श्रीगणेशाय नमः।
योग दर्शन गीता प्रेस हिन्दी
Yog Darshan Gita Press Hindi · Gita Press, Gorakhpur · 146 पृष्ठ · 15 खण्ड
विषय सूची
- । श्रीहरिः । 135 महर्षि पतञ्जलिकृत योग - दर्शन हिन्दी - व्याख्यासहित ॐ योगेश्वर योगीश्वर हिरण्यग प्रेमयोग राजधान भक्तियोग कुंडलिनी योग सांख्ययोग मंत्रयोग… 1–10
- ( १० ) विषय पृष्ठ विभूतिपाद – ३ धारणा, ध्यान और समाधि - इन तीनों अंगों के स्वरूपका प्रतिपादन ७ ९ -८० निर्बीज - समाधिके बहिरंग साधनरूप संयमका निरूपण ८० –… 11–20
- २० पातञ्जलयोगदर्शन तृष्णारहित चित्तकी; वशीकारसंज्ञा = जो वशीकार नामक अवस्था है वह; वैराग्यम् = वैराग्य है… 21–30
- ३० पातञ्जलयोगदर्शन सम्बन्ध - इनके साथ - साथ होनेवाले दूसरे विघ्नोंका वर्णन करते हैं— दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः । ३१… 31–40
- ४० पातञ्जलयोगदर्शन उस समय योगीकी बुद्धि अत्यन्त स्वच्छ - निर्मल हो जाती है ( योग ० ३ । ५ ) । ४७ । सम्बन्ध - अतः -ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा । ४८… 41–50
- ५० पातञ्जलयोगदर्शन ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः । १० । ते = वे; सूक्ष्माः = सूक्ष्मावस्थाको प्राप्त ( क्लेश ); प्रतिप्रसवहेयाः = चित्तको अपने कारणमें… 51–60
- ६० पातञ्जलयोगदर्शन सम्बन्ध — अब उक्त संयोगका कारण बतलाते हैं-तस्य हेतुरविद्या । २४ । तस्य = उस संयोगका; हेतुः = कारण; अविद्या अविद्या है… 61–70
- ७० पातञ्जलयोगदर्शन है, उतना ही उसे लाभ मिलता चला जाता है । सबसे पहले अगले सूत्रमें बाह्य शौचका फल बतलाते हैं— शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः । ४०… 71–80
- ८० पातञ्जलयोगदर्शन सम्बन्ध — समाधिका स्वरूप बतलाते हैं-तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः । ३… 81–90
- ९ ० पातञ्जलयोगदर्शन व्याख्या — धर्म - परिणाम, लक्षण - परिणाम और अवस्था - परिणाम -इस प्रकार जिन तीन परिणामोंका पहले वर्णन किया गया है, उन तीनों परिणामोंमें… 91–100
- १०० पातञ्जलयोगदर्शन भविष्य और वर्तमान एवं सूक्ष्म, ढकी हुई और दूर - देशमें स्थित वस्तुएँ प्रत्यक्ष हो जाती हैं… 101–110
- ११० पातञ्जलयोगदर्शन विवेकज्ञान भी कहते हैं ( योग ० ३ । ५४, ४ । २५ ) । इसीको पहले स्वार्थमें संयम करनेसे होनेवाले पुरुषज्ञानके नामसे कहा है ( योग ० ३… 111–120
- १२० पातञ्जलयोगदर्शन फलभोगानुकूल; वासनानाम् = वासनाओंकी; एव = ही; अभिव्यक्ति: = अभिव्यक्ति ( उत्पत्ति ) होती है… 121–130
- १३० पातञ्जलयोगदर्शन अतः यह अपने लिये नहीं है, द्रष्टा पुरुषके लिये है तथा उसीके भोग और अपवर्गका सम्पादन करनेके लिये यह नाना वासनाओंसे चित्रित है… 131–140
- ( १४० ) त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः त्रयमेकत्र संयमः [ द ] द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः द्रष्टृदृश्योपरक्तं… 141–146