श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 81–90
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 81–90
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२६ सुश्रुतसहिता | उन्हें ' स्कोप ' कहते हैं जैसे Recto Boope, Cysto Scope, Auro Scope, आचूषण क्रिया में दूषित रक्त निकालने को श्रद्ध, अला तथा दूषित स्त्रीदुग्ध को निकालने के लिये Breast pump, उरस्तोय के द्रव को निकालने के लिये Potains Aspirator तथा फोडी हुई पत्थरी के कणों को निकालने के लिये Eva castor प्रयुक्त होता है । आजकल अलाबू तथा यन्त्रों के दूषित रक्त प्यादि के निकालने का कार्य Chpp ing glasses से किया जाता है । चूपणकार्य के लिये वाग्भट ने बटीयन्त्र भी माना है ( तद्वद घटी हिता गुल्मनिलयोनमने च सा ) लोक में इसे फूलडे लगाना कहते हैं । इस घटी में दीपक जला । कर या सन के गुच्छ जलाकर पेट आंधी कर देते हैं जिससे धूपणकार्य होता है । शस्त्रक्रिया के नौकर्य में Probe director, । Hernia director, Lithotomy director, और Fistula director प्रसिद्ध नाडीयन्त्र है । तत्र भगन्दरार्शो व्रणवन्त्युत्तरवस्तिमृत्रवृद्धिकोट
रघुमनिरुद्धप्रकशसन्निरुद्धगुद्यन्त्राण्यलादृशृङ्गयन्त्राणि ।
चोपरिष्टाद्वच्यामः ॥ १४ ॥
इनमें से भगन्दर नाडीयन्त्र ( Rectal Speculum ), अर्शो-यन्त्र, ब्रणयन्त्र ( Syringe and irrigator ) वस्तियन्त्र | ( Enema ), उत्तरवस्तियन्त्र / Rubber ball vaginal douche ) मूत्रवृद्दियन्त्र तथा दकोदरयन्त्र ( Canala ), धूमयन्त्र ( Inhalers or Respirators ) निल्दप्रकाशयन्त्र ( Prepuce or Urethral dalator ) सन्निरुद्धगुदयन्त्र Rectal dilator or Bongre ), अलावूयन्त्र और यन्त्र इनका विस्तृत वर्णन पृथक करेंगे ॥ १३ ॥
विमर्श: - ढल्हण ने अपनी टीका में एकछिन तथा हिछिन ऐसे भगन्दरयन्त्र तथा अर्शोंयन्त्र के २-२ ढो दो भेद माने है । बस्तियन्त्र के ६ छ, ८ आठ, १० दस और १२ ह्रादश अगुट लम्बे ऐसे ४ भेड, धूम्रयन्त्र के वैरेचनिक, स्नैहिक, प्रायो-गिक ऐसे 3 भेट एवं शेष मूलोत मिलकर कुल २० नाडीयन्त्र माने हैं । हाराणचन्द्र जी ने अपनी टीका में waters at और पुरुष भेद से, बस्तियन्त्र ४, उत्तरवस्तियन्त्र पुरुषों के ० दो, स्त्रियों के २ दो तथा कन्याओं के लिये १ एक ऐसे ५ ] पांच, धूमयन्त्र - प्रायोगिक, स्नैहिक, वैरेचनिक, कासथ्न और प्रणधूपनार्थ ऐसे ५, शेष मूलोक मिला के. नाडीयन्त्रों । के २० भेट किये हैं । वाग्भट ने सुश्रुतोक मूल के १२ चारह are meri के २० बीस नाडीयन्त्रों के सिवाय निम्न ६ नाडीयन्त्र ज्यादा माने हैं । १- कण्टशल्यावलो. किनी नाही ( Throat Speculum ), शल्यनिर्धातिनी अली त्राणक ( Finger guard ) शमीयन्त्र, घाणार्बुदाशयन्त्र ( Nasal Speculum ), योनित्रणेक्षणयन्त्र ( Vaginal speculum ) 1 शलाकायन्त्राणि अपि नानाप्रकाराणि, नानाप्रयो-' जनानि यथायोगपरिणाहदीर्घाणि च । तेषां गण्डूपद-सर्पफणशरपुचडिशमुखे द्वे द्वे, एपणव्यूहनचालनाहर-णार्थमुपदिश्येते । मसूरदलमात्रमुखे द्वे किञ्चिदानताग्रे स्रोतोगवशल्योद्धरणार्थम्; पट् कार्पासकृतोष्णीपाणि प्रमार्जनक्रियासु । त्रीणि दर्याकृतीनि खल्लमुखानि, क्षारौपधप्रणिधानार्थम् | त्रीण्यन्यानि जाम्बवत्रद्नानि, श्री यशवदनानि, पडेवाग्निकर्मन्त्रभिप्रेतानि । नासाऽ-र्बुदहरणार्थमेकं कोलास्थिदलमात्रमुखं खल्लतीक्ष्णोष्टम्!
अञ्जनार्थमेकं कलायपरिमण्डलमुभयतो मुकुलाग्रम् ।
मूत्रमार्गविशोधनार्थमेकं मालतीपुष्पवृन्ताग्रप्रमाणपरि-मण्डलमिति ॥ १५ ॥
कायन्त्रों के भी अनेक भेद हैं । ये अनेक कार्यों में प्रयुक्त होते हैं तथा प्रयोजन के अनुसार मोटाई तथा लम्बाई वाले होते हैं । इनमें गण्डपदमुखी अर्थात् केचुए के समान सुखवाली ( Blunt probe ), सर्पफणमुसी ( Retractors ), शरपुङ्खमुखी और वढिशमुखी ( Hooks ) ये २-२ दो दो होती हैं । इन का उपयोग क्रमशः पुपण ( Probbing ), व्यूहन ( ऊपर को उठा कर बाहर निकालना ), चालन और आहरण में होता है । मसूर की दाल के समान मुखवाली किञ्चित् नीचे की ओर मुडी हुई २ दो शलाकाएं होती हैं जो स्रोतोगत शल्य के निका-लने में प्रयुक्त होती हैं । शिर पर कार्पास ( रुई ) लिपटी हुई ६ शलाकाएं Swab probes ) होती हैं जिन्हें प्रणादि को पोंछने में प्रयुक्त करते हैं । दव ( कलछी ) के समान आकृति चाली तथा सल्ल ( औषधमर्दन पान ) की तरह कुछ गट्ठेदार ३ तीन शलाकाएं ( Spoons ) होती हैं । इनको व्रणादिक में चार तथा अन्य औषध लगाने के प्रयोग में लेते हैं । इसी तरह अन्य ३ तीन शलाकाएं जामुन फल के समान मुग्न वाली होती हैं एवं ३ तीन अङ्कुश के सह सुखवाली होती हैं इन ६ छुहों शलाकाओं को अग्निकर्म ( Cautery ) में प्रयुक्त करते हैं । नासिका के अर्बुद को निकालने के लिये बेर की गुठली के समान मुखवाली तथा खरल के किनारों की तरह तेज किनारों वाली एक शलाका ( Nasal Carette ) होती है इसी तरह बीच में मटर के समान गोल तथा दोनों किनारों पर मुकुलाकार ( पुष्पकलिका समान पतली ) पतली एक शलाका होती है जिसे नेत्रों में सुरमा आजनों के लिये प्रयुक्त करते है । मालवी पुप्प के वृन्त ( डठल ) के अग्र के समान मोटाई तथा गोलाई या लम्बाई के प्रमाण वाढी एक शलाका ( Urethral sound or Bongne ) होती है जो कि मूत्रमार्ग के शोधनकर्म में प्रयुक्त होती है ॥ १५ ॥
विमर्श: -- वाग्भट ने निम्न ५ शलाकाए अधिक मानी है । गर्मशङ्कु ( Blunt hook and crotchet ) सर्पफणमुखी ( Inthotomy Scoop ) कर्णशोधनयन्त्र ( Ear Scoop ) शर. । पुङ्खमुखयन्त्र ( Tooth elerator ) अर्धेन्दुमुखीशलाका । उपयन्त्राणि - अपि रज्जुवेणिका पट्टचर्मान्तर्वल्कल-| लतावखाष्टीलाऽश्ममुद्गर पाणिपादतलाङ्गुलिजिह्वादन्तनख मुखबालाश्व कटकशाखाष्ठी चनप्रवाहणहर्षायस्कान्तमयानि क्षाराग्निभेषजानि चेति ॥ १६ ॥
V उपयन्त्रों में रस्सी वेणिका, पह, चर्म, अन्तरद्दाल, लता, वस्त्र, अहीलाग्रन्थि के आकार का पत्थर, मुद्गर, पाणितल, पादतल, अड्गुलि, निह्ना, दांत, नख, मुस, वाल, अश्वकटक ( घोड़े की काठी ), वृक्ष की शाखा, ष्ठीवन ( थूकना ), प्रवा-हण, हर्ष, अयस्कान्त, क्षार, अग्नि, और मेषन कहे गये है ॥१६ ॥
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२८ सुश्रुतसहिता |
अष्टमोऽध्यायः ।
अथातः शखावचारणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब यहां से शस्त्रावचारणीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ चिमर्शः --- शस्त्राणामवचारणमुपयोगो यस्मिन्नध्यायेऽस्ति स शस्त्रावचारणीयस्तं तथोक्तम् । विशतिः शस्त्राणि, तद्यथा - मण्डलाग्रकर पत्रवृद्धि पत्रनखशस्त्रमुद्रिकोत्पलपत्रकार्द्धधारसूचीकुशपत्राटीमुख-शरारिमुखान्तर्मुखन्त्रिकूर्चककुठारिकात्रीहिमुखारावेतस -पत्रकच डिशदन्तशङ्केपण्य इति ॥ ३ ॥
शचीस प्रकार के होते हैं । उनकी गणना इस प्रकार है । १ - मण्डलाग्र ( Circular knife or Round head knife, Deoapitating knife ), २- करपत्र ( आरी Bone | BBW ) ३ - वृद्धिपत्र ( प्रयताम Scalpel या Dissecting knife तथा चिता Curved Bistoary ४ - नसशस्त्र ( Nail parer ), ५ - मुद्रिका ( Finger knife ), ६ - उत्पलपत्र ( Ia. ncet ), ७ - अर्धधार ( Single edged knife ), ८- सूची ( Needle - Straight सरल, Ealf Curved वक्रमुख, Fally Ourved धनुर्वक्र ), ९- कुशपत्र ( Paget's knife or Bist oury ), १० - आटीमुख ( चक्रवर्तिमते Hawk ball Soissors, सामान्यत. यह Lancet है ), ११ - शरारीमुस ( Par of Soissors ), १२ - अन्तर्मुस ( Carved Bistoury ), १३ - त्रिकू. र्घक ( Trocar or Brush ), १४ - कुठारिका ( कुठारसदन Axeshaped knife ), १५ - त्रीहिमुस ( Trocar ), १६ - आरा ( Awl आठ ), १७ - वेतसपत्र ( Narrow oladed knife या sonlpel ), १८ - चढ़ि ( Hook ), १६ - दन्तश ( Tooth scater ) २०- एपणी ( Sharp Probe, Probe director ) || ३ || विमर्श: - वाग्भट ने उक्त वीस शखों के अतिरिक्त निम्न शस्त्र अधिक माने हैं । सर्पास्य प्राणकर्णाशछेदनार्थम् । लिङ्गनाश-वैधनी शलाका ( Cataraot Needle ) कूर्च, नं ० ४, खज, नं ० ५ कर्तरी, न ० ६ कर्णवेधनशस्त्र । तत्र मण्डलाप्रकरपन्ने स्यातां छेदने लेखने च । वृद्धिपत्रनखशस्त्रमुद्रिकोत्पलपत्रका र्द्धधाराणि छेदने भेद-ने च । सुचीकुशपत्राटी मुखशरारिमुखान्तर्मुखत्रिकूर्च -कानि विस्रावणे । कुठारिकात्रीहिमुखारावेत सपत्रकाणि व्यधने सूची च । बडिशं दन्तशङ्कुच्चा हरये । एपएये षणे आनुलोम्ये च । सूच्यः सीवने । इत्यष्टविधे कर्मणि उपयोगः शस्त्राणां व्याख्यातः ॥ ४ ॥
उक्त शस्त्रों में मण्डला तथा करपत्र छेदन और लेखन कर्म में वृद्धिपत्र, नखशस्त्र, मुद्रिका, उत्पलपत्र और अर्द्धधार ' बेदन ' और ' भेटन ' कर्म में, सूची, कृशयन्त्र, आटीमुख, शरा-रीमुख, अन्तर्मुख और त्रिकूर्चक ' विस्रावण कर्म ' में, कुठारिका, श्रीहिमुख, आरा, वेत सपत्र और ' सूचीवेधनकर्म ' में, बडिश तथा दन्तशङ्कु ' आहरणकर्म ' में, तथा एपणी और एपण ' अनुलोमन ' और ' सूचीसीवन ' के कर्म में प्रयुक्त होती है । इस तरह उक्त शस्त्रों का आठ प्रकार के शस्त्रकर्म में उपयोग कह दिया गया है ॥ तेपामथ यथायोगं ग्रहणसमासोपायः कर्मसु वक्ष्य-ते - तत्र वृद्धिपत्रं वृन्तफलसाधारणे भागे गृहीयाद्भेदना-न्येवं सर्वाणि । वृद्धिपत्रं मएटलान्च फिञ्चिदुत्तानेन पाणिना लेखने बहुशोऽवचार्यम् । वृन्तामे विस्रावणानि । विशेषेण तु बालवृद्धसुकुमार भीरुनारीणां गजां राजपु-त्राणा त्रिकूर्चकेन विस्रावयेत् । तलप्रच्छादितवृन्त-मनुष्ठप्रदेशिनीभ्यां त्रीहिमुखम् । कुठारिकां वामहस्त-न्यस्तमितर हस्तमध्यमामुल्याऽनुष्टविष्टब्धयाऽभिहन्यात् आराकर पत्रपरयो मूले ere इन शखों को कर्म ( पफड़ने ) की विधि कहते वृन्त और फल के संयोग अन्य सर्वप्रकार के ' भेदक ' वृद्धि पत्र ' तथा ' मण्डलाम ' से पकड़ कर ' लेसन फर्म ' ( प्रयोग ) करना चाहिये ॥ शेषाणि तु यथायोगंगृहीयात् ॥ करते समय हाथ में धारण करने हैं । उनमें से ' वृद्धिपत्र शस्त्र ' को स्थान पर पकड़ना चाहिये एवं शखों ' को भी इसी तरह पकट्टे । शस्त्र को कुछ उत्तान किये हाथ में अनेक बार उसका अवधारण ' विस्रावण कर्म ' करने वाले शस्त्रों को वृन्त के अग्रभाग पर पकड़ने चाहिये । विशेषतया चालक, वृद्ध, कोमलाङ्ग, डरपोक और स्त्रियों के तथा राजा और राज • पुत्रों के विस्रावण कर्म ' त्रिकूर्चक शस्त्र ' से करें । ' धीहीमुख शख ' के घृन्त भाग को हस्ततल में ढांक कर अद्रुष्ठ तथा प्रदेशिनी अगुली से उसे पकडना चाहिये । ' कुठारिका ' को वामहस्त से पकड़ कर दक्षिणहस्त की मध्यमाहुली से अनुष्टा का सहारा लेकर उसके शिर पर ठोकनी चाहिये । ' आरा ', ' करपत्र ' और ' एषणी ' को मूलभाग में पकडें तथा शेष शस्त्रों को शस्त्रकर्म के सुविधानुसार उनका जो स्थान योग्य हो उसे पकड़ना चाहिये ॥ ५ ॥
तेषां नामभिरेवाकृतयः प्रायेण व्याख्याताः ॥ ६ ॥
उन शस्त्रों का स्वरूप प्रायः उनके नाम से ही जान लिया जाता है ॥ ६ ॥
तत्र नखशस्त्रपण्यौ अष्टाङ्गुले, सूच्यो वक्ष्यन्ते, । ( प्रदेशिन्यग्रपर्व प्रदेश प्रमाणा मुद्रिका | दशाङ्गुला शरारि-मुखी सा च कर्त्तरीति कथ्यते ) । शेपाणि तु षडगुलानि ॥ उनमें ' नसशस्त्र ' और ' एपणी ' आठ आठ भगुल के होते हैं । ' सूचियों ' का व्याख्यान आगे किया जायगा । ' मुद्रिका-' प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अङ्गुली के अग्रिम पर्व ( पोरचे ) के बराबर होता है । ' दाराग्मुिखी शस्त्र ' दश अगुल प्रमाण का होता है उसे ' कर्तरी ' ( कॅची ) कहते हैं । शेष अस्त्र छ असुल प्रमाण के होते हैं ॥ ७ ॥
तानि सुग्रहाणि सुलोहानि सुधाराणि सुरूपाणि सुसमाहितमुखाप्राण्यकरालानि चेति शस्त्रसम्पत् ॥ ८ ॥
इन शस्त्रों की मूठें ( Handle ) उत्तम हों जिससे ये सुग्रह हो ( ठोक तरह से पकड़े जा सकें ), ये अच्छे लौह ( कान्तलौह या Steel ) से बने हों, अच्छी धार वाले, दीखने में सुन्दर, इनके मुख का अग्रभाग ठीक बना हो, तथा ये शस्त्र अकराल ( दांते रहित ) होने चाहिये । ये लक्षण ' शस्त्र । सम्पत् ' के नाम से कहे गये हैं ॥ ८ ॥
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अध्यायः ८ ] सूत्रस्थानम् । २६ तत्र वक्रं, कुण्ठं, खण्डं, खरघारम्, अतिस्थूलम्, अतितुच्छम्, अतिदीर्घम्, अतिहस्त्रम्, इत्यष्टौ शत्र
दोषाः । अतो विपरीतगुणमाददीत, अन्यत्र करपन्नात् ।
तद्धि खरधारमस्थिच्छेदनार्थम् ॥ ६ ॥
Supper इनमें वक्र ( टेढे ), धारा में कुण्ठित, प्रयोग के समय या ऐसे ही पडे २ खण्डित होते रहना, खुरदरी धारवाले अधिक मोटे, अधिक पतले, अधिक लम्बे, अधिक छोटे ये आठ ' शस्त्रों दोष ' हैं । इन दोषों से विपरीत गुणवाले शस्त्रों को ग्रहण करें किन्तु ' करपत्र ' खरधार वाला ही अस्थिछेदन में उपयुक्त होता है ॥ ९ ॥
तत्र धारा भेदनानां मासूरी, लेखनानामर्द्धमासूरी, व्यधनानां विस्रावणानाञ्च कैशिकी, छेदनानामर्धकै-शिकीति ॥ १० ॥
इनमें ' भेदनकर्म ' करने वाले शस्त्रों की धारा मसूर के समान, ' लेखनकर्म ' में प्रयुक्त शस्त्रों की धारा अर्धमासूरी, ' यवन ' तथा ' विस्रावण कर्म ' करने वाले शखों की धारा कैशिकी ( केशसदृशतन्वी ) और ' छेदन कर्म ' करने वाले शस्त्रों की धारा अर्धकैशिकी होनी चाहिये ॥ १० ॥
बडिशं दन्तशङ्कुश्चानताम्रे । तीक्ष्णकण्टकप्रथमयव- ।
पत्रमुख्येषणी गण्डूपदाकारमुखी च ॥ ११ ॥
' बिडिश ' और ' दन्तशङ्कु ' ये दोनों शस्त्र अग्रभाग पर मुड़े हुये होते हैं । तीखे कांटे के समान मुखवाली, यव के नवीन । उत्पन्न पत्र के समान मुख वाली और केंचुए के समान आकार तथा मुख वाली ऐसे तीन प्रकार की ' एषणी ' होती है ॥ ११ ॥
विमर्शः-- " बडिशं दन्तशङ्कुश्चानताये तीक्ष्गकण्टकप्रथमयवप-त्रमुखे, एषणी गण्डूपदाकारमुखी । तीच्णकण्टक समान ' वडिश ' तथा प्रथम यवपत्र समान ' दन्तशङ्कु ' और गण्डूपद के आकार की ' एपणी ' ऐसा पाठान्तर है जिसे ' हाराणचन्द्रजी ' ने भी माना है । तेषां पायना त्रिविधा क्षारोदकतैलेषु | तत्र क्षार-पायितं शरशल्यास्थिच्छेदनेषु, उदकपायितं मांसच्छे-दनभेदनपाटनेषु, तैलपायितं सिराव्यघनत्नायुच्छे-दनेषु ॥ १२ ॥
map शस्त्रों को तेज करने के लिये इन्हें गरम कर क्षार, जल और तैल में हुवा हैं । इस क्रिया को ' पायना ' कहते हैं तथा यह चार, उदक और तैल ऐसे तीन प्रकार की होती है । ' क्षारपायित शस्त्र ' शर ( बाण ) के शल्य को निकालने तथा अस्थिच्छेदन में प्रयुक्त होता है । ' उदकपायित ' शस्त्र को मांस के छेदन, भेदन और पाटन कर्म में प्रयुक्त करना चाहिये । ' तैलपायित ' शस्त्रों को सिराओं के वेधन कर्म तथा स्नायुच्छेदन कर्म में प्रयुक्त करें ॥ १२ ॥
विमर्श - पावना ( Tempering ) निवृताना शखाणा तत्क्ष-गाद् द्रवद्रव्येषु निर्वापणं पायना । सा च वश्वद्रवप्रभावात् कर्मवि-शेषोत्कर्षकरो भवति । ( हाराणचन्द्रः ) " पायितं द्रवेण तैक्ष्ण्यकरणे शिरिपनां भाषा " ( इन्दुः ) तेषां निशानार्थ लक्ष्णशिला माषवर्णा, धारासं-स्थापनार्थ शाल्मलीफलकमिति ॥ १३ ॥
शस्त्रों की धारा को तेज करने के लिये उड़द के रंग की ( काली ) खुरदरी शिला होती है । शस्त्रों की धारा को स्थिर रखने के लिये सेमल के वृक्ष का फलक उपयोग में आता है ॥ विमर्श: - कुण्ठित शस्त्र को प्रथम ' निशातनो ' ( Whet stone ) पर घर्षण द्वारा तीच्ण कर पश्चात् ' शाल्मलिफलक ' | ( आजकल ' नाई चर्मपट्ट ' काल में लाते हैं ) पर नाइयों की दृष्टविधि के अनुसार दो तीन बार शस्त्र को घिस लेवें या फेर लेवें इस ' धारासंस्थापना ' को Stropping कहते हैं । वाग्भट नेत्रों को सुरक्षित रखने के लिये एक ' शस्त्रकोश ' ( Surgi • cal instrumeat Case ) का वर्णन किया है । स्यान्नवाङ्गुलवि-स्वार- सुवनो द्वादशाङ्गुल । क्षौम्पत्रोर्णकौशेय दुकूलनृदुचर्मजः ॥ विन्यत्तपाशः सुस्यूत ' सान्तरोर्णास्थशतकः । शलाकापिहितात्यश्च शलकोश. सुसञ्चय ' ॥ भवति चात्र ।
यदा सुनिशितं शत्रं रोमच्छेदि सुसंस्थितम् ।
सुगृहीतं प्रमाणेन तदा कर्मसु योजयेत् ॥ १४ ॥
जब ' निशानी ' पर घिसा हुआ शत्र रोम काटने में समर्थ हो जाय ( जैसा कि नाई अपने पांव या हाथ के वालों पर धार दिये छुरे की बाल काटने के पहिले परीक्षा कर लेते हैं तथा सुसस्थित ( शोभनाकृति ) हो और उसे शास्त्र प्रमाणानुसार हाथ में धारण कर पश्चात् शस्त्रकर्म में प्रयुक्त करे ॥ ५४ ॥
अनुशखाणि तु त्वक्सारस्फटिककाचकुरुविन्दज-लौकाऽग्निक्षारनखगोजीशेफालिकाशाकपत्रकरीरबाला-ङ्गुलय इति ॥ १५ ॥
वांस की छाल, स्फटिक पत्थर, कांच, कुरुविन्द, जॉक, अग्नि, क्षार, नख, गोजी ( गाजवा ), हार हार का पत्ता, शाकपत्र ( सागौन का पत्ता ), करीर, वाल और अड्डलियां ये ' अनुशन ' हैं ॥ १५ ॥
विमर्श: - ' अनुशस्त्र ' --- अशस्त्राण्येव शखकार्य कुर्वन्तीत्यनु-शखाणि, ( इन्दुः ) । अथवा शखसदृशानि -- अनुशखाणि, ( हाराणचन्द्र ' ) ।
शिशूनां शलभीरूणां शस्त्राभावे च योजयेत् ।
त्वक्सारादिचतुर्वर्ग छेद्ये भेद्ये च बुद्धिमान् ॥ १६ ॥
आहार्य्यच्छेद्यभेद्येषु नखं शक्येषु योजयेत् ।
विधिः प्रवक्ष्यते पश्चात् क्षारवह्निजलौकसाम् ॥ १७ ॥
ये स्युर्मुखगता रोगा नेत्रवर्त्मगताञ्च ये ।
गोजीशेफालिकाशाकपत्रैर्विस्रावयेत्तु तान् ॥
एष्येष्वेषण्यलाभे तु बालाङ्गुल्यङ्कुरा हिताः ॥ १८ ॥
' चालकों के लिये तथा शस्त्रों से डरने वाले पुरुषों के लिये और जब संयोगवश पास में कोई शस्त्र न हो तब छेदन नौर भेदन कर्म करने के लिये ' त्वक्सारादि ' ( वंश, स्फटिक, काच, कुरुविन्द ) अनुशख का प्रयोग करें । आाहरण, छेदन भेदन तथा जन्य शक्य ( करने योग्य ) शस्त्रकर्म को करने के लिये नाखूनों का प्रयोग करना चाहिये ।
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36 सुतसहिता, क्षार, अग्नि और जलौकाओं के प्रयोग की विधि आगे के सर्वशास्त्र को पढे हुये शिष्य को भी ' योग्या ' ( प्रत्यक्ष अध्यायों में कहेंगे । जो रोग मुख में उत्पन्न होते हैं उनका तथा कर्माभ्यास ) करवानी चाहिये । स्नेहन, स्वेदन, चमन, नेत्रों के वर्ल्ड में होने वाले रोगों का विस्रावण गोजी, शेफालिका विरेचन, तथा छेदन, भेदन, वेधन आदि शस्त्रकमों में कर्मपथ और शाक के पत्रों से करना चाहिये । एण्यकर्म में ' एपणी ' ( मार्गदर्शन ) का उपदेश करें । अच्छी प्रकार से अनेक शास्त्रों का प्रयोग करें तथा एपणी के अभाव मे बाल, अगुलियों और अङ्कुरों का उपयोग करना चाहिये ॥ १६-१८ ॥ विमर्श - अष्टाङ्गसग्रह में उक्त चतुर्दश अनुशस्त्रों के अतिरिक्त सूर्यकान्त ( Cunverging glass ) स्वग्दाह के लिये, समुद्रफेन ( Cuttle fishbone ) लेखनर्क्स के लिये तथा शुष्कगोमय ये तीन ' अनुशख ' अधिक वर्णित किये गये हैं ।
शस्त्राण्येतानि मतिमान् शुद्धशैक्यायसानि तु ।
कारयेत् करणप्राप्तं कर्मारं कर्मकोविदम् ॥ १६ ॥
बुद्धिमान् वैद्य इन शत्रों को शुद्ध ( अपद्रव्यरहित ) शैक्यायस ( तीच्गायस, फौलाद Steel ) से करण प्राप्त ( उप करणबनाने में चतुर ) कर्मकोविद ( लौहकार शास्त्र के पण्डित ) ऐसे कर्मार ( लुहार ) से बनवावे ॥ १ ९ ॥
प्रयोगज्ञस्य वैद्यस्य सिद्धिर्भवति नित्यशः ।
तस्मात् परिचय कुर्याच्छस्राणां ग्रहणे सदा ॥ २० ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने शस्त्रावचा-रणीयो नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
शस्त्रों अनुशत्र, यन्त्रों अनुयन्त्रों आदि के प्रयोग ( उपयोग ) को भलीभांति जानने वाले वैद्य को सदा शस्त्र-कर्म में या रोगी को ठीक करने में सिद्धि ( सफलता ) प्राप्त होती है इस लिये हमेशा शस्त्रग्रहण करने में परिचय करना चाहिये ॥ २० ॥ ( अभ्यास )
इत्यायुर्वेदतत्त्वसदीपिकाभापायामटमोऽध्यायः । नवमोऽध्यायः । अथातो योग्यासूत्रीयमध्यायं व्याख्यास्यामः चयोवाच भगवान् ॥ १ ॥
धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके आगे ' योग्यासूत्रीय ' अध्याय का वर्णन करेंगे जैसा कि भगवान् धन्वन्तरिने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्शः -- ग्यान्त्रीयन् - योग्या सन्यक्कर्नाभ्यास, योग्याया सूत्र, तद्दिद्यने यस्मिन् स तथा । अन्ये तु योग्याख्यापकं सूत्र योग्या-सूत्रं तदृषिनृत्य कृनोऽध्यायो यॊग्या॒न्त्रीस्त सन्यग्योगाय तत्सदृशकर्माभ्यानो तथेति । कर्तव्यकर्मण तेन योगाय प्रभनीति योग्या योग, " योग कर्मसु कौशलम् ” ग्रन्थन्त नथेनि चक्र ' योग्या ' तत्या को सूत्र योग्यासूत्रं तदधिकृत्य कृती ( Operative Surgery ) कहते डाक्टरी में ओपरेटिह्न सर्जरी body ) पर यह अभ्यास कराया हैं तथा मृतशरीर ( Dead जाता है । अधिगतसर्वशास्त्रार्थमपि को श्रवण किया ( पढा ) हुआ भी शिष्य ( छात्र ) ने यदि ' योग्या ' को न सीखा हो तो वह प्रत्यक्ष माँ ( शस्त्रकर्म, चिकित्साकर्म, भेपजादिनिर्माण कर्म ) में अयोग्य होता है ॥३ ॥
तत्र, पुष्पफलालावूकालिन्दकत्रपुसैर्वारुकर्कारुकप्र-भृतिषु छेद्यविशेपान् दर्शयेत्, उत्कर्तनपरिकर्त्तनानि चोपदिशेत्, दृतियस्तिप्रसेवकप्रभृतिषु उदकपङ्कपूर्णषु भेद्य-योग्याम् | सरोम्णि चर्मण्यातते लेख्यस्य । मृतपशुसि-रासूत्पलनालेषु च वेव्यस्य । घुणोपहतकाष्ट वेणुनल-नालीशुष्का लावूमुखेष्वेष्यस्य । पनसविम्वीबिल्वफलम-नामृतपशुदन्तेष्वाहार्य्यस्य । मधूच्छिष्टोपलिप्ते शाल्म-लीफलके विस्राव्यस्य । सूक्ष्म घनवस्त्रान्तयोर्मृदुचर्मान्त-योच्च सीव्यस्य । पुस्तमयपुरुपाङ्गप्रत्यङ्ग विशेषेषु बन्धनयो-ग्याम् । मृदुचर्ममांसपेशीपूत्पलनालेषु च कर्गसन्धिबन्ध-योग्याम् । मृदुपु मांसखण्डेष्यन्निक्षारयोग्याम् । उदकपूर्ण-घटपार्श्वस्रोतस्यलावृमुखादिषु च नेत्रप्रणिधानत्रस्तित्रग-वस्तिपीडनयोग्यामिति ॥ ४ ॥
' योग्या ' अथवा प्रत्यक्षकर्माभ्यास के लिये पुष्पफल ( कोहडा ), अलाबू ( लौकी, घियाकद्दू ), कालिन्दक | ( तरबूज ), त्रपुस ( खीरा ), एर्वारु ( क्कडी ), कर्कारुक ( वालन ककढी ) आदि पदार्थों पर ' द्देद्याटिकर्म ' की विशेषता का और अभ्यास ' परिकर्तन कराना ' ( अधरछेद चाहिये तथा ' उत्कर्त्तन ' ( ऊर्ध्वच्छेद ) ) भी इन्हीं पर सिखावें । हृति ( मशक ), वस्ति ( Bladder ) और प्रसेवक ( चर्मनिर्मित-भाण्ड ) आदि को जल और कीचड से भर कर इन पर ' भेटन कर्म ' का अभ्यास कराना चाहिये । विस्तृत और चमड़े पर ' लेखनकर्म ' का अभ्यास, मृत पशुओं की बालदार ( Teins ) तथा कमलनालों पर ' वेधनर्क्स ', घुण लगने शिरानों नष्ट हुये काष्ठ, बांस, कमलनाल आदि तथा सूखे से के सुखों में ' एषणकर्म ' पनस हुये तुम्बी ( टिंडोरी, कुनस, तुण्डी ) और बिल्वफल ( कटहल ), विम्बीफल, पशुओं के दांतों पर ' आहरणकर्म ' की मज्जा तथा मृत लिपटे ( लिप्त ) हुये सेमल मोम ( मधूच्छिष्ट ) से पतले तथा मोटे दो वस्त्रों के प्रान्तभागों के फलक पर ' विश्रावणकर्म ' प्रान्त भागों पर ' सीवनकर्म ', वस्त्र अथवा तथा कोमल चमड़े के हुये पुतलों ( Dummy ) के भग मृत्तिका से बनाये ( Bandaging ), मुलायम मांस प्रत्यगों पर ' बन्धनकर्म ' ' क्षारकर्म ' तथा मुलायम चर्म, मांसपेशियों खण्डों पर ' अग्निकर्म ' और पर ' कर्णसन्धिबन्धन ' का अभ्यास और कमलनालों प्रकार जल भरे हुये घड़े कराना चाहिये । इसी के पार्श्वछिद्र में तथा तुम्बी स्नेहादिषु छेद्यादिषु शिष्यं योग्याङ्कारयेत् । और मुख ' व्रणवत्ति आदि में ' नेत्र ' ( वस्तिनेन्त्र ) का प्रवेश, ' वस्तिकर्म '
प्यकृतयोग्य च कर्मपथमुपदिशेत् । सुबहुश्रुतोऽ- कर्म ' की शिक्षा देनी चाहिये ॥ ४ ॥
. कर्मस्त्रयोग्यो भवति ॥ ३ ॥ विमर्श. - पुस्त - पुत्त्रो दार्यादिमय्याः स्याद्याकृनेरुपादान-कारण यद्वस्तु तदुच्यते ( अरुणदत्त ) अन्यश्च - मृदा वा ढाणा
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श्रध्यायः १० ] सूत्रस्थानम् । ३१ वाध्य वस्त्रेणास्य चर्मणा । दोहरत्नैः कृतं वाऽपि पुस्तमित्यमि-॥ पुन को Dammy कहते हैं तथा इस पर प्रसव कालीन गर्भगतियों ' तथा ' मूढगर्भ के शल्यक्सम्यास ' का ज्ञान कराया जाता है । अन्य सर्व कर्माम्यास मृत शरीर पर ही कराते हैं । प्राचीन काल में गव स्पर्ग के निषिद्ध माने जाने से पुस्त का प्रयोग लिखा है । गवं नसृष्टिनं चैव पृष्ट्वा स्नान्न शुद्धते । ( न्तुः ) परन्तु मृत शरीर पर ही सच्ची ' योग्या ' सिन्हाई जा सकती है अतः वैद्यकीय छात्रों को उसी पर Operative Surgery की शिक्षा देवें । भवतत्र्चात्र ।
एवमादिषु मेधावी योग्यार्हेषु यथाविधि ।
द्रव्ये योग्यां कुर्वाणो न प्रमुझति कर्मसु ॥ ५ ॥
afas वुद्धिमान छात्र टक प्रकार के उपकरणों तथा अन्य योग्न वस्तुओं पर ' योग्य ' का अभ्यास करता हुआ अल्लादि कमों को करने में मोहित ( कर्तव्याकर्तव्यशून्य ) नहीं होता है ॥ ५ ॥
तत्मात् कौशलमन्विच्छन् शस्त्रक्षाराग्निकर्मसु ।
यत्त्व चत्रेह सावर्च्य तत्र योग्यां समाचरेत् ॥ ६ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने योग्यासूत्रीयो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस लिये गन्न, चार और अग्निकर्म में कौशल की इच्छा रखता हुआ क्षेत्र जहाँ पर जिस कार्य की समानता या सुगनता देखे उसी पर उस शखादिकर्म का पूर्ण अभ्यास सम्पादन करे ॥ ६ ॥
इत्यायुर्वेदतच्चसंदीपिकाभाषायां योग्यासूत्रीयोनाम नवमोऽय्यायः ।
-दशमोऽध्यायः ।
अथातो विशिखाऽनुप्रवेशनीयमध्यायं व्याख्यास्याम ॥१ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
यहां से ' विशिखानुप्रवेशनीय ' अध्याय का व्यास्थान करेंगे जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ विमर्शः – विशिखाध्य कर्ममार्ग उच्यते, तदुडियानुप्रवेशनं, यदि वा विशिखरथ्या " थ्या प्रतोदी विशिखा ” ( इत्यमर: ) तत्या चिकित्सार्थमनुप्रवेशनमिति चक्र । प्रशस्त वर्गपरप-यथोऽपि विशिष्वाचष्ठोऽत्रातुरवासत्रमात्रे प्रवर्तते गमकत्वादिति छारामचन्द्रः । अविगततन्त्रेणोपासिततन्त्रार्थेन दृष्टकर्मगा कृतयो-येन शात्रं निगदता राजानुज्ञातेन नीचनखरोम्णा शुचिना शुक्रवन्त्रपरिहितेन छत्रवता दण्डहस्तेन सोण-नत्केनानुद्धतवेशेन सुमनसा कल्यागाभिव्याहारेणाकुह-केन बन्धुभूतेन भूतानां मुसहायवता वैद्येन विशि खाऽनुप्रवेष्टव्या ॥ ३ ॥
गुरु के सुख से शास्त्र को पढे हुये तथा तन्त्र ( शास्त्र ) के अर्थ की उपासना ( अभ्यास ) करके तथा शस्त्रादि कर्म को गुरु द्वारा करते हुये देखकर, पश्चात् उसकी ' योग्या ' का | अभ्यास का गान को पढ़ाने की कुशलता होने पर उस शास्त्र में प्रवीणता तथा चिकित्सा, शस्त्रकर्मादि के करने की राजा से अनुमति या प्रमाणपत्र ( Certificate ) प्राप्त कर नस और बालों को कट्टा कर, स्नानादि से पवित्र हो स्वच्छ | श्वेत वन्त्र पहन कर छाता धारण कर, हाथ में यष्टिका लेकर तथा पांवों में जूते पहन कर सौम्य वेशभूषा धारण कर, मन के भावों को उच्च रखते हुये, मङ्गलकारी शब्द बोलते हुये निरकुल वृत्ति से प्राणियों का बन्धु बन कर, उत्तम सहायक ( नृत्य ) साथ वैद्य ' विशिखा ' ( स्वकर्ममार्ग या रोगी के गृह जाने ( के मार्ग ) में प्रवेश करे ॥ ३ ॥
विमर्श: - पूर्वकाल में राजा की आज्ञा के बिना कोई चिकि । त्साकार्य प्रारम्भ नहीं कर सकता था । राजाध्या दिना नैव जनैः कार्य चिकित्मितम् । ( शुक्रनीतिः ) राजा भी वैद्य की परीक्षा कर अनुमति देता था । " ततो राजा परीक्ष्य वैद्य. प्रनारक्षार्थंमनुमन्तव्य म्य धर्म " ( चक्रः ) वर्तमान में यद्यपि ढाक्टरी चिकित्सा के लिये पढाई का पूर्ण प्रबन्ध तथा प्रमाणपत्र प्राप्ति का सुप्रबन्ध है परन्तु आयुर्वेद की चिकित्सा कोई भी अल्पज्ञ करने लग जाता है जिससे शाख बदनाम होता है । इसलिये ग्रन्थात्मक तथा क्रियात्मक उभय प्रकार से अष्टाङ्ग: आयुर्वेद को पढ कर राज्यमान्य संस्थाओं से उत्तीर्ण स्नातकों को ही चिकित्सा का अधिकार होना चाहिये । ततो दूतनिमित्तशकुनमङ्गलानुलोम्येनातुरगृहम— भिगन्य, उपविश्य, आतुरमभिपश्येत् स्पृशेत् पृच्छेच । त्रिभिरेतैर्विज्ञानोपायै रोगाः प्रायशो वैदितव्या इत्येके ।
तत्तु न सम्यक्, षड्विधो हि रोगाणां विज्ञानोपायः ।
तद्यथा - पञ्चभिः श्रोत्रादिभिः प्रश्नेन चेति ॥ ४ ॥
इसके पश्चात् दूत, निमित्त, शकुन और मङ्गल को अनुकूल जान कर रोगी के घर में जा के आसन पर बैठ कर रोगी को देखे, शरीर, नाडी, यकृत्प्लीहादि का स्पर्श करे तथा रोगोत्पत्ति, लक्षण एवं वेदना, निद्रा आना न आना, मल, मूत्र होता है या नही होता है ' आदि प्रश्न करें । कुछ वाचायों का मत है कि इन तीन ( दर्शन, स्पर्शन और प्रश्न ) रोग ज्ञानोपायों द्वारा प्रायः रोगों को पहचाना जाता है किन्तु यह मत ठीक नहीं है । रोगों के जानने के उपाय ( तरीके ) हैं । जैसे श्रोत्र नेत्र नासिका, जिह्वा और त्वचा तथा प्रश्न ॥ १ ॥
तत्र श्रोत्रेन्द्रियविज्ञेया विशेषा रोगेषु व्रणास्रावत्रि-ज्ञानीचादिषु वच्यन्ते - ' तत्र सफेनं रक्तमीरयन्ननिलः. सशब्दो निर्गच्छति ' इत्येवमादयः । स्पर्शनेन्द्रियविज्ञेयाः शीतोष्णऋक्ष्णकर्कशमृदुकठिनत्वादयः स्पर्शविशेषा ज-रशोफादिषु चक्षुरिन्दियविज्ञेयाः शरीरोपचयापचया-युर्लक्षणबलवर्णविकारादयः । रसनेन्द्रियविज्ञेयाः प्रमेहा-| दिषु रसविशेषाः । त्राणेन्द्रियविज्ञेया अरिष्टलिङ्गादिषु | व्रणानामन्त्रगानाञ्च गन्धविशेषाः । प्रश्नेन च विजानी-याद्देशं कालं जातिं सात्म्यमातसमुत्पत्तिं वेदनासमु-
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३२ सुश्रुतसहिता | डायं बलमन्तरग्निं वातमूत्रपुरीषागां प्रवृत्त्यप्रवृत्ती कालप्रकर्षादींश्च विशेषान् । आत्मासदृशेषु विज्ञानाभ्यु-पायेषु तत्स्थानीयैर्जानीयात् ॥ ५ ॥
श्रोत्रेन्द्रिय से जानने योग्य विशेष बातों का वर्णन ब्रगा -स्राव विज्ञानीयादि अध्यायों में किया जायगा जैसा कि वहां कहा है कि फेनयुक्त रक्त में गति पैदा करने वाला वायु निक • ठते समय शब्द पैदा करता है इत्यादि । स्पर्शनेन्द्रिय से गीत, उष्ण, लक्षण, कर्कश, मृदु. कठिन बादि स्पर्श की विशिष्टवाएं ज्वरादिकों में जानी जाती हैं । मैत्रेन्द्रिय के द्वारा शरीर की वृद्धि सौर हास, नायु के लक्षण, बल, वर्ग और विकार नादि का ज्ञान करते हैं । रसनेन्द्रिय के द्वारा प्रमेहादिक रोगों में माधुर्यादि रस विशेषताओं का ज्ञान करते हैं । प्राणेन्द्रिय से रिटलिहावकों ने व्रण तथा वन्य स्थानों से जो गन्ध नाती है उसका ज्ञान करते हैं । प्रश्न के द्वारा देश, काल, जाति, साम्य,, रोग की उत्पत्ति ( कारण ), वेदना का व्यधित्य, वल, अन्तराति ( पाचकानि ), बात, सूत्र और मल का होना तथा न होना और कालप्रकर्ष अर्थात् रोग कब से उत्पन्न हुला है लादि बातें जानी जाती हैं । वैद्य यदि चचुरादि किसी इन्द्रिय से रहित हो तो जानने योग्य रोगी की बातों को उसके समीप रहने वालों से जान कर रोग का ज्ञान कर लेवे ॥ ५ ॥
रोगों का निदान करने के लिये कई प्रकार से आचार्यों ने लिखा है वह प्रायः विचार करने पर एक विध सा ही हो जाता है । चरक ने रोगों की परीक्षा करने के तीन मुख्य उपाय लिखे हैं— “ त्रित्रिषं खलु रोगविशेषविज्ञानं नववि, तथा महोप देश ", प्रत्यक्षन्, अनुमानद्वेति ( च ० वि ००४ ) व्गतोपदेश में निदानपञ्चक्र का समावेश हो जाता है । निदान पूर्वस्यानि रूमग्लुच्यत । सन्त्राप्तिदेति विधानं रोगा-गां पक्ष्ण लक्ष्म् ॥ ( बाग्म्ड ' ) चरन ने नाप्तोपदेश में गुम्फित निदानपञ्चक का निदान स्थान में पद्मविध रोग ज्ञानोपाय कर के निर्देश भी कर दिया है " त्योपलब्धिनिधनपूर्वदिडशेपशम-चन्द्रातित ” च ० नि ० अ ० १ " लाद थार्षान् नियगनुपहत ईत्वादिभिनवैर्नयावदनु च ० नि ०८०१ √ प्रक्षतु खल रोवलं बुनुलुः सर्वैरिन्द्रियैः सर्गनिन्द्रिया दनानुरगवान् परीदेव, उन्नाव । ( वि ० ० ४ ) इस तरह प्रत्यक्ष परीक्षा में नेत्र द्वारा दर्शन परीक्षा, त्वचा ( हस्त ) द्वारा स्पर्शन ( प्लीहानाड़ी और उदर ) परीक्षा, श्रोत्र द्वारा श्रवण ( हृदय फुप्फुसगतविवशन्दश्रवण, अन्द्र पूजन श्रवण ) परीक्षा का समावेश हो जाता है । अतुलनंख्नु त युदयपेक्ष इसमें अति, वल, मन, स्मृति, व्यदि समस्त लवदोष विषयों की परीक्षा हो जाती है । गृढ़- ि er न्याधि की परीक्षा उपाय तथा अनुपान से की जाती है । इस तरह चरक ने लातोपदेश, प्रत्यक्ष और अनुमान इन तीनों परीक्षानों ने सर्व परीक्षा का समावेश कर दिया है । अन्य लावायों ने रोगी परीक्षा और रोग परीक्षा ऐसे परीक्षा! के दो भेद कर दिये हैं । दर्शनस्पर्शनप्रदः परीनेनाय रोगिन् ।! रोग निदान्पूर्वरूग्रूनेष्ऽभाविति ॥ मलमूत्रादि की परीक्षा! का विधपरीक्षा नाम से वर्जन है । रोगान्यरित्य
स्पान्यश्लेोनचैव । नाहीं सूत्रं टं बिहा शब्दगी: ॥।
टाक्रीन से रोग परीक्षा के प्रथम दो उपाय बताये हैं । प्रथम उपाय प्रश्न ( Interrogation ) है तथा दूसरा उपाय परीक्षा । सामान्य और विशेष ऐसे प्रश्न के भी दो भेद कर दिये हैं । सामान्य प्रश्न General Interrogation में रोगी का नाम, नायु, व्यवसाय, विवाहित, अविवाहित, निवासस्थान, देश, रोगारम्भ का इतिहास, वर्तमानरोगावस्था, रोगवृद्धिक्रम, कहां २ क्या २ चिकित्सा कराई, उसका परिणाम, नाहार । सम्बन्धी बातें और पारिवारिक इतिहास नादि मुख्य हैं । विशेष । प्रश्न Special Interrogation में जो बह या संस्थान पीड़ित होता है उसके विपन में प्रश्न किये जाते हैं । परीवार कई तरह की होती है । नं ० १ दर्शनपरीक्षा ( Inspection ) में रोगी को लच्छी तरह से नापादनिर देखना चाहिये । निर्वन्न करके भी देखें । नं ० २ सर्वननदीक्षा ( paipation ) प्राय: एक हाथ से, कमी २ दोनों हाथों से भी की जाती है । इस में हाथ न नविक गरम और न नविक शीत हो । इसके द्वारा उदर, । यकृत, प्लीहा, शोधयुक्त स्थान, हृदय, वक्ष सभी का स्पर्शन करें । नाडी परीक्षा भी इसमें ना जाती है । नं ० ३ टनाटन ( Percussion ) विधि से शरीर के भीतरी ठोस, जलगर्भ तौर रिक्त ( वायुयुक्त ) स्थानों का ज्ञान होता है । अगुलि द्वारा तादन करने पर प्रतिध्वनि मन्द । ( Dall ) हो तो टल स्थान में ठोसपन तथा प्रतिध्वनि | डिमडिम या टोलवत् ( Tympanitic ) हो तो उस स्थान में रिकना या वायुपूर्णता समझनी चाहिये । यह विधि उदर, छाती और हृदय की परीक्षा में उपयोगी है । बामहस्त को मन्यनागुलि को परोच्य स्थान पर अनुत्तान रखकर दक्षिण | हस्त की मध्यमाङ्गुली के सिरे से हथौड़ी की तरह लाघात किया जाता है । एक स्थान पर दो या तीन बार से अधिक वाहन न करें । ताहन अधिक जोर से न किया नाय । नं ० ४ श्रनपरीश ( Auscultation ) एक विशेष नाड़ी-| यन्त्र ( Stethoscope ) द्वारा की जाती है । परीचय स्थान पर प्रत्यक्ष कर्म से भी श्रवण हो सकता है । फुफ्फुस और हृदय के रोगों में यह परीक्षा महत्व की है । न ० ५ टाक्षणिकविद्वान ( Clinical diagnosis ) शास्त्र में | प्रत्येक रोग के लक्षण ( Symptoms ) तथा बाह्य चिह्न ( Phy-| sical Signs ) निश्रित होते हैं । उन्हें ठीक तरह से घटाकर रोग । निर्णय करें । निटिया रच्यादयो वः, नासाद्य नादश्शरूपाप्येव राज्यमा ( नकोश ) । नं ० ६ राप्शनिदान ( Differential diagnosis ) कई रोगों के कुछ लक्षण परस्पर एक से होते हैं मत एव विशिष्ट ! नेदक लक्षणों से नमुक रोग नहीं है किन्तु नमुक है ऐसा निर्णय करना चाहिये । नं ० उपशयान निदान ( Therspentical disgrosis ) नलेरिया में किनाइन, पेल्यूड्रिन, अपोत्रिक नविसार में इमे -टीन सौर फिरह के लिये साल्वर्सन का प्रयोग करने पर लाभ हो जाय तो अचूक निदान हो जाता है । नं ० - प्रायोगिक विषियों ( Isboratory methods ) से बालकृल रोगनिदान करने की अधिक प्रया हो गई है । इसमें
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श्रध्यायः १० ] सूत्रस्थानम् । ३३ रोगी के मल, मूत्र, थूक, रक्त, मस्तिष्क सुपुग्णा, जल, लसीका तथा शरीर के अन्य स्रावों की परीक्षा की जाती है । ( क ) रासायनिक ( Chemical ) विधि से मूत्र परीक्षा होती है । ( ख ) सूक्ष्मदर्शक यन्त्र ( Microscope ) की सहायता से व्रणस्राव, रक्त, मल, मूल, थूक के जीवाणुओं का ज्ञान हो कर रोगनिदान होता है । इसमें कणगणना ( Cytology ) से भी रोग ज्ञान होता है । भिन्न २ रोगों में रक्त के श्वेत या लाल कणों के घटने या बढ़ने से विशिष्ट रोग हो जाते हैं । ( ग ) जीवाणु विषयक ( Bacteriological Tests ), जब सूक्ष्मदर्शक यन्त्र द्वारा जीवाणुओं का दर्शन नहीं होता है तब रक्त, मूत्र, थूक, पूय आदि सन्दिग्ध द्रव्य को वर्धन द्रव्य ( Culture media ) में प्रविष्ट कर जीवाणु वृद्धि ( Culture ) करके उनके संघ की ' सूक्ष्मदर्शक ' से परीक्षा कर जीवाणु का ज्ञान कर लेते है । संशयित पूय रक्तादि द्रव्य का गिनिपिग, मूषक, शशकादि में अन्तःक्षेप ( Inoculation ) करते हैं तथा उनकी मृत्यु होने पर जीवाणु की जांच की जाती है । ( घ ) लसीकाविषयक परीक्षा ( Serological Tests ) रोगी की लसीका लेकर उसकी विविध प्रकार से जांच की जाती है । आन्त्रिक ज्वर में विडाल, फिरन के लिये पाशर मेन, काला अजार के लिये अल्ड हाइड, या यूरियास्टिकामीन परीक्षा करते हैं । ( ड ) संकीर्ण परीक्षाए - जैसे आन्त्रिक ज्वर के लिये अट्रोपीन की परीक्षा, राजयचमा के लिये ट्युजर क्युलीन परीक्षा । ( घ ) क्ष किरण ( X - ray ) का उपयोग मुख्यतथा राजयक्ष्मा में तथा फेक्चर, प्रविष्ट बन्दूक - गोली आदि जानने होता है । -- आजकल डाक्टर तथा वैद्य सभी थर्मामीटर, स्टेथेस्कोप, एक्सरे, मल - मूत्रादि परीक्षाओं द्वारा रोगनिर्णय करने लग गये हैं किन्तु प्राकृतिक साधनों ( पञ्चज्ञानेन्द्रियों ) के सम्यक्प्रयोग का वर्जन एक बडी भारी भूल है । बुद्धिमान तथा अनुभवी चिकित्सक रोग परीक्षा में सदा अपनी इन्द्रियों पर अधिक विश्वास रखते हैं । सहायतार्थ या सशय निवार-णार्थ उक्तस्थानों का कभी २ प्रयोग करते हैं । यहां की जन | संख्या अधिकतर ग्रामीण है । उनके पास औषध के लिये व्यय करना भी मुश्किल है तो फिर अधिक खर्चीली इन Laboratory की परीक्षाओं में वेहद धन कहां से लावेंगे अत-एव भारतीय चिकित्सक विशेषतया निदान के प्राकृतिक साधनों को काम में लावे । सर्वथा सर्वमालोच्य यथासम्भयमर्थ-वित् । अथाध्यवस्येत्तश्वे च कार्ये च तदनन्तरम् ॥ शास्त्रं ज्योति प्रकाशार्थं दर्शन बुद्धिरात्मन । ताभ्या मिपक्सुयुक्ताभ्या चिकित्स-न्नापराध्यति ॥ आप्ततश्चोपदेशेन प्रत्यक्षकरणेन च । अनुमानेन च व्याधीन् सम्यग्विद्याद्विचक्षण * ॥ ( चरक ' ) विमर्शः - ' आत्मासदृशेषु ' की जगह ' आत्मसदृशेषु ' ऐसा । पाठ ‘ ढल्हण ' सम्मत है जिसका अर्थ है कि रोगज्ञान के जो ६ उपाय बताये हैं उनमें से वातादि दोषों का स्वरूप जानने के लिये जो उपाय उपयोगी हों उनकी इन अधिष्ठान द्वारा इन्द्रिय - विज्ञेय विषयों का ज्ञान कर लेना चाहिये । यहां । ५ सु ० सुश्रुत ने प्रमेहादिकों में मूत्रगत मधुरता जानने को रसनेन्द्रिय का प्रयोग लिखा है किन्तु चरक इसे अनुचित मानता है 1 " प्रत्यक्षतस्तु खलु रोगवत्त्व बुभुत्सु सर्वैरिन्द्रियै सर्वानिन्द्रियार्था-ना तुरगतान् परीक्षेत, अन्यत्र रसज्ञानात् " ( वि ० अ ० ४ ) यह ज्ञान चरकमत से मक्षिका, पिपीलिका, यूका, फाक इत्यादि द्वारा करना लिखा है । रसन्तु खल्वातुरशरीरगतमिन्द्रियवैषयिकमप्य-नुमानादवगच्छेत् । न यस्य प्रत्यक्षेण ग्रहणमुपपद्यते, तस्मादातुर-परिप्रश्नेनैवातुरमुखरस विद्यात् । यूकासर्पणेन त्वस्य शरीरवैरस्यं, मक्षिकोपसर्पणेन शरीरमाधुर्य, लोहितपित्तसन्देहे तु घारि लोहितम-भक्षणालोहित पिप्तमित्यनुमातव्यमेवमन्यानप्यातुर शरीरगतान् रसा-ननुमिनीत । ( वि ० अ ० ४ ) अन्यच्च - मनुष्यो हि मनुष्यस्य कथं । रसमवाप्नुयात् । गणनाथा अपि - प्रमेहादिरसशाने रासनी सा न शस्यते । माधुर्यादिपरिज्ञानसाधने बहुधा स्थिते । कोऽधुना तु प्रयु-ओीत निहा मूत्रपरीक्षणे ॥ ( सि ० निदान ) ।
भवति चात्र-मिथ्यादृष्टा विकारा हि दुराख्यातास्तथैव च ।
तथा दुष्परिमृष्टाश्च मोहयेयुश्चिकित्सकम् ॥ ६ ॥
मिथ्यादृष्ट अर्थात् पञ्चज्ञानेन्द्रियों द्वारा जिन की योग्य परीक्षा न हुई हो, तथा रोगी या रोगी के अभिभावक द्वारा जिन के सम्बन्ध में ठीक न बताया गया हो तथा जो उचित रूप से विचारित न किये गये हों ऐसे रोग चिकित्सक को चिकित्सा के समय मोहित ( कर्तव्याकर्तन्यज्ञानशून्य ) कर देते हैं ॥ ६ ॥
एवमभिसमीक्ष्य साध्यान् साधयेत्, याप्यान् याप-येत्, असाध्यान्नोपक्रमेत्, परिसंवत्सरोत्थितश्च । विकारान् प्रायशो वर्जयेत् ॥ ७ ॥
इस तरह रोगी और रोग की परीक्षा ठीक तरह से करके ' साध्य ' रोगों को चिकित्सा द्वारा ठीक करें, ' याप्य ' रोगों को भेषज द्वारा निवारित करे अर्थात् उनसे रोगी को कष्ट न होने दे तथा ' असाध्य ' रोगों की चिकित्सा न करें । जो रोग एक वर्ष के पुराने हों उनकी प्रायः चिकित्सा नहीं करनी चाहिये क्यों कि वे भी करीब २ ' असाध्य ' से होते हैं ॥ ७ ॥
विमर्श - साध्यलक्षणम् - सुखसाध्य सुखोपाय काल्नाल्पेन साध्यते । याप्यलक्षणम् -यापनीय विजानीयात् क्रिया धारयते तुयम् । क्रियाया तु निवृत्ताया सद्य एव विनश्यति । असाध्यलक्षणम् - परोऽसाध्यः क्रिया सर्वां प्रत्याख्येयोऽतिवर्तते । तस्मादुपेच्य एवाऽसौ । ( अ ० स ० ) अर्थविद्यायशोहा निमुपक्रोशमसग्रहम् । प्राप्नुयान्नियत वैद्यो योऽसाध्यं समुपाचरेव ॥ ( चरक ) प्रायशः कुछ रोग वर्ष से पुराने होने के पश्चात् ही साध्य होते हैं अतः ' प्राय ' शब्द दिया है । रक्तगुल्मे पुराणत्व सुखसाध्यस्य लक्षणम् । तत्र साध्या अपि व्याधयः प्रायेणैषां दुश्चिकित्स्यतमा-भवन्ति । तद्यथा - श्रोत्रियनृपतिस्त्रीबालवृद्ध भीरुराज-सेवककित दुर्बलवैद्यविदग्धव्याधिगोपकदरिद्रकृपणक्रो-धनानामनात्मवतामनाथानाञ्चैवं निरूप्य चिकित्सां कुर्वन् धर्मार्थकामयशांसि प्राप्नोति ॥ ८ ॥
उक्त साध्यासाध्य रोगों में निम्न व्यक्तियों की साध्य व्याधियां भी प्रायः दुश्चिकित्स्य होती हैं । जैसे वेदपाठी ( नित्य
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३४ सुश्रुतसहिता | स्नानादि नियम करते रहने से ), राजा ( क्षणिक विचार वाले होने से ), स्त्री ( पारतन्न्य, लजा, वेगावरोध तथा गुहारोगों को प्रगटन करने से ), वाल, वृद्धा, डरपोक, राजभृत्य, द्यूनकार, दुर्बल, वैद्याभिमानी, व्याधि छिपाने वाला, दरिद्री, कंजूस, क्रोध करने वाला, अपनी आत्मा का हित न चाह कर मनमाना ( भक्ष्यादि ) काम करने वाला ( अपथ्यसेवी ) और atre इनके रोग ' साध्य ' भी ' कष्टमाध्य ' हो जाते है ऐसा विचार कर के जो वैद्य रोगियों की चिकित्सा प्रारम्भ करता वह धर्म, अर्थ ( धन ), काम और यश को प्राप्त करता है ॥ ८ ॥
विमर्श -- त्रोत्रियलचणन् – जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेय सस्कारे दिन उच्च । विषया याति विप्रत्व त्रिभि श्रोत्रिय उच्यते ॥ सदा तुरा. निरानक्षेत्रकायैव वैश्या सह पण्यजीविभिः । द्विनो हि वेदाध्ययनत्रनाहिकक्रियादिमिर्देहहित न चेष्टने ॥ नृपोपसेवी नृप चितरक्षणात परानुरोषाद्वहुचिन्तनाद्भयम् ॥ ( च ० सि ० ०१२ )
भवति चात्र-बीमिः सहास्यां संवासं परिहासञ्च वर्जयेत् ।
दत्तञ्च ताभ्यो नादेयमन्नादन्यद्भिषग्वरैः ॥ ६ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने विशिखानुप्र-वेशनीचो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
और भी कहा है कि त्रियों के साथ एक आसन पर अथवा पास में सट कर बैठना, उनके साथ रहना तथा हमी - मजाक करना वर्जित करना चाहिये । वैद्यों के द्वारा अब के अतिरिक्त उनसे दी हुई किसी अन्य वस्तु ( रुपये, वस्त्रादि ) को ग्रहण नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥
चिमर्गः - चरकेोपि न काचित् श्रीडतनामिमादानन्यन् । अननुद्यावर नवना s ध्यक्षेण । इन्यायुर्वेदतज्वलदीपिका भाषायां विशिखानुप्रवेशनीयो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
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~ एकादशोऽध्यायः ।
अथातः चारपाकविविमव्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोत्राच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥ 4
अब यहां से लागे ‘ क्षारपाकविधि ' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने के लिये कहा था ॥ १-२ ॥ सुश्रुत विमर्श: --- वचन पान, विधिवचार, क्षारस्य पाकविधो यत्र त क्षारपाचविधिन् । धार का पाऊ ( तैयार करने की विधि ) और क्षार का उपयोग करने की विधि । शस्त्रानुशत्रेभ्यः क्षारः प्रधानतमः छेद्यभेद्यलेख्य-करणात्, त्रिदोषन्नत्वात्, विशेपक्रियाऽवचारणाश्च || ३ || दात्रों तथा अनुमन्त्रों से चार अधिक प्रधान माना गया है क्यों कि यह छेदन, भेदन और लेखन इन सत्रों को करने से, अनेक लोपधियों द्वारा बना होने से त्रिदोषनाशक । होने से तथा विशेषक्रियाओं में इसका अवचारण ( उपयोग ) होने से श्रेष्ठ है ॥ ३ ॥
विमर्श: - जिस विषमस्थान में शस्त्र द्वारा कार्य न हो सकता हो तथा शस्त्र प्रयोग से भी जहां सिद्धि प्राप्त न हो वहां भी यह लाभ पहुंचाता है अत ' शखानुशस्त्रों से प्रधानतम है । येपु न शखं क्रमते सर्गनेन्द्रियनाशनानि यानि स्यु.। तेषु निपात्य क्षार ( चरक ) । कृादुर्वलभीरूणा नाडी नर्माश्रिता च या । क्षार-| सूत्रेण ता हिन्यान्न तु शस्त्रेण बुद्धिमान् । ( सुश्रुतः ) । विशेषक्रियाव-| चारणात् - त्रिदोषघ्न और सौम्य हो कर भी दहन, पचन और दारण करता है । आग्नेय होकर भी रक्तपित्त और अर्श में हितकारी है, क्षरण या क्षणन होकर भी पेयकार्य में प्रयुक्त होता है । वाग्भटे क्षारयेष्ठता वंशखानुशखाणा क्षार ठो बहूनि यत् । छेद्यमेधादिकमणि कुरुते विपमेष्वपि ॥ दुखाव-। चार्यशस्त्रेषु तेन निद्धिमयात्स च । अतिकृच्छ्रेषु रोगेषु यच्च पानेऽपि युज्यते ॥ तत्र चरणात् क्षणनाद्वा क्षारः ॥ ४ ॥
दूति मांस आदि के क्षरण ( काटने ) से अथवा त्वचा मांसादि का क्षणन ( हिंसन ) करने से चार कहलाता है ॥ ॥ विमर्श: - चरकमते क्षारपरिभाषा -- भित्त्वा भित्त्वाऽऽचयान् क्षारक्षरत्वाद, क्षारयत्यधः । क्षर स्यन्दने, क्षण हिनाया वा तत. नार । नानौषधिसमवायात् त्रिदोषन्नः, शुक्लत्वात् सौम्यः, तस्य सौम्यस्यापि सतो दहनपचनदारणादिशक्तिरवि-रुद्धा । स खल्याग्नेयोपधिगुणभूयिष्ठत्वात् कटुक उष्ण-स्तीक्ष्णः पाचनो विलयनः शोधनो रोपणः शोषणः स्तम्भ-नो लेखनः कृम्यामकफकुष्ठत्रिपमेदसामुपहन्ता पुंस्त्वस्य चातिसेवितः ॥ ५ ॥
यह चार अनेक ओषधियों के संयोग से बनता है अत एव त्रिदोषनाशक है । वर्ण में श्वेत होने से सौम्य है किन्तु सौम्य स्वभाव का होते हुये भी इसकी दहन, पचन, दारण को शक्ति विद्यमान है । क्यों कि यह चार आग्नेय ओषधियों के द्वारा बनने से रस में कटु, वीर्य में उष्ण, गुणों में तीक्ष्ण, चणशोयादि का पाचक, गुल्मादि का विलायक, दुष्टत्रों का शोधक, शुद्धत्रणों का रोपणकर्ता, व्रणों की क्लिन्नता का शोषक, रातिस्राव का स्तम्भक ( Styptic ), कठिनोन्नतमांसादि का लेखक, कृमि, आमदोष, कफ और कुछ, विप और मेदोवृद्धि का नाशक है तथा इसे अधिक मात्रा में सेवन करने से यह पुस्तव ( पौरुष शक्ति ) का नाशक है ॥ ५ ॥
विमर्श: -- " क्षारं नात्युपयुञ्जीत, क्षारः पुंस्त्वघ्नाना श्रेष्ठ "
( चरक ) ।
सद्विविधः - प्रतिसारणीयः, पानीयश्च ॥ ६ ॥
' प्रतिसारणीय ' ( व्रणादिकों पर छिडकना ) और ' पानीय ' ( यकृप्ली हगुल्म रोगों में पीना ) भेद से यह क्षार दो प्रकार का होता है ॥ ६ ॥
विमर्श: -- अष्टाङ्गसंग्रह में ' बाह्यपरिमार्जन ' ( लणस्थान पर लगाना ) और ' अन्तः परिमार्जन ( मुख से सेवन करना ) नाम से चार के २ भेद किये हैं । " स द्विविषो बाह्याभ्यन्तर-परिमार्जनभेदेन ' ( अ ० सं ० ) ।
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अध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् । ३५ तत्र, प्रतिसारणीयः कुछ किटिभददुमण्डलकिलास-भगन्दरार्बुदार्शोदुष्टव्रणनाडी चर्मकीलतिलकालकन्यच्छ-व्यङ्गमशकबाह्यविद्रधिकृमिविषादिपूपदिश्यते । सप्तसु च मुखरोगेषूपजिह्वाऽधिजिहोपकुशदन्त वैदर्भेषु तिसृपु च रोहिणीषु, एतेष्वेवानुशस्त्रप्रणिधानमुक्तम् ॥ ७ ॥
इन में से प्रतिसारणीय क्षार का प्रयोग कुष्ट, किटिभ, ददु-मण्डल ( Ringworm ), किलास ( श्वेत कुष्ठ Leucoderma ), भगन्दर, अर्बुद, अर्श, दुष्टत्रण, नाडी, चर्मकील ( Warts ), तिलकालक, न्यच्छ, व्यङ्ग, मशक, वाह्यविद्रधि, कृमि, विप में होता है तथा उपजिह्वा, अधिजिह्वा, उपकुश, दन्तवैदर्भ और तीन प्रकार की रोहिणी ऐसे सात मुख रोगों में ' हार ' का प्रयोग होता है । इन रोगों में अनुशस्त्र का उपयोग करना कहा है ॥ ७ ॥
पानीयस्तु गरगुल्मोदरा निसगाजीर्णारोचकानाह-शर्कराश्मर्थ्याभ्यन्तरविद्रधिकृमि विषार्शस्सू पयुज्यते ॥ ८ ॥
" पानी क्षार ' का प्रयोग गर ( कृत्रिम ) विष, गुल्म, उदर रोग, अग्निसङ्ग, अजीर्ण, अरोचक, आनाह, शर्करा, अश्मरी, आभ्यन्तरविद्रधि, कृमि, विष और अर्श इन रोगों होता है ॥ ८ ॥
विमर्शः - गर. - नानाप्राण्ड्गभवमलविरुद्ध पधिभस्मनाम् । वि पणाचा वीर्याणा योगो गर इति स्मृत ॥ कृत्रिमं गरसइन्तु क्रियते विविधौषधै.। ( अ ० सं ० ) । गुल्म. -- इसे गेस ट्यूमर ( Gastumor ) कहते हैं । हृद्वस्त्योरन्तरे ग्रन्थि सञ्चारी यदि वाऽचल । चयापचयवान् वृत्त स गुल्म इति कीर्त्तित ॥ अरोचक Anorexia, प्रक्षिप्तन्तु मुखे चान्न जन्तोर्न स्वदते मुहुः । अरोचक स विज्ञेय. । आनाहः- आमं शकृद्वा निचित क्रमेण भूयो विवद्धं विगु-णानिलेन । प्रवर्तमानं न यथास्वमेनं विकारमानादमुदाहरन्ति ॥ अश्मरी— Stone, Calculus, इसी के छोटे २ कण जब मूत्र में आते हैं तो उन्हें शर्करा, सिकता या Grauel कहते हैं । अहितस्तु रक्तपित्तज्वरितपित्तप्रकृतिबालवृद्धदुर्बल-भ्रममदमूर्च्छातिमिरपरीतेभ्योऽन्येभ्यश्चैवंविधेभ्यः || ६ || ~ रक्तपित्त, ज्वरित, पित्तप्रकृति, बालक, वृद्ध, दुर्बल तथा भ्रम, मद, मूर्च्छा और तिमिर रोगों में यह ' पानीयतार ' अहि-तकारी है ॥ ९ ॥
विमर्शः- भ्रम Vertigo ) —चक्रवद्, भ्रमतो गात्रं भूमौ पतति सर्वदा । भ्रमरोग इति ज्ञेयो रज. पित्तानिलात्मक ॥
तश्वेतरक्षारवद् दग्ध्वा परिस्रावयेत् । तस्य विस्त-रोऽन्यत्र ॥ १० ॥
इस ' पानीयदार ' को इतर अर्थात् ' प्रतिसारणीयचार ' की तरह ओषधियों को जलाकर स्रवण कर ( चुवा ) के बना लेना चाहिये । इसके निर्माण की विस्तृत विधि आगे ' गुल्मा ध्याय ' में कही गई है ॥ १० ॥
अथेतरस्त्रिविधो मृदुर्मध्यस्तीक्ष्णश्च । तं चिकीर्षुः । शरदि गिरिसानुजं शुचिरुपोप्य प्रशस्तेऽहनि प्रशस्त देशजातमनुपहतं मध्यमवयसं महान्तमसितमुष्ककम -धिवास्यापरेद्युः पाटयित्वा खण्डशः प्रकल्प्यात्रपाटय निर्वाते देशे निचितिं कृत्वा सुधाशर्कराश्च प्रक्षिप्य तिलनालैरादीपयेत् । अथोपशान्तेऽग्नौ तद्भस्म पृथग् गृह्णीयाद्भस्मशर्कराश्च ॥ ११ ॥
' प्रतिसारणीयतार ' भी तीन तरह का होता है जैसे मृदु, मध्य और तीचण । इस क्षार को बनाने की इच्छा वाला वैद्य शरद ऋतु में उत्तम दिन जानकर पवित्र हो के उपवास कर गिरि ( पर्वत ) के सानु ( शिखरों ) को प्रशस्त भूमि में उत्पन्न हुये शीत, वर्षा, अग्नि, विप, कृमि आदि से जिसका वीर्य या प्रभाव नष्ट न हुआ हो तथा मध्य आयु के ( आपूर्ण रस वीर्य ), बहुत बडे, काले फूल वाले मुष्क ( मोखे ) को मन्त्रादि से प्रथम दिन आमन्त्रित ( अधिवासन ) कर दूसरे दिन उखाड़ कर, कुल्हाड़ी से टुकड़े टुकडे करके वायुरहित स्थान में सञ्चित ( इकट्टा ) करके उसके ऊपर ( कुछ नीचे, बीच में ) चूने के छोटे २ कंकड डाल कर तिलनाल से अग्नि प्रदीप्त कर देनी चाहिये | अग्नि के स्वागशीत होने पर मोखे की भस्म पृथक् किसी पात्र में इकट्ठी कर लेनी चाहिये तथा चूना और शर्करा ( छोटे कंकड ) को अलग ग्रहण कर लें ॥ ११ ॥
विमर्श - मुष्कक कालपुष्पस्तु वर. श्वतादिपुष्पत । अधिवा स्य – सुरापललसुमनोऽक्षतादिभिश्चतुर्दिश वलिं कृत्वा प्रदक्षिणञ्चाभ्य-च्र्यैनमधिवासयेत् । निवसन्तीह भूतानि यान्यस्मिन् कानिचिद् द्रुमे । अपक्रामन्त्वतछेद्य परार्थे श्वो हाय द्रुम । ' सुधाशर्करा ' को ' सुधा-पापाण ' कहते हैं । भस्म शर्करा - भस्मीभूत सुधापाषाण ' कुछ लोग जलते ' मुष्क ' से निर्गत रस से वही भस्म शर्करा समान हो जाती है ऐसा मानते है । मुष्ककाद्दह्यमानात्तु रस प्रच्यवते तु य • । भस्मना सह सयुक्त काठिन्यमुपगच्छति ॥ ता भस्मशर्करामाहु ॰ ॥ थानेनैव विधानेन कुटजपलाशाश्वकर्णपारिभद्र-कबिभीतकारग्वधतिल्वकार्कस्नुह्यपामार्गपाटलानक्तमाल-वृषकदलीचित्रकपूतिकेन्द्रवृक्षास्फोताऽश्वमारक सप्तच्छ-दाग्निमन्थगुञ्जाश्चतस्रश्च कोशातकीः समूलफलपत्रशाखा-दहेत् ॥ १२ ॥
इस उपर्युक्त विधि के ही अनुसार कुडा, पलाश ( ढाक, खांखरा ), अश्वकर्ण ( शाल ), निम्ब, बहेड़ा, अमलतास, तिल्वक ( लोध ), आक, थूहर, आंधी झाडा ( चिरचिटा ), पाटला, नक्तमाल ( करअ ), अडूसा, कदली, चित्रक, पूतिक ( नाटा करअ ), इन्द्रवृक्ष ( कुटजभेद ), शारिवा, कनेर, सप्तपर्ण, भरणी, चरमू तथा बडे फल, छोटे फल, पीले फूल और श्वेत पुष्प ऐसे चार भेदों वाली ‘ कोशातकी ' इन सबकी जढ़, फल, पत्र और शाखाओं को ले के जला कर भस्म कर लेनी चाहिये ॥ १२ ॥
ततः क्षारद्रोणमुदकद्रोणैः पभिरालोड्य मूत्रैर्वा यथोक्तैरेकविंशतिकृत्वः परिस्राव्य, महति कटाहे शनै-os वघट्टयन् विपचेत् । स यदा भवत्यच्छो रक्त. स्तीक्ष्णः पिच्छिलश्च तमादाय महति वस्त्रे परिस्राव्येतरं विभज्य पुनरग्नावधिश्रयेत् । तत एव च क्षारोदकात् । कुडवमध्यर्थं वाऽपनयेत् ॥ १३ ॥
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३६ सुश्रुतसंहिता । इस तरह जलाने के बाद बनी हुई उक्त भस्म रूपी हार को एक द्रोण ( ४ भादक ) लेकर ६ द्रोण पानी में आलोडित करें अर्थात् घोल देवें । यदि चार तेज बनाना हो तो पानी । की जगह गो आदि का सूत्र ले के उसमें घोलकर इक्कीस बार । वस्त्र से उस पानी को छान लेना चाहिये । फिर एक चडी । कढाही में कलट्टी से धीरे २ चलाते हुये उस चार पानी का पाक ( पाचन ) करना चाहिये । पकाते पकाते जब वह निर्मल, लाल रन का, तीचा और पिच्छिल ( चिपचिपा ) दिखाई देने लगे तब कडाही को उतार कर मोटे कपडे से । छान कर बिना ने नृन्य को छोड़ कर छने हुये को पुन. कटाह में भरकर अग्नि पर चढा के अग्नि देने लग जाय किन्तु पकाने के पहले उसी क्षारोदक से एक कुडव अथवा डेढ कुडव क्षारजल निकाल कर अन्य किसी पात्र में रख देना चाहिये ॥ । विमर्श -- आरद्रोण अर्थात् मोखे की राख दो भाग और कुटजानि द्रव्यों की रास एक भाग मिला के फिर इसमें से १ द्रोण राख लेनी चाहिये । मूत्र - गाय का लेवें । उक्के साथ रणे मूत्रे गत्रा सूत्र प्रकीर्तितम् । ' वाग्भर ' ने जल और मूत्र दोनों को समान भाग में मिश्रित कर क्षार पकाने को लिखा है 1 । “ सलिङप्रउसहन्नेग गत्रादिसूत्रपटसहस्रेग चालोच्य परिन्नावयेत् । - ततः कटशर्कराभस्मशर्कराक्षीरपाकशङ्खनाभीरग्नि-वर्णाः कृत्वाऽऽयसे पात्रे तस्मिन्नेव क्षारोद के निपिच्य पिट्टा तेनैव द्विद्रोणेऽष्टपलसम्मितं शङ्खनाभ्यादीनां प्रमाणं प्रतिवाप्य सततमप्रमत्तश्चैनमवघट्टयन् विपचेत् । स यथा नातिसान्द्रो नातिद्रवश्च भवति तथा प्रयतेत । श्रथैनमागतपाकमत्रतार्थ्यानुगुप्रमायसे कुम्भे संवृतमुखे निदध्यादेष मध्यमः । एष एवाप्रतीवापः पक्त्रः संध्यूहिमो मृदुः ॥ १४ ॥
फिर क्टशर्करा ( खडिया मिट्टी या चूने का पदार्थ ), भस्मनक्रा, चीरपाक ( जलशुक्ति ) और शङ्ख को नाभि इन्हें आग में अग्नि के समान लाल सुर्स करके पहले ही लौह-पात्र में रसे हुये क्षारोद में बुझाकर तथा उसी क्षार जल से पीस कर दो द्रोण शेष क्षारोढक के लिये आठ पल शङ्खनाभि आदि का प्रमाण प्रचकर निरन्तर प्रमादरहित हो के कलछी से चलाते ( घोटते ) हुये पकाचे । वह न अधिक गाढा रहे और न अधिक पतला रहे ऐसा प्रयत्न कर पाक करना चाहिये । आसन्नपाकावस्था के लक्षण होने पर उसे चूल्हे. से उतार कर छोटे मुख के लोहे के कुम्भ ( घडे ) में भरकर उसका मुख बन्द कर रस देवें । यह ' मध्यम तार का विधान है । यदि इसी में शङ्खनाभि आदि का नो आठ पल ' प्रतिवाप ' डालने को लिखा है वह न डाल कर पकाया जाय तो उसे ' मृदुन्नार ' क्ड़्ते हैं तथा उनका ' संन्यूहिम ' भी नाम है ॥१४ ॥
प्रतीवापे यथालाभं इन्तीद्रवन्तीचित्रकलाङ्गलकीपू-निगलतालपत्रीचिड सुवर्चिकाकनकक्षीरी हिडवचाऽ-तित्रिपाः समाः लक्ष्णचूर्णाः शुक्तिप्रमाणाः प्रतीवापः । स एव सप्रतीवापः पक्यः पाक्यस्तीच्णः ॥ १५ ॥
सुवचिका ( हुलहुल या स्वर्जितार ), कनकक्षीरी ( सत्यानाशी, पीले फूलों का धतूरा, चोक ), हींग, वचा और अतीस इन्हें समान प्रमाण में लेकर महीन चूर्ण के रूप में करके शुक्तिप्र-माण भर ढाल देवें । इस तरह कटशर्करादि प्रतिवाप के साथ दन्त्यादि इव्यों का भी प्रतिवाप देकर जो पकाया जाता है उसे ' तीधगक्षार ' कहते हैं तथा उसका दूसरा नाम ' पाक्य ' है ॥१५ ॥
विमर्श - झारमेदा - सव्यूहिमस्तथा पाक्यो द्विविधः क्षार इष्यते । पाक्यस्तु सप्रतिवापस्तीन्गोऽन्यस्तु भवेत्पुन । सुधाढिवर्ग पिष्ट्वा तु सित् क्षारोदकै शनै । तेनैव त पुन पिष्ट्वा त्वय'पात्रे निधापयेत् ॥ एप सब्यूहिम क्षारो नृदु । प्रनिवापलक्षणन् - द्रवद्रव्ये द्रव्यान्तरं रक्ष्गपिष्ट दीयते स प्रतिवाप उच्यते । वाग्भटेऽन्येऽपि प्रतिवापपदार्थ लक्षण शकृद्दक्षगिखिगृध्रकङ्ककपोतजन् । चतुष्पात् पक्षिपित्तालननोहालवणानि च ॥ तेपां यथाव्याधिबलमुपयोगः ॥ १६ ॥
मृदु, मध्य और तीक्ष्ण इन तीन प्रकार के तारों में से जैसा रोग तथा रोगी का बल दिखाई दे तदनुसार किसी एक का उपयोग करे ॥ १६ ॥
विमर्श -- झारोपयोगा ' -- बोज्यस्तीक्ष्णोऽनिल्ड लेप्म मेदोजेष्वर्युदा-दिषु । मध्येप्वंव च नव्योऽन्य पित्तात्त्रगुद्रजन्मसु ॥ क्षीणवले! तु क्षारोदकमावपेद् बलकरणार्थम् ॥१७ ॥
जिस चार का बल क्षीण हो गया हो अर्थात् अधिक समय तक पढा रहने से किंवा हीनौपधि के कारण क्षार मृदु बना हो तो उसमें रोगनाशक तीच शक्ति लाने के लिये पुन ' क्षारजल डालकर पाक करना चाहिये ॥ १७ ॥
/ भवतश्चात्र ~~
नैवशतितीच्णो न मृदुः शुकः शुच्णोऽथ पिच्छिलः ।
अविप्यन्दी शिवः शीघ्रः चारो ह्यष्टगुणः स्मृतः ॥ १८ ॥
~ न ज्यादा तीक्ष्ग, न अति मृदु किन्तु रह्न में श्वेत हो, लक्षण ( अकर्कश मुलायम ) हो, पिच्छिल ( चिकना ) हो, अविप्यन्दी ( प्रसरणशील न हो ), शिव ( सौम्य या गुण-कारी ) तथा शीघ्रप्रभावकारी हो, ये ' क्षार ' के आठ गुण होते हैं ॥ ३८ ॥
विमर्श - चरके क्षारगुणा - तीक्ष्णोष्णो लघुरुष्णश्च क्लेडी की विदारण । टाहनो टीपनच्छेत्ता सर्वक्षारोऽग्निसन्निभ ॥
श्रुतिमार्दवश्वैत्यौष्ण्यतैक्ष्ण्यपैच्छिल्यस र्पिताः ।
सान्द्रता पकता हीनद्रव्यता दोप उच्यते ॥ १६ ॥
अधिक मृदु, अधिक श्वेत, अधिक उष्ण, अधिक तीक्ष्ण, अधिक पिच्छिल, अधिक फैलने वाला, अधिक सान्द्र ( गाढा ), पूर्ण न पका हुआ और जिसमें गात्रोक्त ओपधियां पढ़ी हों, ये चार के दोष हैं १ ९ ॥ विमर्श - योग्यतीक्ष्णक्षारज्ञानप्रकार - " यथेरण्टजना मेप द-हति क्षारों वरो वाक्शतात् ॥ तत्र क्षारसाध्यव्याधिव्याधितमुपवेश्य निवातातपे देशेऽसम्वाद्येऽघोपहरणीयोक्तेन विधानेनोपसम्भृतस-यदि उक्त कटशर्करादि द्रव्यों के ' प्रत्तिचाप ' से यथाप्राप्तम्भारं ततोऽस्य तमवकाशं निरीक्ष्यावघृष्यावलिख्य दन्ती, द्रवन्ती, चित्रक, छानसी ( कडिहारी ), पृतिक ( नाटा | प्रच्छयित्वा शलाकया क्षारं प्रतिसारयेत्, दत्त्वा चाकू-फरस ) के प्रवाळ ( पत्ते ), ताडपत्री ( मूसली ), विढलवण, I शतमात्रमुपेक्षेत ॥ २० ॥।