श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 601–610

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 601–610

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श्रध्यायः १ ] कल्पस्थानम् प्राणनाशके हेतु ' विषकन्या ' का प्रयोग भी किया करता था जैसा कि भारतीय इतिहास का एक अत्यन्त ज्वलन्त उदाहरण हमारे सामने है कि किस प्रकार चाणक्य ने पर्वतेश्वर को विषकन्या के उपयोग से मरवाया था और सम्राट् चन्द्रगुप्त के रास्ते मे एक प्रभावशाली कण्टक को दूर किया था । विपकन्या - विषकन्या बनाने के लिए कन्या को बचपन से ही थोडी थोड़ी मात्रा में विष का सेवन करवाया जाता है । इस प्रकार थोड़ा थोड़ा विष देना आरम्भ करते हैं । फिर धीरे - धीरे इस विप की मात्रा बढ़ाते जाते हैं अन्त में यह मात्रा इतनी अधिक हो जाती है जो कि उस कन्या के लिए तो सह्य होती है किन्तु दूसरे प्राणी के लिए प्राणघातक होती है | प्रयुक्त विषकन्या के सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है । चुम्बन तथा सम्भोग आदि क्रियाओं के द्वारा यह दिप दूसरे पुरुष में भी आ जाता है । इसी लिए ऊपर आचार्य ढल्हण ने व्याख्या करते हुए लिखा है कि- इन्ति स्पृशन्ती स्वेदेन, गम्यमाना च मैथुने । पकं वृन्नादिव फलं प्रज्ञातयति मैहनन् ॥ इस विषकन्या की साधारण तथा निम्न लक्षण से पहिचान की जा सक्ती है कि इसके शरीर पर जूं आदि कीट तुरन्त हो मर जाते हैं । इसी प्रकार ज्योति ara के अनुसार वह जातक कन्या भी चिपकन्या कही जाती है जो विषकन्या योग विशेष में उत्पन्न हुई हो तथा जिसको ग्रहों के योगायोग के कारण वैधव्य योग होता है । इसी प्रकार आजकल की भाषा में फिरङ्ग, पूयमेह आदि योनिरोगों से पीड़ित स्त्री भी विषकन्या कही जा सकती है तथा इसी प्रकार फिरन तथा पूयमेह आदि रोगों से पीडित पुरुषों को भी ' विषपुरप ' कहा जा सकता है किन्तु इनमें इतनी विषाक्तता नहीं होती कि वे प्राणों का हनन कर सकें हाँ इतना अवश्य हो सकता है कि फिरन से पीडित स्त्री अथवा पुरुष अपने चुम्बन तथा सहवास आदि से अपने साथी पुरुष या स्त्री को फिर रोग से ग्रस्त कर दें । किन्तु दूयमेह से ग्रस्त रोगी में चुम्वन आदि में इतनी विषाचता नहीं रहती जितनी कि सहवास नथवा मैथुन कर्म में, वैसे आजकल चिपकन्या का प्रयोग अथवा प्रचलन नहीं के बराबर हो गया है और आजकल के युग में तो विपकन्या विगत अतीत की एक कथा मात्र ही प्रवीन होने लगी है । फिर भी अन्य प्राणहारक साधनों का प्रयोग तो आज भी अपने शत्रुओं के प्राणों के विनाश के लिए प्रायः मनुष्य करते हैं और पहले से अधिक तीव्रता तथा सफलता से । आए दिन इस प्रकार के वृतान्त हमें समाचार-पत्रों में पढ़ने के लिए मिलते ही हैं लो इस प्रकार के विप व्यवहार के प्रचार के ज्वलन्त उदाहरण हैं । यथा भोजन में चिप मिलाकर सहयात्रियों के धन तथा प्राण लूटना, खाद्य तथा पेय पदार्थों में विष मिलाकर यथा दूध आदि में संखिया, anta aafar feer कर दूसरे प्राणी को पिला देना और फिर सज्ञाहीन हो जाने पर गला दाब कर हत्या कर देना या त्रिय आदि के प्रयोग से ही प्राणों का विनाश करना । प्राय ' इस प्रकार प्रयुक्त किए जाने वाले दिनों में वत्सनाभ, संखिया, अफीम, कुचला, धतूरा, भाँग और पोटाशियम । साइनाइड ( KON ) आदि दिप मुख्य हैं ।

यस्माच्च चेतोऽनित्यत्वमश्ववत् प्रथितं नृणाम् ।

न विश्वस्याचतो राजा कदाचिदपि कस्यचित् ॥ ७ ॥

राजा को विश्वास करने का निषेव - क्यों कि मनुष्यों का चित्त घोड़े की भांति सदैव चंचल रहता है इसलिए चतुर | राजा को चाहिए कि वह कभी किसी का विश्वास न करे ( और सदैव सावधान रहे ) ॥ ७ ॥

विमर्श - इस सम्बन्ध में ढल्हणाचार्य जी का मत है कि । ' अश्ववदिति । आशुतमगत्या अश्वा उच्यन्ते, एतेन शोब्रसचारित्वो-पलक्षणार्थं चेतोऽनित्यत्वमुक्त, यस्मादश्वस्य शीघ्रसचारित्वं नाना-भावेन चेतसः, तस्मात् कदाचिदपि कस्यापि विश्वासं न विदध्यान्म हीपतिः । वैद्यविषये च विश्वामहेतु सूत्रस्थाने ' विसृत्यात्मनाऽऽ-रमानन् ' इत्यादिठोकेनाभिहितः ॥ इसलिए वैद्य का विश्वास तो राजा को भी करना ही चाहिए और इसी कारण आचार्य ने | स्वयं प्रथम सूत्रस्थान में व्यवस्था दे दी है यथा ' विसृजत्या-त्मनात्मानम् ' । मन की चंचलता के विषय में तो गीता में स्पष्ट कहा गया है कि ' चञ्चल हि मन. कृष्ण! प्रमाथि बलवद्-| दृढम् । तस्याद्द निनह मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ कविराज हाराणचन्द्र जी ने उपर्युक्त श्लोक में पाठान्तर का निर्देश भी किया है उनके मतानुसार कहीं कहीं ' न विश्वत्यात्ततो राजा कदाचिदपि कस्यचित् के स्थान पर न विश्वसेत् ततो राजा कदा • चिदपि कस्यचित् ॥ ऐसा पाठान्तर पाया जाता है

कुलीनं धार्मिकं स्निग्धं सुभृतं संततोत्थितम् ।

अलुब्धमशठं भक्तं कृतज्ञं प्रियदर्शनम् ॥ ८ ॥

क्रोधपारुष्यमात्सर्यमायालस्यविवर्जितम् ।

जितेन्द्रियं क्षमावन्तं शुचिं शीलदयान्वितम् ॥ ६ ॥

मेघाविनमसंश्रान्तमनुरक्तं हितैषिणम् ।

पटुं प्रगल्भं निपुणं दक्षमालस्यवर्जितम् ॥ १० ॥

पूर्वोक्तैश्च गुणैर्युक्तं नित्यं सन्निहितागढ़म् ।

महानसे प्रयुञ्जीत वैद्यं तद्विद्यपूजितम् ॥ ११ ॥

पाकशाला में नियुक्त करने योग्य वैद्य - वैद्य की योग्यता का निर्देश करते हुए आचार्य कहते हैं कि वैद्य कुलीन ( उच्च कुलोत्पन्न अथवा सन्भ्रान्त कुलोत्पन्न ), धार्मिक, स्नेह रखने वाला अर्थात् स्नेही, धन - धान्यादि साधनों से युक्त, निरन्तर अपने कर्तव्य तथा शास्त्र की वातों पर ध्यान देने वाला, लालच रहित, धूर्तताहीन, श्रद्धावान्, कृतज्ञ, देखने - सुनने में सुन्दर ( व्यक्तित्व से युक्त ), क्रोध, कठोरता, मत्सरता, माचा तथा मालस्य से हीन, नितेन्द्रिय, क्षमाशील, पवित्र स्वभाव वाला, शील तथा दया से पूर्ण चित्तवाला, मेधावी, न थकने वाला, अनुरक्त, हिताभिलापी, वक्ता, स्वकार्यदक्ष, चतुर, निपुण, कुशल, व्यसनरहित ( मद्यपान, धूतकर्म, धूम्रपान, वेश्यागमन आदि दुव्यर्सनों से विरहित ) तथा तत्वाधिगतशास्त्र आदि पूर्वोक्त गुणों से युक्त, सदेव अगद ( विषनाशक औपवि योगों ) को पास में रखने वाला तथा वैद्य विद्या तथा आयुर्वेद के सम्यक् सम्पूर्ण ज्ञान से युक्त वैद्य को तथा अन्य आयुर्वेदज्ञों से पूजित वैद्य को राजा अपने महानस ( रसोई घर ) में नियुक्त करे । तथा इस प्रकार से नियुक्त राजवैद्य की देख रेख में राजा के भोजन पान आदि के लिए भोजनादि का निर्माण हो ॥ ८-११ ॥

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४ सुश्रुतसंहिता विमर्श. — आचार्य ढल्हण ने उक्त श्लोकादि में वर्णित वैद्य-गुणों के विषय में निम्न मत प्रदर्शित किया है यथा ' स च वैद्यो गुणवानेव विश्वासमाजनमिति वैद्यस्य गुणान् निर्दिशन्नाह - कुलीन मित्यादि । कुलीनो दुष्टवीजक्षेत्रतया नाकार्येषु प्रवर्त्तते । कुल-मत्रायुर्वेदाध्यायि कुल ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यभेदेन त्रिविध, कुलगुण | सम्पन्नशूद्रेण सह चतुर्विधमित्यन्ये, तद्भवमिति गयी । लिग्धः स्नेहेन मिश्रभावेन राज्ञा सद्द व्यवस्थित, एतेन मित्रमिव सर्वथा रक्षति । सुभृत सम्यग्भृत यथा च शरीरयात्रा भवति । तथा चोक्त ' सूपौदन घृतमल व्यजन दृढममलिनन वासः । इति । सततोत्थितः अहोरा श्रमध्ययनाध्यापनतदर्थचिन्तानृपशरीरस्वास्थ्यापादानेषु तत्परो नि त्यामियुक्त इति । परगुणविध्वसो मात्सर्यम् । माया - परवन्धन-बुद्धिः । अनुरक्त सदाऽऽतुरलग्न रागयुक्तम् । पटु वक्तार, प्रगल्भ धृष्ट, दक्ष चतुरम्, आलस्यवर्जन द्विरुक्तमत्यन्तनिपेधार्थम् । पूर्वो गुणैस्तत्त्वाधिगतशास्त्रार्थं ', इत्यादिकैः । महानसे रसवत्याम् । तद्वि-धपूजितमिति तद्विधैः पाकनिष्ठिततत्त्वज्ञाने. मिपग्मि पूजितम् ॥ ' कविराज हाराणचन्द्र महोदय उपर्युक्त श्लोकसमुच्चय में कुछ पाठान्तर भी मानते हैं यथा ' संततोत्थितम् ' के स्थान पर ' सततोत्थितम् ', ' मेधाविनमसंधान्तमनुरकं ' के स्थान पर ' मेधाविनमसंभ्रान्तम् ', ' मायालस्य ' के स्थान पर ' मदालस्य ' तथा ' दत्तमालस्य वर्जितम् ' के स्थान पर ' दक्ष मायाविवर्जि तम् ' नामक पाठान्तर का औचित्य स्वीकार करते हैं ।

प्रशस्त दिग्देशकृत शुचिभाण्डं महच्छुचि ।

सजालकं गवाक्षाढ्यमाप्तवर्गनिपेवितम् ॥ १२ ॥

विकशसृष्टससृष्टं सवितानं कृतार्चनम् ।

परीक्षितस्त्रीपुरुप भवेश्चापि महानसम् ॥ १३ ॥

पाकशाला के लक्षण -अब राजा के भोजन आदि के लिए रसोई कैसी हो? उसका वर्णन करते हुए आचार्य कहते हैं कि प्रशस्त दिशा ( आग्नेय कोण ) और प्रशस्त देश में बनाई हुई, पचित्र घर्तनों वाली, बड़ी, शुद्ध साफ तथा स्वच्छ व । सुधरी, जाली वाली, धुआँ जाने के लिए प्रचुर वातायनों । वाली, विश्वस्त पुरुषों ( कर्मचारियों ) से युक्त, लकड़ी आदि के लिए अलग निश्चित स्थानवाली, छत पर वितान ( चदोवा )

युक्त, अनि पूजा की हुई तथा परीक्षित एवं विश्वसनीय स्त्री ।

पुरषादिकों से युक्त रसोई होनी चाहिए ॥ १२-१३ ॥

विमर्श - प्रशस्त देश के विषय में लिसते हुए चरक सहितावार कहते हैं कि ' दृढ निवात प्रवर्तिकदेश सुसप्रविचार मनुपत्यक धूमानपजलरजमामनमिगमनीयमनिष्टानां च शब्दस्पर्श रूपरसगन्धार्ना मोदपानोदूपले नूपलवर्च. ' इत्यादि ॥ कविराज धाराणचन्द्र ' गवाधाव्यमाप्तवर्गनिषेवितम् ' के स्थान पर ' गारवर्गनिषेवितम् ' नामक पाठान्तर का औचित्य स्वीकार करते हैं । आचार्य दहन जी उपर्युक्त श्लोकों की हुए कहते है गिनायी, देशस्तु प्रशरन गद्दी, शुचि अनुपदन, सजाएक जालक G गावानायनम, विकटमष्ट विगत तृणस्थान मनमनममीपे तृणमयी न करणीय इत्युक्त भवनि विदयार्थमिवूजनम् । इनि ।

नियुजीन प्रायो वैद्यगुणान्वितम् ।

यो दक्षिणा दक्ष विनीनाः प्रियदर्शनाः ॥ १४ ॥

संविभक्ताः सुमनसो नीच केशनखाः स्थिराः ।

स्नाता दृढ संयमिनः कृतोष्णीषाः सुसंयताः ॥ १५ ॥

तस्य चाज्ञाविधेयाः स्युर्विविधाः परिकर्मिणः । राजसेवा के योग्य परिचारक - वहाँ पर उस रसवती में रसोई का अधिकारी अथवा अध्यक्ष वैद्य - गुणों से सम्पन्न मनुष्यों को बनावे ( तथा ) काम करने वाले भृत्य, पवित्र, कुलीन, चतुरः नम्र, देखने में सुन्दर, भिन्न - भिन्न कर्मों को करने वाले, निर्मल, शुद्ध मन के, नख तथा केश कटाए हुए, स्वस्थ तथा सवल, स्नान किए हुए, चंचलतारहित, संयमी, सिर को ( सफेद तथा स्वच्छ साफा या पगड़ी से ) लपेटे हुए, संयत तथा आज्ञाकारी व विनम्र होने चाहिए ॥१४ १५ ॥ विमर्शः - अध्यक्ष प्रवन्धक अथवा व्यवस्थापक को कहा जाता है जो कि वैद्यगुणों से सम्पन्न होने के साथ भोजनपाक विद्या में कुशल तथा अनुभवी भी होना चाहिए । आचार्य डल्हण उपर्युक्त श्लोक की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि ' अध्यक्ष मधिपतिम्, वैद्यगुणान्वित वैद्यगुणे • कुलीनधार्मिकत्वादिमि-र्युक्तमित्यर्थ. । आहारस्थितयश्चापि भवन्ति प्राणिनो यतः ॥ १६ ॥

तस्मान्महानसे वैद्यः प्रमादरहितो भवेत् । पाकशाला में वैद्य की सावधानी - क्योंकि मनुष्य का जीवन ( प्रधानतः ) आहार के आश्रित है अतः अध्यक्ष वैद्य रसोई में सदैव ही सावधान तथा जागरूक रहे ॥ १६ ॥

माहान सिकवोढारः सौपौदनिकपौपिकाः ॥ १७ ॥

भवेयुर्वैद्यवशगा ये चाप्यन्येऽत्र केचन । पाकशाला के परिचारकों को वैद्य के अधीन रहने का निर्देश - रसशाला ( रसोई ) में काम करने वाले, पिष्टी । पीसने वाले, दाल भात रोटी ( ओदन तथा सूपकार ) बनाने वाले कर्मचारी तथा अन्य कर्मचारी भी जो रसोई में काम करने वाले हों वे सब अध्यक्ष वैद्य के अधीन रहकर काम करने वाले होने चाहिये ॥ १७ ॥

विमर्शः - उपर्युक्त सूत्र की व्याख्या भाचार्य ढल्हण ने निम्न प्रकार से की है ' माहानसे नियुक्ता मद्दानसिका रसवती-पतय इत्यर्थ, वोढारो वोद्रादयो, बेष्टिकर्मकराः कद्दारादयो वा । सौपा उपकरणभूतद्रव्यसाधकाः सूपव्यञ्जनादिकारकाः, औदनिका उपकार्यभूतमतस्य साधका पौषिकाः पूपादिभक्ष्यार्णा साधकाः कन्दुका इत्यर्थं । अन्येऽत्र केचनेति वैसवारका रकादयः ॥ ' कविराज | हाराणचन्द्र ' चाप्यन्येऽन्न ' के स्थान पर ' चाप्यन्ये तु ' नामक

पाठ का औचित्य स्वीकार करते हैं ।

इङ्गितज्ञो मनुष्याणां वाक्चेष्टामुखवैकृतैः ॥ १८ ॥

विद्याद्विपस्य दातारमेभिर्लिङ्गैश्च बुद्धिमान् ।

न ददात्युत्तरं पृष्टो विवक्षन् मोहमेति च ॥ १६ ॥

अपार्थ बहु सङ्कीर्ण भापते चापि मूढवत ।

स्फोटयत्यङ्गुलीर्भूमिमकस्माद्विलिखेद्धसेत् ॥ २० ॥

वेपथुर्जायते तस्य त्रस्तश्चान्योऽन्यमीक्षते ।

क्षामो विवर्णवत्रच नखैः किञ्चिच्छिनत्यपि ॥ २१ ॥

आलभेतासकृद्दीनः करेण च शिरोरुहान् ।

निर्यियासुरपद्वारेचक्षते च पुनः पुनः ॥ २२ ॥

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श्रध्यायः १ ] कल्पस्थानम् " वर्तते विपरीतं तु विषदाता विचेतनः । विष देने वाले का लक्षण - मनुष्यों के सकेत ( इशारों ) को समझने वाला, चतुर व बुद्धिमान् मनुष्य वाणी, चेष्टा, सुख को भाव भंगिमा आदि से विपदाता मनुष्य को पहचान ले । चिप देने वाला मनुष्य पूछने पर ( प्रश्न किये जाने पर ) उत्तर नहीं देता, बोलने की इच्छा व चेष्टा करता हुआ भी घड़ा जाता है । व्यर्थ की, इधर - उधर की निरर्थक बातें करता है, बहुत बकवास करता है, मूर्खो की भांति मूर्खता पूर्ण बातें करता है । अंगुलियों को चटकाता है, भूमि को नखों व तिनकों से कुरेदता है, अकारण हँसता है । विपदाता मनुष्य रह रहकर काँपने लगता है, डरकर ( भयभीत होकर ) इधर - उधर या एक दूसरे की ओर देखता है । कृशगात्र वाला, सूखा तथा उत्तरा हुआ ( चाम ) मुख वाला, नखों से कुछ तोड़ता रहता है । बारवार हाथों से वालों को छूता रहता है, न जाने योग्य मागों से भागने का प्रयत्न करता है, वारवार मुड - मुड़कर पीछे देखता जाता है । विपरीत चेष्टाये करता है तथा संज्ञारहित, अज्ञान व मूढ हो जाता है ॥ विमर्शः - उपर्युक्त लक्षण अपराधी मन वाले मनुष्य के होते हैं जिन्हें मानसशास्त्र ( Psychology ) में Guilty min ded या Guilty Conscience वाला कहा जाता है । मन में चोर बैठ जाने कारण न जाने कितने प्रकार का तर्क - वितर्क युक्त सन्देह उस मनुष्य के मन में घुसकर घर बना लेता है और उन्हीं के अनुसार उपर्युक्त मानसिक दुर्बलता - सूचक क्रियायें व लक्षणों का प्रदर्शन करने लगता है । कभी कभी आकस्मिक भय या अपने से श्रेष्ठ मनुष्य के समक्ष लाने के समय अथवा भयावहत्व की अवस्था के समय में मनुष्य में कुछ इसी प्रकार के लक्षण आने लगते हैं जिन्हें मानस शास्त्र में Nervousness कहा जाता है और इन्हीं लक्षणों के कारण उत्पन्न होने वाले सन्देह का निराकरण करने के लिये सुश्रुतकार महोदय पुनः आगे कहते हैं कि-केचिद्भयात् पार्थिवस्य त्वरिता वा तदाज्ञया ॥ २३ ॥

असतामपि सन्तोऽपि चेष्टां कुर्वन्ति मानवाः ।

तस्मात् परीक्षणं कार्यं भृत्यानामादृतैर्नृपैः ॥ २४ ॥

विष देने वाले की परीक्षा करने का निर्देश - ( किन्तु ) कभी - कभी राजा के भय से, जल्दी के कारण या राजा की आज्ञा से सजन, निरपराध मनुष्य भी अपराधी व असाधु मनुष्य की भांति आचरण कर बैठते हैं । अतः इन लोगों की परीक्षा समुचित आदर व सावधानी के साथ करनी चाहिये ॥ विमर्श: - चरककार ने विषदाता के लक्षणों का निर्देश निम्नलिखित रूप में किया है यथा- अत्यर्थशङ्कितः स्याद्वद्दुवाग-थवाऽवाग्विगतलक्ष्मोक | प्राप्तप्रकृतिविकारं विषप्रदाता नरो शेयः ॥ ( च ० चि ० अ ० २३३१०६ ) अर्थात् जो मनुष्य किसी को विष देने आता है वह अत्यधिक शक्ति रहता है, उसे इस बात का भय रहता है कि कहीं वह पकड़ न लिया जावे अथवा राजा को व स्वामी को इस बात का पता न चल जाय । वह या तो अपने अपराध को छिपाने के लिये बहुत बोलता है अथवा वहुत थोड़ा बोलता है । उसके देह व मुख की कान्ति नष्ट हो जाती है और उस समय उसके स्वभाव काफी परिवर्तन हुआ रहता है । इस प्रकार हाव-भाव आदि में विकार अन्य कारणों से भी हो सकता है अतः केवल चेष्टाओं से भृत्य को विपदाता न जान लेना चाहिये और न विषदाताओं की चेष्टाओं के न करने से विश्वास ही कर ले । इसका निर्णय करने के लिये अग्नि द्वारा भोज्य अथवा पेय पदार्थ की परीक्षा कर लेना ही श्रेयस्कर होता है ।

अन्ने पाने दन्तकाष्ठे तथाऽभ्यङ्गेऽवलेखने ।

उत्सादने कपाये च परिपेकेऽनुलेपने ॥ २५ ॥

स्रक्षु वस्त्रेषु शय्या कवचाभरणेषु च ।

पादुकापादपीठेषु पृष्ठेषु गजवाजिनाम् ॥ २६ ॥

विषजुष्टेषु चान्येषु नस्यधूमाञ्जनादिषु ।

लक्षणानि प्रवक्ष्यामि चिकित्सामप्यनन्तरम् ॥ २७ ॥

विप देने के सावन - अन्न ( भोजन ), पान ( पेयवस्तु ), दन्तकाष्ठ ( दातुन ), अभ्यंग के हेतु प्रयुक्त होने वाले तैल या पदार्थ में, अवलेखन ( कधी अथवा झामा आदि में ), उबटन, स्नान के हेतु प्रयुक्त किए जाने वाले जल, कपाय, परिषेक, चन्दन आदि लेप, माला, वस्त्र, शय्या, कवच, | आभूषण, जूता, आसन आदि में, हाथी अथवा घोड़े की पीठ, विषैले नस्य, धूम, अञ्जन आदि में विष देते हैं । यहां | ( आगे ) इनके लक्षण कहने के उपरान्त उनकी चिकित्सा । का व्यास्थान किया जावेगा ॥ २५-२७ ॥ विमर्श: - प्रायः विप देने के लिये प्रयुक्त किये जाने वाले । साधनों में से अन्न ( भोजन ) तथा पान ( पेय वस्तु ) तो मुख्य हैं किन्तु अन्य साधनों का भी प्रयोग किया जाता है इतिहास प्रसिद्ध एक उदाहरण हम लोगों के समक्ष है कि औरगजेब ने जयसिंह के पुत्र को विषाक्त सिरोपाव ( एक प्रकार की दरबार में पहनी जाने वाली पोशाक - वस्त्र विशेष ) | प्रदान किया था जिसके पहनने से विष लोमकूपों से होकर जयसिंह के पुत्र के शरीर में व्याप्त हो गया था और फलस्वरूप चे मृत्यु को प्राप्त हो गये थे इसी प्रकार वीड़ी व सिगरेट में far मिलाकर भी प्राणों का विनाश किया जा सकता है ।

नृपभक्ताद्वलिं न्यस्तं सविपं भक्षयन्ति ये ।

तत्रैव ते विनश्यन्ति मक्षिकावायसादयः ॥ २८ ॥

हुतभुक् तेन चान्नेन भृशं चटचटायते ।

मयूरकण्ठप्रतिमो जायते चापि द्रु सहः ॥ २६ ॥

भिन्नार्चिस्तीच्णधूमश्च न चिराञ्चोपशाम्यति ।

चकोरस्याक्षिवैराग्य जायते क्षिप्रमेव तु ॥ ३० ॥

ears विषसंसृष्टं त्रियन्ते जीवजीवकाः ।

कोकिलः स्त्ररवैकृत्यं क्रौञ्चस्तु मदमृच्छति ॥ ३१ ॥

हृष्येन्मयूर उद्विग्न क्रोशत ' शुकसारिके ।

हंसः च्वेडति चात्यर्थं भृङ्गराजस्तु क्रूजति ॥ ३२ ॥

पृषतो विसृजत्यथुं विष्ठां मुञ्चति मर्कटः ।

सन्निकृष्टांस्ततः कुर्याद्राज्ञस्तान् मृगपक्षिणः ॥ ३३ ॥

वेश्मनोऽथ विभूपार्थं रक्षार्थं चात्मन. सदा । त्रिपमिश्रित अन्न के लक्षणादि - राजा के विपाक भोजन में से दो हुई बलि ( अग्रान्न, भोग नादि ) को मक्षिका

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६ सुश्रुतसंहिता ( मनी ), काक ( कोप ) आदि जो भी खाते हैं वे शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं । विपमिश्रित अन्न को आग फेंकने मे ( अगियारी देने से ) चट - चट शब्द अत्यधिक होता है तथा अनिशिसा ( आग की लपटों ) का रंग मोर की ग्रीवा की भाँति हरापन लिए हुए नीले वर्णं का हो जाता है, हम अग्नि का तेज असह्य होता है । ज्वाला विभक्त ( फटी हुई अलग अलग होती है, धुए में तीक्ष्णता रहती है तथा अग्नि प्रायः शीघ्र ही न जाती है । विपमिश्रित अन्न के सेवन से चकोर नामक पक्षी की आँखों की लालिमा नष्ट हो नाती है । विपमिश्रित अन्न को देखकर जीवजीवक नामक प्राणधारी तुरन्त मर जाता है । विषाक्त अन्न के कारण कोकिल ( कोयल ) का स्वर विकृत हो जाता है, कौन नामक पक्षी को मद चढ़ जाता है । मयूर अत्यधिक चचल । ( ट ) एवं नि हो जाता है, तोना तथा मैना क्रन्दन करने लगते हैं - चीखने चिल्लाने लगते हैं । हंस नामक प्राणधारी पक्षी जोर जोर से शब्द करने व चिल्लाने लगता है । भृङ्गराज नामक पक्षी विशेष रूप से क्रूजने लगता है । पृपत् नामक प्राणी ( चित्तल हरिण ) के नेत्रों से अथुस्त्राव होने लगता है और बन्दर तो विपाक अन्न को देस व सुंवकर तुरन्त ही मल त्याग कर देता है । इसलिये राजा को चाहिए कि वह इस प्रकार aur aaa पहिचान के लिए गृद्य पशु पक्षियों को वर में पाले, ऐसा करने से दो लाभ होते हैं प्रथम तो यह कि इन पशु - पक्षियों से घर की शोभा बढ़नी है तथा द्वितीयत ' विपाक अन्न से अपने प्राणों की रक्षा भी होती रहती है ॥ २८-३४ ॥ 1 त्रिमर्गः - ढल्हणाचार्य महोदय ने उपर्युक्त पद्यांश की व्याग्या करते हुए लिग्ता है कि ' रसरूपादिभिस्तल्लिङ्गमुद्दि शन्नाह – नृपमकाद्राजभोजनाद । हुनसुगित्यादि । हुनक्षुक् वह्नि ' । दन मविगार्तेन चचडायन इति च ेन विपशानं, मयूरकण्ठ-प्रतिम उनि रूपेण विद्यानं, नीचनूमचेति गन्धेन विपधानं, रसेन विपान ' विनश्यन्ति मचिकावायसादयः ' इत्यनेनाभिहिनन् । एवं शय्यादिभि पनि ( चतुभि. ) विषद्यानं प्रतिपाद्यापरेणापि कारण कोपिक्षिमृगलुगविनिकारेण विपज्ञानमुद्दिशति । चकोरस्येत्यादि अक्षराच्य रूपग्रहणेऽत्वमिति गयी, विगन-रागेश्री भवति सा । 1 नीवजीवकः पक्षिविशेषः कौद्ध अनि लुग्चि निच लोके । नमृच्छति हर्ष यानीत्यर्थ । हृन्येन्मयूर उद्विग्न नि उद्विग्नश्रलिन मन् मयूरो हृप्येत नृभ्येदित्यर्थं विनिरिह चलना न भयानं परस्परविरोधात् । अंशुन शुकसारिकै नि मनाइनचं कुतसर्थ । हम तिचान्यमिति अतिशयेन शब्दायन उत्पर्यः । भृङ्गराजस्तु कननीति भ्रहणजो भ्रमरको धूम्पाटमा पक्षिराज इतिटोके,

कृदति अव्या शाप पृषनचिदिन्दु चितिटोके ।

उपनिनस्य चान्नस्य चाप्पेणो प्रमर्पता ॥ ३४ ॥

इत्पीडा भ्रान्तनेत्रन्वं शिरोदु खं च जायते ।

नत्र नस्याने कुष्ट लामन्नं नलदं मधु ॥ ३५ ॥

कुर्याच्छरीपरजनी चन्द्रश्च प्रलेपनम् ।

हृदि चन्दनले पस्तु तथा सुखमवाप्नुयान् ॥ ३६ ॥

विपमिश्रित अन्न के बाप के कार्य - विपाक अन्न को स्नाने के लिये थाली में परोसते समय उसमें से निकलने वाले बाप के ऊपर उठकर सूवे जाने पर हृदय में पीड़ा, नेत्र की भ्रान्ति तथा शिरोवेदना आदि लक्षण व्यक्त होने लगते हैं इन सब लक्षणों के निवारणार्थं नस्य तथा अञ्जन के लिये कूट, खस, जटामांसी तथा मधु का प्रयोग करावे । शिरीप, हरिद्रा ( हल्दी ) तथा चन्दन का लेप करे । हृदय - प्रदेश पर चन्दन का लेप लगावे हमसे उपर्युक्त लक्षणों को निवृत्ति होने से सुख ( आराम ) प्राप्त होता ॥ ३५-३६ ॥ विमर्श. -- कहीं पर आचार्य ढल्हण ने इस पाठ में अन्य पाठान्तर भी पाया है जिसका निदर्शन करते हुए वे लिखते हूँ कि ' उपक्षितस्येत्यत्र रखाक्षिप्तस्येति केचित् पठन्ति, उम्खा स्था-ठाति । इसी प्रकार कविराज हाराणचन्द्र ने भी ' लामजं ' के स्थान पर ' राम ' नामक पाठान्तर का औचित्य स्वीकार किया है ।

पाणिप्राप्तं पाणिदाहं नखशातं करोति च ।

अत्र प्रलेपः श्यामेन्द्रगोपासोमोत्पलानि च ॥ ३७ ॥

त्रिपमिश्रित अन्न के हाथ में लगने पर प्रभाव के लक्षण--( इसी प्रकार ) हाथों में लगा हुआ विपमिश्रित अन्न हाथों में दाह ( जलन ), नखशातन ( नत्रों का झड़कर गिरना ) आदि लक्षण उत्पन्न करता है । इसके प्रतिकारार्थं प्रिय, अनन्तमूल, कटुफल और कमल का लेप करें ॥ ३७ ॥

विमर्श: - सुश्रुतसहिता के प्रसिद्ध टीकाकार श्री ढल्हणा चार्य ने उपयुक्त सूत्र की व्याख्या निम्न रूप में की है ' नख शात नखपाननम् । श्यामा श्यामालता, प्रियदुरित्यपरे, इन्द्रा इन्द्र-वाणी, गोपा सुगन्धमूला सारिवा, इन्द्रगोप - इत्यन्ये पठन्ति, तत्रेन्द्र-गोपः कीटविशेषः, सोमा गुडूचीं, मोमलतेत्यन्ये, उत्पल नीलोत्पलन् ' इस प्रकार हुन आचार्य ने सोम का अर्थ गिलोय तथा श्यामा का श्यामालता अर्थ दिया है ।.

स चेत् प्रमादान्मोहाद्वा तदन्नमुपसेवते ।

अष्टीलावत्ततो जिह्वा भवत्यरसवेदिनी ॥ ३८ ॥

तुद्यते दह्यते चापि श्लेष्मा चास्यात् प्रसिच्यते ।

तत्र बाप्पेरितं कर्म यच स्याहान्तकाष्टिकम् ॥ ३६ ॥

सविष अन्न के मोचन करने में टोप - यदि मोह या आलस्य के वशीभूत होकर मनुष्य इस विपमिश्रित अन्न को खा लाता है तो उसकी जिल्ह्ना ( जीभ ) अष्टीला ( गुठली, पत्थर अथवा लोहे ) की भांति अकड - ऐंठ कर कडी एव रसज्ञान से विहीन हो जाती है अथवा रस को नहीं पहचान पाती है । तथा इसमें चुमने के समान पीड़ा ( दर्द ) और जलन होती है, मुख मे अतिमात्रा में लालान्नाव, व लेप्मा ( कफ ) का नाव होने लगता है इस प्रकार की अवस्था में ३५-३६ श्लोक के अन्तर्गत कही गई चिकित्सा का प्रयोग करना चाहिए अथवा आगे कही जाने वाली दन्तकाष्टगत त्रिप के अन्तर्गत कही गई चिकित्सा की योजना करे ॥ ३८-३९ ॥ विमर्श: --- आचार्य ढल्हण ने व्याख्या की है कि ' टान्नका-ठिकमिति वानकीपुष्पादिमि. प्रतिभारण, तच प्रतिमारणमप्रच्छिते ! धोके विधेयम् इनि ॥ '

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श्रध्यायः १ ] कल्पस्थानम्

मूर्च्छा छर्दिमतीसारमाध्मानं दाहवेपथू ।

इन्द्रियाणां च वैकृत्यं कुर्यादामाशयं गतम् ॥। १० ॥

तत्राशु मदना लावुबिम्बीकोशातकीफलैः ।

छर्दन दध्युदश्विद्भद्यामथवा तण्डुलाम्बुना ॥ ४१ ॥

आमाशयगत विष के लक्षण तथा चिकित्सा - आमाशयगत विषाक्त अन्न, ' मूर्च्छा, वमन, अतिसार, आध्मान, जलन, कम्पन और इन्द्रियों में विकार करता है । इस अवस्था में तुरन्त ही मदनफल ( मैनफल ), कटुतुम्बी ( कडुवी तुम्बी ), कडुवी तरोई आदि के फलों से वमन करावे अथवा दही के पानी, तक्र से अथवा चावलों के पानी से वमन करावे ॥

दाहं मूर्च्छा मतीसारं तृष्णामिन्द्रियवैकृतम् ।

आटोपं पाण्डुतां कार्यं कुर्यात् पक्काशयं गतम् ॥ १२ ॥

विरेचनं ससर्पिष्कं तत्रोक्तं नीलिनीफलम् ।

दध्ना दूपीविषारिश्च पेयो वा मधुसंयुतः ॥ ४३ ॥

पक्काशयगत विष के लक्षण - पक्वाशयगत विष दाह, मूर्च्छा, अतिसार, तृष्णा ( प्यास का वारम्वार व अधिक लगना ), इन्द्रियों में विकार, आध्मान, पाण्डुता तथा कृशता ( ' दौर्बल्य ) उत्पन्न करता है । इस अवस्था में नीलिनीफल का विरेचन घी के साथ देना चाहिए । दूषित विपारि अगद का सेवन दही अथवा मधु से मुख द्वारा पीकर करे ॥४२-४३ ॥ विमर्शः — उपर्युक्त ४०, ४१, ४२ तथा ४३ वें श्लोकों को पढ़ने से प्रतीत होता है कि मुख द्वारा लिए गए भोजन में मिश्रित विष के आमाशयान्त्र - प्रणाली में पहुंचने पर मुख, जिह्वा, अन्नप्रणाली ( Oesophagus ), आमाशय ( Stomach ) तथा पक्वाशय ( Duodenum ) में पहुँचने पर किस प्रकार प्रतिक्रिया होती है और उस प्रतिक्रिया के फलस्वरूप कौन कौन से लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं । इन्हीं सब प्रतिक्रियाओं व लक्षणादि का विशद वर्णन आचार्य ने अपनी संहिता में माज से लगभग ४-५ हज़ार वर्ष पहले किया था और आज जब हम आधुनिकदृष्टया विपविज्ञान ( Toxicology ) का अध्ययन करते समय उसी वर्णन को पढ़ते हैं तथा आयुर्वेद के संहिताग्रन्थों में लिखित वर्णन से तुलना करते हैं तो हमारा मस्तक गर्व से उन्नत हो जाता है कि जिस विषय की विवेचना आज के वैज्ञानिक समस्त यत्रोपकरणों से सुसज्जित होने पर भी नहीं कर पाए हैं उसी विषय को विशद एवं साङ्गोपाङ्ग - विवेचना हमें आज से ३-४ हजार वर्ष पूर्व लिखित आयुर्वेद के संहिताग्रन्थों में मिलती है ।

द्रवद्रव्येषु सर्वेषु क्षीरमद्योदकादिषु ।

भवन्ति विविधा राज्यः फेनबुदबुदजन्म च ॥ ४४ ॥

छायाश्चात्र न दृश्यन्ते दृश्यन्ते यदि वा पुनः ।

भवन्ति यमलाछिद्रास्तन्व्यो वा विकृतास्तथा ॥ १५ ॥

सविष द्रव द्रव्य के लक्षण - विपाक्त दूध, मद्य, जल आदि सभी तरल पदार्थों में विप के कारण नाना प्रकार की रेखाएँ । दृष्टिगोचर होने लगती हैं तथा उक्त द्रवों में बुदबुदादिक उत्पन्न होने लगते हैं । इन द्रव पदार्थों में साधारण की भांति कोई प्रतिबिम्ब दिखाई नहीं देता और यदि दिखाई भी देता है तो वह जुडा हुआ ( युग्मित, दो का ), छिद्रान्वित ( छेद । ७ वाला ), पतला अथवा विकृत आकार प्रकार वाला होता है ॥ विमर्शः- उक्त सूत्र की व्याख्या करते हुए डल्हणाचार्य महोदय ने लिखा है कि- ' द्रवद्रव्येषु क्षीरादिषु यत् स्थूलं लक्षणं तदाह - द्रवद्रव्येष्वित्यादि । विविधा राज्यो नानाप्रकारा लेखा ' । विविधा राज्यः श्रीवाग्मटेन व्याख्याता, तथा च ' नोला राजी रसे तात्रा क्षीरे दधने दृश्यते । दयावा पीताऽसिता तक्रे घृते पानी-यसन्निमा || काली मद्याम्मसोः क्षौद्रे इरित्तैलेऽरुणोपमा ' इति । फेने-त्यादि फेनस्य बुदबुदस्य चोत्पत्तिरित्यर्थं । यमला युग्माः । छिद्राः ससुषिराः । तन्व्यः सूक्ष्माः । गयी तु तन्व्य इत्यत्र ' अन्या ’ इति पठित्वा व्याख्याति । अन्यतरेषा पशूनामिव द्यायाः । विकृताः सौम्यस्यापि रौद्राः, रौद्रस्यापि सौम्या ' | कहने का तात्पर्य यह है कि आचार्य वाग्भट ने ऊपर कही गई विविध रेखाओं का वर्णन स्पष्ट रूप से दिया है और प्रतिदिन के अनुभव से भी हमें उपर्युक्त उक्ति सत्य प्रतीत होती है क्यों कि यह तो | प्रायशः देखा ही जाता है कि जब किसी कारण से किसी धातु-निर्मित पात्र में रखा दूध विकृत हो जाता है तो ताम्र पात्र में वह नीलवर्ण का दृष्टिगोचर होने लगता है तो फिर यह भी सम्भव है कि उक्त दुग्ध में ताम्रजनित विष मिला देने पर उसका रंग नीला पड जावे अथवा उसमें नीले रंग की रेखाएं दृष्टिगोचर होने लगे । इसी प्रकार दही में ताम्रजनित विप तूतिया आदि मिला देने पर दधि में हरे रंग की रेखाएं पड़ जाती हैं यही क्रम हम तैल, मधु, घृत आदि द्रव पदार्थों में भी देख सकते हैं, इस प्रकार उक्त श्लोकों को पढ़ने एक विज्ञ वैद्य को इस बात का ज्ञान तो भली भांति हो ही जाता है कि विभिन्न पेय पदार्थों के विषाक्त होने पर कौन - कौन से विकृतिसूचक लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं । अस्तु ।

शाकसूपान्न मांसानि क्लिन्नानि विरसानि च ।

सद्यः पर्युपितानीव विगन्धानि भवन्ति च ॥ ४६ ॥

गन्धवर्णरसैर्हीनाः सर्वे भक्ष्याः फलानि च ।

पक्कान्याशु विशीर्यन्ते पाकमामानि यान्ति च ॥ ४७ ॥

सविष शाक, दाल तथा भक्ष्य फल के लक्षण - शाक, दाल, अन्न तथा मांस आदि आहार द्रव्यों के विपाक होने पर वे किन्न, स्वादरहित, तुरन्त ही बनाए गए होने पर भी वासी की भांति से दीखते हैं । इनकी गन्ध नष्ट हो जाती है । इस प्रकार सभी भच्य पदार्थ विपाक्त होने पर गन्ध, वर्ण, आदि से रहित हो जाते हैं । इसी प्रकार पके हुए फल भी विप से युक्त होने पर शीघ्र ही सड जाते है तथा कच्चे फल विप के प्रभाव से शीघ्र पक जाते हैं ॥ ४६-४७ ॥ विमर्श: - इसी प्रसङ्ग में कौटिल्य अर्थशास्त्र के प्रथम अधिकरण के २० वें अध्याय में लिखा मिलता है कि ' यदि भोजन में चिप मिला हो तो अग्नि में उसकी लपट नीली और उसमें से निकलने वाला धुआँ भी नीला ही निकलेगा तथा अग्नि में चटचट शब्द होगा । यदि उस अन्न को पक्षियों ने खाया होगा तो वे भी उसी समय तड़फड़ाने लगेंगे । उस भम्न में से जो वाप्प ( भाप Vapour ) उठेगी वह भी मयूर ( मोर ) की ग्रीवा के समान नीले रंग की होगी | दिप-मिश्रित पकाया हुआ अन्न शीघ्र ही ठण्डा हो जाता है तथा तोड़ने - फोडने पर उसका रंग भी अन्य प्रकार का हो जाता है ।

पृष्ठ 606

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u सुश्रुतसंहिता किसी विष के संयोग से भोजन में से जलांश पृथक होने लग जाता है और किसी विप के सम्पर्क से भोजन बहुत ही रुखा । वन जाता है । इसी प्रकार चरककार ने भी च. चि. अ. २३ । के ११०-१११ श्लोकों में उक्त विषय का विवेचन करते हुए लिखा है कि, ' पाने नीला राजी वैवर्ण्यस्वा च नेक्षते द्यायाम् । विकृनामथवा पश्यति लवणाचे फेनमाला स्यात् ॥ ११० ॥ पाना-नयोः सविषयोर्गन्धेन शिरोरुजा हृदि मूर्च्छा च । सर्शेन पाणिशोथः

सुप्यद्भुलिदाहृतोदनखभेदा ॥११ ॥ मुखनात्वोष्ठचिमचिमा जिहा

शुना नडा विवर्णां च । द्विनहर्षहनुस्तम्भास्यदा इलालागलविकारा ' ॥ ११२ ॥ भामाशय प्रविष्टे वैवर्ण्य स्वेदसदनमुत्वछेद । दृष्टि

हृदयोपरोधो दिन्दुशतैश्चीयते चाङ्गन् ॥ ११३ ॥ पक्काशयं तु याते ।

मूर्च्छामदमोहदाइबलनाशाः । तन्द्रा कार्य च विषे पाण्डुत्वं चोदरस्थे स्यात् ॥ ११४ ॥ अर्थात् - पान द्रव्य ( दूध आदि ) में

यदि विष संयोग हो तो उसमें नीलवर्ण को रेखा दिखाई । देती है अथवा उसका वर्णं ही विकृत हो जाता है । अपना । प्रतिविम्ब दिखाई नहीं पड़ता अथवा यदि प्रतिविम्ब दिखाई पडता है तो वह विकृत होता है । यदि उस द्रव में नमक ढाला जाय तो झाग बहुत उदता है ( परन्तु इसी परीक्षा पर हो आधारित नहीं हो जाना चाहिये । विषभेद से एक ही द्रव में भी नाना प्रकार को राजियाँ ( रेसाएँ ) उत्पन्न हो सकती हैं ) । विषयुक्त पेय द्रव व भोज्य अम्न को गन्ध से शिर में पीड़ा हो जाती है और हृदय पर प्रभाव होने से मूर्च्छा भी हो सकती है । स्पर्श से हाथ में शोथ व सुप्ति ( वहाँ की संज्ञावाहिनी नाड़ियों का कार्य न करना ), अंगुलियों में दाह अथवा व्यथा हो सकती है, नखों में भेदनवत् पीड़ा होती है अथवा नख टूटने लगते हैं । अतः जब उस अन्न को खाते हैं वा उस विषाक्त द्रव को पीते हैं । तब सुख, तालु और होंठों में चिमचिमाहट पूर्ण वेदना होती है । जीम सूज जाती है तथा लढवत् ( स्तब्ध ) हो जाती है तया उसका वर्ण भी विकृत हो जाता है । दन्तहर्ष, हुनुस्तम्भ, मुम्बदाह, लालास्राव तथा गले में विकार हो जाते हैं । आमाशय में विषाक्त अन्न या पेय इन्य के पहुँचने पर । वहाँ की विवर्णता होती है, पसीना आता है, शिथिलता तथा ठरक्लेश ( जी मिचलाना ) होता है । दृष्टिरोध और हृदय का उपरोध ( अपना कार्य न करना ) तथा मूर्च्छा ( Synoope ) ) होता है, आमाशय में सैकड़ों विन्दु सह स्फोट हो जाते हैं । उमी विषात अन्न के पक्वाशय में पहुंचने पर मूर्खा, मद, मोह ( इन्द्रियों का स्व · विषय ग्रहण में असमर्थ होना ), दाह तथा निर्बलता होती है तथा विष के उदर में रहने पर तन्द्रा, कृशता और पाण्डुता होती है । ( पक्वाशय से ग्रहणी एवं उदर से अभिप्राय शुद्रान्त्र तथा बृहदन्त्र दोनों मे है अथवा पकाशय से प्रहणी और चुद्रान्त्र का तथा उदर । से बृहदान्त्र का ग्रहण करना चाहिये । ) इस प्रकार पाश्चात्य विकिमा के ग्रन्थों में भी विषजुष्ट मनुष्य में निन्नलिखित पण दृष्टिगोचर होते हैं । आम्लिक विष के सामान्य लक्षण निम्नलिखित है । ( 1 ) स्वाद ( Taste ) अम्लीय होता है । ( २ ) मुग में दाह पुत्र पीड़ा का अनुभव तथा ओष्ट, जिल्हा गया ग में शोध एवं व्रजोत्पादन ( ulceration । क्षेत्र । ( ३ ) वमन होना है, जिसमें आमाशयान्नप्रणाली से श्लैष्मिक कला के टुकडे भी पाए जाते हैं । ( ४ ) तृष्णा ( ध्यास ) की अधिकता होती है । ( ५ ) मुख कष्ट के साथ शब्द निकलते हैं अथवा बिल्कुल नहीं निकलते । ( ६ ) उदर में शोथ, पीडा एवं हृदयावसाद ( cardiac failure ) ( ७ ) त्वचा का अधोभाग स्वेदयुक्त होता है । ( ८ ) नाडी दुर्बल हो जाती है तथा ( ९ ) श्वास अति कठिनता से आती जाती है । इसी प्रकार क्षारीय विप के सामान्य लक्षण निम्न-लिखित होते हैं । ( १ ) सुख में कपायपन तथा गले व आमा शय में दाहयुक्त उष्णता का अनुभव होता है । ( २ ) चमन प्रायः कम होता है किन्तु वमन का रङ्ग भूरा होता है तथा वमित द्रव्य में रक्त एव श्लैष्मिक कला के टुकड़े भी पाए जाते हैं । ( ३ ) विरेचन होता है ( ४ ) उदर शूल, नाडी - दुर्बलता एव मुख से आमाशय तक लालिमा एवं शोथ होता है इस प्रकार यदि हम इन लक्षणों को आयुर्वेदीय ग्रन्थोक्त लक्षणों से मिलावें तो हमें उनमें अनुपम साहश्य मिलता है जिससे | हमें इस बात का गौरव होने लगता है कि आज से कई सहस्र वर्ष पूर्व लिखे गए ग्रन्थों में भी इस सम्बन्ध में कोई | बात वर्णन से छूटी नहीं थी I । अस्तु । विशीर्यते कूर्चकस्तु दन्तकाष्ठगते विषे । " जिह्वादन्तोष्ठमांसानां श्वयथुश्वोपजायते ॥ ४८ ॥

अथास्य धातकीपुष्पपथ्याजम्बूफलास्थिभिः । 1

सक्षौद्रैः प्रच्छिते शोफे कर्तव्यं प्रतिसारणम् ॥ ४६ ॥

अथवाऽङ्कोठमूलानि त्वचः सप्तच्छदस्य वा ।

शिरीषमापका वाऽपि सक्षौद्राः प्रतिसारणम् ॥ ५० ॥

सविष दांतुन आदि के लक्षण तथा चिकित्सा - दन्तकाष्ठ ( दांतुन ) में विप संचार होने पर दातुन की कूची झड़ने लगती है । जिह्वा, भोष्ठ, दांत और मसूढ़े सूज जाते हैं । ( इसकी चिकित्सा के लिए ) इसमें पाछना लगा कर धाय के फूल, हरड़, जामुन की गुठली आदि को मधु में - घिस कर मसूड़ों पर मलें ( घर्षण अथवा प्रतिसारण करें ) अथवा अंकोठ को मूल या सप्तपर्ण की छाल, शिरीष के बीज इनका मधु के साथ प्रतिसारण ( घर्पण ) करे ॥ ४८-५० ॥ विमर्श:: - --- चरककार भी दन्तकाष्ठगत विष के लक्षणों का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि ' दन्तपवनस्य कूच विशीर्यते दन्तोष्ठमांसशोफश्च ' ॥ ( च. चि. अ. २३ ११५ ) दातुन की कूची टूट जाती है तथा भोष्ठ एवं मसूदों में शोथ हो जाता है । जिह्वानिर्लेखकवलौ दन्तकाष्ठवदादिशेत् । मविष जीमो, कवलादि को चिकित्सा - जिह्वा निर्लेखन ( जीभी, Tongue cleaner ) और कवल ( गण्डूप, कुल्ला अथवा Gargle ) के विप से दूषित होने पर दांतुन के प्रसङ्ग

में कही गई चिकित्सा करे ।

पिच्छिलो बहुलोऽभ्यङ्गो विवर्णो वा विपान्वितः ॥५१ ॥

स्फोटजन्म रुजा स्रावस्त्वक्पाकः स्वेदनं ज्वर ' ।

दरणं चापि मांसानामभ्यङ्गे त्रिसंयुते ॥ ५२ ॥

तत्र शीताम्बुसिक्तस्य कर्तव्यमनुलेपनम् ।

चन्दनं तगरं कुष्टमुशीरं वेणुपत्रिका ॥ ५३ ॥

पृष्ठ 607

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श्रध्याय १ ] कल्पस्थानम्

सोमवल्लयमृता श्वेता पद्मं कालीयकं त्वचम् ।

कपित्थरससूत्राभ्यां पानमेतच्च युज्यते ॥ ४४ ॥

विषय आदि के लक्षण तथा चिकित्मा - विषाक्त - पिच्छिल ( चिपचिपा ), गाढ़ा, विवर्ण हो जाता है । इसके सेवन से स्फोट ( छाले ) उत्पन्न हो जाते हैं, पीड़ा, स्त्राव, त्व - पाक ( त्वचा का पकना ), पसीना आना, ज्वर और त्वचा का विवरण ( त्वचा का फटना ) होता है । इसमें ( विषजुष्ट मनुष्य को ) शीतल जल से स्नान करा कर चन्दन, तर, फूल, स, वंशपत्र ( यांम के पत्ते ), गिलोय ( अमृता ), अपराजिता ( कोयल ), कालीयक काष्ठ तथा दालचीनी को कपि ra ( क्य ) के रम और गोमूत्र के माथ पीस कर शरीर पर लेप करें तथा इसको पीयें भी ॥ ५६-५४ ॥ विमर्श: - आचार्य ढल्हण ने टक्त पद्यांश की व्याम्या करते हुए लिखा है - पिच्छिल इत्यादि । अन्योऽयान्यजनद्रव्य नादि । दइ घन् । वैगुपत्रिका वंशपत्रागिः अन्ये वैगुपत्रिकां वंशमदृशपत्रितद्रव्यान्तरमाः । मोनो गुहनी । अमृता अमृता ः सपरिका तुत्थकर, उत्तरपदलोपा, श्वेता वेनस्यन्द्र, कालीयक दारिद्रा | बगनम् । मनुलेपन श्रीननोयेन । मूत्र गोनू-श्रम । एतच्चेनि चन्दनादिकम् ' ॥ इस प्रकार आचार्य ढल्हण ने | अमृता अमृता का ग्रहण कर नृत्य का पाठ किया है । श्वेता से श्वेतस्यन्द का पाठ किया है तथा श्वेत का प्रयोग श्वेत । वचा के लिए भी प्रयुक्त माना है । वस्तुतः और सभी पाठों । के विषय में कोई आपत्ति नहीं भी होनी चाहिए किन्तु अमृता । के लिए ' अमृतासन ' अथवा तुत्य का पाठ व प्रयोग तो उचित एवं तर्कसम्मत प्रतीत नहीं होता, विवादास्पद विषय हो । जाता है । अस्तु ।

उत्सादने परीपेके कपाये चानुलेपने ।

शय्यान्तनुत्रेषु ज्ञेयमभ्यङ्गलक्षणैः ॥ ५५ ॥

सविष उत्पादन परिपेक, कषाय, अनुलेपन, शय्या, वन तथा कचत्र के लक्षण और चिकित्मा - उत्सादन, परिपेक, कपाय, अनुलेपन, शय्या, बस्त्र और कवचों में विष का योग होने पर अभ्यग के समान लक्षण और चिकित्सा का विधान किया जाता है || ११ ||

केशशातः शिरोदुखं खेभ्यश्च रुधिरागमः ।

ग्रन्थिजन्मोत्तमाङ्गेषु विजुवलेखने ॥ ५६ ॥

प्रलेपो बहुरास्तत्र भाविताः कृष्णमृत्तिकाः ।

ऋप्यपित्तधृतश्यामा पालिन्दीतण्डुलीयकै ॥ ५७ ॥

गोमयस्वरसो बां s पि हितो वा मालतीरसः ।

रसोमृपिकप वा धूमो चाऽगारसंभवः ॥ ५८ ॥

विष कधी आदि के प्रयोग करने पर लक्षण तथा चिकित्मा -कंघी आदि वस्तुओं के विष से युक्त होने पर तथा उनके प्रयुक्त किए जाने पर केशों का पतन, शिर में पीड़ा, रोमकूपों से रक्तप्रवृत्ति ( रोमकूपों से रक्त निकलना ), शिर में गायें ( फुन्सियाँ ) उत्पन्न हो जाती हैं । इसके प्रतिकार के लिए काली मिट्टी को ' रोह ' नाम से प्रसिद्ध नीलाण्ड मृग के पिच, घृत, श्यामा ( प्रियंगु ), निशोथ, तण्डुलीयक ( चौलाई ) आदि से कई बार भावित करके लगावे अथवा गोवर का रस या २ सु ० क ० चमेली का स्वरस शिर पर लगावे या मूषाकर्णी अथवा । मूषकपर्णी का रस या गृहधूम ( घर का ध्रुवां ) लगावे ॥५६-५८ ॥ विमर्श: - आचार्य उल्हण ने उक्त श्लोकों की व्याख्या करते हुए लिखा है- केशशान इत्यादि । ऋष्यपित्तवृनश्यामादि-स्वरसे: मप्ता भाविनया कृन्गमृदा बहुशः प्रलेपो दिन इत्यर्थः । ऋथ्यो नीलाण्ट'रोम ' इति प्रसिद्धः । काल्सण्डलग्ननलिकामध्यगन-जलं पित्तन् । श्यामा प्रियतु, पालिन्डो त्रिवृत्, मूषिकपर्णी, द्रत्रन्ती, द्रव्यान्तरमिति अन्ये । प्रलेपशब्दो गोमयस्वरमो वेत्यत्र हित-शब्देन मह सम्बन्धनीयः तेन गोमयरसादिप्रलेपो वा दितो भवतीति सम्बन्ध. स्यात् ।

शिरोऽभ्यङ्गः शिरखाण स्नानमुष्णीपमेव च ।

जय विपसंसृष्टाः साधयेदवलेखनात् ॥ ५६ ॥

मपि तैलादि का गिर पर अभ्यक्ष ण्व मविष कवच, साफा नदा माला धारण करने पर लक्षण तथा चिकित्मा - शिर का अभ्यंग ( ( तेल आदि Hair oil ), शिरखाण ( लोहे का टोप | Helmnt ), स्नान का जल, पगडी, मालायें इनके त्रिप से युक्त होने पर उपर्युक्त कधी के समान लक्षण एवं चिकित्सा का विधान माने ॥ ५ ९ ॥ विमर्श: - चरककार ने भी शिर पर विषयुक्त तैल के अभ्यन का प्रभाव बताते हुए लिखा कि- ' केशच्युति शिगे-ग्रन्थयश्च मविषे शिरोऽभ्यने ॥ ( च चि. अ. २३ | ११५ ) यदि शिर पर किया गया अभ्यङ्ग विपयुक्त हो तो वाल ( केश ) गिरते हैं और शिर में ग्रन्थियाँ हो जाती है । इसी प्रकार स्नान आदि में विष के प्रभाव का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि- ' स्नान, न्यगोत्साहन वस्त्रालङ्कार वर्णकैर्दुष्टेः । कण्ड्वतिलोमहर्षाः कोठपिटकाचिमचिमाः शोधाः ॥ ( च. चि. अ. २३ । ११६ ) स्नान, अभ्यङ्ग, उबटन, वस्त्र, आभूषण, वर्णक ( अङ्गराग Rouge आदि सौन्दर्य प्रसाधन ) आदि यदि विपदुष्ट होवें तो कण्डू, लोमहर्ष, कोट, पिढिकाए, चिमचिमायन होना तथा शोथ हो जाता है । इसी प्रकार सुश्रुतोक्त ' कपाय ' शब्द से अभि • प्राय शोधन काय का है अथवा कपाय से मुख पर गारार्थं लगाए जाने वाले रागकादि का अर्थं ग्रहण करना चाहिए ।

मुखालेपे मुखं श्या युक्तमभ्यङ्गलक्षणैः ।

पद्मिनीकण्टकप्रख्यैः कण्टकैश्चोपचीयते ॥ ६० ॥

तत्र क्षौद्रघृतं पानं प्रलेपश्चन्दन घृतम् ।

पस्या मधुकं फखी बन्धुजीवः पुनर्नवा ॥ ६१ ॥

मविष आलेप द्रन्य से मुख लिप्त होने पर लक्षण तथा चिकित्सा - मुख के आलेप के विष से युक्त होने पर ( विप जुष्ट ) मुख श्यामवर्ण, विषैले अभ्यङ्ग के समान लक्षणों वाला हो जाता है | पद्मिनीकण्टक के समान कांटों ( फुन्सियों ) से भर जाता है । इसके प्रतिकार के लिए मधु घृत का पीना, चन्दन, घी, विदारीकन्द, मुलैठी, भारङ्गी, दुपहरिया तथा पुनर्नवा आदि द्रव्यों का लेप करे ॥ ६०-६१ ॥ विमर्शः --- कविराज हाराणचन्द्र जी ने उपर्युक्त श्लोक में ' मुखालेपे ' शब्द के स्थान पर ' मुखलेपे ' शब्द के औचित्य को स्वीकार करते हुए पाठान्तर होने का निर्देश दिया है जो विचारणीय है । चरककार का मत हम पिछले श्लोक ( १ ९ वें श्लोक ) की व्याख्या करते समय दे ही चुके हैं अतः उसी वक्तव्य की पुनरावृत्ति करने से भी कोई लाभ नहीं है ।

पृष्ठ 608

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सुश्रुतसंहिता

अस्वास्थ्यं कुञ्जरादीनां लालास्रावोऽक्षिरक्तता ।

स्फिक्पायु मेढमुष्केषु यातुश्च स्फोटसंभवः ॥ ६२ ॥

तत्राभ्यद्भवदेवेष्टा यातृवाहनयोः क्रिया । विपयुक्त वाइन के लक्षण तथा चिकित्सा - हाथी, घोडे आदि चाहनों की पीठ पर विष लगाने से हाथी, घोडे आदि वाहन पशु रुग्ण हो जाते हैं, उनके मुख से लालास्राव होता रहता है तथा आँखें लाल हो जाती हैं तथा उनपर सवारी करनेवाले मनुष्य के नितम्व, गुदा, मेहन ( मूत्रेन्द्रिय ) तथा सुरक ( अण्डकोषों ) पर स्फोट ( छाले ) उत्पन्न हो जाते हैं, इन लक्षणों के प्रतिकार के लिए अभ्यङ्ग के प्रसग में कही गई चिकित्सा उस चाहन तथा विप से प्रभावित मनुष्य की करें ॥ विमर्श: - कविराज हाराणचन्द्र महोदय ने ' यातुश्च ' नामक शब्द के स्थान पर ' युक्तेपु ' शब्द के भौचित्य को स्वीकार किया है और वह उचित भी है । आचार्य दुल्हण ने भी उक्त शब्द की व्याख्या निम्न प्रकार से की है - पातु आरोहकस्य । यातृवादनयो ' क्रियेति । अत्र यातृशब्द आरोहक

पर्याय इति ।

शोणितागमनं खेभ्यः शिरोरुक्कफसंस्रवः ॥ ६३ ॥

नरयधूमगते लिङ्गमिन्द्रियाणां च वैकृतम् ।

तत्र दुग्धैर्गवादीना सर्पि ' सातिविषैः शृतम् ॥ ६४ ॥

पाने नस्ये च सश्वेतं हितं समदयन्तिकम् । सविनय तथा धूम के लक्षण तथा चिकित्सा - नस्य और धूम में विप होने पर - नाक से रक्तप्रवृत्ति होती है, शिर में बेदना, कफ का नाव तथा इन्द्रियाँ विकृत हो जाती हैं । इस अवस्था गाय आदि के दूध से, अतिविपा ( अतीस ) के एक द्वारा सिद्ध घृत पीने तथा नस्य कर्म के लिए प्रयुक्त करना चाहिए । कटभी ( श्वेतवच ) तथा मेहदी के

कएक से सिद्ध किए गए घृत का प्रयोग ।

होता है ॥ ६३-६४ ॥

विमर्श: - कोई कोई आचार्य अतीस, मेंहदी, श्वेतवच ( अथवा कोयल ) इन तीनों द्रव्यों के कल्क का एक साथ प्रयोग शब्द का कराते ' श्वेतवच | आचार्य ल्हण ने उपर्युक्त ' सश्वेतम् ' इस के साथ ' अर्थ किया है जब कि कई विद्वान ' सश्वेतम् ' शब्द का तात्पर्य ' श्वेत अपराजिता ' नामक वनौषधि द्रव्य से किया है । अतः यह समस्या विद्वानों द्वारा विचारणीय तथा महत्वपूर्ण प्रतीत होती है । के गन्धहानिर्विवर्णत्व पुष्पाणां म्लानता भवेत् ॥ ६५ ॥

जिव्रतश्च शिरोदुःखं वारिपूर्णे च लोचने । तत्र बाप्पेरितं कर्म मुसालेपे च यत स्मृतम् विष पुष्पकेक्षण तथा चिकित्मा - विषैले ॥ ६६ ॥

हा नष्ट होना, विवर्णना तथा मलिन पुष्पों में गन्ध आदि उपग होते हैं । ऐसे पुष्पों होना ( सुरक्षा जाना ) निर में पीड़ा तथा ऑपों में को सूधने वाले प्राणी प्रतिकार के हेतु ति आंसू आ जाते हैं । इसके ऐपों के प्रसग में कही गई बाप्पों चिकित्मा की भाँति तथा विषैले मुख • - चरककार ने भी उपर्युक्त का प्रयोग करें ॥ ६५-६६ ॥ घर्शन दिया है- ( मात्यमगन्ध ग्लायति प्रसन में निम्नलिखित मी शनि नामामुरनि च दर्शने शिरोमजा धूमः ॥ ( लोमदपंकरम् च.चि. । २३ | ११ ९ ) अर्थात् पुष्पों की माला विपदूषित होने पर गन्ध रहित होती है और शीघ्र मुरझा जाती है तथा साथ ही शिर में पीड़ा और रोमाञ्च होता है । तथा धूम के विपयुक्त होने पर स्रोत ( विशेषकर छाती के ) स्तब्ध हो जाते हैं और नाक एवं नेत्रों को हानि पहुँचती है ।

कर्णतै लगते श्रोत्र वैगुण्यं शोवेद ।

कर्णस्रावश्च तत्राशु कर्तव्यं प्रतिपूरणम् ॥ ६७ ॥

स्वरसो बहुपुत्रायाः सघृतः क्षौद्रसंयुतः ।

सोमवल्करसश्चापि सुशीतो हित इष्यते ॥ ६८ ॥

कर्ण में छोडे हुये सविध तैल के लक्षण तथा चिकित्सा-कान में डाले जानेवाले तैल के विषैला होने पर - सुनाई न पड़ना, कान में शोफ, वेदना तथा कर्णस्राव ( कान बहना ) होता है । इस अवस्था में तुरन्त ही शतावरी का स्वरस, घी तथा मधु मिलाकर डाले । कट्फल का शीतल रस भी गुणकारी व लाभप्रद होता है ॥ ६७-६८ ॥ विमर्श: - भारतीय ( संस्कृत, वैदिक अथवा हिन्दी भाषा के ) साहित्य में कर्णमार्ग से विप - प्रयोग का वर्णन तो प्रातः अलभ्य सा ही है किन्तु आंग्ल साहित्य के महान् कवि तथा नाटककार शेक्सपीयर ने अपने रचित एक नाटक ' हैमलेट ' में विषप्रयोग की इस विधि का विवरण दिया है । इस नाटक के कथानक के अनुसार ' डेन्मार्क ' के राजा का छोटा भाई अपनी राज्य लिप्सा के शमनार्थं अपने बड़े भाई के कानों में जब कि डेन्मार्क नरेश अपने उद्यान में सो रहा था विपाक तैल, अथवा विप की बूँदें डाल देता है जिसके फलस्वरूप उक्त राजा की सुप्तावस्था में ही अति रहस्यपूर्ण मृत्यु हो जाती है फिर वह छोटा भाई अपनी भाभी ( भाई की स्त्री तथा राजकुमार हैमलेट की माता ) से विवाह कर लेता है और युवराज हैमलेट के अधिकार को हड़प कर स्वय डेन्मार्क का राजा वन बैठता है और इस रहस्यमयी मृत्यु का अनावरण मृतात्मा अपने पुत्र से करती है और अपनी मृत्यु के प्रतिशोध की कामना करती है । परिणाम स्वरूप हैमलेट अपने पिता की आत्मा के कथना-की नुसार एक नाटक का आयोजन कर उसी विपदान के दृश्य पुनरावृत्ति करता है और इस प्रकार अपने पिता के कथित हत्यारे का पता लगाकर उसकी मृत्यु का प्रतिशोध लेकर स्वयं भी मृत्यु को प्राप्त होता है । इस दुखान्त जगत् प्रसिद्ध नाटक में महान नाटककार शेक्सपीयर किन्तु ने कर्णमार्ग से चिप प्रयोग की विधि का सविस्तर विवरण देकर अपनी अनूठी सूझ बूझ का अनुपम परिचय दिया अश्रूपदेहो दाहश्च वेदना दृष्टिविभ्रमः अञ्जने विपसंसृष्टे भवेदान्ध्यमथापि च तत्र सद्यो घृतं पेयं तर्पणं च समागधम् अञ्जनं मेपशृङ्गस्य निर्यासो वरुणस्य च ॥ मुष्ककस्याजकर्णस्य फेनो गोपित्तसंयुतः कपित्थमेपशृङ्गयोश्च पुष्पं भल्लातकस्य वा ॥ है । | ॥ ६६ ॥

| ७० ||

।

७१ ॥

एकैकं कारयेत् पुष्पं बन्धूकाङ्कोटयोरपि । प्रयुक्त सविष अशन के लक्षण तथा चिकित्मा - विषैले अ. अजन के प्रयोग से आँसू आना, नेत्र से नेन्नमल ( कीचए ) का

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श्रध्यायः १ ] कल्पस्थानम् ११ निक्लना, बसों में जलन, वेदना, दृष्टिभ्रम तथा वन्धापन भी हो जाता है । इस अवस्था में तुरन्त घी का पान करावे, पिप्पली से युक्त तर्पण का पान करे । मेपटगी तथा चरण के गोंद का भजन करे । मुष्कक, भजकर्ण ( साल ), समुद्रफेन आदि को गाय के पित्त में मिलाकर नेत्रों में अजन करे । कैथ, मेपटगी या भल्लातक ( भिलावे ) के पुष्प थना दुपहरिश, अकोट आदि के फूलों में से किसी एक को घिसकर उसमें वजन करे ॥ ६ ९ -७१ ॥ विमर्श - पिपली कल्क में सिद्ध घृत का तर्पण पीचे या नेत्रों का तर्पण करे । इस प्रकार पिप्पली से सिद्ध घृत से तर्पण करने से भी बड़ा लाभ होता है | घरकस्तर ने भी अञ्जनगत विषप्रयोग में होनेवाले लक्षणों का वर्णन निम्नलिखित रूप से किया है कि दुटेनेऽक्षिदार सावो entranama i siâná gì8. qámqzzaR §Ê.11 ( च.वि. २३/१६६ ) अञ्जन में विष का प्रभाव यदि । दूषित वजन में बजा जाय तो आँखों में दाह, नाच, और में मेल का बहुत अधिक निकलना, नेत्र में सूजन और लाली होती है तथा विप से दूषित अम के गाने से कोष्ट में तथा दुष्ट स्पृश्य ( स्पर्श किए जाने वाले ) हृयों के स्पर्श से त्वचा में दाह होता है । इस प्रकार कोई भी चिप अपने ' दाइ ' गुण के कारण तुरन्त ही जान लिया जा सस्ता है । इसी ' दाइ ' गुण को आधुनिक चिकित्सा शास्त्र के विज्ञान में इरिटेशन ( Irritation ) या क्षोभ नाम से जाना जाता है जो कि सनिज तथा वानस्पतिक विपों

का एक प्रधान गुण होता है ।

शोफ स्रावस्तथा स्वाप पादयोः स्फोटजन्म च ॥७२ ॥

भवन्ति विषजुष्टाभ्यां पादुकाभ्यामसंशयम् ।

उपानत्पादपीठानि पादुकावन प्रसाधयेत् ॥ ३ ॥

प्रयुक्त मनिष जूने आदि के लक्षण तथा चिकित्सा - विषैले जूते, सड़ाऊँ आदि से पाँव में सूजन, स्राव, पार्वों का सोना । ( पादसुपुष्ठि ), छालों का उत्पन्न होना आदि लक्षण उत्पन्न । होते है | इस प्रकार जूने, आसन आदि के लक्षण च चिकित्सा पादुका की भाँति ही होती है ( जो आगे कही जायगी ) ॥

भूपणानि हतार्थीपि न विभान्ति यथा पुरा ।

स्वानिस्थानानि हन्यु दाहपाकावदारणैः ॥ ७४ ॥

पादुकाभूपणेपूक्तमभ्यङ्गविधिमाचरेन 1 मनिष भूषणादि धारण करने पर लक्षण तथा चिकित्सा-चिप के कारण आभूषण तेजरहित हो जाते हैं तथा पहले की भाँति दीप्तिमान नहीं रहते ( पहले की भाँति नहीं चमकते ) । जिस स्थान पर उनको धारण किया जाता है वहाँ पर जलना, पकना, अवदारण ( फटना ) उत्पन्न कर देते हैं । इस प्रकार इसके तथा पादुका द्वारा विपाकता की अवस्था में अभ्यङ्ग के प्रसग में कही गई चिकित्सा विधि का प्रयोग करे ॥ ७४-७५ ॥ विमर्शः - चरककार ने भी इसी प्रसन में निम्नलिखित वर्णन दिया है कि च करचरण दाहतोदकुमाविपाकाश्च । भूपादुकाश्वगजचर्मकेनुशयनामनैर्दुष्टं ॥ । ( च चि. अ. २३।११८ ) अर्थात् पृथ्वी, पादुका ( खड़ाऊ, जूता ) इत्यादि, सवारी के घोडे, हाथी आदि के धर्म, केतु ( पताका व अन्य राज्य | चिह्न ), शय्या, आसन ( कुर्सी, बेच चौकी आदि ) के | विष से दूषित होने पर पूर्वकथित कण्ड आदि तथा हाथ-पैर आदि में दाह व तोद होता है तथा कुम एव विपाक ( त्वचा का पक जाना ) भी होता है । इसके अलावा चरककार ने निम्नलिखित वर्णन सुश्रुत की अपेक्षा कुछ | अधिक हो दिया है जो प्राथमिक होने के कारण उल्लेखनीय भी है यथा- पतागादिजल दुर्गन्ध सकलुपविव च । पोन श्य कोठापिटकाच करोनि मग्ण च ॥ ( च. चि. अ २३ । १२० ) अर्थात् कुएँ या तदाग ( तालाब ) आदि के जल में यदि चिप मिला हो तो वह दुर्गन्धयुक्त, मलिन और विकृत वर्ण का होता है । उस जल को पीने से शोध, कोठ, पिडिकाऍ और

। यहाँ तक की मृत्यु भी हो जा मकती है ।

विपोपसर्गे बाप्पादिर्भूपणान्तो य ईरितः ॥ ७५ ॥

समीच्योपद्रवांस्तस्य विदधीत चिकित्सितम् ।

महासुगन्धिमगढ़ यं प्रवक्ष्यामि त भिषक् ॥ ७६ ॥

पानालेपननस्येषु विदधीताञ्जनेषु च ।

विरेचनानि तीक्ष्णानि कुर्यान प्रच्छर्दनानि च ॥ ७७ ॥

सिरात्र व्यधयेत् क्षिप्रं प्राप्त विस्रावणं यदि ।

मूपिका s जकहा वाऽपि हस्ते बद्धातुभूपतेः ॥ ७८ ॥

करोति निर्विपं सर्वमन्नं विपसमायुतम् । पूर्वोक्त विपों का उपद्रव होनेपर अवस्थानुसार चिकित्सा का निर्देश- बाप्प से आरम्भ कर आभूषण पर्यन्त यह जो विप के उपद्रव कहे गये हैं उन उपद्रवों को देख व समझकर उनकी चिकित्सा करे । महासुगन्धि भगद जिसको मैं यहाँ कहता हूँ उसे वैद्यगण पान, लालेपन, नस्य और भञ्जन आदि में प्रयुक्त करें तथा तीचा वमन एव विरेचन देवें । यदि उचित प्रतीत हो तो अथवा रोगी की अवस्था इस योग्य हो तो सिरावेध करके तुरन्त रक्तमोक्षण ( Blood letting ) करे । राजा के हाथ में बाँधी हुई भूपिका ( अजरुहानामक औषधि ) सभी त्रिपेले अन्नों को दिप रहित बना देती है ॥ ७५-७९ ॥ विमर्श --- -8 भजरुहानामक औषधि के लक्षण आचार्य ढल्हण ने निम्न बताए हैं यथा -- ' अनरुहालक्षणमुशनसा प्रोक्तन्कन्द श्वेत सपिठको भेदे चासनसन्निभः पानैस्तु चिप जरयने नृगान् ॥ दष्टाना विपपीताना ये मोदिना । विषं जरयने तेपा तस्मादजन्हा स्मृता

लोमशा कृष्णा भवेत् माऽपि च तद्गुणा ॥ इति ।

हृदयावरणं नित्यं कुर्याच मित्रमध्यगः ॥

पिवेद्रघृत मजेचाख्यममृताख्यं च बुद्धिमान् सर्पिधि पयः क्षोत्रं पिवेद्वा शीतलं जलम् मयूरान्नकुलान् गोधा. प्रपतान् हरिणानपि सततं भक्षयेच्चापि रसांस्तेषां पिवेदपि ॥ । गन्धलेपन-चान्ये विप ॥ मूषिका ७६ ॥ । || ८० ||

।

८१ ॥

हृदय पर विषव्याप्ति के प्रतिषेध का निर्देश- बुद्धिमान नृपति मित्रों के बीच में बैठा हुआ अपने हृदय की रक्षा के हेतु सदैव तत्पर रहे । अजेयघृत, व अमृतघृत का पान करता रहे । घी, दधि, दूध, मधु या शीतल जल का पान, करे । मोर, नेवला, गोधा ( गोह ), चित्तल हरिण या हरिणों के मास का निरन्तर सेवन करता रहे तथा इनके मांसरसों को पीता रहे ॥ ७ ९ -८१ ॥

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१२ सुश्रुतसंहिता विमर्शः - चरककार ने भी ( च. चि. अ. २३ २३८ - २३ ९ ) में ' हृदयावरण ' rss को व्याख्या इस प्रकार की है— हृदयावरण—- सूःम दात्ररजस्तस्मै सचद्र हृद्विशोवनम् । शुद्ध हृदितः शाप हेमचूर्णस्य दापयेत् | हेम सर्वविद्यायाशु गराश्र विनियच्छति । न न पाने विष पद्मवत् ॥ ' इस प्रकार उक्त श्लोकों की व्यारया करते हुए आचार्य डल्हण का कहना है कि - हृदयावरण हृन्यप्रच्छादन हृन्यरक्षाकारिमिमूषिका नन्हाऽमृताऽनेनपुरा 7 घृतदुषविषागि महामृगन्धिचिम्बी यूपतोदगविपन्न धारणादिभिः । मधुक कुष्ठमित्यादिकमजेयाख्यम्, अपामार्गस्य बीनानि पिप्पलीरित्याद्यनून घृन, निरादीनि प्रत्येक चत्वारि वा हृदयावरणानि पिवेदिति ।

गोधानकुलमांसेषु हरिणस्य च बुद्धिमान् ।

दद्यान सुपिष्टां पालिन्दी मधुकं शर्करां तथा ॥ ८२ ॥

शर्करातिविषे देये मायूरे समा १ वे ।

पार्षते चापि देया. स्युः पिप्पल्यः समहोपधाः ॥ ८३ ॥

सद्रः सघृतश्चैव शिम्बी यूपो हित. सदा ।

विपन्नानि च सेवेत भक्ष्यभोज्यानि बुद्धिमान् ॥ ८४ ॥

भक्ष्य मोव्य पदार्थों में विषघ्न द्रव्यों के योग की विनि - गोधा ( गोह ), नकुल ( नेवला ) और हरिण के मांसों में, त्रिवृत्, मुलहठी, शर्करा को बारीक पीस कर मिटा देवें और फिर सेवनार्थ प्रयुक्त करें | मोर के मांस, शर्करा, अतीस तथा सोंठ को मिला कर सेवन करावें । वी और मधु के साथ शिम्बी ( सेम की फली ) का ग्रुप सदैव देना हितावह होता है । बुद्धिमान मनुष्य विपन्न द्रव्यों के साथ भक्ष्य तथा भोजनादिक का सेवन करे ॥ ८२-८४ ॥ विमर्श. - चरककार ने भी हृदय की रक्षा का विधान बताते हुए लिखा है कि-' गदी हृदय रक्ष्य तस्यावरण पिवेद्यथालाभम् । मज्ञान मधु घृतगैरिकनथ गोमयग्स वा । दक्षु सुपकमथवा काक निधीच्य तद् रस बद्दलम् । छागादीना वाऽलुग्भस्म मृढ वा पिवेदाशु ॥ ' अर्थात् -वमन अथवा विरेचन कराने आदि के सब उपक्रमों से पूर्व हृदय की रक्षा करनी परमावश्यक है, उसकी रक्षा के लिए हृदयरक्षक औषधि जो उस समय प्राप्त हो सके पीनी चाहिए । यथा रोगी मजा पी सकता है, मधु चाट सकता है तथा उसे घृतपान कराया जा सकता है । अथवा शुद्ध गैरिक ( स्वर्ण गरिक ) को जल मे घोल कर दिया जाता है । ताजे गोवर का रस भी पिलाया जाता है । रोगी भली प्रकार पकी हुई ईख का रस भी पी सकता है अथवा कौ सस्विन्न मांस को निचोड़ने से जो रस प्राप्त हो उसे पिला सकते हैं— यह मांसयूप बलकारक भी होता है । अथवा बकरे आदि का ताजा रुधिर रोगी को पिलावे अथवा भस्म ( गोबर की रात ) या चश्मीक की काली मिट्टी को ही जल में बोल कर पिलाने का भी विधान है । इसी प्रसङ्ग में अष्टाङ्गसंग्रहकार ने भी निन्नलिखित मत व्यक्त किया है यथा - विकर्षति तोगत्वा

दृश्य नम्य गुप्तये । बिंदु घृन घृतोद्रमगढ वा वृतान् ॥

मन्न नं गोमयरस मस्माम्म कृष्णमृनन् । ऐकध्न पद्धगय वा गिरिवारि वा ॥ खाडा को विहाराकशिपक्टभीच्छदान् । | और आलस्यायन महोदय का भी प्राय. यही मत हे यथा-या सिराः सर्वगात्रपु हृदये नम्प्रनिष्ठिताः । नाभिरस्य विष म हृदय मम्प्रधावनि ॥ घृनेन तु प्रनिच्छन्न विप नानि प्रपोटयेन् । | निर्वागजनन सर्पिः प्राणिना प्राणवर्धनम् ॥ हृदयावरणास्तद्भ-ध्या भोज्याच सर्वन ॥ और आजकल भी यही धारणा वैद्यों में प्रचलित है कि जब वे सरिया आदि का प्रयोग कराते है तो उसके विप प्रभाव का निराकरण करने के हेतु मक्वन वा घृत को प्रचुर मात्रा में सेवन कराने की व्यवस्था भी कर देते हैं जिमसे प्रकारान्तर रूप मे हृदयावरण अथवा हृदय का सरक्षण भी होता रहता है । आधुनिक चिकित्सा जन्यों में विषाक्त रोगी की चिकित्मा की विधि निम्नलिखित पाई जाती है । जैसा कि ' A Test book of Medical garisp: -udente ard toxicology में वर्णित है, यथा -1 medical practitioner should always have an emergency case ready for cases of poisoning, so that he may beable to adopt immediate treatment without loss of time The treatment should be based on the following principles 1 Removal of unsbcorbed | poison from the body. 2 Use of antidotes, 3 Eh mination of poison ab orbed into the system, 4 Treatment of the general symptoms 1 Removal of unabsorbed poison - If a person has been | Introduced into a wound subsequently as a result । of bites or stings, a ligature should immediately he applied above the wound, which should then be excred or sucked provided there is no abrasion or ulcer in the mouth....If a poison has been taken into the stomach, it should be removed by washing out the stomach with a stomach tube ( syphon tube ) or stomach_pamp..... when the stomach tube or pump is rot available, or when a patient is conscious, and does not wish to have it passed in to the stomech free emesis should be produced by tickling the fauces with the fiuger, afeather or a leafy twag of a tree The vomitted matter must be kept for chemical analysis The following emetics may also be administered -1 Copious draughts of warm water 2 A table spoonful of groundmustard or two table spoonful of common salt in half apint of warm water. 3 Half a drachm of sulphate of zinc in a tumbler-| ful of warm water to be repeated in a quarter of an hour, if recessary 4. Twenty to thirty grains of pecacuanha powder, or two to six drachms of pecac. wire In the cae of a child syrup of ipecac ! from half a tea - spoonful to tro tea spoonfuls, ! according to the age is to be preferred as it is easy of adminisrtaion 5 Fifteen to thirty grains दागमेपवळ इत्लुत्शिशुस्यविनोषित ॥ पिवेयुगर्मियां शीतमधुरान् 1 of Ammonium carbonate dissolved in water पायमागवान् । तथा मूच्यांदयो न स्युदिप चाय्वेति नानिलाम् ॥ ' 6 Five to ten grains of copper sulphate dissolved