श्रीगणेशाय नमः।

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी — पृष्ठ 11–20

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20

पृष्ठ 11

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी, पृष्ठ 11 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( १० ) विषय पृष्ठ विभूतिपाद – ३ धारणा, ध्यान और समाधि - इन तीनों अंगों के स्वरूपका प्रतिपादन ७ ९ -८० निर्बीज - समाधिके बहिरंग साधनरूप संयमका निरूपण ८० – ८२ चित्तके परिणामोंका विषय ८२–८४ प्रकृतिजनित समस्त पदार्थोंके परिणामका निरूपण... ८४-८९ । फलसहित भिन्न - भिन्न संयमोंका वर्णन विवेकज्ञानका और उसके परम फलस्वरूप कैवल्यका निरूपण कैवल्यपाद- –४ सिद्धियोंकी प्राप्तिके पाँच हेतुओंका तथा जात्यन्तर परिणामका विषय ध्यानजनित परिणामका संस्कारशून्यता ( निराशयता ) - का प्रतिपादन और योगीके कर्मोंकी महिमा साधारण मनुष्योंकी कर्मफल- प्राप्तिके प्रकारका वर्णन अपने सिद्धान्तका युक्तिपूर्ण प्रतिपादन विवेकज्ञानका विषय और धर्ममेघ समाधि तथा कैवल्य - अवस्थाका निरूपण ८ ९ –१० ९ १–११४ ... ११५ - ११८ ... ११८ – ११ ९ ... ११ ९ – १२२ ... १२२ – १३० ... १३० - १३५

पृष्ठ 12

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी, पृष्ठ 12 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ पातञ्जलयोगदर्शन साधारण हिंदी - भाषाटीकासहित समाधिपाद – १ अथ योगानुशासनम् ॥ १ ॥

अथ = अब; योगानुशासनम् = परम्परागत योगविषयक शास्त्र ( आरम्भ करते हैं ) । व्याख्या - इस सूत्रमें महर्षि पतंजलिने योगके साथ अनुशासन पदका प्रयोग करके योगशिक्षाकी अनादिता सूचित की है और अथ शब्दसे उसके आरम्भ करनेकी प्रतिज्ञा करके योगसाधनाकी कर्तव्यता सूचित की है ॥१ ॥

सम्बन्ध — इस प्रकारके योगशास्त्रके वर्णनकी प्रतिज्ञा करके अब योगके सामान्य लक्षण बतलाते हैं-योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ २ ॥

चित्तवृत्तिनिरोधः - चित्तकी वृत्तियोंका निरोध ( सर्वथा रुक जाना ); योग: -योग है । व्याख्या – इस ग्रन्थमें प्रधानतासे चित्तकी वृत्तियोंके निरोधको ही ' योग ' नामसे कहा गया है ॥२ ॥

सम्बन्ध — योग शब्दकी परिभाषा करके अब उसका सर्वोपरि फल बतलाते हैं-तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ ३ ॥

तदा = उस समय; द्रष्टु: - द्रष्टाकी; स्वरूपे = अपने रूपमें; अवस्थानम् = स्थिति हो जाती है ।

पृष्ठ 13

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी, पृष्ठ 13 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१२ पातञ्जलयोगदर्शन व्याख्या — जब चित्तकी वृत्तियोंका निरोध हो जाता है, उस समय द्रष्टा ( आत्मा ) - की अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है; अर्थात् वह कैवल्य- अवस्थाको प्राप्त हो जाता है ( योग ० ४ । ३४ ) ॥ ३ ॥

सम्बन्ध - क्या चित्तवृत्तियोंका निरोध होनेके पहले द्रष्टा अपने स्वरूपमें स्थित नहीं रहता? - इसपर कहते हैं-वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥४ ॥

इतरत्र = दूसरे समयमें ( द्रष्टाका ); वृत्तिसारूप्यम् = वृत्तिके सदृश स्वरूप होता है । व्याख्या — जबतक योग - साधनोंके द्वारा चित्तकी वृत्तियोंका निरोध नहीं हो जाता, तबतक द्रष्टा अपने चित्तकी वृत्तिके ही अनुरूप अपना

स्वरूप समझता रहता है, उसे अपने वास्तविक स्वरूपका ज्ञान नहीं होता ।

अतः चित्तवृत्तिनिरोधरूप योग अवश्य कर्तव्य है ॥४ ॥

सम्बन्ध - चित्तकी वृत्तियाँ असंख्य होती हैं, अतः उनको पाँच श्रेणियोंमें बाँटकर सूत्रकार उनका स्वरूप बतलाते हैं-वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ॥ ५ ॥

( उपर्युक्त ) क्लिष्टाक्लिष्टाः = - क्लिष्ट और अक्लिष्ट ( भेदोंवाली ); वृत्तयः = वृत्तियाँ; पञ्चतय्यः = पाँच प्रकारकी ( होती हैं ) । व्याख्या - ये चित्तकी वृत्तियाँ आगे वर्णन किये जानेवाले लक्षणोंके अनुसार पाँच प्रकारकी होती हैं तथा हर प्रकारकी वृत्तिके दो भेद होते हैं । एक तो क्लिष्ट यानी अविद्यादि क्लेशोंको पुष्ट करनेवाली और योगसाधनमें विघ्नरूप होती हैं तथा दूसरी अक्लिष्ट यानी क्लेशोंको क्षय करनेवाली और योगसाधनमें सहायक होती हैं । साधकको चाहिये कि इस रहस्यको भलीभाँति समझकर पहले अक्लिष्ट वृत्तियोंसे क्लिष्ट वृत्तियोंको हटावे, फिर उन अक्लिष्ट वृत्तियोंका भी निरोध करके योग सिद्ध करे ॥५ ॥

सम्बन्ध — उक्त पाँच प्रकारकी वृत्तियोंके लक्षणोंका वर्णन करनेके लिये पहले उनके नाम बतलाते हैं-

पृष्ठ 14

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी, पृष्ठ 14 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

समाधिपाद – १ १३ प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः ॥ ६ ॥

प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः = ( १ ) प्रमाण, ( २ ) विपर्यय, ( ३ ) विकल्प, ( ४ ) निद्रा, ( ५ ) स्मृति - ये पाँच हैं । व्याख्या – इन पाँचोंके स्वरूपका वर्णन स्वयं सूत्रकारने अगले सूत्रोंमें किया है, अतः यहाँ उनकी व्याख्या नहीं की गयी है ॥६ ॥

सम्बन्ध — उपर्युक्त पाँच प्रकारकी वृत्तियोंमेंसे प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाये जाते हैं-प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥७ ॥

प्रत्यक्षानुमानागमाः: = प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम - ( ये तीन ), प्रमाणानि प्रमाण हैं । व्याख्या– प्रमाणवृत्ति तीन प्रकारकी होती है; उसको इस प्रकार समझना चाहिये— ( १ ) प्रत्यक्ष - प्रमाण - बुद्धि, मन और इन्द्रियोंके जाननेमें आनेवाले जितने भी पदार्थ हैं, उनका अन्तःकरण और इन्द्रियोंके साथ बिना किसी व्यवधानके सम्बन्ध होनेसे जो भ्रान्ति तथा संशयरहित ज्ञान होता है, वह प्रत्यक्ष अनुभवसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है । जिन प्रत्यक्ष दर्शनोंसे संसारके पदार्थोंकी क्षणभंगुरताका निश्चय होकर या सब प्रकारसे उनमें दुःखकी प्रतीति होकर ( योग ० २ । १५ ) मनुष्यका सांसारिक पदार्थोंमें वैराग्य हो जाता है, जो चित्तकी वृत्तियोंको रोकनेमें सहायक हैं, जिनसे मनुष्यकी योगसाधनमें श्रद्धा और उत्साह बढ़ते हैं, उनसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति तो अक्लिष्ट है तथा जिन प्रत्यक्ष दर्शनोंसे मनुष्यको सांसारिक पदार्थ नित्य और सुखरूप होते हैं, भोगोंमें आसक्ति हो जाती है, जो वैराग्यके विरोधी भावोंको बढ़ानेवाले हैं, उनसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति क्लिष्ट है । ( २ ) अनुमान -प्रमाण - किसी प्रत्यक्ष दर्शनके सहारे युक्तियोंद्वारा जो अप्रत्यक्ष पदार्थके स्वरूपका ज्ञान होता है, वह अनुमानसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है । जैसे धूमको देखकर अग्निकी विद्यमानताका ज्ञान होना,

पृष्ठ 15

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी, पृष्ठ 15 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४ पातञ्जलयोगदर्शन नदीमें बाढ़ आया देखकर दूर - देशमें वृष्टि होनेका ज्ञान होना - इत्यादि । इनमें भी जिन अनुमानोंसे मनुष्यको संसारके पदार्थोंकी अनित्यता, दुःखरूपता आदि दोषोंका ज्ञान होकर उनमें वैराग्य होता है और योगके साधनोंमें श्रद्धा बढ़ती है, जो आत्मज्ञानमें सहायक हैं, वे सब वृत्तियाँ तो अक्लिष्ट हैं और उनके विपरीत वृत्तियाँ क्लिष्ट हैं । ( ३ ) आगम - प्रमाण – वेद, शास्त्र और आप्त ( यथार्थ वक्ता ) पुरुषोंके वचनको ‘ आगम ' कहते हैं । जो पदार्थ मनुष्यके अन्तःकरण और इन्द्रियोंके प्रत्यक्ष नहीं है एवं जहाँ अनुमानकी भी पहुँच नहीं है, उसके स्वरूपका ज्ञान वेद, शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंसे होता है, वह आगमसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है । जिस आगम- प्रमाणसे मनुष्यका भोगों में वैराग्य होता है ( गीता ५ । २२ ) और योगसाधनोंमें श्रद्धा - उत्साह बढ़ते हैं, वह तो अक्लिष्ट है और जिस आगम- प्रमाणसे भोगोंमें प्रवृत्ति और योग-साधनोंमें अरुचि हो, जैसे स्वर्गलोकके भोगोंकी बड़ाई सुनकर उनमें और उनके साधनरूप सकाम कर्मोंमें आसक्ति और प्रवृत्ति होती है, वह क्लिष्ट है ॥७ ॥

सम्बन्ध - प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाकर अब विपर्ययवृत्तिके लक्षण बतलाते हैं-विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥ ८ ॥

अतद्रूपप्रतिष्ठम् = जो उस वस्तुके स्वरूपमें प्रतिष्ठित नहीं है, ऐसा; मिथ्याज्ञानम् - मिथ्या ज्ञान; विपर्ययः = विपर्यय है । व्याख्या– किसी भी वस्तुके असली स्वरूपको न समझकर उसे दूसरी ही वस्तु समझ लेना - यह विपरीत ज्ञान ही विपर्ययवृत्ति है - जैसे सीपमें चाँदीकी प्रतीति । यह वृत्ति भी यदि भोगोंमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली और योगमार्गमें श्रद्धा - उत्साह बढ़ानेवाली हो तो अक्लिष्ट है, अन्यथा क्लिष्ट है । जिन इन्द्रिय आदिके द्वारा वस्तुओंका यथार्थ ज्ञान होता है, उन्हींसे विपरीत ज्ञान भी होता है । यह मिथ्या ज्ञान भी कभी - कभी भोगों में वैराग्य करनेवाला हो जाता है । जैसे भोग्य पदार्थोंकी क्षणभंगुरताको देखकर,

पृष्ठ 16

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी, पृष्ठ 16 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

समाधिपाद – १ १५ अनुमान करके या सुनकर उनको सर्वथा मिथ्या मान लेना योग-सिद्धान्तके अनुसार विपरीतवृत्ति है; क्योंकि वे परिवर्तनशील होनेपर भी मिथ्या नहीं हैं तथापि यह मान्यता भोगीमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली होनेसे अक्लिष्ट है । कुछ महानुभावोंके मतानुसार विपर्ययवृत्ति और अविद्या - दोनों एक ही हैं, परंतु यह युक्तिसंगत नहीं मालूम होता; क्योंकि अविद्याका नाश तो केवल असम्प्रज्ञातयोगसे ही होता है ( योग ० ४ । २ ९ -३० ) जहाँ प्रमाणवृत्ति भी नहीं रहती । किंतु विपर्ययवृत्तिका नाश तो प्रमाणवृत्तिसे ही हो जाता है । इसके सिवा योगशास्त्रके मतानुसार विपर्यय ज्ञान चित्तकी वृत्ति है, किंतु अविद्या चित्तवृत्ति नहीं मानी गयी है; क्योंकि वह द्रष्टा और दृश्यके स्वरूपकी उपलब्धिमें हेतुभूत संयोगकी भी कारण है ( योग ० २ । २३-२४ ) तथा अस्मिता और राग आदि क्लेशोंकी भी कारण है ( योग ० २।४ ), इसके अतिरिक्त प्रमाणवृत्तिमें विपर्ययवृत्ति नहीं है, परंतु राग - द्वेषादि क्लेशोंका वहाँ भी सद्भाव है, इसलिये भी विपर्ययवृत्ति और अविद्याकी एकता नहीं हो सकती; क्योंकि विपर्ययवृत्ति तो कभी होती है और कभी नहीं होती, किंतु अविद्या तो कैवल्य - अवस्थाकी प्राप्तितक निरन्तर विद्यमान रहती है । उसका नाश होनेपर तो सभी वृत्तियोंका धर्मी स्वयं चित्त भी अपने कारणमें विलीन हो जाता है ( योग ० ४ । ३२ ) । परंतु प्रमाणवृत्तिके समय विपर्ययवृत्तिका अभाव हो जानेपर भी न तो राग-द्वेषोंका नाश होता है तथा न द्रष्टा और दृश्यके संयोगका ही । इसके सिवा प्रमाणवृत्ति क्लिष्ट भी होती है; परंतु जिस यथार्थ ज्ञानसे अविद्याका नाश होता है, वह क्लिष्ट नहीं होता । अतः यही मानना ठीक है कि चित्तका धर्मरूप विपर्ययवृत्ति अन्य पदार्थ है तथा पुरुष और प्रकृतिके संयोगकी कारणरूपा अविद्या उससे सर्वथा भिन्न है ॥८ ॥

सम्बन्ध — अब विकल्पवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं— शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥ ९ ॥

शब्दज्ञानानुपाती = जो ज्ञान शब्दजनित ज्ञानके साथ - साथ होनेवाला

पृष्ठ 17

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी, पृष्ठ 17 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१६ पातञ्जलयोगदर्शन है; ( और ) वस्तुशून्य: - जिसका विषय वास्तवमें नहीं है, वह; विकल्पः = - विकल्प है? व्याख्या — केवल शब्दके आधारपर बिना हुए पदार्थकी कल्पना करनेवाली जो चित्तकी वृत्ति है, वह विकल्पवृत्ति है । यह भी यदि वैराग्यकी वृद्धिमें हेतु, योगसाधनोंमें श्रद्धा और उत्साह बढ़ानेवाली तथा आत्मज्ञानमें सहायक हो तो अक्लिष्ट है, अन्यथा क्लिष्ट है । आगम - प्रमाणजनित वृत्तिसे होनेवाले विशुद्ध संकल्पोंके सिवा सुनी - सुनायी बातोंके आधारपर मनुष्य जो नाना प्रकारके व्यर्थ संकल्प करता रहता है, उन सबको विकल्पवृत्तिके ही अन्तर्गत समझना चाहिये । विपर्ययवृत्तिमें तो विद्यमान वस्तुके स्वरूपका विपरीत ज्ञान होता है और विकल्पवृत्तिमें अविद्यमान वस्तुकी शब्दज्ञानके आधारपर कल्पना होती है, यही विपर्यय और विकल्पका भेद है । जैसे कोई मनुष्य सुनी - सुनायी बातोंके आधारपर अपनी मान्यताके अनुसार भगवान्‌के रूपकी कल्पना करके भगवान्‌का ध्यान करता है, पर जिस स्वरूपका वह ध्यान करता है उसे न तो उसने देखा है, न वेद - शास्त्रसम्मत है और न वैसा कोई भगवान्‌का स्वरूप वास्तवमें है ही, केवल कल्पनामात्र ही है । यह विकल्पवृत्ति मनुष्यको भगवान्‌के चिन्तनमें लगानेवाली होनेसे अक्लिष्ट है; दूसरी जो भोगोंमें प्रवृत्त करनेवाली विकल्पवृत्तियाँ हैं, वे क्लिष्ट हैं । इसी प्रकार सभी वृत्तियों में क्लिष्ट और अक्लिष्टका भेद समझ लेना चाहिये ॥ ९ ॥

सम्बन्ध - अब निद्रावृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं ।

अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥ १० ॥

अभावप्रत्ययालम्बना = अभावके ज्ञानका अवलम्बन ( ग्रहण ) करनेवाली; वृत्तिः = वृत्ति; निद्रा = निद्रा है । व्याख्या - जिस समय मनुष्यको किसी भी विषयका ज्ञान नहीं रहता; केवलमात्र ज्ञानके अभावकी ही प्रतीति रहती है, वह ज्ञानके

पृष्ठ 18

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी, पृष्ठ 18 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

समाधिपाद – १ १७ अभावका ज्ञान जिस चित्तवृत्तिके आश्रित रहता है, वह निद्रावृत्ति है । ' निद्रा भी चित्तकी वृत्तिविशेष है, तभी तो मनुष्य गाढ़ निद्रासे उठकर कहता है कि मुझे आज ऐसी गाढ़ निद्रा आयी जिसमें किसी बातकी कोई खबर नहीं रही । इस स्मृतिवृत्तिसे ही यह सिद्ध होता है कि निद्रा भी एक वृत्ति है, नहीं तो जगनेपर उसकी स्मृति कैसे होती । निद्रा भी क्लिष्ट और अक्लिष्ट दो प्रकारकी होती है । जिस निद्रासे जगनेपर साधकके मन और इन्द्रियोंमें सात्त्विकभाव भर जाता है, आलस्यका नाम - निशान नहीं रहता तथा जो योगसाधनमें उपयोगी और आवश्यक मानी गयी है । ( गीता ६ । १७ ) ', वह अक्लिष्ट है, दूसरे प्रकारकी निद्रा उस अवस्थामें परिश्रमके अभावका बोध कराकर विश्रामजनित सुखमें आसक्ति उत्पन्न करनेवाली होने से क्लिष्ट है ॥ १० ॥

सम्बन्ध - अब स्मृत्तिवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं-अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः ॥ ११ ॥

अनुभूतविषयासम्प्रमोष: - अनुभव किये हुए विषयका न छिपना अर्थात् प्रकट हो जाना; स्मृतिः = स्मृति है । व्याख्या - उपर्युक्त प्रमाण, विपर्यय, विकल्प और निद्रा - इन चार प्रकारकी वृत्तियोंद्वारा अनुभवमें आये हुए विषयोंके जो संस्कार चित्तमें पड़े हैं, उनका पुनः किसी निमित्तको पाकर स्फुरित हो जाना ही स्मृति है । उपर्युक्त चार प्रकारकी वृत्तियोंके सिवा इस स्मृतिवृत्तिसे जो संस्कार चित्तपर पड़ते हैं उनमें भी पुन: स्मृतिवृत्ति उत्पन्न होती है । स्मृतिवृत्ति भी क्लिष्ट और अक्लिष्ट दोनों ही प्रकारकी होती है । जिस स्मरणसे १- दूसरे दर्शनकार निद्राको वृत्ति नहीं मानते, सुषुप्ति - अवस्था मानते हैं; अतः यह लक्ष्य करानेके लिये ' निद्रा भी वृत्ति है ', सूत्रमें ' वृत्ति: ' पदका प्रयोग किया गया है ।

२ - युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार - विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका और सोने तथा जागनेवालेका ही सिद्ध होता है ।

पृष्ठ 19

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी, पृष्ठ 19 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१८ पातञ्जलयोगदर्शन मनुष्यका भोगोंमें वैराग्य होता है तथा जो योगसाधनोंमें श्रद्धा और उत्साह बढ़ानेवाला एवं आत्मज्ञानमें सहायक है, वह तो अक्लिष्ट है और जिससे भोगोंमें राग - द्वेष बढ़ता है, वह क्लिष्ट है । स्वप्नको कोई - कोई स्मृतिवृत्ति मानते हैं, परंतु स्वप्नमें जाग्रत्की भाँति सभी वृत्तियोंका आविर्भाव देखा जाता है; अतः उसका किसी एक वृत्तिमें अन्तर्भाव मानना उचित प्रतीत नहीं होता ॥ ११ ॥

सम्बन्ध— यहाँतक योगकी कर्तव्यता, योगके लक्षण और चित्तवृत्तियोंके लक्षण बतलाये गये; अब उन चित्तवृत्तियोंके निरोधका उपाय बतलाते हैं— अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ १२ ॥

तन्निरोधः = उन ( चित्तवृत्तियों ) का निरोध; अभ्यासवैराग्याभ्याम् = अभ्यास और वैराग्यसे होता है । व्याख्या – चित्तकी वृत्तियोंका सर्वथा निरोध करनेके लिये अभ्यास और वैराग्य — ये दो उपाय हैं । चित्तवृत्तियोंका प्रवाह परम्परागत संस्कारोंके बलसे सांसारिक भोगोंकी ओर चल रहा है । उस प्रवाहको रोकनेका उपाय वैराग्य है और उसे कल्याणमार्गमें ले जानेका उपाय अभ्यास है * ॥१२ ॥

सम्बन्ध— उक्त दोनों उपायोंमेंसे पहले अभ्यासका लक्षण बतलाते हैं— तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ॥ १३ ॥

तत्र = उन दोनोंमेंसे; स्थितौ = ( चित्तकी ) स्थिरताके लिये; यत्नः = जो प्रयत्न करना है, वह; अभ्यासः - अभ्यास है । व्याख्या - जो स्वभावसे ही चंचल है ऐसे मनको किसी एक ध्येयमें स्थिर करनेके लिये बारम्बार चेष्टा करते रहनेका नाम ' अभ्यास ' है । इसके प्रकार शास्त्रोंमें बहुत बतलाये गये हैं; इसी पादके ३२ वें सूत्रसे * गीतामें भी कहा है— अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ( ६।३५ ) ' हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! अभ्यास अर्थात् स्थितिके लिये बारम्बार यत्न करनेसे और वैराग्यसे मन वशमें होता है, इसलिये इसको अवश्य वशमें करना चाहिये ।

पृष्ठ 20

योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी, पृष्ठ 20 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

समाधिपाद – १ १ ९ ३ ९ वेंतक अभ्यासके कुछ भेदोंका वर्णन है; उनमेंसे जिस साधकके लिये जो सुगम हो, जिसमें उसकी स्वाभाविक रुचि और श्रद्धा हो उसके लिये वही ठीक है ॥ १३ ॥

सम्बन्ध — अब अभ्यासके दृढ़ होनेका प्रकार बतलाते हैं-स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः ॥१४ ॥

तु - परंतु; सः = वह ( अभ्यास ); दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितः-बहुत कालतक निरन्तर ( लगातार ) और आदरपूर्वक सांगोपांग सेवन किया जानेपर; दृढभूमि: - = दृढ़ अवस्थावाला होता है । व्याख्या— अपने साधनके अभ्यासको दृढ़ बनानेके लिये साधकको चाहिये कि साधनमें कभी उकतावे नहीं । यह दृढ़ विश्वास रखे कि किया हुआ अभ्यास कभी भी व्यर्थ नहीं हो सकता, अभ्यासके बलसे मनुष्य निःसंदेह अपने लक्ष्यकी प्राप्ति कर लेता है । यह समझकर अभ्यासके लिये कालकी अवधि न रखे, आजीवन अभ्यास करता रहे, साथ ही यह भी ध्यान रखे कि अभ्यासमें व्यवधान ( अन्तर ) न पड़ने पावे, निरन्तर ( लगातार ) अभ्यास चलता रहे तथा अभ्यासमें तुच्छ बुद्धि न करे, उसकी अवहेलना न करे, बल्कि अभ्यासको ही अपने जीवनका आधार बनाकर अत्यन्त आदर और प्रेमपूर्वक उसे सांगोपांग करता रहे । इस प्रकार किया हुआ अभ्यास दृढ़ होता है * ॥१४ ॥

सम्बन्ध — अब वैराग्यके लक्षण आरम्भ करते हुए पहले अपर - वैराग्यके लक्षण बतलाते हैं-दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥ १५ ॥

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य - देखे और सुने हुए विषयोंमें सर्वथा * इस सूत्रका भाव गीतामें इस प्रकार आया है— स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ ( ६ । २३ ) ‘ अर्थात् उस योगका अभ्यास बिना उकताये हुए चित्तसे निष्ठापूर्वक करते रहना चाहिये । '