श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 541–550

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 541–550

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श्रध्यायः २८ ] चिकित्सास्थानम् ११५ सर्पिरोदन इत्याहारः एवमुपयुञ्जानो ब्रह्मवर्चसी । श्रुतनिगादी भवति वर्षशतमायुरवाप्नोति । त्रिरात्रोपो-षितश्च त्रिरात्रमेनां भक्षयेत्, त्रिरात्रादूध्वं पयः सर्पि रिति चोपयुञ्जीत । बिल्वमात्रं पिण्डं वा पयसाऽऽ-लोड्य पिवेत्, एवं द्वादशरात्रमुपयुज्य मेधावी वर्ष शतायुर्भवति ॥ ४ ॥

मण्डूकपर्णी - स्वरस रसायन योग - वमन विरेचनादि के द्वारा दोपों को दूर किया हुआ व्यक्ति, ससर्जन क्रम से पेया, बिलेपी आदि का सेवन करके, भल्लातक सेवन - विधान के अनुसार, गृह में प्रवेश करे और एक सहस्र सपात मंत्रों के द्वारा आहुति देकर, शक्ति के अनुसार, मण्डूकपर्णी - स्वरस दूध में घोलकर अथवा दूध के अनुपान से, पान करे । औषधि के जीर्ण होने पर, दूध के साथ जी का भात भोजन करे । अथवा तिलों के साथ, दूध के अनुपान से तीन, मास मण्डूक-पण का सेवन और औषध जीर्ण होने पर दूध, घी तथा भात भोजन करे । इस प्रकार औषध सेवन करके तेजस्वी, और सुनी हुई वाणी को धारण करने में शक्तिमान् होता है तथा ( रोगी ) सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है । तीन दिन उपवास करके, तीन दिन मण्डूकपर्णी का सेवन करे । तीन दिन के पश्चात् दूध और घी का सेवन करे । अथवा एक पल औषध. पिण्ड दूध में घोल कर पीछे । इस प्रकार वारह दिन औषध सेवन करने वाला व्यक्ति, बुद्धिमान् और सौ वर्ष की आयु वाला होता है ॥ ४ ॥

हृतदोष एवागारं प्रविश्य प्रतिसंसृष्टभतो ब्राह्मी स्वरसमादाय सहस्रसम्पाताभिहुतं कृत्वा यथाबलमु-पयुञ्जीत, जीणौषध्वापराहे यवागूमलवणां पिबेत्, क्षीरसात्म्यो वा पयसा भुञ्जीत, एवं सप्तरात्रमुपयुज्य ब्रह्मवर्चसी मेधावी भवति, द्वितीयं सप्तरात्रमुपयुज्य ग्रन्थमीप्सितमुत्पादयति नष्टं चास्य प्रादुर्भवति, तृतीयं सप्तरात्रमुपयुज्य द्विरुचारितं शतमप्यवधारयति, एवमेकविंशतिरात्रमुपयुञ्ज्यालक्ष्मीरपक्रामतिः मूर्तिमती चैनं वाग्देव्यनुप्रविशति, सर्वाश्चैनं श्रुतय उपतिष्ठन्ति, श्रुतधरः पञ्चवर्षशतायुर्भवति ॥ ५ ॥

ब्राह्मीस्वरस रसायन योग - वमन विरेचनादि के द्वारा दोपों को दूर कर तथा संसर्जन क्रम से पेया, विलेपी आदि का सेवन करके ( रोगी ) गृह में प्रवेश करे और एक सहस्र संपात मन्त्रों से आहुति देकर, शक्ति के अनुसार ब्राह्मी - स्वरस का सेवन करे । औषध जीर्ण होने पर, अपराह्न काल में, लवण-रहित यवागू पीवे, जिसे दूध सात्म्य हो वह दूध के साथ यवागू सेवन करे । इस प्रकार सात दिन औषध सेवन करने से तेजस्वी और मेधावी होता है । दूसरी वार सात दिन औषध सेवन करने से अभिलपित ग्रन्थ की रचना करता है और विस्मृत रचना स्मरण हो जाती है । तीसरी बार सात दिन औषध सेवन करने से दो बार कही गई सौ वाणी भी स्मरण रखता है । इस प्रकार इक्कीस दिन ( औषध ) सेवन करने से दुःख दारिद्र्य नष्ट होता है, मूर्तिमान सरस्वती देवी शरीर में प्रवेश करती हैं, सभी श्रुतियाँ स्मरण हो जाती हैं और सुनी हुई वाणी को | धारण करने की शक्ति लाभ कर, पांच सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है ॥ ५ ॥

ब्राह्मस्वरसप्रस्थद्वये घृतप्रस्थं विडङ्गतण्डुलानां कुडवं द्वे द्वे पले वचामृतयोर्द्वादश हरीतक्यामलकबि-भीतकानि श्लक्ष्णपिष्टान्यावाप्यैकध्यं स्वनुगुप्तं निदध्यात्, ततः पूर्वविधानेन मात्रां यथाब-लमुपयुञ्जीत, जीर्णे पयः सर्पिरोदन इत्याहार, पूर्व-| वञ्चात्र परीहारः, एतेनोर्ध्वमधस्तिर्यक् कृमयो निष्क्रा-मन्ति, अलक्ष्मीरपक्रामति, पुष्करवर्णः स्थिरवयाः श्रुतनिगादी त्रिवर्षशतायुर्भवति, एतदेव कुष्टविषमज्वरा-पस्मारोन्मादविप भूतग्रहेष्वन्येषु च महाव्याधिषु संशोधनमादिशन्ति ॥ ६ ॥

ब्राह्मीधृत रसायन - ब्राह्मी स्वरस दो प्रस्थ और घृत एंक प्रस्थ में विडङ्ग - तण्डुल ( विडग के सुपरहित चावल ) एक कुडव, वच और गिलोय दो दो पल तथा त्रिफला बारह पल, महीन पीस कर, सिद्ध करके, सुरक्षित स्थान में रखना चाहिए । इसके पश्चात् पूर्वोक्त विधि से वलके अनुसार इसकी मात्रा ( एक पल ) सेवन करनी चाहिए | औषध का पाचन होने पर दूध, घी और भात खाना चाहिए तथा पूर्वोक्त वर्जित पदार्थों का सेवन त्याग देना चाहिए । इसके सेवन से ऊपर-नीचे तथा मध्य शरीर से कृमि निकलते हैं । दारिद्र्य नष्ट । होता है । वर्ण कमल की भांति होता है और आयु स्थिर रहती | है | श्रवण की हुई वाणी को धारण करने की शक्ति लाभ कर, मनुष्य तीन सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है । कुष्ठ, विषम उवर, अपस्मार, उन्माद, विष, भूतवाधा, ग्रह तथा अन्य महाव्याधियों में इसी सशोधन का उपदेश किया जाता है ॥ हृतदोष एवागारं प्रविश्य हैमवत्या क्वायाः पिण्ड-मामलकमात्रमभिहुतं पयसाऽऽलोड्य पिवेत्, जीर्णे पयः सर्पिरोदन इत्याहार, एवं द्वादशरात्रमुपयुञ्जीत, ततोऽस्य श्रोत्रं वित्रियते, द्विरभ्यासात् स्मृतिमान् भवति, त्रिरभ्यासाच्छ्रुतमादत्ते, चतुर्द्वादशरात्रमुपयुज्य सर्व तरति किल्बिषं, तार्क्ष्यदर्शनमुत्पद्यते, शतायुश्च भवति । द्वे द्वे पले इतरस्या वचाया निष्काथ्य पिवेत् पयसा, समानं भोजनं समाः पूर्वेणाशिषश्च ॥ ७ ॥

वचा रसायन योग - जिस व्यक्ति ने वमन विरेचनादि के द्वारा शरीर की शुद्धि कर ली हो, उसे गृह में प्रविष्ट होकर होम करके, आँवले के बरावर श्वेत वचा का पिण्ड दूध में घोल कर पीना चाहिए । औषध जीर्ण होने पर दूध, घी और भात खाना चाहिए । इस प्रकार बारह दिन प्रयोग करना चाहिए । इस क्रिया से औषध सेवन करने वाले व्यक्ति की । श्रवणशक्ति बढती है । दूसरी बार वारह दिन औषध सेवन करने से स्मृतिशील बनता है । तीसरी बार बारह दिन सेवन करने से श्रवण की हुई बाणी को धारण करता है । चौथी | बार बारह दिन औषध सेवन करके, सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो । जाता है । गरड के समान दृष्टि हो जाती है तथा सौ वर्ष की

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११६ सुश्रुतसहिता आयु प्राप्त करता है । दो - दो पल लाल रंग की वच का क्वाथ कर, दूध के साथ सेवन करे । आहारविधि तथा गुण पूर्वोत औषधि के समान हैं ॥ ७ ॥

विमर्श. – हेमवत्या वचायाः श्वेतवचाया इत्यर्थे । अमित मित्यत्र कृत्वेत्यध्याहारात होमं कृत्वेत्यर्थः । इतरस्या बचाया इति अरुणाया इत्यर्थ. । वचाशतपाकं वा सर्पिर्द्रोणमुपयुज्य पञ्चवर्षशतायु-र्भवति, गलगण्डापचीश्लीपदस्वरभेदांश्चापहन्तीति ॥5 ॥

रसायन शतपाक वचा घृत -- वच के क्वाथ एव क्ल्क के साथ सौ बार पकाये गए वृत की एक द्रोण मात्रा सेवन करने से ' मनुष्य की आयु पाँच सौ वर्ष की होती है और गलगण्ड, अपची, श्लीपट तथा स्वरभेदादि रोग नष्ट होते है ॥ ८ ॥

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि आयुष्कामरसायनम् ।

मन्त्रौषधसमायुक्तं संवत्सर् फलप्रदम् ॥ ६ ॥

इसके आगे मन्त्र तथा औषधियों से युक्त, एक वर्ष में फल प्रदान करने वाले, आयुर्वर्द्धक रसायन का कथन किया जाता है ॥ ९ ॥

विल्वस्य चूर्ण पुण्ये तु हुतं वारान् सहस्रशः ।

श्रीसूक्तेन नरः कल्ये ससुवर्णं दिने दिने ॥ १० ॥

सर्पिर्मधुयुतं लिह्यादलक्ष्मीनाशनं परम् ।

त्वचं विहाय बिल्वस्य मूलकार्थं दिने दिने ॥ ११ ॥

प्राश्नीयात् पयसा सार्धं स्नात्वा हुत्वा समाहितः ।

दशसाहस्रमायुष्यं स्मृतं युक्तरथं भवेत् ॥ १२ ॥।

आयुर्वर्द्धक रसायन - पुष्य नक्षत्र में मनुष्य को ( अथर्व-वेदोक्त ) श्रीसूक्त के द्वारा एक सहस्र आहुति देकर प्रतिदिन प्रातः काल सुवर्ण के साथ वेल का चूर्ण, मधु और वृत मिला कर चाटना चाहिए । इसके लेवन से दारिद्र्य दूर होता है । बेल के जड़ की छाल हटाकर पकाया गया काय, वुद्धिमान् व्यक्ति को प्रतिदिन, स्नान और होम करने के पश्चात् दूध के साथ, सेवन करना चाहिए । इस औषध को सेवन करने वाले व्यक्ति की आयु, दश सहस्र वर्ष की होती है तथा वह चुक्कर ( रसायन समर्थ ) होता है । १०-१२ ॥

वासिनां कथं तु मधुलाजैश्च संयुतम् ।

अमोघं शतसाहस्रं युक्तं युक्तरथं स्मृतम् ॥ १३ ॥

विसकाथ रसायन योग - बिस ( मृणाल ) का क्वाथ मधु और धान के लावे के साथ होम करके पीना चाहिए । यह अव्यर्थ रसायन है और सौ सहस्र ( एक लाख ) प्रदान करता है एवं रसायन समर्थ बनाता है ॥ सुवर्ण पद्मवीजानि मधु लाजा. प्रियङ्गवः गव्येन पयसा पीतमलक्ष्मीं प्रतिपेधयेत् दारिद्र्यनाशक रसायन योग - स्वर्ण भस्म मधु, धान का लावा और प्रियद्धु को गौ के सेवन करने से दरिद्रता का निवारण होता है ॥ वर्ष की आयु १३ ॥

।

॥ १४ ॥

, कमलगट्टा, दूध के साथ ५४ ॥

नीलोत्पलदलक्वायो गव्येन पयसा श्रुतः ।

ससुवर्णस्तिलैः सार्धमलक्ष्मीनाशनः स्मृतः ॥ १५ ॥

नील कमल का छाथ गोदुग्ध के साथ पकाकर सुवर्ण भस्म और निल के साथ सेवन करने से द्वारिद्र्य दूर होता है ॥

गव्यं पयः सुवर्ण च मधूच्छिष्टं च माक्षिकम् ।

पोतं शतसहस्राभिर्हुतं युक्तरथं स्मृतम् ॥ १६ ॥

एक लक्ष आहुतियाँ देकर गोदुग्ध, सुवर्णभस्म, मोम और मधु को एक साथ सेवन करने से मनुष्य रसायन - समर्थ बनता है ॥ १६ ॥

वचाघृत सुवर्णं च बिल्वचूर्णमिति त्रयम् ।

मेध्यमायुष्यमारोग्यपुष्टिसौभाग्यवर्धनम् ॥ १७ ॥

मेधावर्धक वचादि योग - वचा, घृत, सुवर्ण भस्म और वेल के चूर्ण को घृत के साथ सेवन करने से बुद्धि और आयु बढ़ती है, आरोग्य लाभ होता है तथा शरीर की पुष्टि एव सौभाग्य की वृद्धि होती है ॥ १७ ॥

बासामूलतुलाकाथे तैलमावाप्य सावितम् ।

हुत्वा सहस्रमश्नीयान्मेध्यमायुष्यमुच्यते ॥ १८ ॥

एक तुला अडूसा की जड़ के हाथ में सिद्ध तेल को एक सहस्र आहुतियाँ देकर सेवन करने से बुद्धि तथा आयु की वृद्धि होती है ।

यावकांस्तावकान् खादेदभिभूय यवांस्तथा ।

पिप्पलीमधुसंयुक्तान् शिक्षा चरणवद्भवेत् ॥ १६ ॥

जौ को कूटकर, उनसे बनाये गए भोज्य पदार्थ का सेवन मधु और पिप्पली के साथ करना चाहिए । इससे शास्त्राभ्यास स्वतः उसी प्रकार होता है जैसे बाल्यावस्था के बाद चलने की शिक्षा दिए बिनाभी, बालक स्वयं चलने लगते हैं ॥ १ ९ ॥ विमर्श -नवानान् एत् यावका यवान् तावकान् अभिभूय कुट्टयित्वा तत्कृनान् भध्यान् नधुपिप्पलीसयुक्तान् खादेत् । शिश्चाचरणवद् भवेदिनि शिक्षा उपदेशापेक्षाशास्त्राम्यात सुखेनैव मवति । यथा किल वाल्यानन्तर पादगमन शिक्षा विनैव भवति नयवैतेन योगेनाभ्यव्हनेन नेघावृद्धे. शास्र्ाम्यास ॰ सुखेनैव मवति । ( ढल्हण )

मध्यामलकचूर्णानि सुवर्णमिति च त्रयम् ।

प्राश्वारिष्टगृहीतोऽपि मुच्यते प्राणसंशयात् ॥ २० ॥

अरिष्टशामक मध्वाद्वियोग -- अरिष्ट दशा में पड़ा हुआ रोगी भी मधु, आंवले का चूर्ण और सुवर्ण भस्म इन तीनों को चाट कर प्राणनाग के संशय से मुक्त होता है ॥ २० ॥

शतावरीघृतं सम्यगुपयुक्तं दिने दिने ।

सक्षौद्रं ससुवर्णं च नरेन्द्रं स्थापयेद्वशे ॥ २१ ॥

वशीकरण शतावरी घृत योग - प्रति - दिन मधु और सुवर्ण भस्म के साथ शतावरी घृत का भली भांति सेवन राजा को वश में रखता है ॥ २१ ॥

गोचन्दना मोहनिका मधुकं माक्षिक मधु ।

सुवर्णमिति संयोगः पेयः सौभाग्यमिच्छता ॥ २२ ॥

सौभाग्यकारक गोचन्दनादि योग - सौभाग्य की कामना वाले व्यक्ति को गोचन्दना ( प्रियड ), मोहनिका ( पुत्रजीवक ), मुलेठी, और का मधु और सुवर्ण भस्म एक साथ मिला कर | पीना चाहिए ॥ २२ ॥

पद्मनीलोत्पल क्वाथे यष्टीमधुकसंयुते ॥ सर्पिरासादितं गव्यं ससुवर्ण सदा पिवेत् ॥ २३ ॥

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श्रध्यायः २ ९ ] चिकित्सास्थानम् ११७

पयश्चानुपिवेत् सिद्धं तेषामेव समुद्भवे ।

अलच्मीन्नं सदाऽऽयुष्यं राज्याय सुभगाय च ॥ २४ ॥ ।

सौभाग्यकारक पद्मादि योग - मुलेठी युक्त लाल और । नील कमल के क्वाथ के द्वारा गोवृत का पाक कर सुवर्णभस्म के साथ सा मेवन करना चाहिए और इसके पश्चात् उपर्युक्त च्यों के काथ में सिद्ध किया गया दूध पीना चाहिए । यह योग दरिद्र्नानाशक, आयुर्वर्धक तथा राज्य और ऐश्वर्य को देने वाला है || २३-२४ ॥

यत्र नोद्दीरितो मन्त्रो योगेष्वेतेषु साधने ।

शब्दिता तत्र सर्वत्र गायत्री त्रिपदा भवेत् ॥ २५ ॥

इन योगों के निर्माण काल में जहाँ मन्त्र का कथन नहीं

किया गया है, उन सभी स्थलों पर तीन पदों वाली गायत्री ।

का उच्चारण करना चाहिए ॥ २५ ॥

पाप्मानं नाशयन्त्येता दद्युचौपघयः श्रियम् ।

कुर्युर्नागवलं चापि मनुष्यममरोपमम् ॥ २६ ॥

ये औषधियाँ, दुःख और दारिद्र्य का नाश कर लक्ष्मी प्रदान करती हैं, हाथी का बल देती हैं तथा मनुष्य को देवताओं के समान बनाती हैं ॥ २६ ॥

सतत्ताव्ययनं वादः परतन्त्रावलोकनम् ।

द्विद्याचार्यसेवा च बुद्विमेधाकरे ) गु ( ग ) णः ॥ २७ ॥

बुद्धिमेवावर्धक गण - निरन्तर अध्ययन, वाद ( स्वपक्ष-साधनं परपन्नबाधन वादः ), दूसरे तन्त्रों ( न्याय, वैशे-पिक, व्याकरण आदि ) का अवलोकन तथा इन विद्याओं का पठन - पाठन एवं आचार्य की सेवा, बुद्धि और स्मृति बढाते हैं ।

आयुष्यं भोजनं जीर्णे वेगानां चात्रिधारणम् ।

ब्रह्मचर्यमहिंसा च साहसानां च वर्जनम् ॥ २८ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने मेघायुष्कामीयं ।

रसायनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

आयुर्वर्धक गण - पूर्व आहार के पचने पर भोजन करना, मल - सूत्रादि के वर्गों का न रोकना, ब्रह्मचर्य ( इन्द्रियसंयम ), अहिंसा और दुस्साहस का परित्याग, आयु की वृद्धि करते हैं ॥ इत्यायुर्वेदतत्त्वसंदीपिकाभापाव्याख्यायामष्टाविंशति • तमोऽयायः ॥ -एकोनत्रिंशत्तमोऽध्यायः अथातः स्वभावव्याधिप्रतिपेवनीयं रसायनं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

स्वभावव्याधिप्रतिषेधनीय रसायन का उपक्रम - इसके । अनन्तर स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने वाली न्याधियों की चिकित्सा के लिए रसायन का वर्णन किया जा रहा है, जैसाकि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत प्रभृति शिष्यों से ) कहा ॥१-२ ॥ विमर्शः -- स्त्रावप्रवृत्ताना भुवपिपासाजरामृत्युनिद्राप्रभृतीना यणधीना प्रनिषेधनं स्वभावव्याधिप्रतिषेधनम्, तदधिकृत्य कृत रसा-यनं स्त्रभावव्याधिप्रतिषेषनीयम् । ( डल्हण )

ब्रह्मादयोऽसृजन् पूर्वममृतं सोमसज्ञितम् ।

जरामृत्युविनाशाय विधानं तस्य वक्ष्यते ॥ ३ ॥

पूर्व काल में ब्रह्मा आदि ने बुढापा और मृत्यु को नष्ट करने के लिए सोम नामक अमृत का सृजन किया था, are सेवन का विधान बतलाया जा रहा है ॥ ३ ॥

एक एव खलु भगवान् सोम स्थानानामाकृति • वीर्यविशेषैश्चतुर्विंशतिवा भिद्यते ॥ ४ ॥

२४ प्रकार के सोम - भगवान् सोम एक ही प्रकार के हैं किन्तु स्थान, नाम, आकृति और वीर्य भेद से उनके चौबीस भेद हो जाते हैं || १ ||

तद्यथा-अंशुमान् मुञ्जवांश्चैव चन्द्रमा रजतप्रभः ।

दूर्वा सोमः कनीयांश्च श्वेताक्षः कनकप्रभः ॥ ५ ॥

प्रतानवांस्तालवृन्तः करवीरोंऽशवानपि ।

स्वयप्रभो महासोमो यश्चापि गरुडाहृतः ॥ ६ ॥

गायत्रबैष्टुभः पाङ्को जागतः शाकरस्तथा ।

अग्निष्टोमो रैवतश्च यथोक्त इति संज्ञितः ॥ ७ ॥

गायत्र्या त्रिपदा युक्तो यश्चोपतिरुच्यते ।

एते सोमाः समाख्याता वेदोकैर्नामभिः शुभैः ॥ ८ ॥

जैसे कि: -- ( 1 ) अंशुमान् ( २ ) मुञ्जवान् ( ३ ) चन्द्रमा | ( 8 ) रजतप्रभ ( ७ ) दुर्वासोम ( ६ ) कनीयान् ( ७ ) श्वेताक्ष ( ८ ) कनकप्रभ ( ९ ) प्रतानवान् ( १० ) तालवृन्त ( ११ ) करवीर ( १२ ) अंशवान् ( १३ ) स्वयप्रभ ( १४ ) महासोम ( १५ ) गरुडा-हृन ( १६ ) गायत्र ( १७ ) त्रैष्टुभ ( १८ ) पाच ( १ ९ ) जागत ( २० ) शाकर ( शाहर ) ( २१ ) अग्निष्टोम ( २२ ) रैवत ( २३ ) त्रिपदा गायत्री और ( २४ ) उडुपति, इन वेदोक्त शुभ नामों से सोमों का कथन किया जाता है । ७-८ ॥

सर्वेषामेव चैतेषामेको विधिरुपासने ।

सर्वे तुल्यगुणाचैव विधानं तेषु वक्ष्यते ॥ ६ ॥

इन सभी सोमों के सेवन की विधि एक ही है तथा । सभी समान फल देने वाले हैं । इनका सेवन विधान बतलाया जाता है ॥ ९ ॥

अतोऽन्यतमं सोममुपयुयुक्षुः सर्वोपकरणपरिचार-कोपेतः प्रशस्ते देशे त्रिवृतमागारं कारयित्वा हृतदोषः प्रतिसंसृष्टभक्तः प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्त नक्षत्रेषु अंशुमन्तमादायाध्वरकल्पेनाहृतमभिषुतमभिहुतं चान्त-| रागारे कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनः सोमकन्दं सुवर्णसूच्या विदार्य पयो गृहीयात् सौवर्णे ( राजते वा ) पात्रेऽञ्जलि -मात्र, ततः सकृद्देवोपयुञ्जीत नास्वादयन्, तत उप-स्पृश्य शेषम स्ववसाद्य यमनियमाभ्यामात्मानं संयोज्य वाग्यतोऽभ्यन्तरतः सुहृद्भिरुपास्यमानो विहरेत् ॥ १० ॥

सोम सेवन की विधि - इनमें से किसी एक सोम का | सेवन करने की कामना वाला मनुष्य, सभी साधनों तथा

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११८ सुश्रुतसहिता सेवकों के साथ, उत्तम भूमिपर, तीनगर्भ वाला गृह बनवाकर, वमन, विरेचनादि के द्वारा शरीर की शुद्धि तथा ससर्जन । क्रम से पेया, विलेपी आदि का सेवन करके अग्निष्टोमयज्ञ-विधान से लाये गए तथा ऋत्विजों के द्वारा पीडित और अग्निक्षिप्त, अंशुमान् ( सोमकन्द ) को उत्तम तिथि, करण, मुहूर्त एवं नक्षत्र में लेकर गृह के भीतरी भाग में स्वस्ति । वाचन मगल पाठ करके सोमकन्द को सोने की सुई से फाढ कर सोने के पात्र में एक कुडव प्रमाण दूध ( रस ) ग्रहण करे । इसके बाद बिना स्वाद लिए एक बार में सोम रस पी ले । फिर आचमन करके रस निकाले गए अंशुमान् कन्द को । जल में डाल कर यम और नियम के द्वारा मन को एकाग्र तथा मौन धारण करके मित्रों के साथ विहार करे ॥ १० ॥

विमर्शः - अध्वरकल्पेनाहृतम् - अग्निष्टोमविधानेनानीतम् । अ-मिषुतन् - ऋत्विग्भिः पीडितम् । अमिहुत- वहौ प्रक्षिप्तम् । अञ्जलि-मात्रं - कुडवप्रमाणन् । उपस्पृश्य - आचमन कृत्वा । शेष - गृहीतक्षीर-मंशुमत ' कन्दम् । मन॰सङ्कल्यादिनिरोधो नियम, पुनरिन्द्रियदेहयो निरोधो यम. । आत्मान चेत ' । वाग्यत. मौनं कृत्वा ।

रसायनं पीतवांस्तु निवाते तन्मनाः शुचिः ।

आसीत तिष्ठेत् कामेच्च न कथञ्चन संविशेत् ॥ ११ ॥

रसायन मनुष्य, वायुरहित स्थान में पान करनेवाला सोम का ध्यान करते हुए, पवित्रता पूर्वक बैठे, खडा रहे और चले किन्तु निद्रा न ले ॥ ११ ॥

सायं वा भुक्त्वानुपश्रुतशान्तिः कुशशय्यायां कृष्णाजिनोत्तरायां सुहृद्भिरुपास्यमान. शयीत, तृषितो वा शीतोदकमात्रां पिवेत् ( अशनायितो वा क्षीरं ); ततः प्रातरुत्थायोपश्रुतशान्तिः कृतमङ्गुलो गां स्पृष्ट्वा तथैवासीत, तस्य जीर्णे सोमे छर्दिरुत्पद्यते, तत ' शोणिताक्त कृमिव्यामिश्रं छर्दितवते सायं शृतशीतं क्षीरं वितरेत्; ततस्तृतीयेऽहनि कृमिव्यामिश्रमति सार्यते स तेनानिष्टप्रतिग्रहभुक्तप्रभृतिभिर्विशेवैर्विनि-मुक्तः शुद्धतनुर्भवति, ततः सायं स्नाताय पूर्ववदेव क्षीरं वितरेत्, क्षौमवस्त्रास्तृतायां चैनं शय्यायां शाययेत्, ततञ्चतुर्थेऽहनि तस्य श्वयथुरुत्पद्यते, तत ' सर्वाङ्गेभ्यः कृमयो निष्क्रामन्ति, तदहश्च शय्यायां पांशुभिरत्रकीर्यमाणः शयीत, तत. सायं पूर्ववदेव क्षीर वितरेत्, एवं पञ्चमषष्ठयोदिवसयोर्वर्तत, केवलमुभ-यकालमस्मै क्षीर वितरेत; ततः सप्तमेऽहनि निर्मा सस्त्वगस्थिभूतः केवलं सोमपरिग्रहादेवोच्छ्वसिति, तदहश्च क्षीरेण सुखोष्णेन परिषिच्य तिलमधुकचन्द-नानुलिप्तदेह पयः पाययेत्, ततोऽष्टमेऽहनि प्रातरेव क्षीरपरिषिक्तं चन्दनप्रदिग्वगात्र पयः पाययित्वा पांशुशय्यां समुत्सृज्य क्षौमवस्त्रास्तृतायां शय्यायां शाययेत्, ततोऽस्य मांसमाप्याय्यते, त्वकू चावदलति, दन्तनखरोमाणि चास्य पतन्ति, तस्य नवमदिवसात् प्रभृत्यरणुतैलाभ्यङ्गः सोमवल्ककषाय-परिपेक '; ततो दशमेऽहन्येतदेव वितरेत्, ततोऽस्य त्वक् स्थिरतामुपैति एवमेकादशद्वादशयोवर्तत तत-त्रयोदशात् प्रभृति सोमवल्ककपायपरिपेकः, एवमा-पोडशाद्वर्तेत; ततः सप्तदशाष्टादशयोर्दिवसयोर्दशना जायन्ते शिखरिणः स्निग्धवज्रवैदूर्यस्फटिकप्रकाशाः समाः स्थिराः सहिष्णवः, तदा प्रभृति चानवैः शालि -तण्डुलैः क्षीरयवागूमुपसेवेत यावत् पञ्चविशतिरिति; ततोऽस्मै दद्याच्छाल्योदनं मृदूभयकालं पयसा, ततोऽ-स्य नखा जायन्ते विद्रुमेन्द्रगोपकतरुणादित्यप्रकाशाः, स्थिराः स्निग्धा लक्षणसंपन्नाः केशाश्च सूच्मा जायन्ते, त्वक् च नीलोत्पलान सीपुष्पवैदूर्यप्रकाशाः ऊर्ध्वं च मासात् केशान् वापयेत्, वापयित्वा चोशीरचन्दन-कृष्णतिलकल्कैः शिरः प्रदिह्यात् पयसा वा स्नापयेत्; ततोऽस्यानन्तरं सप्तरात्रात् केशा जायन्ते भ्रमराञ्ज-ननिभाः कुञ्चिताः स्थिराः स्निग्धाः ततखिरात्रात् प्रथ-मावसथ परिसरान्निष्क्रम्य मुहूर्तं स्थित्वा पुनरेवान्तः प्रविशेत्, ततोऽस्य वलातैलमभ्यङ्गार्थेऽवचायं, यत्र-पिष्टमुद्वर्तनार्थे, सुखोष्ण च पय परिपेकार्थे, अजक-र्णकषायमुत्सादनार्थे, सोशीरं कूपोदकं स्नानार्थे, चन्द-नमनुलेपार्थे, आमलकरसविमिश्राश्चास्य यूषसूपवि-कल्पाः, क्षीरमधुकसिद्धं च कृष्णतिलमवचारणार्थे, एवं दशरात्रः ततोऽन्यद्दशरात्रं द्वितीये परिसरे वर्तेत; ततस्तृतीये परिसरे स्थिरीकुर्वन्नात्मानमन्यद्दशरात्र-मासीत, किञ्चिदातपपवनान् वा सेवेत, पुनश्चान्तः प्रविशेत्, न चात्मानमादर्शेऽप्सु वा निरीक्षेत रूपशा लित्वात्; ततोऽन्यद्दशरात्रं क्रोधादीन् परिहरेत्, एवं सर्वेषामुपयोगविकल्पः । विशेषतस्तु वल्लीप्रत नक्षुपका-दयः सोमा ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यैर्भक्षयितव्याः । तेषां तु प्रमाणमर्धचतुष्कमुष्टयः ॥ १२ ॥

अथवा सन्ध्या समय भोजन तथा मंगल पाठ श्रवण कर, कृष्णमृग की मृगछाला विछी हुई कुशा की शय्या पर मित्रों के मध्य में सोवे । प्यास लगने पर अल्प मात्रा में शीतल जल का पान करे । फिर प्रात काल उठकर, मंगलपाठ श्रवण कर तथा स्वस्ति वाचन करके गौ का स्पर्श करे एवं पूर्ववत् विहरे । सोम का पाचन होने पर वमन होता है । रक्तमिश्रित, कृमियुक्त वमन करने वाले मनुष्य को सन्ध्या समय उष्ण दूध शीतल करके पिलावे । तीसरे दिन कृमियुक्त रेचन होता है । इससे वह मनुष्य अनिष्ट तथा प्रतिग्रह भोजन भादि से मुक्त होकर शुद्ध शरीर वाला होता है । सन्ध्यासमय स्नान किए हुए उस मनुष्य को पूर्ववत् दूध पिलावे और रेशमी चादर बिछी हुई शय्या पर सुलावे । चौथे दिन उस व्यक्ति के शरीर में शोथ उत्पन्न होता है एवं सम्पूर्ण अङ्गों से कृमि निकलते है । उस दिन शय्या पर धूल विछा कर सोवे और सन्ध्या समय पूर्ववत् दूध पीवे । इसी प्रकार पाँचवें और छठे दिन करे, उसे दोनों समय केवल दूध पिलावे । सातवें दिन त्वचा | और मांस से रहित अस्थि वाला होकर वह केवल सोमपान के

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श्रध्याय २ ९ ] चिकित्सास्थानम् ११६ कारण श्वास लेता है । उस दिन सुसोष्ण दूध से स्नान । करा, तिल, मुलेठी और चन्दन का सम्पूर्ण शरीर में लेप लगावे और दूध पिलावे | आठवें दिन प्रातः काल में ही दूध से स्नान किए हुए तथा शरीर में चन्दन का लेप लगाये हुए मनुष्य को दूध पिलाकर, धूलि की शय्या से उठाकर रेशमी चादर बिछी हुई शय्या पर सुलावे । इसके पश्चात् । उस मनुष्य का मांस पुष्ट होने लगता है, त्वचा फटने लगती । है, दाँत, नस और रोम गिर जाते हैं । नवें दिन उसके शरीर पर अणु तैल की मालिश तथा सोम की छाल के काथ से स्नान करावे । दशवें दिन यही कार्य करे । इससे उसकी त्वचा स्थिर हो जाती है । इसी प्रकार ग्यारहवें और बारहवें । दिन करे | तेरहवें दिन सोम की छाल के काथ स्नान करावे और इस प्रकार सोलहवें दिन तक करें । सत्रहवें दिन नोकीले चिकने, हीरा, वैडूर्य और स्फटिक की भाँति चमकीले, मम, स्थिर तथा सहनशील दाँत निकलते है । उस दिन मे पुराने शालि चावल के द्वारा दूध में बनाई गई यवागू का सेवन पच्चीसवें दिन तक करे । फिर दोनों समय उसे शालि चावल का गला हुआ भात दूध के साथ खिलावे । उस व्यक्ति के मूगा, वीरबहूटी और बाल सूर्य के समान लाल नग्व तथा स्थिर, चिकने, उत्तम लक्षणों से युक्त एवं सूक्ष्म केश उत्पन्न होते हैं । त्वचा, नील कमल, तीसी के फूल और वैदूर्य की भाँति सुंदर होती है । एक मास के बाद केशों को कटवावे और केश कटवाकर खस, चन्दन तथा काले तिल के कल्क का लेप शिर पर लगावे अथवा दूध । से स्नान करावे । सात दिन के बाद उस व्यक्ति के भरे और अञ्जन के समान काले और घुंघराले, स्थिर तथा चिकने केश निकलते है । तीन दिन के पश्चात्, प्रथम वासस्थान की चहार दिवारी से निकलकर, एक क्षण रुककर पुनः अन्दर प्रवेश करे । उस मनुष्य के अभ्यन के लिये बळा तेल, उबटन के लिये जौ को पिट्टी, स्नान के लिए सुखोष्ण दूध, घर्षण के लिए अर्ण कपाय ( क ), स्नान के लिये खसयुक्त कूप जल, प के लिये चन्दन, और आँवले के रस से युक्त यूप तथा सूप आदि का प्रयोग करे और दूध एवं मुलेठी के साथ सिद्ध काले तिल का लेप शरीर में लगावे । इस प्रकार दस दिन करे | फिर दूसरे दस दिन दूसरे गर्भ में ( घर के दूसरे भाग में ) रहे । फिर तीसरे गर्भ में अपने को स्थिर रखते हुए, दस दिन वास करे और कुछ धूप तथा वायु का सेवन कर पुनः घर में प्रवेश करे । रूपवान हो जाने के कारण अपनी छाया शीशा या जल में न देखे । अन्य दश दिनों तक क्रोध आदि का परित्याग करे । इसी प्रकार सभी सोमों के सेवन का क्रम है 1 । विशेष रूप से लता, प्रतान ( शाखा वाले ) और चुप ( छोटे पौधे ) आदि स्वरूप वाले सोमों का सेवन ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य को करना चाहिये । इनकी मात्रा साढ़े चार पल है ॥ १२ ॥

अंशुमन्तं सौवर्णे पात्रेऽभिपुण्यात, चन्द्रमसं · राजते; तावुपयुज्याष्टगुणमैश्वर्यमवाप्येशानं देवमनुप्रवि-1 शति, शेपांस्तु ताम्रमये मृन्मये वा रोहिते वा चर्मणि ! वितते, शूद्रवर्ज त्रिभिर्वर्णैः सोमा उपयोक्तव्याः । तत-चतुर्थे मासे पौर्णमास्यां शुचौ देशे ब्राह्मणानर्चयित्वा | कृतमङ्गलो निष्क्रम्य यथोक्तं व्रजेदिति ॥ १३ ॥

अनेकविध सोमों के रसग्रहण के लिए पात्रों का | निर्देश - अंशुमान सोम को सोने के पात्र में निचोडना चाहिये और चन्द्रमस को चाँदी के पात्र में । इन दोनों का सेवन कर मनुष्य, अणिमा, लघिमा आदि अष्टविध ऐश्वर्यं को प्राप्त कर देव महेश्वर को प्राप्त करता है । शेष अन्य सोमों को ताम्बा या मिट्टी अथवा रोहितमृग के चर्म से निर्मित बढ़े पात्र में निचोदना चाहिये । शूद्धों को छोड़कर अन्य तीन वर्ण के व्यक्तियों को, सोम का सेवन करना चाहिये । चौथे मास में पूर्णमासी को पवित्र स्थान मे ब्राह्मणों की पूजा तथा स्वस्तिवाचन, मंगलपाठ करके गृह से निकल कर पूर्वोक्त विधि के अनुसार चले ॥ १३ ॥

ओषधीनां पतिं सोममुपयुज्य विचक्षणः ।

दशवर्षसहस्राणि नवां धारयते तनुम् ॥ १४ ॥

सोमसेवन का फल - औषधियों के स्वामी सोम का प्रयोग कर बुद्धिमान् मनुष्य दस सहस्र वर्ष तक नवीन शरीर धारण करता है ॥ १४ ॥

नाग्निर्न तोयं न विप न शस्त्रं नास्त्रमेव च ।

तस्यालमायुः क्षपणे समर्थानि भवन्ति हि ॥ १५ ॥

अग्नि, जल, विप, शस्त्र और अस्त्र कोई भी सोम सेवन । करने वाले मनुष्य की आयु नष्ट करने में समर्थ नहीं होते ॥

भद्राणां पष्टिवर्षाणां प्रस्तुतानामनेकधा ।

कुञ्जराणां सहस्रस्य बल समधिगच्छति ॥ १६ ॥

साठ वर्ष की आयु वाले भद्रजाति के तथा अनेक वार जिनके मस्तकों से मद चू चुका है, ऐसे सहस्र हाथियों का चल सोम सेवन करने वाला मनुष्य प्राप्त करता है ॥ १६ ॥

क्षीरोदं शक्रसदनमुत्तरांश्च कुरूनपि ।

यच्छतिस गन्तुं वा तत्राप्रतिहता गतिः ॥ १७ ॥

चीरसागर, इन्द्रपुरी तथा उत्तर कुरु प्रदेश, जहाँ भी वह व्यक्ति जाना चाहे उसकी गति अकुण्ठित रहती है ॥ १७ ॥

कन्दर्प इव रूपेण कान्त्या चन्द्र इवापरः ।

प्रह्लादयति भूतानां मनांसि स महाद्युतिः ॥ १८ ॥

रूप में कामदेव के समान तथा कान्ति में दूसरे चन्द्रमा की भाँति वह महानू तेजस्वी मनुष्य जीवों के मन को । प्रसन्न करता है ॥ १८ ॥

साङ्गोपाङ्गांश्च निखिलान् वेदान् विन्दति तत्त्वतः ।

चरत्यमोघसङ्कल्पो देववच्चाखिलं जगत् ॥ १६ ॥

वह मनुष्य समस्त वेदों तथा उनके अन एवं उपादों के तव को जानता है, उसके सकल्प अव्यर्थ होते हैं और वह देवताओं की भाँति समस्त संसार मे विचरता है ॥ १ ९ ॥

सर्वेषामेव सोमानां पत्राणि दश पञ्च च ।

तानि शुक्ले च कृष्णे च जायन्ते निपतन्ति च ॥२० ॥

एकैकं जायते पत्र सोमस्याहरहस्तदा ।

शुकस्य पौर्णमास्यां तु भवेत् पञ्चदशच्छदः ॥ २१ ॥

शीर्यते पत्रमेकैकं दिवसे दिवसे पुनः ।

कृष्णपक्षक्षये चापि लता भवति केवला ॥ २२ ॥

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१२० सुश्रुतसहिता सोमों के सामान्य लक्षण -- सभी सोमों में पन्द्रह पत्ते होते हैं और वे शुद्धपक्ष में निकलते तथा कृष्णपन झड जाते हैं । शुक्लपक्ष में प्रतिदिन मोम का एक एक पत्ता उत्पन्न होता है तथा पूर्णमासी के दिन वे पूरे पन्द्रह हो जाते हैं । पुन ' कृष्णपक्ष में प्रतिदिन एक एक पत्ता झटने लगता है और पक्ष की समाप्ति पर ( अमावस्या को ) कंवल लताशेष रह जाती है ।

अंशुमानाज्यगन्धस्तु कन्दद्वान् रजतप्रभः ।

कढल्याकारकन्दस्तु मुखवांल्लनच्छदः ॥ २३ ॥

विविध सोमों के विशिष्ट लक्षण —– अंशुमान सोम घृत की गन्ब वाला तथा रजतप्रभ कन्डयुक्त होता है । सुअवान् सोम में केले के समान कन्द और लशुन की भाँति पत्ते होते हैं ॥

चन्द्रमाः कनकाभासो जले चरति सर्वदा ।

गरुडाहृतनामा च श्वेताक्षत्रापि पाण्डुरी ॥ २४ ॥

सर्पनिर्मोकसदृशौ नो वृक्षमावलम्बिनौ ।

तथाऽन्ये मण्डलैश्वित्रैश्चित्रिता इव भान्ति ते ॥ २५ ॥

सर्व एव तु विज्ञेयाः सोमाः पञ्चदशच्छदाः ।

श्रीरकन्दलतावन्तः पत्रैर्नानाविधैः स्मृताः ॥ २६ ॥

चन्द्रमा और कनकप्रभ सोम सदा नल में रहते है | गरु डाहत और श्वेताच सर्प की केंचुल के समान तथा पाण्डुर ( धूमर ) वर्णं के होते हैं एवं वृक्ष के अग्रभाग में लटके रहते हैं । शेप अन्य मोम मण्डलाकार चित्रों में चित्रित को भांति प्रतीत होते हैं । सभी सोम पन्द्रह पत्ते वाले होते हैं, उनके कन्द में दूध तथा लतायें होती हैं एवं पत्ते नाना प्रकार के होते हैं ॥

हिमवत्यर्बुदे सह्ये महेन्द्रे मलये तथा ।

श्रीपर्वने देवगिरौ गिरा देवसहे तथा ॥ २७ ॥

पारियात्रे च विन्ध्ये च देवसुन्दे हृदे तथा ।

उत्तरेण वितस्तायाः प्रवृद्धा ये महीधरा ॥ २८ ॥

पञ्च नेपामवो मध्ये सिन्धुनामा महानदः ।

ear a तत्र चन्द्रमा सोमसत्तमः ॥ २६ ॥

सोमों की उत्पत्ति के स्थानों का निर्देश - हिमालय, अर्बुद, सह्य, महेन्द्र, मलय, श्रीपर्वत, देवगिरि, पारियात्र, विन्ध्य, दैत्रसुन्ढ तथा हृद ( बड़े तालाच ) में सोम पाये जाते हैं । वितस्ता नदी के उत्तर में, बहुत बडे जो पाँच पर्वत हैं, उनके नीचे, मध्य में, सिन्धु नामक महानद है, उसमें, सोमों में श्रेष्ट चन्द्रमा, हरु ( जलकुम्भी ) की भाँति तैरता रहता है ।

तस्योद्देशेषु चाप्यस्ति मुञ्जवानंशुमानपि ।

काश्मीरेषु सरो दिव्यं नान्ना क्षुद्रकमानसम् ॥ ३८ ॥

गायत्रत्रैष्टुभः पाङ्को जागतः शाक्करस्तथा ।

अत्र सन्त्यपरे चापि सोमाः सोमसमप्रभाः ॥ ३१ ॥

मुञ्जवान और अशुमान् भी चन्द्रमा नामक सोम के समीप रहते हैं । काश्मीर में चुड़क मानस नामक दिव्य सरोवर है, वहाँ गायत्र, त्रैष्टुम, पाऊ, जागत तथा गाकर पूर्व अन्य दूसरे चन्द्रमा के समान सुंदर सोम भी है ॥३०-३६ ॥ चैवात्र मन्दभाग्यैस्ते भिपनश्चापमानिता. । न तान् पश्यन्त्यवर्मिष्टाः कृतन्नाश्चापि मानवाः भेजद्वेपणश्चापि त्राह्मणद्वेपणस्तथा ॥ ३२ ॥

इति श्री सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने स्वभाव-व्याधिप्रतिपेवनीयं रसायनचिकित्सितं नामै-कोनत्रिंशोऽध्यायः || २१ || भाग्यहीन, वैद्य का अपमान करने वाले, अधार्मिक और कृनम्न तथा औषधियों एवं ब्राह्मणों मे द्वेष रखने वाले मनुष्य उन्हें देख नहीं पाते ॥ ३२ ॥

इत्यायुर्वेदतत्वमंदी पिकाभापान्यास्यायामेकोनत्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ त्रिंशत्तमोऽध्यायः अथातो निवृत्तसन्तापीयं रसायनं व्याख्यास्यामः ॥१ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

निवृत्त संतापीय रमायनाध्याय का उपक्रम - इसके अन • तर, सन्ताप को दूर करने वाले, रसायन चिकित्सा का वर्णन | किया जा रहा है, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत प्रभृति शिष्यों से ) कहा ॥ १-२ ॥

यथा निवृत्तसन्तापा मोढन्ते दिवि देवताः ।

तथौपधीरिमाः प्राप्य मोदन्ते भुवि मानवाः ॥ ३ ॥

जिस प्रकार सन्ताप ( दुख ) मे मुक्त देवता लोग स्वर्ग में प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार इन औषधियों को प्राप्त कर मनुष्य पृथ्वी पर हर्षित होते हैं ॥ ३ ॥

अथ खलु सप्त पुरुषा रसायनं नोपयुञ्जीरन्; तद्यथा - अनात्मवानलसो दरिद्रः प्रमादी व्यसनी पापकृद् भेषजापमानी चेति । सप्तभिरेव कारणैर्न संपद्यते; तद्यथा - अन्नानावनारम्भाटस्थिरचित्तत्वा-दारिद्रयादनायत्तत्वादधर्मादौ पघालाभाच्चेति ॥ ४ ॥

रसायन सेवन के अयोग्य पुरुष -मात प्रकार के मनुष्यों को रसायन का सेवन नहीं करना चाहिए, जैसे- अजितेन्द्रिय, आलमी, दरिद्र, प्रमादी, व्यसनी, पापकर्म में लिप्त और । औषधियों का अपमान करने वाले । सात कारणों से ही, रसायन मेवन का फल प्राप्त नहीं होता -१ अज्ञान औषध का आरम्भ न करना ३ मन की चञ्चलता ४ दरिद्रता ५ पराधीनता, ६ अधर्म तथा ७ औषध का न मिलना ॥ ४ ॥

अथौपधीर्व्यायाख्यास्यामः -- तत्राजगरी, श्वेत-कापोती, कृष्णकापोती, गोनसी, वाराही, कन्या, छात्रा, अतिच्छत्रा, करेणुः अजा, चक्रका, आदित्य-पर्णी, ब्रह्मसुवर्चला, श्रावणी, महाश्रावणी, गोलोमी, अजलोमी, महावेगवती, चेत्यष्टादश सोमसमवीर्या महौषधयो व्याख्याताः । तासां सोमवत् क्रियाशी: -| स्तुतयः शाखेऽभिहिताः । तासामागारेऽभिहुतानां या क्षीरवत्यस्तासां क्षीरकुडवं सकृदेवोपयुञ्जीत, यास्त्वक्षीरा मूलवत्यस्तासां प्रदेशिनीप्रमाणानि त्रीणि

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अध्यायः ३० ] चिकित्सास्थानम् १ ९ १ काण्डानि प्रमाणमुपयोगे, श्वेतकापोती, समूलपत्रा! भक्षयितव्या, गोनस्यजगरीकृष्णकापोतीनां सनख । मुष्टि खण्डशः कल्पयित्वा क्षीरेण विपाच्य परिस्रा • व्याभिधारितमभिहुतं च सकृदेवोपयुञ्जीत, चक्रकायाः पयः सकृदेव, ब्रह्मसुवर्चला सप्तरात्रमुपयोक्तव्या भव्य-कल्पेन, शेषाणां पञ्च पञ्ज पलानि क्षीराढककथितानि

प्रस्थेऽवशिष्टेऽवतार्य परिस्राव्य सकृदेवोपयुञ्जीत ।

सोमवदाहारविहारौ व्याख्यातौ केवलं नवनीतमभ्य-सार्थे, शेषं सोमवदानिर्गमादिति ॥ ५ ॥

सोमसदृश अन्य रसायन ओषधियाँ -- इसके भागे औप-धियों का वर्णन किया जाता है -- अजगरी, श्वेत कापोती, कृष्णकापोती, गोनसी, वाराही, कन्या, छत्रा, अतिच्छत्रा, करेणु, अजा, चक्रका, आदित्यपर्णी, ब्रह्मसुवर्चला, श्रावणी, महाश्रावणी, गोलोमी, अजलोमी और महावेगवती, इन अठारह औषधियों को, सोम के समान शक्तिशाली कहा गया है । इनका सेवन - विधान तथा गुण और प्रशंसा भी, सोम की भांति शास्त्र में वर्णित है । होम किए हुए गृह में ( प्रवेश करके ) इनमें से जो दूध वाले हों, उनका एक कुढव ( ४ पल ) दूध, एक वार में पी ले । जो दूधरहित मूल वाली हों, उनकी तर्जनी अंगुलि के तुल्य तीन टुकड़ों की मात्रा का उपयोग करे । श्वेत कापोती, मूल और पत्ते के साथ सेवन करनी चाहिए । गोसी, अजगरी और कृष्ण कापोती को, नख सहित एक मुट्ठी प्रमाण, छोटे छोटे टुकडे करके, दूध में पकाकर तथा छान कर, थोडा घी मिला, होम करके, एक वार में सेवन करे । चक्रका का दूध एक बार में पीवे । ब्रह्मसुवर्चला का सेवन भक्ष्यल्प ( मालपुभा, पूडी, कचौडी आदि ) विधान से सात दिन करे । शेष अन्य सोमों को पांच - पांच पल लेकर, एक आदक दूध में पकावे और एक प्रस्थ दूध अवशिष्ट रहने पर अभि से उतार, छान कर, एक बार में सेवन करे । आहार-विहार का विधान, सोम की तरह समझे और अभ्यङ्ग में केवल मक्खन का प्रयोग करे । शेष सभी विधान, गृह से बाहर निकलने तक, सोम के तुल्य है ॥ ५ ॥

भवन्ति चात्र-युवानं सिहविक्रान्तं कान्तं श्रुतनिगादिनम् ।

कुर्युरेताः क्रमेणैव द्विसहस्रायुषं नरम् ॥ ६ ॥

रासायनिक औषधियों के सेवन का फल - जैसे कि: - ये औपधियाँ, क्रमानुसार मनुष्य को युवा, सिंह के समान वल • शाली, सुन्दर, स्मृति शील तथा दो सहस्र वर्ष की आयु वाला बनाती हैं ॥ ६ ॥

अगदी कुण्डली मौली दिव्यस्रक्चन्दनाम्बरः ।

' चरत्यमोघसंकल्पो नभस्यम्बुदुदुर्गंमे ॥ ७ ॥

बाजूबन्द, कुण्डल, मुकुट, दिव्यमाला, चन्दन और वस्त्र धारण करके तथा सफल मनोरथ होकर, मनुष्य, बादलों के लिए भी दुर्गम, आकाश में विचरता है ॥ ७ ॥

व्रजन्ति पक्षिणो येन जललम्बाश्च तोयदाः ।

गतिः सौपधिसिद्धस्य सोमसिद्धे गतिः परा ॥ ८ ॥

१६ सु ० चि ० पक्षियों तथा जल से भरे हुए बादलों की भांति औषधि-सिद्ध मनुष्य की गति होती है । सोमसिद्ध पुरुष को गति तो कुछ दूसरी ही है अर्थात् वह इनसे उत्कृष्ट होती है ॥ ८ ॥

अथ वक्ष्यामि विज्ञान मौषधीनां पृथक् पृथक् ।

मण्डलैः कपिलैश्वित्रैः सर्पाभा पञ्चपर्णिनी ॥ ६ ॥

पञ्चारनिप्रमाणा च विज्ञेयाऽजगरी बुधैः ।

निष्पत्रा कनकाभासा मूले व्यङ्गुलसंमिता ॥ १० ॥

सर्पाकारा लोहितान्ता श्वेतकापोतिरुच्यते ।

द्विपणिनीं मूलभवामरुणां कृष्णमण्डलाम् ॥ ११ ॥

व्यरत्नमात्रां जानीयाद्गोनसीं गोनसाकृतिम् ।

सक्षीरां रोमशां मृद्वीं रसेनेक्षुरसोपमाम् ॥ १२ ॥

एवंरूपरसां चापि कृष्णकापोतिमादिशेत् ।

कृष्णसर्प स्वरूपेण वाराही कन्दसंभवा ॥ १३ ॥

एकपत्रा महावीर्या भिन्नाञ्जनसमप्रभा ।

छत्रातिच्छत्र के विद्याद्रक्षोघ्ने कन्दसंभवे ॥ १४ ॥

जरामृत्युनिवारिण्यौ श्वेतकापोतिसंस्थिते ।

कान्तैर्द्वादशभिः पत्रैर्मयूराङ्गरुहोपमैः ॥ १५ ॥

कन्दजा काञ्चनक्षीरी कन्या नाम महौषधी ।

करेणुः सुबहुक्षीरा कन्देन गजरूपिणी ॥ १६ ॥

हस्तिकर्णपलाशस्य तुल्यपर्णा द्विपर्णिनी ।

अजास्तनाभकन्दा तु सक्षीरा क्षुपरूपिणी ॥ १७ ॥

अजा महौषधी ज्ञेया शङ्खकुन्देन्दुपाण्डुरा ।

विचित्रकुसुम काकादन्या समां क्षुषाम् ॥ १८ ॥

चक्रकामोपधीं विद्याज्जरामृत्युनिवारिणीम् ।

मूलिनी पञ्चभिः पत्रैः सुरक्तांशुककोमलैः ॥ १६ ॥

आदित्यपर्णिनी ज्ञेया सदाऽऽदित्यानुवर्तिनी ।

कनकाभा जलान्तेषु सर्वतः परिसर्पति ॥ २० ॥

सक्षीरा पद्मिनीप्रख्या देवी ब्रह्मसुवर्चला ।

अरत्निमात्रक्षुपका पत्रैद्द्द्वर्यङ्गुलसंमितैः ॥। २१ ॥

पुष्पैर्नीलोत्पलाकारैः फलैश्चाञ्जनसन्निभैः ।

श्रावणी महती ज्ञेया कनकाभा पयस्विनी ॥ २२ ॥

श्रावणी पाण्डुराभासा महाश्रावणिलक्षणा ।

गोलोमी चाजलोमी च रोमशे कन्दसंभवे ॥। २२ ॥

हसपादीष विच्छिन्नैः पत्रैर्मूलसमुद्भवैः ।

अथवा शङ्खपुष्प्या च समाना सर्वरूपतः ॥। २४ ॥

रासायनिक विविध औषधियों के लक्षण - इसके आगे, औषधियों की पहचान, पृथक् पृथक् वतलाई जाती है । अजगरी, गोलाकार, धूसर वर्ण के चित्रों से चित्रित, सर्प के समान, पाँच पत्तों वाली तथा पाँच अरत्नि ( बालिश्त ) प्रमाण की होती है । श्वेत कापोती, पत्ररहित, स्वर्ण के समान आभावाली, मूल में दो अंगुल लम्बी, सर्पाकार तथा लाल किनारे वाली होती है । गोनसी, दो पत्ते वाली, लाल जड़ तथा काले मण्डलों से युक्त, दो अरति लम्बी और गौ के खुर के समान आकृति वाली होती है ।

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१२२ सुश्रुतसंहिता कृष्ण कापोती, दूध युक्त, रोमवाली, कोमल, गन्ने के रस के समान रस वाली और उसी रूप - रस की होती है । वाराही । स्वरूप में काले सर्प के समान, कन्द से उत्पन्न होने वाली, एक पत्ते वाली, महान् शक्ति सम्पन्न और टूटे हुए अञ्जन की । भांति, चमक से युक्त होती है । छत्रा और अतिछत्रा, राक्षसों का नाश करने वाली, कन्द से उत्पन्न होने वाली, बुढापा और मृत्यु को दूर करने वाली तथा श्वेत कापोती के समान आकृति वाली होती है । कन्या नामक महौषधि, मोरपख के समान सुन्दर बारह पत्तों से युक्त, कन्द से उत्पन्न होने वाली तथा सुनहले रंग के दूध वाली होती है । करेणु अधिक दूध वाली, हाथी के समान कन्दवाली तथा हस्तिकर्णपलाश के समान पत्तों वाली एव दो पत्तों से युक्त होती है । अजा नामक महौषधि, बकरी के स्तन की भाति कन्द वाली, दूध से युक्त, ' चुप ( छोटे पौधे ) के आकार वाली तथा शंख, कुन्द ( पुष्प ) और चन्द्रमा के समान उज्ज्वल होती है । चक्रका औषधि, श्वेत विविध वर्ण के पुष्पों से युक्त, काकादनी ( गुञ्जा ) के पौधे के समान और जरा एवं मृत्यु को दूर करने वाली होती है । आदित्यपर्णी, मूलवाली, सूर्य की लाल किरणों के समान सुन्दर, कोमल, पाँच पत्तों से युक्त तथा सदा सूर्य का अनु गमन करने वाली होती है । देवी ब्रह्मसुवर्चला, सोने के समान वर्णं वाली, जल के किनारे फैलने वाली, दूध युक्त और कमलिनी के समान होती है । श्रावणी का पौधा एक चालिश्त लम्बा, पत्ते दो अगुल लम्बे, फूल नीलोफर की आकृति के और फल अञ्जन के समान होते हैं । महाश्रावणी, सोने के समान चमकीली, दूध से युक्त, धूसर वर्ण वाली और महाश्रावणी के लक्षणों से युक्त होती है! । गोलोमी और अजलोमी, रोमवाली, कन्द से उत्पन्न होने वाली, हंसपदो के समान कटे हुए तथा जड़ों से निकलने वाले पत्तों वाली अथवा सम्पूर्ण रूप से शंखपुष्पी के समान होती है ॥ ९ –२४ ॥

वेगेन महताऽऽविष्टा सर्पंनिर्मोकसन्निभा ।

एपा वेगवती नाम जायते ह्यम्बुदक्षये ॥ २५ ॥

वेगवती, वेग से बढ़ने वाली, साँप की केचुल के समान आकृति वाली और वर्षा ऋतु के अन्त मे ( शरद् ऋतु में ) उत्पन्न होती है ॥ २५ ॥

सप्तादौ सर्परूपिण्यो ह्यपध्यो याः प्रकीर्तिताः ।

तासामुद्धरणं कार्यं मन्त्रेणानेन सर्वदा ॥ २६ ॥

रासायनिक औषधियों के उखाडने का मन्त्र -- प्रारम्भ में, साप की आकृतिवाली जिन सात औषधियों का वर्णन किया गया है, उन्हें इम अधोलिखित मन्त्र के साथ, सदा उखाडना चाहिए ॥ २६ ॥

महेन्द्ररामकृष्णानां ब्राह्मणानां गवामपि ।

तपसा तेजसा वाऽपि प्रशाम्यध्व शिवाय वै ॥ २७ ॥

महेन्द्र, राम, कृष्ण, ब्राह्मण और गौ के तप और तेज से, कल्याण करने के लिए, शान्त रहो ॥ २७ ॥

मन्त्रेणानेन मतिमान् सर्वा एवाभिमन्त्रयेत् ।

अश्रद्दधानेरलसै कृनघ्तै पापकर्मभिः ॥ २८ ॥

नैवासादयितु शम्याः सोमाः सोमसमास्तथा । इस मन्त्र के द्वारा बुद्धिमान् वैद्य, सभी औषधियों को अभिमन्त्रित करे । श्रद्धारहित, भालसी, कृतघ्न और पापकर्म में रत मनुष्य, चन्द्रमा के तुल्य सोमों को, प्राप्त नहीं कर सकते ॥ २८ ॥

पीतावशेषममृतं देवैर्ब्रह्मपुरोगमैः ॥ २६ ॥

निहितं सोमवीर्यासु सोमे चाप्योपधीपत्तौ । पूर्वोक्त ओषधियों के अमृत समान गुणकारी होने में हेतु-ब्रह्मा के पश्चाद्वामी देवताओं ने, पीने से बचे हुए अमृत को, सोम के समान वीर्य वाली औषधियों में तथा औषधियों के स्वामी चन्द्रमा में रख दिया ॥ २ ९ ॥ देवसुन्दे हृदवरे तथा सिन्धौ महानदे ॥ ३० ॥

दृश्यते च जलान्तेषु मेघ्या ब्रह्मसुवर्चला ।

आदित्यपर्णिनी ज्ञेया तथैव हिमसंक्षये ॥ ३१ ॥

दृश्यतेऽजगरी नित्यं गोनसी चाम्बुदागमे ।

काश्मीरेषु सरो दिव्यं नाम्ना क्षुद्रकमानसम् ॥ ३२ ॥

करेणुस्तत्र कन्या च छत्रातिच्छत्रके तथा ।

गोलोमी चाजलोमी च महती श्रावणी तथा ॥ ३३ ॥

वसन्ते कृष्णसर्पाख्या गोनसी च प्रदृश्यते ।

कौशिक सरितं तीर्त्वा सञ्जयन्त्यास्तु पूर्वतः ॥ ३४ ॥

क्षिति प्रदेशो वल्मीकैराचितो योजनत्रयम् ।

विज्ञेया तत्र कापोती श्वेता वल्मीकमूर्धसु ॥ ३५ ॥

मलये नलसेतौ च वेगवत्योषधी ध्रुवा! कार्तिक्यां पौर्णमास्यां च भक्षयेत्तामुपोषितः ॥ ३६ ॥

सोमवच्चात्र वर्तेत फलं तावच्च कीर्तितम् ।

सर्वा विचेयास्त्वोषध्यः सोमाश्चाप्यर्बुदे गिरौ ॥ ३७ ॥

स शृङ्गैर्देवचरितैरम्बुदानीकभेदिभिः ।

व्याप्तस्तीर्थैश्च विख्यातैः सिद्धर्षिसुरसेवितैः ॥ ३८ ॥

गुहाभिर्भीमरूपाभिः सिंहोन्नादितकुक्षिभिः ॥

गजालोडित तोयाभिरापगाभिः समन्ततः ।

विविधैर्धातुभिश्वित्रैः सर्वत्रैवोपशोभितः ॥ ३६ ॥

नदीषु शैलेषु सरःसु चापि पुण्येष्वरण्येषु तथा ss श्रमेषु । सर्वत्र सर्वाः परिमार्गितव्याः सर्वत्र भूमिर्हि वसूनि धत्ते ॥ ४० ॥

| इति श्रीसुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने निवृत्तसंतापीयं रसायन नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥

पूर्वोक्त ओषधियों के उत्पत्ति- प्रदेश - जलाशयों में श्रेष्ठ; देवसुन्द तथा सिन्धु महानदी में एवं जल के किनारे, मेध्या ब्रह्मसुवर्चला दीखती है । इसी प्रकार आदित्यपर्णी वसन्त ऋतु में दिखलाई पडती है । अजगरी सदा तथा गोनसी वर्षा ऋतु में दृष्टिगत होती है । काश्मीर में क्षुद्रक मानस नामक एक दिव्य जलाशय है, वहाँ करेणु, कन्या, छत्रा, अतिछत्रा, गोलोमी, अजलोमी, श्रावणी और महाश्रावणी उत्पन्न होती

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प्रध्याय ३१ ] चिकित्सास्थानम् १३३ है । बाराही और गोनसी वसन्त ऋतु में दिखलाई पडती है । कौशिकी नदी को पार करके, सञ्जयन्ती के पूर्व में, वल्मीक से भरा हुआ तीन योजन का भूभाग है, वहाँ श्वेतकापोती मलय पर्वत तथा नल मेतु पर निश्रय प्राप्त होती है । इसे कार्तिक मास की पूर्णिमा को उपवास करके सेवन करना चाहिए । इसमें सोम सेवन की भांति आहार और आचार तथा गुण बतलाया गया है । सभी औषधिय तथा सोम अर्युदगिरि से एकत्रित करनी चाहिए । उस पर्वत की चोटियों पर देवता विचरते हैं, शियर मेघघटा का भेदन करते हैं, ( ऊँचाई के कारण ) वह प्रसिद्ध तीर्थ स्थानों से भरा हुआ है तथा वह सिद्ध प्रापि और देवताओं का चाम है । यह भयर गुहाओं तथा सिंहगर्जना से प्रतिध्वनित मोहों में व्याप्त तथा हाथियों के द्वारा आलोडित नदियों के जल मे चदिक घिरा हुआ है और नाना प्रकार के धातु एव चित्र विचित्र वस्तुओं में सभी स्थानों में सुशोभित है । नदी, पर्वत, जलाशय, पवित्रवन, आश्रम एवं सभी स्थानों में इन सम्पूर्ण औषधियों को दूना

चाहिए क्योंकि भूमि मभी स्थलों पर सम्पत्ति धारण करती है ।

इत्यायुर्वेदत्तच्यमंत्रीपिकाभापान्याय्यायां त्रिशत्तमोऽध्यायः ॥

एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः प्रथातः स्नेहो पयौगिकचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

स्नेोपयोगि चिकित्सा का उपक्रम - इसके अनन्तर स्नेहप्रयोग चिकित्सा विधि का वर्णन किया जा रहा है, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत प्रभृति निष्यों से ) कहा । स्नेहसारोऽयं पुरुषः, प्राणाय स्नेहभूयिष्ठाः स्नेहसाध्याश्च भवन्ति । स्नेहो हि पानानुवासनमस्ति कशिरोवस्त्युत्तरवस्तिनस्य कर्णपूरणगात्राभ्यद्भभोजने -पूपयोज्यः ॥ ३ ॥

स्नेह की प्रशसा - मनुष्य शरीर में स्नेह ही सार वस्तु है, उसका जीवन ( बल ) स्नेह पर आधारित रहता है तथा उसकी रक्षा भी स्नेह के द्वारा ही होती है । स्नेह का प्रयोग पान, अनुपमन, मस्तिष्क ( शिरोविरेचन ), शिरोबस्ति, उत्तरवस्ति नस्य, कर्णपूरण ( कान में तेल ढालना ), गात्रा यह ( शरीर की मालिश ) और भोजन में करना चाहिये ॥ तत्र द्वियोनिश्चतुर्विकल्पोऽभिहितः स्नेहः स्नेहगु-णाश्च । तत्र जङ्गमेभ्यो गव्यं घृतं प्रधानं, स्थावरेभ्य-स्तिलतैलं प्रधानमिति ॥ ४ ॥

स्नेह के भेद एवं उनमें गोधन तथा तिल तेल की प्रधानता - स्नेह के दो उत्पत्तिस्थान ( स्थावर और जगम ) तथा चार भेद ( घृन, तैल, वसा, मजा ) होते है । जगम स्नेहीं ( घृत, वसा, मज्जा ) में गोघृत प्रधान होता है और स्थावरों में तिल तेल ॥ ४ ॥

अत ऊर्ध्वं यथाप्रयोजनं यथाप्रधानं च स्थावर-स्नेहानुपदेच्यामः-: -तत्र तिल्वकैरण्डकोशाम्रदन्तीह -। यन्तीस तलाशङ्खिनीपलाशविपाणिकागवाक्षीकम्पिल्लक-| शम्पाकनीलिनीस्नेहा विरेचयन्ति, जीमूतककुटज-कृनवेधनेच्वाकुधामार्गवमदनस्नेहा वामयन्ति, विडङ्ग-खरमञ्जरीमधुशि सूर्यवल्ली पीलुसिद्धार्थकज्योतिष्मती-स्नेहा. शिरो विरेचयन्ति, करजपूतीककृतमालमातुलु-| झेनुदी किरातति ककस्नेहा दुष्टत्रणेपूपयुज्यन्ते, तुवरक-कपित्थकम्पिल्लकभल्लातकपटोलस्नेहा महाव्याधिपु | त्रपुसेर्वारुककर्काकतुम्बी कूष्माण्डस्नेहा मूत्रसङ्गेपु, । कपोतवडावल्गुजहरीतकी स्नेहा. शर्कराश्मरीपु, कुसु-भसर्पपात सीपिचुमदतिमुक्तकभाण्डीकटुतुम्बीकटभी-स्नेहाः प्रमेहेपु, तालनारिकेलपनसमोच प्रियाल बिल्व-मधूकश्लेप्मातकान्नात कफलस्नेहाः पित्तसंसृष्टे वायौ, विभीतकभल्लातकपिण्डीतकस्नेहाः कृष्णीकरणे, श्रव-| णकडुकटुण्टुकस्नेहाः पाण्डुकरणे, सरलपीतदारुशि-शपागुरुसारस्नेहा ददुक्कुष्टकिटिभेपु, सर्व एव स्नेहा चातमुपन्नन्ति तैलगुणाश्च समासेन व्याख्याताः ॥ ५ ॥

विविध स्थावर स्नेहों के गुण तथा उपयोग- इसके आगे प्रयोजन और प्रधानता की दृष्टि मे, श्रेष्ठ स्थावर स्नेहों का वर्णन किया जाता है- इनमें तिल्वक ( लोध ), पुरण्ड, कोशात्र, दन्ती, हयन्ती, सप्तला ( सेहुण्ड भेद ), शखिनी ( यचतिक्ता ), पलाश, विपाणिका ( मेढासिंगी ), गवाक्षी ( इन्द्रायण ), कम्पिलक ( कवीला ), शम्पाक ( अमलतास ) और नीलिनी ( नील ) से उत्पन्न स्नेह विरेचन करते हैं । | जीमूतक ( देवदाली ), कुटज, कृतवेधन ( कडुई तरोई ), | इवाकु ( कदुई तुम्बी ), धामार्गच ( नेनुआ ) और मैनफल से उत्पन्न स्नेह वमन कराते है । चिढग, खरमञ्जरी ( अपामार्ग ), | मधुशिय ( मीटा सहिजन ), सूर्यवल्ली ( हुलहुल ), पीलु, सिद्धार्थक ( सरसों ) और ज्योतिष्मती ( मालकांगनी ) से उत्पन्न स्नेह, शिरोविरेचन के लिए उपयुक्त होते हैं । करञ्ज, पूतिकरञ्ज, कृतमाल ( अमलतास ), मातुलुङ्ग ( विजौरा ), । इनुदी और चिरायता का स्नेह, दुष्टचणों में प्रयुक्त होता है । तुवरक, कैथ, कवीला, भिलावा और परवल के स्नेह का प्रयोग, महाव्याधियों में किया जाता है । नपुस ( खीरा ), एर्वारुक ( ककदी ), कर्कारुक ( कूप्माण्डी ), तुम्बी ( कटुतुम्बी ) | और कूष्माण्ड के स्नेह का प्रयोग, मूत्रावरोध में किया जाता । है । कपोतवद्धा ( ब्राह्मी ), अवल्गुज ( वाकुची ) और हरीतकी का स्नेह, शर्करा और अश्मरी में प्रयुक्त होता है । कुसुम्भ ( वर्रे का तेल ), सरसों, तीसी, नीम, अतिमुक्तक ( माधवीलता ) भाण्डी ( मजीठ ), कटुतुम्बी और कटभी ( मालकांगनी ) का स्नेह, प्रमेहों में प्रयोग में लाया जाता है । ताल ( ताड ), । नारियल, कटहल, मोघ ( केला ), प्रियाल ( चिरौंजी ), वेल, महुमा, श्लेष्मातक ( लिसोडा ) और आम्रातक ( आमडा ) फलों के स्नेह, पित्तयुक्त बात में प्रयोग किये जाते है । बहेड़ा, भिलावा, और पिण्डितक ( मैनफल ) का स्नेह कृष्णकर्म ( त्वचा का वर्ण काला करना ) मे प्रयुक्त होता है । श्रवण ( तापसवृक्ष, इगुदी ), कंगुक ( प्रियगु ) और टुण्टुक । ( भरल ) का स्नेह पाण्डुकर्म में प्रयुक्त होता है । चीड़,

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१३४ सुश्रुवसहिता देवदार, शीशम और अगर के सार भाग का स्नेह ददु, कुष्ठ एव किटिभ रोग में व्यवहृत होता है! सभी स्नेह वातनाशक होते है । तेल के गुणों का संक्षेप में वर्णन किया गया है ॥ ५ ॥

अत ऊध्वं कपायस्नेहपाकक्रममुपदेच्यामः । तत्र केचिदाहुः - त्वक्पत्रफलमूलादीनां भागस्तच्चतुर्गुणं जल चतुर्भागावशेषं निष्क्काध्यापहरेदित्येष कपायपाक-कल्पःः स्नेहृप्रसृतेषु षट्सु चतुर्गुणं द्रवमात्राप्य चतुर-चक्षसमान् भेषजपिण्डानित्येप स्नेहपाककल्पः । एतत्तु न सम्यक्; कस्मात्? आगमासिद्धत्वान् ॥ ६ ॥

क्वाथ तथा स्नेह के पाक - क्रम में एकदेशीय मत - इसके आगे कृपाय ( क्वाथ ) और स्नेहपाक विधि का कथन किया जाता है । कुछु आचायों का मत है कि वनस्पतियों की छाल, पत्ता, फूल और मूल एक भाग तथा उससे चौगुना जल डाल कर क्वाथ करना चाहिये और चनुर्थांश नल अवशेष रहने पर उतार लेना चाहिये, यह कषायपाक विधि है । स्नेहपाक के लिए ६ अञ्जली स्नेह में चौगुना द्रव पदार्थ ( जल या किसी द्रव्य का स्वरसवाय ) मिलाना चाहिये और चार अच्च ( बछेडे का फल ) की मात्रा में क्ल्क द्रव्य ढालना चाहिये यह स्नेह पाक विधि है । किन्तु उनका कथन ठीक नहीं, क्योंकि शास्त्र से इस वचन की पुष्टि नहीं होती ॥ ६ ॥

विमर्शः- प्रमुतोऽत्र संयुक्तपाटिरीपदविस्तृतपाणिरेव, न तु एनः पलङयम् । चतुरश्चाश्चममान् भेषजककपिण्डान् विमी-नजफलमानान् पिष्टभेषजकत्कान् । पलक्कुडवादीनामतो मानं तु व्याख्यास्यामः -- तत्र द्वादृश धान्यमापा मध्यमाः सुवर्णमापकः; ते पोडश सुवर्णमू; अथवा मध्यमनिष्पावा एकोनविंशतिर्धरणं, तान्यर्थतृतीयानि कर्पः; ततश्चोर्ध्वं चतुर्गुणमभिवर्ध -यन्तः पलक्कुडवप्रस्थाढकद्रोणा इत्यभिनिष्पद्यन्ते, तुला पुनः पलशतं ताः पुनर्विशतिर्भारः शुष्काणामिदं मानम्, आर्द्रद्रयाणां च द्विगुणमिति ॥ ७ ॥

पल - कुडवादिमान परिभाषा - इमलिये पल, कुडव आदि की मान परिभाषा का वर्णन किया जाता है- मध्यम श्रेणी की बारह उददी का एक सुवर्णमाप होता है और सोलह सुवर्ण मापा एक सुवर्ण ( वर्ष ) । अथवा मध्यम श्रेणी की दुनीम निष्पावों ( सेम के बीज ) का एक धरण होता है और अट्ठाई धरण का एक कर्ष । इसके आगे चौगुना के क्रम से बहने हुए ( जैसे चार कर्ष का एक पड़ और चार पर का एक कुन्ब ) पढ़, कुदव, प्रम्य, आदक और द्रोण बनते हैं । सौप की एक तुला होती है और योग तुला का एक भार । यह मान परिभाषा सूते हुए द्रव्यों के लिये है, गीली औषधियां और जब पदार्थ इसी मान में दुगना लेना चाहिये ॥ ७ ॥

निसर्गः - म यमा नायमप्रमाण, नेन नानिन्यूला नातितनवध प्राणाः । सुवर्षे वर्ष इत्यर्थः । अद्धतीय येषा नान्यतृतीयानि सार्द्धश्यमित्यथः । ततः आंगनुमानात् पन्नू, एवं पात I "I, कुठवर प्रप्रथाकार द्रोण । नत्रान्यनमपरिमाणसंमितां यथायोगं वकपत्रक लमूलादीनामातपपरिशोपितानां छेद्यानि खण्डशरछे-दयित्वा भेद्यान्यगुशो भेदयित्वाऽवकुट्याष्टगुणेन पोडशगुणेन वाऽम्भसाऽभिषिच्य स्थाल्यां चतुर्भागाव-| शिष्टं कार्थायित्वाऽपहरेदित्येष कपायपाककल्पः । स्नेहा-चतुर्गुणो द्रवः, स्नेहचतुर्थांशो भेपजकल्कः, तदैकभ्यं संसृज्य विपचेदित्येष स्नेहपाककल्पः । अथवा तत्रो-दकद्रोणे त्वक्पत्रफलमूलादीनां तुलामाबाप्य चतुर्भा-गावशिष्टं निष्काध्यापहरेदित्येप कपायपाककल्पः, | स्नेहकुडवे भेषजपलं पिष्टं कल्कं चतुर्गुणं द्रवमाबाप्य विपचेदित्येष स्नेहपाककल्पः ॥ ८ ॥

स्नेहपाक कल्प इनमें से किसी एक मान के अनुसार, योग में प्रयुक्त किये जाने वाले द्रव्यों की त्वचा ( छाल ), पत्र, फल और मूल आदि को धूप सुखाकर, उनमें से । काटने योग्य द्रव्यों के छोटे छोटे टुकड़े # काट लेना चाहिए तथा तोड़ने योग्य द्रव्यों को छोटे - छोटे टुकड़ों में तोड लेना चाहिये और सबको कूटकर आय्गुने या सोलहगुने जल में भिगोकर क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थांश क्वाथ अवशिष्ट रहने पर उसे अग्नि पर से उतार लेना चाहिये; यह कपाय-पाक विधि है | स्नेहपाक में स्नेह से चौगुना द्रव पदार्थ, और स्नेह का चतुर्थांश औषधियों का पिसा हुआ क्ल्क एक साथ मिलाकर पाक करना चाहिये, यह स्नेहपाक विधि है । अथवा एक द्रोण नल में छाल, पत्ता, फल और जुड आदि की एक तुला डालकर क्वाथ करना चाहिये और चतुर्थांश जल अवशेष रहने पर उतार लेना चाहिए, यह कषायपाक विधि है । एक कुदव स्नेह में, एक पल औषधि का पिसा हुआ कल्क तथा चौगुना द्रव पदार्थ ढालकर पाक करना चाहिये, यह स्नेहपाक विधि है ॥ ८ ॥

भवतश्चात्र-स्नेहभेपजतोयानां प्रमाणं यत्र नेरितम् ।

तत्रायं विधिरास्थेयो निर्दिष्टे तद्वदेव तु ॥ ६ ॥

अनुक्ते द्रवकार्ये तु सर्वत्र सलिलं मतम् ।

कल्कक्काथावनिर्देशे गणात्तस्मात् प्रयोजयेत् ॥। १० ॥

जैसे कि - जिम स्थान पर स्नेह, औषध और नल का परिमाण न लिखा गया हो वहाँ इस विधि का व्यवहार | करना चाहिए और जहाँ विधि का निर्देश हो वहाँ उसी के अनुसार कार्य करना चाहिए । जहाँ द्रव पदार्थ निर्देदा न किया गया हो वहाँ जल लेना चाहिये और कल्क तथा लोपधियों काव्य द्रव्य का निर्देश न होने पर, जिस वर्ग की के द्वारा स्नेहपाक करना हो, उसी वर्ग के द्वच्यों का प्रयोग करना चाहिये ॥ ९ -१० ॥ अत ऊर्ध्वं स्नेहपाकक्रममुपदेयामः । स तु त्रिविधः तद्यथा - मृदुः, मध्यमः, खर इति । तत्र स्नेहा पधिविवेकमात्रं यत्र भेपज स मृदुरिति, मधू-| च्छिष्टमित्र विशदमविलेपि यत्र भेषजं स मध्यम ', कृष्णमवसन्नमीपद्विशदं चिक्कणं च यत्र भेपज स खर । उच्यं दग्धस्नेहो भवति, तं पुनः साधु साधयेत् । तत्र