श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 651–660
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 651–660
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श्रध्यायः ८ 1 कल्पस्थानम् ६१
' आवर्तकस्तथोरभ्रः सारिकामुखवैदलौ ।
शराव कुर्दोऽभीराजिः रुपचित्रशीर्षकः ॥ ६ ॥
शतबाहुच यश्चापि रक्तराजिश्व कीर्तितः ।
अष्टादशेति वायव्याः कीटाः पवनकोपनाः ॥ ७ ॥
तैर्भवन्तीह दष्टानां रोगा वातनिमित्तजाः । अट्ठारह प्रकार के वायव्य कीटों के नाम - कुम्भीनस, तुण्डिकेरी, शृङ्गी, शतकुलीरक, उच्चिटिङ्ग, अग्निनामा, चिचिटिङ्ग, मयूरिका, आवर्तक, उरभ्र, सारिका, मुखवैदल, शरावकुर्द, अभीराजि, परुप, चित्रशीर्षक, शतवाहु, रक्त. राजि, ये भट्ठारह कीट वातप्रकृति के हैं, ये वायु को प्रकुपित करते हैं । इनके काटने से वातजन्य रोगे ते हैं ॥ ५-७ ॥ कौण्डिन्यकः कणभको वरटी पत्रवृश्चिकः ॥ ८ ॥
विनासिका ब्राह्मणिका बिन्दुलो भ्रमरस्तथा ।
बाह्यकी पिच्चिटः कुम्भी वर्च. कीटोऽरिमेदकः ॥६ ॥
पद्मकीटो दुन्दुभिको मकरः शतपादकः ।
पञ्चालकः पाकमत्स्यः कृष्णतुण्डोऽथ गर्दभी ॥१० ॥
क्लीतः कृमिसरारी च यश्चाप्युत्क्लेशकस्तथा ।
एते ह्यग्निप्रकृतयश्चतुर्विंशतिरेव । च ॥ ११ ॥ ।
तैर्भवन्तीह दष्टानां रोगाः पित्तनिमित्तजाः । २४ प्रकार के आग्नेय कीर्टो के नाम - कौण्डिन्य, कणभक, वरटी, पत्रवृश्चिक, विनासिका, ब्राह्मणिका, विन्दुल, भ्रमर, ब्राह्यको, पिञ्चिटि, कुम्भी, वर्ध. कीट, अरिमेदक, पद्मकीट, दुन्दुभिक, मकर, शतपादक, पञ्चालक, पाकमत्स्य, कृष्ण-लुण्ड, गर्दभी, कीत, कृमिसरारी, उत्क्लेशक, ये चौबीस पित्त प्रकृतिवाले है, इनके काटने से पित्तप्रकोपजन्य रोग होते है ॥ ८-११ ॥ विश्वम्भरः पञ्चशुकुः पञ्चकृष्णोऽथ कोकिलः ॥ १२ ॥
सैरेयकः प्रचलको वलभः किटिभस्तथा ।
सूचीमुखः कृष्णगोघा यश्च कापायवासिक. ॥ १३ ॥
कीटो गर्दभश्चैव तथा त्रोटक एव च ।
त्रयोदशैते सौम्याः स्युः कीटाः श्लेष्मप्रकोपणाः ॥ १४ ॥
तैर्भवन्तीह दष्टानां रोगाः कफनिमित्तजाः । १३ प्रकार के सौम्य कीटों के नाम - विश्वम्भर, पञ्चशुक्कु, पञ्चकृष्ण, कोकिल, सैरेयक, प्रचलक, वलभ, किटिभ, । सूचीमुख, कृष्णगोधा, कपायवासिक, गर्दभक, त्रोटक, ये तेरह कीट सौम्य एवं कफप्रकोपक होते हैं, इनके काटने से कफजनित रोग होते हैं ॥ १२-१४ ॥ तुङ्गनासो विचिलकस्तालको वाहकस्तथा ॥ १५ ॥ ।
कोठागारी क्रिमिकरो यश्च मण्डलपुच्छकः ।
तुण्ड ( ग ) नाभः सर्पपिको वल्गुलिः शम्बुकस्तथा ॥१६ ॥
अग्निकीटश्च विज्ञेया द्वादश प्राणनाशनाः ।
तैर्भवन्तीह दृष्टानां वेगज्ञानानि सर्पवत् ॥१७ ॥
तास्ताश्च वेदनास्तीत्रा रोगा वै सान्निपातिकाः ।
क्षाराग्निदग्धवदंशो रक्तपीतसितारुणः ॥ १८ ॥
१२ प्रकार के सानिपातिक कीटों के नाम- तुङ्गीनास, विचिलक, तालक, वाहक, कोष्ठागारी, कृमिकर, मण्डल • पुच्छक, तुण्डनाभ, सर्पपिक, शम्बूक तथा अग्निकीट नामक वारह कीट प्राणनाशक होते हैं । इनके काटने पर सर्पों के | दिप की भाँति ही पिवेग होते हैं तथा उसी प्रकार की वेदनाएँ होती हैं और ये सन्निपात के लक्षण उत्पन्न करते हैं । इनका दंश क्षार या भग्निदग्ध के समान रक्त वर्ण का ( लाल ), पीला, श्वेत या काले वर्ण का होता है ॥ १५-१८ ॥
ज्वराङ्गमर्ढरोमाञ्चवेदनाभिः समन्वितः ।
छतीसारतृष्णाश्च दाहो मूर्च्छा विजृम्भिका ॥ १६ ॥
वेपथुश्वासहिक्काश्व दाहः शीतं च दारुणम् ।
पिडकोपचयः शोफो ग्रन्थयो मण्डलानि च ॥ २० ॥
दद्रः कर्णिकाचैव विसर्पाः किटिभानि च ।
तैर्भवन्तीह दष्टानां यथास्वं चाप्युपद्रवाः ॥२१ ॥
येऽन्ये तेषां विशेपास्तु तूर्णं तेषां समादिशेत् ।
दूषीविषप्रकोपाच विपलेपनात् ॥ २२ ॥
लिङ्गं तीक्ष्णविपेष्वेतत्-तीक्ष्णविप कोट के लक्षण- इन तीक्ष्ण विप वाले कीटों के विष के कारण ज्वर, भङ्गमर्द ( भङ्गों का टूटना ), रोमाञ्च ( वेदना के कारण ), छर्दि ( वमन ), अतिसार, तृष्णा, दाह, मूर्च्छा, जृम्भा ( जम्हाई आना ), कम्पन, श्वास, हिचकी, दाह, अतिशीत, पिढकाओं की वृद्धि होना, शोफ, ग्रंथियाँ ( गाँठ ), मण्डल, ददु, कर्णिकाएँ, विसर्प, किटिभ आदि लक्षण होते है, जो तत्सम्वन्धी दोषों के उपद्रव है तथा जो अन्य उपद्रव है उनके भेदों को भी दूषीचिप के लक्षणादिकों से, विप के आहारादि भेद से ज्ञात करे ॥१ ९ -२२ ॥ विमर्श ' -- चरककार ने दूपीविप कीटों से दृष्ट के लक्षण तथा उनके प्राणहर लक्षणों का वर्णन करते हुए कहा है, कि-मात्र रक्त सित कृष्ण श्याव वा पिडकान्वितम् । सकण्डूदाहवी-सर्पपाकि स्यात्कुथित तथा ॥ कोट í पीविषैर्दष्ट लिङ्गं प्राणहरं शृणु । सर्पदष्टे तथा शोथो वर्धते सोग्रगन्ध्यसृक् । दशेऽक्षिगौरवं मूर्च्छा सरुगात श्वसित्यपि ॥ ( च. चि. भ. २३ / १४०-१४१ ) जिस | अवयव पर दूपविप कोट काटता है वह स्थान श्वेत, काला व श्याम वर्ण का हो जाता है । उस पर फुन्सियाँ निकल भाती हैं, खुजली तथा दाह होता है । विसर्प हो जाता है अर्थात् शोथ फैलता जाता है । वह स्थान पक जाता है तथा सड़ गल जाता है तथा प्राणहर कीट से दृष्ट के लक्षण में साँप से दृष्ट पुरुष में जैसा शोथ होता है वैसा ही यहाँ दशस्थान में शोफ उग्रगन्धयुक्त रक्त के साथ होता हुआ निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होता है । नेत्र का भारीपन, मूर्च्छा, श्वास तथा वेदना से रोगी पीडित होता है । इसी प्रकार अष्टांग-सग्रहकार ने भी कहा है कि - वेगाश्च सर्ववच्छोको वर्द्धिष्णुर्वि-स्ररक्तता । शिरोऽक्षिगौरव मूर्च्छा भ्रमः श्वासोऽतिवेदना ॥ ( अ. उ. अ. ४३ ) चरककार ने पुनः मत व्यक्त करते हुए कहा है कि- तृष्णाऽरुचिपरीतश्च भवेद् दूषीविपादितः । ( च.चि. अ. २३/१४२ ) दूषीविप कीट से दृष्ट पुरुष में पूर्वोक्त स्थानीय लक्षणों के अतिरिक्त तृष्णा तथा अरुचि भी होती है ।
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६२ सुश्रुतसंहिता
—शृणु मन्दविपेष्वतः ।
प्रसेकारोचकच्छर्दिशिरोगौरवशीतकाः ॥ २३ ॥
पिडका कोठकण्डूनां जन्म दोषविभागतः । मन्द विष कीट के लक्षण — अब मन्दविषों के लक्षणादि सुनो मुख से लालास्राव, अरोचक, चमन, शिर में भारीपन, अवशीतन ( शीत की कमी ), पिडिका, कोठ, कण्डु की । उत्पत्ति आदि लक्षण कीटों के दोपों के अनुसार दृष्टिगोचर होते हैं ॥ २३ ॥
योगैर्नानाविधैरेषां चूर्णानि गरमादिशेत् ॥ २४ ॥ ॥
दूषीविषप्रकाराणां तथा चाप्यनुलेपनात् । गर विष के लक्षण — इन कीटों के विविध प्रकार के योगों
से बने हुए चूर्णों को गर त्रिप कहना चाहिए । दूषीचिप की ।
भाँति लेप करने से भी इनसे गरविष उत्पन्न होता है ॥२४ ॥
विमर्श: -इन विषैले कीटों के वेग सपा की भाँति होते है । बढ़नेवाला शोफ, रक्त की विस्रता, शिर तथा आँखों का भारीपन, मूर्च्छा, भ्रम, श्वास तथा दशस्थान पर पीढा । आदि लक्षण होते है । प्राय सभी कीटों के दशस्थान पर । कर्णिका, मांसाकुर, शोफ, ज्वर, कण्डू तथा अरुचि होती । है । विपों का एक छोटा भेद संयोगज चिप का है । इसकी कई प्रथकारों ने कई सज्ञाएँ दी है । इसके कारण मृत्यु । नहीं होती परन्तु यह चिरकालीन रोगों को उत्पन्न करता है । जैसा कि चरककार ने कहा है कि - पर सयोगज चान्यद् गरस गढप्रदम् । कालान्तरविपाकित्वान्न तदाशु हरत्यसून् ॥ ( च. चि अ. २३/१४ ) स्थावर, जगम से अतिरिक्त एक और भी विष होता है जिसे गर नाम से कहा जाता है । यह सयोगज होता है । यह भी रोगों को उत्पन्न करता है । कालान्तर में विपाक होने के कारण यह शीघ्र ही मृत्यु का कारण नहीं होता । वृद्ध काश्यपकार ने तो गरविप की । और अधिक स्पष्ट व्यारया की है यथा - सयोगजन द्विविध
वृताय विषमुच्यते । गर स्यादविष तत्र सविष कृत्रिम मतम् ॥
अर्थात् संयोगल विप नामक विष का एक तृतीय वर्ग भी है यह भी दो प्रकार का होता है । भविप द्रव्यों से निर्मित को गर तथा सचिप द्रव्यों के सयोग से बने त्रिप को कृत्रिम । चिप कहते है । यूनानी चिकित्सा के अनुसार भी केचुआ, वीरबहूटी, सांढा आदि प्राणियों का प्रयोग योगों में यथा लेपन व साथ योगों में किया जाता है उसी प्रकार यदि उक्त विपैले कृमियों का प्रयोग करने पर विषजनित उपद्रवादि होने लगते है तो वह गर विप कहलाता है । हम प्रकार विविध औषधियों के सयोग से बने चिप को रवि कहते हैं । इसके प्रभाव मे शोफ, पाण्डु, उदररोग, उन्माद, अश आदि विकार होते है । नाना प्रकार के प्राणियों के अङ्गों में उत्पन्न मल ( मूत्र, पुरीप, नख, केश, रोम ), विन्द्र ओषधियों के भस्म तथा अल्पवीर्य वाले विपों के योग से ये विष बनते हैं । इसका प्रयोग कुलटा या सौत के द्वेष से चुभित स्त्रियाँ अपने सौभाग्य के लिए व अपने पति को अपने वश में रखने के लिए अथवा अपने ऊपर अनुरक बनाए रखने के लिए करती हैं । यह विष सद्यो-घातक न होकर चिरकालिक स्वरूप की कोई व्याधि उत्पन्न कर देता है । इसके अतिरिक्त कई बार राजाओं में चिरकाल तक कष्ट देकर मारने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता रहा है । इस स्थिति में शत्रु के द्वारा प्रेरित राजा के निकटवर्ती दरवारीगण राजा पर इसका प्रयोग करते हैं । गर चिप प्रायः जीर्णस्वरूप का होता है परन्तु तीघ्र भी हो सकता है प्राय. इसका प्रयोग गुप्त रूप से भोजन में मिलाकर उस भोजन को शत्रु को खिलाकर किया जाता है । इस विष से पीडित हुआ व्यक्ति कृश, पाण्डुवर्ण, मन्दाग्नि, कास, श्वास, ज्वरयुक्त, प्रतिलोम वायु से युक्त, निद्रा तथा चिन्ता में डूबा हुआ, उदररोगों ( यकृत् वृद्धि, लोहावृद्धि आदि ) से पीडित, दीन हीन वाणी वाला, दुर्बल, आलसी, शोफी, निरन्तर आध्मान से युक्त, ग्रहणी तथा क्षय रोग से युक्त होता है । उसको सपने में सियार, बिल्ली, नेवला, हिंस्र पशु, बन्दर, सूखे वनस्पति तथा जलाशय दृष्टिगोचर होते हैं तथा स्वप्न में ही अपने को काला या गोरा तथा स्वस्थ होने पर इन्द्रियविहीन देखता है । उपर्युक्त लक्षणों को देखकर चिकित्सक को उसके इतिहास तथा परिस्थिति के बारे में जिज्ञासा करनी चाहिए । यदि सदिग्ध प्रकार का इतिहास प्राप्त होता हो तो गर विप का निश्चय कर लेना चाहिए । यदि रोगी तत्काल आ गया हो तो उसको वमन तथा आमाशय-प्रक्षालन कारना चाहिए । उसके बाद उसको ताम्र भस्म का उपयोग मधु के साथ कराना चाहिए । इसके चटाने से हृदय का सम्यक् विशोधन हो जाता है । सुवर्णमाक्षिक का मधु शर्करा के साथ सेवन कराना चाहिए तथा नागदन्ती, निशोथ, स्नुहीक्षीर व मैनफल से सिद्ध घृत का प्रयोग कराना चाहिए । चिरकालीन गर चिप की चिकित्सा करते समय मूर्वा, गुहची, तगर आदि द्रव्यों को तक्र, गरम पानी या नीबू के रस से गरपीडित मनुष्य को पिलाना चाहिए । स्वर्ण के योगों का सेवन कराना चाहिए । अवस्थानुसार उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए गरविष प्रारम्भिक अवस्था में भोजन चिप ( Food poisoning ) के रूप में रहता है परन्तु जीर्णावस्था में वह मन्दविपमयता ( Slow poisoning ) का रूप ले लेता है । आज के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि किन्हीं अज्ञात कारणों से शरीर के विभिन्न अग कुछ विशिष्ट प्रकार के विप बनाने लगते हैं जिनके कारण शरीर की जीवनीय शक्ति ( Vitahty ) घटने | लगती है तथा मनुष्य मृत्यु मुख की ओर अग्रसर होता जाता है । इस प्रकार के मन्द विष को स्वगत विषाक्तता ( Anto poisoning ) कहा जाता है । सम्भवतः आयुर्वेद के ग्रंथों में वर्णित गरविप जिसका निर्विप विरुद्ध | द्रव्यों के सयोग से निर्माण होता है, इसी वर्ग का प्रतीत होता है । कुछ आचायों का मत है कि हीनवीर्यं स्थावर त्रिप दूषीविप तथा हीनवीर्य मृतसर्प, कीटादि जगम विप के संयोग से निर्मित चूर्ण प्रलेपादि गरविप हैं किन्तु वास्तव में दोनों एक ही है केवल नाम का भेदमात्र ही है । क्योंकि दोनों के गुण धर्म भी समान ही होते हैं, इति । आचार्य ढल्हण ने भी उपर्युक्त श्लोकों की व्याख्या करते हुये | आलस्यायन नामक आचार्य के मत का वर्णन किया है कि-
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श्रध्यायः ८ ] कल्पस्थानम् ६३ ' अथालम्बायनोक्त कीटाना सामान्यज्ञानोपायो लिख्यते - ' कृष्णा- । भिर्विन्दुलेखाभि पक्षै पादैर्मुखैर्नखे । शुकै कण्टकलाङ्गुलेः सनिष्टेः । पक्षरोममि. ॥ स्वनै. प्रमाणे. संस्थानलिङ्गैश्वापि शरीरगैः । विष-वीर्यैश्च कौटाना रूपवानं विभाव्यते ॥ इति तथा तेपा न केवल | नियमेन शूकादिदशेन विषप्रादुर्भाव, किन्तर्हि अभ्यवहारचूर्णा- । नुलेपनैश्च दूषोविपलिद्गप्रादुर्भाव इत्याह - यश्चैतानि हि चूर्णैर्वा चूर्ण्यते लिप्यतेऽथवा । मूत्रादिभिस्तस्य दूपविपरित समादिशेत् ॥ इनि ॥ एकजातीनतस्तूर्ध्वं कीटान् वक्ष्यामि भेदतः ॥ २ ॥ ।
सामान्यतो दष्टलिङ्गैः साध्यासाध्यक्रमेण च ।
त्रिकण्ट: करिणी चापि हस्तिकक्षोऽपराजितः ।
चत्वार एते कणभा व्याख्यातास्तीत्रवेदनाः ॥ २६ ॥
तैर्दष्टस्य श्वयथुरङ्ग मर्दो गुरुता गात्राणां दंशः कृष्णश्च भवति ४ प्रकार के कम के नाम और उससे दृष्ट के लक्षण- - इसके आगे एक जातिवाले कीटों का वर्णन सामान्य भेद, फाटने के लक्षणों तथा साध्यासाध्यता की दृष्टि से करूँगा । त्रिकटु, करिणी, हस्तिकक्ष, अपराजित ये चार कणभ जाति के हैं । इनके दंश के कारण तीव्र वेदना होती है तथा काटने के स्थान पर शोध होता है एवं भर्गो का टूटना, अंगों का भारीपन होता है तथा देशस्थान का वर्ण काला होता है । २५-२७ ॥ विमर्श: - चरककारने भी कणभ दृष्ट के लक्षणों का वर्णन निम्न प्रकार से किया है यथा- विसर्प. श्वयथु शूल
ज्वरश्छदिरथापि वा । लक्षणं कणमैर्दष्टे दशश्चैष विशीर्यते ॥
( च. चि. अ. २३/१५१ ) अर्थात् कणभ दृष्ट पुरुष में विसर्प, शोथ, शूल, ज्वर तथा वमन भादि ये लक्षण होते हैं तथा । इसका दंश झड़कर गिर जाता है । प्रतिसूर्यकः, पिङ्गाभासो, बहुवर्णो, निरुपमो गोथेरक इति पञ्च गोधेरका: तैर्दृष्टस्य शोफो दाहरुजी च भवतः, गोधेरकेणैतदेव ग्रन्थिप्रादुर्भावो ज्वरः ॥ २८ ॥
५ प्रकार के विषखोपरा के नाम तथा उसके दष्ट के लक्षण-प्रतिसूर्यक, पिह्नाभास, बहुवर्ण, निरुपम, गोधेरक ये पाँच जाति के हैं । गोधेरक इनके काटने से शोफ, दाह तथा पीडा । होती है । गोधेरक के दंश में इन लक्षणों के साथ ज्वर और ग्रन्थियाँ ( गाँठों ) की उत्पत्ति भी होती है ॥ २८ ॥
विमर्श: - कविराज हाराणचन्द्र महोदय इस पाठ के स्थान पर निम्नलिखित पाठ का औचित्य स्वीकार करते हैं यथा - प्रतिसूर्य्य. पिङ्गमासो बहुवर्णो महाशिरा • तथा निरुपम । श्चापि पञ्च गौधेरका ' स्मृताः ॥ तैर्भवन्तीह दष्टाना वेगवानानि सर्प-वत् । रुजश्च विविधाकारा ग्रन्थयश्च सुदारुणाः ॥ ' तथा आचार्य ढल्हण ने उपर्युक्त सूत्र की व्याख्या करते हुए एक अन्य पाठान्तर का निर्देश किया है यथा- केचित् तु प्रतिसूर्यक इत्यादि स्थाने एवं पठन्ति ‘ प्रतिसूर्यः पिङ्गनासो बहुलोमा महा-शिराः । तथा निरुपमश्चेति पच गोधरका • स्मृता ॥ तैर्भवन्तीह | दष्टानां वेगज्ञानानि सर्पवत् । रुनश्च विवैधाकारग्रन्थयश्च सुदा-रुणाः ॥ ' इति । गौधेरकलक्षण तन्त्रान्तरे - कृष्णसर्पेण गोधाया भवेद् यस्तु चतुष्पदः । सर्पो गोधेरको नाम तेन दष्टो न जीवति ॥ इति ॥ गलगोलिका - वेता, कृष्णा, रक्तराजी, रक्तमण्डला, सर्वश्वेता, सर्पपिकेत्येवं पट्; ताभिर्दष्टे सर्पपिकावर्ज । दाहशोफक्लेदा भवन्ति, सर्पपिकया हृदयपीडा -तिसारच, तासु मध्ये सर्पपिका प्राणहरी ॥ २६ ॥
६ प्रकार के गलगोली के नाम तथा उसके दृष्ट के लक्षण-गलगोलिका, श्वेता, कृष्णा, रक्तराजी, रक्तमण्डला, सर्वश्वेता तथा सर्पपिका ये छः हैं । इनके काटने पर सर्पपिका को छोड़कर दाद, सूजन और क्लेद होता है । सर्पपिका के दंश से हृदय में पीडा तथा अतिसार होता है । इन ऊपर कहे गए ६ कीटों में सर्पपिका का विप प्राणहर है अर्थात् घातक होता है ॥ २ ९ ॥ विमर्श: -- चरककार ने गलगोटिका ( गलगोली = छिप-कली ) दुष्ट के लक्षण निम्न प्रकार से लिखा है यथा-दाहृतोदस्वेदशोथकरी तु गलगोटिका ॥ ( च. चि. अ. २३।१५५ ) भर्थात् गलगोडिका दाह, तोद ( व्यथा ), स्वेद एवं शोध को उत्पन्न करती है तथा इसी प्रसंग में अष्टांगसंग्रहकार का भी निम्नलिखित मत प्राप्त होता है कि- गृहगोलिकया स्वेदतोद • श्वयथुदाहवान् । क्लेदी च दशो दष्टस्य हृत्पीटा ग्रन्थिसम्भवः ॥ ( भ. सं. उ. तं. अ. ४३ ) इति । शतपद्यस्तु - परुपा, कृष्णा, चित्रा, कपिला, पीतिका, रक्ता, श्वेता, अग्निप्रभा इत्यष्टौ ताभिर्दष्टे शोफो वेदना वाहच हृदये, श्वेतामिप्रभाभ्यामेतदेव, दाहो मूर्च्छा चातिमात्रं श्वेतपिडकोत्पत्तिश्च ॥ ३० ॥
८ प्रकार के गोजर के नाम और उसके दष्ट के लक्षण--शतपदी ( गोजर ), परुपा, कृष्णा, चित्रा, कपिला, पीतिका, रक्ता, श्वेता, अग्निप्रभा, ये आठ होती हैं । इनके काटने पर शोफ, वेदना तथा हृदय में दाह होता है । श्वेता तथा अग्निप्रभा के दंश से दाह एव मूर्च्छा उपर्युक्त लक्षणों के साथ विशेषरूप से होते हैं तथा श्वेत वर्णं की पिडिकाएँ उत्पन्न होती हैं ॥ ३० ॥
विमर्श: -- चरककार ने शतपदी विप के लक्षणों का निम्न प्रकार से वर्णन किया है यथा - दशे स्वेद रुज दाहं कुर्याच्छत-पदोवियम् ॥ ( च. चि. अ. २३१५५ ) अर्थात् शतपदी द्वारा दष्ट पुरुष के दंशस्थान पर स्वेद, वेदना, दाह आदि लक्षण होते हैं । अष्टाङ्गसंग्रहकार ने भी लिखा है कि - पीन. शतपदी दशः स्वेदरुग्रागशोफवान् । अतसीपुष्पवर्णो वा पिटकावान् भ्रम-प्रदः ॥ ( अ. सं उ तं. अ. ४३ ) मण्डूकाः -- कृष्णः, सारः, कुहजो, हरितो, रक्तो, यववर्णाभो, भृकुटी, कोटिकश्चेत्यष्टौ; तैर्दष्टस्य दंशे कण्डूर्भवति पीतफेनागमश्च वक्त्रात्, भृकुटीकोटिका-भ्यामेतदेव दाहश्छर्दिर्मूर्च्छा चातिमात्रम् ॥ ३१ ॥
८ प्रकार के मेढक का नाम और उसके दष्ट के लक्षण - मण्डूक ( मेंढक ), कृष्ण, सार, कुहक, हरित, रक्त, यववर्णाभ, भृकुटी, कोटिक ये आठ होते है । इनके काटने पर देश में कण्डू ( खुजली ) होती है, पीले रंग की झाग मुख से निकलती है । भृकुटी तथा कोटिक से लक्षणों के साथ दाह, वमन तथा मूर्च्छा अधिक मात्रा में होती है ॥ ३१ ॥
विमर्शः -- भाचार्य ढल्हण ने व्याख्या करते हुए तन्त्रान्तर के पाठ का वर्णन करते हुए लिखा है - अथ मण्डूकोत्पत्तिः भृकुटीलक्षणञ्च तन्त्रान्तरोक्त पठ्यते - ' वर्षमाणे सृजेच्छुक प्रावृट्काले
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६४ सुश्रुतसंहिता महोरगः । ततः शरत् - प्रतप्तार्या भूमौ मण्डो जलस्य हि । तस्मिन मण्टोदके जाना मण्डूकास्तेन सचिता । मण्डको गोगतिस्तज्
कोटिक परिकीर्त्तित । तेन दष्टस्य मरण नास्ति तस्य प्रतिक्रिया ॥
इति ॥ चरककार ने सविपमण्डूक दष्ट के लक्षणों का निरूपण निम्नलिखित प्रकार से किया है यथा - एकदष्ट्रादितः शून सरुक् स्यात्पीतक सतृट् । छदिनिंद्रा च मण्डूकः मविपटलक्ष णम् । ( च. चि. अ. २३/१५३ ) अर्थात् मविष मेढक के ढंश में एक ही दंष्ट्रा से दंश होता है इसमें दास्थान सुजा हुआ तथा वेदनायुक्त होता है । देह का वर्ण पीला हो जाता है । प्यास लगती है । वमन होता है तथा निद्रा आती है ।
विश्वम्भराभिर्दष्टे दंशः सर्पपाकाराभिः पिडकाभिः ।
सरुजाभिश्चीयते, शीतज्वरार्तश्च पुरुपो भवति ॥ ३२ ॥
विश्वम्भरा दष्ट के लक्षण-- विश्वम्भरा नामक कोट के काटने पर दंश सरसों के आकार की एवं वेदना युक्त पिडिकाओं से पूर्ण रहता है । तथा रोगी को शीतपूर्वक ( जाड़ा देकर ) ज्वर आता है ॥ ३२ ॥
अहिण्डुकाभिर्दष्टे तोददाहकण्डुश्वयथवो भवन्ति मोहश्चः कण्डूमकाभिर्दष्टे पीतानश्छद्येतीसारज्वरादि भिरभिहन्यते शुक्रवृन्ताभिर्दष्टे कण्डूकोठाः प्रवर्धन्ते शुकं चात्र लक्ष्यते ॥ ३३ ॥
अहिण्डुका- कण्डूमका - शूकवृन्ता के दष्ट लक्षण - अहिण्डुका के काटने पर तो, दाह, कण्डू, श्वयथु और मूर्च्छा होती है । कण्डुमका के काटने पर रोगी के अंग पीले पड जाते हैं । चमन, अतिसार, ज्वर आदि के कारण रोगी की मृत्यु हो जाती है । शुकता के काटने पर कण्डू तथा कोट की उत्पत्ति होती है तथा वंशस्थान पर शूक ( डंक ) दिखाई पडता है ॥ ३३ ॥
पिपीलिका: - स्थूलशीर्पा, संवाहिका, ब्राह्मणिका, अङ्गुलिका; कपिलिका, चित्रवर्णेति पट्; ताभिर्दष्टे दंशे श्वरनिस्पर्शवाहश फौ भवतः ॥ ३४ ॥
६ प्रकार की चीटियों के नाम और उनसे दृष्ट के लक्षण-पिपीलिका ( चींटियाँ ), स्थूलशीर्पा, संवाहिका, ब्राह्मणिका, अंगुलिका, कपलिका और चित्रवर्णा ये छः प्रकार की होती हैं । इनके काटने पर ढंदा में शोध एव अग्नि से जलने ( दुग्ध ) की भाँति दाह तथा शोथ होता है ॥ ३४ ॥
मक्षिकाः -- कांन्तारिका, कृष्णा, पिङ्गला, मधू-लिका, कापायी, स्थालिकेत्येचं पटू, ताभिर्दष्टस्य कण्डुशोफदाहरु जो भवन्ति, स्थालिकाकापायीभ्या मेतदेव श्यावपिडकोत्पत्तिरुपद्रवाश्च ज्वरादयो भवन्ति, कापायी स्थालिका च प्राणहरे ॥ ३५ ॥
६ प्रकार की मक्खियों के नाम और दष्ट के लक्षण -मक्सियाँ - कान्तारिका, कृष्णा, पिङ्गला, मधूलिका, कपायी तथा स्थालिका ये छ. प्रकार की होती है । इनके काटने पर कण्डू ( खुजली ), शोफ, दाह, वेदना होती है । स्थालिका तथा कपायी से इन लक्षणों के साथ में श्यामवर्ण की पिडिकाओं की उत्पत्ति तथा ज्वर आदि उपद्रव होते हैं । कपायी और स्थाटिका नामक मक्खियाँ प्राणनाशक होती है ॥ ३५ ॥
विमर्श: --- चरककार ने मचिका दंश के लक्षणों को निम्न. लिखित रूप में कहा है कि - सद्यः प्रनाविणी घ्यावा दाहमूर्द्धा व्यन्त्रिता । पिटिका मक्षिका, तामां तु स्थगिकाऽसृहत् ॥ ( च. चि. अ. २३/१५७ ) मक्षिका से दृष्ट स्थान पर श्याम वर्ण की पिढिकाएँ होती है । इसमें से तत्काल ही स्राव होना प्रारम्भ हो जाता है । इस पिटिका के साथ ही दाह, मूर्च्छा आदि ज्वर ये लक्षण भी होते हैं । मक्षिकाओं से मे स्थगिका नाम की मम्मी प्राणहर है । चरककारने सम्भवत. सुश्रुतोक्त स्थालिका के लिए स्थगिका नाम का पाठ किया है । अष्टांग संग्रह में भी कहा गया है कि - प्रायेण मक्षिच नेत्रे दशन्ति श्वयथुणः । तदृशो टाकण्डुमास्तासां तु स्थाटिकां त्यजेत ॥ नष्टे पिटका श्यावा स्त्राविनी भूर्भुपद्रवा ॥ ( अ. स. उ. तं. अ, ४३ ) मशका: - सामुद्रः, परिमण्डलो, हस्तिमशक ', कृष्णः, पार्वतीय इति पञ्चः तैर्दष्टस्य तीत्रा कण्डूश शोफ, पार्वतीयस्तु कीटैः प्राणहरेस्तुल्यलक्षणः ॥ ३६ ॥
५ प्रकार के मच्छरों के नाम और उसमे दृष्ट के लक्षण-| मशक ( मच्छर ) - सामुद्र, परिमण्डल, हस्तिमशक, कृष्ण और पार्वतीय ये पाँच प्रकार के होते है । इनके काटने से तीच कण्डू और देशस्थान में सूजन होती है । पार्वतीय । मशक प्राणहर कीटों के समान लक्षण वाले होते हैं ॥ ३६ ॥
विमर्श: - मशक ( मच्छर ) दृष्ट के लक्षण कहते हुए चरककार लिखते है कि - कण्डूमा मशकैरीपच्योयः स्यान्मन्दः । वेदन. । असाध्यकी मदृशममाध्यमशकक्षतम् ॥ ( च. चि. अ. २३/१५६ ) मच्छरों के काटने से थोडा सा शोध होता है और इस शोथ में खुजली तथा मन्द वेदना होती है । असाध्य मच्छरों के काटने पर लक्षण असाध्य कीटों के दंश के समान ही होते हैं ।
नखावकृष्टेऽत्यर्थ पिडकादाहपाका भवन्ति ।
जलौकसां दृष्टलक्षणमुक्तं चिकित्सितं च ॥ ३१ ॥
नस से खरोंच हो जाने पर उत्पन्न विष के लक्षण - नख से सच देने पर अतिशय दाह, पाक तथा पिडिकाएँ होती हैं । जोक के काटने के लक्षण तथा चिकित्सा ( सूत्र स्थान में जलौकावचारणीय नामक अध्याय ) कह दी है ॥ ३७ ॥ ·
भवन्ति चात्र--गोवेरकः स्थालिका च ये च श्वेतप्रभे ।
भृकुटी कोटिकश्चैव न सिध्यन्त्येकजातिषु ॥ ३८ ॥
एक जातियों में असाध्य - एक जाति के कीटों में गोधेरक, स्थालिका, श्वेता, अग्निप्रभा, भृकुटी और कोटिक नाम के ये कीट असाध्य माने गए हैं ॥ ३८ ॥
विमर्श: - मण्डूकों की उत्पत्ति अथवा उत्पत्ति का जो भी रहस्य प्राचीनों द्वारा प्रतिपादित किया गया हो परन्तु । इतना तथ्य तो अवश्य ही प्राप्त होता है कि सर्पशुक्र से । इनकी उत्पत्ति होती है । जन्य व जनक में समानता होने के कारण मण्डुक भी विषैले होते हैं । फिर भी मेंढकों में अधिकतर जातियाँ निर्विष ही होती हैं अत ' चिकित्सा में प्रायः सुसाध्यता रहती है । इसी प्रकार सविष तथा निर्विष भेद से मक्षिका भी दो प्रकार की होती है । निर्विप
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श्रध्यायः ८ ] कल्पस्थानम् ६५ afras वरों में रहती हैं और प्रायः काटती भी अधिक हैं परन्तु इनके दंश से कोई विप प्रभाव नहीं होता है । पश्चात्य विद्वानों तथा अन्वेषकों ने भी कई सविष मक्षिकाओं का अनुसन्धान किया है, जिनके दंश से चिरकालीन ज्वर, काला ज्वर ( Kalazar ) तथा सुषुप्ति ज्वर ( Sleeping sickness ) नादि होते हैं इनमें अफ्रीका महाद्वीप में पाई जानेवाली महाविषाक्त मक्षिका टिसीटिसी ( Tse Tse fly ) मी है इसके अतिरिक्त ( Aedes egypti ) वा मरु मक्षिका, हरिमृग ( Cantoridis ) नाम की मक्खियाँ भी विषाक्त तथा अनेक रोगों की उत्पत्ति का कारण होती हैं । मशकों अथवा मच्छरों के ऊपर भी पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने बहुत अनुसन्धान किये हैं उन्होंने विषाक्त मच्छरों को तीन बड़ी बुड़ी जातियों ( १ ) एनोफिलीज ( Anophe les ) ( २ ) क्यूलेक्स ( Culex ) तथा ( ३ ) स्टेगोमाया ( Stegomaya ) में विभक्त किया है । परन्तु इनकी तया प्राचीन नाचायों की विचारसरणी में भेद यह है कि प्राचीन आचार्य मच्छरों को स्वत. विपाक मानते हैं जब कि अर्वाचीन वैज्ञानिक उनको विषाक्त न मानकर विषाणुओं या जीवाणुओं का वाहक Carrier ) मानते हैं । अनेक विचार से ये मच्छर एक प्रकार के माध्यम ( Media, host ) होते हैं जो रोगजनक कीटाणुओं का वहन करते हैं तथा अपने दंशस्थान के मार्ग द्वारा प्राणियों में कीटाणुओं का अन्तर्भरण ( Inoculation or Injection ) कर देते हैं जिसके परिणामस्वरूप विषमज्वर ( Malaria ) लीपद ( Pilaris ) आदि रोग उत्पन्न होते हैं । इत्यादि इत्यादि ।
- शत्रसूत्रपुरीषैस्तु सविधैरवमर्शनात् ।
· स्युः कण्डूदाहकोठारु ' पिडकातोदवेदनाः ॥ ३६ ॥
- प्रक्केद्वांस्तथा स्रावो भृशं संपाचयेत्त्वचम् ।
दिग्धविद्धक्रियास्तत्र यथावदवचारयेत् ॥ ४० ॥ ।
विषाक्त शव, मूत्र, पुरीप के स्पर्श से होनेवाले लक्षण और चिकित्मा - विपाक्त शव, मूत्र, मल आदि के स्पर्श से कण्डू ( खुजली ), दाह ( जलन ), कोठ ( चकत्ते, ददोरे ), भरूं-पिकाएँ, पिडिका, वोद, वेदना, क्लेदोन्नता ( कोथ या सढना ), स्राव, स्वपाक ( Cellahtis ) या ( Dermatitis ) आदि लक्षण होते हैं । इसमें विषाक्त शस्त्र आदि के लगने के समान चिकित्सा करे ॥ ३ ९ -१० ॥
नावसन्नं न चोत्सन्नमतिसंरम्भवेदनम् ।
दशादौ विपरीतार्ति कीटदष्टं सुबाधकम् ॥ ४ ९ ॥ ।
सुखान्य कीटदष्ट के लक्षण - जो दंश न तो बहुत दवा हुना, और न बहुत उभरा हुआ तथा बहुत शोधयुक्त तथा रक्तवर्ण ( लाल रंग ) वाला होता है, अतिवेदना युक्त तथा देश के प्रारम्भ में विपरीत पीड़ा वाला होता है वह कीटदष्ट कष्टसाध्य होता है ॥ ४१ ॥
' दष्टानुप्रविषैः कीटैः सर्पवत् समुपाचरेत् ।
विविधानां तु पूर्वेषां त्रैविध्येन क्रिया हिताः ॥ १२ ॥
उग्रविष कीट की चिकित्सा - उग्रविषवाले कोटों ( कीड़ों ) के काटने पर सर्पविष की भाँति चिकित्सा करे । दर्वीकर, । ६ सु ० क ० मण्डली, राजिमान् की शुक्रादि योनिभेद पूर्वोक तीन प्रकार के कीटों की चिकित्सा भी वातादि भेद के | अनुसार करे ॥ ४२ ॥
स्वेदमा लेपनं सेकं चोष्णमत्रावचारयेत् ।
अन्यत्र मूच्छिताहंशात् पाककोथप्रपीडितात् ॥ १३ ॥
विपन्नं च विधिं सर्वं बहुशः शोधनानि च । कीट दष्ट में सामान्य चिकित्सा - स्वेदन, आलेपन तथा | सेक आदि को उष्ण रूप में ही इनमें प्रयुक्त करे । मूच्छिता -वस्था में, देश के पाक होने पर केवल शीतल स्वेदन, आलेप व परिषेक का प्रयोग करे एवं सम्पूर्ण विपन्न उपचार करे तथा पुनः पुनः शोधन कर्म करे ॥ ४३ ॥
विमर्श: - आचार्य ढल्हण उपर्युक्त श्लोक की व्याख्या | करते हुए कहते हैं कि इदानीं सामान्यं चिकित्सितमाह— । स्वेदमालेपनमित्यादि । अन्यत्र मूच्छितादिति । मूच्छित वर्जयित्वा, मूच्छिते न कुर्य्यादित्यर्थः ।...... संशमनविधिं पाननस्याभ्यङ्गाले-पनपरिषेकाञ्जनादिकं वानादिविषहरद्रव्यकल्पितम् । संशोधनानि । चेति । वमनविरेकास्थापनानि, यथादोपमित्यध्याहारः ॥ इति ॥ शिरीषकटुकाकुष्टवचारजनिसैन्धवैः ॥ ४४ ॥
क्षीरमज्जवसासर्पिःशुण्ठीपिप्पलिदा I उत्कारिका स्थिरादौ वा सुकृता स्वेदने हिता ॥ १५ ॥
वातादि दोष विषहर स्वेद द्रव्यों का निर्देश - शिरीप, कुटकी, कुष्ठ ( कूल ), वच, हल्दी, सेंधानमक, दूध, मज्जा, वसा, वी, सोंठ, पिप्पली, दारूहल्दी इनसे अथवा शालिपर्णी आदि लघु पञ्चमूल से बनाई उत्कारिका ( पुल्टिस, उपनाह ) । स्वेदनार्थ उत्तम होती है ॥ १४–४५ ॥ न स्वेदयेत चादंश धूमं वक्ष्यामि वृश्चिके । वृश्चिक के दंश में स्वेदन- निषेध - वृश्चिक के दंश में स्वेदन
कर्म न करे परन्तु आगे कहा गया धूम देवे ।
अगदानेकजातीषु प्रवक्ष्यामि पृथक् पृथक् ॥ १६ ॥
कुष्ठं वक्र वचा पाठा विल्वमूलं सुवर्चिका ।
गृहधूमं हरिद्रे द्वे त्रिकण्टकविपे हिताः ॥४७ ॥
त्रिकण्टक में कुष्टादि अगद - एक जाति वाले कीटों के लिए प्रयुक्त होने वाले अगदों को अब पृथक् पृथक् कहता हूँ । कूठ, तगर, वच, पाठा, विश्वमूल, सुवर्चला ( हुलहुल ), गृहधूम, हल्दी, दारूहल्दी यह योग त्रिकण्टक विष में हितकर होता है ॥ ४६-४७ ॥
रजन्यागार घूमश्च वक्रं कुष्ठं पलाशजम् ।
गलगोलिकदृष्टानामगदो विषनाशनः ॥ १८ ॥
गलगोली विष में रजन्यादि भगढ - हरिद्रा ( हल्दी ), गृहधूम, तगर, कुष्ट ( कुठ ), पलाश वीज यह भगद गल-गोलिका ( छिपकली ) के विप को नष्ट करता है ॥ ४८ ॥
कुङ्कुमं तगरं शिशु पद्मकं रजनीद्वयम् ।
अगदी जलपिष्टोऽयं शतपद्विषनाशनः ॥ ४
शनपदी विष में कुङ्कुमादि अगद - केशर, तगर, सहजन, पद्माख, हल्दी, दारूहल्दी आदि को जल में पीस कर बनाया
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६६ सुश्रुतसंहिता गया अगद शतपदी ( कनखजूरा या गोजर ) के चिप को नष्ट करता है ॥ ४ ९ ॥
मेषशृङ्गी वचा पाठा निचुलो रोहणी जलम् ।
सर्वमण्डूकदष्टानामगदोऽय विपापहः ॥ ५० ॥
मण्डूक विष में मेषशृङ्गयादि - मेपशृङ्गी ( मेदाशृङ्गी ), वच, पाठा, निचुल ( जलवेंत ), कुटकी, बालक आदि के द्वारा बनाया अगद सभी प्रकार के मण्डूकों ( मेंढकों ) के विप को नष्ट करता है ॥ # ५० ॥ धवाश्वगन्धातिबलाबलासातिगुहागुहाः विश्वम्भराभिदष्टानामगदोऽयं विषापह ॥ ५१ ॥
विश्वम्मरा विप में धवादि अगद - धाय ( धव ), अश्वगंधा, अतिबला, चला, शालिपर्णी ' तथा पृश्निपर्णी से बना अगद विश्वम्भराजाति के कीटों के विप का नाशक है ॥ ५१ ॥
शिरीषं तगर कुष्ठं शालिपर्णी सहा निशे ।
हिण्डुकाभिर्दष्टानामगदो विपनाशनः ॥ ५२ ॥
अहिण्डुका विष में शिरीपादि अगद - शिरीष, तगर, कूठ, शालपर्णी, मुद्रपर्णी, हल्दी और दारूहल्दी से बनाया गया अगद अहिण्डुका जाति के कीटों के चिप को नष्ट करता है ॥
कण्डूमकाभिर्दष्टानां रात्रौ शीताः क्रिया हिताः ।
दिवा ते नैव सिध्यन्ति सूर्यरश्मिबलार्दिताः ॥ ५३ ॥
कण्डमका - विप - चिकित्सा - कण्डूमका जाति के कीटों के देश में रात्रि में शीतल उपचार करे क्योंकि दिन में सूर्य की किरणों से वल पाकर यह फिर अच्छा नहीं होता ॥ ५३ ॥
चक्रं कुष्ठमपामार्गः शुकवृन्तविपेऽगदः ।
भृङ्गस्वरसपिष्टा वा कृष्णवल्मीकमृत्तिका ॥ ५४ ॥
शूकबृन्त - विष चिकित्सा - तगर, कूठ, अपामार्ग ( चिरचिटा ) इनका अगद शुकवृन्त कीटों के विप में प्रयुक्त किया जाता है अथवा बांबी की काली मिट्टी को भांगरे के रस ( भृंगराज स्वरस ) में पीसकर दंशस्थान पर लेप करे ॥ ५४ ॥
पिपीलिकाभिर्दष्टानां मक्षिकामशकैस्तथा ।
गोमूत्रेण युतो लेपः कृष्णवल्मीकमृत्तिका ॥ १५ ॥
पिपीलिका मक्षिका मशक विप चिकित्सा - चींटी तथा मक्खी व मच्छर के काटने पर वाश्वी ( वल्मीक ) की काली मिट्टी को गोमूत्र में मिलाकर लेप करे ॥ ५५ ॥
नखावधृष्टसंजाते शोफे भृङ्गरसो हितः । प्रतिसूर्य कष्टानां सर्पदष्टवदाचरेत् । नख्ख से खरोंच लगने व प्रतिसूर्यक दष्ट की चिकित्सा - नख से खरोंच लग जाने से उत्पन्न शोध में भृङ्गराज - स्वरस का प्रयोग उत्तम होता है । तथा प्रतिसूर्यक के दश में सर्पदशोक्त की चिकित्सा करे ॥ ५६ ॥
त्रिविधा वृश्चिका प्रोक्ता मन्दमध्य महाविषाः ॥ २६ ॥
गोशकृत्कोथजा मन्दा मध्याः काष्ठेप्टिकोद्भवाः ।
सर्पकोथोद्भवास्तीक्ष्णा ये चान्ये विपसंभवाः ॥ २७ ॥
वृश्चिक की उत्पत्ति - बिच्छू तीन प्रकार के कहे गये हैं । ( १ ) मन्दविप, ( २ ) मध्य विप तथा ( ३ ) महाविप | गाय के गोवर के सड़ने से उत्पन्न होने वाले बिच्छू मन्द विष वाले, काठ व इंट के सडने से उत्पन्न होने वाले बिच्छू मध्यविष तथा सर्प के मृत शरीर से उत्पन्न होने वाले विच्छू तीव्र विष वाले होते हैं तथा अन्य जो भी विच्छू दूसरे विर्षो से उत्पन्न होते हैं वे भी तीव्रविप वाले होते हैं ॥ ५७ ॥
विमर्श: - गोवर कण्ठे ( गोहरी ) आदि के इकट्ठे करने के स्थान पर होने वाले बिच्छू मन्द विष चाले होते हैं क्योंकि गोवर के सड़ने से तथा बिच्छू की उत्पत्ति से कोई तात्पर्य नहीं निकलता इसी प्रकार ईंट व लकडी भादि के रखने के स्थान पर मिलने वाले बिच्छू मध्मविप वाले माने जाते है तथा सर्प आदि विपाक्त वस्तुओं के स्थानों के आस पास पाये जाने वाले बिच्छू तीव्र विष वाले कहे जा सकते हैं । कई विद्वानों ने उपर्युक्त श्लोक को निम्न प्रकार से ग्रहण किया है- सर्पको योद्भवास्तोत्रा दिग्धविद्धविपेते । कोथे मध्या गवादीनां शकृत् -- कोथेऽवराः स्मृता ॥ इति ॥
मन्दा द्वादश मध्यास्तु त्रयः पञ्चदशोत्तमाः ।
दश विंशतिरित्येते संख्यया परिकीर्तिताः ॥ २८ ॥
वृश्चिक सख्या - बिच्छू तीस ( संख्या में ) माने गये गए हैं, इनमें बारह मन्दविप वाले, तीन मध्यम विष वाले तथा पन्द्रह तीव्र विप वाले कहे जाते हैं ॥ ५८ ॥
विमर्श: - आचार्य गयदास २० संख्या मानते हुए लिखते है कि त्रयोदश प्राणहरास्त्रयो मध्यात्तथाऽपरे । मन्दवीर्या दशैकश्चं वृश्चिका विषवेदिमि. ॥ सप्तविंशतिरित्येते संख्यया परिकीर्तिता ॥ बिच्छू एक विषैला प्राणी है तथा इसकी अनेक जातियाँ पाई जाती हैं । कुछ जातियों के दंश से रोगी को कष्ट तो बहुत होता है किन्तु उनकी मृत्यु का डर नहीं, रहता है, ऐसे वृश्चिक -दश को रुजाकर ( वेदनोत्पादक ) मान सकते हैं । इसके अतिरिक्त कुछ बिच्छू ऐसे भी पाये जाते है जिनके टुक मारते ही शरीर का मांस गल गलकर गिरने लगता है । तथा रोगी की मृत्यु हो जाती है, ऐसे वृश्चिकों को सद्योमारक प्राणघातक की कोटि में रखा जा सकता है । चिच्छू के काटने पर दश स्थान से कुछ ऊपर अंगों में कई वन्ध लगा दिए जाते हैं, जिनसे विष का प्रसार ऊपर की ओर न होने पावे क्योंकि सर्पविष के समान ही बिच्छू के विष का स्वभाव ऊर्ध्वगामी होता है । किन्तु इन दोनों कीटों के विष में सबसे बड़ा अन्तर यह है कि सर्पदंश में पीडा नहीं होती जब fa बिच्छू के विप में पीडा की पराकाष्ठा हो जाती है । इसी लिए लोकभाषा में एक प्रसिद्ध कहावत भी है कि ' सांप का काटा सोवे । विच्छू का काटा रौवे । ' और वास्तव में सर्पदंश में निद्रा एवं तन्द्रा मुख्य लक्षण होते भी हैं । वृश्चिक विष का प्रधान प्रभाव नाडी - संस्थान पर होता है अतः तीव्र | चिप की अवस्था में अन्य स्थानों के दंश होने पर भी मस्तिष्क तथा नाडियों के द्वारा हृदय, नासिका, जिह्वा आदि भगों में कम्प, स्तम्भ भादि विकृतिया दृष्टिगोचर होती हैं । किन्तु यह स्थिति प्रायः घातक होती है । बिच्छू के पुच्छ प्रदेश ( पूछ वाले भाग ) में दो विपगर्भ - प्रन्थियां होती हैं । | ढक मारने से इन थैलियों का विष ददा द्वारा होता हुआ
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अध्याय ८ [ ] कल्पस्थानम् II दंश स्थान में प्रविष्ट हो जाता है जिसके फलस्वरूप दंशस्थान में तीव्र पीड़ा होती है । अन्य सार्वदेहिक लक्षणों में ज्वर तीन से छः दिनों तक हो सकता है । इसके अलावा पेट में भयंकर शूल, चमन तथा अतिसार आदि लक्षण भी हो सकते हैं । नाडी मण्डल के प्रभावित होने पर सर्वागीण स्वेद प्रवृत्ति, एवं पेशियों में उद्देष्टन ( Muscular cramps ) आदि होते हैं । ये उद्वेष्टन अधिकतर गले तथा अधोहनु की पेशियों मैं दृष्टिगोचर होते है । यदि विप बहुत ही तीव्र है तो आगे चलकर श्वासावरोध ( Asphyxia ), तथा संन्यास ( Coma ) के उपरान्त मृत्यु हो जाती है । प्रायः छोटे बच्चों में वृश्चिकदंश के कारण होने वाली मृत्यु की प्रतिशत ( Percentage ) अधिक पाई जाती है । कृष्णः श्याव. कर्बुरः पाण्डुवर्णो गोमूत्राभः कर्कशो मेचकश्च पीतो धूम्रो रोमशः शाद्वलाभो रक्तः श्वेतेनोदरेणेति मन्दाः युक्ताश्चैते वृश्चिकाः पुच्छ देशे स्युर्भूयोभिः पर्वभिश्चेतरेभ्यः एभिर्दष्टे वेदना वेपथुश्च | || २६ ||
।
गात्रस्तम्भः कृष्णरक्तागमच ॥ ६० ॥
शाखादष्टे वेदना चोर्ध्वमेति दाहस्वेदौ दशशोको ज्वरश्व । मन्दविष वृश्चिकों के नाम, लक्षण तथा कर्म - कृष्ण, श्यात्र, कर्बुर, पाण्डुवर्ण, गोमूत्राभ, कर्कश, मेचक, पीत ( पीला ), धूम्रवर्ण, रोमश, शाद्वलाभ ( हरी दूब के वर्ण का ) तथा लालये बारह वृश्चिक उदर से श्वेत होते है तथा ये मन्द विप वाले विच्छू हैं । ये बिच्छू दूसरे बिच्छुओं की अपेक्षा पुच्छ प्रदेश पर बहुपर्वान्वित होते है, इनकी पूंछ पर बहुत से जोड़ होते हैं, दूसरे प्रकार के वृश्चिकों पर इतने अधिक पर्व नहीं होते । इनके देश से वेदना, कम्पन, गात्र-स्तम्भ, काले रक्त की प्रवृत्ति होती है । हाथ पैर आदि में दंश होने पर वेदना ऊर्ध्वगामी होने के कारण ऊपर की भोर चढ़ती है तथा दाह, स्वेद, दंशस्थान पर शोथ तथा ज्वर होता है । विमर्श: कहीं कहीं पर निम्नलिखित पाठान्तर भी मिलता है, यथा-- ' श्वेतोदरो रोमशः शादलाभो रक्तश्चैते मन्दः वीर्या मतास्तु । ' इति । आचार्य ढल्हण ने उपर्युक्त श्लोकों की व्याख्या करते हुए लिखा है कि- कृष्णादयो द्वादश, पि श्वेने-नोदरेणोपलक्षिना वेदना चोर्ध्वमेतीति त्रिविधानामपि वृश्चिकाना सामान्यलक्षगमत्र प्रायोवृत्त्याऽभिहितम् । स्युर्भूयोभिः पर्वमिश्चेतरेम्य इति । इतरेभ्यो मन्दविषा वृश्चिका भूयोभिर्वहुतरै पर्वभिरुपलक्षिता भवेयुः इति ॥ रक्तः पीतः कापिलेनोदरेण सर्वे धूम्राः पर्वभिश्च त्रिभिः स्युः ॥ ६१ ॥
एते मूत्रोच्चारपूत्यण्डजाता मध्या ज्ञेयास्त्रिप्रकारोरगाणाम् । यस्यैतेपामन्वयाद्यः प्रसूतो दोषोत्पत्ति तत्स्वरूपां स कुर्यात् ॥ ६२ ॥
जिह्वाशोफो भोजनस्यावरोधो मूर्च्छा चोग्रा मध्यवीर्याभिदष्टे । मध्यविष वृचिकों के नाम, लक्षण तथा कर्म - मध्यम विप वाले बिच्छू लाल, पीत ( पीला ) तथा कपिल वर्ण के होते । हैं । इनका उदर कृष्ण वर्ण का होता है । इनकी पूंछ पर तीन । पर्व ( जोड ) होते है । दवकर, मण्डली तथा राजिमान तीन प्रकार के सांपों के मल मूत्र के सडने एवं उनके अण्डों से जो उत्पन्न होता है । वह बिच्छू उसी के अनुसार दोपोत्पत्ति को करता है । जिह्वा में शोथ, भोजन का अवरोध, तथा तीव्र मूर्च्छा, मध्यवीर्य वाले बिच्छुओं के दंशन से उत्पन्न होती है ॥ श्वेनश्वित्रः श्यामलो लोहिताभो रक्तः श्वेतो रक्तनीलोदरौ च ॥ ६३ ॥
' पीतोऽरको नीलपीतोऽपरस्तु रक्तो नीलो नीलशुक्लस्तथा च । तो बभ्रुः पूर्ववचैर्वा चार्वा पर्वणी द्वे च यस्य ॥ ६४ ॥
नानारूपा वर्णतश्चापि घोरा ज्ञेयाश्च वृश्चिकाः प्राणचौराः । जन्मैतेषां सर्पकोथात् प्रदिष्टं देभ्यो वा घातितानां विपेण ॥ ६५ ॥
एभिर्दष्टं सर्पवेगप्रवृत्तिः स्फोटोत्पत्तिर्भ्रान्तिदाहो ज्वरश्च । खेभ्यः कृष्णं शोणितं याति तीव्र तस्मात् प्राणस्त्यज्यते शीघ्रमेव ॥ ६६ ॥
तीक्ष्ण विप वृश्चिकों के नाम, लक्षण तथा कर्म - श्वेत, चित्र ( रह्न विरङ्गा ), श्यामल, लोहिताभ, रक्तश्वेत, रक्तोदर, । नीलोदर, पीला लाल, नीला पीला, लाल नीला, नीलश्वेत, | रक्तबभ्रु, पूछ पर एक पर्व वाला, पूंछ पर पर्वरहित, दो पर्व | वाले इस प्रकार नाना भाकृति एवं वर्ण वाले भयानक बिच्छू प्राणहर माने जाते हैं । इनकी उत्पत्ति सर्पों के सबने से अथवा विष से मृत प्राणी के शरीर से होती है । इनके काटने पर सर्पविष - वेग के लक्षण, स्फोटों ( छालों ) की उत्पत्ति, भ्रान्ति, दाह तथा स्वर आदि लक्षण होते हैं । तथा रोमकूपों या नाक व मुख से काले रंग का रक्त वेग से ( तेजी से ) निकलने लगता है भत ' रोगी शीघ्र ही प्राण त्याग देता है ॥ ६३-६६ ॥ विमर्शः -- चरककार ने भी बिच्छू के काटने के साध्य व असाध्य लक्षणों का वर्णन निन्न प्रकार से किया है, यथा-दहत्यग्निरिवादी तु मिनत्तीवोध्वंमाशु च । वृश्चिकस्य विपयानि दशे पश्चातु तिष्ठति ॥ दृष्टोऽसाध्यस्तु चापरमनोपतो नरः । मासैः पतद्भिरत्यर्थे वेदनान जहात्यसून् ॥ ( च ० चि ० अ ० २३ / १४ ९ - १५० ) अर्थात् विच्छू का चिप प्रारम्भ में अभि के सदृश दाह तथा भेदन के सहा पीटा को उत्पन्न करता है । यह शीघ्र ही ऊपर की ओर बढ़ता है परन्तु बाद में दशस्थान पर आकर ठहर जाता है । तथा प्राणहर वृश्चिक के दंश से
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सुश्रुतसंहिता हृदय, नाक और जिह्वा अपना काम करना बन्द कर देते हैं, मांस गल गलकर लड़ने ( गिरने ) लगता है तथा वह मनुष्य वेदनाओं से पीडित होकर प्राणों का त्याग कर देता है । अष्टाङ्गहृदयकार ने भी वृश्चिक - विप का वर्णन करते हुए लिखा है - वृश्चिकस्य विपलक्षणम् - आदी दहति वह्निवत् । ऊर्ध्व मारोहति क्षिप्र दशे पश्चात्तु तिष्ठति ॥ ( अ ० हृ ० उ ० तं अ ० ३७ ) निम्नलिखित कोष्ठक में त्रिविध वृश्चिकों के पार्थक्य का दिग्दर्शन कराया गया है: 2 वृश्चिक ( ३० ) उग्रविष ( १५ ) ( सर्प अथवा विप जुष्ट प्राणी के कोथ ग्रस्त शरीर से उत्पन्न ) अग्निवर्ण, दो या एक पर्व के लाल, काले या श्वेत उदर के । एक या हीनपर्वा न्वित ( पुच्छ में ) । मध्यविप ( ३ ) मन्दविष ( १२ ) ईट तथा लकड़ी ( गोवर तथा कंडे से उत्पन्न होने से उत्पन्न ) वाले ) धूम्रवर्ण, कृष्णपाद पीले, श्वेत, काले, वाले तीन पर्व के रूक्ष, मेचकवर्ण के चत्र तथा लालिमा रोमयुक्त एवं बहु युक्त चित्रित । पर्वान्वित । पुच्छ में तीन पर्व पुच्छ में बहुत पर्व होते हैं । होते हैं । प्रायः सभी विच्छू पुच्छ युक्त होते है । उनके पुच्छ में कई सन्धियां या पर्व बने होते है और पुच्छ के अन्त में एक शूक ( सूचीवत् ) के समान कांटा होता है जिसे तुण्ड कहा जाता है । इस तुण्ड के द्वारा ही विच्छु ढंक मार कर अपना विप प्राणी के दंश स्थान में भर देता है । इस तुण्ड को आल भी कहा जाता है । वृश्चिक आलविप वाला माना जाता है क्योंकि इनके मुख में विप का अधिष्ठान न होकर तुण्ड अथवा आल में होता है इसलिये बिच्छू दश नहीं करता चरन् प्राणी के अग को अपने तुण्ड से विद्ध करता है ।
उग्रमध्यविपैर्दष्टं चिकित्सेत् सर्पदष्टवत् ।
आदशं स्वेदितं चूर्णैः प्रच्छितं प्रतिसारयेत् ॥ ६७ ॥
रजनीसैन्धवव्योपशिरीपफलपुष्पजै. उग्र - मध्यविष वृश्चिक - दष्ट की चिकित्सा - तीघ्र तथा मध्य विप वाले बिच्छुओं के काटने पर सर्पदष्ट की भांति ही चिकित्सा करे । दश के चारों ओर स्वेदन करके तथा उस स्थान को पोछ कर, हल्दी, सेन्धानमक, त्रिकुट ( सोंठ, मरिच, पीपल ) शिरीष के फल तथा पुष्पों के चूर्ण से दंश ( विद्व ) स्थान पर प्रतिसारण करे या घर्पण करे वा रगडे ॥ ६७ ॥
विमर्श. -- चरककार ने बिच्छुओं के विष को प्रकृति को बताकर उसकी चिकित्सा - विधि का सुन्दर वर्णन दिया है, कि - वातो विपाप्राय उच्चिटिङ्गा सवृश्चिका । वातपित्तो रत्रणा. कीटा श्लैष्मिका कणभादय ॥ ( च चि. अ. २३१६४ ) अर्थात् उच्चिटिङ्ग तथा बिच्छुओं का विप प्रायः वातप्रधान, फोटों का विप वातपित्त - प्रधान और कणभ आदि का विप कफप्रधान ( श्लैष्मिक ) होता है । इसलिए बिच्छू और उन्तिटिनों को छोडकर शेष सभी और सब स्थानों पर पहुंचे । हुए विपों में प्रायः शीतोपचार हितकर होता है, यथा-| विषेष्वपि च सर्वेषु सर्वस्थानगतेषु च । अवृद्धिको चिटिङ्गेषु प्रायः शीतो विधितिः ॥ ( च. चि. अ. २३।१७१ ) अतः वृश्चिक - दष्ट की चिकित्सा निम्न प्रकार से करनी उचित होती है, यथा-वृश्चिकं स्वेदमभ्यङ्ग घृतेन लवणेन च । सेकांचोष्णान्प्रयुञ्जीत भोन्य पान च सर्पिष ॥ ( च. चि. अ. २३/१७२ ) अर्थात् बिच्छू के दंश में स्वेद, घी और सेंधानमक को मिलाकर अभ्यङ्ग तथा घी और सेंधानमक को मिश्रित कर गरम परिपेचन करना चाहिए तथा खान - पान आदि में घी का अधिक प्रयोग करे | अष्टाङ्ग - सग्रहकार ने भी चिकित्सा सिद्धान्त का वर्णन करते हुए निर्देश किया है, कि लवणोत्तम युक्तेन सर्पिषा वा पुनः पुन । सिञ्चेत्... * 11 ( 87. € उ. तं. अ. ४३ ) वृश्चिक दंश ( Scorpion bite ) के लक्षण व चिकित्सा का वर्णन आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में निन प्रकार से दिया गया है । बिच्छू के दंश से बाल्यावस्था में रोगी की मृत्यु हो सकती है । दर्शित स्थान से प्रारम्भ होकर ऊर्ध्वदिशा की ओर पीड़ा का प्रसार हो जाता है । चमन, आक्षेप ( Convulsions ), तीव्र ज्वर, प्रस्वेद ( Sweating ), उद्वेष्टन ( Oramps ) तथा चेतनानाश ( Unconsious • ness ) आदि लक्षण होते हैं । स्थानिक चिकित्सा - दर्शित | स्थान को काटकर यदि उनका कोई भाग शरीर में रह गया हो तब उसको निकाल देना चाहिए | दशित स्थान पर लाइकर एमोनिया फोर्ट ( Lig Ammon fortis ), की एक बूँद लगाने से पीडा कम हो जाती है । तथा दशित स्थान को पोटाशियम परमैगनेट के घोल से धोना चाहिए । इनके अतिरिक्त सद्यः लाभप्रद कई प्रकार के इडा स्वतन्त्र नाडी-मण्डल की क्रिया को पराभूत करने वाले ( Sympathetic Inhibitor ) योगों का व्यवहार करना चाहिए । चूँकि वृश्चिक चिप अम्ल प्रतिक्रिया ( Acid reaction ) का होता है, अत. चारों या क्षार - प्रतिक्रिया वाले द्रव्यों का प्रयोग शीघ्रता से उसका शामक हो जाता है । इसके अतिरिक्त सज्ञाहर द्रव्यों के उपयोग से भी सद्यः लाभ होता है । संज्ञाहर द्वयों के प्रयोग: - नोवोकेन ( Novocaine ) २ % का २ सी ० सी ० घोल या सोडीबाई का ( Sodi bi aarb ) के २ % घोल की सी ० सी ० की मात्रा सूचिकाभरण द्वारा दंशित स्थान के चारों ओर प्रवेश ( Infiltration ) करने से पीड़ा का शमन होती है 1 । क्योंकि इस क्रिया से वहाँ की सावेदनिक नाडियाँ संज्ञाहीन हो जाती हैं, अतः वेदना का अनुभव रोगी को नहीं होता । परन्तु यह लाभ भएप काल तक ही रहता है । आधे घण्टे के बाद कभी - कभी पुनः वेदना शुरू हो जाती है । लसिका ( Serum ) चिकित्सा विशिष्ट लसिका की ५ सी ० सी ० पेशीमार्ग ( Intra museu • lar ) से सूचिकाभरण करना चाहिए । तारपीन का तेल, स्प्रिट, टिंचर आयोडीन व सर्पप तैल के मिश्रण का अभ्य भी लाभप्रद होता है तथा क्लोरोफार्म ( Chloroform ) के द्वारा वृश्चिक विद्ध रोगी को आंशिक संज्ञाहरण ( Partial Anaes thesia ) करना चाहिए । इससे रोगी तत्काल चड्गा हो जाता है, उसका रोना - धोना जाता रहता है । अन्य चिकित्सा - तिर्यक् ( Turyag ), लेक्सिन ( Lexin ) आदि
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श्रध्यायः ८ ] कल्पस्थानम् का प्रयोग करने से भी लाभ होता है तथा निपात ( Collapse ) आदि की भी उपयुक्त चिकित्सा करनी चाहिए ॥ अर्वाचीन काल में एक सिद्ध प्रयोग पोटाशियम परमैंगनेट । और टार्टरिक या साइट्रिक एसिड ( Citric Acid ) का है । इन दोनों के चूणों को अलग - अलग रखना चाहिए । बिच्छू के दंश स्थान पर पहले पोटाशियम परमैंगनेट, का थोडा चूर्ण रखे बाद में उसी के ऊपर साइट्रिक " एसिड का चूर्ण छोडे तथा बाद में उसके ऊपर पानी की एक या दो बूँदें डाले । ऐसा करने से वहाँ पर एक फुदकनं तथा उभार बनेगी एवं बिच्छू का विष गायब हो जायगा । इसी प्रकार दंश स्थान पर पोटाश के कुछ कण रखकर नीबू के रस का एक या दो बूँद टपकाने से भी यही क्रिया होती है और वृश्चिक दंश में सद्य लाभ होता है किन्तु यदि दूंशस्थान
का ठीक पता न रहे तब यह योग उतना लाभकर नहीं होता ।
मातुलुङ्गानुगोमूत्रपिष्टं च सुरसाग्रजम् ॥ ६८ ॥
लेपे, स्वेदे सुखोष्णं च गोमयं हितमिष्यते ।
पाने क्षौद्रयुतं सर्पिः क्षीरं वा बहुशर्करम् ॥ ६६ ॥
तुलसी के पत्तों को बिजौरा नीबू के रस तथा गोमूत्र में पीसकर लेप करे । स्वेदन के लिए सुखे गोवर से सुहाता हुआ गरम सेक देवे | पीने के लिए घी को मधु के साथ या प्रचुर मात्रा में शर्करा मिश्रित दूध दे ॥ ६८-६९ ॥
दंशं मन्दविपाणां तु चक्रतैलेन सेचयेत् ।
विदारीगणसिद्वेन सुखोष्णेनाथवा पुनः ॥७० ॥ ।
कुर्याच्चोत्कारिकास्वेदं विपन्नैरुपनाहयेत् 1 गुडोदकं वा सुहिमं चातुर्जातकसंयुतम् ॥७ ॥ ।
पानमस्मै प्रदातव्यं क्षीरं वा खगुडं हिमम् ।
शिखिकुक्कुटवर्हाणि सैन्धवं तैलसर्पिपी ॥७२ ॥
धूमो हन्ति प्रयुक्तस्तु शीघ्रं वृश्चिकजं विषम् ।
कुसुम्भपुष्पं रजनी निशा वा कोद्रवं तृणम् ॥७३ ॥
एभिर्धृताक्तैर्धूपस्तु पायुदेशे प्रयोजितः नाशयेदाशु कीटोत्थं वृश्चिकस्य च यद्विषम् ॥७४ ॥
मन्दविष वृश्चिक - दश को चिकित्सा - मन्द विष वाले बिच्छुओं में कोल्हू के ताजे तैल से परिपेक करे अथवा विदारीगण से सिद्ध तैल से सुहाता हुआ गरम सेक करे । शिरीपादि विपहर द्रव्यों से यनाई उत्कारिका से स्वेदन करे । विपन्न दृष्यों से उपनाह बाँधे । दालचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर से मिले गुड के शर्वत को बहुत ठण्डा करके पीने को दे अथवा गुढवाले दूध को ठण्डा करके पीने के लिए देना चाहिए । मोर, मुर्गों के पंख, सेंधानमक, तेल, घी इनका धुँआ ( धूम ) बिच्छू के विष को शीघ्र नष्ट करता है । फूदी अथवा हल्दी और कोद्रव तृण ( कोदों घास ), इनको घी में मिलाकर गुदा प्रदेश पर किया गया धूम कीटों के तथा विच्छू के विप को शीघ्र ही नष्ट कर डालता है ॥ ७०-७४ ॥
लुताविषं घोरतम दुर्विज्ञेयतमं च तत् ।
दुश्चिकित्स्यतमं चापि भिपग्भिर्मन्दबुद्धिभिः ॥ ७५ ॥
लूता विष को घोरतरता का कथन - मकडी का विप अति भयानक तथा कठिनाई से जाना जाता है तथा मन्द बुद्धि वाले वैद्यों द्वारा उसकी वडी कठिनाई से चिकित्सा की जा सकती है ॥ ७५ ॥
सर्विषं निर्विषं चैतदित्येवं परिशङ्किते विषन्नमेव कर्तव्यमविरोधि यदौपधम् ॥ ७६ ॥
अगदानां हि संयोगो विपजु॑ष्टस्य युज्यते ।
निर्विषे मानवे युक्तोऽपदः संपद्यतेऽसुखम् ॥ ७ ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन ज्ञातव्यो विपनिश्चयः ।
अंज्ञात्वा विषसद्भावं भिपग्व्यापादयेन्नरम् ॥७८ ॥
अगद प्रयोग के लिए विष के निश्चय ज्ञान की आवश्यकता -| यह विषजुष्ट है अथवा निर्विप है, यह शङ्का जब मन में उठे तो उसमे विपनाशक एवं रस आदि धातुओं का । विरोध न करनेवाली ओपधि का प्रयोग करना चाहिए । पिष्ट व्यक्ति में ही अगदों का प्रयोग उत्तम है | विपरहित मनुष्यों में अगदों के प्रयोग से कष्ट होने लगता है, अतः पूर्णरूपेण सभी यत्र व प्रयत्नादि से जब चिप का प्रयोग हुआ है तथा यह प्राणी विषजुष्ट है यह निश्चय हो जावे तथ ही अगदादि का प्रयोग करना चाहिए । विप की उपस्थिति । को न समझता हुआ वैद्य उस विषजुष्ट मनुष्य को निर्विष जानकर चिकित्सा न कर मार देता है ॥ ७६-७८ ॥
प्रोद्भिद्यमानस्तु यथाङ्कुरेण न व्यक्तजातिः प्रविभाति वृक्षः ।
। तद्वदुरालक्ष्यतमं हि तासां विपं शरीरे प्रविकीर्णमात्रम् ॥
लता विष को दुर्विज्ञेयता - उद्भिद्यमान ( फुटते हुए ) | अंकुर से जिस प्रकार वृक्ष, किस जाति का होगा, का पता नहीं चलता, इसी प्रकार मकड़ी का विप शरीर में थोडी | मात्रा में फैला हुआ भी बढ़ी कठिनाई से ही जाना जा सकता है ॥ ७ ९ ॥
। ईषत्सकण्डु प्रचलं सकोठमव्यक्तवर्णं प्रथमेऽहनि स्यात् ।
अन्तेषु शूनं परिनिम्नमध्यं प्रव्यक्तरूपं च दिने द्वितीये ॥
त्र्यहेण तद्दर्शयतीहरूपं
विपं चतुर्थेऽहनि कोपमेति ।
अतोऽधिकेऽह्नि प्रकरोति जन्तो-पिप्रकोपप्रभवान् विकारान् ॥ ८१ ॥
पष्ठे दिने विप्रसृतं तु सर्वान् मर्म प्रदेशान् भृशमावृणोति ।
तत् सप्तमेऽत्यर्थपरीतगात्रं व्यापादयेन्मर्त्यमतिप्रवृद्धम् ॥
लता विषका ७ दिनों में पृथक् - पृथक् लक्षण - मकडी का विष प्रथम दिन अल्प कण्डू वाला, प्रचल ( व्यापक, फैलने वाला ), कोठयुक्त एव अव्यक्त वर्ण ( अस्पष्ट रंग ) का होता है । दूसरे दिन यह किनारों पर सुजा तथा बीच में ( मध्यभाग में ) दबा हुआ तथा स्पष्ट लक्षणों वाला हो जाता है । तीसरे दिन और भी स्पष्ट हो जाता है । चौथे दिन यह विष प्रकुपित होता है और इसके बाद के दिन से विपप्रकोपजन्य रोगों को मनुष्य में उत्पन्न करता है । छठे दिन यह विप सम्पूर्ण देह में फैलकर सभी मर्म प्रदेशों । को विशेष रूप से आवृत कर लेता है । फिर सातवें दिन
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७२ सुश्रुतसंहिता आदंशे पिडका ताम्रा कपिलायाः स्थिरा भवेत् ।. शिरसो गौरवं दाहंस्तिमिरं भ्रम एव च ॥ १०५ ॥
} तत्र पद्मककुष्ठैलाकरञ्जककुभत्वच ' स्थिरार्कपर्ण्यपामार्गदूर्वान्ब्राह्मयो ', विपापहाः ॥ १०६ ॥ ।
कपिला लता दष्ट के लक्षण और चिकित्सा - कपिला लुना । के दंश में ताम्र वर्णं की एवं स्थिर पिडिका होती है । शिर में भारीपन, दाह, तिमिर और भ्रम होता है । इसमें पद्माख, कुष्ट, इलायची, करक्ष, अर्जुन की छाल, शालपणीं, अर्कपर्णी, अपामार्ग, दूर्वा और ब्राह्मी ये विपन्न द्रव्य लाभप्रद होते हैं ॥ १०५ - १०६ || } } 1 1
आदशे पीतिकायास्तु पिंडका पीतिका स्थिरा ।
भवेच्छर्दिर्ज्वरः शूलं मूर्ध्नि रक्ते तथाऽक्षिणी ॥१०७ ॥
कुटजोशीरतुङ्ग, पद्मकवञ्जुलाः...! शिरीपकिणिहीशेलुकदम्बककुभत्वचः - 1 1180511 पीतिका दष्ट के लक्षण और चिकित्सा - पीतिका के काटने पर पीले रंग की पिढिका होती है जो स्वभाव में स्थिर प्रकार की होती है तथा इससे वमन, ज्वर, शिर - शूला तथा नेत्रों में लाली होती है । इसमें कुटज, खस, नागकेसर, पद्माख, जल वेस, शिरीप, अपामार्ग, लसोढ़ा, कदम्ब, 1 अर्जुन -स्वक् का प्रयोग उत्तम तथा लाभप्रद होता है ॥ १०७ - १०८ ॥ ' रक्तमण्डनिभे दशैं ' पिडकाः सर्पपा T इव " जायन्ते तालुशोषश्च दाहश्चाविपादिते ॥१०६ ॥
तत्र प्रियही कुठला मजवञ्जुला: 1 FE-अगदः शतपुष्पा च 1 सपिप्पलवटाङ्कुराः ॥११० ॥
आलविष - दष्ट के लक्षण और चिकित्सा - भालविप लता के दश में पिढिका रक्तवर्ण की ( लाल चकत्ते जैसी ) तथा सर्प के समान आकार की होती है तथा इसमें तालुशोष दाह होता है । इसमें प्रियगु, वेर, कूठ, उशीर ( खस ), जलवेतस, सौंफ, पिप्पली एवं वट ( वरंगद ) के कोमल पत्तों से बनाया हुआ अगद प्रयुक्त करे । १० ९ -११० ॥ दे
पूतिर्मूत्रविपादशो विसर्पी कृष्णशोणितः ।
कासश्वासवमीमूर्च्छाज्वरदाहसमन्वितः ॥१११ ॥
मनःशिलाल मधुककुष्ठ चन्दनपद्मकैः ' मधुमिश्रै ' सलामज्जैरगदस्तत्र · कीर्तितः ॥११३ ॥
+ मुत्रविषादष्ट के लक्षण और चिकित्सा - मूत्रचिप वाली लुता का दंश कोथयुक्त हो फैलता है तथा उस स्थान पर का रक्त काले वर्ण का हो जाता है एव कास, श्वास,, वमन, मूर्च्छा, ज्वर एव दाह आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं । इसमें मैनसिल, हरताल मुलहठी, कूठ, चन्दन, पद्माख व खस को मधु के साथ मिलाकर सेवन करावे ॥ १११–११२ ॥ आपाण्डुपिढको दशो दाहक्लेदसमन्वितः । T रक्ताया रक्तपर्यन्तो विज्ञेयो रक्तसंयुतः ॥११३ ॥
कार्यस्तत्रागद्स्तोय चन्दनोशीर पद्मकैः तथैवार्जुनशेलुभ्यां त्वग्मिराम्नातकस्य च ॥ ११४॥
" ' | रक्तादष्ट के लक्षण और चिकित्सा - रचना का दंश चारों ओर पाण्डुवर्ण को पिढिकाओं से युक्त, दाहयुक्त, क्लेदयुक्त, किनारों पर लाल तथा रक्तयुक्त होता है । इसमें चन्दन, उशीर ( खस ), पद्माख से निर्मित किए गए अगद का प्रयोग करे तथा अर्जुन, लसोड़ा ( श्लेष्मातक ), तथा आनातक ( आमडा ) की छाल को पानी में घिस कर लेप करे ॥ ११३ - ११४ ॥
३. पिच्छिलं कसनादशाद्रुधिरं शीतल स्रवेत् ।
कासश्वासौ च तत्रोक्तं रक्तलूताचिकित्सितम् ॥११५ ॥
,: कसनादष्ट के लक्षण और चिकित्सा - कसना लूता के दंश में पिच्छिल ( चिपचिपा ) तथा शीतल रक्त की प्रवृत्ति होती है तथा इसमें कास, श्वास आदि लक्षण भी उत्पन्न होते हैं अतः इसके दश में रक्तालुता के प्रसग में वर्णित चिकित्सा का प्रयोग करे ॥ ११५ ॥
पुरीपगन्धिरल्पासृक् कृष्णाया दृश एव तु ।
ज्वरमूच्छवमी दाहकासश्वाससमन्त्रितः ॥११६ ॥
तिला सर्पाक्षीगन्धनाकुलिचन्दनैः महासुगन्धिसहितैः प्रत्याख्यायागदः स्मृतः ॥११७ ॥
, कृष्णाष्टके लक्षण और चिकित्सा - कृष्णा लता का दंश मल की गन्ध वाला, अल्परक्तान्वित, उवर, मूर्च्छा, वमन, दाह, कास व श्वास आदि लक्षणों से युक्त होता है । इसमें इलायची, तगर, सर्पाक्षी, राना, चन्दन से निर्मित योग को महासुगन्धि अगद के साथ असाध्य कह कर प्रयुक्त करे ॥ ११६-११७ ॥ >
i द दा विकायाः स्रावोऽत्यर्थं ज्वरस्तथा ।
" चोपकण्डूरोमहर्षा दाहविस्फोटसंयुतः ॥ ११८ ॥
.. कृष्णाप्रशमनं चात्र प्रत्याख्याय प्रयोजयेत् |.. सारिवोशीरयष्टयाह्न चन्दनोत्पलपद्मकम् ॥११६ ॥
" " अग्निवक्रादष्ट के लक्षण और चिकित्सा - अग्निवत्रा लुता के देश में दाह ' अतिशय स्राव, ज्वर, चोष, कण्डू, रोमाञ्ज, दाह, विस्फोट ( छाले ) होते हैं । इसको भी असाध्य कहकर ही कृष्णां लुता के विप के प्रसग में कही गई चिकित्सा का प्रयोग करे तथा सारिवा, खस, मुलहठी, चन्दन, कमल, पद्माख का सेवन करावे ॥ ११८-११९ ॥
सर्वासामेव युञ्जीत विपे श्लेष्मातकत्वचम् ।
भिषेक सर्व प्रकारेण तथा चाक्षीवपिप्पलम् ॥ १२० ॥
सब लूताओं को सामान्य चिकित्सा - चिकित्सक सब लूताओं के विप में लसूड़े की छाल का पान, लेप आदि में सब प्रकार से प्रयोग करे । इसी प्रकार अक्षीव पिप्पली का प्रयोग करे ॥ विमर्श: - आचार्य, डल्हण ने उपर्युक्त श्लोक की व्याख्या करते हुए कहा है कि, ' अक्षीवपिप्पलमिति । अक्षीवान्महानिम्बा जातः पिप्पल अक्षवपिप्पल, अन्ये शोभाञ्जनाज्जात इति मन्यते ॥ अन्यत्राप्युक्तम् - अक्षीवाज्जातस्य पिप्पलस्य मणि सर्वविपापहः । शेल-त्वचो वेति । आल्म्बायनोऽप्यत्राह - ' लताविषेषु सर्वेषु पानस्या -| भ्यञ्जनादिना । प्रयोज्य. पिप्पलोक्षीवाज्जात शेलुत्वचोऽथवा ' इति ॥ कहने का तात्पर्य यह है कि - अतीव पिप्पली से यहाँ शोभाजन की पिप्पली अथवा महानिम्ब पर उत्पन्न होने