श्रीगणेशाय नमः।

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 71–80

सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 71–80

पृष्ठ 71

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सुश्रुतसंहिता | 8

अम्मिन् शास्त्रे शखकर्मप्राधान्याच्छखकर्मैव तावत् ।

पूर्वमुपदेच्यामम्तत्सम्भारांञ्च ॥ १ ॥

इस ' शल्य शान्त्र ' में शर्म के प्रधान होने से प्रथम अकर्म तथा उसकी सामग्रियों का वर्णन करते हैं ॥ १ ॥

तच्च शत्त्रकर्माऽप्रविधम् । तद्यथा — छेद्यं, भेचं, लेख्य, वैध्यम्, एष्यम्, आहार्यम्, विस्राव्यं, सीव्य-मिति ॥ ५ ॥

वह शर्म आठ प्रकार का होता है । जैसे- छेडन, भेटन, लेखन, वेधन, एषग, आहरण, विस्रावण और सोचन ॥ ७ ॥

विमर्श - मैत्र सुश्रुत ने अष्ट तथा चरक ने पण और बाहरण को यन्त्रकर्म मान कर शर्म ६ ही माने हैं । ' uter ] व्य er ' चैत्र छेडन लेखन तथा । प्रोन्न सीवन चैव षड्विनं शतमं न्द् ' । ( चत्र २५ ) इंडन ( Ex. cision ) — काट कर अलग कर देना, जैसे- अर्ग, चर्म-कील और भगन्दर । ' हेया भगन्दरा ग्रन्थि -ल + ' । मेडन ( Incision ) —- चीरना जैसे- विद्रधि । न्द्या-चित्र सनद ग्रन्थयख्यः 1 लेखन ( Scraping or scanfication ) —बुरचना ' डिस्गवन्नो रोहिण्यः किममुर-निहिन ' । बेघन ' Puncturing ) - नोकदार मन्त्र से छेट करना जैसे- सिरावेध आदि 1 । बेना सिरा बहुविधा मूत्रवृद्धिर्द को-दरम् । एषग ( Probing, exploration ) - शलाका द्वारा नाडीगाडि का पता लगाना । एया नाट्य. नानाश्च व्रणा-उन्नाविपच ये । आहरण ( Extraction - बाहर खीच कर निकालना । ' आहानां शर्क निन्नोऽमणं । शानि सूहगमांच वर्चश्च नित्रनं गुठे । ' विन्नावण ( Drainage ) - रक्त, ल्मीका और पूय को बली आदि से बाहर निकालना । ' नान्या विषय पत्र मयु सर्वजादृते । सीवन ( Sataring, stitching ) टांके लगाना । ' मीना मेदसमुत्थाय मित्रा. लिखिता गढा । सद्योद्रणाश्च ये चैत्र चल्मन्निपानि । वाग्भट ने उत्पाटन, कुट्टन, मन्यन, ग्रहण और दहन ये पांच कर्म अधिक मान कर शस्त्रकर्म के तेरह भेद माने हैं । कुट्टन को Priokang ( सूई द्वारा त्वचा में छेड करना ), मन्थन को Drilling ( मथते हुए छेट करना ), ग्रहण को Catching ( पकड़ना ) तथा दहन को Caatey ( यन्त्रादि से दाह करना ) कहते हैं । आज कल Cantery Enife का प्रयोग अन्त्र कर्म मे बहुत चढ़ गया द्रव्य ( जलयुक्त सक्क्षीरादि ), काय और लेप को ओषधियां, कल्क ( लुगडी ), पखा, ठंडा और गरम पानी, कटाह आदि लोहनिर्मित पात्र ए व स्निग्ध ( अनुरक्त ), स्थिरचित्त और बलवान् नृत्य होने चाहिये ॥ ६ ॥

विमर्श: जान्ववोष्ठ – जम्बूफर सदृशनुसाग्र कृष्णागर चिना बति । यह एक प्रकार का शस्त्र है जिसका अग्निकर्म और चार क्म में प्रयोग किया जाता है । पद — त्रणबन्धनोपयोगी वस्त्र Bandages | शत्रुर्म में बलवान परिचारकों की आवश्यकता रहती है इसलिये यहां बलवान् विशेषण दिया है । कायचिकित्सा में बलवान् की उतनी आवश्यकता नहीं रहती जैसा कि चरक कहा है । परिकर्मिगो लक्षगन्— ' उपचारना डायननुरागश्च भरि । शोच चेति चतुष्कोऽय गुण परिचरं ज्ने ॥ ( च ० सू ० अ ० ९ ) ततः प्रशस्तेषु तिथिकरण मुहूर्त्तनऩत्रेषु दध्यक्षता-न्नपानरत्नैरग्निं विप्रान् भिपजश्चार्चयित्वा कृतवलिमङ्ग-लस्वस्तिवाचनं लघुभक्तान्तं प्राङमुखमातुरमुपवेश्य यन्त्रयित्वा प्रत्यङ्मुखो वैद्यो मर्मसिरास्नायुसन्ध्यस्थि-धमनीः परिहरन् अनुलोमं शस्त्रं निदध्यादा नूयदर्शनात्, सकृद्देवापहरेच्छबमाशु च । महत्स्वपि च पाकेषु । द्र्यङ्कुलान्तरं त्र्यङ्गुलान्तरं वा शस्त्रपदमुक्ता ॥ ७ ॥

फिर श्रेष्ठ तिथि, करण, मुहूर्त्त और नक्षत्र के दिन ढहो, चांवल, अन्न - पान तथा रखादि से अग्नि, ब्राह्मण और वैद्यों का पूजन कर, वलि, मगल, स्वस्तिवाचन किये हुये एव हल्का भोजन किये हुये रोगी को पूर्वाभिमुख बिठाकर तथा उसके हस्त- पाढादि अह्नों को नियन्त्रित कर पश्चिम दिशा में मुख किया हुआ वंद्य ( मर्जन ) मर्म, मिरा, स्नायु, सन्धि, अस्थि | और धमनियों का बचाव करते हुए पूय के सम्पूर्ण निक्लने तक लोगों की दिशा में शव को चलाये । इस तरह ठीक रूप से उचित स्थान पर एक बार ही शस्त्रप्रवेश कर पुनः शीघ्रता से निकाल लेवे । पाकस्थानों के महान् ( अधिक दूर तक फैले | हुये ) होने पर भी ढो अगुल या तीन अतुल तक लम्बा व्रण का घाव करना चाहिये ॥ ७ ॥

विमर्श - भोजन का प्रयोजन - प्राक्शलकर्मणश्चेष्ट भोज्ये-ढातुर भिषक् । न मूर्च्छत्यन्नयोगान्मत्तो शस्त्र न इध्यते । तस्माद-वन्य मोक्ल्यन् । प्राणो ह्याभ्यन्तरो नृणा बाह्यप्रणणगुणान्वित | धार-है । सुश्रुत में भी इस प्रकार का वर्जन है । ' अग्नितप्तेन शयन्यविरोधेन शरीरं पाञ्चमोतिम् ॥ ' भोजनकर्म वर्जन- मूढगनों-दिन्नाद ' । यतोऽन्यतमं कर्म चिकीर्षता वैद्येन पूर्वमेवोप्रकल्प बितत्र्यानि — चन्त्रशन्नचाराग्निशलाका शृङ्ग जलौकालानू जाम्बवौष्टपिचुप्रोतसूत्रपत्रपट्टमधुघृनवसापयस्तैलतर्पण-कपायालेपनकत्कयजनश तोष्गोदककटाहादीनि परि कर्मिणश्च लिग्या थिंग बलवन्तः ॥ ६ ॥

उपर्युक्त अष्टमों में से किसी एक कर्म करने को इच्छा वाले चैत्र को प्रथम हो निम्नलिखित सामग्री तैय्यार कर लेनी चाहिये । यन्त्र, अन्न, चार, अग्नि, शलाका, शृङ्ग, जॉक, ब्लावू, ( तूम्बी ), जाम्बवौष्ट, पित्रु, ( रुई ), प्रोत ( वस्त्र ), सूत्र, पत्ते, पट, मनु, घृत, चरबी, दुग्ध, तैल, सन्तर्पण-दरार्शोमगन्दरनुखरोगेष्वमुच्वन कर्म कुर्वीत । यन्त्रणकर्म — इस वैज्ञानिक युग में अनुसन्धानशील विद्वानों ने सार्वदेहिक संज्ञाहरद्वव्य ( Chloroform ), स्थानिक संज्ञाहर द्वन्यों | ( प्रोकन, नोवोकेन, कोकेन आदि ) का आविष्कार कर यन्त्रण सरीखी आसुरी क्रिया की आवश्यकता नहीं रखी है फिर भी | प्रायः देखा जाता है कि साधारण विधि को खोलने के लिये किसी भी संज्ञाहर द्रव्य का प्रयोग न कर रोगी के हाथ पांवों को सहायक कम्पाउण्डर, नर्स आदि पकड़ लेते हैं अत ' कम । बेसी यन्त्रण करना ही पड़ता है । मर्माणि - मारयनीति, मरणकारित्वाद्वा मर्म, मर्माणि नाम माससिरात्नायुसन्ध्यत्थिसन्निपानास्तेषु स्वभावन एव प्राणान्तिष्ठन्ति । | कुलान्तरं व्यठान्तरं त्रण कुर्यात - विद्वधि यही हो तो दो

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अध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् । १७ अङ्गुल या तीन अङ्गुल की दूरी पर अन्य शखपद या व्रण शस्त्र द्वारा बनाने चाहिये जिससे पूय का पूर्ण रूप से निर्हरण हो जाय । अङ्गुलद्वयमथवाऽङ्गुलत्रयमन्तरीकृत्य पुनरन्यं न कुर्यान्नत्वा-सन्नम् | अरुणदन्त । तन्त्रायतो विशालः समः सुविभक्तो निराश्रय इति रागुणाः ॥ ८ ॥

आयत ( दीर्घ ), विशाल ( विस्तृत = चौडा ), सम ( सीधा ), सुविभक्त अर्थात् तीक्ष्ण शस्त्र से साफ कटा हुआ जिस कारण त्वचा मांसादि का अधिक नाश नहीं हुआ हो तथा निराश्रय ( पूय कोटर रहित ) ये व्रण के गुण हैं ॥ ८ ॥

भवतश्चात्र-यता विशालश्च सुविभक्तो निराश्रयः ।

प्राप्तकालञ्चापि व्रणः कर्मणि शस्यते ॥ ६ ॥

भायत, विशाल, सुविभक्त, निराश्रय तथा उचित समय पर किया गया or f चकित्साकर्म में श्रेष्ठ माना जाता है ॥ ९ ॥

विमर्श -- प्राप्तकालकृत —-शोथ, विद्रधि या फोड़े को आमा-वस्था में चीरने से पूर्ण रूप से दोष नहीं निकलते तथा पके की उपेक्षा करने से भीतर का पूय इधर उधर जाकर नाडी Sinus ) वना देता है अतः योग्य काल में उसे चीर देना चाहिये । यरिछनत्याममज्ञानाद् यश्च पक्कमुपेक्षते । श्वपचाविव मन्तव्य तावनिश्चितिकारिणौ । शौर्यमाशुक्रिया शस्त्रतैक्ष्ण्यमस्वेदवेपथु 1 असम्मोहन वैद्यस्य शस्त्रकर्मणि शस्यते ॥ १० ॥

शूरता, ( उत्साह, निर्भयता ), शस्त्रपातादिक्रिया में शीघ्रता ( लघुहस्तता ), शस्त्र की धार का उचित तीक्ष्ण होना, शस्त्रकर्म करते समय वैद्यसर्जन को पसीना न आना तथा हाथ का न कांपना तथा रोगोल्वणता या बडे शस्त्रकर्म की दशा में या निकलते हुए रक्तादि को देख कर मूच्छित न होना ये शस्त्रचिकित्सक ( Surgeon ) के गुण हैं और ऐसे ही सर्जन शस्त्रकर्म ( Operation ) में प्रशस्त होते हैं ॥ १० ॥

एकेन वा ब्रणेनाऽशुध्यमाने नाऽन्तरा बुद्धयाऽ - ।

वेदयापरान् व्रणान् कुर्यात् ॥ ११ ॥

यदि एक व्रण ( Incision चीरा ) से फोड़े की शुद्धि न हुई हो या पूयादि का पूर्णरूप से निर्गमन न हुआ हो तो वृद्धिपूर्वक विचार कर बीच में या पूर्वत्रण के समीप अन्य व्रण कर देवे ॥ ११ ॥

भवति चात्र-यतो यतो गतिं विद्यादुत्सङ्गो यत्र यत्र च I तत्र तत्र व्रणं कुर्य्याद् यथा दोषो न तिष्ठति ॥१२ ॥

जिस जिस स्थान पर दोष ( पूय ) को गति तथा उभार प्रतीत हो उस उस स्थान पर शस्त्र से व्रण ( चीरे ) करने चाहिये जिस से दोष ( पूय ) भीतर ( मांसादि गम्भीर धातुओं में ) न रह सके ॥ १२ ॥

विमर्श -- दोष शब्द से यहां दोषोत्पन्न पूय का ग्रहण ३ सु ० होता है । ' पूय एव दोपशब्देन उच्यते, कारणे कार्योपचारात् ' | इति डल्हणः । तत्र भ्रूगण्डशङ्खललाटाक्षिपुटौष्ठदन्तवेष्टकताकुक्षि-वङ्ङ्क्षणेपु तिर्यक् छेद उक्तः ॥ १३ ॥

भ्रू, गण्डस्थल ( गाल = कपोल ), शङ्खप्रदेश ( कनपटी ), ललाट, आंखों के पलक, ओष्ठ, दन्तवेष्ट ( मसूडे ), कक्षा ( कांख ), कुक्षि ( उदर ) और वंक्षण ( ऊरुसन्धि ) इन स्थानों में तिरछा छेदन करना चाहिये ॥ १३ ॥

( चन्द्रमण्डलवच्छेदान् पाणिपादेषु कारयेत् । अर्द्धचन्द्राकृतींश्चापि गुदे मेढे च बुद्धिमान् || १४ || ) बुद्धिमान वैद्य हस्त और पाद में चन्द्रमण्डल के समान गोल छेदन करे तथा गुदा और मेटू ( इन्द्रिय ) में अर्धचन्द्रा-कृति छेदन करे ॥ १४ ॥

अन्यथा तु सिरास्नायुच्छेदनम्, अतिमात्रं वेदना, चिराद् व्रणसंरोहो, मांसकन्दी प्रादुर्भावश्चेति ॥ १५ ॥

उपर्युक्त विधि के अनुसार चीरा न लगाने से सिरा और | स्नायु के छेदन की सम्भावना रहती है, पीढ़ा अधिक होती है, चिरकाल ( देरी ) से व्रण भरता है और मांस की गांठ उत्पन्न हो जाती है ॥ १५ ॥

मूढगर्भोदरार्शोऽश्मरीभगन्दर मुखरोगेष्वभुक्तवतः कर्म कुर्वीत ॥ १६ ॥

मूढगर्भ, उदररोग, अर्श, पथरी, भगन्दर और मुखरोगों में रोगी को विना कुछ खिलाये ही शस्त्रकर्म करना चाहिये ॥१६ ॥

विमर्श - आधुनिक शल्यतंत्र ( Surgery ) के अनुसार उदर, मूढगर्भ और मुखरोगों में शस्त्रकर्म के पूर्व भोजन करने से प्रत्यावर्त्तन क्रिया ( Reflex sotion ) द्वारा वमन तथा हिक्का उत्पन्न होकर बाधा उत्पन्न होती है किन्तु अर्श, अश्मरी और भगन्दर में ऐसी सम्भावना कम होने से हल्का तथा दूब-प्राय भोजन कराना ठीक माना है । सुश्रुत में भी आगे चिकि • सास्थान में अर्श और भगन्दर में शस्त्रकर्म के पूर्व आहार देने को कहा है । ' केनाचेद्वाशों भगन्दरावविपक्येते, तदयुक्त, चिकि-त्सिते तयोः शस्त्रकर्मण प्राग् भोजनविधानादेतदर्थानुवादिना वाग्भटेनाप्यपठितत्वाच्च ” इति हाराणचन्द्र ॥ ततः शस्त्रमवचार्य शीताभिरद्भिरातुर माश्वास्य, समन्तात् परिपीड्याङ्गुल्या, व्रणमभिमृद्य ( ज्य ), प्रक्षाल्य कषायेण, प्रोतेनोदकमादाय, तिलकल्कमधुसर्पिः प्रगा-ढामौषधयुक्तां नातिस्निग्धां नातिरूक्षां वत्तिं प्रणि-ध्यात् । ततः कल्केनाच्छाद्य घनां कवलिकां दत्त्वा वस्त्रपट्टेन बध्नीयात् । वेदनारक्षोघ्नैर्धूपैर्धूपयेद् रक्षो-नैश्व मन्त्रै रक्षां कुर्वीत ॥ १७ ॥

तदनन्तर व्रण से शस्त्र को निकाल कर रोगी को शोतल जल से ( मुख - हस्तादि पर सेचन द्वारा ) आश्वासन या शान्ति देकर चारो ओर ( बाहर और अन्दर से ) अड्डलियों द्वारा व्रण को धीरे २ दबाकर ( सद्योव्रणहित अथवा शोधन ) कषाय

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सुश्रुतसंहिता | १८ से व्रण का प्रक्षालन करें । पश्चात् प्रोत ( शुद्ध वस्त्र ) से व्रण के भीतर के शेप कपायजल को पोंछ कर तिल कल्क, शहद, और घृत से लिप्त तथा न अतिस्निग्ध और न अधिक रूक्ष ( मिश्रकाध्यायोक्त अजगधा, अजश्रृंगी आदि सशोधन भोपधि युक्त वर्ति व्रणस्थान में रख कर उसे सद्योव्रणहित औषध ) कल्क से ढक कर तथा उस पर मोटी कवलिका ( गद्दी या स्वच्छ रूई ) रख कर वस्त्रपट्ट से बांध देना चाहिये । पश्चात् वेदनाहर और राक्षस ( जीवाणु ) नाशक द्रव्यों की धूनी ( धूपन ) से उस स्थान को धूपित करे तथा रक्षोघ्नमंत्रों से व्रण की रक्षा करनी चाहिये ॥ १७ ॥

विमर्श - शीतल जल पिलाना भी चाहिये जिससे मूर्च्छा आदि नही होने पाती । व्रणमभिमृद्य -कभी २ व्रण के भीतर अनेक पूयकोटर ( Pas pookets ) होते हैं अतः व्रण के भीतर एक या दो अगुलियां डाल कर धीरे २ मर्दन द्वारा उन्हें तोडना पढ़ता है । शोधनकपाय -- शङ्खिन्यकोठसुमन ' करवीरसुवर्चला । शोधनानि कपायाणि वर्गश्चारग्वधाटिक ॥ ( सू ० अ ० २७ ) । आज कल व्रणशोधन के लिये - ढेरॉल वोरिक एसिड, पोटास परमैंगनेट, मर्करी ( पारद ), एक्रिफ्लेविन आदि के घोल प्रयुक्त होते हैं । वर्ति — इसकी जगह ढाक्टरी में जालीदार कपडे ( Gauze ) को जन्तुघ्न द्रव्य के घोल में भिंगो कर वर्ति बना के रखते हैं अथवा रवर नली ( Drainage Tube ) रखी जाती है । प्राचीन काल में भी कवलिका आदि सभी को उष्णता तथा धूपन द्वारा जन्तुरहित ( Sterile ) कर काम में लेते थे । वाग्भटे-शुचिसूक्ष्मदृढा पट्टा कवल्य सविकेशिका ।, धूपिता मृद्रव श्लक्ष्णा निर्बलीका नये हिता ॥ ततो गुग्गुल्बगुरुसर्जरसवचागौरसर्षपचूर्णैर्लवण-निम्बपत्रविमिश्रैराज्ययुक्तैर्धूपयेत्, आज्यशेषेण चास्य प्राणान् समालभेत ॥ १८ ॥

तदनन्तर गूगल, अगर, राल, वचा, श्वेत सरसो इनके चूर्ण तथा लवण, नीम के पत्ते इनको घृत के साथ मिलाकर धूपन करे । बचे हुये घृत से रोगी के हृदयादि मर्म स्थानों पर ( हल्के हाथ से ) मालिश करे ॥ १८ ॥

उदकुम्भाच्चापो गृहीत्वा प्रोक्षयन् रक्षाकर्म कुर्यात् तद्वक्ष्यामः ॥ १६ ॥

जल के घड़े में से पानी हाथ में लेकर रोगी पर छिड़क

( परिमार्जन ) कर निम्न मन्त्रों से रक्षाकर्म करना चाहिये ।

उसकी विधि आगे कहते हैं ॥ १ ९ ॥

कृत्यानां प्रतिघातार्थं तथा रक्षोभयस्य च ।

रक्षाकर्म करिष्यामि ब्रह्मा तदनुमन्यताम् ॥ २० ॥

नागाः पिशाचा गन्धर्वाः पितरो यक्षराक्षसाः ।

अभिद्रवन्ति ये ये त्वां ब्रह्माद्या नन्तु तान् सदा ॥

पृथिव्यामन्तरीक्षे च ये चरन्ति निशाचराः ।

दिक्षु वास्तुनिवासाच पान्तु त्वां ते नमस्कृताः ॥

पान्तु त्वां मुनयो ब्राह्मथा दिव्या राजर्पयस्तथा ।

पर्वताश्चैव नद्यश्च सर्वाः सर्वे च सागराः ॥ २३ ।

अग्नी रक्षतु ते जिह्वां प्राणान् वायुस्तथैव च ।

सोमो व्यानमपानं ते पर्जन्यः परिरक्षतु ॥ २४ ॥

उदानं विद्युतः पान्तु समान स्तनयित्नवः ।

बलमिन्द्रो बलपतिर्मनुर्मन्ये मतिं तथा ॥ २५ ॥

कामांस्ते पान्तु गन्धर्वाः सत्रमिन्द्रोऽभिरक्षतु ।

प्रज्ञां ते वरुणो राजा समुद्रो नाभिमण्डलम् ॥ २६ ॥

चक्षुः सूर्यो दिशः श्रोत्रे चन्द्रमाः पातु ते मनः ।

नक्षत्राणि सदा रूपं छायां पान्तु निशास्तव ॥ २७ ॥

रेतस्त्वाप्याययन्त्वापो रोमाण्योषधयस्तथा ।

आकाशं खानि ते पातु देहं तव वसुन्धरा ॥। २८ ॥

वैश्वानरः शिरः पातु विष्णुस्तव पराक्रमम् ।

पौरुषं पुरुपश्रेष्ठो ब्रह्माऽऽत्मानं ध्रुवो भ्रुवौ ॥ २६ ॥

एता देहे विशेषेण तव नित्या हि देवताः ।

एतास्त्वां सततं पान्तु दीर्घमायुरवाप्नुहि ॥ ३० ॥

( स्वस्ति ते भगवान् ब्रह्मा स्वस्ति देवाश्च कुर्वताम् । )

स्वस्ति ते चन्द्रसूर्यौ च स्वस्ति नारदपर्वतौ ।

स्वस्त्यग्निश्चैव वायुश्च स्वस्ति देवाः सहेन्द्रगाः ॥ ३१ ॥

पितामहकृता रक्षा स्वस्त्यायुर्वर्धतां तव ।

यस्ते प्रशाम्यन्तु सदा भव गतव्यथः ॥ ३२ ॥

इति स्वाहा | _कृत्याओं तथा राक्षसों के भय को दूर करने के लिये रक्षा-कर्म करुगा । ब्रह्मदेव इस कर्म का अनुमोदन करे | नाग, पिशाच, गन्धर्व, पितर, यक्ष, राक्षस, आदि जो जो तुम्हें पीड़ा पहुचाते हों उन्हें ब्रह्मादिक देवता नष्ट करें । पृथिवी पर, आकाश में और दिशाओं में जो जो राक्षस विचरते हों तथा तुम्हारे घर में जो राक्षसादि रहते हों वे तेरे नमस्कार से प्रसन्न होकर तेरी रक्षा करें | अनेक ब्रह्मर्षि, देवप और राजर्पि, सव पर्वत, नदियां, सातो या चारो समुद्र, करें । अग्नि तेरी जिह्वा की रक्षा करें, वायु प्राणों की, सोम व्यान वायु । की और पर्जन्य ( वृष्टिमान् मेघ ) अपान वायु की रक्षा करें । बिजली उदानवायु की, मेघ समान वायु की, बलपति इन्द्र वल की ओर मनु ग्रीवा की सिराओं तथा बुद्धि की रक्षा करें । गन्धर्व तेरी कामनाओं या मनोरथों की, इन्द्र सच्च ( सतो-गुण या मन ) की, राजा वरुण प्रज्ञा की तथा समुद्र नाभि-मण्डल की रक्षा करें । सूर्य नेत्रों की, दिशाए कर्णों की, चन्द्रमा मन की, नक्षत्र रूप ( सौन्दर्य ) की और रात्रि तेरी छाया की सदा रक्षा करें । जल तेरे वीर्य को वढावे, ओषधियां - रोमपंक्ति की, आकाश शरीरछिद्रों की तथा पृथिवी तेरे देह की रक्षा । करें । वैश्वानर शिर की, विष्णु तेरे पराक्रम की, पुरुषोत्तम तेरे पौरुप ( मेढ़ ) की, ब्रह्मा आत्मा की और ध्रुव दोनों भृकुटियों की रक्षा करें । तेरी देह में नित्य ये उपर्युक्त देवता विशेष करके रहते हैं । ये तेरी निरन्तर रक्षा करें तथा तुझे दीर्घायु प्राप्त हो । भगवान् ब्रह्मा तेरा मंगल करे, सब देवता तेरा मंगल करें, चन्द्रमा और सूर्य दोनों तेरा कल्याण करें, नारद और पर्वत ( ऋषी ) तेरा शुभ करें । अग्नि, वायु तथा । इन्द्र सहित सब देवता तेरा मंगल करें । यह पितामह ( ब्रह्म-

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अध्यायः -५ ] सूत्रस्थानम् । १६ देव ) द्वारा की हुई रक्षा तेरा कल्याण करती हुई आयु को बढ़ावे 1 । तेरी सव ईतियां ( कष्ट ) दूर होकर तू सदा व्यथा

( पीडा ) से रहित हो जा । इन मन्त्रों को पढकर स्वाहा शब्दो-चारण करे ॥ २०-३२ ॥

एतैर्वेदात्मकैर्मन्त्रैः कृत्याव्याधिविनाशनैः ।

मयेवं कृतरक्षस्त्वं दीर्घमायुरवाप्नुहि ॥ ३३ ॥

कृत्या और व्याधि को नष्ट करने वाले इन वेदसम्बन्धी ।

मन्त्रों द्वारा मुझसे रक्षित तू दीर्घायु को प्राप्त हो ॥ ३३ ॥

विमर्श: - कृत्या — कुपितमन्त्रिणोऽभिचारकर्म अनिता राक्षसी कृत्येत्युच्यते । ईति —अतिवृष्टिरनावृष्टिर्मूपका शलभाः सगा । स्वचक्र परचक्रञ्च सप्तैता ईतय स्मृता । ततः कृतरक्षमातुरमागारं प्रवेश्य आचारिकमा दिशेत् ॥ ३४ ॥

इसके पश्चात् उक्त मन्त्रों से रक्षित किये रोगी को उसके स्थान ( घर Indoor ward ) में ले जाकर उन्नीसवें त्रणितो-पासनीय अध्याय में कहे हुये आहार - विहारादिक स्वास्थ्यव -र्द्धक नियमों का उपदेश करे ॥ ३४ ॥

ततस्तृतीयेऽहनि विमुच्यैवमेव बध्नीयाद्वखपट्टेन, न चैन त्वरमाणोऽपरेद्युर्मोक्षयेत् ॥ ३५ ॥

भाचारिक उपदेश देने के वाद तीसरे दिन व्रणवन्धन की पट्टी खोलकर पूर्वानुसार ही कपाय से धोकर पह से बन्धन कर देना चाहिये । शीघ्रता की आकांक्षा रखकर दूसरे ही दिन पट्टी को नहीं खोलनी चाहिये ॥ ३१ ॥

द्वितीयदिवसपरिमोक्षणाद्विग्रथितो व्रणचिरादुपसं-रोहति, तीव्ररुजश्च भवति ॥ ३६ ॥

दूसरे दिन व्रण की पट्टी खोलने से उसमें गांठें पड़कर देरी से रोहण होता ( भरता ) है और वेदनाएं अधिक तीव्र होती है ॥ ३६ ॥

अत ऊर्ध्वं दोषकालबलादीनवेदय कषायालेपन-बन्धाहाराचारान् विध्यात् ॥ ३७ ॥

इसके बाद व्रण के दोप तथा समय की मौसम और रोगी के बल जैसे हीन, मध्यम, उत्तम और आयु आदि का विचार कर तदनुसार कषाय, लेप, वन्ध, आहार और आचार का प्रयोग करना चाहिये ॥ ३७ ॥

न चैनं त्वरमाणः सान्तर्दोष रोपयेत् । स ह्यल्पेना-प्यपचारेणाभ्यन्तरमुत्सङ्गं कृत्वा भूयोऽपि विकरोति ३८ जल्दी अच्छे होने की आकांक्षा से शीघ्रता करके सदोष व्रण पर रोपण क्रिया कभी भी नहीं करनी चाहिये । क्योंकि सान्तर्दो रोपित व्रण बाद में थोडे ही कुपथ्य करने से भीतर ही भीतर उठाव कर विकार उत्पन्न कर देता है ॥ ३८ ॥

भवन्ति चात्र-तस्मादन्तर्बहिश्चैव सुशुद्धं रोपयेद् व्रणम् ।

रूढेऽप्यजीर्णव्यायामव्यवायादीन् विवर्जयेत् ।

हर्ष क्रोधं भयञ्चापि यावत् स्थैर्योपसम्भवात् ॥ ३१ ॥

इस कारण भीतर और बाहर से भली प्रकार शुद्ध हुये व्रण का रोपण करना चाहिये तथा रोपण होने के बाद भी जब तक उस स्थान में पूर्ण आरोग्यता दिखाई न दे तब तक अजीर्ण, व्यायाम, स्त्रीसम्भोग, हर्प, क्रोध और भय इनका वर्जन करना चाहिये ॥ ३ ९ ॥ विमर्श - -: शुद्ध व्रण लक्षण - त्रिभिर्दोषैरनाक्रान्त व्यानोष्ठः पिडकी सम । अवेदनो ' निरास्रावो व्रण शुद्ध इहोच्यते ॥ सम्यग्न-णरूढलक्षण -- रूढवर्त्मानमग्रन्थिमशूनमरुज व्रणम् | त्वक्सवर्ण सम-तल सम्यगूढ विनिर्दिशेत् ॥ ( सु ० सू ० अ ० 23 ) अष्टाङ्गसंग्रह में मैथुनादि के वर्जन का समय ६ या ७ मास तक माना है 1 । ' रूढेऽप्यजीर्णं व्यायामव्यवायादीन् विवर्जयेत् । मासान् पट् सप्त वा नृणा विधिरेष प्रशस्यते ॥

हेमन्ते शिशिरे चैव वसन्ते चापि मोक्षयेत् ।

त्र्यहाद् व्यहाच्छरद्ग्रीष्मवर्षास्त्रपि च बुद्धिमान् ॥४० ॥

बुद्धिमान वैद्य हेमन्त शिशिर और वसन्त ऋतु में तीसरे दिन पट्ट खोले तथा शरद्, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु में दूसरे दिन व्रण की पट्टी खोल देवे ॥ ४० ॥

विमर्श - प्रायः शीत समय में पाक कम होने से तीन दिन पर तथा उष्णकाल में पाकशीघ्रता भय से दो दिन में खोलना लिखा है । यदि पैत्तिक व्रण हो तथा ऋतु शरद् या ग्रीष्म हो तो दिन में सुबह - साम दो वार भी पट्टी खोलनी पड़ती है ।

अतिपातिषु रोगेषु नेच्छेद्विधिमिमं भिषक् ।

प्रदीप्तागारवच्छीघ्रं तत्र कुर्य्यात् प्रतिक्रियाम् ॥४१ ॥

व्रण में पाक द्वारा अथवा तीव्र रक्तस्राव द्वारा हानि या प्राणभय की सम्भावना होने पर पट्टमोक्षण के उक्त नियमों पर ध्यान न देते हुये जलते हुये मकान के प्रतीकार की तरह जिस किसी उपाय से लाभ पहुंचे वैसी प्रतिक्रिया ( व्यव-स्था = चिकित्सा ) करनी चाहिये ॥ ४१ ॥

या वेदना शस्त्रनिपातजाता तीव्रा शरीरं प्रदुनोति जन्तोः ।

घृतेन सा शान्तिमुपैति सिक्ता कोष्णेन यष्टीमधुका न्वितेन ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽप्रोपहरणीयो-नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

Ma किसी शस्त्र की चोट से अथवा शस्त्र क्रिया के कारण व्रण में उत्पन्न हुई तीव्र वेदना जो कि शरीर को दुःखित या सन्तप्त करती हो वह मुलेठी के चूर्ण से युक्त किंचित् उष्ण घृत के द्वारा सेचन करने से शान्त हो जाती है ॥ ४२ ॥

विमर्श - एक कटोरी में तोले या ६ माशे भर घृत डाल कर उसमें ३ माशे भर मुलेठी का चूर्ण प्रक्षिप्त कर निर्धूम अङ्गारों पर कुछ उष्ण करके व्रण - वेदना - स्थान पर लगाना

चाहिये ।

इत्यायुर्वेदतत्त्वसन्दीपिकाभाषायां पञ्चमोऽध्यायः ॥

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२० सुश्रुतसहिता |

षष्ठोऽध्यायः ।

अथात ऋतुचर्यमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

इसके बाद ' ऋतुचर्या ' नामक अध्याय का वर्णन करते हैं । जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत के लिये ) कहा था ॥ कालो हि नाम भगवान् स्वयम्भूरनादिमध्यनिध-नोऽत्र रसव्यापत्सम्पत्ती जीवितमरणे च मनुष्याणामा-यत्ते । स सूक्ष्मामपि कलां न लीयत इति कालः । सकलयति कालयति वा भूतानीति कालः ॥ ३ ॥

काल की व्याख्या इस प्रकार है । वह ऐश्वर्यशाली और स्वयम्भू अर्थात् किसी से उत्पन्न नहीं है तथा आदि, मध्य और अन्त से रहित है, अर्थात् न उसके आदि ( प्रारम्भ ) का । न मध्य का और न समाप्त होने का ज्ञान है । मधुरादि ६ रसों की विकृति और सम्पत्ति तथा प्राणियों का जीवन और मरण उस काल के ही अधीन है । वह काल अपनी सूक्ष्म कला तक भी नहीं ठहरता है अतः उसे ' काल ' कहते हैं । अथवा प्राणियों का सकलन ( सुख - दुःस के साथ सयोग ) ) करता है किवा प्राणियों का सहार करता है अत एव उसे ' काल ' कहते हैं ॥ २ ॥

विमर्श -- कालशब्दनिरुक्ति ' - " कलाशब्दस्य ककाराकारी ली. धातोश्च लकारमादाय कालशब्द निष्पत्ति " । कलनात सर्वधातूनां स काल परिकीर्तित । मुदु साभ्या भूतानि योजयनीति काल | काल-यति सक्षिपतीति वा काऊ । मृत्युसमीप नयतीति वा काल | भाग वतेऽपि कालो बलीयान बलिना भगवानीश्वरोऽव्यय । प्रजा काल । यते कीढन् पशुपाो यया पशून् ॥ हाराणचन्द्रस्तु मूक्ष्मामपि कला कालाशविशेष लीयते = रृप्यतिकालस्य सर्वमूर्तसयोगित्वादितिकाल । तस्य संवत्सरात्मनो भगवानादित्यो गतिविशेपेण निमेपकाष्ठाकला मुहूर्त्ताहोरात्रपक्षमा सर्त्ययनसंवत्सरयुग प्रविभागं करोति ॥ ४ ॥

सवत्सररूपी उस काल का भगवान् सूर्य अपनी गति - । विशेष से निमेष, काष्टा, कला, मुहूर्त्त, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर और युग इस तरह विभाग करते है ॥ ३ ॥।

तत्र लध्यक्षरोच्चारणमात्रोऽचिनिमेपः, पञ्चदशा-क्षिनिमेपाः काष्टा, त्रिंशत्काष्ठा: कला, विंशतिकलो-मुहूर्त्तः कलादशभागश्च, त्रिंशन्मुहूर्त्तमहोरात्रं, पञ्चदशा-होरात्राणि पनः । स च द्विविधः - शुकः कृष्णच, तौ मासः ॥ ५ ॥

उक्त कालभेटों में प्रत्येक का लक्षण दिसते हैं - अकारादि । लघु अक्षर के उच्चारण करने में जितना समय लगता है उसे ' अक्षिनिमेप ' कहते है । पन्द्रह अति निमेषों की एक ' काष्ठा ' होती है । तीस काष्ठाओं की एक ' कला ' और वीस कला तथा एक कलाका दसवां हिस्सा ( ३ काष्टा ) मिलकर एक ' मुहूर्त ' एवं तीस मुहूर्त्त का एक ' अहोरात्र ' ( दिन रात ) और पन्द्रह अहो.

रात्र का एक ' पक्ष ' होता है जिसके शुद्ध तथा कृष्ण दो भेद हैं ।

दो पक्षों का एक ' मास ' होता है ॥ ५ ॥

तत्र माघादयो द्वादश मासाः संवत्सरः, द्विमासिक-मृतुं कृत्वा पडू ऋतवो भवन्ति । ते शिशिरवसन्तग्रीष्म- | वर्षाशरद्धेमन्ताः तेपां तपस्तपस्यो शिशिरः, मधुमा धवौ वसन्तः शुचिशुको ग्रीष्मः, नभोनभस्यों चर्पाः इपोर्जी शरत्:, सहःसहस्यौ हेमन्त इति ॥ ६ ॥

उक्त सवत्सर में माचादि बारह मास होते है । ढो २ मास की एक एक ' ऋतु ' होती है । इम तरह बारह मामों से ६ धातुएं बनती हैं । उनके नाम शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद और हेमन्त हैं । उनमें तप ( माघ ) और तपस्य ( फाल्गुन ) मासों से शिशिर, मधु ( चैत्र ) और माधन ( वैशान ) मा से वसन्त, शुचि ( ज्येष्ठ ) तथा शुक्र ( आषाढ ) मामों से ग्रीष्म, नभ ( श्रावण ) और नमस्य ( भाद्रपद ) मासों से वर्षा, इप ( आश्विन ) और कर्ज ( कार्मिक ) मासों मे शरद तथा सहा ( मार्गशीर्ष ) और सहस्य ( पीप ) मामों से हेमन्त ऋतु होती है ॥ ६ ॥

त एते शीतोष्णवर्पलचणाञ्चन्द्रादित्ययोः कालवि-भागकरत्वादयने द्वे भवतो दक्षिणमुत्तरञ्च । तयोर्दक्षिणं वर्षाशरद्धेमन्ताः तेषु भगवानाप्यायते सोम ', ' अम्लल-वणमधुराश्च रसा बलवन्तो भवन्ति, उत्तरोत्तर सर्वप्राणिनां बलमभिवर्द्धते । उत्तरच शिशिरवसन्तग्री-मा:, तेषु भगवानाप्यायतेऽर्कः, तिक्तकषायकटुकाश्च रसा बलवन्तो भवन्ति, उत्तरोत्तरच सर्वप्राणिनां चल-मपहीयते ॥ ७ ॥

शीत, उष्ण और वर्षा लक्षणों वाली इन ऋतुओं के चन्द्र और सूर्य के काल - विभाग करने के गुण से दक्षिण और उत्तर ऐसे दो ' अयन ' होते हैं । उनमें से वर्षा, शरद और हेमन्त ऋतु के समय को ' दक्षिणायन ' कहते है । दक्षिणायन की वर्षादि न ऋतुओं में भगवान् चन्द्रमा क्रमशः आप्यायित ( बलशाली ) होते हैं तथा अम्ल, लवण और मधुर रस बलवान् होते हैं । सर्व प्राणियों का बल भी उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है । शिशिर वसन्त और ग्रीष्म के समय को ' उत्तरायण ' कहते हैं । इन ऋतुओं में भगवान् सूर्य बलशाली होते हैं । तिक्त, कपाय और कटु र बलवान होते हैं और उत्तरोत्तर सर्व प्राणियों का वल क्षीण होता है ॥ ७ ॥

विमर्श - दक्षिणायन को ' विसर्ग काल ' कहते हैं । विसर्गश्च यद्दल विसृजत्ययम् । विसृनति जनयत्याध्यमश प्राणिनाञ्च बलमिति विसर्गः । ( चक्रपाणि ) | चन्द्रादि के शीतल होने से अम्ल - मधु-रादि रस पुष्ट होकर प्रणियों का बल बढ़ाते है । उत्तरायण को ' आदान काल ' कहते हैं । सूर्य अपनी तीव्र किरणों से जगत् के जल, पृथिवी, वृक्ष, मनुष्य सभी प्राणियों के स्नेहाश को सींच लेता है अत एव इसे ' आदान ' कहा है | आदान च तदादन्ते नृणा प्रतिदिन बलम् । ( अ ० ह ० ) । आददाति = क्षयति पृथिव्याः सोम्याश प्राणिनाच बलमित्यादानम् । ( चक्रपाणि ) ।

भवति चात्र-शीतांशुः क्लेदयत्युर्वी विवस्वान् शोपयत्यपि ।

तावुभावपि संश्रित्य वायुः पालयति प्रजाः ॥ ८ ॥

चन्द्रमा पृथ्वी को अपनी शीत किरणों द्वारा क्लिन्न ( आई ) रखता है और सूर्य सुसाता है । तथा चन्द्र और सूर्य दोनों का आश्रय के कर वायु प्रजा का पालन करता है ॥ ८ ॥

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श्रध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् । २१ विमर्श - वायु योगवाही होने से चन्द्र और सूर्य दोनों के कार्य में सहयोग देता है । योगवाह परं वायुः सयोगादुभया-र्थकृत् । दाइकृत्तेजसा युक्त ' शीतकृत्सोमसश्रयात् ॥ ( च ० चि ० अ ० ३ ) । वायुके भन्य उपयोगी गुण - " सृष्टिश्व मेघानाम्, अपा विसर्ग ', उद्भेदन चौद्भिदाना, पुष्पफलानाञ्चाभिनिर्वर्तनम्, बीजा भिसस्कार सस्याभिवर्धनम्, भविक्लेदोपशोपणे । ( च ० सू ० अ ० १२ । अथ खल्त्रयने द्वे युगपत् संवत्सरो भवति । ते तु पञ्च युगमिति संज्ञां लभन्ते । स एप निमेषादियुगपर्य-न्तः कालश्चक्रत्रत् परिवर्त्तमानः कालचक्रमुच्यत इत्येके । इन दक्षिणायन तथा उत्तरायण दोनों अयनों का मिल कर गुर्व्यश्व । ता उपयुज्यमाना मन्दकिरणत्वाद्भानोः सतु-षारपवनोपस्तम्भितदेहानां देहिनामविदग्धाः स्नेहाच्छे-त्या गौरवादुपले पाञ्च श्लेष्मसञ्चयमापादयन्ति । स सञ्जयो वसन्तेऽर्करश्मिप्रविलायित ईपत्स्तब्धदेहानां देहिनां श्लैष्मिकान् व्याधीञ्जनयति ॥ १२ ॥

वे ही भोपधियां हेमन्त ऋतु में समय के परिणाम से परिणतवीर्य ( परिपक्व वीर्य वाली ) और वलवान् हो जाती हैं तथा जल भी निर्मल, स्निग्ध और भा हो जाता है । इस समय सूर्य की रश्मियों के मन्द होने से | तथा तुपार ( वर्फ ) से मिली वायु के सम्पर्क द्वारा स्तम्भित ' एक ' वर्ष ' होता है । वे पांच वर्ष मिल कर ' युग ' कहलाते हैं ॥ देह वाले प्राणियों में प्रयुक्त की हुई वे भोपधियां और जल निमेष से ले कर युग तक चक्र के समान परिवर्तन ( भ्रमण ) शील यह काल किसी के मत से ' कालचक्र ' कहलाता है ॥ ९ ॥

इह तु वर्षाशरद्धेमन्तवसन्तग्रीष्मप्रावृषः षड् ऋतवो भवन्ति दोपोपचयप्रकोपोपशमनिमित्तम् । ते तु भाद्रप-दाद्येन द्विमासिकेन व्याख्याताः । तद्यथा - भाद्रपदाश्व-युजौ वर्पाः, कार्त्तिकमार्गशीर्षौ शरत्, पौपमाघौ हेमन्तः, फाल्गुनचैत्रौ वसन्तः, वैशाखज्येष्ठौ ग्रीष्मः, आषाढश्रावणौ प्रावृडिति ॥ १० ॥

यहाॅ तो दोषों के सञ्चय, प्रकोप और प्रशमन निमित्त से वर्षा, शरद, हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म और प्रावृट् ६ ऋतुएं होती हैं और भाद्रपदादि दो २ मासों को मिलाकर इनकी गणना ( व्याख्या ) की जाती है । जैसे भाद्रपद और भाश्विन को ' वर्षा ', कार्त्तिक और मार्गशीर्ष को ' शरद ', पौप और माघ को ' हेमन्त ', फाल्गुन और चैत्र को ' वसन्त ', वैशाख और ज्येष्ठ को ' ग्रीष्म ' तथा आषाढ और श्रावण को ' प्रावृट् ' कहते है ॥१० ॥

तत्र, वर्पास्वोषधयस्तरुण्योऽल्पवीर्या आपश्चाप्रसन्नाः क्षितिमलप्रायाः । ता उपयुज्यमाना नभसि मेघावतते जलप्रक्लिन्नायां भूमौ किन्नदेहानां प्राणिनां शीतवातविष्ट -म्भिताग्नीनां विदह्यन्ते, विदाहात् पित्तसञ्चयमापादय

न्ति! स सञ्चयः शरदि प्रविरलमेघे वियत्युपशुष्यति ।

पङ्केऽर्ककिरणप्रविलायितः पैत्तिकान् व्याधीन् जनयति ॥

उन धातुओं में से वर्षा ऋतु में ओपधियाँ तरुण ( नूतन ) होने से अल्पवीर्य वाली होती हैं तथा जल पृथिवी के मल ( सडे गळे पदार्थों ) से युक्त होने के कारण अप्रसन्न ( कलु पित ) होता है । आकाश के मेधाच्छन्न होने पर तथा पृथिवी के वृष्टि जल से गीली हो जाने पर क्लिन्न देह वाले तथा शीत ( से कुपित ) वात से विनष्ट पाचकाग्नि वाले प्राणियों के शरीर में उस दूषित जल तथा भोपधि सेवन से विदाह । रहने लगता है । विदाह से पित्त का सचय होता है । यह पित्त का सचय मेघों के भल्प होने पर और पृथिवी के कीचड़ के शुष्क होने पर सूर्य की किरणों से विद्युत होकर पैत्तिक व्याधियों को उत्पन्न करता है ॥ ११ ॥

ता एवौषधयः कालपरिणामात् परिणतवीर्या बल-त्यो हेमन्ते भवन्त्यापन प्रसन्नाः स्निग्धा मधुरपाकी होकर स्नेह, शीतता, गुरुता ( भारीपन ) और चिकणता के कारण कफ का सञ्चय करती हैं । यह सचित कफ वसन्त ऋतु में सूर्य की किरणों से पिघल कर कुछ स्तब्ध हुई देह वाले प्राणियों में श्लैष्मिक रोग पैदा करता है ॥ १२ ॥

ता एवौषधयो निदाघे निस्सारा रूक्षा अतिमात्रं लघ्न्यो भवन्त्यापश्च, ता उपयुज्यमानाः सूर्यप्रतापोपशो-षितदेहानां देहिनां रौक्ष्याल्लघुत्वाद्वैशद्याच्च वायोः सञ्च-मापादयन्ति । स सञ्चयः प्रावृषि चात्यर्थं जलोपक्लि-नायां भूमौ क्विन्नदेहानां प्राणिनां शीतवातवर्पेरितो

वातिकान् व्याधीनयति । एवमेष दोष -प्रकोपहेतुरुक्तः ॥ १३ ॥

ये ही भोषधियां और जल ग्रीष्म ऋतु में साररहित, रूक्ष और अत्यन्त हल्की हो जाती हैं । उक्तगुण वाली प्रयुज्य -मान ये भोपधियां और जल सूर्य की गरमी से शुष्क देहवाले | मनुष्यों में रूक्षता, लघुता और विशदता ( निःस्नेहता ) के कारण वायु का सञ्चय करती हैं । यह वायु का सञ्चय प्रावृट ऋतु में भूमि के जल द्वारा अधिक गीली होने पर क्लिन्न देह वाले प्राणियों में शीत, वात और वर्षा के कारण वातिक विकारों को उत्पन्न करता है । इस तरह दोषों के सञ्चय और प्रकोप के हेतु का वर्णन किया है ॥ १३ ॥

तत्र वर्षाहेमन्तग्रीष्मेषु सन्चितानां दोषाणां शर-द्वसन्तप्रावृट्सु च प्रकुपितानां निर्हरणं कर्तव्यम् ॥१४ ॥

वर्षा, हेमन्त और ग्रीष्म में सञ्चित हुये तथा शरद्, वसन्त और प्रावृट् ऋतु में कुपित हुये दोषों का ( उचित शाखोक्त उपायों द्वारा ) निर्हरण करना चाहिये ॥ १४ ॥

विमर्श - मिथ्या आहार - विहारादि से सञ्चित दोषों का संशोधन उनकी चयावस्था में ही करना चाहिये । " चय एव जयेद्दोषम् ” ( वाग्भट ) । सञ्चयेऽपहृता दोषा लभन्ते नोत्तरा गती । ते तूत्तरासु गतिषु भवन्ति वलवत्तरा ॥ ( सुश्रुत ) सञ्चितदोष-हरणविधिः- माधवप्रथमे मासि नभस्य प्रथमे पुन.। सहस्य • प्रथमे चैव हारयेद्दोषसञ्चयम् ॥ ( च ० सू ० अ ० ७ ) । श्रावणे कार्त्तिके चैत्रे मासि साधारणे क्रमात् । ग्रीष्मवर्षाहिमचितान् वाखादीनाशु निर्हरेत् ॥ ( वाग्भट ) । तत्र पैत्तिकानां व्याधीनामुपशमो हेमन्ते, श्लैष्मि-

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२२ सुश्रुतसहिता । काणां निदाघे, वातिकानां शरदि, स्वभावत एव । त जलाद देश देशात काल सभारत । विद्याद् दुष्परिहार्यत्याहरीयस्त-एते सञ्चयप्रकोपोपशमा व्याख्याताः ॥ १५ ॥ रमवित् ॥

पित्तजन्य रोगों का शमन हेमन्त में, कफजन्य रोगों का शमन ग्रीष्म में और वातजन्य रोगों का शमन शरद् ऋतु में स्वभाव से ही हो जाता है । इस तरह दोपों के सञ्चय, प्रकोप और प्रशमन को व्याख्या की गई है ॥ १५ ॥

विमर्श - प्रायेण प्रशम याति स्वयमेव समीरण । शरत्काले वसन्ते च पित्त प्रावृती कफ ॥ ( शार्ङ्गधर ) । तत्र, पूर्वाह्णे वसन्तस्य लिङ्गं, मध्याहे ग्रीष्मस्य, अपराह्ने प्रावृपः, प्रदोषे वार्षिकं, शारदमर्धरात्रे, प्रत्यु-पसि हैमन्तमुपलक्षयेत् । एवमहोरात्रमपि वर्षमिव शीतोष्णवर्पलक्षणं दोपोपचयप्रकोपोपशमैर्जानीयात् ॥ १६ ॥

दिन के पूर्व भाग मे वसन्त ऋतु के लक्षण होते हैं, एवं मध्याह्न में ग्रीष्म, अपराह में प्रावृट्, सन्ध्या के समय वर्षा, आधीरात में शरद और सूर्योदय के पूर्व ( ब्राह्ममुहूर्त्त ) में हेमन्त ऋतु के लक्षण होते हैं । इस तरह दिन और रात भी दोषों के सञ्चय, प्रकोप और प्रशमनों द्वारा वर्ष की तरह शीत, उष्ण और वर्षा के लक्षणों से युक्त माने जाते हैं ॥ १६ ॥

विमर्श - अहोरात्र में वर्ष की तरह प्रतिदिन छहों ऋतुयें तथा उनमें दोषों का सञ्चय, प्रकोप और प्रशमन होते रहते हैं । तत्र व्यापन्नेष्वृतुष्व व्यापन्ना श्रोषधयो भव-न्त्यापश्च, ता उपयुज्यमानाः प्राणायुर्बलवीर्योजस्कर्यो भवन्ति ॥ १७ ॥

अव्यापन्न ( अविकृत = स्वाभाविक ) ऋतुओं में ओपधियां तथा जल भी अव्यापन्न अर्थात् अदूषित रहते हैं । उनका उपयोग प्राणशक्ति, आयु, वल, वीर्यं और ओज का चर्द्धक होता है ॥ १७ ॥

तेपां पुनर्व्यापढोऽदृष्टकारिताः, शीतोष्णवातव र्पाणि खलु विपरीतान्योपधीर्व्यापादयन्त्यपश्च ॥ १८ ॥

उन ऋतुओं की व्यापत् ( विकृति ) अदृष्ट ( अधर्म ) से होती है । शीत, उष्ण, वायु और वर्षा का वैपरीत्य ओप धियों और जल को विगाढ देता है ॥ १८ ॥

विमर्श — चरकेऽपि “ कुतो मूलमेपा वास्त्रादीना वैगुण्यमुपपद्यते ', वाय्वादीना यद्वैगुण्यमुत्पद्यते तस्य मूलमधर्मः, तन्मूल वाऽसत्कर्म पूर्वं कृतम् । तेषा तथाऽन्तर्हितधर्माणामधर्मप्रधानानामपक्रान्तदेवता नामृतवो व्यापद्यन्ते । तासामुपयोगाद्विविधरोगप्रादुर्भावो मरको वा भवेदिति ॥ १६ ॥

विकृत हुई उन ओषधियों तथा जल के सेवन करने से अनेक प्रकार के रोगों का प्रादुर्भाव अथवा मरक भी उत्पन्न होता है ॥ १ ९ ॥ विमर्श - मरक को महामारी ( Pandemic or epidemio disease ) कहते हैं । चरकोक्तकारण - वैगुण्यमुपपन्नाना देशकाला-निलाम्भसाम् । गरीयस्त्व विशेषेण हेतुमत सम्प्रवक्ष्यते ॥ वाताजलं तत्र, अव्यापन्नानामोपधीनामपाचोपयोगः ॥ २० ॥

ऋतुओं की विकृति के समय तथा महामारी रोग उत्पन्न हो जाने पर अदूषित ओपधियों तथा जल का उपयोग करना चाहिये ॥ २० ॥

विमर्श - ऋतुओं की विकृति प्रारम्भ होने के पूर्व ओप-धियां उसाड़ कर सुरक्षित रस लेनी चाहिये जैसा कि चरक में कहा है - तरमात् प्रागुदध्वसात् प्राक् च भूमेवंरसीमावादुद्धरध्व, सोम्य पज्यानि यावन्नो पत्तरसवीर्यप्रभावारि । ' शस्यते विश्व भेषजे पूर्वमुद्रवते । आजकल कॉलरा टायफायडू, प्लेग, चेचक आदि महामारियों के फैलने के पूर्व उनसे बचने के लिये Pro phylaxas treatment किया जाता है जिससे रोग - सम्भावना बहुत कम हो जाती है । कदाचिदव्यापन्नेष्वप्यृतुषु कृत्याऽभिशापरक्षःक्रो-धाधर्मैरुपध्वस्यन्ते जनपदाः । विपौपधिपुष्पगन्धेन वायुनोपनीतेनाक्रम्यते यो देशस्तत्र दोपप्रकृत्यविशेपेण कासश्वासवमथुप्रतिश्यायशिरो रुग्ज्यरैरुपतप्यन्ते, ग्रहन-क्षत्रचरितैर्वा, गृहदारशयनासनयानवाहनमणिरत्रोपक-रणगहिंतलक्षणनिमित्तप्रादुर्भावैर्वा ॥ २१ ॥

किसी किसी समय ऋतुओं के ठीक रहने पर भी कृया, अभिशाप, राक्षस - पिशाचादिकों के क्रोध और अधर्म से देश के देश विनष्ट हो जाते हैं । कभी २ विपयुक्त अथवा विषैले पुष्पों की गन्ध से दूषित वायु द्वारा वातादि दोपों तथा सावि कादि प्रकृति की विशेषता के बिना ही कास, श्वास, चमन, प्रतिश्याय, शिरोवेदना तथा ज्वर से देशवासी पीढित हो जाते है । किंवा सूर्यादि ग्रह तथा अश्विन्यादि नक्षत्रों के अनिष्ट प्रभाव से भी व्याधियां उत्पन्न हो जाती हैं अथवा वर, खी, शयन ( पलग ), आसन, यान, वाहन, मणि, रल एवं अन्य उपकरणों की दुष्टि होने से तथा अन्य अशुभ सूचक लक्षणों से । रोग उत्पन्न होते देखे गये है ॥ २१ ॥

विमर्श - - व बहुत से रोगों का विष वायुद्वारा प्राणियों पर आक्रमण करता है जैसे - मसूरिका, रोमान्तिका, प्रतिश्याय, मस्तिष्कसुपुन्नाज्वर ( Cerebrospinal Fever ), रोहिणी, । न्यूमोनिया, कास आदि । पूर्वकाल मे एक शत्रु दूसरे शत्रु राजा के देश के जल, वायु, खाद्य - पेय पदार्थों में विद मिला देते थे । तन्त्र, स्थानपरित्यागशान्तिकर्मप्रायश्चित्तमङ्गलजप-होमोपहारेन्याऽञ्जलि नमस्कारतपोनियमद्यादानदीक्षा-ऽभ्युपगमदेवता ब्राह्मणगुरु परैर्भवितव्यम्, एवं साधु | भवति ॥ २२ ॥

इस प्रकार की अवस्था में निवास स्थान का परित्याग, शान्तिकर्म, प्रायश्चित्त, मंगल, जप, हवन, उपहार ( बलिदान ), यज्ञ ( इज्या ), बद्धाञ्जलि प्रणाम, तप, नियम, दया, दान, दीक्षाग्रहण तथा देवता, ब्राह्मण और गुरुओं में श्रद्धाभक्ति करना चाहिये, इससे शान्ति होती है ॥ २२ ॥

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श्रध्याय ६ ] सूत्रस्थानम् । २३ विमर्श - नरको कोपाया - " येपा न मृत्युमामान्यं सामान्य न । न्च कर्मणान् । कर्म पग्रविधं तेषा भैषज परमुच्यते ॥ हित जनपदाना शिवनानुपसेवनम् । सेवन ब्रह्मचर्यस्य तथैव ब्रह्मचारिणान् ॥ या धर्मशास्त्राणां महपणां जितात्मनाम् । धार्मिक, सात्त्विकै नित्य सहास्या वृद्धसमत. ॥ अत ऊर्ध्वमव्यापन्नानामृतूनां लक्षणान्युपदे-क्ष्यामः ॥ २३ ॥

इसके आगे अव्यापन्न ( अदूषित शुद्ध ) ऋतुओं के लक्षण कहते है ॥ २३ ॥

वायुवत्युत्तरः शीतो रजोधूमाकुला दिशः ।

छन्नस्तु पारैः सविता हिमानद्वा जलाशयाः ॥ २४ ॥

दर्पिता ध्यानाहमहिपोरभ्रकुञ्जराः ।

रोत्रप्रियपुन्नागाः पुष्पिता हिमसाहये ॥ २५ ॥

हेमन्त ऋतु में उत्तर दिशा की टण्टी चायु चलती है, धारों विशाणु धूलि और धूप से व्याप्त रहती हैं । सूर्य तुपार ( हिमपात ) से आच्छादित रहता है, तटागादि जलाशय बर्फ से ढक जाते हैं, का, गेढा, महिप, भंठा और हस्ती ये अपने म से दर्पित ( मदोन्मत्त ) रहते हैं तथा लोध, प्रियद्ध और नाग ( नागकेशर ) के पृठ पुष्पित हो जाते हैं ॥ २४-२५ ॥

शिशिरे शीतमधिकं वातवृष्टयाकुला दिशः ।

शेषं हेमन्तवत् सर्वं विज्ञेयं लक्षणं बुधैः ॥ २६ ॥

शिशिर ऋतु में शीत अधिक होता है, दिशाएं वायु और वर्षा से व्याकुल ( व्याप्त ) रहती है तथा शेष लक्षण हेमन्त ऋतु के समान होते हैं जिनका बुद्धिमान् स्वयं ज्ञान कर लेवे ॥ २६ ॥

सिद्धविद्याधरवधूचरणालक्तकाद्धिते ।

मलये चन्दनलता परिष्वद्नाधिवासिते ॥ २७ ॥

वाति कामिजनानन्दजननोऽनदीपनः ।

दम्पत्योर्मानभिदुरो वसन्ते दक्षिणोऽनिलः ॥ २८ ॥

दिशो वसन्ते विमलाः काननैरुपशोभिताः ।

किंशुकाम्भोजबकुलचूताशोकादिपुष्पितैः ॥ २ ९ ॥

कोकिला पट्पद्गणैरुपगीता मनोहराः ।

दक्षिणा निलसंवीताः सुमुखाः पल्लवोज्ज्वलाः ॥ ३० ॥

वसन्त ऋतु में सिद्ध तथा विद्याधरों की वधुओं के चरणों में लगे हुए अलक्तक ( माहोर या लाक्षारस ) से अङ्कित मलय गिरि के ऊपर चन्दन पर चढ़ी हुई चमेली-मालती आदि लताओं के आलिङ्गन ( अत्यन्त संपर्क ) से सुवासित, कामीजनों को आनन्द देने वाली, अनङ्ग ( काम-देव ) को दीप्त करने वाली तथा स्त्री और पुरुषों के परस्पर मान का भेदक मलयगिरि की दक्षिणी वायु चलती है । इनके अतिरिक्त वसन्त ऋतु सव दिशाए निर्मल, वन " उपवनों से शोभायमान, पलाश, कमल, बकुल ( मौलश्री ), आन और अशोक इत्यादि वृक्षों के पुष्पों से शोभित तथा चारो ओर को किला और अमरों के समूह के गुअन ( गीत ) से मनोहर, दक्षिण दिशा की वायु से व्याप्त तथा अनेक नये २ भूरे लाल कोमल पप्लवों से शोभित होती हैं ॥ २७-३० ॥

श्रीष्मे तीक्ष्णांशुरादित्यो मारुतो नैर्ऋतोऽसुखः ।

भूस्तप्ता सरितस्तन्व्यो दिशः प्रज्वलिता इव ॥ ३१ ॥

भ्रान्तचक्रायुगलाः पयःपानाकुला मृगाः ।

ध्वस्तवीरुत्तृणलता विपर्णाङ्कितपादपाः ॥ ३२ ॥

ग्रीष्म ऋतु में सूर्य तीक्ष्ण किरणों वाला हो जाता है, नित दिशा का कष्टदायक पवन चलता है, पृथ्वी गरमी से संतप्त रहती है, अल्पप्रवाह के कारण नदियां पतली ( कम जल वाली ) हो जाती हैं, चारो दिशाए प्रज्वलित सी प्रतीत होती हैं, चकवा और चकवी का जोढा पानी की खोज में भ्रान्त से घूमते रहते हैं, हरिण जल पीने के लिये व्याकुल से रहते है, छोटे वृक्ष, तृण और लताए नष्ट हो जाती है तथा पेड़ों के पत्ते झड़ जाते है ॥ ३१-३२ ॥

प्रावृज्यम्बरमानद्धं पश्चिमानिलकर्पितैः ।

अम्बुदैर्विद्युदुद्योत प्रस्रुतैस्तुमुलस्वनैः ॥ ३३ ॥

कोमलश्यामप्पाढ्या शक्रगोपोज्ज्वला मही ।

कदम्बनीपकुटजसर्जकेतकिभूपिता ॥ ३४

प्रावृत् ऋतु में आकाशमण्डल पश्चिम दिशा लाये हुये तथा विजली की चमक के साथ कुछ और भयंकर गर्जन करने वाले मेघों से व्याप्त पृथ्वी कोमल तथा श्याम रंग की घास से व्याप्त ( हुन्द्रवधू - वीरबहूटी ) से उज्ज्वल तथा कदग्व सर्ज, केतकी से भूषित रहती है ॥ ३३–३४ ॥ ॥ की वायु से बरसने वाले रहता है एवं , एव शक्रगोपों , नीप, कुटज, विमर्श -- वाल्मीकृितवर्षावर्णने --- ' वालेन्द्रगोपान्तरचित्रितेन विभाति भूमिर्नवशाद्वलेन ।

तत्र वर्षासु नद्योऽम्भश्छन्नोत्खाततटद्रुमाः ।

चाप्यः प्रोत्फुल्लकुमुदनीलोत्पलविराजिताः ॥ ३५ ॥

भूरव्यक्तस्थलश्वभ्रा बहुससयोपशोभिता ।

नातिगर्जत्स्रवन्मेघनिरुद्धार्कग्रहं नभः ॥ ३६ ॥

वर्षा ऋतु में नदियां जल से पूर्ण हो कर अपने प्रवल प्रवाह से तीर के ऊपर के स्थित पे को उखाड देती हैं । बावड़ियां अत्यन्त खिले हुए कुमुद ( श्वेत कमल ) तथा नील कमलों से शोभायमान रहती है । पृथिवी घास से ढकी होने से उसके ऊपर विद्यमान स्थल और गड हे विदित नहीं होते हैं तथा अनेक प्रकार के धान्यों से सुशोभित रहती है । इसी तरह मन्द मन्द ध्वनि कर के वर्पते हुए मेघों से सूर्य और नक्षत्र तथा आकाश छिपे रहते है ॥ ३५-३६ ॥

बभ्रुरुष्णः शरद्यर्कः श्वेताभ्रविमलं नभः ।

तथा सरांस्यम्बुरुहैर्भान्ति हंसांसघट्टितैः ॥ ३७ ॥

पङ्कशुष्कद्रुमाकीर्णा निम्नोन्नतसमेषु भूः ।

बाणसप्ताहबन्धूककाशासनविराजिता ॥ ३८ ॥

शरद ऋतु में सूर्य पिङ्गलवर्ण का तथा उष्ण रहता है आकाश श्वेत बादलों से निर्मल ( स्वच्छ ) दिखाई देता है । हसों के इधर - उधर चलने से उनके कंधों से घट्टित ( भालो डित ) कमलों से सरोवर शोभायमान रहते है । तथा नीचे - ऊंचे

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२४ सुश्रुतसंहिता और समान स्थानों में पृथिवी कीचड़युक्त, शुष्क ( सूखी ) और द्रुम ( वल्मीक = विमवट बनाने वाली चीटियों ) से व्याप्त हो जाती है तथा पिट, सतौना, गुलदुपहरिया, काश और विजयसार से शोभित रहती है ॥ ३७-३८ ॥ विमर्श - वल्मीककारिण्य सूक्ष्मा पिपीलिका हुमा उच्यन्ते । इति ण ।

स्वगुणैरतियुक्तेषु विपरीतेषु वा पुन ' ।

विषमेष्वपि वा दोषाः कुप्यन्त्यृतुषु देहिनाम् ॥ ३६ ॥

ऋतुओं में अपने स्वाभाविक गुणों के अधिक मात्रा में वढने से तथा विपरीत होने से किंवा अपने गुणों के विपम होने से प्राणियों के शरीर स्थित वातादि दोष प्रकुपित होते हैं ॥ ३ ९ ॥

हरेद्वसन्ते श्लेष्माणं पित्तं शरदि निर्हरेत् ।

वर्षासु शमयेद्वायु प्राग् विकारसमुच्छ्रयात् ॥ ४० ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने ऋतुचर्या -नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

Ma रोग उत्पन्न होने के पूर्व वसन्त ऋतु में वमनादि विधि से कफ का हरण, शरद् ऋतु में विरेचन द्वारा पित्त का हरण और वर्षा ऋतु में स्नेहपान, वस्ति आदि उपायों से बात का संशमन कर देना चाहिये ॥ ४० ॥

विमर्श - विरेचन हि पित्तत्य जयाय परमौषधम् । चरके दोषहरणोपदेश ॰ — हेमन्तिक दोषचय वसन्ते प्रवाहयन् त्रैष्मिकम-काले 1 । वनात्यये वार्षिकमाशु सम्यक् प्राप्नोति रोगान् ऋतुजान् न जातु ॥ आजकल दोप्शामक सुन्दर उपाय का उपयोग न करने से भिन्न - भिन्न ऋतुओं में वातादि रोगों की प्रबलता होती रहती है । उक्त क्रम का पालन करना अत्यन्त श्रेष्ठ है । प्रक्षालनादि पङ्कस्य दूरादत्यर्शन वरम् । Prevention is better then cure. इत्यायुर्वेदतस्वसदी पिकाभाषायां षष्ठोऽध्यायः ।

सप्तमोऽध्यायः ।

अथातो यन्त्रविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अव यहां से ' यन्त्रविध ' अध्याय का व्याख्यान करेंगे ।

जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१-२ ॥

विमर्श - यन्त्रव्युत्पत्ति —यन्त्र्यते शस्त्रकर्म समये नियन्त्र्यते रोगी रोगो वाऽनेनेति यन्त्रन् । शल्याहरणोपायो वा यन्त्रम् । यन्त्रशतमेकोत्तरम्, अत्र हस्तमेव प्रधानतमं यन्त्राणामत्रगच्छ | किं कारणम्? यस्माद्धस्तादृते यन्त्रा-णामप्रवृत्तिरेव, तदधीनत्वाद् यन्त्रकर्मणाम् ॥ ३ ॥

/ यन्त्र एक सौ एक १०१ होते हैं । यहां हाथ को ही प्रधान यन्त्र जानना चाहिये कारण कि हस्त के विना यन्त्रों का प्रयोग असम्भव है क्योंकि यन्त्रकर्म हाथ के ही अधीन होते हैं ॥३ ॥

-विमर्श यन्त्र एक सौ एक १०१ ही होते हैं ऐसा यहाँ -तात्पर्य नहीं है, ये अनेक हो सकते है । स्वदुध्या च विकल्पन विविधानि यन्त्रशस्त्राणि तत्कर्माणि च उपकल्पयेत् । अनः कर्मव-शास्तपामियत्ताऽवधारणमशक्यम् । ( श्र ० सं ० ) । तत्र, मनःशरीराबाधकराणि शल्यानि, तेपामाह-रणोपायो यन्त्राणि ॥ ४ ॥

~ मन और शरीर को बाधा ( दुःख ) पहुंचाने वाले भावों | को शल्य तथा इन को निकालने के उपकरणों या उपायों का नाम ' यन्त्र ' है ॥ ४ ॥

विमर्श -- मनःशल्य कोई दृश्यमान पदार्थ नहीं है अतः उसे यन्त्र - शस्त्रों से निकाला भी नहीं जा सकता, इस दोष के निराकरणार्थ सुश्रुत सूत्रस्थान के २६ वें अध्याय में " सर्वशरी-रावाधकर शल्यम् ” ऐसा शल्यलक्षण किया है । आहरणोपाय-विशेषकर स्वस्तिक, सदश और तालयन्त्र का कार्य है किन्तु अन्य कार्य भी यन्त्रों के होते हैं । १ --- दर्शन कार्य - जैसे कण्टशल्यावलोकन, योनित्रणेक्षणा दि । निम्न यन्त्र रोग या शल्य - दर्शनार्थ है-- Laryngoscope, Pharyngoscop, Gorethroscope, Cystoscope, Auroscope, | Proctoscope, Sigmoidoscope, Vaginal speculum, Rectal speonlum, Nasal Speonulum, इत्यादि । २ - क्रियासौकर्य में | स्पेकुलम तथा डायरेक्टर्स । ३ - विशोधनकार्य - जैसे मूत्रमार्ग -शोधक कैथेटर. साउण्ड, स्पून, स्कूप डायलेटर्स आदि । तानि पद्मकाराणि तद्यथा - स्वस्तिकयन्त्राणि, | संदेशयन्त्राणि, तालयन्त्राणि, नाडीयन्त्राणि, शला-कायन्त्राणि, उपयन्त्राणि चेति ॥ ५ ॥

V इन यन्त्रों के आकृतिभेद से ६ प्रकार हैं । जैसे स्वस्तिक | यन्त्र ( Cruci form instruments, सन्दशयन्त्र ( Forceps ), तालयन्त्र ( Scoop or Spoon ), नाडीयन्त्र ( Speculum ), शलाकायन्त्र ( Probes ) और उपयन्त्र ॥ ५ ॥

तत्र चतुर्विंशतिः स्वस्तिकयन्त्राणि, द्वे संदेशयन्त्रे, द्वे एव तालयन्त्रे, विंशतिर्नाड्य, अष्टाविशतिः शलाकाः, पञ्चविंशतिरुपयन्त्राणि ॥ ६ ॥

उनमें से स्वस्तिकयन्त्र २४ चौबीस प्रकार के, सन्देशयन्त्र २ दो प्रकार के, तालयन्त्र भी २ दो ही प्रकार के, नाडीयन्त्र बीस २० प्रकार के शलाकायन्त्र २८ अट्ठाइस प्रकार के और उपयन्त्र २५ पच्चीस प्रकार के होते हैं ॥ ६ ॥

विमर्श - ' अष्टाङ्गहृदय ' में ४ चार प्रकार के सन्दंशयन्त्र, । २३ तेईस प्रकार के नाडीयन्त्र, ३४ चौतीस प्रकार के शलाका-यन्त्र और १ ९ उन्नीस प्रकार के उपयन्त्र माने हैं । तानि प्रायशो लौहानि भवन्ति, तत्प्रतिरूपकारिण वा तदलाभे ॥ ७ ॥

प्रायः करके ये यन्त्र लौह के बनाये जाते हैं किन्तु लौह के अभाव में उसके सदृश पदार्थों के भी बनाये जा सकते हैं ॥ ७ ॥

विमर्श - लौह शब्द से फौलाद या स्टील ही ग्रहण करें नकि, सोना, चांदी आदि । किन्तु लौह ( Iron ) न मिलने

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श्रध्यायः - ७ ] सूत्रस्थानम् । २५ पर सोना, चांदी, तांबा भादि धातु तथा भृङ्ग, लकड़ी और हाथी के दांत का उपयोग हो सकता है । तत्र, नानाप्रकाराणां व्यालानां मृगपक्षिणां मुखैर्मु-खानि यन्त्राणां प्रायशः सदृशानि । तस्मात् तत्सारूप्या दागमादुपदेशादन्ययन्त्रदर्शनाद युक्तितश्च कारयेत् ॥ यन्त्रों की बनावट या सकल ( स्वरूप ) के लिये कहा है कि अनेक प्रकार के हिंसक पशु, मृग और पक्षियों के मुख के समान इनका मुख बनाना चाहिये क्यों कि इन जानवरों के मुख प्रायः यन्त्रों के समान होते हैं । इसलिये उक्त प्रकार के पशु - पक्षियोंके मुख - सादृश्यानुसार, आगम ( शास्त्र ) के प्रमाणानुकूल, अनुभवी वैद्यों के कथनानुसार एवं पूर्वकाल में बने हुये यन्त्रों के समान और युक्तिपूर्वक यन्त्रों का निर्माण करना चाहिये ॥ ८ ॥

समाहितानि यन्त्राणि खरश्लक्ष्णमुखानि च ।

सुढानि रूपाणि सुग्रहाणि च कारयेत् ॥ ६ ॥

मन्त्रों को समाहित ( प्रमाणबद्ध, न अधिक मोटे और न अधिक छोटे ), आवश्यकतानुसार कोई खुरदरे और कोई मुलायम मुख वाले, अत्यन्त मजबूत, सुन्दर और जिन्हें ठीक तरह से हाथ में पकड़ सकें ऐसे बनावें ॥ ९ ॥

तत्र स्वस्तिकयन्त्राणि – अष्टादशाङ्गुलप्रमाणानि, सिंहन्याघ्रवृकतरवृक्षद्वीपिमार्जारशृगालमृगर्वारुकका-ककङ्ककुररचाषभासशशघात्युलूक चिल्लिश्येनगृध्रक्रौन भृङ्गराजाञ्जलिकर्णावभञ्जननन्दिमुखमुखानि, मसूराकृ-तिभिः कोलैरवबद्धानि, मूलेऽङ्कुशवदावृत्तवाराणि, अस्थिविदष्टशल्योद्धरणार्थमुपदिश्यन्ते ॥ १० ॥

स्वस्तिक यन्त्रों को १८ अट्ठारह अडल प्रमाण के लम्बे तथा सिंह, व्याघ्र, भेडिया, तरडु ( चरख ), भालू ( रींछ ), चीता, बिल्ली, गौदड़, हरिण, हरिण के समान पशु ( एर्वारुक ), कौआ, कंक ( बगुला ), कुरर, चास, भास, शशघाति ( खरगोश को मारने वाला ) उल्लू, चिली ( चील ), श्येन ( बाज ), गीध, क्रौच, भृङ्गराज, अञ्जलिकर्ण, अवभञ्जन और नन्दिमुख इन के मुख के समान मुखवाले तथा मसूर के समान कील से सिरे ( दोनों खण्ड के मेल ) पर मुडे हुये एवं मूलभाग में अङ्कुश के समान मोढ़े हुये पकड़ने के स्थान वाले होने चाहियें । ये ‘ स्वस्तिकयन्त्र ' अस्थि में अथवा जहां कहीं भी शल्य हो उसे निकालने के लिये प्रयुक्त होते हैं ॥ १० ॥

विमर्श - स्वस्तिकयन्त्रों को Forceps कह सकते हैं । आज कल मुख्य ' स्वस्तिकयन्त्र, निम्न है— प्राण्यङ्गसाम्यबाले– सिंहमुख Lion Forceps, शशघाति मुख Dental Hawk bill Forceps, मूषिकमुख Mouse teeth Forceps, मकरमुख Crocodile Forceps, श्वमुख Bulldog Volsalls, कार्यानुसार नामवाले— Bone Forceps, Dental Forceps 1

सनिग्रहोऽनिग्रहच संदशौ षोडशाङ्गुलौ भवतः ।

तौत्वङ्मांससिरास्नायुगवशल्योद्धरणार्थमुपदिश्येते । ११ ॥

४ सु ० सनिग्रह ( कीलयुक्त With handle ) और अनिग्रह ( कील रहित ] Without handle ) ऐसे दो प्रकार के सन्देशयन्त्र होते हैं तथा ये १६ सोलह भड्डुल लम्बे होते हैं । इनका उपयोग त्वचा, मांस, सिरा और स्नायु में प्रविष्ट शल्य को निकालने के के लिये होता है ॥ ११ ॥

विमर्श - अष्टाङ्गसंग्रह के " सनिबन्धनो निर्निबन्धनश्च घोड-शाङ्गुली सन्दशौ द्वौ भवत । " इस पाठ की टीका में सनिबन्धन का अर्थ कीलबद्ध किया है । अर्थात् With a catch और निर्निबन्धन का Without a catoh ऐसा अर्थ होता है जिससे Dressing Forceps या V के आकार के Forceps ग्रहण किये जा सकते हैं । अष्टाङ्गहृदय भी ऐसे हो सन्दंश लिखता है । “ कीलबद्ध विमुक्तायौ संदशौ पोडशाङ्गुलो ” वाग्भट ने इन दो के अतिरिक्त तीसरा ६ अद्गुरु का सन्देश ( घढङ्गुलोऽन्यो हरणे सूक्ष्मशल्योपपक्ष्मणाम् ) और चौथा मुचुण्डीसन्दंश ( मुचुण्डी -सूक्ष्मदन्तर्जुमूले रुचकभूषणा । गम्भीरवणमासानामर्मण. शेषितस्य च ) माना है । तालयन्त्रे - द्वादशाङ्गुले मत्स्यतालुवदेकतालद्विता -लके, कर्णनासानाडीशल्यानामाहरणार्थम् ॥ १२ ॥

—'तालयन्त्र ' संख्या में २ दो तथा १२ बारह अड्डुल के होते हैं तथा वे मत्स्य के तालु के समान एक ताल और द्विताल युक्त होते हैं । इनका उपयोग कान, नासा और नाड़ी के शल्यों को निकालने में होता है ॥ १२ ॥

विमर्श - ताल शब्द का सीधा अर्थ निम्न मध्यप्रदेश है तथा मन्दिरों में बजाने के कांस के ताल और हस्ततल भी इसके अर्थ हैं । इस समय इन्हें Scoop या Spoon के रूप में ग्रहण करना चाहिये । एक ताल । Single Scoop तथा द्वितालको Double Scoop कहते हैं । नाडीयन्त्राणि - अप्यनेकप्रकाराणि, अनेकप्रयोजना-नि, एकतोमुखानि, उभयतोमुखानि च । तानि स्रोतो-गतशल्योद्धरणार्थ, रोगदर्शनार्थम्, आचूषणार्थ, क्रिया-सौकर्य्यार्थनेति । तानि स्रोतोद्वारपरिणाहानि यथा-योगदीर्घाणि च ॥ १३ ॥

? नाडीयन्त्र भी अनेक प्रकार के होते है तथा अनेक कार्यो में प्रयुक्त होते हैं । किसी के एक तरफ मुख होता है तथा किसी के दोनों तरफ मुख होता है । नाडीयन्त्रों का प्रयोग स्रोतोगत शल्य को निकालने के लिये, रोगों को देखने के लिये, अर्थात् रोगों की परीक्षार्थ, कुछ नाडीयन्त्रों का उपयोग दूषित रक्त तथा पूय का चूषण करने के लिये एवं अर्श आदि रोगों में क्षारपातनादि क्रिया की सुगमता के लिये होता है । इन नाडी-यन्त्रों की मोटाई स्रोतोद्वार के समान तथा लम्वाई आवश्य • कतानुसार होती है ॥ १३ ॥

विमर्श - नलिका की भांति अन्दर से पोले तथा एक या दोनों तरफ जिनके मुख हो उन्हें नाडीयन्त्र ( Speculum and । Scope ) कहते है । " नाडीवान्त सुधिराणि यन्त्राणि नाडीयन्त्राणि ” रोगदर्शन के लिये Speculum प्रयुक्त होते है जैसे Nasal Spe. culum, Earspeonlum, Rectal Speonlam, Vaginal SpeonIum, कुछ रोगदर्शक नाडीयन्त्र में प्रकाश का प्रबन्ध होता है