श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 591–600

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 591–600

पृष्ठ 591

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श्रध्यायः ४० 3 चिकित्सास्थानम् १६५ स्रोतो मूलेऽङ्गुष्ठपरिणाहं धूमवर्तिप्रवेशस्रोतोऽङ्गुला । न्यष्टचत्वारिशत् प्रायोगिके, द्वात्रिंशत् स्नेहने, चतुर्वि । शतिर्वैरेचने, पोडशाङ्गुलं कासन्ने वामनीये च । एतेऽपि कोलास्थिमात्रच्छिद्रे भवतः । व्रणनेत्रमष्टाङ्गुलं व्रणधू-पनार्थं कलायपरिमण्डलं कुलत्थवाहिस्रोत इति ॥ ५ ॥

धूमनेत्र ( नलिका ) के साधन द्रव्य और घूमनेत्र के प्रमाण - वस्तिनेत्र के द्रव्यों से ( सुवर्ण, चांदी, रांगा, सीसा, तात्र, कांस्य आदि ) घूमनेत्र का निर्माण करना चाहिए । प्रायोगिक धूमनेत्र, कनिष्ठिका अंगुलि के समान मोटा, अग्र भाग में मटर के बराबर छिद्र वाला, मूल में भङ्गूठे के तुल्य शिष्टां प्रक्षिप्य पुनरपि धूमं पाययेदादोपविशुद्धेः; एप धूमपानोपायविधिः ॥ १० ॥

धूम विशेष से धूमपान में विशेष विधि- प्रायोगिक धूम सेवन के समय वैद्य को, सरकण्डे से निकाली हुई एवं वायु रहित प्रदेश तथा छाया में सुखाई गई धूमवर्ति को अंगार से जला कर और नेत्रमूलस्रोत में स्थापित करके, ' धूम खींचो ' ऐसा आतुर से कहना चाहिए । इसी प्रकार स्नैहिक तथा वैरेचनिक धूम में भी करना चाहिए । धूम और अगार से रहित, स्थिर एवं भलीभांति स्थापित शराव में धूमवर्ति को रख, उसे दूसरे शराव में, जिसके मूल में छि हो, दवा देना चाहिए और उस छिद्र में नेत्र मल जोडकर स्थूल तथा भड़तालीस भड्डुल लम्बे धूमवतिं प्रवेश योग्य । अन्य कासन्न और वामनीय धूर्मो का सेवन कराना चाहिए । स्रोत से युक्त होना चाहिए । स्नैहिक नेत्र वृत्तीस अङ्गुल, वैरेचनिक चौबीस अगुल तथा कासन और वामनीय सोलह अङ्गुल लम्बे होने चाहिए । इनमें भी छिद्र प्रमाण वैर की गुठली के समान रहना चाहिए । व्रण - धूपन के लिए व्रण नेत्र, आठ अङ्गुल लम्बा, मटर के समान मोटा तथा कुलथो के जाने योग्य छिद्र से युक्त होना चाहिए ॥ ५ ॥

अथ सुखोपविष्टः सुमना ऋन्वधोदृष्टिरतन्द्रितः स्नेहाक्तदीप्तायां वतिं नेत्रस्रोतसि प्रणिधाय धूमं पिवेत् ॥ ६ ॥

धूमपान की विधि - सुखपूर्वक बैठ कर, प्रसन्न चित्त से, शरीर को सीधा तथा दृष्टि को नीची करके, आलस्यरहित होकर, अग्रभाग में स्नेहलिप्त एव प्रज्वलित धूमवर्ति को नेत्र स्रोत में स्थापित कर धूमपान करना चाहिए ॥ ६ ॥

मुखेन तं पिवेत् पूर्वं नासिकाभ्यां ततः पिवेत् ।

मुखपीतं मुखेनैव वमेत् पीतं च नासया ॥ ७ ॥

धूमपान प्रथम सुख से फिर नासिका से करना चाहिए तथा मुख और नासिका के द्वारा पान किए गए धूम मुख से ही बाहर निकालना चाहिए ॥ ७ ॥

मुखेन धूममादाय नासिकाभ्यां न निर्हरेत् ।

तेन हि प्रतिलोमेन दृष्टिस्तत्र निहन्यते ॥ ८ ॥

मुख से धूमपान करके नासिका के द्वारा धूम बाहर नहीं निकालना चाहिए क्योंकि प्रतिलोम हुए उस धूम के कारण दृष्टिनाश हो जाता है ॥ ८ ॥

विशेषतस्तु प्रायोगिकं घ्राणेनाददीत स्नैहिक मुखनासाभ्यां, नासिकया वैरेचनिकं, मुखेनैवेतरो ॥६ ॥

प्रायोगिक धूम विशेष कर नासिका के द्वारा ग्रहण करना चाहिए, स्नैहिक मुख और नासिका दोनों के द्वारा, वैरेचनिक नामिका के द्वारा तथा अन्य दोनों कासन्न और वामनीय धूर्मो का सेवन मुख से ही करना चाहिए ॥ ९ ॥

तत्र प्रायोगिके वर्तिं व्यपगतशरकाण्डां निवातात-पशुष्कामङ्गारेष्ववदीप्य नेत्रमूलस्रोतसि प्रयुज्य धूममाह-रेति ब्रूयात्; एवं स्नेहनं वैरेचनिकं च कुर्यादिति । इतरयोर्व्यपेतधूमाङ्गारे स्थिरे समाहिते शरावे प्रक्षिप्य वर्ति मूलच्छिद्रेणान्येन शरावेण विधाय तस्मिन् छिद्रे नेत्रमूलं संयोज्य धूममासेवेत, प्रशान्ते धूमे वर्तिमव-धूम के शान्त होने पर अवशिष्ट वर्ति को पुनः शराव में रखकर दोष की शुद्धि पर्यन्त धूमपान कराना चाहिए । यह धूम पान करने की विधि है ॥ १० ॥

तत्र शोकश्रमभयामर्षौण्यविपरक्तपित्तमदमूर्च्छा-दाहपिपासापाण्डुरोगतालुशोपच्छर्दिशिरोऽभिघातोद्गा-रापतर्पिततिमिर प्रमेहोदराध्मानोवातार्ता बालवृद्ध-दुर्बलविरिक्तास्थापित जागरितगर्भिणीरूक्षक्षीणक्षतोर-स्कमधुघृतदधिदुग्धमत्स्यमद्ययवागूपीताल्पकफाश्च न धूममासेवेरन् ॥ ११ ॥

धूमपान के अयोग्य -- शोक, श्रम, भय, क्रोध, उष्ण, विप, रक्तपित्त, मद, मूर्च्छा, दाह, पिपासा, पाण्डुरोग, तालु-| शोप, छर्दि, शिरोभिघात, उद्गार, लंघन, तिमिर, प्रमेह, उदर, आध्मान और ऊर्ध्ववात से पीड़ित, बालक, वृद्ध, दुर्बल, विरेचन तथा निरूहण प्रयुक्त, रात्रि जागरण किए हुए, गर्भिणी, रुक्ष, क्षतक्षीण तथा उरःक्षत से ग्रसित, मधु, घृत | दही, दूध, मछली, मद्य और यवागू का पान किए हुए एवं अल्प कफ वाले मनुष्यों को धूम सेवन नहीं करना चाहिए ॥

अकालपीतः कुरुते भ्रमं मूर्च्छा शिरोरुजम् ।

घ्राणश्रोत्राक्षिजिह्वानामुपघातं च दारुणम् ॥ १२ ॥

अकाल में धूम पान करने से होने वाले व्यापद् -- अकाल में किया गया धूमपान भ्रम, मूर्च्छा, शिरपीड़ा तथा नासिका, कान, नेत्र और जिह्वा का भयानक व्यापद् नाश करता है ॥ आद्यास्तु त्रयो धूमा द्वादशसु कालेपूपादेयाः । तद्यथा- क्षुतद्न्त प्रक्षालननस्यस्नानभोजन दिवास्वप्न-मैथुनच्छर्दिमूत्रोच्चारहसितरुपितशस्त्रकर्मा । तत्र विभागो - मूत्रोच्चारक्षवथुहसितरुपित मैथुनान्तेषु स्नैहिकः, स्नानच्छर्दनदिवास्वप्नान्तेषु वैरेचनिकः, दन्तप्रक्षालनस्य, स्नानभोजनशस्त्रकर्मान्तेषु प्रायोगिक | इति ॥ १३ ॥

धूमपान के समय का निर्देश - प्रारम्भ के तीन धूर्मो | का सेवन बारह कालों मे करना चाहिए । जैसे: - छीक, दन्त-प्रक्षालन, नस्य, स्नान, भोजन, दिवास्वप्न, मैथुन, छर्दि, मूत्र-त्याग, हसना, क्रोध और शस्त्र कर्म के पश्चात् धूमसेवन करना चाहिए । यह विभाग इस प्रकार है- मन्त्रत्याग, छींक, । हंसना, क्रोध और मैथुन के अन्त में स्नैहिक । स्नान, छुर्दि

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१६६ सुश्रुतसंहिता और दिवास्वप्न के अन्त में वैरेचनिक तथा दन्तप्रक्षालन, । स्नान, भोजन एवं शस्त्र कर्म के अन्त में प्रायोगिक धूमपान का प्रयोग करना चाहिए ॥ १३ ॥

तत्र स्नैहिको वातं शमयति, स्नेहादुपलेपाश्च; वैरेचनः श्लेष्माणमुत्क्लेश्यापकर्षति, रौदयात्तदण्यादौ ष्ण्याद्वैशद्याच्च; प्रायोगिकः श्लेष्माणमुक्तेशयत्युत्कृिष्टं चापकर्षति शमयति वातं साधारणत्वात् पूर्वाभ्यामिति ॥ धूमों के प्रत्येक कार्य - स्नेह और उपलेप होने के कारण स्नैहिक धूम वायु का शमन करता है । रूक्ष, तीक्ष्ण, उष्ण और विशद होने के कारण वैरेचनिक धूम श्लेप्मा को उत्क्ले शित कर बाहर निकालता है । प्रायोगिक धूम साधारण अर्थात् पूर्वकथित स्नैहिक और वैरेचनिक धूमों के तुल्य होने के कारण श्लेप्मा को उत्क्लेशित करता है तथा उक्लेशित श्लेप्मा को बाहर निकालता है ॥ १४ ॥

भवति चात्र-नरो धूमोपयोगाश्च प्रसन्नेन्द्रियवाङ्मनाः ।

दृढकेशद्विजश्मश्रुः सुगन्धिविशदाननः ॥ १५ ॥

धूमपान के गुण - जैसे कि: - धूमसेवन से मनुष्य की इन्द्रियाँ, वाणी और मन प्रसन्न होता है । केश, दाँत, दाढ़ी और मछ के बाल हृढ़ होते हैं, तथा मुख सुगन्धित एव निर्मल हो जाता है ॥ १५ ॥

तथा कासश्वासारोचकास्योपलेपस्वरभेदमुखास्रा -वक्षवथुवमथुक्रथतन्द्रानिद्राहनुमन्यास्तम्भाः पीनसाशि-रोरोगकर्णाक्षिशूला वातकफनिमित्ताश्चास्य मुखरोगा न भवन्ति ॥ १६ ॥

इसके अतिरिक्त धूम सेवन करने वाले को कास, श्वास, अरोचक, मुख में लिपा सा मालूम पडना, स्वरभेद, मुख से लार बहना, छींक, चमन, अकस्मात् श्वासावरोध, तन्द्रा, निद्रा, हनुस्तम्भ, मन्यास्तम्भ, पीनस, शिरोरोग, कर्णशूल, नेत्रशूल तथा वात - कफजन्य मुख रोग नहीं होते ॥ १६ ॥

तस्य योगायोगातियोगा विज्ञातव्याः । तत्र योगो रोगप्रशमन ', अयोगो रोगाप्रशमनः, तालुगलशोपपरि-दाहपिपासामूर्च्छाश्रममदकर्णदवे उदृष्टिनासारोग दौर्ब-ल्यान्यतियोगो जनयति ॥ १७ ॥

धूम के योगातियोग के लक्षण -- धूमपान के योग, अयोग तथा अतियोग का भी ज्ञान करना चाहिए । रोग की शान्ति होना धूम का योग, रोग का शान्त न होना अयोग तथा तालुशोप, गलशोप, दाह, पिपासा, मूर्च्छा, भ्रम, मद, कानों में ध्वनि, दृष्टि रोग, नासा रोग और दुर्बलता का होना अतियोग कहलाता है ॥ १७ ॥

प्रायोगिकं त्रीस्त्रीनुच्छ्वासानाददीत मुखनासिकाभ्यां च पर्यायांस्त्रींश्चतुरो वेति, स्नैहिक यावदश्रुप्रवृत्तिः, वैरेचनिकमादोपदर्शनात्, तिलतण्डुलयवागूपीतेन पातव्यो वामनीयः, ग्रासान्तरेषु कासन्न इति ॥ १८ ॥

प्रायोगिक आदि धूमों के पीने की मर्यादा - मुख और नासिका से तीन तीन उच्छ्वास प्रायोगिक धूम का पान करना चाहिए तथा इस परिपाटी को तीन या चार बार ( दोष और व्यक्ति के बल के अनुसार ) दुहराना चाहिए । अश्रु निकलने तक स्नैहिक धूम एवं दोष अर्थात् विकृत कफ के आने तक वैरेचनिक धूम का सेवन करना चाहिए । तिल, और तण्डुल की यवागू पिलाकर वामनीय धूम पिलाना चाहिए तथा ग्रासों के मध्य में कासन्न धूम का प्रयोग करना चाहिए ॥ व्रणधूम शरावसंपुटोपनीतेन नेत्रेण व्रणमानयेत्, धूमपानाद्वेदनोपशमो व्रणवैशद्यमास्रावोपशमश्च भवति ॥ १६ ॥

व्रणधूपन की विधि - शराव - सम्पुट में चन्द व्रणधूम को, नेत्र के द्वारा व्रण में पहुँचाना चाहिए । व्रण - धूपन से वेदना की शान्ति, व्रण में निर्मलता तथा स्राव का शमन होता है ॥

विधिरेप समासेन धूमस्याभिहितो मया ।

नस्यस्यातः प्रवक्ष्यामि विधिं निरवशेषतः ॥ २० ॥

नस्य के लक्षण और उसके भेद - धूमपान विधि का मैंने संक्षिप्त वर्णन किया है, इसके अनन्तर नस्य विधि का विस्तृत वर्णन किया जा रहा है ॥ २० ॥

औपधमपधसिद्धो वा स्नेहो नासिकाभ्यां दीयत इति नस्यम् । तद् द्विविधम्- शिरोविरेचन, स्नेहन च । तदुद्विविधमपि पञ्चधा । तद्यथा - नस्यं, शिरोविरेचनं, प्रतिमर्शः, अवपीडः, प्रधमनं च । तेषु नस्यं प्रधानं शिरोविरेचनं च; नस्यविकल्पः प्रतिमर्शः, शिरोविरे-चनविकल्पोऽवपीडः प्रधमनं च; ततो नस्यशब्दः पञ्चधा नियमितः ॥ २१ ॥

नासिका छिद्रों के द्वारा औषध या औषधसिद्ध स्नेह के प्रयोग को नस्य कहते हैं । वह दो प्रकार का होता है - ( १ ) शिरोविरेचन और ( २ ) स्नेहन | ये द्विविध नस्य भी पाँच भागों में विभक्त है । जैसे- ( १ ) नस्य, ( २ ) शिरोविरेचन, ( ३ ) प्रतिमर्श, ( ४ ) अवपीड और ( ५ ) प्रधमन । इनमें नस्य और शिरोविरेचन प्रधान है । प्रतिमर्श नस्य का ही भेद है । अवपीड और प्रधमन शिरोविरेचन के भेद है । इस प्रकार नस्य शब्द वाचक पाँच प्रकारों का नियमपूर्वक प्रतिपादन किया गया है ॥ २१ ॥

विमर्श. - शिरोविरेचन द्रव्यैर्यो दीयते स शिरोविरेचन. । शृतशीतस्त्ररसादीनां पिश्चुनावपीडनादवपीढ ' । चूर्णस्य मुखेन नाडया वा प्रध्मापनात् प्रधमनम् । तत्र यः स्नेहनार्थ शून्यशिरसां श्रीवास्कन्धोरसां च बलजननार्थं दृष्टिप्रसादजननार्थं वा स्नेहो विधीयते तस्मिन् वैशेषिको नस्यशब्दः । तत्तु देय वाताभिभूते शिरसि दन्तकेशश्मश्रुप्रपातदारुणकर्णशूलकर्णदवेडति • मिरस्वरोपघातनासारोगास्यशोपावबाहुका कालजवली -पलितप्रादुर्भावदारुणप्रबोधेषु वातपैत्तिकेषु मुखरोगे-ध्वन्येषु च वातपित्तहरद्रव्यसिद्धेन स्नेहेनेति ॥ २२ ॥

स्नैहिक नस्य के प्रयोग का वर्णन - शून्य शिर, ग्रीवा, स्कन्ध और वक्षस्थल के स्नेहन एव शक्तिसञ्चय तथा नेत्रों को निर्मल करने के लिए जिस स्नेह का प्रयोग किया जाता

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श्रध्यायः ४० ] चिकित्सास्थानम् १६७ है उसमें नस्य शब्द विशेष अर्थ में प्रयुक्त होता है । इस स्नेह का प्रयोग, वातपित्तनाशक द्रव्यों से सिद्ध स्नेह ( सर्पिस्तैलवसामजा ) के द्वारा वात से पीड़ित शिरोरोग, दाँत - केश श्मधु ( दाढ़ी - मूंछ के बाल ) के गिरने, भयङ्कर कर्णशूल, कर्णवेड ( कानों में वेणुघोष के समान ध्वनि होना ), तिमिर, स्वरभेद, नासारोग, मुखशोप, अवबाहुक, अकाल वली - पलित की उत्पत्ति ( असमय में झुर्रियाँ पडना तथा बालों का सफेद होना ), भयानक वात पित्तजन्य व्याधियों के उदय, मुख रोग एवं अन्य विकारों में करना चाहिए ॥ २२ ॥

शिरोविरेचनं श्लेष्मणाऽभिव्याप्ततालुकण्ठशिरसा मरोचकशिरोगौरवशूलपीनसार्धाव भेद ककृमिप्रतिश्या -यापस्मारगन्धाज्ञानेष्वन्येषु चोर्ध्वजत्रुगतेषु कफजेषु विकारेषु शिरोविरेचनद्रव्यैस्तत्सिद्धेन वा स्नेहेनेति ॥ २३ ॥ ।

शिरोविरेचन के योग्य रोगी - शिरोविरेचन का प्रयोग श्लेप्मा से भरे हुए तालु, कण्ठ और शिर में, अरोचक, शिरोगौरव, शूल, पीनस, अर्धावभेदक, कृमि, प्रतिश्याय, अपस्मार, गन्धज्ञाननाश तथा अन्य ऊर्ध्वजत्रुगत कफज विकारों में, शिरोविरेश्वन द्रव्यों के द्वारा ( पिप्पली विडङ्ग शिग्रु सिद्धार्थ कापा मार्गप्रभृतीनि ) अथवा इनसे सिद्ध स्नेह से करना चाहिए ॥ २३ ॥

तत्रैतद् द्विविधमप्यभुक्तवतोऽन्नकाले, पूर्वाह्णे श्लेष्म । रोगिणां मध्याह्ने पित्तरोगिणाम्, अपराहे वातरोगिणाम् । स्नैहिक और वैरेचनिक नस्यों का काल - इन द्विविध ( स्नैहिक और वैरेचनिक ) नस्यों का प्रयोग, भोजन के समय बिना खाये हुए तथा श्लेष्मा के रोगियों के लिए पूर्वाद्ध में एवं पित्त के रोगियों के लिए मध्याह्न में और वातज रोगियों के लिए अपराह में करना चाहिए ॥ २४ ॥

अथ पुरुषाय शिरोविरेचनीयाय त्यक्तमूत्रपुरीषाय भुक्तवते व्यभ्रे काले दन्तकाष्ठधूमपानाभ्यां विशुद्धवक्त्र स्रोतसे पाणितापपरिस्विन्नमृदितगलकपोलललाटप्रदे शाय वातातपरजोहीने वेश्मन्युत्तानशायिने प्रसारित करचरणाय किञ्चित् प्रविलम्बितशिरसे वस्त्राच्छादित नेत्राय वामहस्तप्रदेशिन्यप्रोन्नामितनासाग्राय विशुद्धस्रो-तसि दक्षिणहस्तेन स्नेहमुष्णाम्बुना प्रतप्तं रजतसुवर्ण-ताम्रमणिमृत्पात्र शुक्तीनामन्यतमस्थं शुक्तया पिचुना | वा सुखोष्णं स्नेहमद्रुतमासिचेदव्यवच्छिन्नघारं यथा नेत्रे न प्राप्नोति ॥ २५ ॥

नस्यदान की विधि - वादलरहित स्वच्छ आकाश के समय शिरोविरेचन के योग्य, मल मूत्र का त्याग एव अल्प भोजन तथा दन्तधावन और धूम्रपान के द्वारा मुख । और स्रोतों को शुद्ध किए हुए, हथेली के ताप से स्वेदित, मृति गल, कपोल और ललाटप्रदेशवाले, वायु, धूप और धूलि से रहित गृह में उत्तान सोये हुए, हाथ पैर फैलाये हुए, शिर को कुछ नीचे झुकाये हुए, वस्त्र से नेत्रों को । ढँके हुए, बायें हाथ की प्रदेशिनी अगुलि से नासिका के प्रभाग को ऊपर उठाये हुए पुरुष के स्वच्छ नासारन्धों । | में उष्ण जल के द्वारा तपाये गए और रजत, स्वर्ण, ताम्र, मणि, मृत्तिकापात्र या शुक्ति में से किसी एक पात्र में रखे हुए सुखोष्ण स्नेह को, दाहिने हाथ से शुक्ति अथवा पिचु के द्वारा धीरे - धीरे एक धार से डाले, जिसमें वह नेत्रों में न पढ़े ॥ २५ ॥

स्नेहेऽवसिच्यमाने तु शिरो नैव प्रकम्पयेत् ।

न कुयेन प्रभापेच न क्षुयान्न हसेत्तथा ॥ २६ ॥

नासिकारन्धों में स्नेह सिञ्चन के समय आतुर को शिर नहीं हिलाना चाहिए, क्रोध नहीं करना चाहिए तथा बोलना, छींकना और हँसना नहीं चाहिए ॥ २६ ॥

एतैर्हि विहतः स्नेहो न सम्यक् प्रतिपद्यते ।

ततः कासप्रतिश्यायशिरोऽक्षिगद संभवः ॥ २७ ॥

क्योंकि इन अवस्थाओं में प्रयुक्त स्नेह भली - भाँति यथास्थान नहीं पहुँचता जिससे कास, प्रतिश्याय, शिरोरोग तथा नेत्ररोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ २७ ॥

तस्य प्रमाणमष्टौ विन्दवः प्रदेशिनीपर्वद्वयनिःसृताः प्रथमा मात्रा, द्वितीया शुक्तिः, तृतीया पाणिशुक्तिः, इत्येतास्तिस्रो मात्रा यथाबलं प्रयोज्याः ॥ २८ ॥

स्नैहिक नस्य का प्रमाण - एक - एक नासारन्ध्रों में छोडे जाने वाले स्नेह की मात्रा ' आठ विन्दु होती है । प्रदेशिनी अंगुलि के स्नेहसिक्त दो पोरों से टपके हुए बिन्दुओं की प्रथम मात्रा, शुक्ति ( ३२ बूँद ) दूसरी मात्रा और पाणिशुक्ति ( ६४ बूँद ) तीसरी मात्रा होती है । इन तीनों मात्राओं का प्रयोग बल के अनुसार करना चाहिए ॥ २८ ॥

स्नेहनस्य नोपगिलेत्कथंचिदपि बुद्धिमान् ॥ २६ ॥

शृङ्गाटकमभिप्लाव्य निरेति वदनाद्यथा ।

कफोत्क्लेशभयाच्चैनं निष्ठीवेदविधारयन् ॥३० ॥

स्नैहिक नस्य के पश्चात् कर्तव्य कर्म - बुद्धिमान व्यक्ति को स्नेह नस्य कभी भी निगलना नहीं चाहिए क्योंकि शृङ्गाटक मर्म को आप्लावित कर यह मुख द्वारा बाहर निकल जाता है । इसलिए कफोरक्लेश के भय से इसे मुख में धारण किए बिना थूक देना चाहिए ॥ २ ९ –३० ॥ विमर्श ' - नोपगिलेन्न पिवेत् । तथाहि विदेह: - निष्ठीवेन्न पिवेन्नस्यं व्यापद पिवतस्त्विमा | भवन्ति कासवछर्दिश्च कुत्माऽन्ने-वमथुस्तथा ' इति । क्वचिन्नस्यपानमप्युक्त विदेहेनैव - ' क्षीणं मांस बल यस्य वातार्त्तिश्चोर्ध्वजत्रुजा | सुदीप्ताझि स्नेहसात्म्य. स नरयं नासया पिवेत् । धातूंश्च तर्पयेद् देहे पीत नस्यन्तु नस्तत. ' इति । नासाकर्णस्रोतोऽक्षिजिह्वा तर्पणीनां शिराणा सन्निपातः शृङ्गाटक दत्ते च पुनरपि संस्वेद्य गलकपोलादीन् धूममा-सेवेत, भोजयेश्चैनमभिष्यन्दि, ततोऽस्याचारिकमादि-शेत्; रजोधूमस्नेहात पमद्यद्रव पान शिरः स्नाना तियान-क्रोधादीनि च परिहरेत् ॥ ३१ ॥

नस्य प्रयोग के अनन्तर पुनः आतुर के गला, कपोल आदि को सेंककर धूम्रपान कराना चाहिए और अभिप्यन्दि द्रव्य खिलाना चाहिए तथा उसे आचारविधि समझानी चाहिए । रोगी को, धूल, धूम्र, स्नेह, धूप, मध, द्रवपान,

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१६८ सुश्रुतसंहिता शिरःस्नान, अधिक सवारी करना तथा क्रोध आदि का त्याग स्रोतों में गुरुता तथा कफ का स्राव होना, ये लक्षण शिरोभाग करना चाहिए ॥ ३१ ॥ की हीन शुद्धि में होते हैं ॥ ३ ९ ॥

तस्य योगातियोगायोगानामिदं विज्ञानं भवति ॥ ३२ ॥

स्नैहिक नस्य के योग, अतियोग तथा अयोग के लक्षण-नस्य के योग, अतियोग और अयोग के लक्षण इस प्रकार होते हैं ॥ ३२ ॥

लाघवं शिरसो योगे सुखस्वप्नप्रबोधनम् ।

विकारोपशमः शुद्धिरिन्द्रियाणां मनःसुखम् ॥ ३३

नस्य के योग से शिर में लघुता, सुख से सोना और जागना, विकारों का शमन, इन्द्रियों की शुद्धि तथा मानसिक सुख शान्ति की प्राप्ति होती है ॥ ३३ ॥

कफप्रसेकः शिरसो गुरुतेन्द्रियविभ्रमः ।

लक्षणं मूर्त्यतिस्निग्धे रूक्षं तत्रावचारयेत् ॥ ३४ ॥

कफ का निकलना, शिर का भारीपन और इन्द्रियों की अशान्ति ये लक्षण शिरोभाग के भतिस्नेहन अर्थात् नस्य के अतियोग से उत्पन्न होते हैं । इसमें रूक्ष उपचार करना चाहिए ॥ ३४ ॥

अयोगे वातवैगुण्यमिन्द्रियाणां च रूक्षता ।

रोगाशान्तिश्च तत्रेष्टं भूयो नस्यं प्रयोजयेत् ॥ ३५ ॥

वातवैगुण्य, इन्द्रियों में रूक्षता और विकारों का शान्त न होना, ये लक्षण नस्य के अयोग से उत्पन्न होते हैं । इनमें पुन. नस्य प्रयोग करना चाहिए ॥ ३५ ॥

चत्वारो विन्दवः पड् वा तथाऽष्टौ वा यथाबलम् ।

शिरोविरेकस्नेहस्य प्रमाणमभिनिर्दिशेत् ॥ ३६ ॥

नस्य में शिरोविरेक स्नेह का प्रमाण - दोप और व्यक्ति के बल के अनुसार शिरोविरेचनीय नस्य की मात्रा - चार आठबूँद ( प्रतिनासारन्ध्र के लिए ) होती है ॥ ३६ ॥

विमर्श - विदेह ने इस मात्रा - क्रम का विधान अघो लिखित रूप में किया है- ' चतुरश्चतुरो विन्दुनेकैकस्मिन् समा चरेत् । एषा लध्वी मता मात्रा तथा शीघ्र विरेचयेत् । अध्यद्धी द्विगुणां वापि त्रिगुणां वा चतुर्गुणाम् । यथान्याथि विदित्वा तु मात्रां समवचारयेत् ॥ '

नस्ये श्रीण्युपदिष्टानि लक्षणानि प्रयोगतः ।

शुद्ध ( ड ) हीनातिसंज्ञानि विशेपाच्छ । त्रचिन्तकैः ॥ ३७ ॥

वैरेचनिक नस्य के योग, आयोग तथा अतियोग के लक्षण - शास्त्रज्ञ ( विदेह आदि ) ने विशेषकर प्रयोग की दृष्टि से नस्य के ( १ ) शुद्ध ( २ ) हीन और ( ३ ) अति नामक तीन लक्षण बनलाये है ॥ ३७ ॥

लाघवं शिरसः शुद्धि, स्रोतसां व्याधिनिर्जयः ।

चित्तेन्द्रियप्रसादश्च शिरसः शुद्धिलक्षणम् ॥ ३८ ॥

शिर में हलकापन, स्रोतों की स्वच्छता, व्याधि की शान्ति, मन और इन्द्रियों में प्रसन्नता तथा शिर की शुद्धि, ये नस्य के शुद्ध लक्षण हैं ॥ ३८ ॥

कण्हूपदेो गुरुता स्रोतसां कफसंस्रवः ।

मूर्ध्नि हीनविशुद्धे तु लक्षण परिकीर्तितम् ॥ ३६ ॥

कण्ड, उपदेह ( कुछ गीला पुता हुआ सा प्रतीत होना ),

मस्तुलुङ्गागमो वातवृद्धिरिन्द्रियविभ्रमः ।

शून्यता शिरसचापि मूर्ध्नि गाढविरेचिते ॥ ४० ॥

शिरोविरेचन के अतियोग में मस्तुलुङ्गः ( शिरोऽन्तर्धृता कारः ) का बाहर निकलना, वातवृद्धि, इन्द्रियों में विभ्रम तथा शिर की शून्यता आदि लक्षण होते हैं ॥ ४० ॥

हीनातिशुद्धे शिरसि कफवातन्नमाचरेत् ।

सम्यग्विशुद्धे शिरसि सर्पिर्नस्यं निपेचयेत् ॥ ११ ॥

शिर को हीन और अति शुद्धि होने पर कफ और वात-नाशक उपचार तथा सम्यक् शुद्धि होने पर घृत के नस्य का प्रयोग करना चाहिये ॥ ४१ ॥

( एकान्तर व्यन्तरं वा सप्ताहं वा पुनः पुनः ।

एकविंशतिरात्रं वा यावद्वा साधु मन्यते ॥ १२ ॥

एक दिन, दो दिन, सात दिन या इक्कीस दिन के अन्तर से अथवा जब तक चिकित्सक उचित समझे उसे बार बार नस्य प्रयोग करना चाहिये ॥ ४२ ॥

मारुतेनाभिभूतस्य वाऽत्यन्तं यस्य देहिनः ।

द्विकालं चापि दातव्यं नस्यं तस्य विजानता ) ॥ ४३ ॥

वायु के द्वारा अत्यधिक पीडित पुरुष के लिये विद्वान् वैद्य को दोनों समय नस्य प्रयोग करना चाहिये ॥ ४३ ॥

अवपीडस्तु शिरोविरेचनवद्भिष्यण्णसर्पदष्टवि सज्ञेभ्यो दद्याच्छिरोविरेचनद्रव्याणामन्यतममव पिण्या-वपीढ्य च, शर्करेक्षुरसक्षीरघृत मांसरसानामन्यतमं क्षीणानां शोणितपित्ते च विदध्यात् ॥ ४४ ॥

अवपीडनुस्य के योग्य पुरुष -- मेद और कफ से व्याप्त शिर ( अभिष्यन्नो मेद. कफाभिव्याप्तशिर ) तथा सर्पदश के द्वारा सज्ञारहित हुए पुरुषों के लिए, शिरोविरेचन द्रव्यों में से किसी एक द्रव्य को पीसकर अथवा दवाकर, शिरोविरेचन की भांति अवपीड ( नस्य ) का प्रयोग करना चाहिये । क्षीण पुरुषों तथा रक्तपित्त के रोगियों के लिये शर्करा, इक्षुरस, दूध, घृत और मांसरस में से किसी एक द्रव्य का प्रयोग करना चाहिये ॥ ४४ ॥

कृशदुर्बलभीरूणा सुकुमारस्य योषिताम् ।

शृताःस्नेहाः शिरःशुद्धचै कल्कस्तेभ्यो यथा हित ॥४५ ॥

कृश, दुर्बल, भीरु, सुकुमार और स्त्रियों की शिर - शुद्धि के | लिये ( शिरोविरेचनीय द्रव्यों के द्वारा ) सिद्ध स्नेह और इन द्रव्यों का कल्क हितकर होता है ॥ ४५ ॥

चेतोविकारकृमिविपाभिपन्नानां चूर्ण प्रधमेत् ॥ ४६ ॥

प्रधमन नस्य प्रयोग के विपय - चेतना को विकृति, कृमि तथा विष से पीडित पुरुषों के लिये शिरोविरेचनीय द्रव्यों का चूर्ण नासिकां में प्रधमन ( लॅकना ) करना चाहिये ॥ नस्येन परिहर्तव्यो भुक्तवान पतर्पितोऽत्यर्थतरुण-प्रतिश्यायी गर्भिणी पीतस्नेहोदकमद्यद्रवोऽजीर्णी दत्तवस्तिः क्रुद्धो गरार्तस्तृषितः शोकाभिभूतः श्रान्तो बालो वृद्धो वेगावरोवितः शिरः स्नातुकामश्चेति अना-र्तवे चाभ्रे नस्यधूमौ परिहरेत् ॥ ४७ ॥

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अध्यायः ८० 1 चिकित्सास्थानम् १६६ नम्य के अयोग्य पुरुष - भोजन किये हुये, टंधन से । युक्त, अत्यधिकनरुण, प्रतिश्याय पीड़ित, गर्भिगी, स्नेह - सट-मद्य तथा किसी इव पदार्थ का पान किये हुये, अजीर्णग्रस्त, बलि सेवन किये हुये, कुछ, गरविष से दुःखी, प्याले शोक • सुन्वष्ठ, श्रान्त, बालक, वृद्ध, मन्द - मृवादि के वेगों को रोके हुये, सिर में स्नान की अभिलाषा रखने वाले तथा रजोधर्म रहित न्त्री ( बुजम्बला की मी ) एवं मेवाच्छ आकाश के समय नस्य और धूम्रपान दोनों का परित्याग करना चाहिए ॥ । तत्र हीनातिमात्रा विशीतोष्णसहसा प्रदानाइति । प्रविलन्निशिरस उच्छितो त्रिचलतोऽभ्यवहरतो वा । प्रतिषिद्धप्रदानाच व्यापदो भवन्ति तृम्णोद्वाराइयो दोषनिमित्ताः श्रयजात्र ॥ ४८ ॥

नस्य के व्यापद्— दीनमात्रा में, अधिकमात्रा में, अन्यन्त शीतल, अधिक उष्ण, सहमा प्रयोग करने से, शिर को अधिक नीचा रखने से, छोंकने में, हिलने से, भोजन के समय तया । निषिद्ध अवस्था में नस्य का प्रयोग करने में, दोपोक्लेश

और दोषत्रयजन्य, तृष्णा, उद्वार आदि उपद्रवों की उत्पत्ति ।

होती है ॥ १८ ॥

भवतश्चात्र-नस्ये शिरोविरेके च व्यापदो द्विविधाः स्मृताः ।

दोषो केशान् अयाच्चैव विशेयास्ता यथाक्रमम् ॥ १६ ॥

नस्य ध्यापदों के दो प्रकार — जैसे किन्नस्य और शिरो विरेचन में, दोषों के टम्क्लेश तथा उनके चय से, दो प्रकार के उपद्रव उत्पन्न होते हैं । उन्हें क्रमानुसार अर्थात् नस्य के द्वारा दोपोरकेशज और शिरोविरेचन के द्वारा दोपचयज उपद्रवों की उत्पत्ति समझनी चाहिये ॥ ४ ९ ॥ दोषोत्क्लेशनिमित्तास्तु तयेच्छमनशोधनैः । अथ क्षयनिमित्तानु यथास्वं बृंहणं हितम् ॥ ४० ॥ ]

नस्यच्यापदों की चिकित्सा - डोपोक्लेशजन्य उपद्रवी का चार शमन और शोधन के द्वारा तथा चयजन्य विकारों का प्रतिकार उनके दोषों के अनुकूल बृंहण विधि मे करना चाहिये ॥ ५० ॥

प्रतिमर्शश्चतुर्दशसु कालेषूपादेयः तद्यथा - तल्पो । त्थितेन प्रचालितदन्तेन, गृहान्निर्गच्छता, व्यायाम । व्यवायाव्यपरिश्रान्तेन, मूत्रोचारकवलाञ्जनान्ते, भुक्तवता, छर्दितवता दिवास्वप्नोत्थितेन, सायं चेति ॥ ५१ ॥

प्रतिम नस्य का समय - प्रतिमर्श का प्रयोग चौदह अबस्याओं में हितकर होता है; जैसे - ( 1 ) प्रातः काल वाय्या त्यागने पर, ( २ ) दन्तधावन करने के पश्चात्, ( ३ ) घर से बाहर जाते समय, ( १ ) व्यायाम, ( ५ ) मैथुन एवं ( ६ ) मार्ग चलने में श्रान्त होने पर, ( ७ ) सूत्र, ( ८ ) अघोवायु, ( ९ ) कवल तया ( १० ) अञ्जन लगाने के अन्त में, ( ११ ) भोजन के बाद, ( १२ ) छींक आने के अनन्तर ( १३ ) दिन में सोकर उठने पर और ( 12 ) सायंकाल में ॥ ५१ ॥

तत्र तल्पोत्थितेनासेवितः प्रतिमर्शो रात्रावुपचितं नासाचोतोगनं मलमुपहन्ति मनः प्रसादं च करोति, प्रक्षालितदन्तेनासेवितो दन्तानां दृढतां वदनसौगन्ध्यं २२ सु ० चि ० चापादयति, गृहान्निर्गच्छता सेवितो नासाम्नोतसः छिन्नतया रजोवूमो वा न चावते, व्यायाममैथुनाच्च-परिश्रान्तेनासेवितः श्रममुपहन्ति, सूत्रोश्चारान्ते सेवितो गुरुत्वमपनयति, कालाञ्जनान्ते सेि दयति, भुक्तवता सेवितः स्रोतसां त्रिशुद्धिं लघुतां चापादयति, वान्तेनासेवितः स्रोतोविलग्नं श्लेष्माणम-पोहा भक्ताकाङ्क्षामापादयति, दिवास्वप्नोत्थितेनासेवितो निद्राशेषं गुरुत्वं मलं चापोह्य चित्तैकाग्र्यं जनयति, सायं चासेवितः सुखनिद्राप्रबोधं चेति ॥ ५२ ॥

यथोक्त काल में सेवित प्रतिमर्श के गुण- प्रातः काल सो कर उठने वाले व्यक्ति के द्वारा सेवन किया गया प्रतिम ( नस्य ) रात्रि में एकत्रित हुए नामानीत के मल को नष्ट करता है तथा मन में प्रसन्नता लाता है । दन्तधावन के पश्चात् सेवित प्रतिमर्श दांतों को हद बनाता है तथा सुख में सुगन्धित्पन्न करता है । घर से बाहर निकलते समय प्रति-मर्दा का सेवन करने से, नासारन्धों के गीला रहने के कारण, धूलि और धूम हानि नहीं पहुंचाते । व्यायाम, मैथुन तथा मार्गगमन से श्रान्त व्यक्ति के द्वारा सेवन किया गया प्रतिम थकावट मिटाता है । मूत्र तथा अधोवायु के उपरान्त प्रतिमर्श का सेवन करने से दृष्टि का भारीपन नष्ट हो जाता है । कवल और अञ्जन के बाद सेवन करने से नेत्र निर्मल होते हैं । भोजन के बाद प्रतिमर्श का सेवन स्रोतों को शुद्ध करता है तथा शरीर में लघुता लाता है । वमन किए हुए व्यक्ति के द्वारा मेचिन प्रतिमर्श स्रोतों में चिपके हुए श्लेष्मा को निकालकर भोजन में रचि उत्पन्न करता है । दिन मैं सोकर उठने वाले के द्वारा सेवन किया गया प्रतिमर्श * शेषनिद्रा, भारीपन और मल को दूर कर चित्त में एकाग्रता त्पन्न करता है | सायंकाल सेवन किया गया प्रतिमर्श सुख-पूर्वक निद्रा लाता है और ( प्रातः ) जगाता है ॥ ५२ ॥

sugar: स्नेहो यावद्वक्त्रं प्रपद्यते ।

नस्ये निषिक्तं तं विद्यात् प्रतिमर्श प्रमाणतः ॥ ५३ ॥

प्रतिमर्श की मात्रा - नस्य में प्रयुक्त किया गया स्नेह जब थोड़ी छींक आने पर भी मुख में ना जाय तो उस प्रतिमर्शं को प्रमाणानुकूल समझना चाहिए ॥ ५३ ॥

नस्येन रोगाः शाम्यन्ति नराणामूर्ध्वजत्रुजाः ।

इन्द्रियाणां च वैमल्यं कुर्यादास्यं सुगन्धि च ॥ २४ ॥

नस्य सामान्य के गुण- नस्य के प्रयोग से मनुष्यों के ऊर्ध्वजत्रुगत रोग शान्त होते हैं, इन्द्रियाँ निर्मल होती है-तथा मुख सुगन्धित होता है ॥ ५२ ॥

हनुदन्तशिरोग्रीवा त्रिकत्राहूरसा वलम् I वलीपलितखालित्यव्यङ्गानां चाप्यसंभवम् ॥ २५ ॥

हनु, दन्त, शिर, ग्रीवा, त्रिक ( कटि ), बाहु और वक्ष बलवान बनते हैं तथा वली, पलित, खालित्य एवं व्यङ्ग रोगों की भी दम्पत्ति नहीं होती ॥ ५५ ॥

तैलं कफे सवाते स्यात् केवले पवने वसाम् ।

दद्यात्सर्पिः सदा पित्ते मज्जानं च समामुते ॥ १६ ॥

दोष विशेष से नत्य में स्नेह विशेष - ( नस्य के लिए )

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१७० सुश्रुतसंहिता कफयुक्त वातप्रकोप में तेल, केवल बात में वसा, पित्त में एवं स्नेहपय क्षोद्रराम्भृताः 1 घृत तथा वातपित्त में मजा का प्रयोग करना चाहिए ॥ ५६ ॥ कपायोष्णोदकाभ्यां च कवला दोषतो हिताः || ६४ ||

चतुर्विधस्य स्नेहस्य विधिरेवं प्रकीर्तितः । दोपविशेष से कवलविशेष का निर्देश- इस प्रकार श्लेष्मस्थानाविरोधित्वात्तेषु तैलं विधीयते ॥५७ ॥ स्नेह, दूध, मधु, रस, गोमूत्र, अम्ल ( काक्षी ), कपाय और

इस प्रकार चतुर्विध स्नेह के प्रयोग की विधि बतलाई उष्णोदक का दोषों के अनुसार कवल धारण हितकर होता गई है, इनमें श्लेप्मस्थान का विरोधी न होने के कारण तैल श्रेष्ठ होता है ॥ ५६ ॥,

अतः परं प्रवक्ष्यामि कवलग्रहणे विधिम् ।

चतुर्धा कवलः स्नेही प्रसादी शोधिरोपणौ ॥ १८ ॥

चतुर्विध कवल -- इसके अनन्तर कवल धारण की विधि / बतलाई जाती है । कवल चार प्रकार का होता है, ( १ ) स्नेही ( २ ) प्रसादी ( ३ ) शोधन और ( ४ ) रोपण ।

स्निग्धोष्णैः सैहिको वाते, स्वादुशीतैः प्रसादनः ।

पित्ते, कट्वलवणै रुक्षोणैः शोधनः कफे ॥ ५६ ॥

arasaty में निग्ध और उप स्नैहिक कवल, पित्त । में मधुर और शीतल प्रसादन कवल तथा कफ में कटु, अम्ल, लवण, रूक्ष और उष्ण शोधन कवळ धारण करना चाहिए ॥ ५ ९ ॥

कपायतिक्तमधुरैः कटूष्णै रोपणो व्रणे ।

चतुर्विधस्य चैवास्य विशेषोऽय प्रकीर्तितः ॥ ६० ॥

व्रण में कपाय, तिक्त, मधुर, कटु और उष्ण रोपण कवल धारण करना चाहिए । चतुबिंध कचलों की विशेषता ( भेद ) का इस प्रकार वर्णन किया गया है ॥ ६० ॥

तत्र त्रिकटुकवचासर्षपहरीतकी कल्कमालोड्य । तैलशुक्तसुरामृत्रचारमधूनामन्यतमेन सलवणमभिप्रतप्त-मुपस्त्रिन्नमृत्ति गलक पोलललाट प्रदेशो धारयेत् || ६१ || | कफहर त्रिकटुकादि कवल - त्रिकटु, वध, सरसों और हरीतकी के कल्क को तैल, शुक्त, सुरा, गोमूत्र, चार और मधु में से किसी एक इन्य में घोलकर नमक मिलाना चाहिए और उसे उष्ण करके, गला, कपोल एवं ललाट ) प्रदेश का स्वेदन तथा मर्दन करने के पश्चात् कवल धारण करना चाहिए ॥ ६१ ॥

सुखं संचार्यते या तु मात्रा स ( सा ) कवलः स्मृतः ।

अचार्या तु या मात्रा गण्डूप स प्रकीर्तितः ॥६२ ॥

कवल तथा गहू में भेद -जो मात्रा मुख में सुख पूर्वक इधर - उधर संचरित हो उसे कवल तथा जिसका संचार न हो उसे गण्डूप कहते हैं ॥ ६२ ॥

तावच्च धारयितव्योऽनन्यमन सोन्नतदेहेन यावद्दोप-परिपूर्ण कपोलत्वं नासास्रोतोनयन परिप्लावश्च भवति नदा विमोक्तव्यः, पुनश्चान्यो ग्रहीतव्य इति ॥६३ ॥

गण्डूप धारण के काल की अवधि - गण्डूप और कवल, एकाग्र मन से शरीर को सीधा करके तबतक धारण करना चाहिए जबतक क्ण्ठ दोष ( कफ ) से परिपूर्ण न हो जाय तथा नासिका रन्ध्र और नेत्र जल से न भर जाये । इसके है ॥ ६४ ॥

व्याधेरपचयस्तुष्टिर्वैशद्यं वक् 1 इन्द्रियाणां प्रसादश्च कवले शुद्धिलक्षणम् ॥ ६ ॥

शुद्ध कवल के लक्षण -- रोग की शान्ति, सन्तोष, निर्मलता, मुख में लघुना और इन्द्रियों की प्रसन्नता ये शुद्ध कवल के लक्षण हैं ॥ ६५ ॥

होने जाड्यकफोरक्लेशावरसज्ञानमेव च ।

अतियोगान्मुखे पाकः शोपतृष्णाऽरुचिक्लमाः ॥ ६६ ॥

कचल का हीन योग होने पर जड़ता, कफ की वृद्धि और रसज्ञान की अप्रतीति होती है तथा अतियोग होने पर मुख में पाक, शोष, तृष्णा अरुचि और कम होता है ॥ ६६ ॥

शोधनीये विशेषेण भवन्त्येव न संशयः ।

तिला नीलोत्पलं सर्पिः शर्करा क्षीरमेव च ॥ ६५ ॥

सक्षौद्रो दग्धवक्त्रस्य गण्डूपो दाहनाशनः ।

कवलस्य विधिप समासेन प्रकीर्तितः ॥ ६६ ॥

दाहनाशन तिलादि कवल - शोधनीय कवलों में निस्सन्देह ये लक्षण विशेष रूप से होते हैं । तिठ, नील कमल, घृत, शर्करा, दूध और मधु का कवल धारण जले हुए मुख के दाह को नष्ट करता है । संक्षेप में कवल - धारण की इस विधि का वर्णन किया गया है ॥ ६७-६८ ॥

विभन्य भेषजं बुद्धया कुर्वीत प्रतिसारणम् ।

कल्को रसक्रिया क्षौद्रं चूर्ण चेति चतुर्विधम् ॥६६ ॥

मुखरोग में प्रतिसारण विधि- अपनी बुद्धि से औषध को कल्क, रसक्रिया ( फाणिताकृति ), चौद्र ( मोटा चूर्ण ) और चूर्ण रूप में विभक्त करके प्रतिसारण करना चाहिए ॥

अङ्गुल्यप्रप्रणीतं तु यथास्वं मुखरोगिणाम् ।

तस्मिन् योगमयोगं च कलोत विभावयेत् ॥७ ९ ॥

प्रतिसारण में पश्चात् कर्तव्य कर्म -- मुख के रोगियों के के लिए दोषों के अनुसार औषधि को अंगुली के अग्रभाग में लगाकर प्रतिसारण ( घिसना ) करना चाहिए तथा प्रतिसारण के हीन और अतियोग कवल की भाँति समझना चाहिए ॥ ७० ॥

तानेव शमयेद् व्याधीन् कवलो यानपोहति ।

दोपन्नमनभिष्यन्दि भोजयेच तथा नरम् ॥७१ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने धूमनस्यकवलग्रह-चिकित्सितं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥

कवल - धारण जिन रोगों को शान्त करता है उन्हीं रोगों की शान्ति प्रतिसारण के द्वारा भी होता है । प्रतिसारण अनन्तर मुख से कवल निकाल कर दूसरा कवल धारण काल में रोगी को दोषनाशक तथा अनभिप्यन्दि पदार्थ करना चाहिए ॥ ६३ ॥ खिलाना चाहिए ॥ ७१ ॥

इत्यायुर्वेदतच्चसंदीपिकाभापाव्यास्यायां चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ चिकित्साम्थानं समाप्तम् ।

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॥ श्रीः ॥ काशी संस्कृत ग्रन्थमाला II महर्षिणा सुश्रुतेन विरचिता सुश्रुतसंहिता ' आयुर्वेदतत्त्वसदीपिका ' हिन्दीव्याख्या - वैज्ञानिकविमर्शोपेता ( कल्पस्थानम् ) व्याख्याकार -डा ० सनधनिहारी प्रग्निहोत्री ए. एम. एस. अध्यापक, गवर्नमेण्ट आयुर्वेदिक कालेज, रायपुर चौरखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस वाराणसी - १

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प्रकाशक -- चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी. मुद्रक - विद्याविलास प्रेस, वाराणसी. प्रथम संस्करण, संवत् २०१७ ( पुनर्मुद्रणादिकाः सर्वेऽधिकारा ' प्रकाशकाधीना. ) Chowkhamba Sanskrit Series Office, P. O. Box 8, Varanasi, ( INDIA ) 1960

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11 ft: 11 सुश्रुतसंहिता कल्पस्थानम् प्रथमोऽध्यायः अथातोऽन्नपानरञ्जाकल्पं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अन्नपान - रक्षाकल्प का उपक्रम - अब इसके अनन्तर अन्न. पान - रक्षाक्ल्प ( नामक अध्याय ) का व्याख्यान करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श: - यहाँ ' अ ' शब्द मंगलसूचक अथवा माङ्गलिक है । क्योंकि मगलाचरण आस्तिक बुद्धि का निदर्शक है और ! यह रुचि के अनुसार देवता नमस्कारात्मक अथवा ' अथ ' आदि माङ्गलिक शब्दों के द्वारा किया जाता है । इसी प्रकार धर्मशास्त्रों में ' अथातो धर्मजिज्ञासा ' ( मीमांसा ), ' अथ शानुशासनम् ' ( महाभाष्य ) आदि में ' अथ ' शब्द को मंगलाचरणार्थं प्रयुक्त किया है । इसी प्रकार यहाँ पर आचार्य ने भी मंगल कामना के सूचनार्थ ' अध ' शब्द का प्रयोग किया है । यथा ' ओंकारश्चायशब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा । कण्ट भित्त्वा विनिर्यातौ तस्मान्माद्गलिकावुभौ । " इसी प्रकार अथ शब्द नवीन विपयारम्भ का द्योतक भी है क्योंकि इसके पहले चिकित्सास्थान का वर्णन किया जा चुका है । ' अन्नपान रचाकल्पमिति ' – आचार्य ढल्हण ने अपनी टीका में कहा है - ' चिकित्सास्थानानन्तर कल्पस्थानमारभ्यते, यतचिकित्सास्था-नादिभूते द्वित्रणीयाध्याये - विषजुष्टस्य विज्ञान विपनिश्चयमेव च । चिकित्सितश्च वक्ष्यामि कल्पे तु प्रविभागश ॥ ' इत्यनेन श्रोकेन विप जुष्टव्रणस्य कल्पस्थाने प्रतिपादन सूचितं तस्मात् तत्रापि स्वस्थस्य व्याधिक्षीणस्य चान्नैरेव प्राणानां धारण क्रियते, अतः प्रागन्नपानरक्षा कल्पं व्याख्यातुकामः प्राह— ' अर्थात् ' इत्यादि । इस प्रकार सुश्रुतोक्त कल्पस्थान अगदतन्त्र ही है, जैसा कि आचार्य । सुश्रुत ने सूत्रस्थान में स्वयं कहा है- ' अन्नस्य रक्षाविधान । स्थावरस्येतरस्य च । मर्पदष्टविषद्यान तस्यैव च चिकित्सितम् ॥ दुन्दु-भेर्मूषिकाणां च कौटानां कल्प एव च । अशे कल्पा समाख्याता विपभेषजकत्पनात् ॥ अध्यायानां शतं विंशमेवमेतदुदीरितम् ॥ ' ( सु. सू. अ. ३।२७ २८३ ) कल्पस्थान में अन्नपान रक्षाविज्ञा नीय, स्थावर • विपविज्ञानीय, जंगमविष विज्ञानीय, सर्पदष्ट विषविज्ञानीय, सर्पदष्ट विपचिकित्सित, दुन्दुभिस्वनीय, मूषिक तथा कीटकल्प नाम के आठ अध्याय हैं । विपौषध के जानने से इसको कप कहते हैं । इस प्रकार से पूर्व कहे हुए १२० अध्याय पूर्ण हो जाते हैं । इसलिये कल्पस्थान अगद तन्त्र का नामान्तर ही है जिसको विपविज्ञान अथवा ' डोक्सिकोलॉजी ' ( Toxicology ) भी कह सकते हैं फिर इस तन्त्र में औषध का नाम भी तो ' अगद ' बताया गया है जिसका अर्थ होता है; जिसके सेवन से गद = रोग या विप विकार उत्पन्न ही न हो तथा नष्ट भी हो जावे या दूर हो । जावे । इसलिए विप चिकित्सा की कल्पना इस तन्त्र में की | गई है अतः इसका नाम कल्पस्थान कहा गया है । ' अन्नपान-| रक्षा ' की व्याख्या करते हुए ढल्हणाचार्य जी ने कहा है ' भन्ने भक्ष्यमवरुद्ध धनसाधर्म्यात्; पाने लेह्यमवरुद्धं द्रवसाधर्म्याद, एव | चतुर्विधस्यापि रक्षाकल्प | रक्षण रक्षा, सा पुनरदुष्टस्य, दुष्टस्य पुनर्विषभेषजकल्पनात् कल्पः, रक्षया सहित कल्पो रक्षाकल्पः । | आदिशब्दोऽत्र लुप्तनिर्दिष्टो द्रष्टव्य, तेन दन्तकाष्ठादीनामपि लक्षण-चिकित्सितकल्पनम् । इति ॥ ' प्रकार भेद से ससार में दो प्रकार के पदार्थं होते हैं - ( १ ) अमृत - जिनके सेवन से प्राणी मृत नहीं होता तथा प्रसाद अथवा प्रसन्नता का अनुभव करता है तथा ( २ ) विप - जिनके सेवन से प्राणिमात्र विषाद का । अनुभव करता है तथा मृत्यु को प्राप्त होता है । जैसा कि हम कह चुके हैं कि कल्पस्थान अगद तन्त्र का ही नाम विशेष है जिसे विपविज्ञान या ' टोक्सिकोलॉजी ' Toxicology कहा जाता है अतः इस टोक्सिकोलॉजी की व्याख्या आधुनिक

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सुश्रुतसंहिता चिकित्साशास्त्र के ग्रन्थों में निम्न प्रकार से दी हुई है, यथा -Toxicology deals with the diagnosis, symptoms and treatment of poisons, and the methods of detecting them ' ( Med Jurisprudence and Toxicology By J P.Modi, Ith Edition 1947, p.p 1 ) इसी प्रकार उपर्युक्त चिप अथवा Poison की व्याख्या भी निम्न प्रकार से प्राप्त होती है ' Broadly speaking, a poison may be defined as a substance of the nature of a drug which is admiinistered in a way and in an amount in which it is hkely to be administered, will produce deleter -ous effects of a serious nature. ' ( Medical Jurisprudence and Toxicology by JP Modi, 9th edition 1947, pp 406 ) उपर्युक्त गद्यांश का भावार्थ यह है कि विपविज्ञान वह विज्ञान है जिसमें विषाक्त प्राणी का निदान, विप के कारण उत्पन्न होने वाले लक्षण अथवा लक्षणों तथा विपाक प्राणी के प्राण - रक्षार्थ को जाने वाली चिकित्सा का, तथा विपढाता एव सदिग्ध विषाक्त पुरुष का निदान आदि विपयों का समावेश होता है । इसी प्रकार विप शब्द की ब्यारया का भी भावार्थं इस प्रकार किया जा सकता है कि ' सामान्यतया जो कोई भी पदार्थ शरीर के साथ बाह्यसम्पर्क में आने पर या शरीर में किसी प्रकार शोषित होने के बाद शरीर पर हानिकारक प्रभाव करे वह ' विप ' ( Poison ) माना जाता है । या कोई भी पदार्थ जो अन्तःक्षेपण ( Injection ), भक्षण या बाह्य प्रयोग से शोषित हो कर शरीर में पहुँच कर या शरीर में स्वयं उत्पन्न होकर शरीरयत्र को हानि पहुँचावे या उसकी क्रिया में घाधा पहुँचावे ( विपादजनक हो ) उसे चिप या ( poison ) प्वाइजन कहते हैं । प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथों में बगद तन्त्र का उल्लेख_ निम्नलिखित अध्यायों, स्थानों व कल्पों आदि के अन्तर्गत किया गया है । यथा सुश्रुत संहिता में सम्पूर्ण कल्प स्थान, चरकसंहिता में चिकित्सा स्थान का २३ वां अध्याय, अष्टाङ्गहृदय में उत्तरतन्त्र के ३५, ३६, ३७ तथा ३८ वें अध्याय, अष्टाङ्गसग्रह में उत्तरतन्त्र का ४० वाँ अध्याय, हारीतसहिता में तृतीय स्थान का ५६ वाँ अध्याय, भावप्रकाश में चिकित्सा स्थान का ६७ वाँ अध्याय, शार्ङ्गधर सहिता में यत्र तत्र, वासवराजीय में २१ व २३ वाँ प्रकरण में कुछ प्रतिवियों का वर्णन मिलता है । काश्यप सहिता तथा सर्वविध विषप्रतिपादिका के अन्तर्गत तथा चिकित्सा के सग्रह ग्रन्थों में प्रायः विप चिकित्सा का अन्य एक अध्याय पाया जाता है । धन्वन्तरि काशिपतिस्तपोवर्मभृता वरः । सुश्रुतप्रभृतीच्छिष्याञ्छशासाहतशासनः ॥ ३ ॥

तपस्त्रीगण तथा धर्म को धारण करने वालों में श्रेष्ठ तथा । अहनशामन अर्थात् जिसकी आज्ञा तथा अनुशासन का उलङ्घन नहीं किया जा सकता ऐसे काशिराज दिवोदास धन्वन्तरि जी ने अपने सुश्रुतादि शिष्यों से कहा ॥ ३ ॥

निमर्श - नाचार्य उल्हण ने एक पाठान्तर का भी वर्णन किया है यथा- ' दिवोदासं विनिपनिस्नपोथर्मनाकर । सुश्रुत धनुरनन्दिन्यान्ददामाहनशासनः ॥ ' धन्वन्तरिः - ' धनु. शल्यं, तम्या नमियत गच्द्रनीनि धन्यन्नरिः । शल्यशास्त्र के पारनून | विद्वान होने से धन्वन्तरि तथा जगदर्थसाधनाद् धनुर्धर्मः, तस्यान्तो व्याधि, अकालमृत्युसम्पादकोऽधर्मः, तस्यारिः व्याध्य-कालमृत्युनिवर्तनद्वारा इति ॥ भगवान् धन्वन्तरि काशी के राजा थे तथा उनका नाम दिवोदास था । ये चिकित्सा शास्त्र विशेष कर शल्य चिकित्सा के प्रकाण्ड विद्वान् तथा प्रवर्त्तक माने गये हैं । इन्हीं के शिष्यों में सुश्रुत भी थे जो भगवान् धन्वन्तरि के प्रधान शिष्य थे । इन सुश्रुताचार्य ने ही प्रश्नोत्तर विधि से अपने जगत् प्रसिद्ध गुरु से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर उस प्रसिद्ध सहिता ग्रन्थ की रचना की जिसको ' सुश्रुत सहिता ' के नाम से चिकित्सा जगत् जानता है ।

रिपवो विक्रमाक्रान्ता ये च स्वे कृत्यतां गताः ।

सिसृक्षवः क्रोधविष विवरं प्राप्य तादृशम् ॥ ४ ॥

विषैर्निहन्युर्निपुणं नृपति दुष्टचेतसः । खियो वा विविधान् योगान् कदाचित्सुभगेच्छया ।

विपकन्योपयोगाद्वा क्षणाज्जह्यादसून्नरः ।

तस्माद्वैद्येन सततं विषाद्रक्ष्यो नराधिपः ॥ ६ ॥

विष से राजा की रक्षा - शौर्य, वीरता तथा विक्रम से जीते हुए शत्रु तथा अन्य लोग जो द्वेपवश अपने शत्रु हो गए हैं वे लोग अवसर की प्रतीक्षा में रहते हुए अपने क्रोध • रूपी विप को उगलने अथवा छोड़ने के लिए मौका ढूढ़ते रहते हैं । ये दूषित मन वाले शत्रु आदि व्यक्ति अवसर पाकर निपुण राजा को विषों के प्रयोग से मार डालते हैं । इसी प्रकार कभी कभी स्त्रियां भी सौभाग्य प्राप्ति की इच्छा से नाना प्रकार के विप मिश्रित योगों को ( अपने पतियों व पुरुषमित्रों को ) दे देती है अथवा कभी कभी विप कन्या के उपयोग अथवा उपभोग से मनुष्य शीघ्र ही अपने प्राणों को खो बैठता है । इस लिए राजवैद्य या कुशल वैद्य का कर्तव्य है कि वह निरन्तर अपने स्वामी राजा तथा यजमान धनवान रोगी की विप से रक्षा करे ॥ ४-६ ॥ विमर्श: - उपर्युक्त पद्यांश की व्याख्या करते हुए डल्हणा चार्य ने व्यवस्था दी है कि ' नृपति. कुतो रक्षणीय हत्या -सिसृक्षवः स्रष्टुमिच्छव, क्रोधेन विप क्रोधविपम् । न केवल रिपवः स्वे चात्मीया मृत्या कृत्यता गना विद्वेष गताः । तथा च कृत्यशब्दार्थोऽमरकोपे – ' कृत्य क्रियादेवतयोस्त्रिषु विद्विष्टकार्य्ययो. ' । इति ॥ विवर छिद्र प्राप्य तादृश नृपतिं वधक्षम स्त्रियो दुष्टचित्ता विविधान् योगान् सयोगविपाणि प्राप्य कदाचिद् अज्ञानात् सुभगे-च्या वा विविधान् योगान् सिसृक्षवो दातुमिच्छन्त्यो राजान निहन्यु । विषकन्योपयोगाद् वा क्षणालह्यादम्न्नर. । उक्त च ' इन्ति स्पृशन्ती स्वेदेन गम्यमाना च मैथुने । पक्व वृन्तादिव फल प्रशात-यति मेहनम् । ' इति । कृत्यतां गता इत्यत्र ' विकृतिं गता. ' इत्यन्ये पठन्ति । इस प्रकार इतिहास का अध्ययन करने पर भी यह स्पष्ट हो जाता है कि एक राजा पराजित हो जाने पर भी अपने विजेता राजा के विनाश के लिय छल, वल, कौशल, विप, मारण, उच्चाटनादि तान्त्रिक क्रियाओं की सहायता लेता था और उस विजेता राजा के रसोइया, परिचारक, दासी आदि को मिलाकर उसके भोजन, जल, पेय, वस्त्र आदि को विपाक्त करके उसके प्राणों का विनाश करने का प्रयत्न करता था । तथा कभी - कभी तो वह उस राजा के विनाश अथवा