श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 661–663

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 661–663

पृष्ठ 661

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श्रध्याय ८ ] कल्पस्थानम ३ वाली पिप्पली का ग्रहण करना चाहिये, किन्तु यह पाठ कुछ सन्दिग्ध सा ही प्रतीत होता है । वाग्भटकार ने भी लिखा है कि- ' सर्वतोऽपइरेव रक्त शृङ्गाद्यैः सिरयाऽपि वा । सेका लेपा-स्ततः शी बोधिले मानवाश्रकैः ॥ ' ( अ ० हृ ० उ ० तं ० अ ० ३७ । ४० ) अतः यह भी विचार कई विद्वानों द्वारा व्यक्त किया । जा सकता है कि पीपल की छाल को दूध में पीसकर सर्व प्रकार से सेचन एवं लेपन आदि के रूप में प्रयोग करने से अधिक लाभ प्राप्त हो सकता है । अस्तु ।

कृच्छ्रसाध्यविषा ह्यष्टौ प्रोक्ताद्वे च यदृच्छया ।

अवार्यविषवीर्याणां लक्षणानि निबोध मे ॥१२१ ॥

ध्यामः सौवर्णिकादंशः सफेनो मत्स्यगन्धकः ।

श्वासः कासो ज्वरस्तृष्णा मूर्च्छा चात्र सुदारुणा ॥ १२२ ॥

आदंशे लाजवर्णाया ध्यामं पूति स्रवेदसृक् ।

दाहो मूर्च्छातिसारश्च शिरोदुःखं च जायते ॥१२३ ॥

घोरो दंशस्तु जालिन्या राजिमानवदीर्यते ।

स्तम्भः श्वासस्तमोवृद्धिस्तालुशोषश्च जायते ॥ १२४ ॥

एणीपद्यास्तथा दंशो भवेत् कृष्णतिलाकृतिः ।

तृष्णामूर्च्छाज्वरच्छर्दिका सश्वाससमन्वितः ॥१२५ ॥

, दंश: काकाण्डिकादष्टे पाण्डुरक्तोऽतिवेदनः ।

तृण्मूर्च्छाश्वासहृद्रोगहिक्काकासाः स्युरुच्छ्रिताः ॥ १२६ ॥

रक्तो मालागुनाशो धूमगन्धोऽतिवेदनः ।

बहुधा च विशीर्येत दाहमूर्च्छाध्वरान्वितः ॥ १२७ ॥

असाध्य विपवाली लताओं के दष्ट लक्षण - ( ऊपर ) आठ लुताएँ कष्टसाध्य वर्ग की कह दी गई हैं उनमें दो कभी अच्छी हो जाती हैं और कभी कभी नहीं भी अच्छी होती यथा कृष्णा व अग्निवर्णा । अव अप्रतिहत शक्ति वाली ( असाध्य ) लुनाओं के लक्षणों को मुझसे सुनकर जानो । सौवर्णिक का देश काला, झागदार, मछली जैसी गन्धवाला होता है । इसके दंश में रोगी को श्वास, कास, ज्वर, तृष्णा व भयानक मूर्च्छा आदि लक्षण होते हैं । लाजवर्णा के देश में काले रङ्ग का दुर्गन्ध युक्त रक्त का स्त्राव होता रहता है तथा रोगी को दाह, मूर्छा, अतिसार तथा शिरोवेदना आदि लक्षण होते हैं । जालिनी नामक लूता का दंश भयानक, रेखान्वित तथा किनारों पर कटा फटा होता है । इसके कारण जडता, श्वास, अन्धकार का बढ़ते जाना तथा तालुशोप आदि लक्षण होते । हैं । एणीपदी का दंश काले तिल के समान आकार वाला होता है । तथा इसमें रोगी को तृष्णा, ज्वर, कास तथा श्वास आदि लक्षण होते हैं 1 । काकाण्डिका लुता के दंश में दुष्टस्थान से स्रवित होने वाला रक्त पाण्डुवर्ण का होता है तथा रोगी को अतिवेदना, तृष्णा, मूर्च्छा, श्वास, हृद्रोग, कास तथा हिक्का ( हिचकी ) तीव्र रूप में होती है । मालागुणा का दंश । रक्तवर्ण, तथा धूम्रगन्धी होता है इसमें बहुत वेदना होती है । तथा यह कई स्थानों पर कटा - फटा हुआ होता है एवं इसमें रोगी को दाह, मूर्च्छा तथा ज्वर आदि के लक्षण भी होते हैं ॥

असाध्यास्वप्यभिहितं प्रत्याख्यायाशु योजयेत् ।

दोषोच्छ्रायविशेपेण दाहच्छेदविवर्जितम् ॥ १२८ ॥

१० सु ० क ० असाध्य लताओं की प्रत्याख्यान करके चिकित्सा का निर्देश-| असाध्य लूताओं में भी असाध्य कहकर ही उपर्युक्त उपचार अथवा चिकित्सा करे । तथा इनमें दोष विशेष की विशेष रूपेण चिकित्सा करे एवं दाह व छेदन आदि कर्मों का प्रयोग वर्जित मानकर न करे ॥ १२८ ॥

साध्याभिरा भिल्लूताभिर्दष्टमात्रस्य देहिनः ।

वृद्धिपत्रेण मतिमान् सम्यगादंशमुद्धरेत् ॥ १२६ ॥

साध्या लूभाओं के दश में तात्कालिक चिकित्सा -- कुशल चिकित्सक को चाहिए कि वह साध्य लताओं के दश में भी | शीघ्र ही वृद्धिपत्र से इनके दश को दंशस्थान से पूर्णरूपेण व भली प्रकार से निकाल दे ॥ १२ ९ ॥

अमर्मणि विधानज्ञो वर्जितस्य ज्वरादिभिः ।

दशस्योत्कर्तनं कुर्यादल्पश्वयथुकस्य च ॥१३० ॥

मधुसैन्धवसयुक्तैरगदैर्लेपयेत्ततः प्रियङ्गुरजनीकुष्ठसमङ्गामधुकैस्तथा ॥१३१ ॥

सारिवां मधुकं द्राक्षां पयस्यां क्षीरमोरदम् ।

विदारीगोक्षुरक्षौद्रमधुकं पाययेत वा ॥१३२ ॥

श्रीरिणां त्वक्कषायेण सुशीतेन च सेचयेत् ।

उपद्रवान् यथादोपं विपन्नैरेव साधयेत् ॥ १३३ ॥

लता विष में देश का उत्कर्तन तथा उसके पश्चात्कर्तव्य कर्म-विधान को समझने वाला चिकित्सक, मर्मरक्षित स्थान में | ज्वर आदि से रहित तथा अल्पशोथान्वित पुरुष में देश को काटकर निकाल दे | फिर मधु तथा सैन्धव नमक युक्त अगदों से लेप करे । इसी प्रकार प्रियडु, हल्दी, कूठ, मञ्जीठ तथा मुलहठी का लेप करे । सारिवा, मुलहठी, द्राक्षा, विदारी, क्षीरमोस्ट इनको या विदारी, गोक्षुर ( गोखरू ), मधु तथा मुलहठी का क्वाथ पिलाये । वट ( बरगद ) आदि क्षीरी वृक्षों के अतिशीतल काथ से दंशस्थान का परिपेक करे तथा दोषों के अनुसार उपद्रवों की विपन्न औषधियों से चिकित्सा करे ॥ १३० –१३३ ॥

नस्याञ्जनाभ्यञ्जनपानधूमं तथाऽवपीडं कवलग्रह च ।

संशोधनं चोभयतः प्रगाढं कुर्यात्सिरामोक्षणमेव चात्र ॥

लूता में १० प्रकार के उपक्रम - लता विष में नस्य, अञ्जन, अभ्यङ्ग, पान, धूम, अवपीड, कवलग्रह, तीक्ष्ण वमन, तोषण विरेचन और सिरामोक्षण इन दश विधियों से चिकित्सा करे ॥ कीटदष्टव्रणान् सर्वानहिदष्टव्रणानपि 1 आढाहपाकात्तान् सर्वाश्चिकित्सेदुष्टवद्भिषग् ॥१३५ ॥

दुष्टत्रण चिकित्सा का कोट दष्टव्रणादि में अतिदेश - कीटों के काटने उत्पन्न व्रणों की, सर्पों के सब दूषित ऋणों की दाह, एवं पाक की अवस्था तक चिकित्सक दूषित व्रणों की भांति ही सम्पूर्ण चिकित्सा करे ॥ १३५ ॥

विनिवृत्ते ततः शोफे कर्णिकापातन हितम् ।

निम्बपत्रं त्रिवृद्दन्ती कुसुम्भं कुसुम मधु ॥१३६ ॥

गुग्गुलुः सैन्धवं किण्वं वर्चः पारावतस्य च ।

विपवृद्धिकरं चानं हित्वा संभोजनं हितम् ॥ १३७ ॥

पृष्ठ 662

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सुश्रुतसंहिता दादादि के निवृत्त होने पर व्रम में विपोत्पन्न कर्णिका की चिकित् - शोफ के हट जाने पर वर्णिका को निकाल कर अलग कर देना चाहिए । इसके लिए नीम के पत्ते, निशोथ, जमालगोटा, कुसुम्भ का पुष्प, मधु, गुग्गुल, सैन्धव, सुरावीज, कबूतर की बीट ( विष्टा ) उत्तम || तिल, कुलत्थ आदि far के बढ़ाने वाले भोजनों को छोड़कर शेष सब अन्न भोजन उत्तम होते हैं ॥ १३६-१३७ ॥

विपेभ्यः खलु सर्वेभ्य ' कर्णिकामरुजां स्थिशम् ।

प्रच्छयित्वा मधून्मिश्रै ' शोधनीयैरुपाचरेत् ॥ १३८ ॥

सब प्रकार के विपी में से वेदनारहित तथा स्थिर कर्णिका ( मासग्रथि ) पाकर निम्बपत्र, दन्तीमूल आदि शोधनीय द्रव्यों को मधु में मिलाकर लेप करने के उपरान्त निकाले ।

सप्तपष्टस्य कीटानां शतस्यैतद्विभागशः ।

दलक्षणमाख्यातं चिकित्सा चाप्यनन्तरम् ॥१३६ ॥

कटिकल्प का उपमहार - एक सौ सड़सट कीटों के दष्ट. लक्षण अलग अलग कह दिए हैं तथा उनकी चिकित्सा भी उनके बाद में कह दी है ॥ १३ ९ ॥ सत्रिंशमध्यायशतमेतदुक्तं विभागशः इहोद्दिष्टाननिर्दिष्टानर्थान् वच्याम्यथोत्तरे ॥ १४ ॥

सूत्रस्थान, निदानस्थान, शारीरस्थान, कल्पस्थान, चिकित्सा स्थान के विभाग से एक सौ बीम अध्याय भी कह दिए हैं । इन स्थानों के नाम मात्र से कहे हुए, जो कि विस्तार से नहीं कटे गये हैं, उन विषयों को उत्तरस्थान में आगे कहूँगा ॥१४० ॥

सनातनत्वाद्वेदानामक्षरत्वात्तथैव च ।

तथा दृष्टफलत्वाच्च हितत्वादपि देहिनाम् ॥ १४१ ॥

वाक्समूहार्थविस्तारात् पूजितत्वाच्च देहिभिः ।

चिकित्सितात् पुण्यतमं न किंचिदपि शुश्रुमः ॥ १४२ ॥

पेरिन्द्रप्रभावस्यामृतयोनेर्भिपग्गुरोः

धारयित्वा तु त्रिमलं मतं परमसंमतम् ।

उक्ताहारसमाचार इह प्रेत्य च मोदते ॥१४३ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने कीटकल्पो नामा-मोऽध्यायः ॥ ८ ॥

I © चिकित्मक का पुण्यतमत्व का कथन ---- - वेदों के सनातन होने से तथा आयुर्वेद के अह्नों के अक्षर होने से, प्रत्यक्ष फल | देखने से, मनुष्यों का क्ल्याणकारी होने से, वाणी समूह में अर्थ का विस्तार के रहने के कारण, मनुष्यों द्वारा पूजित होने I से चिकित्मा से बढकर और कोई अधिक पुण्यशाली वस्तु का वर्णन हम नहीं सुनते । अमृत की योनि, वैद्यों के गुरु, श्रेष्ठ प्रभाव वाले ऋषि के अति समत, निर्मल मत को धारण करके, कहे हुए के अनुसार कार्य करने पर मनुष्य इस लोक में तथा 1

परलोक में प्रसन्न तथा सुख से रहता है । ' १४१–१४३ ॥ इति ॥

इति श्री सुश्रुतसहिताया क्ल्पस्थाने कीटकल्पो-नामाष्टमोऽध्याय ॥ ८ ॥

-इति भगवता श्रीधन्वन्तरिणोपदिष्टायां तच्छिष्येण महर्पिणा सुश्रुतेन विरचितायां सुश्रुतसंहितायां पञ्चम कल्पस्थानं समाप्तम् ॥ ५ ॥

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