोधादि और काकोल्यादि गणों का उल्लेख किया जा चुका है उन दोनों का सप्तकपायों में प्रयोग पित्त से दूषित व्रण के लिए करना चाहिए । २ सु ० चि ० भारग्वधादि और उष्णगण ( सुरसादिगण ) का वर्णन पहले । किया जा चुका है । कफ से दूषित व्रण में इन दोनों गण का तथा मिश्रित दोष वाले वर्णों में गणों का सम्मिलित प्रयोग ( शोधन -रोपण होने के कारण ) करना चाहिए ॥ ७४-७९ ॥ वातात्मकानुग्ररुजान् सास्रावानपि च ब्रणान् ॥ ८० ॥
सक्षौमयवसर्पिर्भिर्धूपनाङ्गैश्च धूपयेत् । ३४ धूपन -- वातदोष, तीव्र वेदना तथा स्राव से युक्त व्रणों में क्षौम ( तीसी से निर्मित वस्त्र ), जौ, घृत और धूपन द्रव्यों ( श्रीवेष्टक, सर्जरस आदि ) से धूप देना चाहिए ॥८० ॥
परिशुष्काल्पमांसानां गम्भीराणां तथैव च ॥ ८१ ॥
कुर्यादुत्सादनीयानि सर्पीण्यालेपनानि च ।
मांसाशिनां च मांसानि भक्षयेद्विधिवन्नरः ॥ ८२ ॥
विशुद्धमनसस्तस्य मांसं मांसेन वर्धते । ३५ उत्सादन - सूखे हुए, अल्पमांस वाले तथा गहरे व्रणों में उत्सादनीय ( निम्न व्रण को ऊपर उठाने वाले ) द्रव्यों से सिद्ध घृत और लेप का प्रयोग करना चाहिए । रोगी को मांसाहारी जन्तुओं का मांस विधिपूर्वक खिलाना चाहिए । मांस सेवन से विशुद्ध मन वाले ( शोक, क्रोध आदि से रहित ) व्यक्ति के मांस की वृद्धि होती है ॥ ८१-८२ ॥ उत्सन्नमृदुमांसानां व्रणानामवसादनम् ॥ ८३ ॥
कुर्याद् द्रव्यैर्यथोद्दिष्टैश्चूर्णितैर्मधुना सह । ३६ अवसादन - उभरे हुए मृदु मांस वाले व्रणों का अवसादन ( उठे हुए व्रण को नीचा करना ) पूर्व कथित ( कासीसादि ) औषधियों के चूर्ण में मधु मिलाकर करना चाहिए ॥ ८३ ॥
कठिनानाममांसानां दुष्टानां मातरिश्वना ॥ ८४ ॥
मृद्वी क्रिया विधातव्या शोणितं चापि मोक्षयेत् ।
वातघ्नौषधसंयुक्तान् स्नेहान् सेकांश्च कारयेत् ॥ ८५ ॥
३७ मृदुकर्म - कठिन, अल्पमांस वाले एवं वात से दूषित त्रणों में मृदुकर्म और रक्तमोक्षण तथा वातघ्न औषधियों से युक्त स्नेह और सेक का प्रयोग करना चाहिए ॥ ८४-८५ ॥
मृदुत्वमाशुरोहं च गाढो बन्धः करोति हि ।
व्रणेषु मृदुमांसेषु दारुणीकरणं हितम् ॥
धवप्रियग्वशोकानां रोहिण्याच त्वचस्तथा ॥ ८६ ॥
त्रिफलाधातकीपुष्परोध्रसर्जरसान् समान् ।
कृत्वा सूक्ष्माणि चूर्णानि व्रणं तैरवचूर्णयेत् ॥ ८७ ॥
३८ दारुण कर्म – कसकर पट्टी बाँधने से व्रण में कोमलता आती है और वह शीघ्र भरता है । मृदु मांस वाले व्रणों में दारुणकर्म ( व्रण को कठिन बनाने वाली क्रिया ) हितकर होता है । धव, फूलप्रियद्धु, अशोक, कटुतुम्बी की छाल, हरड, बहेड़ा, आँवला, धाय के फूल, लोध्र और राल का समान भाग में महीन चूर्ण बना कर व्रण पर छिड़कना चाहिए ॥
उत्सन्नमांसान् कठिनान् कण्डूयुक्तांश्चिरोत्थितान् ।
तथैव खलु दुःशोध्यान् शोधयेत् क्षारकर्मणा ॥ ८ ॥
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१० सुश्रुतसंहिता ३ ९ क्षार कर्म - उभरे हुए मांस वाले, कठिन, खुजली युक्त, चिरकाल से उत्पन्न तथा कठिनाई से शुद्ध होने वाले व्रणों का शोधन क्षार कर्म के द्वारा करना चाहिए ॥ ८८ ॥
स्रवतोऽश्मभवान्मूत्रं ये चान्ये रक्तवाहिनः ।
निःशेषच्छिन्नसन्धींश्च साधयेदग्निकर्मणा ॥ ८६ ॥
४० अग्निकर्म - मूत्र बहाने वाले, अश्मरीजन्य तथा रक्त
वहाने वाले अन्य ब्रण एवं सम्पूर्ण रूप से कटी हुई सन्धियों ।
वाले व्रण को अग्निकर्म से सिद्ध ( नीरोग ) करना चाहिए ॥८ ९ ॥
दुरूढत्वात्तु शुक्लानां कृष्णकर्म हितं भवेत् ।
भल्लातकान् वासयेत्तु क्षीरे प्रामत्रभावितान् ।
ततो द्विधा च्छेदयित्वा लौहे कुम्भे निधापयेत् ॥ ६० ॥
कुम्भे ऽन्यस्मिन् निखाते तु तं कुम्भमथ योजयेत् ।
मुखं मुखेन सन्धाय गोमयैर्दाहयेत्ततः ॥ ६१ ॥
यः स्नेहच्श्यवते तस्माद्ग्राहयेत्तं शनैर्भिपक् ।
ग्राम्यानूपशफान् दग्ध्वा सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत ॥६२ ॥
तैलेनानेन संसृष्टं शुकुमालेपयेद् व्रणम् ।
भल्लातकविधानेन सारस्नेहांस्तु कारयेत् ॥
ये च केचित् फलस्नेहा विधानं तेषु पूर्ववत् ॥ ६३ ॥
४१. कृष्णकर्म - भलीभाँति न भरने के कारण श्वेत वर्ण वाले व्रणों में कृष्ण र्क्स हितकर होता है । पहले ( सप्ताह पर्यन्त ) गोमूत्र में रखे हुए भिलावे को दूध में ( सात दिन ) रखे । फिर भिलावे के दो टुकड़े कर लोहे के घड़े में रखे । पश्चात् भूमि में गढे हुए दूसरे घडे के सुख के साथ ( मिलावे ( वाले ) घडे का सुख मिलाकर सन्धिवन्धन करके ऊपर से उपले की अग्नि जलावे | इस विधि से जो स्नेह ( तेल ) टपके उसे धीरे धीरे वैद्य ग्रहण करे । ग्राम्य तथा आनूप देश के पशुओं का खुर जला कर बनाया गया बारीक चूर्ण इस तेल में मिलावे और शुकु व्रण पर लेप करे । भल्लातक विधान के अनुसार ( स्नेह निकालने की उपर्युक्त विधि ) सारस्नेह ( सालसारादिगण की औपधियों का तेल ) निकाले तथा फलस्नेह ( विभीतक आदि फलों का तेल ) निकालने में उपर्युक्त विधि का ही अनुसरण करे ॥ ९ ० - ९ ३ ॥ दुरूढत्वात्तु कृष्णानां पाण्डुकर्म हितं भवेत् ॥ ६४ ॥
सप्तरात्रं स्थितं क्षीरे छागले रोहिणीफलम् ।
तेनैव पिष्टं सुश्लक्ष्णं सवर्णकरण हितम् ॥ ६५ ॥
४२. पाण्डुकर्म - भलीभाँति न भरने के कारण जो व्रण काले हो गये हों उनमें पाण्डुकर्म ( त्वचा के समान वर्णं करना ) हितकर होता है । रोहिणीफल ( हरीतकी भेद ) को सात दिन बकरी के दूध में रख कर उसी दूध से वारीक पीस ले । त्वचा के समान वर्णं करने के लिए इसका प्रयोग हितकर है ॥ ९ ४ - ९ ५ ॥
नवं कपालिकाचूणं वैदुलं सर्जनाम च ।
कासीसं मधुकं चैव क्षौद्रयुक्तं प्रलेपयेत् ॥ ६६ ॥
कोरे कोरे ( मिट्टी का पात्र विशेष ) के चूर्ण, वेंत की जड, राल, कासीस और मुलेठी के चूर्ण में मधु मिलाकर प्रलेप लगावे ॥ ९ ६ ॥
कपित्थमुद्धृते मांसे मूत्रेणाजेन पूरयेत् ।
कासीसं रोचनां तुत्थं हरितालं मनःशिलाम् ॥ ६७ ॥
वेनिर्लेखनं चापि प्रपुन्नाडरसाञ्जनम् ।
अधस्तादर्जुनस्यैतन्मासं भूमौ निधापयेत् ॥
मासादूर्ध्वं ततस्तेन कृष्णमालेपयेद् व्रणम् ॥ ६८ ॥
कैथ के अन्दर का गूदा निकालकर उसे बकरी के मूत्र से भर दे । उसमें कासीस, गोरोचन, तूतिया, हरिताल, मैनशिल, बाँस की छाल का चूर्ण, चकवड़ का बीज और रसोत मिला कर एक मास तक अर्जुन वृक्ष की जड़ के नीचे जमीन में गाढ कर रखे । एक माम उपरान्त काले व्रण पर इसका लेप करे ॥ ९ ७ - ९ ८ ॥ कुक्कुटाण्डकपालानि कतकं मधुकं समम् ॥ ६६ ॥
तथा समुद्रमण्डूकी मणिचूर्ण च दापयेत् ।
गुटिका मूत्रपिष्टास्ता व्रणानां प्रतिसारणम् ॥ १०० ॥
४३. प्रतिसारण - मुर्गी के अण्डे का छिलका, निर्मली, मुलेठी, समुद्रमण्डूकी ( मुक्ताशुक्ति ) और मणिचूर्ण ( स्फटिक पत्थर, मोती आदि का चूर्ण ) को समान भाग में ले, गोमूत्र के साथ पीस कर गोली बनावे । इस गोली से प्रतिसारण ( घर्पण ) कर्म करे ॥ ९९ -१०० ॥
हस्तिदन्तमसीं कृत्वा मुख्यं चैव रसाञ्जनम् ।
रोमाख्येतेन जायन्ते लेपात्पाणितलेष्वपि ॥ १०१ ॥
४४ रोमसञ्जनन - हाथीदांत को जलाकर ( कोयला बनाकर ) चूर्ण करके उत्तम रसोत ( बकरी के दूध के साथ ) में मिलाकर लेप करने से हथेली और तलवे में भी बाल उत्पन्न होते है ॥ १०१ ॥
चतुष्पदानां त्वग्रोमखुरशृङ्गास्थिभस्मना ।
तैलाचा चूर्णिता भूमिर्भवेद्रोमवती पुनः ॥ १०२ ॥
चौपायों ( पशुओं ) की त्वचा, बाल, खुर, सींग और हड्डी की भस्म को ( रोमरहित ) तेल पुते हुए भाग पर बुरकने से पुनः रोम उत्पन्न हो जाता है ॥ १०२ ॥
कासीस नक्तमालस्य पल्लवांश्चैव संहरेत् ।
कपित्थरसपिष्टानि रोमसंजननं परम् ॥ १०३ ॥
कासीस और करन के पत्तों को कैथ के रस से पीस कर किया गया लेप वाल उत्पन्न करने के लिए उत्तम प्रयोग है ॥
रोमाकीर्णो व्रणो यस्तु न सम्यगुपरोहति ।
क्षुरकर्तरिसन्दंशैस्तस्य रोमाणि निर्हरेत् ॥ १०४ ॥
४५ लोमापहरण - बालों से भरा होने के कारण जो व्रण भलीभांति न भरता हो, उस व्रण के वालों को, छुरा, कैंची तथा संदेशयन्त्र ( चिमटी ) से निकाल देना चाहिए ॥
( शङ्खचूर्णस्य भागौ द्वौ हरितालं च भागिकम् ।
शुकेन सह पिष्टानि लोमशातनमुत्तमम् ) ॥ १०५ ॥
( शंख का चूर्ण दो भाग और हरिताल एक भाग को शुक्त फल सिद्ध अम्ल द्रव ) के साथ पीस कर लेप लगाना वालों को गिराने के लिए उत्तम प्रयोग है ) ॥ १०५ ॥
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श्रध्यायः १ ] चिकित्सास्थानम् ११
तैलं भल्लातकस्याय स्नुहीचीरं तथैव च ।
प्रगृह्यैकत्र मतिमान् रोमशातनमुत्तमम् ॥
बुद्धिमान वैद्य भिलावे के तेल और थूहर एकत्र मिलाकर बालों को गिराने के लिए प्रयोग कदलीदीर्घवृन्ताभ्यां भस्मालं लवणं शमी वीजं शीतोदपिष्टं वा रोमशातनमाचरेत् केला और भरल की भस्म ( जलाकर बनाई १०६ ॥ के दूध को करे || १०६ || | ॥ १०७ ॥
गई राख ),
हरिताल, सेन्वानमक और शमी के बीज को शीतल जल से ।
पीस कर बालों को गिराने के लिए प्रयोग करना चाहिए ॥
आगारगोविकापुच्छं रम्भाऽऽलं बीजमैहुदम् ।
दुग्ध्वा तद्भस्म तैलाम्बु सूर्यपक्कं कचान्तकृन् ॥ १०८ ॥
आगारगोधिका की पूँछ, केला, हरिताल और इङ्गुदीबीज को जलाकर बनाई गई भस्म में तेल तथा जल मिला कर
' धूप में पाया जावे । यह रोमनाशक योग है ॥ १०८ ॥
विमर्शः- आगारगोधिका को बंगाल प्रान्त में ब्राह्मणी कहते है । यह सर्प की तरह चमकदार और रेखाङ्कित किन्तु आकार में छोटी और पैर वाली होती है, देहाती क्षेत्र के घरों में यह बहुधा देखी जाती है । उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में इसे ' ओटनी ' कहते हैं ।
वातदुष्टो व्रणो यस्तु रूक्षश्चात्यर्थवेदनः ।
अथः कार्य विशेपेण तत्र वस्तिर्विधीयते ॥ १०६ ॥
४६. बत्तिर्न - वायु से दूषित, रूड़ और तीव्रवेदनावाले तथा विशेष कर शरीर के अवो भाग में स्थित वर्गों में बस्ति कर्म करना चाहिए ॥ १० ९ ॥
मूत्राघाते मूत्रदोपे शुक्रदोपेऽश्मरीत्रणे ।
तथैवार्तवदोपे च वस्तिरप्युत्तरो हितः ॥ ११० ॥
४७. उत्तरवस्ति – मूत्राघात, मूत्रदोष, शुक्रदोष और अश्म-रीजन्यत्रण तथा आर्त्तवदोष में उत्तरवस्ति हितकर होती है ॥
यस्माच्छुष्यति वन्वेन त्रणो याति च मार्दवम् ।
रोहत्यपि च निःशङ्कस्तस्माद्बन्धो विधीयते ॥ १११ ॥
४८. वन्य ( Bandage ) - पट्टी बाँधने से व्रण शुद्ध होता है, उसमें मृदुता आती है तथा निःशङ्क रूप से ( मक्खी आदि के लगने की बाघा से रहित ) भरता है, अतः व्रण में पट्टी बाँधनी चाहिए ॥ ११५ ॥
स्थिराणामल्पमांसानां रोच्यादनुपरोहताम् ।
पत्रदानं भवेत् कार्य यथादोषं यथर्तु च ॥ ११२ ॥
४१. पत्रदान- स्थिर, अल्पमांसवाले तथा रूक्षता के कारण न भरनेवाले व्रणों में, दोष और ऋतु के अनुसार
पत्रदान ( व्रण पर लेप लगाकर ऊपर पत्ता रखना ) करना ।
चाहि ॥ ११२ ॥
एरण्डभूर्त पूतीकहरिद्राणां तु बाजे ।
पत्रमाश्ववलं यच्च काश्मरीपत्रमेव च ॥ ११३ ॥
पत्राणि श्रीरवृक्षाणामौदकानि तथैव च ।
दूषिते रक्तपित्ताभ्यां ब्रणे दद्याद्विचक्षणः ॥ ११४ ॥
वातज व्रण मेंरेंड, भोजपत्र, करक्ष तथा हल्दी की पत्ती रखनी चाहिए । रक्त - पित्त से दूषित व्रग में अश्ववला ( पोई ), गम्भारी, चीरवृक्ष ( बद, गूलर आदि ) तथा औदक ( कमल आदि के ) पत्तों का प्रयोग बुद्धिमान् वैद्य को करना चाहिए ॥
पाठामूर्वागुडूचीनां काकमाचीहरिद्रयोः ।
पत्रं च शुकनासाया चोजयेत् कफजे व्रणे ॥११५ ॥
कफजत्रण में - पाठा, मूर्वा, गिलोय, मकोय, हल्दी और शुकनासा ( चर्मकार वट ) के पत्तों का प्रयोग करे ॥ ११५ ॥
अकर्कशमविच्छिन्नमजीर्णं सुकुमारकम् ।
अजन्तुजग्धं मृदु च पत्रं गुणवदुच्यते ॥ ११६ ॥
जो पत्ता खुरदरा न हो, फटा न हो, नया हो, पतला हो, और कीड़ों से खाया हुआ न हो तथा कोमल हो वह ( पत्रदान के लिए ) गुणकारी होता है ॥ ११६ ॥
स्नेहमौषवसारं च पट्टः पत्रान्तरीकृतः ।
नादत्ते यत्ततः पत्रं लेपस्योपरि दापयेत् ॥ ११७ ॥
पत्ते को लेप के ऊपर रख कर पट्टी बाँधने से नेह ( शतधौत घृत आदि ) और औषधि का सार ( वीर्य ) पट्टी में नहीं लगता इसलिए लेप के ऊपर पत्ता रखना चाहिए ॥११७ ॥
शैत्यौष्ण्यजननार्थाय स्नेहसंग्रहणाय च ।
दत्तोषघेषु दातव्यं पत्रं वैद्येन जानता ११८ ॥
शीतलता और उष्णता उत्पन्न करने तथा स्नेह को बचाने के लिए, विद्वान वैद्य को लेप के ऊपर पत्ता रखना चाहिए ॥ ११८ ॥
मनिका व्रणमागत्य निःक्षिपन्ति यदा कृमीन् ।
श्वयथुर्भक्षिते तैस्तु जायते भृशदारुणः ॥ ११६ ॥
तीत्रा रुजो विचित्राश्च रक्तास्रावश्च जायते ।
सुरसादिर्हितस्तत्र घावने पूरणे तथा ॥ १२० ॥
सप्तपर्णकरञ्जार्कनिम्वराजादनत्वचः ।
हिता गोमूत्रपिष्टाश्च सेकः क्षारोदकेन वा ॥ १२१ ॥
प्रच्छाद्य मांसपेश्या वा कृमीनपहरेद् त्रणात् ।
विंशतिं कृमिजातीस्तु वच्याम्युपरि भागशः ॥ १२२ ॥
५० कृमिघ्न — ब्रेण पर बैठकर मक्खियाँ जब कृमि उत्पन्न कर देती हैं । तब उन कृमियों के काटने से ऋण में अत्यन्त कष्ट देनेवाला गोथ उत्पन्न हो जाता है । उसमें तीव्र और विचित्र ( तोद, दाह, कण्डू आदि नाना रूपवाली ) वेदना तथा रक्तस्त्राव होता है । इम अवस्था में सुरसादि गण की ava यों का प्रयोग व्रण के धोने तथा भरने के लिए हितकर होता है है ॥ छतिवन, करज, मटार, नीम और खिरनी की छाल को गोमूत्र में पीसकर लेप करना अथवा क्षारयुक्त जल से सेक करना हितकर होता है । मांस के टुकडे से ( व्रण को ) ढक कर कृमियों को व्रण से बाहर निकालना चाहिए । वीस प्रकार की कृमि जाति का वर्णन उत्तरतन्त्र ( कृमिप्रति • पेधीय अध्याय ) में किया जावेगा ॥ ११ ९ -१२२ ॥
दीर्घकालातुराणां तु कृशानां व्रणशोषिणाम् ।
बृंहणीयो विधिः सर्वः कायाग्नि परिरक्षता ॥ १२३ ॥
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II सुश्रुतसहिता ५१ बृहण - चिरकाल से रुग्ण, कृश एवं व्रण से शुष्क ( दुर्बल ) व्यक्ति के लिए जाठराग्नि की रक्षा करते हुए सभी प्रकार की वहण ( शरीर को पुष्ट करने वाली ) विधि का प्रयोग करना चाहिये ॥ १२३ ॥
विपजुष्टस्य विज्ञान विपनिश्चयमेव च ।
चिकित्सितं च वक्ष्यामि कल्पेषु प्रतिभागशः ॥ १२४ ॥
५० विपन - विष से युक्त ( अन्न - पान आदि ) का लक्षण विप ( स्थावर जंगम - आदि ) की परीक्षा और उसकी चिकित्सा कल्प स्थान में पृथक २ कही जावेगी ॥ १२४ ॥
कण्डूमन्तः सशोफाश्च ये च जनूपरि व्रणाः ।
शिरोविरेचनं तेषु विदध्यात्कुशलो भिपक् ॥ १२ ॥
५३ शिरोविरेचन-- कुशल वैद्य खुजली वाले, शोध युक्त
और कण्ठ प्रदेश के ( जनुवक्षोऽसयोः सन्धिः ) व्रणों में ।
शिरोविरेचन का प्रयोग करे ॥ १२५ ॥
रुजावन्तोऽनिलाविष्टा रूक्षा ये चोर्ध्वजनुजाः ।
व्रणेषु तेषु कर्तव्यं नस्यं वैद्येन जानता ॥ १२६ ॥
०४ नम्य - विद्वान वैद्य पीडायुक्त, वायु से भाक्रान्त, रूक्ष और कण्ठ प्रदेश से ऊपर के व्रणों में नस्य ( स्नैहिक नस्य ) का प्रयोग करे ॥ १२६ ॥
दोपप्रच्यावनार्थाय रुजादाहक्षयाय च ।
जिह्वादन्तसमुत्थस्य हरणार्थं मलस्य च ॥ १२७ ॥
शोधनो रोपणश्चैव व्रणस्य मुखजस्य वै ।
उष्ण वा यदि वा शीतः कवलग्रह इष्यते ॥ १२८ ॥
५० कवलधारण - दोषों को निकालने के लिए पीढ़ा और दाह की शान्ति के लिए जिह्वा तथा दातों में लगे हुए मल । को साफ करने के लिये एवं मुख में उत्पन्न व्रण के शोधन ।
तथा रोपण के लिए उष्ण भथवा शीतल कवलधारण हितकर ।
होता है ॥ १२७ १२८ ॥
ऊर्ध्वजत्रुगतान् रोगान् व्रणांश्च कफवातजान् ।
शोफखावरुजायुक्तान, धूमपानैरुपाचरेत् ॥ १२६ ॥
५६ धूम - कण्ठ प्रदेश से ऊपर के रोगों की और कफ-वातजन्य तथा शोथ, स्राव एवं पीटा से युक्त घणों की चिकित्सा धूमपान से करनी चाहिये ॥ १२ ९ ॥
क्षतोष्मणो निग्रहार्थ सन्धानार्थं तथैव च ।
सद्योत्रणेष्वायतेषु क्षौद्रसर्पिर्विधीयते ॥ १३० ॥
५७. मधुपक्षितजन्य ऊष्मा को रोकने तथा व्रण को लोड़ने के लिये, नवीन एव चौडे व्रण में मधुसर्पि का प्रयोग करना चाहिये ॥ १६० ॥
अवगाढास्त्वणुमुखा ये व्रणाः शल्यपीडिताः ।
निवृत्तहस्तोद्धरणा यन्त्रं तेषु विधीयते ॥ १३१ ॥
५८ यन्त्र - गहरे, बहुत छोटे सुसवाले, शल्य से युक्त तथा जिन वर्णो में से हाथ द्वारा शल्य निकालना सम्भव न हो उनमें यन्त्र का प्रयोग करना चाहिये ॥ १३१ ॥
लघुमात्रो लघुश्चैव स्निग्ध उष्णोऽग्निदीपनः । सर्वत्रणिभ्यो देयस्तु सदाऽऽहारो विजानता ॥१३२ ॥ ]
५ ९ आहार - विद्वान् वैद्य सभी प्रकार के व्रणरोगियों को लघु मात्रा ( परिमाण में अल्प ) और लघु द्रव्यों ( गुणमें लघु शालिघान्य आदि ) का स्निग्ध, उष्ण अग्निदीपन आहार प्रदान करे ॥ १३२ ॥
निशाचरेभ्यो रयस्तु नित्यमेव तातुरः ।
रक्षाविधानैरुद्दिष्टैर्यमैः सनियमैस्तथा ॥ १३३ ॥
६०. रक्षाविधान - पहले कहे गए रक्षाविधान, ( गुग्गुलु आदि का धूपन एवं आयुर्वेदविहित मन्त्रों का प्रयोग ) तथा यम और नियम के द्वारा क्षत से पीडित व्यक्ति की निशाचरों से रक्षा अहर्निश करनी चाहिए ॥ १३३ ॥
विमर्श -- मै. सनियमैरिति । पन यमा नियमाश्च पञ्च । यम का लक्षण -- अहिंसा सत्यमस्तेय ब्रह्मचर्यं तथैव च । व्यवहार-निवृत्तिश्च यमाः पञ्च प्रकीर्तिताः ॥ नियम का लक्षण - अक्रोधो गुरुशुश्रूषा शौचमाहारलाघवम् । अप्रमादश्च पञ्चते नियमाः परिकीर्तिताः ॥
पण्मूलोऽष्टपरिमाही पञ्चलक्षणलक्षितः ।
पट्या विधानैर्निर्दिष्टेचतुर्भिः साध्यते व्रणः ॥ १३४ ॥
६ कारण, आठ अधिष्ठान, और पांच लक्षणों से पहचाने गए व्रण की चिकित्सा निर्दिष्ट ( पूर्व कथित ) ६० उपक्रमों तथा चतुष्पादों के द्वारा की जाती है ॥ १३४ ॥
विमर्श - ( १ ) व्रण के पण्मूल ( ६ कारण ) -- बात-पित्तकफशोणितसन्निपातानन्तवः पडेव मूलकारणानि यस्य स मूल. । ( २ ) अष्टपरिग्राही ( अविष्ठान ) त्वमाससिराखायु-मन्ध्यन्धिकोष्ठमर्माणीत्यष्टौ व्रणवस्तूनि परिगृह्ण नीति अष्टपरिग्राही । परिग्रहोऽधिष्ठानम् आश्रय इत्यर्थ. । ( ३ ) पञ्चलक्षण - ( गन्ध - वर्ण ) सामवेदनाकृतिभिर्लक्षणैर्लक्षित इति । ( 8 ) साठ विधानों ( उपक्रमों ) का वर्णन ऊपर किया गया है । ( ५ ) चतुर्भिः ( चतुष्पाद ) - ( चतुर्भिर्वेधातुरपरिचारकौषधेरित्यर्थः । ढल्हण
योऽल्पौपधकृतो योगो बहुप्रन्थभयान्मया ।
द्रव्याणां तत्समानानां तत्रावापो न दुष्यति ॥ १३५ ॥।
ग्रन्थविस्तार के भय से अल्प औषधियों से युक्त जिन योगों का वर्णन मैंने किया है, उन योगों में तुल्य गुण वाले अन्य द्रव्यों का आवाप ( निक्षेप ) दोपयुक्त नहीं है । १३५ ॥
प्रसङ्गाभिहितो यो वा बहु दुर्लभ भेषजः ।
यथोपपत्ति तत्रापि कार्यमेव चिकित्सितम् ॥ १३६ ॥
कहे गए अनेक दुर्लभ औषधियों वाले योगों में से जितने द्रव्य उपलब्ध हो सकें, उन्हीं से चिकित्सा कार्य करना चाहिए ॥ १३६ ॥
. गणमपि यद् द्रव्यं भवेव्याधावयौगिकम् ।
तदुद्धरेद्यौगिकं तु प्रक्षिपेदप्यकीर्तितम् ॥ १३७ ॥
गणों में निर्दिष्ट यदि कोई द्रव्य व्याधि की दृष्टि से उपयुक्त न हो तो उसे निकाल देना चाहिए तथा योग से सम्बद्ध किन्तु गण में नहीं कहे गए अन्य द्रव्य का भी मिश्रण कर लेना चाहिए ॥ १३७ ॥
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श्रध्यायः २ ] चिकित्सास्थानम् १३
उपद्रवास्तु द्विविधा व्रणस्य व्रणितस्य च ।
तत्र गन्धादयः पञ्च व्रणस्योपद्रवाः स्मृताः ॥ १३८ ॥
उपद्रव दो प्रकार के होते है ( १ ) व्रण के और ( २ ) व्रण से पीड़ित के । उनमें गन्ध आदि पांच व्रण के उपद्रव कहलाते हैं ॥ १३८ ॥
ज्वरातिसारौ मूर्च्छा च हिक्का च्छदिंररोचकः ।
श्वासकासाविपाकाश्च तृष्णा च व्रणितस्य तु ॥ १३६ ॥ ।
ज्वर, अतिसार, मूर्च्छा, हिचकी, वमन, अरुचि, श्वास, कास, अन्न का परिपाक न होना और प्यास ये व्रण से पीडित के उपद्रव हैं ॥ १३ ९ ॥
व्रणक्रियास्वेवमासु व्यासेनोक्तास्वपि क्रियाम् ।
भूयोऽप्युपरि वक्ष्यामि सद्योव्रणचिकित्सिते ॥ १४० ॥
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने द्वित्रणीय-चिकित्सितं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
व्रण के उपक्रमों का विस्तार से यहां वर्णन होने पर भी आगे कहे जाने वाले ' सद्योव्रणचिकित्सित ' अध्याय में पुनः क्रियाओं का कथन किया जावेगा ॥ १४० ॥
इत्यायुर्वेदतध्वसंदीपिका - भाषायां प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः अथातः सद्योव्रणचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
इसके अनन्तर सद्योत्रण - चिकित्सा विधि का वर्णन किया जा रहा है, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत प्रमृति शिष्यों से ) कहा ॥ १–२ ॥
धन्वन्तरिर्धर्मभृतां वरिष्ठो वाग्विशारदः ।
विश्वामित्रसुतं शिष्यमृषिं सुश्रुतमन्वशात् ॥ ३ ॥
धार्मिकों में प्रधानतम, अर्थयुक्त हृदयग्राही नवीन वाणी घोलने वाले धन्वन्तरि ने, अपने शिष्य, विश्वामित्र के पुत्र, ऋषि सुश्रुत को शिक्षा दी ॥ ३ ॥
नानाघारामुखैः शखैर्नानास्थाननिपातितैः ।
नानारूपा व्रणा ये स्युस्तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् ॥४ ॥
विविध रूप के धार तथा मुख वाले शस्त्रों का प्रहार शरीर के विभिन्न स्थानों पर होने से नाना प्रकार के जिन व्रणों की उत्पत्ति होती है, उनका लक्षण कहता हूं ॥ ४ ॥
विमर्शः - व्रण की आकृति के निर्देशक तीन कारणों का उल्लेख ऊपर किया गया है । ( १ ) शस्त्र की धार ( २ ) शस्त्र का मुख तथा ( ३ ) शरीर का वह प्रदेश जहाँ शस्त्राभिघात हुआ हो व्रण की आकृति निर्धारित करते हैं । ( १ ) शस्त्र की धार यदि तीक्ष्ण है तो उससे उत्पन्न व्रण में भोथरे ( Blunt ) शस्त्र से निर्मित व्रण की अपेक्षा भिन्नता रहेगी, चाहे अभिघात का स्थान एक ही क्यों न हो । Medical juris prudence में व्रण की आकृति से ही चोट पहुंचाने वाले शस्त्र का अनुमान किया जाता है । ( २ ) शस्त्र का मुख भी व्रण की आकृति बनाता है । यदि शस्त्र भाले की तरह नोकीला है तो उससे उत्पन्न व्रण की भाकृति तलवार आदि लम्बे - चौडे मुख वाले शस्त्रजन्य व्रण की अपेक्षा भिन्न होगी । शस्त्र का जैसा मुख होगा अभिघात वश वह शरीर पर वैसा ही व्रण वनावेगा । ( ३ ) व्रण की भाकृति के निर्माण में शरीर का वह प्रदेश । भी भाग लेता है, जहां शस्त्राभिघात होता है । शिर छाती तथा पीठ जैसे प्रशस्त प्रदेश के व्रण, हाथ - पैर आदि संकीर्ण स्थान के वर्णों से भिन्न आकृति के होते है ।
आयताश्चतुरस्राश्च व्यस्रा मण्डलिनस्तथा ।
अर्धचन्द्रप्रतीकाशा विशाला: कुटिलास्तथा ॥ ५ ॥
शराव निम्नमध्याश्च यवमध्यास्तथाऽपरे ॥
एवंप्रकाराकृतयो भवन्त्यागन्तवो व्रणाः ।
दोषजा वा स्वयं भिन्ना न तु वैद्यनिमित्तजाः ।
भिषग्णाकृतिज्ञो हि न मोहमधिगच्छति ॥ ६ ॥
चौढे, चौकोर, त्रिकोण, गोल, अर्द्धचन्द्राकार, विस्तृत, टेढे, शकोरे की भांति बीच में दवे हुए तथा जौ के समान मध्य में उठी हुई आकृति वाले, वातादि दोपों से उत्पन्न अथवा स्वयं फटने वाले आगन्तुक व्रण होते हैं, ये व्रण वैद्यों के द्वारा बनाए गए नहीं होते ॥ १-६ ॥ भयङ्कर स्वरूप वाले तथा विकृत व्रणों को देखकर व्रणों की आकृति को जानने वाला वैद्य धवडाता नहीं है । विमर्श - वैद्य निर्मित व्रण का लक्षण - आयतश्च विशालश्च
सुविभक्त निराश्रयः । प्राप्तकालकृतश्चापि व्रणः कर्मणि शस्यते ॥
( सु. सू. अ. ५ ) भृशं दुर्दर्शरूपेषु व्रणेषु विकृतेष्वपि ॥ ७ ॥
अनन्ताकृतिरागन्तुः स भिषग्भिः पुरातनैः ।
समासतो लक्षणत. षड्विधः परिकीर्तितः ॥ ८ ॥
छिन्नं भिन्नं तथा विद्धं क्षत पिच्चितमेव च ।
घृष्टमाहुस्तथा षष्ठं तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ ६ ॥
अनेक आकार के आगुन्तक व्रणों को प्राचीन वैद्यों ने लक्षण के अनुसार सक्षेप में ६ प्रकार का माना है । ( १ ) छिन्न ( २ ) भिन्न ( ३ ) विद्व ( ४ ) क्षत् ( ५ ) पिञ्चित और छठा घृष्ट । इनका लक्षण कहा जा रहा है ॥ ७ - ९ ॥ विमर्श - आगन्तुक व्रणों की आकृति मुख्यतः प्रहार में प्रयुक्त शस्त्रों के स्वरूप पर आश्रित रहती है । छिन्न और भिन्न व्रण तीच्णधार वाले ( तलवार आदि ) शस्त्रों के द्वारा बनते है । अत्यन्त छोटे मुख वाले शस्त्रों ( वाण आदि ) से विद्व व्रणों की उत्पत्ति होती है तथा पिञ्चित और घृष्ट व्रणों का निर्माण लाठी- पत्थर आदि पदार्थ करते हैं । पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान के अनुसार व्रणों का स्वरूप निम्नलिखित रूप में ४ प्रकार का होता है: The nature of the wound · ( i ) If the wound is simple clean cut through the skin or other tissues, the appearance of the shin quite up to the edge of the wound being unaltered, and the surface of the cut smooth, showing the
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१४ सुश्रुतसहिता different structure cut through, it is an incised wound ( 11 ) If the surface of the wound is dark in colour and uneven and the skin arround it is livid, ecchymosed, and more or less cold and benumbed, it is acontused wound ( m ) If the surface of the wound is extremely | irregular, with long threds of tissue adherent to at it is a lacerated wound, ( iv ) There is where the depth of a wound as out of proportion to its superficial extent, a punc tured wound.
तिरश्चीन ऋजुर्वाऽपि यो व्रणाश्चायतो भवेत् ।
गात्रस्य पातनं चापि छिन्नमित्युपदिश्यते ॥ १० ॥
चौडी आकृति वाला तिरछा या सीधा तथा शस्त्र प्रहार से हाथ आदि अङ्ग के कटकर पृथक् हो जाने या लटकते रहने पर जो व्रण बनता है उसे छिन्न व्रण कहते हैं ॥ १० ॥
कुन्तशक्त्यष्टिखड्गाग्रविपाणादिभिराशयः ।
हृतः किञ्चित् स्रवेत्तद्धि भिन्नलक्षणमुच्यते ॥ ११ ॥
भाला, शक्ति ( शक्तिखिमुखी ), सृष्टि ( सवरी ) और तलवार आदि शस्त्रों के अग्रभाग तथा सींग आदि के प्रहार से फटे हुए आशर्यो ( आमाशय - पक्वाशय आदि ) के द्वारा कुछ स्राव ( अनिर्दिष्ट ब ) बहाने वाले व्रण को भिन्न, व्रण कहते है ॥ ११ ॥
स्थानान्यामाग्निपक्कानां मूत्रस्य रुधिरस्य च ।
हृदुण्डुकः फुप्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते ॥ १२ ॥
( १ ) आमाशय ( २ ) अग्न्याशय ( ३ ) पक्वाशय ( ४ ) मूत्राशय ( ५ ) रक्ताशय ( ६ ) हृदय ( ७ ) उण्डुक और ( ८ ) फुफ्फुस कोष्ठ कहलाते है ॥ १२ ॥
तस्मिन् भिन्ने रक्तपूर्ण ज्वरो दाहश्च जायते ।
मूत्रमार्गगुदास्येभ्यो रक्तं घ्राणाञ्च गच्छति ॥ १३ ॥
मूर्च्छाश्वासतृडाध्मानमभक्तच्छन्द् एव च ।
विण्मूत्रवातसगश्च स्वेदास्रावोऽक्षिरक्तता ॥ १४ ॥
लोहगन्धित्वमास्यस्य गात्रदौर्गन्ध्यमेव च ।
हृच्छूल पार्श्वयोश्चापि विशेपं चात्र मे शृणु ॥ १५ ॥
( शस्त्रप्रहार से ) आशयों के छिदने पर वे रक्त से भर जाते हैं, ज्वर और दाह होता है तथा मूत्रमार्ग, गुदा, सुख एव नासिका से रक्तस्राव होने लगता है । मूर्च्छा, श्वास, तृपा, आध्मान ( वायु से पेट का फूलना ), अन्न से अरुचि, मल - मूत्र और वायु का अवरोध, पसीने का निकलना, नेत्रों में रक्तवर्ण, मुख में लोह की गन्ध आना, शरीर में दुर्गन्ध तथा हृदय और पार्श्व में पीड़ा होती है । इनके विशेष उक्षण मुझ से सुनो ॥ १३-१५ ॥
आमाशयस्थे रुधिरे रुधिर छर्दयेत पुनः ।
आध्मानमतिमात्र च शूलं च भृशदारुणम् ॥ १६ ॥
आमाशय में रक्त एकत्रित होने पर बार बार रक्त का चमन, अत्यधिक आध्मान और अत्यन्त भयङ्कर उदरशूल होता है ॥ १६ ॥
पक्वाशयगते चापि रुजो गौरवमेव च ।
शीतता चाप्यधो नाभेः खेभ्यो रक्तस्य चागमः ॥ १७ ॥
पक्काशय में रक्त एकत्रित होने पर शरीर में पीडा और भारीपन, नाभिप्रदेश के नीचे शीतलता तथा स्रोतों से रक्त प्रवाह होता है ॥ १७ ॥
अभिन्नेऽप्याशयेऽन्त्राणां खैः सूक्ष्मैरन्त्रपूरणम् ।
पिहितास्ये घटे यद्वल्लक्ष्यते तस्य गौरवम् ॥ १८ ॥
अत्राशय के भिन्न न होने पर भी आंतों के सूक्ष्म स्रोतों से उनमें रक्त भर जाता है और उनमें भारीपन उसी प्रकार लक्षित होता है जिस प्रकार वन्द मुख वाले घडे के सूक्ष्म छिद्रों से जल की उपस्थिति का ज्ञान होता है ॥ १८ ॥
सूक्ष्मास्यशल्याभिहतं यदङ्गं त्वाशयाद्विना ।
उत्तण्डितं निर्गतं वा तद्विद्धमिति निर्दिशेत् ॥ १६ ॥
छोटे मुख वाले शस्त्रों के प्रहार से आशय के अतिरिक्त अन्य अन का ( शल्य के साथ ) ऊपर उठ जाना अथवा शल्य रहित स्थिति में होना विद्ध व्रण कहलाता है ॥ १ ९ ॥
नातिच्छिन्नं नातिभिन्नमुभयोर्लक्षणान्वितम् ।
विपमं व्रणमङ्गे यत्तत् क्षतं त्वभिनिर्दिशेत् ॥ २० ॥
न तो अधिक मात्रा में दो टुकडों में विभाजित और न अधिक फटे हुए अपितु ( छिन्न और भिन्न ) दोनों व्रणों के लक्षणों से युक्त शरीर के ऊँचे - नीचे व्रण को क्षण कहते है ॥ २० ॥
प्रहार पीडनाभ्यां तु यदङ्गं पृथुतां गतम् ।
सास्थि तत् पिचितं विद्यान्मज्जरक्तपरिप्लुतम् ॥२१ ॥
( लाठी आदि के ) प्रहार तथा ( किवाढ आदि में ) दवने के कारण अस्थि के साथ ही कुचलकर जो अङ्ग फैल जाता है तथा मज्जा और रक्त से सन जाता है उसे पिचित व्रण कहते है ॥ २१ ॥
विगतत्वग्यदङ्गं हि संघर्षादन्यथाऽपि वा ।
उपास्रावान्वितं तत्तु घृष्टमित्युपदिश्यते ॥ २२ ॥
रगढ अथवा अन्य प्रकार से अह्न के त्वचा रहित हो जाने तथा उपा ( दाह विशेष ) और स्राव से युक्त को घृष्ट व्रण कहते हैं ॥ २२ ॥
छिन्ने भन्ने तथा विद्धे क्षते वाऽसृगतिस्रवेत् ।
रक्तक्षयाद्रुजस्तत्र करोति पवनो भृशम् ॥ २३ ॥
स्नेहपानं हित तत्र तत्सेको विहितस्तथा ।
वेशवारैः सकृशरैः सुस्निग्धैश्चोपनाहनम् ॥ २४ ॥।
धान्यस्वेदांश्च कुर्वीत स्निग्धान्यालेपनानि च ।
वातन्नौपधसिद्धैश्च स्नेहैर्बस्ति विधीयते ॥ २५ ॥
छिन्न भिन्न, विद्ध तथा क्षत व्रणों से रक्तस्राव अधिक । होता है । रक्तक्षय के कारण ( कुपित हुआ ) वायु वर्णों में