श्रीगणेशाय नमः।

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी — पृष्ठ 1–10

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1–10

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॥ श्रीहरिः ॥ 135 महर्षि पतञ्जलिकृत योग - दर्शन हिन्दी - व्याख्यासहित ॐ योगेश्वर योगीश्वर हिरण्यग प्रेमयोग राजधान भक्तियोग कुंडलिनी योग सांख्ययोग मंत्रयोग कर्मयोग हठयोग गीताप्रेस गोरखपुर गीताप्रेस, गोरखपुर | GITA PRESS, GORAKHPUR [ SINCE 1923 ] ] ||

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135 ॐ पातञ्जलयोगदर्शन ( साधारण हिंदी - व्याख्यासहित ) त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ टीकाकार - हरिकृष्णदास गोयन्दका

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सं ० २०७४ अड़तालीसवाँ पुनर्मुद्रण ५,००० कुल मुद्रण ४,४८,२५० * मूल्य – I २० ( बीस रुपये ) प्रकाशक एवं मुद्रक— गीताप्रेस, गोरखपुर – २७३००५ ( गोबिन्दभवन - कार्यालय, कोलकाता का संस्थान ) फोन: ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५०, २३३३०३० web: gitapress.org e - mail: booksales@gitapress.org गीताप्रेस प्रकाशन gitapressbookshop.in से online खरीदें ।

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ प्रथम संस्करणका निवेदन

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम् ।

यत्कृपा महं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥

योगदर्शन एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण और साधकोंके लिये परम उपयोगी शास्त्र है । इसमें अन्य दर्शनोंकी भाँति खण्डन- मण्डनके लिये युक्तिवादका अवलम्बन न करके सरलतापूर्वक बहुत ही कम शब्दों में अपने सिद्धान्तका निरूपण किया गया है । इस ग्रन्थपर अबतक संस्कृत, हिंदी और अन्यान्य भाषाओं में बहुत भाष्य और टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं । भोजवृत्ति और व्यासभाष्यके अनुवाद भी हिंदी - भाषामें कई स्थानोंसे प्रकाशित हो चुके हैं । इसके सिवा ' पातञ्जलयोग-प्रदीप ' नामक ग्रन्थ स्वामी ओमानन्दजीका लिखा हुआ भी प्रकाशित हो चुका है, इसमें व्यासभाष्य और भोजवृत्तिके सिवा दूसरे - दूसरे योगविषयक शास्त्रोंके भी बहुत - से प्रमाण संग्रह करके एवं उपनिषद् और श्रीमद्भगवद्गीतादि सद्ग्रन्थोंके तथा दूसरे दर्शनोंके साथ भी समन्वय करके ग्रन्थको बहुत ही उपयोगी बनाया गया है । परंतु ग्रन्थका विस्तार अधिक है और मूल्य अधिक होनेके कारण सर्वसाधारणको सुलभ भी नहीं है । इन सब कारणोंको विचारकर पूज्यपाद भाईजी तथा श्रीजयदयालजीकी आज्ञासे मैंने इसपर यह ' साधारण हिंदी - भाषाटीका ' लिखनी आरम्भ की थी । टीका थोड़े ही दिनोंमें लिखी जा चुकी थी, परंतु उसी समय ' कल्याण ' के ' उपनिषदङ्क ' का निकालना निश्चित हो गया; अतः ईशावास्योपनिषद् से लेकर श्वेताश्वतरोपनिषद्तक नौ उपनिषदोंकी टीका लिखनेका भार मुझपर आ पड़ा । इस कारण योगदर्शनकी टीकाका संशोधनकार्य नहीं हो सका एवं प्रेसमें छापनेके लिये अवकाश नहीं रहा । इसके सिवा और भी व्यापार - सम्बन्धी काम हो गये, अतः प्रकाशनकार्यमें विलम्ब हुआ । इस समय सरकारका कागजोंपरसे कन्ट्रोल उठ जानेसे एवं प्रेसमें भी छपाईके लिये कुछ अवकाश मिल जानेसे यह टीका प्रकाशित की जा रही है । यह तो पाठकगण जानते ही होंगे कि तो विद्वान् हूँ और न अनुभवी ही । अतः योगदर्शन - जैसे गम्भीर शास्त्रपर टीका लिखना मेरे जैसे अल्पज्ञ

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( ४ ) मनुष्यके लिये सर्वथा अनधिकार चेष्टा है । तथापि मैंने इसपर अपने और मित्रोंके संतोषके लिये जैसा कुछ समझमें आया, वैसे लिखनेकी धृष्टता की है । इसके लिये अनुभवी विद्वान् सज्जनोंसे सानुनय प्रार्थना है कि इस टीकामें जहाँ जो त्रुटियाँ रह गयी हों, उनकी सूचना देनेकी कृपा करें, ताकि अगले संस्करणमें आवश्यक सुधार किया जा सके । समाधिपाद इस ग्रन्थके पहले पादमें योगके लक्षण, स्वरूप और उसकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन करते हुए चित्तकी वृत्तियोंके पाँच भेद और उनके लक्षण बतलाये गये हैं । वहाँ सूत्रकारने निद्राको भी चित्तकी वृत्तिविशेषके अन्तर्गत माना है ( योग ० १ । १० ), अन्य दर्शनकारोंकी भाँति इनकी मान्यतामें निद्रा वृत्तियोंका अभावरूप अवस्थाविशेष नहीं है । तथा विपर्ययवृत्तिका लक्षण करते समय उसे मिथ्याज्ञान बताया है । अतः साधारण तौरपर यही समझमें आता है कि दूसरे पादमें ' अविद्या ' के नामसे जिस प्रधान क्लेशका वर्णन किया गया है ( योग ० २।५ ), वह और चित्तकी विपर्ययवृत्ति— । दोनों एक ही हैं; परंतु गम्भीरतापूर्वक विचार करनेपर यह बात ठीक नहीं मालूम होती । ऐसा माननेसे जो - जो आपत्तियाँ आती हैं, उनका दिग्दर्शन सूत्रोंकी टीकामें कराया गया है ( देखिये योग ० १ । ८; २ । ३, ५ की टीका ) । द्रष्टा और दर्शनकी एकतारूप अस्मिता - क्लेशके कारणका नाम ' अविद्या ' है ( योग ० २ । २४ ), वह अस्मिता चित्तकी कारण मानी गयी है ( योग ० १ । ४७; ४ । ४ ) । इस परिस्थितिमें अस्मिताके कार्यरूप चित्तकी वृत्ति अविद्या कैसे हो सकती है जो कि - अस्मिताकी भी कारणरूपा है, यह विचारणीय विषय है । इस पादके सत्रहवें और अठारहवें सूत्रोंमें समाधिके लक्षणोंका वर्णन बहुत ही संक्षेपमें किया गया है । उसके बाद इकतालीसवेंसे लेकर इस पादकी समाप्तितक इसी विषयका कुछ विस्तारसे पुनः वर्णन किया गया है, परन्तु विषय इतना गम्भीर है कि समाधिकी वैसी स्थिति प्राप्त कर लेनेके पहले उसका ठीक - ठीक भाव समझ लेना बहुत ही कठिन है । मैंने अपनी साधारण बुद्धि अनुसार उन सूत्रों की टीकामें विषयको समझानेकी चेष्टा की है, किंतु यह नहीं कहा जा सकता कि इतनेसे ही पाठकोंको संतोष हो जायगा; क्योंकि सूत्रकारने आनन्दानुगत और अस्मितानुगत समाधिका स्वरूप यहाँ स्पष्ट शब्दोंमें नहीं बताया । इसी प्रकार ग्रहण और ग्रहीताविषयक समाधिका विवेचन भी स्पष्ट शब्दोंमें नहीं किया; अतः विषय बहुत ही जटिल हो गया है । यही कारण

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( ५ ) है कि बड़े - बड़े टीकाकारोंका सम्प्रज्ञातसमाधिके स्वरूप - सम्बन्धी विवेचन करनेमें मतभेद हो गया है, किसीके भी निर्णयसे पूरा संतोष नहीं होता । मैंने यथासाध्य पूर्वापरके सम्बन्धकी संगति बैठाकर विषयको सरल बनानेकी चेष्टा तो की है, तथापि पूरी बात तो किसी अनुभवी महापुरुषके कथनानुसार श्रद्धापूर्वक अभ्यास करनेसे वैसी स्थिति प्राप्त होनेपर ही समझमें आ सकती है और तभी पूरा संतोष हो सकता है, यह मेरी धारणा है । प्रधानतया योगके तीन भेद माने गये हैं - एक सविकल्प, दूसरा निर्विकल्प और तीसरा निर्बीज । इस पादमें निर्बीज समाधिका उपाय प्रधानतया पर - वैराग्यको बताकर ( योग ०१।१८ ) उसके बाद दूसरा सरल उपाय ईश्वरकी शरणागतिको बतलाया है ( योग ०१ । २३ ), श्रद्धालु आस्तिक साधकोंके लिये यह बड़ा ही उपयोगी है । ईश्वरका महत्त्व स्वीकार कर लेनेके कारण इनके सिद्धान्तमें साधारण बद्ध और मुक्त पुरुषोंकी ईश्वरसे भिन्नता तथा अनेकता सिद्ध होती है । योगदर्शनकी तात्त्विक मान्यता प्राय: सांख्यशास्त्रसे मिलती - जुलती है । कई लोग यद्यपि सांख्यशास्त्रको अनीश्वरवादी बतलाते हैं, परंतु सांख्यशास्त्रपर भलीभाँति विचार करनेपर यह कहना ठीक मालूम नहीं होता; क्योंकि सांख्यदर्शनके तीसरे पादके ५६ वें और ५७ वें सूत्रोंमें स्पष्ट ही साधारण पुरुषोंकी अपेक्षा ईश्वरकी विशेषता स्वीकार की गयी है । अतः सांख्य और योगके तात्त्विक विवेचनमें वर्णनशैलीके अतिरिक्त और कोई मतभेद प्रतीत नहीं होता । उपर्युक्त तीन भेदोंमेंसे सम्प्रज्ञातयोगके दो भेद हैं । उनमें जो सविकल्पयोग है, वह तो पूर्वावस्था है, उसमें विवेकज्ञान नहीं होता । दूसरा जो निर्विकल्पयोग है, जिसे निर्विचार समाधि भी कहते हैं; वह जब निर्मल हो जाता है ( योग ० १।४७ ), उस समय उसमें विवेकज्ञान प्रकट होता है, वह विवेकज्ञान पुरुषख्यातितक हो जाता है ( योग ०२ । २८; ३ । ३५ ) जो कि पर - वैराग्यका हेतु है ( योग ०१ । १६ ); क्योंकि प्रकृति और पुरुषके वास्तविक स्वरूपका ज्ञान होनेके साथ ही साधककी समस्त गुणोंमें और उनके कार्यमें आसक्तिका सर्वथा अभाव हो जाता है । तब चित्तमें कोई भी वृत्ति नहीं रहती, यह सर्ववृत्तिनिरोधरूप निर्बीज समाधि है ( योग ०१ । ५१ ) । इसीको असम्प्रज्ञातयोग तथा धर्ममेघ समाधि ( योग ०४।२ ९ ) भी कहते हैं, इसकी विस्तृत व्याख्या यथास्थान की गयी है । निर्बीज समाधि ही योगका अन्तिम लक्ष्य है, इसीसे आत्माकी स्वरूपप्रतिष्ठा या यों कहिये कि कैवल्यस्थिति होती है ( योग ० ४ । ३४ ) ।

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( ६ ) निरोध - अवस्थामें चित्तका या उसके कारणरूप तीनों गुणोंका सर्वथा नाश नहीं होता; किंतु जड - प्रकृति - तत्त्वसे जो चेतनतत्त्वका अविद्याजनित संयोग है, उसका सर्वथा अभाव हो जाता है । साधनपाद इस दूसरे पादमें अविद्यादि पाँच क्लेशोंको समस्त दुःखोंका कारण बताया गया है, क्योंकि इनके रहते हुए मनुष्य जो कुछ कर्म करता है, वे संस्काररूपसे अन्तःकरणमें इकट्ठे होते रहते हैं, उन संस्कारोंके समुदायका नाम ही कर्माशय है । इस कर्माशयके कारणभूत क्लेश जबतक रहते हैं, तबतक जीवको उनका फल भोगनेके लिये नाना प्रकारकी योनियोंमें बार - बार जन्मना और मरना पड़ता है एवं पापकर्मका फल भोगनेके लिये घोर नरकोंकी यातना भी सहन करनी पड़ती है । पुण्यकर्मोंका फल जो अच्छी योनियोंकी और सुखभोगसम्बन्धी सामग्रीकी प्राप्ति है वह भी विवेककी दृष्टिसे दुःख ही है ( योग ०२ । १५ ), अतः समस्त दुःखोंका सर्वथा अत्यन्त अभाव करनेके लिये क्लेशोंका मूलोच्छेद करना परम आवश्यक है । इस पादमें उनके नाशका उपाय निश्चल और निर्मल विवेकज्ञानको ( योग ०२ । २६ ) तथा उस विवेकज्ञानकी प्राप्तिका उपाय योगसम्बन्धी आठ अंगोंके अनुष्ठानको ( योग ०२।२८ ) बताया है । इसलिये साधकको चाहिये कि बताये हुए योगसाधनोंका श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करे । विभूतिपाद इस तीसरे विभूतिपादमें धारणा, ध्यान और समाधि - इन तीनोंका एकत्रित नाम ' संयम ' बतलाकर भिन्न - भिन्न ध्येय पदार्थोंमें संयमका भिन्न - भिन्न फल बतलाया है; उनको योगका महत्त्व, सिद्धि और विभूति भी कहते हैं । इनका वर्णन यहाँ ग्रन्थकारने समस्त ऐश्वर्यमें वैराग्य उत्पन्न करनेके लिये ही किया है । यही कारण है कि इस पादके सैंतीसवें, पचासवें और इक्यावनवेंमें एवं चौथे पादके उनतीसवें सूत्रमें उनको समाधिमें विघ्नरूप बताया है । अतः साधकको भूलकर भी सिद्धियोंके प्रलोभनमें नहीं पड़ना चाहिये । कैवल्यपाद इस चौथे पादमें कैवल्यपाद प्राप्त करनेयोग्य चित्तके स्वरूपका प्रतिपादन किया गया है ( योग ०४ । २६ ) । साथ ही योगदर्शनके सिद्धान्तमें जो - जो शंकाएँ

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( ७ ) हो सकती हैं, उनका समाधान किया गया है । अन्तमें धर्ममेघ - समाधिका वर्णन करके ( योग ०४।२ ९ ) उसका फल क्लेश और कर्मोंका सर्वथा अभाव ( योग ० ४ । ३० ) तथा गुणोंके परिणाम - क्रमकी समाप्ति अर्थात् पुनर्जन्मका अभाव बताया गया है ( योग ०४ । ३२ ) एवं पुरुषको मुक्ति प्रदान करके अपना कर्तव्य पूरा कर चुकनेके कारण गुणोंके कार्यका अपने कारणमें विलीन हो जाना अर्थात् पुरुषसे सर्वथा अलग हो जाना गुणोंकी कैवल्य - स्थिति और उन गुणोंसे सर्वथा अलग होकर अपने रूपमें प्रतिष्ठित हो जाना पुरुषकी कैवल्य- स्थिति बतलाकर ( योग ०४ । ३४ ) ग्रन्थकी समाप्ति की गयी है । विशेष वक्तव्य इस प्रकार इस ग्रन्थमें बहुत ही थोड़े शब्दोंमें आत्मकल्याणके बहुत ही उपयोगी और प्रत्यक्ष उपाय बताये गये हैं ॥ पाठकोंको चाहिये कि ग्रन्थका रहस्य समझनेके लिये उसे आद्योपान्त पढ़कर उसपर विचार करें । जिस किसी विषयका वर्णन प्रकारान्तरसे कई जगह हुआ हो उसके सभी स्थलोंपर दृष्टि डालकर पूर्वापरके विरोधाभासको मिटाकर उसकी संगति बैठावें । जबतक अपने मनमें पूरा संतोष न हो जाय, तबतक उसकी खोज करते रहें । दूसरे टीकाकारोंने उसकी संगति किस प्रकार लगायी है, वर्तमान अनुभवी सज्जनोंका उस विषयपर क्या कहना है और मूलग्रन्थसे सरलतापूर्वक बिना किसी प्रकारकी खींचतानके क्या भाव झलकता है - इन सब बातों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करनेपर कुछ समाधान हो सकता है । जैसे विवेकज्ञानका स्वरूप, उसके अवस्था - भेद और फल आदिका आशय समझना हो तो प्रथम पादके ४८ और ४ ९, द्वितीय पादके २६ से २८, तृतीय पादके ३५, ३६, ४ ९, ५२, ५३ और ५४ तथा चतुर्थ पादके २५, २६ और २ ९ – इन सब सूत्रोंको सम्मुख रखकर उनपर विचार करना चाहिये । यदि अविद्याके स्वरूपका निर्णय करना हो तो प्रथम पादके ८, द्वितीय पादके ३, ४, ५, १२, २४ और २५ तथा चतुर्थ पादके ११, २८ और ३० – इन सब सूत्रोंको सामने रखकर विचार करें । यदि समाधिके स्वरूपको उसके अवान्तर भेदोंसहित भलीभाँति समझना हो तो प्रथम पादके १७ से २२ और ४१ से ५१, तृतीय पादके ३, ९ से १२, ३५, ३७, ४४, ४७, ४ ९ और ५० तथा चतुर्थ पादके १, २ ९, ३०, ३२ और ३४ – इन सब सूत्रोंपर दृष्टिपात करके गम्भीरतापूर्वक भलीभाँति विचार करना चाहिये । इसी प्रकार अन्यान्य प्रसंगोंका

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( ८ ) विवेचन करते समय भी तद्विषयक समस्त सूत्रोंपर ध्यान देना चाहिये । ऐसा करनेसे ग्रन्थका आशय समझनेमें बड़ी सुगमता होती है, यह मेरी अनुमान है । इस ग्रन्थमें पुरुषविशेष ईश्वरका प्रतिपादन करके उसकी शरणागतिको आत्मसाक्षात्कारका कारण बताया है, परंतु उस ईश्वरको जाननेका कोई भिन्न साधन नहीं बताया गया । इससे यह अनुमान किया जा सकता है कि वहाँतक न तो मन - बुद्धि आदि प्राकृत तत्त्वोंकी पहुँच है और न उस प्रकृतिस्थ पुरुषकी ही । वह एक प्रकृतिसे अलग विशुद्ध आत्मतत्त्वसे ही प्रत्यक्ष किया जा सकता है, जैसा कि श्वेताश्वतरोपनिषद् में कहा है—

यदाऽऽत्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत् ।

अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥

( २।१५ ) ‘ जब योगी यहाँ दीपकके सदृश ( प्रकाशमय ) आत्मतत्त्वके द्वारा ब्रह्मतत्त्वको भी भलीभाँति प्रत्यक्ष देख लेता है, उस समय वह उस अजन्मा, निश्चल, समस्त तत्त्वोंसे विशुद्ध परमदेव परमात्माको जानकर सब बन्धनोंसे सदाके लिये छूट जाता है । ' कोई भी सच्चा सम्बन्ध सजातीय तत्त्वसे ही हो सकता है, विजातीयसे नहीं । ईश्वरका सजातीय तत्त्व आत्मा ही है, अतः उसीसे उसका प्रत्यक्ष अनुभव हो सकता है, अन्य जड तत्त्वोंसे नहीं । इस शास्त्रमें प्रकृतिके चौबीस भेद एवं आत्मा और ईश्वर - इस प्रकार कुल छब्बीस तत्त्व माने गये हैं; उनमें प्रकृति तो जड और परिणामशील है अर्थात् निरन्तर परिवर्तन होना उसका धर्म है तथा मुक्त पुरुष और ईश्वर – ये दोनों नित्य, चेतन, स्वप्रकाश, असंग, देशकालातीत, सर्वथा निर्विकार और अपरिणामी हैं । प्रकृतिमें बँधा हुआ पुरुष अल्पज्ञ, सुख - दुःखोंका भोक्ता, अच्छी - बुरी योनियोंमें जन्म लेनेवाला और देशकालातीत होते हुए भी एक देशी - सा माना गया है । इसके सिवा योगशास्त्रसे वर्णित साधनोंका प्रायः उपनिषद्, गीता, भागवत आदि सभी धर्मग्रन्थ समर्थन करते हैं । अतः प्रत्येक साधकको इस ग्रन्थमें बताये हुए साधनोंका श्रद्धापूर्वक सेवन करना चाहिये । विनीत – हरिकृष्णदास गोयन्दका

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ॐ श्रीपरमात्मने नमः पातञ्जलयोगदर्शनके प्रधान विषयोंकी सूची समाधिपाद – १ सूत्र विषय पृष्ठ १–४ ग्रन्थके आरम्भकी प्रतिज्ञा, योगके लक्षण और उसकी आवश्यकताका प्रतिपादन ११-१२ ५ - ११ चित्तकी वृत्तियोंके पाँच भेद और उनके लक्षण १२ – ८८ १२–१६ अभ्यास और वैराग्यका प्रकरण १८ – २० १७ – २२ समाधिका विषय २१–२५ २३ - २ ९ ईश्वर - प्रणिधान और उसके फलका कथन... २५- २८ ३०-४० चित्तके विक्षेपोंका, उनके नाशका और मनकी स्थितिके लिये भिन्न - भिन्न उपायोंका वर्णन ३८-३४ । ४१ – ५१ समाधिके फलसहित अवान्तर भेदोंका वर्णन... ३४–४२ १-२ ३ - ९ १० - १७ १८ – २२ २३ – २७ साधनपाद - २ क्रियायोगके स्वरूपका और फलका निरूपण अविद्यादि पाँच क्लेशोंका वर्णन क्लेशोंके नाशका उपाय और उसकी आवश्यकताका प्रतिपादन दृश्य और द्रष्टाके स्वरूपका तथा दृश्यकी सार्थकताका कथन प्रकृति - पुरुषके अविद्याकृत संयोगका स्वरूप ४३-४४ | ४४-४९ ५०-५५ ५५-५९ और उसके नाशके उपायभूत अविचल विवेक-ज्ञानका निरूपण... ५ ९ -६२ २८–५५ विवेकज्ञानकी प्राप्तिके लिये अष्टांगयोगके अनुष्ठानकी आवश्यकता, आठों अंगोंके नाम तथा उनमेंसे पाँच बाह्य अंगोंके लक्षण और उनके विभिन्न अवान्तर फलोंका वर्णन ६२ - ७८