श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 531–540
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 531–540
पृष्ठ 531
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०४ सुश्रुतसहिता न चालकर्णनासास्रोतोदशनाक्षिविवराण्यभिकु ष्णीयात्, न वीजयेत् केशमुखनखवखगात्राणि, न गात्रनखवक्रत्रादित्रं कुर्यात्, न काष्ठलेोष्टतृणादीनभि-हन्याच्छिन्द्याद्भिन्द्याद्वा ॥ ६५ ॥
चाल, कान, नाक, स्रोत ( मल - मूत्रेन्द्रिय ) और दाँत के छिद्रों को अंगुलि से नहीं कुरेदना चाहिये । केश, मुख, नख, और शरीर को नहीं हिलाना चाहिये । शरीर नख और मुख्ख को बजाना नहीं चाहिये । लकडी, ढेला और तृण आदि को पीटना, काटना या तोडना नहीं चाहिये ॥ ९ ५ ॥ न प्रतिवातातपं सेवेत, न भुक्तमात्रोऽग्निमुपा सीत, नोत्कटकाल्पकाष्ठासनमध्यासीत, न ग्रीवां विपमं धारयेत्, न विषमकाय: क्रियां भजेत् भुञ्जीन वा, न प्रततमीक्षेत विशेषाञ्ज्योतिर्भास्करसूक्ष्मचलभ्रा न्तानि, न भारं शिरसा वहेत्, न स्वप्नजागरणशय-नासनस्थानचङ्क्रमणयानवाहनप्रधावन लङ्घनपुत्रनप्रत-रणहास्यभाष्यव्यवायव्यायामादीनुचितानप्यतिसेवेत ॥ मामने की वायु और धूप का सेवन नहीं करना चाहिये । भोजन करते ही आग नहीं तापना चाहिये, बहुत ऊँचे, छोटे तथा लकडी के आसन पर नहीं बैठना चाहिये । गर्दन नहीं रखनी चाहिये । शरीर टेढ़ा करके कार्य या भोजन नहीं करना चाहिये । सूर्य तथा सूक्ष्म, देखना चाहिये । जागना, लेटना सवारी करना, उछलना, तैरना, उचित कार्यों का आँख फाड़कर, विशेष रूप से प्रकाश और अस्थिर एवं भ्रान्त वस्तुओं की ओर नहीं शिर पर बोझ नहीं ढोना चाहिये । सोना, , बैठना, चक्कर काटना, रथ आदि की घोडे आदि पर चढना, दौडना, लाँघना, हँसना, बोलना, मैथुन और व्यायाम आदि सेवन भी अधिक नहीं करना चाहिये ॥ ९ ६ ॥ उचितादप्यहितात् क्रमशो विरमेत्, हितमनुचि-तमप्यासेवेत क्रमशः, न चैकान्ततः पादहीनात् ॥६७ ॥
उचित ( अभ्यस्त ) फिर भी अहितकर आहार - विहार का परित्याग और हितकर किन्तु अनुचित ( अनभ्यस्त ) का सेवन क्रमश चतुर्थांश के त्याग तथा स्वीकार के क्रम से करना चाहिये न कि किमी वस्तु का पूर्णरूप से सहसा परित्याग या मेचन प्रारम्भ करना चाहिये ॥ ९ ७ ॥ नावाशिरा शयीत, न भिन्नपात्रे भुञ्जीत, न विना पात्रेण, नाञ्जलिपुटेनापः पिवेत्, काले हितमित-निग्धमधुर प्रायमाहार वैद्यप्रत्यचेक्षितमश्नीयात्, ग्राम-गणगणिकापणिकशत्रुसत्रशठपतितभोजनानि परिह-रेन, शेपाण्यपि चानिष्टरूपरसगन्धस्पर्शशब्दमान-सानि, अन्यान्येवं गुणान्यपि सभ्रमदत्तानि, ( तान्यपि ) मचिकावालोपहतानि नाप्रक्षालितपाणिपादो भुञ्जीत, न मृत्रोचारपीडित, न सन्ध्ययोर्नानुपाश्रितो नातीत-कालं हीनमतिमात्रं ( नोद्धृतस्नेहं ) चेति ॥ ६८ ॥
लुम के ब नहीं मोना चाहिये । फूटे हुए पात्र तथा विना पात्र के भोजन नहीं करना चाहिये । अञ्जलि से पानी नहीं पीना चाहिये । समय पर वैद्य द्वारा परीक्षित, हितकर, अल्प, स्निग्ध और मधुर रस प्रधान आहार खाना चाहिये । ग्रामभोज तथा गण ( रथकार, चारण आदि ), गणिका ( वेश्या ), पणिक ( दूकानदार ), शत्रु, सत्र ( यज्ञ ), शठ ( दुर्जन ) और पतित ( धर्मभ्रष्ट ) के अन्न का परित्याग करना चाहिये । इनके अतिरिक्त अन्य शेष अप्रिय रूप, रस, गन्ध, स्पर्श तथा शब्द से युक्त मनुष्यों का भोजन भी नहीं करना चाहिये । प्रिय रूप, रस, गन्ध आदि से युक्त व्यक्तियों के द्वारा घबडाहट में दिया गया भोजन भी परित्याग देना चाहिये । मक्खी और बाल गिरे हुए पदार्थों को भी त्याग देना चाहिये । हाथ, पैर धोये विना भोजन नहीं करना चाहिये । मूत्र मल के वेग को धारण किये हुए, सध्या समय, आसन पर बिना बैठे, भोजन का समय बिताकर, तथा बहुत अल्प और बहुत अधिक ( घृतरहित ) भोजन नहीं करना चाहिये ॥ ९ ८ ॥
न भुञ्जीतोद्धृतस्नेहं नष्टं पर्युषितं पयः ।
ननक्त दधि भुञ्जीत न चाप्यघृतशर्करम् ॥ ६६ ॥
नामुद्द्रयूषं नाक्षौद्रं नोष्णं नामलकैर्विना ।
अन्यथा जनयेत् कुष्ठविसर्पादीन् गदान् बहून् ॥
नात्मानमुदके पश्येन्न नग्न प्रविशेज्जलम् ॥ १०० ॥
घी निकाला हुआ, फटा हुआ तथा वासी दूध नहीं पीना चाहिये । घी, शक्कर, मूँग का यूप, मधु, उष्ण द्रव्य या आँवला मिलाये विना रात्रि में दही नहीं खाना चाहिये । अन्यथा कुछ, विसर्प आदि अनेक रोगों की उत्पत्ति होती है । जल में अपनी छाया नहीं देखनी चाहिये तथा नग्न होकर जल में प्रवेश नहीं करना चाहिये ॥ ९९ -१०० ॥ द्यूतमद्यातिसेवा प्रतिभूत्वसमाह्वानगोष्ठीवादित्राणि न सेवेत, स्रजं छत्रोपानहौ कनकमतीतवासांसि न चान्यैर्धृतानि धारयेत् • ब्राह्मणमग्निं गां च नोच्छिष्टः स्पृशेत् ॥ १०१ जुआ, अधिक मद्यपान, प्रतिभू ( जमानतदारी ), समाह्वान ( गप्प लडाना ), गोष्ठी ( सभा ) और वादित्र ( ढोल, मृदङ्ग आदि बजाना ) नहीं करना चाहिये । माला, छाता, जूता, स्वर्ण और पुराने वस्त्र, दूसरे व्यक्ति के धारण किये हुए नहीं पहनना चाहिये । ब्राह्मण, अग्नि और गौ को जूठे हाथ से नहीं छूना चाहिये ॥ १०१ ॥
भवन्ति चात्र-यस्मिन् यस्मिन्नृतौ ये ये दोपाः कुप्यन्ति देहिनाम् ।
तेषु तेषु प्रदातव्या रसास्ते ते विजानता ॥ १०२ ॥
ऋतुभेद से पीने योग्य रसों का निर्देश - जैसे कि मनुष्यों के जो जो दोप जिम जिस ऋतु में प्रकुपित होते हैं, उनमें तदनुकूल रसों का सेवन बुद्धिमान् वैद्य को कराना चाहिए ॥
वर्षासु न पिवेत्तोयं पिवेच्छरदि मात्रया ।
वर्पासु चतुरो मासान् मात्रावदुदकं पिवेत् ॥ १०३ ॥
वर्षा और शरद् ऋतु में थोडा जल ( न पिबेत् ईपत् । पिवेदित्यर्थः ) पीना चाहिए । वर्षा के चार मास ( आपाढ़,
पृष्ठ 532
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रध्यायः २४ ] चिकित्सास्थानम् १०५ श्रावण, भाद्र, आश्विन ) में मात्रापूर्वक ( मात्राशब्दोऽल्प-वचनः ) अर्थात् अल्प जल पीना चाहिए ॥ १०३ ॥
उष्णं मे वसन्ते च कामं ग्रीष्मे शीतलम् ।
हेमन्ते च वसन्ते च सीध्वरिष्टौ पिवेन्नरः ॥ १०४ ॥
हेमन्त और वसन्त ऋतुओं में उष्ण तथा ग्रीष्म ऋतु में पर्याप्त शीतल जल पीना चाहिए । हेमन्त और वसन्त ऋतुओं में मनुष्यों को सीधु तथा अरिष्ट पान करना चाहिये ॥
भृतशीतं पयो ग्रीष्मे प्रावृट्काले रसं पिवेत् ।
यूषं वर्षति, तस्यान्ते प्रपिवेंच्छीतलं जलम् ॥ १०५ ॥
ग्रीष्म ऋतु में उष्ण जल शीतल करके तथा प्रावृट्काल में मांसरस पीना चाहिये । वर्षा ऋतु में यूष तथा उसके अन्त में शीतल जल पीना चाहिए ॥ १०५ ॥
स्वस्थ एवमतोऽन्यस्तु दोषाहारगतानुगः ।
स्नेहं सैन्धवचूर्णेन पिप्पलीभिश्च संयुतम् ॥ १०६ ॥
पिवेदग्निविवृद्धयर्थं न च वेगान् विधारयेत् ।
अग्निदीप्तिकरं नृणां रोगाणां शमनं प्रति ॥ १०७ ॥
प्रावृट् शरद्वसन्तेषु सम्यक् स्नेहादिमाचरेत् ॥
स्वस्थ मनुष्य को उपर्युक्त विधि से तथा अस्वस्थ को दोष और आहार के अनुसार जलपान करना चाहिये । अग्नि की वृद्धि करने के लिए सेन्धानमक तथा पिप्पल का चूर्ण मिलाकर स्नेहपान करना चाहिये और मल - मूत्रादि के वेगों का धारण नहीं करना चाहिये । मनुष्यों की अग्नि वृद्धि तथा रोगों का शमन करने के लिए प्रावृद्, शरद और वसन्त ऋतुओं में भली भाँति स्नेहपान कराना चाहिए ॥ कफे प्रच्छर्दनं पित्ते विरेको बस्तिरीरणे ॥ १०८ ॥
शस्यते त्रिष्वपि सदा व्यायामो दोषनाशनः ।
भुक्तं विरुद्धमप्यन्नं व्यायामान्न प्रदुष्यति ॥ १०६ ॥
त्रिदोष के शमन में व्यायाम का महत्व कफ में वमन, पित्त में विरेचन और वायु में वस्ति तथा तीनों दोपों के शमन के लिए दोषनाशक व्यायाम का सेवन, सदा हितकर होता
है । व्यायाम करने से खाया हुआ विरुद्ध अन्न भी दूषित नहीं ।
होता अर्थात् उसका भी पाचन हो जाता है ॥ १०८ - १० ९ ॥
उत्सर्गमैथुनाहारशोधने स्यात्तु तन्मनाः ।
नेच्छेद्दोपचयात् प्राज्ञः पीडां वा कायमानसीम् ॥
मल - मूत्र के त्याग, मैथुन, भोजन और शोधन ( वमन-विरेचन ) काल में, उसी में दत्त - चित्त रहना चाहिए । बुद्धिमान् मनुष्य को दोप - संचय के भय मात्र से ही, शरीर और मन को पीडित नहीं करना चाहिए ॥ ११० ॥
अतिस्त्रीसंप्रयोगाच्च रक्षेदात्मानमात्मवान् ।
शूलकासज्वरश्वासका पाण्ड्वामयक्षयाः ॥ १११ ॥
अतिव्यवायाज्जायन्ते रोगाश्चाक्षेपकादयः । अधिक मैथुन के दोप —— पंयमी मनुष्य को अधिक स्त्री. प्रसङ्ग से बचना चाहिये । शूल, कास, ज्वर, श्वास, दुर्बलता, पाण्डुरोग, क्षय और आक्षेपक आदि व्याधियाँ, अधिक मैथुन से उत्पन्न होती है ॥ १११ ॥
१४ सु ० चि ० आयुष्मन्तो मन्दजरा वपुर्वर्णबलान्विताः । ११२ ॥ स्थिरोपचितमांसाश्च भवन्ति स्त्रीषु संयताः । ' स्त्री प्रसङ्ग में संयमी पुरुष, आयुष्मान्, देर में वुढे होने वाले, शरीर शोभा, वर्ण और वल से युक्त तथा कठिन और स्थिर मांसपेशियों वाले होते है ॥ ११२ ॥
त्रिभिस्त्रिभिरहोभिर्वा समीयात् प्रमदां नरः ॥ ११३ ॥
सर्वेष्वृतुषु धर्मेषु पक्षात् पक्षाद् व्रजेद् बुधः । सभी ऋतुओं में तीन - तीन दिन के अन्तर पर तथा ग्रीष्म ऋतु में पन्द्रह दिन के अन्तर से बुद्धिमान् को स्त्री - संभोग करना चाहिये ॥ ११३ ॥
रजस्वलामकामां च मलिनामप्रियां तथा ॥ ११४ ॥
वर्णवृद्धां वयोवृद्धां तथा व्याधिप्रपीडिताम् ।
हीनाङ्गीं गर्भिणीं द्वेष्यां योनिदोपसमन्विताम् ॥ ११५ ॥
सगोत्रां गुरुपत्नीं च तथा प्रव्रजितामपि ।
सन्ध्यापर्वस्वगम्यां च नोपेयात् प्रमदां नरः ॥ ११६ ॥
रजस्वला, मैथुन से अनिच्छा वाली, मलिन, अप्रिय, | ऊँचे वर्ण की, वयोवृद्ध, रोग से पीड़ित, अङ्गहीन, गर्भवती, द्वेष रखने वाली, योनि रोग से युक्त, समान गोत्र वाली, गुरुपत्नी, संन्यासिनी, तथा अगम्या ( मैथुन के अयोग्य पुत्री, सास आदि ) खियों के साथ एवं संध्याकाल और पर्व के दिन मनुष्य को सम्भोग नहीं करना चाहिये ॥११४ - ११६ ॥
गोसर्गे चार्धरात्रे च तथा मध्यदिनेषु च ।
लज्जासमावहे देशे विवृतेऽशुद्ध एव च ॥ ११७ ॥
क्षुवितो व्याधितश्चैव क्षुधचित्तश्च मानवः । • वातविण्मूत्रवेगी व पिपासुरतिदुर्बलः ॥ ११८ ॥
तिर्यग्योनावयोनौ च प्राप्तशुकविधारणम् ।
दुष्टयोनौ विसर्ग तु बलवानपि वर्जयेत् ॥ ११६ ॥
प्रात काल, अर्द्धरात्रि और मध्याह्न में तथा लज्जा अनुभव होने वाले खुले हुए और अशुद्ध स्थान में, एव भूखे, रोगी, दुखी, वायु, मल और मूत्र के वेग से युक्त प्यासे और अत्यन्त दुर्बल मनुष्य को, स्त्री प्रसग नहीं करना चाहिये । तिर्यग्योनि ( पशुयोनि ) एवं अयोनि ( मुख आदि ) में मैथुन तथा शुक्रवेग का धारण ( रोकना ) नहीं करना चाहिये । वलवान् व्यक्ति को भी, दूपित योनि में शुक्र त्याग नहीं करना चाहिये ॥ ११७- ११ ९ ॥
रेतसचातिमात्रं तु मूर्धावरणमेव च ।
स्थितावुत्तानशयने विशेपेणैव गर्हितम् ॥ १२० ॥
कीडायामपि मेवावी हितार्थी परिवर्जयेत् । शुक्र का अत्यधिक त्याग और शिश्नमुण्ड का आवरण करना ( रगडना या खोली चढ़ाना ) तथा सढे होकर एवं चित्त लेटकर शुक्र त्याग करना विशेष निन्दनीय है । बुद्धिमान् और अपना हित चाहने वाले व्यक्ति को खेल में भी शुक्र-त्याग नहीं करना चाहिये ॥ १२० ॥
रजस्वलां प्राप्तवतो नरस्यानियतात्मनः ॥ १२१ ॥
दृष्टयायुस्तेजसां हानिरधर्मश्च ततो भवेत् । असयमी पुरुष को रजस्वला खी के साथ संभोग करने
पृष्ठ 533
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०६ सुश्रुतसंहिता पर, उसकी दृष्टि, आयु और तेज को हानि तथा अधर्म की प्राप्ति होती है ॥ १२१ ॥
लिङ्गिनीं गुरुपत्नीं च सगोत्रामथ पर्वसु ॥ १२२ ॥
वृद्धां च सन्ध्ययोश्चापि गच्छतो जीवितक्षयः । संन्यासिनी, गुरुपत्नी, समान गोत्र वाली और वृद्धा स्त्री के साथ तथा पर्व और संन्ध्याकाल में सम्भोग करने से जीवन का क्षय होता है ॥। १२२ ॥ गर्भिण्या गर्भपीडा स्याद् व्याधितायां बलक्षयः ॥
हीना मलिनां द्वेष्यां कामं बन्ध्यामसंवृते ।
देहेऽशुद्धे च शुक्रस्य मनसश्च क्षयो भवेत् ॥ १२४ ॥
क्षुधितः क्षुधचित्तश्च मध्याह्ने नृपितोऽबलः ।
स्थितैश्व हानिं शुक्रस्य वायोः कोपं च विन्दति ॥
गर्भवती के साथ सभोग करने पर गर्भ को पोड़ा और रोगिणी के साथ चल का नाश होता है । हीन भनों वाली, मलिन, द्वेप रखने वाली, कामवासनारहित, ( ' कामवन्ध्याम् ' इति हाराणचन्द्रः ) खुले प्रदेश में तथा अशुद्ध दशरीर वाली स्त्री के साथ सम्भोग करने से, शुक्र का क्षय एवं मन में ग्लानि होती है । भूखे और दुसी, मध्याह्न काल में, प्यासे, निर्वल अवस्था मे तथा वैठकर सम्भोग करने से, शुक्र नाश एव वायु का प्रकोप होता है | १२३-१२५ ॥
अतिप्रसङ्गाद्भवति शोपः शुक्रक्षयावहः ।
व्याधितस्य रुजा प्लीहि मृत्युर्मूर्च्छा च जायते ॥
अधिक स्त्री प्रसन करने से शुक्रक्षयजन्य शोप की उत्पत्ति होती है । रोगी व्यक्ति के सम्भोग करने पर पीडा, प्लीहा वृद्धि मूर्च्छा एवं मृत्यु होती है ॥ १२६ ॥
प्रत्यूपस्यर्धरात्रे च वातपित्ते प्रकुप्यतः ।
तिर्यग्योनावयोनौ च दुष्टयोनौ तथैव च ॥ १२७ ॥
उपदंशस्तथा वायोः कोपः शुक्रस्य च क्षयः । प्रातःकाल और आधी रात में स्त्री - सम्भोग करने पर वायु तथा पित्त का प्रकोप होता है । तिर्यग्योनि ( पशुओं की योनि ), अयोनि ( मुख मैथुन आदि ) तथा दूषितयोनि मैं शुक्र त्याग करने से उपदंश रोग, वात प्रकोप और शुक्र का क्षय होता है ॥ १२७ ॥
उच्चारिते मूत्रिते च रेतसच विधारणे ॥ १२८ ॥
उत्ताने च भवेच्छीघ्रं शुक्राश्मर्यास्तु सभवः ।
सर्वं परिहरेत्तस्मादेतल्लोकद्वयेऽहितम् ॥ १२६ ॥
शुक्रं चोपस्थितं मोहान्न सन्धार्य कथचन । मलमूत्र के उपस्थित वेग के समय तथा चित्त लेटकर, शुक्र के वेग को रोकने से, शुक्राश्मरी की उत्पत्ति शीघ्र होती | इसलिये इहलोक तथा परलोक दोनों के लिए अहितकर, इन सभी कार्यों का परित्याग करना चाहिए तथा मोह ( अज्ञान ) के वशीभूत होकर, उपस्थित शुक्रवेग को कभी नहीं रोकना चाहिए ॥ १२८-१२९ ॥ वयोरूपगुणोपेतां तुल्यशीलां कुलान्विताम् ॥ १३० ॥
अभिकामोऽभिकामां तु हृष्टो हृष्टामलङ्कृताम् ।
सेवेत प्रमदां युक्तया वाजीकरणवृतिः ॥ १३१ ॥
वाजीकरण विधि के द्वारा शक्तिसम्पन्न, रति का इच्छुक और प्रसन्न मनुष्य को, आयु, रूप और गुण मे युक्त, समान स्वभाव वाली, गुणशीला, कामवासना सहित, प्रसन्न और अलङ्कारवती रमणी का सेवन, युक्तिपूर्वक करना चाहिये ॥
भक्ष्याः सशर्कराः क्षीरं ससितं रस एव च ।
स्नानं सव्यजनं स्वप्नो व्यवायान्ते हितानि तु ॥१३२ ॥
मैथुन के अन्त में, शर्करा मिश्रित भोजन, मिश्री मिला दूध और मांसरस तथा स्नान, पंखे से वायु सेवन एवं निद्रा लेना हितकर होता है ॥ १३२ ॥
मुखमात्रं समासेन सद्वृत्तस्यैतदीरितम् ।
आरोग्यमायुरर्थो वा नासद्भिः प्राप्यते नृभिः ॥ १३३ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थानेऽनागताबाध-चिकित्सितं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
सदवृत्त का उपसंहार - सद्वृत्त की इन प्रधान वार्ती का संक्षेप में कथन किया गया है । आचाररहित मनुष्य आयु, आरोग्य या धन नहीं प्राप्त कर सकते ॥ १३३ ॥
इत्यायुर्वेदतत्वसदी पिकाभापाटीकायां चतुर्विशोऽध्यायः ॥२४ ॥
पञ्चविंशतितमोऽध्यायः अथातो मिश्रकचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
मिक चिकित्सा का उपक्रम - इसके अनन्तर मिश्रक चिकित्सा विधि का वर्णन किया जा रहा है, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत प्रभृति शिष्यों से ) कहा ॥ १-२ ॥
पाल्यामयास्तु विस्राच्या इत्युक्तं प्रानिबोध तान् ।
परिपोटस्तथोत्पात उन्मन्थो दुखवर्धनः ॥ ३ ॥
पञ्चमः परिलेही च कर्णपाल्या गदा स्मृताः । कर्णपाली के रोगों की सख्या तथा नाम - कर्णपाली के रोग विस्रावण के योग्य होते है, यह पहले कहा जा चुका है, उनका वर्णन सुनो । कर्णपाली - रोग पाँच प्रकार के होते हैं-( १ ) परिपोट ( २ ) उत्पात ( ३ ) उन्मन्थ ( ४ ) दुःख वर्धन और ( ५ ) परिलेही ॥ ३ ॥
सौकुमार्याच्चिरोत्सृष्टे सहसाऽभिप्रवर्धिते ॥ ४ ॥
कर्णशोको भवेत् पाल्यां सरुजः परिपोटवान् ।
कृष्णारुणनिभः स्तब्धः स वातात् परिपोटक. ॥५ ॥
परिपोट के लक्षण - सुकुमारता के कारण बहुत दिनों से छोडे हुए, कान की लोर ( कर्णपाली ) के छिद्रों को सहसा बढ़ाने से, कर्णपाली में पीडा तथा परिपोटयुक्त ( कुछ फटा हुआ ) शोथ हो जाता है, उसे परिपोट कहते है । वायु के द्वारा उत्पन्न यह परिपोट काला, लाल और स्तब्ध ( जकढा हुआ ) होता है ॥ ४-६ ॥
गुर्वाभरणसंयोगात्ताडनाद्धर्पणादपि ।
शोफ पाल्यां भवेच्छयावो दाहपाकरुगन्वितः ॥६ ॥
पृष्ठ 534
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०५ सुश्रुतसंहिता
लोपाकानूपमज्जानं वसां तैलं नवं घृतम् ।
पचेदशगुणं क्षीरमावाप्य मधुरं गणम् ॥ २५ ॥
अपामार्गावगन्धे च तथा लाक्षारस शुभम् ।
तत्सिद्धं परिपूतं च स्वनुगुप्तं निधापयेत् ॥ २६ ॥
तेनाभ्यञ्जयात् सदा पालीं सुस्विन्नामतिमर्दिताम् ।
एतेन पाल्यो वर्धन्ते निरुजो निरुपद्रवाः ॥
मृव्यः पुष्टाः समाः स्निग्धा जायन्ते भूपणक्षमाः ॥ २७ ॥
कर्णपालीवर्धन तेल -- शृंगाल ( या लोमडी ) और आनूप जीवों की मजा, वसा, तैल एव नवीन घृत को दशगुने दूध के द्वारा काकोल्यादि गण के द्रव्य, अपामार्ग, अश्वगन्ध और लाक्षारस प्रक्षेप के साथ पकाना चाहिये तथा पाक सिद्ध होने पर, छान कर सुरक्षित स्थान में रखना चाहिए । भली भाँति स्वेदित और मर्दित वर्णपाली में सदा इससे अभ्यंग करना चाहिए । इसके प्रयोग से वेदना और उपद्रव के विना पालियाँ बढ़ती है तथा कोमल, पुष्ट, सम, स्निग्ध एवं आभूषण धारण करने योग्य होती है ॥ २५-२७ ॥ नीलीदल भृङ्गरजोऽर्जुनत्वकू पिण्डीतकं कृष्णमयोरजश्च । वीजोद्भव साहचरं च पुष्प पध्याक्षघात्रीसहितं विचूर्ण्य ॥ २८ ॥
एकीकृतं सर्वमिद प्रमाय पङ्केन तुल्यं नलिनीभवेन । संयोज्य पक्ष कलशे निधाय लौहे घटे सद्मनि सापिधाने ॥ २६ ॥
अनेन तैलं विपचेद्विमिश्र रसेन भृङ्गत्रिफलाभवेन । आसन्नपाके च परीक्षणार्थ पत्रं बलाकाभवमाक्षिपेच ॥ ३० ॥
भवेद्यदा सङ्क्रमराङ्गनील
तदा विपक्कं विनिधाय पात्रे ।
कृष्णायसे मासमवस्थितं त-दभ्यङ्गयोगात् पलितानि हन्यात् ॥ ३१ ॥ ।
पलित रोग में नीली तेल - नीलीडल ( नील का पत्ता ), मंगरैया, अर्जुन की छाल, मैनफल, कृष्ण लोहचूर्ण, विजयसार और सहचर के फूल तथा हरड बहेडा आवले का एक साथ चूर्ण बनाकर, तौल लिया जावे और इसके समान कमल की जड का कीचड़ मिलाकर, लोहे के ढक्कन युक्त घडे में, पन्द्रह दिन घर के अन्दर रखा जावे । पन्द्रह दिन के पश्चात् उसमें तेल मिलाकर, भृगराज और त्रिफला स्वरस के द्वारा, पाक किया जावे । पाक सिद्धि की परीक्षा के डिए - बगुला का पंख बैंल में छोड़ना चाहिए, जब वह पख भैरि के समान नील वर्ण का ( काला ) हो जाय, तब तेल को पका हुआ समझ कर, काले लोह के पात्र में एक मास तक रखना चाहिए । इस तेल के मर्दन से पलित रोग नष्ट होता है ॥ २८-३१ ॥ सैरीयजम्ब्वर्जुनकाश्मरीजं पुष्पं तिलान्मार्कचूतवीजे । पुनर्नवे कर्दमकण्टकार्यो कासीसपिण्डीत कधीजसारम् ॥ ३२ ॥
फलत्रयं लोहरजोऽञ्जनं च agni नीरजसारिवे च । पिष्ट्वाऽथ सर्व सह मोदयन्त्या साराम्भसा वीजकसंभवेन ॥ ३३ ॥
साराम्भसा सप्तभिरेव पश्चात
प्रस्थैः समालोड्य दशाहगुप्तम् ।
लौहे सुपात्रे विनिधाय तैल-मनोद्भवं तच्च पचेत् प्रयत्नात् ॥ ३४ ॥
पकं च लहेऽभिनवे निय नस्यं विदध्यात् परिशुद्ध कायः । अभ्यद्योगैश्च नियुज्यमानं भुञ्जीत मापान् कुशरामथो वा ॥ ३५ ॥
मासोपरिष्टाद्धनकुञ्चितामाः
केशा भवन्ति भ्रमराखनाभाः ।
केशास्तथाऽन्ये खलतौ भवेयु-जरा न चैन सहसाऽभ्युपैति ॥ ३६ ॥
वलं परं सभवतीन्द्रियाणां भवेच्च वक्त्रं वलिभिर्विमुक्तम् । नाकामिनेऽर्थिनि नाकृताय नैवारये तैलमिदं प्रदेयम् ॥ ३७ ॥
केश को काला करने के लिए सैरीयकादि तैल - सैरीय ( कटसरैया ), जामुन, अर्जुन और गम्भारी के फूल, तिल, मंगरैया, आम की गुठली, श्वेत पुनर्नवा, रक्त ' पुनर्नवा, कमल के जड की कीचड़, बडी कटेरी, छोटी कटेरी, कासीस, मैनफल, विजयमार, त्रिफला, टोहचूर्ण, रसाञ्जन, मुलेठी, नीलकमल, सारिवा और मल्लिका को विजयसार के क्वाथ से पीसकर, सात प्रस्थ विजयसार के क्वाथ में घोलना चाहिए और लोहपात्र में रखकर, दस दिन सुरक्षित स्थान में रखना. चाहिए । फिर इसमें बहेडे का तेल मिलाकर यत्र पूर्वक पाक 6 " करके सिद्ध तैल को नवीन लोह पात्र में रखना चाहिये । वमन विरेचनादि मे शुद्ध शरीर वाले रोगी को, इस तैल का नस्य और मर्दन करना चाहिए तथा इस अवधि में उडद या खिचडी खानी चाहिए । एक माम तक इसका सेवन करने से केश घने, घुंघराले तथा भौरे और अजन के समान काले हो जाते हैं । इसका सेवन करने वाले व्यक्तिको पलित ( वालों का असमय सफेद होना ) और खलित ( खल्वाट ) रोग नहीं होते तथा वृद्धावस्था शीघ्र आक्रमण नहीं करती । इन्द्रियाँ शक्ति - सम्पन्न बनती हैं एवं मुख की झुर्रियाँ मिट जाती हैं । अनिच्छुक, आवश्यकता रहित, कृतघ्न तथा शत्रु को यह तैल । नहीं देना चाहिए ॥ ३२-३७ ॥ लाक्षा रोधं द्वे हरिद्रे शिलाले कुष्ठ नागं गैरिका वर्णकाञ्च ।
पृष्ठ 535
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्यायः २६ } चिकित्सास्थानम् १०६ मञ्जिष्टोमा स्यात् सुराष्ट्रोद्भवा च पत्तनं वै रोचना चाञ्जनं च ॥ ३८ ॥
हेमाङ्गत्वक् पाण्डुपत्रं वटस्य कालीयं स्यात् पद्मकं पद्ममध्यम् । रक्तं श्वेतं चन्दनं पारदं च काकोल्यादिः क्षीरपिष्टश्च वर्गः ॥ ३६ ॥
मेदो मज्जा सिक्थकं गोघृतं च दुग्धं काथः क्षीरिणां च द्रुमाणाम् । एतत् सर्वं पक्कमैकध्यतरतु वक्त्राय सर्पिक्तं प्रधानम् ॥ ४० ॥
हन्याद् व्यङ्गं नीलिकां चातिवृद्धां वक्त्रे जाताः स्फोटिकाश्चापि काश्चित् । पद्माकरं निर्वलीकं च वक्त्रं कुर्यादेतत् पीनगण्डं मनोन्नम् ॥ ४१ ॥
राज्ञामेतद्योषितां चापि नित्यं कुर्याद्वैद्यस्तत्समानां नृणां च । कुष्टनं वै सर्पिरेतत् प्रधानं येषां पादे सन्ति वैपादिका ॥ ४२ ॥ ।
सुख पर मर्दन करने के लिये घृत - लाख, लोध्र, हल्दी, दारूहल्दी, मैनशिल, हरिताल, कूल, नागकेशर, गेरु, वर्णक ( कवीला ), मजीठ, चच, सौराष्ट्री मिट्टी, पतंग, गोरोचन, स्रोताञ्जन, अमलतास की छाल, वरगढ के पके पत्ते, पीत चन्दन, पद्माख, कमलगट्टा, लालचन्दन, श्वेतचन्दन, पारद, दूध में पिसे हुए काकोल्यादिगण के द्रव्य, मेद, मजा, मोम, और गोघृत को गोदुग्ध तथा क्षीरीवृक्षों काथ के द्वारा पकाना चाहिए । मुख में मालिश करने के लिए यह घृत उत्तम होता है । इसके सेवन से व्यग, बहुत बढ़ी हुई नीलिका, तथा मुख में निकले हुए किसी प्रकार के फफोले नष्ट होते । मुख कमल के समान, झुर्री रहित भरा हुआ तथा सुन्दर हो जाता है । राजा, स्त्री तथा इनके समान अन्य पुरुषों के लिये इस घृत का प्रयोग वैद्य को नित्य कराना
चाहिए । यह घृत कुष्टनाशक एवं विपादिका से पीडित ।
व्यक्तियों के लिए हितकर होता है ॥ ३८-४२ ॥
हरीतकीचूर्णमरिष्टपत्रं चूतत्वचं दाडिमपुष्पवृन्तम् । पत्रं च दद्यान्मदयन्तिकाया लेपोऽङ्गरागो नरदेवयोग्यः ॥ ४३ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने मिश्रकचिकित्सितं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
राजाओं के योग्य अङ्गराग- हरीतकी चूर्ण, नीम पत्ते, आम की छाल, अनार की कली और मेहदी के पत्ते के द्वारा बनाया गया अंगराग राजाओं के योग्य होता है ॥ ४३ ॥
इत्यायुर्वेदतत्त्वसंदीपिकाभापाटीकार्यां पञ्चविंशोऽध्यायः ॥२५ ॥
पविंशतितमोऽध्यायः अथातः क्षीणवलीयं वाजीकरणचिकित्सितं व्याख्यास्यामः यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
क्षीणवलंवालों के लिये वाजीकरण चिकित्सा का उपक्रम-इसके अनन्तर हीनशक्ति व्यक्तियों के लिए वाजीकरण चिकित्सा विधि का वर्णन किया जा रहा है, जैसाकि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत प्रभृति शिष्यों से ) कहा ॥ १-२ ॥
, कल्यस्योदग्रवयसो वाजीकरणसेविनः ।
सर्वे तुम्बहरहर्व्यवायो न निवारितः ॥ ३ ॥
स्थविराणां रिरंसूनां स्त्रीणां वाल्लभ्यमिच्छताम् ।
योपित्प्रसङ्गात् क्षीणानां क्लीचानामल्परेतसाम् ॥ ४ ॥
विलासिनामर्थवतां रूपयौवनशालिनाम् ।
' नृणां च बहुभार्याणां योगा वाजीकरा हिताः ॥ ५ ॥
वाजीकरण के योग्य मनुष्य -- रोगरहित, तरुण और वाजीकरण द्रव्यों का सेवन करने वाले व्यक्तियों के लिए सभी ऋतुओं में प्रतिदिन मैथुन करना निषिद्ध नहीं है । वृद्ध, रमण की इच्छा वाले, स्त्रियों का प्रिय बनने की कामना वाले, अधिक स्त्री संभोग से क्षीण, नपुसक, अल्पशुक्रयुक्त, बिलासी, धनवान, रूप - यौवनसम्पन्न तथा अनेक पलियों चाले मनुष्यों के लिए, बाजीकरण योग हितकर होते हैं ॥ ३-५ ॥ विमर्श. 1. - – कल्यस्य रोगरहितस्य । उदग्रवयसस्तरुणस्य । रिरंसु • रन्तुमिच्छुः । चाजीकरण - ' वाज शुक्र तदस्यास्तीति वाजी, अवाजी वाजी क्रियतेऽनेनेति वाजीकरणम् ' । वाज शुक्र का पर्यायवाचक शब्द है । जिस व्यक्ति के शरीर में शुक्र विद्यमान रहता है । वह बाजी अर्थात् वीर्यवान् कहलाता है । यदि इस प्रकार का व्यक्ति चिन्ता, भय आदि कारणों से शुक्ररहित हो जाय तो उसे भवाजी संज्ञा प्राप्त होगी । पुन ' जिस क्रिया विशेष द्वारा वह व्यक्ति वाजी अर्थात् वीर्यवान् बनाया जाता है । उसे । वाजीकरण कहते हैं । अथवा - ' वाजी अन्यस्तद्वत् नारीषु मैथुनस्य सामर्थ्यं वीर्यवृद्धिश्व येन क्रियाविशेषेण जायते तद्वाजीकरणम् ' । जैसा कि चरक ने लिखा है- ' येन नागपु मामर्थ्य बाहि नरः । येन वाऽप्यधिक वीर्य वाजीकरणभेव नन् ' ॥ हारीतसहिता में वाज शब्द से मैथुन का ग्रहण किया गया है - ' बाजो नाम प्रका-शत्वात्तच्च मैथुन सचिनन् । वाजीकरणसचामि पुस्त्वमेव प्रचश्चते ' ॥ वाजीकरण पदार्थों का सेवन मनुष्य को धर्म, अर्थ, प्रीति तथा यश प्रदान करता है । महर्षि चरक ने वाजीकरण की | प्रशंसा इन शब्दों में की है । ' वाजीकरणमन्विच्छेत् पुरुषो नित्य-मात्मवान् । तदायन्तौ हि धर्मार्थौ प्रानिश्च यज्ञ एव च ॥ पुत्रस्यायननं तद् गुणाश्चने सुनाया ।
सेवमानो यदौचित्याद्वाजीवात्यर्थवेगवान् ।
नारीस्तर्पयते तेन वाजीकरणमुच्यते ॥ ६ ॥
भोजनानि विचित्राणि पानानि विविधानि च ।
वाचः श्रोत्रानुगामिन्यस्त्वचः स्पर्शसुखास्तथा ॥ ७ ॥
यामिनी सेन्दुतिलका कामिनी नवयौवना । गीतं श्रोत्रमनोहारि ताम्बूलं मदिराः स्रज्ञः ।
पृष्ठ 536
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
११० सुश्रुतसहिता गन्धा मनोज्ञा रूपाणि चित्राण्युपवनानि च ॥ मनसश्चाप्रतीघातो वाजीकुर्वन्ति मानवम् ॥ ८ ॥
वाञ्जीकरण की निरुक्ति - जिस वस्तु का विधिपूर्वक सेवन कर मनुष्य घोडे के समान अत्यन्त वेगवान वन कर खियों को सन्तुष्ट करता है, उसे वाजीकरण कहते हैं । नाना प्रकार के भोजन, भांति भाति के पेय पदार्थ, कर्णप्रिय वाणी, स्पर्श - सुखदायक त्वचार्ये, चन्द्रमा से सुशोभित रात्रि, नवयौ बना रमणी, कान तथा मन को आकर्षित करने वाले गीत, पान, मदिरा, पुप्पमाला, मनोहर गन्ध, सुन्दर स्वरूप, उपवन और मानसिक प्रसन्नता, मानव को वाजी ( वीर्यवान् ) बनाती है ॥ ६ - ९ ॥
तैस्तैर्भावैरद्यैस्तु रिरंसोर्मनमि ते ।
द्वेष्यत्रीमंप्रयोगाच क्लैव्यं तन्मानसं स्मृतम् ॥ ६ ॥
मानसिक कीचना के लक्षण - रमण की इच्छा वाले व्यक्ति के मन में ( भय, अविश्वास, स्त्री - दोपदर्शन आदि ) अप्रिय भावों के कारण, आघात लगने तथा शत्रुता रखने वाली स्त्री के मंप्रयोग ( अभिचार ) से जो नपुंसकता होती है, उसे मानसिक छोवता कहते हैं ॥ ९ ॥
कटुकाम्लोष्णलवणैरतिमात्रोपसेवितैः 1 सौम्यधातुक्षयो दृष्ट ' क्लैव्यं तढपरं स्मृतम् ॥ १० ॥
कटु, अम्ल, उष्ण और लवण रस का अधिक सेवन करने मौम्यधातु ( शुक्र ) के क्षय के कारण जो नपुंसकता होती है, वह दूसरी कीवता है ॥ १० ॥
अतिव्यवायशीलो यो न च वाजीक्रियारतः ।
ध्वजभङ्गमवाप्नोति तच्छुकहेतुकम् ॥ ११ ॥
अत्यधिक मैथुन - रत जो व्यक्ति वाजीकरण पदार्थों का
सेवन नहीं करता, उमे शुक्रक्षय के कारण ध्वजभङ्ग की प्राप्ति ।
होती है ॥ ११ ॥
महता मेढ़रोगेण मर्मच्छेदेन वा पुनः ।
क्लैव्यमेतच्चतुर्थं स्यान्नृणां पुंस्त्वोपघातजम् ॥ १२ ॥
ears मेटू रोग ( शिन रोग ) या शुक्रवाही नाड़ी के
कद्र जाने मे मनुष्यों को पुंस्वनाशक चौथी कीवता होती है ।
जन्मप्रभृति य क्लीच ' क्लैव्यं तन सहजं स्मृतम् ॥ १३ ॥
बलिन ' क्षुमनसो निरोधाद् ब्रह्मचर्यतः ।
पष्टं क्लैव्यं मतं तत् खरशुक्रनिमित्तनम् ॥ १४ ॥
जन्मकाल मे जो नपुंक्ता होती है वह महज ( जन्म जात ) क्लीवता कहलाती है । चञ्चलचित्त वलवान मनुष्य ब्रह्मचर्य में जब शुक्र - वेग को रोकता है तो छठी नपुंसकता होती है, यह अवस्था शुक्र के खर ( कठिन ) हो नाने से होती है ॥ १३ ॥
असाव्यं सहज क्लैव्यं मर्मच्छेदाच्च यद्भवेत् ।
साम्यानामितरेषां तु कार्यो हेतुविपर्ययः ॥ १५॥
सहज और मर्मच्छेदजन्य क्लीवता असाध्य होती है । अन्य माध्य क्लीव रोगों में हेतु विपरीत ( व्याधि - उत्पादक कारण के विरुद्ध ) चिकिम्मा करनी चाहिए ॥ ११-१५ ॥
निजीकरो यस्तु तं प्रवच्याम्यतः परम् ।
विलमापविदारीणा शालीनां चूर्णमेव वा ॥ १६ ॥
पौण्ड्रकेक्षुरसैरार्द्र मर्दितं सैन्धवान्वितम् ।
वराहमेदसा युक्तां घृतेनोत्कारिकां पचेत् ॥
तां भक्षयित्वा पुरुषो गच्छेत्तु प्रमदाशतम् ॥ १७ ॥
वाजीकरण उत्कारिका ( लप्सी ) - इसके आगे वाजी. करण विधि का वर्णन किया जाता है । तिल, उडद, विदारीकन्द या शालि धान्य के चूर्ण को पौण्डे और गन्ने के रस से गीला कर गंढना चाहिए तथा सेंधा नमक और सूअर की मेद मिलाकर घी के द्वारा उत्कारिका ( लप्सी ) पकानी चाहिए । इसको खांकर पुरुष सौ स्त्रियों के साथ संभोग कर सकता है ॥ १६-१७ ॥ वस्ताण्डसिद्धे पयसि भावितानसकृत्तिलान् ॥ १८ ॥
शिशुमारव सापकाः शष्कुल्यस्तैस्तिलै ' कृताः ।
य ' खादेत् स पुमान् गच्छेत् स्त्रीणां शतमपूर्ववन् ॥१६ ॥
वाजीकरण शष्कुली ( पूरी ) - बकरे के अण्डकोप के | साथ सिद्ध किए गए ( पकाये गए ) दूध से अनेक बार भावना | दिए गए तिल तथा मगर की चर्बी में पकी हुई इन तिलों को | शष्कुली ( पूरी ) को खाने वाला पुरुष, सौ स्त्रियों के साथ अपूर्व रूप से सभोग कर सकता है ॥ १८-१९ ॥
पिप्पलीलवणोपेते वस्ताण्डे क्षीरसर्पिपि ।
साधिते भक्षयेद्यस्तु स गच्छेत् प्रमदाशतम् ॥ २० ॥
वाजीकरण वस्ताण्ड ( बकरे का अण्डकोप ) योग -पिपल और सेन्धा नमक युक्त बकरे का अण्डकोप, दूध से निकले हुए घी ( मक्खन ) के द्वारा पका कर, जो व्यक्ति खाता है, वह सौ स्त्रियों के साथ रमण कर सकता है ॥ २० ॥
पिप्पलीमापशालीनां यवगोधूमयोस्तथा ।
चूर्ण भागैः समैस्तैस्तु घृते पूपलिकां पचेत् ॥ २१ ॥
तां भक्षयित्वा पीत्वा तु शर्करामधुरं पयः ।
नरश्चटकवगच्छेद्दशवारान्निरन्तरम् ॥ २२ ॥
चाजीकरण पूपलिका ( पूरी ) - पिप्पल, उडद, शालिधान्य, जी और गेहूं का समान भाग में चूर्ण बना कर ( पीसकर ) घी के द्वारा पूरी बनाई जावे । इनको खाकर तथा शर्करायुक्त दूध पीकर मनुष्य चटक पक्षी की भांति निरन्तर दश वार
रमण कर सकता है ॥। २१-२२ ॥
विदार्या. सुकृतं चूर्णं स्वरसेनैव भावितम् ।
सर्पिर्मधुयुतं लीढवा दश स्त्रीरधिगच्छति ॥ २३ ॥
वाजीकरण विदारीकन्द योग - विदारीकन्द के भली भाति बने हुए चूर्ण में विदारीकन्द - स्वरस की भावना ढेकर घी और मधु के साथ चाटने से मनुष्य दश स्त्रियों के साथ सभोग कर सकता है ॥ २३ ॥
एवमामलकं चूर्णं स्वरसेनैव भावितम् ।
शर्करामधुसर्पिर्भिर्युक्तं लीवा पय पिवेत ॥
एतेनाशीतिवर्षोऽपि युवेव परिहृष्यति ॥ २४ ॥
वाजीकरण आमलक योग-- इसी प्रकार आवले के स्वरस में भावित आँवले का चूर्ण, चीनी, मधु और घी के साथ चाट कर दूध पीना चाहिए । इसके सेवन से अस्सी वर्ष का वृद्ध । व्यक्ति भी युवक की भांति कामातुर होता है ॥ २४ ॥।
पृष्ठ 537
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रध्यायः २६ ] चिकित्सास्थानम् १११
पिप्पलीलवणोपेते वस्ताण्डे घृतसाधिते ।
शिशुमारस्य वा खादेत्ते तु वाजीकरे भृशम् ॥
कुलीरकूर्मनत्राणामण्डान्येवं तु भक्षयेत् ॥ २५ ॥
बाजीकरण अण्ड योग - पिप्पल और सेंधा नमक के साथ, वी में पकाये गए बकरे का अण्डकोष या शिशुमार के अपदे : का सेवन करना चाहिए । ये दोनों अत्यधिक वाजीकरण हैं । कुलीन ( केकड़ा ) कर्म ( कछुआ ) और नक्र ( घड़ियाल ) केस का सेवन भी इसी प्रकार करना चाहिए ॥ २५ ॥
महिभवस्तानां पिवेच्छुकाणि वा नरः ॥ २६ ॥
वाजीकरण महिपादिशुक्र योग -अथवा महिप ( भैंसा ), ऋषभ ( बैल ) और घस्त ( रा ) का शुक्र मनुष्य को पीना चाहिए ॥ २६ ॥
अश्वत्थफलमूलत्वक्छुङ्गसिद्धं पयो नरः ।
पीत्वा सशर्कराक्ष कुलिङ्ग इव हृप्यति ॥ २७ ॥
बाजीकरण श्रश्वत्य योग-- पीपल के फल, मूल, छाल और कोमल पत्ते के द्वारा सिद्ध किए गए चीनी और मधु मिश्रित दूब को पी कर मनुष्य कठिन पक्षी की भांति कामवासना युक्त होता है ॥ २७ ॥
विदारिमूलककं तु तेन पयसा नरः ।
उदुम्बरसमं पीत्वा वृद्धोऽपि तरुणायते ॥ २८ ॥
वाजीकरण विदारीमूल योग - विदारीकन्द का क्क्क गूलर के फल की मात्रा में टप्ण दूध साथ पीकर वृद्ध व्यक्ति भी युवा हो जाता है ॥ २८ ॥
भाषाणां पलमेकं तु संयुक्तं क्षौद्रसर्पिषा ।
अलि पयः पीत्वा तेन वाजी भवेन्नरः ॥ २६ ॥
वाजीकरण माप योग - मधु - वृत युक्त एक पल उडद खा कर और दूध पीकर मनुष्य वीर्यवान् बनता है ॥ २ ९ ॥ क्षीरपक्कस्तु गोधूमानात्मगुप्ताफलैः सह । शीतान् घृतयुतान् खादेत्ततः पश्चात् पय ' पिवेन ३० वाजीकरण गौधूमादि योग— कौच के बीज के साथ गेहूं को दूध में पकाकर गीतल होने पर घृन मिला कर खाना चाहिए और उपर से दूध पीना चाहिए ॥ ३० ॥
नकमूधिकमण्डूकचटकाण्डकृतं घृतम् ॥ ३१ ॥
पादाभ्यङ्गेन कुरुते बल भूमिं तु न स्पृशेत् ।
यावत् स्पृशति नोभूमिं तावद्रच्छेन्निरन्तरम् ॥ ३२ ॥
वाजीकरण पादाभ्यङ्ग योग - घडियाल, चूहा, मेदक और चटक पनी के के द्वारा पकाए गये घी की मालिश पैरों में करने से acce होता है । इसका अभ्यङ्ग र भूमि पर पैर नहीं रखना चाहिए । जब तक मनुष्य पैरों मे भूमि का स्पर्श नहीं करता तब तक निरन्तर स्त्री संभोग कर सकता है ॥ ३१-३२ ॥
स्वयंगुमेक्षुरकयोः फलचूर्ण सशर्करम् ।
थारोष्णेन नरः पीत्वा पयसा न क्षयं व्रजेत् ॥ ३३ ॥
बाजीकरण स्त्रयंगुष्ठादि योग - कौंच के बीज और ताल मखाना के चूर्ण में शर्करा मिला कर धारोष्ण दूध के साथ सेवन करने से मनुष्य का शुक्रश्चय नहीं होता है ॥ ३३ ॥
उच्चटा चूर्णमप्येवं क्षीरेणोत्तममिष्यते 1
शतावर्युचटाचूणं पेयमेवं बलार्थिना ।
स्त्रयंगुप्राफलैर्युक्तं मापसूपं पिवेन्नरः ॥ ३४ ॥
वाजीकरण कतिपय योग- इसी प्रकार उच्चटा ( श्वेतदुर्वा रिकाया श्वेनगुञ्जा ) का चूर्ण धारोष्ण दूध के साथ सेवन करना । उत्तम होता है । वल चाहने वाले व्यक्ति ने शतावर और उच्चटा की जड़ हमी प्रकार ( उपर्युक्त विधि ) पीनी चाहिए । कौंच के फलों से युक्त उडद का सूप ( ग्रुप ) मनुष्य को पीना चाहिए ॥ ३४ ॥
गुमाफलं गोक्षुरकाच बीजं तथो sri गोपयसा विपाच्य । खजाहृतं शर्करया च युक्तं पीत्वा नरो हृप्यति सर्वररात्रम् ॥ ३५ ॥
कौंच के बीज, गोखरू और उच्चडा के बीज को दूध के साथ कॉच मे वोट कर पकाया जावें । इसमें शर्करा मिलाकर दूध के साथ सेवन करने से मनुष्य सम्पूर्ण रात्रि कामातुर रहता है ॥ ३५ ॥
मापान् विदारीमपि सोचटांच क्षीरे गवां घृतोपपन्नाम् । पीत्वा नरः शर्करया सुयुक्तां कुलिङ्गववृष्यति सर्वरात्रम् ॥ ३६ ॥
विदारीकन्द्र और बीज को गो के दूध में पका कर, मधु, घृत और डार्क के साथ सेवन करने पर मनुष्य कुलित पक्ष की भांति रात्रि - पर्यन्त कामवासनायुक्त बना रहता है ॥ ३६ ॥
गृष्टीनां वृद्धवत्सानां मापपर्णभृतां गवाम् ।
यत् क्षीरं तत् प्रशंसन्ति बलकामेषु जन्तुषु ॥ ३७ ॥
वाजीकरण क्षीर योग- प्रथम बार व्यायी हुई, बडे बडे वाली और उड़द के पत्ते खाने वाली गौ का दूध, बल चाहने । वाले व्यक्तियों के लिए श्रेष्ठ होता है ॥ ३७ ॥
। क्षीरमां सगणाः सर्वे काकोल्यादिश्च पूजित ।
वाजीकरणहेतोर्हि तस्मात्तत्तु प्रयोजयेत् ॥ ३८ ॥
सभी प्रकार के दूब, सभी प्रकार के मांस और वाकोल्या -| द्विगण, वाजीकरण होने के कारण श्रेष्ठ होते हैं, क्षत ' इनका सेवन करना चाहिए ॥ ३८ ॥
एते वाजीकरा योगाः प्रीत्यपत्यवलप्रदाः ।
सेव्या विशुद्धोपचितदेहैः कालाद्यपेक्षया ॥ ३६ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने क्षीणवलीयवाजी-करणचिकित्सितं नाम पड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
वाजीकरण योगों के फल - ये वाजीकरण योग, मानसिक प्रसन्नता, सन्तान और बल प्रदान करने वाले है, इनका सेवन | वमन विरेचनादि से शुद्ध शरीर वाले व्यक्ति को काल आदि की अपेक्षा से अर्थात् ऋतु का विचार करने करना चाहिए ॥ इत्यायुर्वेदतत्त्वसंदीपिकाभापाव्याग्यायां पद्विशोऽध्यायः ॥
पृष्ठ 538
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
११२ सुश्रुतसंहिता सप्तविंशतितमोऽध्यायः अथातः सर्वोपघातशमनीयं रसायनं व्याख्यास्यामः ॥१ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
सर्वोपघात शमनीय रसायन का उपक्रम - इसके अनन्तर सभी बाधाओं को शमन करने वाली रसायन विधि का वर्णन । किया जा रहा है, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत प्रमृति शिष्यों से ) कहा ॥ १-२ ॥
पूर्वे वयसि मध्ये वा मनुष्यस्य रसायनम् ।
प्रयुञ्जीत भिपक् प्राज्ञः स्निग्धशुद्धतनोः सदा ॥ ३ ॥
नाविशुद्धशरीरस्य युक्तो रासायनो विधिः ।
न भाति वाससि किटे रङ्गयोग इवाहितः ॥ ४ ॥
रसायन के योग्य अवस्था तथा मनुष्य - युवा अथवा मध्यावस्था में, स्निग्ध और शुद्ध शरीर वाले मनुष्य को रसायन का सेवन बुद्धिमान् वैद्य सदा करावे । जिस मनुष्य के शरीर की शुद्धि ( वमन, विरेचनादि क्रियाओं के द्वारा ) न की गई हो उसके लिए रसायन सेवन करना उचित नहीं है । जिस प्रकार मलिन वन्त्र पर रंग सुशोभित नहीं होता उसी प्रकार अशुद्ध शरीर चाले व्यक्ति के उपर रसायन सेवन का प्रभाव नहीं पडता ॥ ३-२ ॥ विमर्शः - औषधियाँ दो प्रकार की होती हैं - ' स्वस्थस्यो । स्कर किद्वित्किािर्त्तस्य गेगनुत् ' । ( चरक ) अर्थात् कुछ औषधियाँ स्वस्थ मनुष्यों के वल और ओज को बढ़ाती है । तथा दूसरी रोगी व्यक्तियों के रोग को दूर करती है । इनमें प्रथम, स्वस्थ मनुष्यों के बल और लोज को बढ़ाने वाले द्रव्य रसायन कहलाते है, जैसा कि चरक ने लिखा है - ' स्वस्थस्यो स्कर यच तद ' वृष्यं तद्रमाननम् ं । रसायन इव्यों का सेवन मनुष्य को बुढ़ापा और व्याधि से बचाता है । वह दो प्रकार का होता है । ( 1 ) कुटी प्रावेशिक और ( २ ) वातात पिक । रसायन के पुन तीन भेद किए जा सकते है । ( १ ) काम्य-बल, बुद्धि आदि को बढ़ाने की कामना से सेवन किए जाने वाले दृश्य काम्य रसायन की श्रेणी में आते है ( २ ) नैमित्तिक —— क्रिमी व्यावि विशेष को नष्ट करने के निमित्त शिलाजत, भट्टानक आदि का सेवन नैमित्तिक रसायन कहलाता है । ( ३ ) आजत्रिक- दूध, घृत का निरन्तर सेवन आजत्रिक रसायन है । रसायन द्वन्य रस- रक्तादि सातों धातुओं को पुष्ट कर मनुष्य - शरीर में ओज की वृद्धि करते हैं । रसायन सेवन के पूर्व वमन विरेचन आदि के द्वारा मनुष्य को शरीर की शुद्धिकर लेनी चाहिए अन्यथा रसायन सेवन का पूरा फल प्राप्त नहीं होता ।
शरीरस्योपधाता ये दोपजा मानसास्तथा ।
उपदिष्टाः प्रदेशेषु तेषां वच्यामि वारणम् ॥ ५ ॥
चानादि शारीरिक तथा रज और तम मानसिक दोषों के द्वारा उत्पन्न होने वाले शारीरिक विकारों को, जिनका उल्लेख यथास्थान किया गया है, दूर करने का उपाय बतलाया जाता है ॥ ५ ॥
शीतोदकं पयः क्षत्रं सर्पिरित्येकशो द्विशः ।
त्रिश समस्तमथवा प्राकू पीतं स्थापयद्वय ॥ ६ ॥
शीतल जल, दुग्ध, मधु और घृत का योग - शीतल जल, दूध, मधु और घृत पृथक पृथक, दो दो, तीन - तीन अथवा चारों, एक साथ सर्व प्रथम प्रातः काल पीने से आयु स्थापित होती है ॥ ६ ॥
तत्र विडङ्गतण्डुलचूर्णमाहृत्य यष्टीमधुकमधुयुक्तं यथाबल शीततोयेनोपयुञ्जीत शीततोयं चानुपिवेदेवम-हरहर्मासं, तदेव मधुयुक्त भल्लातकक्कायेन वा, मधुद्रा-क्षाक्काययुक्तं त्रा, मध्यामलकरसाभ्यां वा, गुडूचीकान वा, एवमेते पञ्च प्रयोगा भवन्ति; जीर्णे मुद्रामलक • यूपेणालवणेनाल्पस्नेहेन घृतवन्तमोदनमश्नीयात्; एने खल्वसि क्षपयन्ति कृमीनुपन्नन्ति, ग्रहणधार-णशक्ति जनयन्ति, मासे मासे च प्रयोगे वर्षशतं वर्षशतमायुपोऽभिवृद्धिर्भवति ॥ ७ ॥
रसायन विडंग तण्डुल योग - विडंग के चावलों ( विडंग की भूमी हटाकर चावलों के समान बनाए गए ) के चूर्ण में सुलेठी का चूर्णं तथा मधु मिलाकर शक्ति के अनुसार, शीतल जल के द्वारा सेवन करना चाहिए और इसके पीछे शीतल पीना चाहिए । इस प्रकार प्रतिदिन एक मास तक करना । चाहिए । अथवा उपर्युक्त विडग तण्डुलों को भिलावे के क्वाथ के साथ या मधुयुक्त मुनक्के के काथ के साथ या मधुमिश्रित आँवले के रम में या गुडूची क्वाथ से पीना चाहिए । इस प्रकार ये पाँच प्रयोग होते है । औपधि का पाचन होने पर लवणरहित, अरुप स्नेहयुक्त मूंग और आंवले के यूप के साथ घृत मिला हुआ भात खाना चाहिए । इन योगों का सेवन करने से नशों का नाश होता है, कृमि मरते हैं तथा समझने । और स्मरण रखने की शक्ति उत्पन्न होती है । इनका एक एक मास प्रयोग करने से, आयु में सौ - सौ वर्ष की वृद्धि होती है ॥ विडङ्गतण्डुलानां द्रोण पिष्टपचने पिष्टवदुपस्वेद्य विगतकपाय स्त्रिन्नमवतार्य पदि पिष्टमायसे ढे कुम्भे मधूढकोत्तरं प्रावृपि भस्मराशावन्तर्गृहे चतुरो मासान्निध्यात्, वर्षाविगमे चोदूधृत्योपसंस्कृतशरीर. सहस्रसंपाताभिहुत कृत्वा प्रातः प्रातर्यथाबलमुपयुञ्जीत, | जीर्णे मुद्रामलक्यूपेणालवणेन घृतवन्तमोदनमश्नीयात्, पांशुशय्यायां शयीत, तस्य मासादूर्ध्वं सर्वाङ्गेभ्यः कृमयो निष्क्रामन्ति तानयुतैलेनाभ्य तस्य वंशविदले-नापहरेन्, द्वितीये पिपीलिकास्तृतीये यूकास्तथैवा-पहरेत्, चतुर्थे दन्तनखरोमाण्यवशीर्यन्ते, पञ्चमे प्रशस्तगुणलक्षणानि जायन्ते, अमानुषं चादित्यप्रकाशं चपुरधिगच्छति, दूराच्छ्रवणानि दर्शनानि चास्य भवन्ति, रजस्तमसी चापोह्य सत्त्वमधितिष्ठति, श्रुत-निगाद्यपूर्वोत्पादी गजबलोऽश्वजवः पुनर्युवाऽष्टौ वर्ष-| शतान्यायुरवाप्नोति, तस्याणुतैलमभ्यङ्गार्थे, अजकर्ण-| कपायमुत्सादनार्थे, सोशीर कूपोदकं स्नानार्थे, चढ्न-सुपलेपनार्थे, भल्लातकविधानवदाहार परिहारम् || ६ || द्वितीय विडंग तण्डुल योग - एक द्रोण विडंग - तण्डुलों . ( तुपरहित विडंग ) को तृणनिर्मित ( टोकरी ) कडाही में रखकर,
पृष्ठ 539
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रध्यायः २७ ] चिकित्सास्थानम् ११३ पिट्टे बनाने के लिए उवाले जाने वाले पदार्थों की भांति स्वेदन करना चाहिए । फिर काथ रहित ( जलीयांशरहित ) उबले हुये उन तण्डुलों को अग्नि से उतारकर पत्थर की सिल पर पीसना चाहिए और लोहे के मजबूत घड़े में पर्याप्त प्रमाण में मधु एवं जल के साथ बन्द करना चाहिये । उस पात्र को वर्षाऋतु में अन्दर के घर में, राख की ढेर में, चार मास रखना चाहिए । वर्षा के बीतने पर घड़े को निकालकर, वमन विरेचनादि से शरीर शुद्ध करके तथा एक सहस्र सम्पात मन्त्रों को आहुति ढेकर, प्रतिदिन प्रातःकाल शक्ति के अनुसार इस औषधि का सेवन करना चाहिये । औषधि का पाचन होने पर लवणरहित, अल्प स्नेहयुक्त मूंग तथा आँवले के यूप साथ ही मिला हुआ भात खाना चाहिए । धूलि की शय्या पर सोना चाहिए । एक मास के बाद इस औषधि का सेवन करने वाले व्यक्ति के सम्पूर्ण अंगों से कृमि निकलते हैं । इन कमियों को अणु तैल की मालिश किए हुए उस व्यक्ति के शरीर से बाँस की कपल के द्वारा निकालना चाहिए । इस प्रकार दूसरे मास में चींटियों को तथा तीसरे में जू को इसी विधि से निकालना चाहिए । चौथे मास में उस व्यक्ति के ढाँत, नख और रोम झड जाते हैं तथा पाँचवें में उत्तम गुण एवं लक्षण उत्पन्न होते है । उस व्यक्ति का शरीर अपूर्व श्रीयुक्त तथा सूर्य के समान तेजस्वी हो जाता है । उसे दूर के शब्दों को सुनने तथा दृश्यों को देखने की शक्ति प्राप्त हो जाती है । रज और तम को हटाकर सगुण स्थापित होता है । सुनी हुई वाणी को धारण करने तथा अपूर्व श्लोक रचना करने की शक्ति प्राप्त होती है । हाथी के समान बल और घोडे की तरह वेग होता है एवं वह व्यक्ति पुनः युवक वनकर आठ सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है उस व्यक्ति के अभ्यंग के लिये अणु तैल, उत्सादन ( उवटन ) के लिये अजकर्ण ( शालवृक्ष ) का क्वाथ ( कल्क ), स्नान के लिए खसयुक्त कूपजल और लेप लगाने के लिए चन्दन का प्रयोग करना चाहिये तथा भल्लातक - सेवन - विधान में बतलाये गए आहार एव परिहार नियम का पालन कराना चाहिये ॥ विमर्श: - पिष्ट पचने तृणादिकृतास्तारे कटाहे । आजकल वांस की बनी टोकरियां भी उपलब्ध होती हैं, तथा उनके द्वारा इस प्रकार के कार्य सम्पादित किए जाते है । पहले लोहे की कडाही में जल भर दिया जाता है और उसके ऊपर इन टोकरियों में जिन द्रव्यों का स्वेदन करना होता है उन्हें भर कर रखते हैं । इनमें रखे हुए पदार्थों का स्वेदन बाप्प के द्वारा होता है । सहनसम्पातामिहुतम् - सहस्रसम्पाताध्यायो ऋग्वेदे पठ्यते, तैमंन्त्रे, सहस्र हुत्वा उपयुञ्जीत । वंशविदलेन -वश-कलम्बिकया । अमानुषम् - अपूर्व श्रीयुक्तम् वपु. करोतीत्यर्थ. । अपूर्वो त्पादीति - अपूर्वंश्वोकादिकं करोतीत्यर्थं । कपायोऽत्र कल्क । सस्नेह -कल्केनोद्यर्पणमुत्सादनम् । आशिप इति गुणा । काश्मर्याणां निष्कुलीकृतानामेप एव कल्पः पांशु शय्याभोजनवर्जम्, अत्र हि पयसा तेन भोक्तयं, समानमन्यत् पूर्वेणाशिपश्च । शोणितपित्तनिमित्तेषु विकारेष्वेतेपामुपयोगः ॥ ६ ॥
गम्भारी का योग - धूलि की शय्या एवं तथा कथित आहार के निषेध पूर्वक गुठली रहित गम्भारी के फलों के १५ सु ० चि ० लिये भी यही विधि है तथा इसके सेवन काल में उष्ण दूध के साथ भोजन करना चाहिए । अन्य विधियां एक समान है तथा औषध सेवन का फल भी पूर्व औषध के । तुल्य है । इनका प्रयोग रक्त और पित्तजन्य व्याधियों में करना चाहिए ॥ ९ ॥
यथोक्तमागारं प्रविश्य बलामूलार्धपलं वा पय-साऽऽलोड्य पिवेत्, जीर्णे पयःसपिरोदन इत्याहारः, एवं द्वादशरात्रमुपयुष्य द्वादशवर्षाणि वयस्तिष्ठति; एवं दिवसशतमुपयुज्य वर्षशतं वयस्तिष्ठति । एवमेवा -| तिबलानागबलाविदारीशतावरीणामुपयोगः । विशेषत-| स्त्वतिबलामुदकेन, नागबलाचूर्ण मधुना, विदारीचूर्ण क्षीरेण, शतावरीमप्येवं पूर्वेणान्यत्समानमाशिपश्च समाः । एतास्त्वोषधयो बलकामानां शोपिणां रक्त-पित्तोपसृष्टानां शोणितं छर्दयतां विरिच्यमानानां । चोपदिश्यन्ते ॥ १० ॥
चला मूल ( खरेटी ) रसायनयोग- पूर्वोक्त प्रकार के गृह में प्रवेश कर खरेटी की जड आधापल या एक पल दूध में घोलकर पीना चाहिये तथा औषधि का पाचन । होने पर दूध, घी और भात खाना चाहिए । इस प्रकार बारह दिन प्रयोग करने से बारह वर्ष और सौ दिन प्रयोग करने से सौ वर्ष की आयु स्थिर रहती है । इसी प्रकार अतिबला, | नागवला, विदारीकन्द और शतावर का प्रयोग करना चाहिये । इनके सेवन में विशेषता इतनी है कि अतिबला जल साथ, नागवला चूर्ण मधु के साथ और विदारीकंद तथा शतावर चूर्ण का सेवन दूध के साथ करना चाहिये । औषध सेवन का फल तथा अन्य वातें पूर्ववत् है । | इन औषधियों का प्रयोग वल के इच्छुक, शोपरोगी, रक्तः | पित्त से ग्रसित, रक्तवमन करने वाले तथा विरेचन के योग्य व्यक्तियों के लिये करना चाहिये ॥ १० ॥
वाराहीमूलतुलाचूर्णं कृत्वा ततो मात्रां मधुयुक्तां पयसाऽऽलोड्य पिवेत्, जीर्णे पयः सर्पिरोदन इत्या-हारः, प्रतिषेधोऽत्र पूर्ववत्, प्रयोगमिममुपसेवमानो | वर्पशतमायुरवाप्नोति स्त्रीपु चाक्षयताम्, एतेनैव चूर्णेन । पयोऽवचूर्य शृतशीतमभिमथ्याज्यमुत्पाद्य मधुयुतमुप-| युञ्जीत सायं प्रातरेककालं वा, जीर्णे पयः सर्पिरोदन । इत्याहारः, एवं मासमुपयुज्य वर्षशतायुर्भवति ॥ ११ ॥
वराहीकन्द रसायन योग- वाराहीकन्द की जड का एक तुला चूर्ण बनाकर उसकी एक मात्रा ( एक पल ) मधु के साथ दूध में घोलकर पीना चाहिए । औषध का पाचन होने पर दूध, घी और भात खाना चाहिये । इसके प्रयोग में, । पूर्वोक्त वर्जित पदार्थों का त्याग करना चाहिये । इस योग को सेवन करने वाला व्यक्ति, सौ वर्ष की आयु तथा खी । संभोग में अक्षयता ( शुक्रक्षय का न होना ) प्राप्त करता है । उपर्युक्त चूर्ण के साथ दूध का पाक करके शीतल होने पर मथकर घी निकालना चाहिए । इसमें मधु मिलाकर प्रातः । और सायंकाल अथवा एक समय सेवन करना चाहिए ।
पृष्ठ 540
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
११४ सुश्रुतसहिता औषध का पाचन होने पर दूध, घी और भात खाना चाहिए । इस प्रकार एक मास सेवन करने से सौ वर्ष की आयु होती है ॥ ११ ॥
चक्षुः कामः प्राणकामो वा बीजकसाराग्निमन्थमूलं निष्क्काध्य माषप्रस्थं साधयेत्, तस्मिन् सिध्यति चित्रकमूलानामक्षमात्रं कल्कं दद्यादामलकरस चतुर्थ-भागं, ततः स्विन्नमवतार्य सहस्रसंपाताभिहुतं कृत्वा शीतीभूतं मधुसर्पिभ्य संसृज्योपयुञ्जीत यथाबलं, यथासात्म्यं च लवणं परिहरन् भक्षयेत् । जीर्णे मुद्रा-मलकरूपेणालवणेन घृतवन्तमोदनमश्नीयात् पयसा वा मासत्रयम्, एवमाभ्यां प्रयोगाभ्यां चक्षुः सौपर्णं भवत्यनल्पबलः स्त्रीषु चाक्षयो वर्षशतायुर्भवतीति ॥ विजयसार आदि रसायन योग - नेत्रों में ज्योति तथा चल की कामना वाले व्यक्ति को विजयसार और अरणी को जड़ का काथ करके उसके साथ एक प्रस्थ उडद का पाक करना चाहिये । उडद का पाक होते समय चित्रक की जब का कल्क एक कर्प और आँवले का रस चतुथांश ( उडद की अपेक्षा ) मिलाना चाहिये । जब उडद उचल जाय उसे अग्नि से उतार एक सहस्र संपात मन्त्रों के द्वारा आहुति देकर मधु और घृत के साथ शक्ति के अनुसार सेवन करना । चाहिए । जहां तक लवण छोडना सात्म्य रहे, उसका त्याग करते हुए भोजन करना चाहिये । औषध का पाचन होने पर । घीमिश्रित भात, लवणरहित मूंग और आँवले के यूप अथवा दूध के साथ तीन मास खाना चाहिये । इस प्रकार इन दोनों प्रयोगों के सेवन से नेत्र की ज्योति गरुड की भांति होती है, बल बढ़ता है, स्त्री संभोग में शुक्रक्षय नहीं होता तथा सौ वर्ष की आयु प्राप्त होती है ॥ १२ ॥
भवति चात्र-पयसा सह सिद्धानि नरः शणफलानि यः ।
भक्षयेत् पयसा सार्धं वयस्तस्य न शीर्यते ॥ १३ ॥ ।
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने सर्वोपघात-शमनीयं रसायन चिकित्सितं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ सन के फल का रसायन योग — जैसे कि -- दूध में पके हुए सन के फलों को जो मनुष्य दूध के साथ सेवन करता है, उसकी आयु नहीं गिरती, अर्थात् एक समान स्थिर रहती है उसमें परिवर्तन नहीं होता ॥ १३ ॥
इत्यायुर्वेदतत्वसदी पिकाभापाव्यास्यायां सप्तविंशति-तमोऽध्यायः ॥ २७ ॥
1 - * cebo-अष्टाविंशतितमोऽध्यायः अथातो मेघायुष्कामीयं रसायनचिकित्सितं व्याख्यास्याम । यथोवाच भगवान् धन्वन्तरि ॥१-२ ॥ । मेधायुष्कामीय रसायन चिकित्सा का उपक्रम - इसके अनन्तर बुद्धि और भायु प्रदान करने वाले रसायन चिकित्सा विधि का वर्णन किया जा रहा है, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ( सुश्रुत प्रभृति शिष्यों से ) कहा ॥ १-२ ॥ मेघायुष्कामः श्वेता वल्गुजफलान्यातपपरिशुष्का-ण्यादाय सूक्ष्मचूर्णानि कृत्वा गुडेन सहालोड्य स्नेह-कुम्भे सप्तरात्रं धान्यराशौ निदध्यात्, सप्तरात्रादुद्धृत्य हृतदोषस्य यथाबलं पिण्डं प्रयच्छेदनुदिते सूर्ये, उष्णोदकं चानुपिवेत्; भल्लातकविधानवच्चागारप्रवेशः, जीणौषधश्चापराले हिमाभिरद्भिः परिपक्तगात्रः | शालीनां षष्टिकाना च पयसा शर्करामधुरेणौदनमश्नी -यात्; एवं षण्मासानुपयुज्य विगतपाप्मा बलवर्णोपेतः श्रुतनिगादी स्मृतिमानरोगो वर्षशतायुर्भवति । कुष्ठिनं | पाण्डुरोगिणमुदरिणं वा कृष्णाया गोर्मूत्रेणालोड्या-| पलिकं पिण्डं विगतलौहित्ये सवितरि पाययेत्, | पराहे चालवणेनामलकयूपेण सर्पिष्मन्तमोदनम श्री -यात्; एवं मासमुपयुज्य स्मृतिमानरोगो वर्पशतायुर्भ-वति । एप एवोपयोगश्चित्रकमूलानां रजन्याश्च चित्रकमूले विशेपो द्विपलिक पिण्ड परं प्रमाण, शेषं पूर्ववत् ॥ ३ ॥
श्वेत वाकुची के बीजों का रसायन योग - बुद्धि और भायु की कामना वाला व्यक्ति धूप में सुखाये गए श्वेत वाकुची के वीजों का महीन चूर्ण बना कर, उसमें गुड मिलावे और घी के घड़े में सात दिन धान की ढेर में रखे । सात दिन के बाद घड़े को निकाल कर, वमन विरेचन के द्वारा शुद्ध शरीर वाला व्यक्ति शक्ति के अनुसार सूर्योदय से पूर्व औषध पिण्ड ( एक पल ) सेवन कर, ऊपर से उष्ण जल का पान करे । भल्लातक सेवन विधान की भाति गृह में प्रवेश करे । औषध का पाचन होने पर अपराह्न में शीतल जल से स्नान करके शाली और साठी के चावलों का शर्करा मिश्रित दूध के साथ भोजन करे । इस प्रकार ६ मास औषध सेवन करके रोगी पाप रहित होकर बल और वर्ण से युक्त सुनी हुई वाणी को धारण करने की शक्ति वाला, स्मृतिशाली, निरोग और सौ वर्ष की आयु वाला होता है । कुष्ठी, पाण्डुरोगी या उदर रोगी को काली बाकुची के बीजों का चूर्ण गोमूत्र में घोलकर आधे पल की मात्रा में उपाकाल में पिलाया जावे । अपराह में लवणरहित भाँवले के ग्रुप के साथ घी मिला हुआ भात रोगी भोजन करे । इस प्रकार एक मास औषध सेवन करके रोगी स्मृतिशाली निरोग और सौ वर्ष की आयु वाला होता है । यही उपयोग - विधान चित्रक की जड़ और हल्दी का है । चित्रकमूल के सेवन में विशेषता इतनी है कि इसकी उत्तम मात्रा २ पल होनी चाहिये अन्य वातें पूर्ववत् है ॥ ३ ॥
हृतदोप एव प्रतिसंसृष्टभक्तो यथाक्रममागार प्रविश्य मण्डूकपर्णीस्वरसमादाय सहस्रसम्पाताभिहुतं कृत्वा यथाबलं पयसाऽऽलोड्य पिवेत् पयोऽनुपानं वा, तस्यां जीर्णायां यवान्नं पयसोपयुञ्जीत, तिलैर्वा सह भक्षयेत्रीन् मासान् पयोऽनुपानं, जीर्णे पयः