श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · ब्रह्मसूत्र

ब्रह्मसूत्र — चतुर्थ अध्याय, चतुर्थ पाद

22 मूल पद्य 21 संस्करणसे मिलाये गये

ये सूत्र ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप की अभिव्यक्ति और उसके जगत से संबंध की सूक्ष्म व्याख्या करते हैं। इनमें इस बात पर विचार किया गया है कि ब्रह्म का प्राकट्य किस प्रकार होता है और वह दृश्य जगत से किस प्रकार भिन्न है। पाठक को यहाँ जीव और ब्रह्म के अभेद तथा जगत के मिथ्यात्व के तार्किक आधार प्राप्त होंगे।

संपद्याविर्भावाधिकरणम्

4.4.1 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १

सूत्र ४.४.१

संपद्याविर्भावः स्वेन शब्दात् ॥ ४.४.१ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 901

पदच्छेद — संपद्य , आविर्भावः , स्वेनशब्दात्

सूत्रार्थ — ( संपद्य ) प्रकाशरूप आत्माका साक्षात्कारकर उस आत्मरूपमें ( आविर्भाव :) विद्वान् विभूत होता है, ( स्वेनशब्दात् ) क्योंकि ' स्वेन रूपेण ' इस श्रुतिमें ' स्व ' शब्द है।

शाङ्करभाष्य

केवलेनैव आत्मना आविर्भवति न धर्मान्तरेणेति कुतः स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते इति स्वशब्दात् अन्यथा हि स्वशब्देन विशेषणमनवक्लृप्तं स्यात्। ननु आत्मीयाभिप्रायः स्वशब्दो भविष्यति न तस्यावचनीयत्वात् येनैव हि केनचिद्रूपेणाभिनिष्पद्यते तस्यैव आत्मीयत्वोपपत्तेः स्वेनेति विशेषणमनर्थकं स्यात् आत्मवचनतायां तु अर्थवत् केवलेनैव आत्मरूपेणाभिनिष्पद्यते न आगन्तुकेनापररूपेणापीति।। कः पुनर्विशेषः पूर्वावस्थासु इह च स्वरूपानपायसाम्ये सतीत्यत आह

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ‘ एवमेवैष सम्प्रसादो ० ' ( इसीप्रकार यह जीव इस शरीर से समुत्थानकर - देहात्मभाव त्यागकर ज्योतिःस्वरूप परब्रह्मका साक्षात्कारकर स्व - आत्मरूपसे आविर्भूत होता है ) ऐसी श्रुति है। उसमें संशय होता है कि क्या देवलोक आदि उपभोग स्थानोंके समान किसी एक आगन्तुक स्वरूपविशेष से अभिनिष्पन्न होता है अथवा आत्ममात्र से? तब क्या प्राप्त होता है?

पूर्वपक्षी -- अन्य स्थानोंके समान किसो एक व्यागन्तुकरूपसे अभिनिष्पन्न होना चाहिए, क्योंकि मोक्ष मी फलरूप से प्रसिद्ध है, ' अभिनिष्पद्यते ' ( अभिनिष्पन्न होता है ) यह उत्पत्तिका पर्यायवाची शब्द है। यदि स्वरूपमात्र से अभि निष्पत्ति हो तो पूर्व अवस्थाओं में भी स्वरूपके अविनाश होनेसे ज्ञात होना चाहिए। इसलिए किसी एक विशेषरूप से अभिनिष्पन्न होता है सिद्धान्ती —- ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - केवल आत्मरूपसे ही आविर्भूत होता है, अन्य धर्मसे नहीं। किससे?

इससे कि ' स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ' ( अपने रूप से अभिनिष्पन्न होता है ) इसमें ' स्व ' शब्द है। अन्यथा विशेषणीभूत ' स्वेन ' स्वशब्द अनुपपन्न होगा। परन्तु आत्मीय अभिप्रायवाला ' स्व ' शब्द होगा? नहीं, क्योंकि यह स्वकीय कहने योग्य नहीं है। जिस किसी रूपसे अभिनिष्पन्न होता है। उसीमें आत्मीयत्वकी उपपत्ति होने से ' स्वेन ' यह विशेषण अनर्थक होगा और आत्मवाची होनेपर तो सार्थक है, इसलिए केवल बात्मरूपसे ही आविर्भूत होता है किसी अन्य आगन्तुकरूपसे नहीं॥ १

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * गत पादमें सगुण ब्रह्मोपासकोंके लिए कार्यं ब्रह्मकी प्राप्ति कही गई। अब उनके लिए ब्रह्मलोक सम्बन्धी ऐश्वयं विशेषका विचार इस पादके उत्तरार्द्धसे किया जायगा।

उससे पूर्व अभीष्ट परविद्यासे प्राप्य निर्विशेष ब्रह्मभावको कहते हैं - ' स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ' इस निर्गुणविद्याके फलबोधक वाक्यमें स्वशब्दके सम्बन्धी आगन्तुकरूपवाची और स्वात्मरूपवाची होनेसे संशय होता है अर्थात् स्वशब्द आत्मीय और आत्माके लिए प्रयुक्त होता देखा जाता है, अतः किसका ग्रहण करना चाहिए?

पूर्वपक्षी - ' मोक्षः, आगन्तुकः, फलत्वात् स्वर्गवत् ' ( मोक्ष आगन्तुक है, क्योंकि फल है जैसे स्वर्ग ) यदि स्वशब्दसे वात्मस्वरूपमात्रकी अमिनिष्पत्ति हो तो पूर्व अवस्थामोंमें अविनष्ट होनेसे उसका सवंदा ज्ञान होना चाहिए, इससे ज्ञान आदि साधन व्यर्थं होंगे, अतः मोक्ष एक आगन्तुक फलविशेष है। पूर्वपक्ष में मोक्ष स्वर्गके समान है, सिद्धांन्त में मोक्ष स्वगंसे विशेष है।

सिद्धान्ती - आत्मसाक्षात्काररूप मोक्ष स्वर्ग आदि साध्यफलके समान उत्पन्न नहीं होता, किन्तु विद्यासे केवल अविद्याकी निवृत्तिमात्र है, आत्मा तो स्वयं नित्य सिद्ध है। जैसे प्रकाश अन्धकारकी निवृत्तिद्वारा वस्तुकी अभिव्यक्तिमें हेतु है। कि ' अभिनिष्पद्यते ' शब्दका अर्थ केवल उत्पत्ति नहीं है आविर्भाव भी है। जैसे सेवालसे आवृत्त जल उसके हटाए जानेपर स्पष्टरूपसे प्रतीत होता है, वैसे अविद्यासे आवृत्त आत्मस्वरूप विद्यासे अविद्या - की निवृत्ति होनेपर स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त अनुभूत होता है॥

१

4.4.2 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २

सूत्र ४.४.२

मुक्तः प्रतिज्ञानात् ॥ ४.४.२ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 902

पदच्छेद — मुक्तः , प्रतिज्ञानात्

सूत्रार्थ — ( मुक्त :) मुक्त पुरुष पूर्ण आनन्दरूपसे अवस्थित होता है, ( प्रतिज्ञानात् ) क्योंकि ' एतं त्वेव ते ' इत्यादि श्रुतिमें सम्पूर्ण अनर्थसे मुक्त आनन्दस्वरूप आत्माकी व्याख्येयरूपसे प्रतिज्ञा की गई है।

शाङ्करभाष्य

योऽत्र अभिनिष्पद्यत इत्युक्तः स सर्वबन्धविनिर्मुक्तः शुद्धेनैव आत्मना अवतिष्ठते पूर्वत्र तुअन्धो भवत्यपि रोदितीव विनाशमेवापीतो भवतिइति च अवस्थात्रयकलुषितेन आत्मना इत्ययं विशेषः। कथं पुनरवगम्यतेमुक्तोऽयमिदानीं भवतीति प्रतिज्ञानादित्याह। तथा हि एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि इति अवस्थात्रयदोषविहीनम् आत्मानम् व्याख्येयत्वेन प्रतिज्ञाय अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः इति च उपन्यस्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः इति च उपसंहरति तथा आख्यायिकोपक्रमेऽपि य आत्मापहतपाप्मा इत्यादि मुक्तात्मविषयमेव प्रतिज्ञानम्। फलत्वप्रसिद्धिरपि मोक्षस्य बन्धनिवृत्तिमात्रापेक्षा न अपूर्वोपजनापेक्षा। यदपि अभिनिष्पद्यत इत्युत्पत्तिपर्यायत्वम् तदपि न अपूर्वावस्थापेक्षम् यथा रोगनिवृत्तौ अरोगोऽभिनिष्पद्यत इति तद्वत्। तस्माददोषः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु स्वरूपका अविनाश समान होनेपर पूर्व अवस्थाओं और इस अवस्था में क्या विशेष है? इसपर कहते हैं -

यहाँ ' अभिनिष्पद्यते ' शब्दसे जो कहा गया है, वह सम्पूर्ण बन्धसे विनिर्मुक्त होकर शुद्ध आत्मरूपसे ही अवस्थित होता है।

पूर्व अवस्थाओं में ' अन्धो भवति ' ( जाग्रदवस्था में वह अन्धा होता है ) ' अपि रोदितीव ० ' ( स्वप्नावस्था में आहत होनेसे अथवा प्रिय वस्तु के विनाशसे मानो रोता है ) ' विनाशमेवापीतो भवति ० ' ( सुषुप्ति में विशेष ज्ञानके न होनेसे मानो विनाशको प्राप्त होता है ) इस प्रकार तीनों अवस्थाओं में कलुषित मात्मरूपसे अवस्थित होता है यह [ ज्ञानसे पूर्व तीन अवस्थाओं ओर इस अवस्थामें ] विशेष है। परन्तु अब यह मुक्त होता है ऐसा कैसे अवगत हो? प्रतिज्ञासे, ऐसा कहते हैं।

क्योंकि ' एतं त्वेव ते ० ' ( मैं तुम्हारे प्रति इस आत्माका पुनः व्याख्यान करूँगा ) इस प्रकार तीनों अवस्थाओं के दोष से रहित आत्माकी व्याख्येयरूपसे प्रतिज्ञा कर ' अशरीरं वाव सन्तं ० ' ( उस शरीरभूत आत्माको प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं करते ) इस प्रकार उपक्रमकर ' स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ० ' ( अपनेरूप से अभिनिष्पन्न होता है वह उत्तम पुरुष है ) ऐसा उपसंहार करते हैं।

इसीप्रकार आख्यायिकाके उपक्रममें भी ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' ( यह आत्मा पाप रहित है ) इत्यादि मुक्त आत्मविषयक ही प्रतिज्ञान है। और मोक्षमें फलत्व सिद्धि मी बन्ध निवृत्तिमात्रकी अपेक्षासे है, अपूर्व उत्पत्ति की अपेक्षासे नहीं है। यद्यपि ' अभिनिष्पद्यते ' यह उत्पत्तिका पर्याय है, तो भी वह पूर्वावस्थाकी अपेक्षासे है। जैसे रोगकी निवृत्ति होनेपर अरोग अभिनिष्पन्न होता है, उसके समान यहाँ भी समझना चाहिए, इससे दोष नहीं है॥ २

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.४.३ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

4.4.3 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ३

सूत्र ४.४.३

आत्मा प्रकरणात् ॥ ४.४.३ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 903

पदच्छेद — आत्मा , प्रकरणात्

सूत्रार्थ — ( आत्मा ) यहाँ आत्माका हो ज्योतिः शब्दसे प्रतिपादन है, ( प्रकरणात् ) क्योंकि ' य आत्मा ' इस प्रकार उसका प्रकरण है।

शाङ्करभाष्य

कथं पुनर्मुक्त इत्युच्यते यावता परं ज्योतिरुपसंपद्य इति कार्यगोचरमेव एनं श्रावयति ज्योतिःशब्दस्य भौतिके ज्योतिषि रूढत्वात् न च अनतिवृत्तो विकारविषयात् कश्चिन्मुक्तो भवितुमर्हति विकारस्य आर्तत्वप्रसिद्धेरिति नैष दोषः यतः आत्मैवात्र ज्योतिःशब्देन आवेद्यते प्रकरणात् य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युः इति प्रकृते परस्मिन्नात्मनि न अकस्माद्भौतिकं ज्योतिः शक्यं ग्रहीतुम् प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रियाप्रसङ्गात् ज्योतिःशब्दस्तु आत्मन्यपि दृश्यते तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिः इति। प्रपञ्चितं च एतत् ज्योतिर्दर्शनात् इत्यत्र।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु ' परं ज्योतिरुपसंपद्य ' ० ( पर ज्योतिको प्राप्तकर स्वात्मरूपसे व्यवस्थित होता है ) यह श्रुति इसे कार्य विषयक श्रवण कराती है, तो मुक्त है, पुनः ऐसा क्यों कहा जाता है? क्योंकि ज्योतिः शब्द मौतिक ज्योतिमें रूढ है। कार्यविषयका अनतिक्रमणकर कोई मुक्त नहीं हो सकता। कारण कि विकार दुःखरूप प्रसिद्ध है। यह दोष नहीं है, क्योंकि यहाँ आत्मा हो ज्योतिः शब्दसे कहा जाता है, क्योंकि उसका प्रकरण है, ' य आत्मा ० ' ( यह आत्मा पाप रहित, जरा रहित और मृत्यु रहित है ) इस प्रकृत परमात्मामें अकस्मात् भौतिक ज्योतिका ग्रहण नहीं किया जा सकता, कारण कि ऐसा होने में प्रकृतहानि और अप्रकृतप्रक्रियाका प्रसङ्ग होगा। ज्योतिः शब्द तो ' तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिः ( उसको देवता लोग ज्योतिके मी ज्योतिरूपसे उपासना करते हैं ) इस प्रकार आत्मामें भी देखा जाता है। इसका ' ज्योतिर्दर्शनात् ' इस सूत्र में विस्तृत विचार किया गया है || ३ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' परं ज्योतिरुपसंपद्य ' इस श्रुतिपर विचार करनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि स्वरूप अभिनिष्पत्तिसे अतिरिक्त ज्योतिको प्राप्त होता है। क्योंकि ' सूर्यो ज्योतिः ' ' अग्निज्योतिः ' इत्यादि मोतिक पदार्थोंमें ज्योतिःशब्द रूढ है सिद्धान्ती - यद्यपि ज्योति शब्द सूर्य आदि भौतिक ज्योतिमें रूढ है तथापि आत्माका प्रकरण है, ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' और ' परं ज्योति ' इस प्रकार प्रकरण और वाक्यसे आत्मा में भी ज्योतिः शब्द प्रयुक्त होता है। यहाँपर ज्योतिः पद तो मुख्यरूप से ब्रह्ममें प्रयुक्त होता है केवल ज्योतिमें नहीं। यदि ज्योतिः शब्दसे सूर्य आदि भौतिक ज्योतिका ग्रहण करें, तो प्रकृत आत्माका परित्याग अप्रकृत भौतिक ज्योतिका ग्रहण प्रसक्त होगा। इसलिए ज्योति : स्वरूप आत्माका साक्षात्कारकर आत्मरूपसे अवस्थित होना ही मुक्त है॥ ३

अविभागेन दृष्टत्वाधिकरणम्

4.4.4 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ४

सूत्र ४.४.४

अविभागेन दृष्टत्वात् ॥ ४.४.४ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 904

पदच्छेद — अविभागेन , दृष्टत्वात्

सूत्रार्थ — ( अविभागेन ) मुक्त पुरुष परब्रह्मसे अविभक्त होकर अवस्थित होता है, ( दृष्टत्वात् ) क्योंकि ' ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति ' इत्यादि श्रुतियोंमें अभेद ही देखा जाता है।

शाङ्करभाष्य

परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते यः स किं परस्मादात्मनः पृथगेव भवति उत अविभागेनैवावतिष्ठत इति वीक्षायाम् स तत्र पर्येति इत्यधिकरणाधिकर्तव्यनिर्देशात् ज्योतिरुपसंपद्य इति च कर्तृकर्मनिर्देशात् भेदेनैवावस्थानमिति यस्य मतिः तं व्युत्पादयति अविभक्त एव परेण आत्मना मुक्तोऽवतिष्ठते कुतः दृष्टत्वात् तथा हि तत्त्वमसि अहं ब्रह्मास्मि यत्र नान्यत्पश्यति न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् इत्येवमादीनि वाक्यान्यविभागेनैव परमात्मानं दर्शयन्ति यथादर्शनमेव च फलं युक्तम् तत्क्रतुन्यायात् यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति। एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम इति च एवमादीनि मुक्तस्वरूपनिरूपणपराणि वाक्यान्यविभागमेव दर्शयन्ति नदीसमुद्रादिनिदर्शनानि च। भेदनिर्देशस्तु अभेदेऽप्युपचर्यते स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि इति आत्मरतिरात्मक्रीडः इति च एवमादिदर्शनात्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जो पर ज्योतिको प्राप्तकर आत्मरूप से अभिनिष्पन्न होता है। क्या वह परमात्मासे पृथक् ही होता है अथवा अविभागसे - अभेदसे हो अवस्थित होता है?

इसप्रकार विचार होनेपर ' स तत्र पर्येति ' ( वह अपने आत्मामें स्थित हुबा सब ओर संचार करता है ) इसमें अधिकरण और अधिकर्तव्य - आधाराधेयभावका निर्देश होने से और ' ज्योतिरुपसंपद्य ' ( ज्योतिको प्राप्तकर ) इसमें कर्ता और कर्मका निर्देश होने से मुक्त पुरुष परमात्मासे भिन्न होकर ही अवस्थित होता है, ऐसी जिसकी बुद्धि हो उसको कहते हैं— मुक्त पुरुष परमात्मासे अविभक्त ही व्यवस्थित होता है, किससे?

इससे कि ऐसा देखा जाता है | जैसे कि ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' ' यत्र नान्यत्पश्यति ' ( जहाँ अन्य नहीं देखता ) ' न तु तद्वितीयमस्ति ' ( उस समय उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं जिसे देखे ) इत्यादि वाक्य अविभागसे ही परमात्माको दिखलाते हैं। और दर्शनके अनुसार ही तत्क्रतुन्यायसे फल युक्त है। ' यथोदकं शुद्धे ०, ' ( जैसे शुद्ध जलमें डाला हुबा शुद्ध जल वैसा ही हो जाता है, वैसे ही हे गौतम!

विज्ञानी मुनिका आत्मा भी हो जाता है ) इत्यादि मुक्ति स्वरूप निरूपण परक वाक्य और नदी, समुद्र आदि दृष्टान्त अविभाग ही दिखलाते हैं। भेद निर्देश तो ' स भगवः ० ' ( नारद - हे भगवन्! वह भूमा किसमें प्रतिष्ठित है? सनत्कुमार — अपनी महिमामें ) और ' आत्मरतिरात्मक्रीड : ' ( इस प्रकार जाननेवाला आत्मरति और आत्मक्रीड है ) इत्यादि दर्शनसे अभेदमें भी उपचरित होता है॥ ४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यदि मुक्त पुरुष ब्रह्म से अविभक्त होकर ही अवस्थित है तो ' स तत्र पर्येति ' ' परं ज्योतिरुपसंप ' इत्यादि श्रुतियों में भेदका निर्देश क्यों किया गया है? अभेदमें भी भेदोपचार होता है, जैसे ' पुरुषस्य चैतन्यम् ' ' राहोः शिर ' इत्यादि स्थलोंमें है। अतः औपचारिक भेदनिर्देश वास्तविक अभेदका बाधक नहीं होता। वस्तुतः जीव तो अज्ञानावस्था में भी ब्रह्मस्वरूप है, किन्तु उपाधिसे भिन्न प्रतीत होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि मुक्त पुरुष ब्रह्म अत्यन्त अविभक्त ही

रहता है॥ ४

ब्राह्माधिकरणम्

4.4.5 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ५

सूत्र ४.४.५

ब्राह्मेण जैमिनिर् उपन्यासादिभ्यः ॥ ४.४.५ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 905

पदच्छेद — ब्राह्मण , जैमिनिः , उपन्यासादिभ्यः । व्यवस्थित होता है

सूत्रार्थ — ( ब्राह्मण ) मुक्त पुरुष ब्राह्मधर्मं - सर्वज्ञत्व, सर्वेश्वरत्व स्वरूपसे आदि हेतुओंसे ऐसा ( जैमिनिः ) ऐसा आचार्य जैमिनिका मत है, ( उपन्यासादिभ्यः ) क्योंकि उपन्यास ही अवगत होता है।

शाङ्करभाष्य

स्थितमेतत् स्वेन रूपेण इत्यत्र आत्ममात्ररूपेणाभिनिष्पद्यते न आगन्तुकेनापररूपेणेति। अधुना तु तद्विशेषबुभुत्सायामभिधीयते स्वम् अस्य रूपं ब्राह्मम् अपहतपाप्मत्वादिसत्यसंकल्पत्वावसानं तथा सर्वज्ञत्वं सर्वेश्वरत्वं च तेन स्वरूपेणाभिनिष्पद्यत इति जैमिनिराचार्यो मन्यते कुतः उपन्यासादिभ्यस्तथात्वावगमात् तथा हि य आत्मापहतपाप्मा इत्यादिना सत्यकामः सत्यसंकल्पः इत्येवमन्तेन उपन्यासेन एवमात्मकतामात्मनो बोधयति तथा स तत्र पर्येति जक्षत्क्रीडन्रममाणः इति ऐश्वर्यरूपमावेदयति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति इति च सर्वज्ञः सर्वेश्वरः इत्यादिव्यपदेशाश्च एवमुपपन्ना भविष्यन्तीति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सर्वज्ञत्व, सर्वेश्वरत्व है, उस स्वरूपसे अभिनिष्पन्न होता है, ऐसा जैमिनि आचार्य

मानते हैं। किससे? इससे कि उपन्यास यादि हेतुमसे वैसा ही अवगत होता है। क्योंकि ' य

आत्माऽपहतपाप्मा ' इत्यादिसे लेकर और ' सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः ' इत्यन्त उपन्याससे आत्माके ऐसे

ही स्वरूपत्वका बोध

स्थित होता है, उस कराता है। इसी प्रकार ' स तत्र पर्येति ० ' ( वह संप्रसाद - जीव अपने आत्मरूपमें अवस्थामें कहीं भक्षण करता, हँसता, रमण करता हुआ विचरण करता है ) इस

प्रकार ऐश्वयंरूपका आवेदन ( सूचना ) करता है। ' तस्य सर्वेषु ० ' ( सब लोकों में उसकी यथेच्छ

गति होती है ) ऐसी श्रुति भी है। ' सर्वज्ञः सर्वेश्वरः ' इत्यादि व्यपदेश भी इस प्रकार माननेपर उपपन्न

होंगे।। ५

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * क्या वह मुक्त पुरुष सर्वज्ञत्व आदि धर्मं युक्त होकर अवस्थित होता

है अथवा धर्म यादि रहित निर्विशेष चिन्मात्ररूपसे अवस्थित होता है, अथवा वस्तुतः चिन्मात्र होनेपर भी अन्य जीवके व्यवहारकी दृष्टिसे कल्पित सर्वज्ञत्व आदि धर्म हैं? इस प्रकार संशय होनेपर ' अधुना ' आदिसे कहते हैं। वह मुक्त पुरुष सर्वज्ञत्व व्यादि युक्त सविशेष ब्रह्मरूपसे अवस्थित होता है। इसमें उपन्यास आदि हेतु विद्यमान हैं। ' सोऽन्वेष्टव्यः ' ( उसका अन्वेषण करना चाहिए ) इत्यादि विधिके लिए ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' यह उपन्यास है। आदि पदसे विधि और व्यपदेशका ग्रहण है। अज्ञात ज्ञापक वाक्यको विधि कहते हैं। ' स तत्र पर्येति ' यह विधि है, और ' सर्वज्ञः सर्वेश्वरः ' यह व्यपदेश है || ५ ||

4.4.6 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ६

सूत्र ४.४.६

चितितन्मात्रेण तदात्मकत्वाद् इत्य् औडुलोमिः ॥ ४.४.६ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 905

पदच्छेद — चितितन्मात्रेण , तदात्मकत्वात् , इति , जोडुलोमि

सूत्रार्थ — ( तदात्मकत्वात् ) जीवके चैतन्यरूप होनेसे ( चितितन्मात्रेण ) मुक्तपुरुष केवल चैतन्यरूपसे अवस्थित होता है, ( इति बोडुलोमिः ) ऐसा मोडुलोमि आचार्य मानते हैं। ' स्वेन रूपेण ' ( आत्मरूपसे अभिनिष्पन्न होता है ) इस श्रुतिमें केवल आत्मरूप से अभिनिष्पन्न होता है किसी अन्य आगन्तुकरूपसे नहीं, ऐसा सिद्ध हुआ। अब तो उसके विशेष जाननेकी इच्छा होनेपर कहते हैं कि इसका अपना ब्राह्मरूप अपहृतपाप्मत्व आदिसे लेकर सत्य

शाङ्करभाष्य

यद्यपि अपहतपाप्मत्वादयो भेदेनैव धर्मा निर्दिश्यन्ते तथापि शब्दविकल्पजा एव एते पाप्मादिनिवृत्तिमात्रं हि तत्र गम्यते चैतन्यमेव तु अस्य आत्मनः स्वरूपमिति तन्मात्रेण स्वरूपेण अभिनिष्पत्तिर्युक्ता तथा च श्रुतिः एवं वा अरेऽयमात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव इत्येवंजातीयका अनुगृहीता भविष्यति सत्यकामत्वादयस्तु यद्यपि वस्तुस्वरूपेणैव धर्मा उच्यन्ते सत्याः कामा अस्येति तथापि उपाधिसंबन्धाधीनत्वात्तेषां न चैतन्यवत् स्वरूपत्वसंभवः अनेकाकारत्वप्रतिषेधात् प्रतिषिद्धं हि ब्रह्मणोऽनेकाकारत्वम् न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गम् इत्यत्र। अत एव च जक्षणादिसंकीर्तनमपि दुःखाभावमात्राभिप्रायं स्तुत्यर्थम् आत्मरतिः इत्यादिवत्। न हि मुख्यान्येव रतिक्रीडामिथुनानि आत्मनिमित्तानि शक्यन्ते वर्णयितुम् द्वितीयविषयत्वात्तेषाम्। तस्मान्निरस्ताशेषप्रपञ्चेन प्रसन्नेन अव्यपदेश्येन बोधात्मना अभिनिष्पद्यत इत्यौडुलोमिराचार्यो मन्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यद्यपि अपहतपाप्मत्व आदि धर्मं भेदसे ही निर्दिष्ट हैं, तो भी वे धर्मं शब्दविकल्पसे ही उत्पन्न होते हैं, क्योंकि उनमें केवल पाप आदिको निवृत्ति ज्ञात होती है। परन्तु चैतन्य ही इस आत्माका स्वरूप है, इसलिए केवल उसी स्वरूपसे अभिनिष्पत्ति युक्त है। इस प्रकार एवं वा अरे ० ' ( याज्ञवल्क्य - हे मैत्रेयी! उसी प्रकार यह आत्मा अन्तर - बाह्य भेदसे शून्य सम्पूर्ण प्रज्ञानघन ही है ) इस प्रकारकी श्रुति अनुगृहीत होगी। परन्तु सत्यकाम है इसका वह सत्यकाम है, इस व्युत्पत्ति से यद्यपि सत्यकामत्व यादि धर्मं वस्तुस्वरूपसे ही कहे जाते हैं, तो भी उपाधि सम्बन्धके अधीन होनेसे उनमें चैतन्यके समान स्वरूपत्व संभव नहीं है, क्योंकि आत्मामें अनेकाकारत्वका प्रतिषेध है। ' न स्थानतोऽपि परस्यो - मय लिङ्गम् ' इस सूत्र में ब्रह्ममें अनेकाकरत्वका प्रतिषेध किया गया है। अतएव मक्षण आदि संकीर्तन मी दुःख अभावमात्र के अभिप्रायसे है और वह आत्मरति आदिके समान स्तुत्यर्थक है। क्योंकि रति, क्रीडा, मिथुन आत्मामें मुख्यरूपसे वर्णन नहीं किए जा सकते, कारण कि वे द्वितीय - अन्य विषयक है। इसलिए समस्त प्रपञ्चसे रहित प्रसन्न मव्यपदेश्य बोधरूपसे अभिनिष्पन्न होता है, ऐसा ओडुलोमि आचार्य मानते हैं॥ ६

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * मुक्तपुरुष ईश्वरके सत्यकामत्व आदि धर्मविशिष्ट होकर अवस्थित होता है, इस प्रकार भेदाभेद अयुक्त है, इस बातको कहने के लिए ' चितितन्मात्रेण ' इत्यादिसे अन्य पूर्वपक्ष कहते हैं।। ६

4.4.7 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ७

सूत्र ४.४.७

एवम् अप्य् उपन्यासात् पूर्वभावाद् अविरोधं बादरायणः ॥ ४.४.७ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 906

पदच्छेद — एवम् अपि , उपन्यासात् पूर्वभावात् , अविरोधम् , बादरायणः

सूत्रार्थ — ( एवमपि ) ऐसा होनेपर भी ( उपन्यासात् ) पूर्वोक्त उपन्यास आदि हेतुओंसे ( पूर्वभावात् ) प्रथम ब्रह्मके सर्वज्ञत्व यादि व्यावहारिक होनेसे मुक्त आत्मा में ( अविरोध : ) विरोध नहीं है, ( बादरायणः ) ऐसा बादरायण आचार्यका मत है।

शाङ्करभाष्य

एवमपि पारमार्थिकचैतन्यमात्रस्वरूपाभ्युपगमेऽपि व्यवहारापेक्षया पूर्वस्यापि उपन्यासादिभ्योऽवगतस्य ब्राह्मस्य ्ैऐश्वर्यरूपस्य अप्रत्याख्यानादविरोधं बादरायण आचार्यो मन्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऐसा होनेपर मी - पारमार्थिक चैतन्यमात्रस्वरूप स्वीकार करनेपर भी व्यवहारको अपेक्षासे उपन्यास आदिसे पूर्व अवगत ब्राह्म ब्रह्म के ऐश्वयंरूपका प्रत्याख्यान न होनेके कारण अविरोध बादरायण आचार्य मानते हैं।। ७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जैमिनि आचार्यने ब्रह्मके सत्यकामत्व आदि धर्मोको पारमार्थिक सत्य कहा है और खोडुलोमि आचार्यने इन धर्मोको औपाधिक कहकर अत्यन्त असत् कहा है, अतः ये दोनों पक्ष अयुक्त हैं, क्योंकि ऐसा माननेपर अद्वैत श्रुति, सर्वज्ञत्व श्रुति और व्यवहारका बाध होता है। यद्यपि परमार्थ में चैतन्यमात्र स्वरूप है, तो भी व्यवहारदृष्टि से सत्यकामत्व, ऐश्वयं आदि सत्य मानने चाहिए, क्योंकि उपन्यास आदि हेतुओंसे सिद्ध होता है। इसलिए परमार्थदृष्टि से और व्यवहारदृष्टिसे दोनों पक्ष युक्त हैं अर्थात् परमार्थदृष्टिसे केवल चैतन्यमात्र स्वरूप है उससे भिन्न सब कल्पित - मिथ्या असत् है, यह मडुलोमि आचार्यका मत युक्त है और व्यवहारदृष्टिसे ब्रह्म के सत्यकामत्व आदि धर्म सत्य हैं, इस प्रकार जैमिनि आचार्यका मत मी युक्त है। इस प्रकार परमार्थदृष्टिसे और व्यवहारदृष्टिस्चे दोनोंमें कोई विरोध नहीं है॥ ७

संकल्पाधिकरणम्

4.4.8 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ८

सूत्र ४.४.८

संकल्पाद् एव तच्छ्रुतेः ॥ ४.४.८ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 907

पदच्छेद — संकल्पात् एव तु तच्छ्रुतेः

सूत्रार्थ — ( संकल्पादेव ) इस विद्वान् के केवल संकल्पसे ही पितर आदि उपस्थित होते हैं, ( तच्छ्रुतेः ) क्योंकि ' संकल्पा देवास्य ' ऐसी श्रुति है।

शाङ्करभाष्य

हार्दविद्यायां श्रूयते स यदि पितृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति इत्यादि। तत्र संशयः किं संकल्प एव केवलः पित्रादिसमुत्थाने हेतुः उत निमित्तान्तरसहित इति। तत्र सत्यपि संकल्पादेव इति श्रवणे लोकवत् निमित्तान्तरापेक्षता युक्ता यथा लोके अस्मदादीनां संकल्पात् गमनादिभ्यश्च हेतुभ्यः पित्रादिसंपत्तिर्भवति एवं मुक्तस्यापि स्यात् एवं दृष्टविपरीतं न कल्पितं भविष्यति संकल्पादेव इति तु राज्ञ इव संकल्पितार्थसिद्धिकरीं साधनान्तरसामग्रीं सुलभामपेक्ष्य योक्ष्यते न च संकल्पमात्रसमुत्थानाः पित्रादयः मनोरथविजृम्भितवत् चञ्चलत्वात् पुष्कलं भोगं समर्पयितुं पर्याप्ताः स्युरिति। एवं प्राप्ते ब्रूमः संकल्पादेव तु केवलात् पित्रादिसमुत्थानमिति कुतः तच्छ्रुतेः संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति इत्यादिका हि श्रुतिर्निमित्तान्तरापेक्षायां पीड्येत निमित्तान्तरमपि तु यदि संकल्पानुविधाय्येव स्यात् भवतु न तु प्रयत्नान्तरसंपाद्यं निमित्तान्तरमिष्यते प्राक्संपत्तेः वन्ध्यसंकल्पत्वप्रसङ्गात् न च श्रुत्यवगम्येऽर्थे लोकवदिति सामान्यतो दृष्टं क्रमते संकल्पबलादेव च एषां यावत्प्रयोजनं स्थैर्योपपत्तिः प्राकृतसंकल्पविलक्षणत्वान्मुक्तसंकल्पस्य।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — हाविद्या में ' स यदि पितृलोककामो ० ' ( वह यदि पितृलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही पितृगण वहाँ समुपस्थित होते हैं ) इत्यादि श्रुति है। उसमें संशय होता है कि क्या केवल संकल्प ही पितृ आदिके समुत्थानमें हेतु है अथवा अन्य निमित्तके साथ संकल्प हेतु है? पूर्वपक्षी - उस श्रुतिमें ' संकल्पसे ही ' इसप्रकार श्रवण होनेपर भी लोकके समान अन्य निमित्तकी अपेक्षा युक्त है।

जैसे लोकमें अस्मद् आदिके संकल्पसे बोर गमन आदि हेतुओंसे पितृ आदिकी प्राप्ति होती है, वैसे मुक्तके लिए भी होनी चाहिए, ऐसा होनेसे दृष्टसे विपरीत कल्पित नहीं होगा। ' संकल्पसे ही ' यह तो राजाके समान संकल्पित अर्थकी सिद्धि करनेवाली अन्य साधन सामग्री की सुलभताकी अपेक्षासे कहा जाता है। और संकल्पमात्रसे समुत्थान होनेवाले पितर आदि मनोरथसे कल्पितके समान चन्चल होने से पुष्कलभोग समर्पण करनेमें समर्थ नहीं होंगे।

सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होने पर हम कहते हैं— केवल संकल्पसे ही पितृ आदिका समुत्थान होता है, किससे? इससे कि उसकी श्रुति है। ' संकल्पादेवास्य ० ' ( उस विद्वान् के संकल्पसे ही पितृगण समुपस्थित होते हैं ) इत्यादि श्रुति अन्य निमित्तकी अपेक्षा होनेपर बाधित हो जायगी। अन्य निमित्त भी यदि संकल्पके अनुविधायो ( अनुगामी ) हो तो भले हो, परन्तु अन्य प्रयत्न साध्य अन्य निमित्त हमें इष्ट नहीं है, क्योंकि अन्य निमित्तकी प्राप्ति के पूर्व संकल्पसे वन्ध्यत्व प्रसंग होगा।

और श्रुति अवगम्य अर्थमें ' लोकके समान ' यह सामान्यतोदृष्ट अनुमान प्रवृत्त नहीं होता। संकल्पबलसे ही इन विद्वानोंका यावत् प्रयोजन स्थिरताको उपपन्न होता है, कारणकि मुक्त पुरुषका संकल्प प्राकृत पुरुषोंके संकल्पसे विलक्षण है || ८ ||

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.४.१२ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

4.4.9 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ९

सूत्र ४.४.९

अत एव चानन्याधिपतिः ॥ ४.४.९ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 908

पदच्छेद — अतः , एव , च , अनन्याधिपतिः

सूत्रार्थ — ( अत एव च ) और अवन्ध्य संकल्पसे ही विद्वान् ( अनन्याधिपतिः ) अनन्याधिपति होता है।

शाङ्करभाष्य

अत एव च अवन्ध्यसंकल्पत्वात् अनन्याधिपतिर्विद्वान्भवति नास्यान्योऽधिपतिर्भवतीत्यर्थः। न हि प्राकृतोऽपि संकल्पयन् अन्यस्वामिकत्वमात्मनः सत्यां गतौ संकल्पयति। श्रुतिश्चैतद्दर्शयति अथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान्कामांस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इसी से - अवन्ध्य संकल्पसे ही विद्वान् अनन्याधिपति होता है, इसका अन्य अधिपतिस्वामी नहीं होता, ऐसा अर्थ है। संकल्प करता हुआ प्राकृत पुरुष भी गति होनेपर अपने ऊपर अन्य स्वामी होनेका संकल्प नहीं करता। ' अथ य ० ' ( जो इस लोकमें आत्माको तथा सत्यकामनाओंको जानकर परलोकमें जाते हैं उनकी समस्त लोकों में यथेच्छ गति होती है ) यह श्रुति भी इसको दिखलाती है॥ ९

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.४.१२ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

अभावाधिकरणम्

4.4.10 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १०

सूत्र ४.४.१०

अभावं बादरिर् आह ह्य् एवम् ॥ ४.४.१० ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.१०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 908

पदच्छेद — अभावम् , बादरि , आह , हि , एवम् |

सूत्रार्थ — ( बादरिः ) बादरि आचार्य मानते हैं कि ( अभावम् ) विद्वान्के शरीरका वहाँ अभाव होता है, ( हि ) क्योंकि ( एवम् ) ' मनसैतान् ' ऐसा श्रुति कहती है।

शाङ्करभाष्य

संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति इत्यतः श्रुतेः मनस्तावत्संकल्पसाधनं सिद्धम्। शरीरेन्द्रियाणि पुनः प्राप्तैश्वर्यस्य विदुषः सन्ति न वा सन्ति इति समीक्ष्यते। तत्र बादरिस्तावदाचार्यः शरीरस्येन्द्रियाणां च अभावं महीयमानस्य विदुषो मन्यते कस्मात् एवं हि आह आम्नायः मनसैतान्कामान्पश्यन्रमते य एते ब्रह्मलोके इति यदि मनसा शरीरेन्द्रियैश्च विहरेत मनसेति विशेषणं न स्यात् तस्मादभावः शरीरेन्द्रियाणां मोक्षे।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ‘ संकल्पदेवास्य ॰ ’ ( उसके संकल्पसे ही पितृगण समुपस्थित होते हैं ) इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है कि मन ही संकल्पका साधन है। प्राप्त ऐश्वयंवाले विद्वान्के शरीर और इन्द्रियाँ होती हैं . अथवा नहीं होती? इस विषयपर विचार किया जाता है। इस परिस्थिति में बादरि आचार्य तो ऐश्वयं आदि महिमाको प्राप्त हुए विद्वानके शरीर, इन्द्रियोंका अभाव मानते हैं। किससे? इससे कि ' मनसैतान् ० ' ( यह आत्मा ब्रह्मलोक में मनसे ही भोगोंको देखता हुआ रमण करता है ) ' य एते ब्रह्मलोके ' ( ये जो ब्रह्मलोक में संकल्पलभ्य भोग हैं ) यह श्रुति ऐसा ही कहती है। यदि मन, शरीर और इन्द्रियोंसे विहार करेगा तो ' मनसा ' ( मनसे ) यह विशेषण नहीं होना चाहिए, इससे मोक्ष में शरीर और इन्द्रियोंका अभाव है॥ १०

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.४.१२ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

4.4.11 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ११

सूत्र ४.४.११

भावं जैमिनिर् विकल्पामननात् ॥ ४.४.११ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.११ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 908

शाङ्करभाष्य

जैमिनिस्त्वाचार्यः मनोवत् शरीरस्यापि सेन्द्रियस्य भावं मुक्तं प्रति मन्यते यतः स एकधा भवति त्रिधा भवति इत्यादिना अनेकधाभावविकल्पमामनन्ति। न हि अनेकविधता विना शरीरभेदेन आञ्जसी स्यात्। यद्यपि निर्गुणायां भूमविद्यायाम् अयमनेकधाभावविकल्पः पठ्यते तथापि विद्यमानमेवेदं सगुणावस्थायाम् ऐश्वर्यं भूमविद्यास्तुतये संकीर्त्यत इत्यतः सगुणविद्याफलभावेन उपतिष्ठत इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पदच्छेद - भावम्, जैमिनिः, विकल्पामननात्।

सूत्रार्थ- ( भावम् ) मनके समान शरीर और इन्द्रयोंका मोक्ष में भाव ( जैमिनिः ) जैभिनि आचार्य मानते हैं, ( विकल्पामननात् ) क्योंकि ' स एकंधा भवति ' इत्यादि श्रुति अनेकधाभावका विकल्प कहती है।

जैमिनि वाचार्य तो मनके समान इन्द्रिय सहित शरीरका भी भाव मुक्त पुरुषके प्रति मानते हैं, क्योंकि ' स एकधा भवति ० ' ( वह एक प्रकारका होता है, तीन प्रकारका होता है ) इत्यादिसे श्रुति अनेक भावका विकल्प कहती है। शरीर भेदके विना अनेक विधता मुख्य संगत नहीं होगी। यद्यपि निर्गुण भूमविद्या में यह अनेकधा भाव विकल्प पढ़ा जाता है, तो भी सगुण अवस्थामें इस विद्यमान ऐश्वयंका भूमविद्याकी स्तुतिके लिए भूमविद्यामें संकीर्तन किया जाता है, इसलिए सगुणविद्यकेि फलरूप से उपस्थित होता है॥ ११

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.४.१२ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

4.4.12 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १२

सूत्र ४.४.१२

द्वादशाहवद् उभयविधं बादरायणोऽतः ॥ ४.४.१२ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.१२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 909

पदच्छेद — द्वादशाहवत् , उभयविधम् , बादरायणः , अतः

सूत्रार्थ — ( बादरायणः ) बादरायणका मत है कि ( अतः ) उभय लिङ्गक श्रुति देखने से ( उभयविधम् ) उभयविधत्व है। ( द्वादशाहवत् ) जैसे द्वादशाह उभयविध होता है।

शाङ्करभाष्य

बादरायणः पुनराचार्यः अत एव उभयलिङ्गश्रुतिदर्शनात् उभयविधत्वं साधु मन्यते यदा सशरीरतां संकल्पयति तदा सशरीरो भवति यदा तु अशरीरतां तदा अशरीर इति सत्यसंकल्पत्वात् संकल्पवैचित्र्याच्च। द्वादशाहवत् यथा द्वादशाहः सत्रम् अहीनश्च भवति उभयलिङ्गश्रुतिदर्शनात्एवमिदमपीति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सिद्धान्ती - कहते हैं- -

परन्तु बादरायण आचार्य इसीसे उम्य लिङ्गकी श्रुति देखनेसे उभयविधत्व उचित मानते हैं। जब उपासक सशरीरताका संकल्प करता है तब सशरीर होता है और जब अशरीरताका संकल्प करता है तब अशरीर होता है, क्योंकि वह सत्यसंकल्प है और संकल्प विचित्र है। द्वादशाहके समान। जैसे द्वादशाह सत्र और महीन होता है, कारण कि उभयलिङ्गक श्रुति देखने में आती है, अतः यह भी इसीप्रकार है।। १२

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * सिद्धान्ती — उपासकका संकल्प सत्य और विलक्षण होता है, अतः संकल्प और असंकल्पके भेदसे सशरीरत्व और अशरीरत्व उपपन्न होते हैं। इसमें द्वादशाह नामक सत्रका उदाहरण देते हैं' द्वाश हमृद्धिकामा उपेयुः ' ( समृद्धिकी कामनावाला द्वादशाह नामक सत्र करे ) ' य एवं विद्वांसः सनमुपयन्ति ' ( जो विद्वान् इसप्रकार सत्रको प्राप्त होते हैं ) ' त भासते ' इसप्रकार आसन और उपयन विधि ज्ञापित बहुकर्तृक सत्र कहलाता है, और उस सत्रको ' द्वादशाहेन प्रजाकामं याजयेत् ' ( प्रजाकी कामनावाला द्वादशाह नामक याग करे ) यहाँ ' यज् ' धातुका विधिमें प्रयोग होनेसे नियत एक कर्ता प्रतीत होता है | अतः द्विरात्र के समान अहीनत्व प्राप्त है 1

। जैसे यहाँ उभय लिङ्गक श्रुतिसे दोनों कार देखे जाते हैं, वैसे सगुण उपासकके लिए शरीर आदिके विषयमें समझना चाहिए॥ १२

4.4.13 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १३

सूत्र ४.४.१३

तन्वभावे सन्ध्यवद् उपपत्तेः ॥ ४.४.१३ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.१३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 910

पदच्छेद — तन्वभावे , सन्ध्यवद् , उपपत्तेः

सूत्रार्थ — ( तन्वभावे ) ब्रह्मलोक में इन्द्रिय युक्त शरीरका अभाव होनेपर भी ( सन्ध्यवद् ) वनके समान मानसिक विषय उपलब्धिमात्र होते हैं, ( उपपत्ते 1 ) क्योंकि ऐसी उपपत्ति होती है

शाङ्करभाष्य

यदा तनोः सेन्द्रियस्य शरीरस्य अभावः तदा यथा संध्ये स्थाने शरीरेन्द्रियविषयेष्वविद्यमानेष्वपि उपलब्धिमात्रा एव पित्रादिकामा भवन्ति एवं मोक्षेऽपि स्युः एवं हि एतदुपपद्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — * यदा तनोः सेन्द्रियस्य शरीरस्याभावस्तदा यथा

संध्ये स्थाने शरीरेन्द्रियविषयेष्व

सूत्रार्थ - ( मावे ) ब्रह्मलोक में इन्द्रिय सहित शरीरके

सद्भावमें ( जाग्रद्वत् ) जाग्रत् के समान पेतर आदि उपलब्ध होते हैं।

जब तनुका - इन्द्रिय सहित शरीरका अभाव होता है, तब जैसे स्वप्नावस्था में शरीर, इन्द्रिय और विषय अविद्यमान होनेपर भी पितृ आदि पदार्थ उपलब्धिमात्र होते हैं, वैसे मोक्ष - ब्रह्मलोक में श्री उपलब्धिमात्र होंगे, इसप्रकार यह उपपन्न होता है॥ १३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * शरीर, इन्द्रियके न होनेपर भी जैसे स्वप्नावस्थामें केवल मनसे पितर आदिका सूक्ष्म उपरोग होता है, वैसे विद्वान्को ब्रह्मलोकमें मानसिक सूक्ष्म उपभोग प्राप्त होता है। ऐसा माननेपर मनसैतान्कामान्पश्यन्रमते ' यह श्रुति भी उपपन्न होती है। यदि सन्ध्ययब्दसे सुषुप्तिका ग्रहण करें . उक्त श्रुति बाधित होगी, क्योंकि सुषुप्ति में मनका अपने कारणमें लय होनेसे किसी प्रकारका मोग उपपन्न नहीं हो सकता। इसलिए सन्ध्य शब्दसे स्वप्नावस्थाका ग्रहण युक्त है॥ १३

4.4.14 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १४

सूत्र ४.४.१४

पपद्यते ॥ ४.४.१४ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.१४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 910

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु शरीरके होनेपर जैसे जाग्रदवस्थामें विद्यमान ही पितर आदि पदार्थ होते हैं, वैसे मुक्त को भी उपपन्न होते हैं॥ १४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यद्यपि ब्रह्मलोक में मुक्त पुरुषके लिए मनसे ही सूक्ष्म भोग उपलब्ध होते हैं, तो भी शरीर

सद्भावमें मुक्त पुरुषको पुष्कल भोगकी सिद्ध होती है, अन्यथा नहीं॥ १४

प्रदीपाधिकरणम्

4.4.15 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १५

सूत्र ४.४.१५

प्रदीपवदावेशस् तथा हि दर्शयति ॥ ४.४.१५ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.१५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 910

पदच्छेद — प्रदीपवत् , आवेश :, तथा , हि , दर्शयति

सूत्रार्थ — विद्वान् के द्वारा निर्मित अनेक शरीरोंमें विद्वान् ( प्रदीपवत् ) प्रदीपके समान आवेशः ) प्रविष्ट होता है, ( हि ) क्योंकि ( तथा ) उसी प्रकार ( दर्शयति ) ' स एकधा भवति ' इत्यादि त्रुतिदिखलाती है।

शाङ्करभाष्य

भावं जैमिनिर्विकल्पामननात् इत्यत्र सशरीरत्वं मुक्तस्योक्तम् तत्र त्रिधाभावादिषु अनेकशरीरसर्गे किं निरात्मकानि शरीराणि दारुयन्त्रवत्सृज्यन्ते किं वा सात्मकान्यस्मदादिशरीरवत् इति भवति वीक्षा।

तत्र च आत्ममनसोः भेदानुपपत्तेः एकेन शरीरेण योगात् इतराणि शरीराणि निरात्मकानि इत्येवं प्राप्ते प्रतिपद्यते प्रदीपवदावेश इति यथा प्रदीप एकः अनेकप्रदीपभावमापद्यते विकारशक्तियोगात् एवमेकोऽपि सन् विद्वान् ऐश्वर्ययोगादनेकभावमापद्य सर्वाणि शरीराण्याविशति कुतः तथा हि दर्शयति शास्त्रमेकस्यानेकभावम् स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा इत्यादि नैतद्दारुयन्त्रोपमाभ्युपगमेऽवकल्पते नापि जीवान्तरावेशे न च निरात्मकानां शरीराणां प्रवृत्तिः संभवति।

यत्तु आत्ममनसोर्भेदानुपपत्तेः अनेकशरीरयोगासंभव इति नैष दोषः एकमनोनुवर्तीनि समनस्कान्येवापराणि शरीराणि सत्यसंकल्पत्वात् स्रक्ष्यति सृष्टेषु च तेषु उपाधिभेदात् आत्मनोऽपि भेदेनाधिष्ठातृत्वं योक्ष्यते एषैव च योगशास्त्रेषु योगिनामनेकशरीरयोगप्रक्रिया।। कथं पुनः मुक्तस्य अनेकशरीरावेशादिलक्षणमैश्वर्यमभ्युपगम्यते यावता तत्केन कं विजानीयात् न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्विजानीयात् सलिल एको द्रष्टाद्वैतो भवति इति च एवंजातीयका श्रुतिः विशेषविज्ञानं वारयति इत्यत उत्तरं पठति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' भावं जैमिनिर्विकल्पामननात् ' इस सूत्र में मुक्त पुरुषको सशरीर कहा गया है। वहाँ त्रिधा-

आदिमें अनेक शरीरको सृष्टिमें दारुयन्त्र के समान क्या निरात्मक शरीर उत्पन्न किए जाते हैं अथवा क्या स्मद् आदि शरीरके समान सात्मक उत्पन्न किए जाते हैं? इसप्रकार विचार होता है। पूर्वपक्षी - उसमें आत्मा और मनके भेदकी अनुपपत्तिसे एक शरीरके साथ योग - सम्बन्ध है, अतः अन्य शरीर निरात्मक हैं। सिद्धान्ती -- ऐसा प्राप्त होनेपर प्रतिपादन करते हैं - ' प्रदीपवदावेश : '।

जैसे एक योगसे भाव प्राप्तकर सब शरीरोंमें प्रवेश करता है, क्योंकि उसी प्रकार ' स एकधा भवति ० ' प्रदीप विकारशक्तिके योगसे अनेक प्रदीपभावको प्राप्त होता है, वैसे विद्वान् एक होता हुआ भी ऐश्वयं ( वह एक रूप होता है, तीन रूप होता है, पञ्चधा, सप्तधा औरं नवघा होता है ) इत्यादि शास्त्र एकका अनेकभाव दिखलाता है। यह दारुयन्त्र उपमाके स्वीकार करनेमें संभव नहीं है और न अन्य जीवके प्रवेशमें भी। और निरात्मक शरीरोंकी प्रवृत्ति भी नहीं हो सकती।

और जो यह कहा गया है कि वात्मा और मनके भेदकी अनुपपत्ति होनेसे अनेक शरीरोंके साथ योग - सम्बन्ध असंभव है। यह दोष नहीं है, क्योंकि वह सत्यसङ्कल्पसे एक मनके अनुवर्ती मन सहित अन्य शरीरोंकी सृष्टि करेगा। उनकी सृष्टि होनेपर उपाधि भेदसे आत्माका भी भेद होनेसे अधिष्ठातृत्व युक्त होगा। योगियोंकी योगशास्त्रोंमें अनेक शरीरके साथ सम्बन्धकी यही प्रक्रिया है।। १५

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * परन्तु उभयलिङ्गः श्रुतिसे जो विद्वान्के अनेक शरीर माने गए हैं, वह व्यर्थ है, क्योंकि उन जड़ शरीरोंमें भोगका असंभव है। इस प्रकार आक्षेप संगति पूर्वपक्षी कहते हैं— मुक्त पुरुष के सत्यसंकल्पसे निर्मित शरीर दारुयन्त्र के समान जड़ हैं, क्योंकि आत्मा और मन एक एक हैं, उनका विभाग नहीं हो सकता। उन शरीरोंमें प्रवेशके लिए अन्य आत्माकी मी उरुपति नहीं हो सकती, क्योंकि कर्म - कर्तृभावका विरोध है। अतः संकल्पित अन्य घरोर जड़ हैं।

सिद्धान्ती L - ' स एकधा ति ' इत्यादि श्रुति के बलसे विद्वानका अनेकधाभाव कहा गया है। इस विषय में योगशास्त्रको सम्मति है - ' निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ' ( योगसूत्र ४१४ ) ( योगियों के योग प्रभाव से उत्पादित शरीर अस्मितामात्र कारणसे - अहंकार पूर्वक संकल्पसे निर्मित मनोंसे युक्त होते हैं ) इसप्रकार योगियोंसे निर्मित अनेक शरीर और मनोंकी प्रवृत्तिमें भेद दिखाई देता है।

इस भेदका कारण - ' प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् ' ( योगसूत्र ४/५ ) ( अनेक मनोंकी प्रवृत्ति भेदमें अनादि एक मन ही प्रयोजक है ) इसलिए योगियोंके योग प्रभावसे नवनिर्मित देहों में अस्मितासे निर्मित्त चित्त होते हैं और अनादि एक चित्त उन सबका नियामक होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि सगुण उपासक सत्यसंकल्पसे अनेक सात्मक शरीरोंका निर्माण कर उनमें प्रविष्ट होता है।। १५

4.4.16 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १६

सूत्र ४.४.१६

स्वाप्ययसंपत्योर् अन्यतरापेक्षम् आविष्कृतं हि ॥ ४.४.१६ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.१६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 912

पदच्छेद — स्वाप्ययसंपत्त्योः , अन्यतरापेक्षम् , आविष्कृतम् , हि

सूत्रार्थ — ( स्वाप्ययसम्पत्त्योः ) सुषुप्ति और मुक्ति में से ( अन्यतरापेक्षम् ) एककी अपेक्षासे विशेषज्ञानका अभाव स्वीकार किया गया है, ( हि ) क्योंकि ( आविष्कृतम् ) संगुण विद्या में शरीर आदिके स्वीकार करनेमें कोई विरोध नहीं है

शाङ्करभाष्य

भावं जैमिनिर्विकल्पामननात् इत्यत्र सशरीरत्वं मुक्तस्योक्तम् तत्र त्रिधाभावादिषु अनेकशरीरसर्गे किं निरात्मकानि शरीराणि दारुयन्त्रवत्सृज्यन्ते किं वा सात्मकान्यस्मदादिशरीरवत् इति भवति वीक्षा।

तत्र च आत्ममनसोः भेदानुपपत्तेः एकेन शरीरेण योगात् इतराणि शरीराणि निरात्मकानि इत्येवं प्राप्ते प्रतिपद्यते प्रदीपवदावेश इति यथा प्रदीप एकः अनेकप्रदीपभावमापद्यते विकारशक्तियोगात् एवमेकोऽपि सन् विद्वान् ऐश्वर्ययोगादनेकभावमापद्य सर्वाणि शरीराण्याविशति कुतः तथा हि दर्शयति शास्त्रमेकस्यानेकभावम् स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा इत्यादि नैतद्दारुयन्त्रोपमाभ्युपगमेऽवकल्पते नापि जीवान्तरावेशे न च निरात्मकानां शरीराणां प्रवृत्तिः संभवति।

यत्तु आत्ममनसोर्भेदानुपपत्तेः अनेकशरीरयोगासंभव इति नैष दोषः एकमनोनुवर्तीनि समनस्कान्येवापराणि शरीराणि सत्यसंकल्पत्वात् स्रक्ष्यति सृष्टेषु च तेषु उपाधिभेदात् आत्मनोऽपि भेदेनाधिष्ठातृत्वं योक्ष्यते एषैव च योगशास्त्रेषु योगिनामनेकशरीरयोगप्रक्रिया।। कथं पुनः मुक्तस्य अनेकशरीरावेशादिलक्षणमैश्वर्यमभ्युपगम्यते यावता तत्केन कं विजानीयात् न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्विजानीयात् सलिल एको द्रष्टाद्वैतो भवति इति च एवंजातीयका श्रुतिः विशेषविज्ञानं वारयति इत्यत उत्तरं पठति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु मुक्त अनेक शरोरोंमें आवेश आदि रूप ऐश्वर्यं कैसे स्वीकार किया जाता है, जब कि ' तत्केन ० ' ( मुक्तावस्था में ज्ञानी किस करणसे किस विषयको जाने ) ' न तु तद्वितीयमस्ति ' ( उस विजानीयात् ' ( बृह ० ४/५/१५ ), ' न तु तद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्विजानीयात् ' ( बृह ० ४।३।३० ) ‘ सलिल एको द्रष्टाऽद्वैतो भवति ' ( ब्रह्मसूत्र ४ | ३ | ३२ ) इति चैवंजातीयका श्रुतिअवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ ही नहीं होता जिसे वह विशेषरूपसे जाने ) ' सलिल एको ' ( सलिल - सा शुद्ध एक द्रष्टा अद्वैत है ) इस प्रकारकी श्रुतियाँ विशेष विज्ञानका वारण करती हैं? इसके विषय में उत्तर कहते हैं-

' स्वाप्ययः ' सुषुप्ति, क्योंकि ' स्वमपीतो भवति ' ० ( यह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है, इसीसे इसे लोग ' स्वपिति ' ( सोता है ) ऐसा कहते हैं ) ऐसी श्रुति है। ' संपत्तिः - कैवल्य, क्योंकि ' ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति ' ( ब्रह्म ही होता हुआ ब्रह्मको प्राप्त होता है ) ऐसी श्रुति है। उन दोनों में से एक अवस्थाकी अपेक्षासे इस विशेषज्ञानके अभावका बोधक वचन है। श्रुति कहींपर सुषुप्ति अवस्थाकी अपेक्षासे [ विशेषज्ञानका अभाव ] कहती है और कहींपर कैवल्य अवस्थाकी अपेक्षासे। यह कैसे अवगत हो? क्योंकि ' एतेभ्यो भूतेभ्यः ० ' ( यह इन सत्य शब्द वाच्य भूतोंसे प्रकट होकर उन्होंके साथ नाशको प्राप्त हो जाता है देहेन्द्रियमावसे मुक्त होनेपर इसकी कोई विशेष संज्ञा नहीं रहती है ) ' यत्रस्वस्य ० ' ( परन्तु जिस ज्ञानावस्था में इसके लिए सब आत्मा ही हो गया है ) ' यत्र सुप्तो ० ' ( जहाँ सोया हुआ यह किसी मोगकी कामना नहीं करता और न कोई स्वप्न ही देखता है ) इत्यादि श्रुतियोंसे उसमें ही उसके प्रकरण के बलसे स्पष्ट किया गया है। जिसमें इस ऐश्वयंका वर्णन किया जाता है वह सगुणविद्याका विप rs ( फल ) स्थान स्वर्ग आदिके समान अन्य अवस्था है, इससे दोष नहीं है॥ १६

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' न तु तद्वितीयमस्ति ' ( परन्तु वह द्वितीय नहीं है ) यहाँ सुषुप्तिको लेकर अन्यका निषेध है, और ' तत्केन कं पश्येत् ' यहाँ मुक्तिको लेकर विशेष विज्ञानका अभाव कहा गया है। इसलिए विशेष ज्ञानके अभावका वचन सुषुप्ति और कैवल्य मुक्ति दोनोंमें से किसी एककी अपेक्षासे कहा गया है। यहाँ मुनि याज्ञवल्क्यने आमासवादको लेकर मैत्रेयीको उपदेश किया है।

इसका रहस्य यह है कि जैसे उदकपूर्ण घटमें चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब पड़ता है और जल सहित घटके नाश होनेपर प्रतिबिम्बका मी नाश हुआ प्रतीत होता है। वस्तुतः उनका नाथ उपाधिके नष्ट होनेपर बिम्बरूपसे अवस्थिति है। वैसे घट स्थानीय पांच भौतिक शरीर और जल स्थानीय अन्तःकरणमें चन्द्रमा स्थानीय ब्रह्मका आभास पड़ता है, वही लोकमें जीव नामसे कहा जाता है।

जब तत्त्वज्ञानसे मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति हो जाती है और भोगसे प्रारब्ध कर्म समाप्त हो जाता है, तब अन्तःकरण सहित शरीरके नाश होने के साथ - साथ आभासका भी नाश हो जाता है। वस्तुतः उसका नाश अपने बिम्बरूप चेतन से अवस्थिति है। इस प्रकार उपाधिके नाश होनेसे प्रतिबिम्बका नाश - सा होता है, इस अभिप्रायसे ' एतेभ्यो भूतेभ्यः ' यह श्रुति है | और ' यत्रत्वस्य ' इस प्रकारकी श्रुतियाँ कैवल्य विषयक हैं, और ' यत्र सुप्तो न कंचन कामं कामयते ' इत्यादि श्रुतियां सुषुप्ति विषयक हैं।

इसलिए सगुणोपासकके लिए ऐश्वर्यं प्राप्तिका वचन दोष रहित है, क्योंकि उसका भिन्न विषय है अर्थात् फलोपभोगके लिए स्वर्ग आदिके समान एक अवस्था विशेष है।। १६

जगद्व्यापाराधिकरणम्

4.4.17 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १७

सूत्र ४.४.१७

जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणाद् असंनिहितत्वाच् च ॥ ४.४.१७ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.१७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 913

पदच्छेद — जगद्व्यापारवम् , प्रकरणात् , असंनिहितत्वाच्च । पदच्छेद– ( जगद्व्यापारवजंम् ) जगत् की उत्पत्ति आदि व्यापारको छोड़कर अन्य अणिमा दि ऐश्वर्य विद्वान्को प्राप्त होता है , ( प्रकरणात् ) क्योंकि जगत् सृष्टिमें ईश्वर प्रकृत है ( असंनिहि

शाङ्करभाष्य

ये सगुणब्रह्मोपासनात् सहैव मनसा ईश्वरसायुज्यं व्रजन्ति किं तेषां निरवग्रहमैश्वर्यं भवति आहोस्वित्सावग्रहमिति संशयः। किं तावत्प्राप्तम् निरङ्कुशमेव एषामैश्वर्यं भवितुमर्हति आप्नोति स्वाराज्यम् सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति इत्यादिश्रुतिभ्य इति। एवं प्राप्ते पठति जगद्व्यापारवर्जमिति जगदुत्पत्त्यादिव्यापारं वर्जयित्वा अन्यत् अणिमाद्यात्मकमैश्वर्यं मुक्तानां भवितुमर्हति जगद्व्यापारस्तु नित्यसिद्धस्यैव ईश्वरस्य कुतः तस्य तत्र प्रकृतत्वात् असंनिहितत्वाच्चेतरेषाम् पर एव हि ईश्वरो जगद्व्यपारेऽधिकृतः तमेव प्रकृत्य उत्पत्त्याद्युपदेशात् नित्यशब्दनिबन्धनत्वाच्च तदन्वेषणविजिज्ञासनपूर्वकं तु इतरेषामणिमाद्यैश्वर्यं श्रूयते तेनासंनिहितास्ते जगद्व्यापारे। समनस्कत्वादेव च एतेषामनैकमत्ये कस्यचित्स्थित्यभिप्रायः कस्यचित्संहाराभिप्राय इत्येवं विरोधोऽपि कदाचित्स्यात् अथ कस्यचित् संकल्पमनु अन्यस्य संकल्प इत्यविरोधः समर्थ्येत ततः परमेश्वराकूततन्त्रत्वमेवेतरेषामिति व्यवतिष्ठते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — तवाच्च ) और अन्य असंनिहित हैं।

जो सगुण ब्रह्मकी उपासना से मनके साथ ही ईश्वर सायुज्यको प्राप्त होते हैं, उनका ऐश्वयं क्या निरङ्कश है अथवा साङ्कय? इस प्रकार संशय होता है, तब क्या प्राप्त हुआ? पूर्वपक्षी - इनका ऐश्वर्य निरङ्कश ही होना चाहिए, क्योंकि ' आप्नोति स्वाराज्यम् ' ( वह स्वाराज्यको प्राप्त होता है ) ' सर्वेऽस्मै देवा ० ' ( समस्त देवगण उसे बलि ( उपहार ) समर्पण करते हैं ) ' तेषां सर्वेषु ० ' ( उनकी सम्पूर्णं लोकोंमें यथेच्छ गति होती है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं।

सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं' जगद्व्यापारवर्जम् '। जगत् की उत्पत्ति आदि व्यापारको छोड़कर मुक्त पुरुषको अन्य अणिमा बादि रूप ऐश्वर्यं प्राप्त हो सकता है। जगत् के उत्पत्ति आदि व्यापार तो नित्य सिद्ध ईश्वरका ही है, किससे? इससे कि वह सृष्टिमें प्रकृत है और अन्य जीव असंनिहित हैं। परमेश्वर ही जगत्को उत्पत्ति आदि व्यापार में अधिकृत है, कारण कि उसको प्रस्तुतकर उत्पत्ति आदिका उपदेश है और नित्यशब्द से सम्बन्धित है।

उसका अन्वेषण विशेष जिज्ञासापूर्वक अन्योंका अणिमा मादि ऐश्वयं सुना जाता है। इससे वे जगत्‌को उत्पत्ति आदि व्यापार में असंनिहित - असम्बन्धित हैं। इनके मनस्वी होनेसे ही ऐकमत्यका संभव न होने से किसीका जगत् की स्थिति में अभिप्राय और किसीका उसके संहारमें अभिप्राय होगा, इस प्रकार कदाचित् विरोध भी होगा। यदि किसी एकके संकल्पके अनुसार अन्यका संकल्प हो, इसप्रकार अविरोधका समथंन करे तो इससे भी परमेश्वरके अभिप्रायके अधीन ही अन्य जीव हैं, ऐसी व्यवस्था होती है॥१७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्टन्ति ' ( इस उपासकके संकल्पसे ही पितर समुपस्थित होते हैं ) स एकधा भवति त्रिधा भवति ' इत्यादि प्रतिसे सिद्ध होता है कि ब्रह्मलोकमें गये हुए सगुणोपासकका ऐश्वर्यं निरङ्कुश होता है अर्थात् जैसे वह उपभोगके लिए अपने संकल्पसे ही इष्ट देह आदिकी सृष्टिमें स्वतन्त्र हैं, वैसे आकाश आदि जगत् की उत्पत्ति आदि करनेमें भी स्वतन्त्र हैं। वे ईश्वर के समान स्वतन्त्र - निरङ्कय ऐश्वर्यवान् होते हैं।

इससे पूर्वपक्षमें अनेक ईश्वर सिद्ध होते हैं। सिद्धान्ती - सगुणोपासकका ऐश्वयं अस्वतन्त्र है अर्थात् जगत्को उत्पत्ति आदि करनेमें वह असमर्थ है। जगत् की उत्पत्ति आदि तो वह कर सकता है जो जगत् की उत्पत्तिसे पूर्व ही सिद्ध हो और पूर्वापर पर्यालोचन करनेमें समर्थ, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् नित्यसिद्ध हो, वह तो ईश्वर ही हो सकता है।

योगी लोग तो ईश्वरानुग्रहसे ब्रह्मलोक में जाकर ऐश्वर्यवान् होते हैं, और महाप्रलयमें उन सबका अन्त हो जाता है, जगत् की उत्पत्तिके पूर्व वे अविद्यान होनेके कारण उनसे जगत् की उत्पत्ति आदि असम्भव है | किश्च ' स ईक्षाञ्चक्रे ' ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' इत्यादि श्रुतियाँ प्रलयके अनन्तर सृष्टिकी उत्पत्ति आदिमें ईश्वरको ही कारण कहती हैं, इसका विस्तृत वर्णन ( ब्रह्मसूत्र १।१।२ ) इस सूत्रमें किया गया है॥ १७

4.4.18 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १८

सूत्र ४.४.१८

प्रत्यक्षोपदेशाद् इति चेन् नाधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः ॥ ४.४.१८ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.१८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 914

पदच्छेद — प्रत्यक्षोपदेशात् , इति चेत् , न , आधिकारिकमण्डलस्योक्तेः । सूत्रर्थ - ( प्रत्यक्षोपदेशात् ) ' याप्नोति स्वाराज्यम् ' इत्यादि प्रत्यक्ष श्रुतिसे विद्वान्का ऐश्वयं निरङ्कश प्रतिपादित है । ( इति चेन्न ) तो यह युक्त नहीं है , क्योंकि ( आधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः )

शाङ्करभाष्य

अथ यदुक्तम् आप्नोति स्वाराज्यम् इत्यादिप्रत्यक्षोपदेशात् निरवग्रहमैश्वर्यं विदुषां न्याय्यमिति तत्परिहर्तव्यम् अत्रोच्यते नायं दोषः आधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः। आधिकारिको यः सवितृमण्डलादिषु विशेषायतनेष्ववस्थितः पर ईश्वरः तदायत्तैव इयं स्वाराज्यप्राप्तिरुच्यते यत्कारणम् अनन्तरम् आप्नोति मनसस्पतिम् इत्याह यो हि सर्वमनसां पतिः पूर्वसिद्ध ईश्वरः तं प्राप्नोतीत्येतदुक्तं भवति तदनुसारेणैव च अनन्तरम् वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः। श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः च भवति इत्याह। एवमन्यत्रापि यथासंभवं नित्यसिद्धेश्वरायत्तमेव इतरेषामैश्वर्यं योजयितव्यम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यह जो कहा गया है कि ' आप्नोति स्वाराज्यम् ' ( वह स्वाराज्यको प्राप्त होता है ) इत्यादि प्रत्यक्ष श्रुतिसे उपासकोंका ऐश्वयं निरङ्कुश युक्त है, उसका परिहार करना चाहिए। इसपर कहते हैंयह दोष नहीं है, क्योंकि आधिकारिक मण्डल स्थितोंके लिए यह उक्ति - वचन है | आदित्यमण्डल आदि विशेष स्थानोंमें अवस्थित जो आधिकारिक परमेश्वर है उसके अधीन ही यह स्वाराज्य प्राप्ति कही जाती है, क्योंकि अनन्तर ' आप्नोति मनसस्पतिम् ' ( वह मनके पति ब्रह्मको प्राप्त होता है ) ऐसा श्रुति कहती है। जो सब मनोंका पति पूर्व सिद्ध ईश्वर है उसको प्राप्त होता है, ऐसा कहा गया है। अनन्तर उसके अनुसार ही ' वाक्पतिश्चक्षुष्पति : ' ( तथा वाणीका पति, चक्षुका पति, श्रोत्रका पति और विज्ञानका पति हो जाता है ) इसप्रकार श्रुति कहती है। इसप्रकार अन्यत्र भी अन्य उपाकोंका ऐश्वर्यं नित्य सिद्ध ईश्वरके अधीन ही है, ऐसी यथासम्भव योजना करनी चाहिए।। १८

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' आप्नोति स्वाराज्यम् ' यह श्रुति वचन आदित्यमण्डल आदि विशेष स्थानोंमें स्थित परमेश्वर के अधीन ही स्वाराज्य प्राप्ति के विषय में है। यदि वह स्वाराज्य प्राप्तिमात्रसे निरङ्कश ऐश्वयंवान होता तो उसके अनन्तर हो ' आप्नोति मनसस्पतिम् ' इत्यादि श्रुति वचन असंगत होगा। आदित्य आदिको जो अधिकारमें नियुक्त करता है वह यहाँ अाधिकारिक कहा गया है। इसलिए सगुण उपासकको अपने उपभोग में भले स्वाराज्य- स्वातन्त्र्य हो, परन्तु जगत् की उत्पत्ति आदिमें नहीं। इस प्रकार ' सर्वेषु लोकेषु कामचारो मवति ' इत्यादि स्थलोंमें भी यही समझना चाहिए कि उपासकका ऐश्वयं ईश्वरके धीन है स्वतन्त्र नहीं॥ १८

4.4.19 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १९

सूत्र ४.४.१९

विकारावर्ति च तथा हि स्थितिम् आह ॥ ४.४.१९ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.१९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 915

पदच्छेद — विकारावर्ति , च , तथा , हि , स्थितिम् आह

सूत्रार्थ — ( विकारावर्ति च ) विकारमें न रहनेवाला मी ब्रह्मका स्वरूप है, ( हि ) क्योंकि ( तथा ) वैसे ( स्थितिम् ) परमेश्वरके दो रूपों की स्थिति, ( आह ) ' तावानस्य महिमा ' इत्यादि श्रुति कहती है।

शाङ्करभाष्य

विकारावर्त्यपि च नित्यमुक्तं पारमेश्वरं रूपम् न केवलं विकारमात्रगोचरं सवितृमण्डलाद्यधिष्ठानम् तथा हि अस्य द्विरूपां स्थितिमाह आम्नायः तावानस्य महिमा ततो ज्याया््च पुरुषः। पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि इत्येवमादिः। न च तत् निर्विकाररूपम् इतरालम्बनाः प्राप्नुवन्तीति शक्यं वक्तुम् अतत्क्रतुत्वात्तेषाम्। अतश्च यथैव द्विरूपे परमेश्वरे निर्गुणं रूपमनवाप्य सगुण एवावतिष्ठन्ते एवं सगुणेऽपि निरवग्रहमैश्वर्यमनवाप्य सावग्रह एवावतिष्ठन्त इति द्रष्टव्यम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ब्रह्मकी महिमा है, तथा निर्विकार पुरुष इससे उत्कृष्ट है, तेज, जल और अन्न आदि सम्पूर्ण चराचर प्राणी इसका एक पाद हैं, और इसका पुरुष नामक त्रिपाद अमृत प्रकाशमय स्वात्मा में स्थित है ) इत्यादि श्रुति इसके दो रूपोंकी स्थिति कहती है। अन्य ( विकारवतिरूप ) का आलम्बन करनेवाले उपासक उसके निर्विकाररूपको प्राप्त होते है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे उस क्रतुवाले नहीं है। इसलिए जैसे दो रूपवाले परमेश्वरके होनेपर भी वे निर्गुणरूपको प्राप्त न कर सगुणरूप में ही अवस्थित होते हैं, वैसे सगुणमें मी निरङ्कुश ऐश्वयं प्राप्त किये विना उपासक साङ्कुश - अस्वतन्त्र ऐश्वयं में ही अवस्थित होते हैं, ऐसा समझना चाहिए॥ १ ९

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * शङ्का — जैसे उपास्य सगुण ब्रह्मगत सत्यसङ्कल्पत्व यादि उपासक में आते हैं, वैसे उपास्य गत जगत्‌को उत्पत्ति आदि व्यापारकी सामथ्यं भी उसमें आनी चाहिए? समाधान - ' तावानस्य महिमा ' इस श्रुतिवचनसे ब्रह्मका विकारवर्तिरूप और ' ज्यायांश्च पूरुष : ' इस वचनसे ब्रह्मका निर्विकाररूप प्रतिपादित है। और ' पादोऽस्य सर्वा भूतानि ' इस श्रुतिवचनसे ब्रह्मका विकारवर्तिरूप और ' त्रिपादस्यामृतं दिवि ' इस वचनसे ब्रह्मका निर्विकाररूप प्रतिपादित है। इसप्रकार जैसे ब्रह्मके दो रूप होनेपर भी निर्गुणरूप सगुण उपासकोंसे अप्राप्त है, क्योंकि उसको निर्विकार ब्रह्मका ज्ञान नहीं है, वैसे सगुण ब्रह्मगत जगत् की उत्पत्ति आदि व्यापारकी सामर्थ्य होनेपर भी उपासक उसे प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए उपासक केवल अणिमा आदि सातिशय ऐश्वर्यको ही प्राप्त कर सकता है।। १ ९

4.4.20 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २०

सूत्र ४.४.२०

दर्शयतश् चैवं प्रत्यक्षानुमाने ॥ ४.४.२० ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.२०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 915

पदच्छेद — दर्शयता , च , एवम् प्रत्यक्षानुमाने । विकारमें न रहनेवाला मी परमेश्वरका नित्यरूप कहा गया है केवल विकारमात्र विषयक सवितृमण्डल आदि अधिष्ठानकरूप नहीं है , क्योंकि ' तावानस्य महिमा ० ' ( उतनी ही इस गायत्र्याख्य

शाङ्करभाष्य

दर्शयतश्च विकारावर्तित्वं परस्य ज्योतिषः श्रुतिस्मृती न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः इति न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः इति च। तदेवं विकारावर्तित्वं परस्य ज्योतिषः प्रसिद्धमित्यभिप्रायः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — III ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ४ पा ० ४

सूत्रार्थ - ( एवम् ) इसप्रकार ( प्रत्यक्षानुमाने च ) श्रुति और स्मृति भी ( दर्शयतः ) परमेश्वरका निर्विकाररूप दिखलाती हैं। आवृत्ति शास्त्र परिसमाप्तिद्योतक है।

' न तत्र सूर्यो भाति ० ' ( उस ज्योतिःस्वरूप परब्रह्ममें लोकावभासक सूयं प्रकाशित नहीं होता, न चन्द्र और न तारे प्रकाशित होते हैं और न विद्युत् ही चमकती हैं पुनः अस्मदादि गोचर यह भौतिक अग्नि तो कहीं प्रकाशित हो सकती है? ) और ' न तद्भासयते ० ' ( उस स्वयं प्रकाशमय परब्रह्म को न सूर्य, न चन्द्रमा और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकते हैं ) इसप्रकार श्रुति और स्मृति भी ज्योतिःस्वरूप परब्रह्मका विकारावर्तित्व दिखलाती हैं। इसप्रकार पर ज्योतिमें विकारावर्तित्व प्रसिद्ध है, यह अभिप्राय है॥ २०

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.४.२२ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

4.4.21 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २१

सूत्र ४.४.२१

भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच् च ॥ ४.४.२१ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.२१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 916

पदच्छेद — भोगमात्र साम्यलिङ्गात् , च

सूत्रार्थ — और उपासकोंको ईश्वरके साथ भोगमात्र की साम्य श्रुति होनेसे भी उनका निरङ्कय ऐश्वयं नहीं है। इतश्च न निरङ्कुशं विकारालम्बनानामैश्वर्यं यस्माद्भोगमात्रमेवैषामनादिसिद्धेने-

शाङ्करभाष्य

इतश्च न निरङ्कुशं विकारालम्बनानामैश्वर्यम् यस्मात् भोगमात्रमेव एषाम् अनादिसिद्धेनेश्वरेण समानमिति श्रूयते तमाहापो वै खलु मीयन्ते लोकोऽसौ इति स यथैतां देवतां सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतान्यवन्ति तेनो एतस्यै देवतायै सायुज्यं सलोकतां जयति इत्यादिभेदव्यपदेशलिङ्गेभ्यः।। ननु एवं सति सातिशयत्वादन्तवत्त्वम् ऐश्वर्यस्य स्यात् ततश्च एषामावृत्तिः प्रसज्येत इत्यतः उत्तरं भगवान्बादरायण आचार्यः पठति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इस वक्ष्यमाण हेतुसे भी विकारका आलम्बन - उपासना करनेवाले उपासकोंका ऐश्वयं निरङ्कुश नहीं है, क्योंकि इनका मोगमात्र ही अनादि सिद्ध ईश्वरके साथ समान है, ' तमाहापो ο ' ( उस उपासकसे हिरण्यगमं सान्त्वना पूर्वक कहते हैं, मुझसे ये अमृतमय जल भोगे जाते हैं, तुमसे यह अमृतमय लोक भोग्य हैं तुम इसका यथेच्छ भोग करो ) ऐसी श्रुति है, और ' स यथैतां ० ' ( जैसे इस हिरण्यगर्भ देवताकी सब प्राणी पूजा करते हैं, वैसे ही ऐसा जाननेवालेकी सब भूत पूजा करते हैं ) ' तेनो एतस्यै ० ' ( उस प्राणात्मप्रतिरूप व्रतके योगसे उपासक इसी प्राणदेवताका सायुज्य एकात्मता और समान लोकता - एक स्थानत्व प्राप्त करता है ) इत्यादि भेदव्यपदेश लिङ्गोंसे भी प्रतीत होता है। कि उपासकका उपास्य ईश्वरके साथ भोगसाम्य है॥ २१

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.४.२२ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

4.4.22 · चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २२

सूत्र ४.४.२२

अनावृत्तिः शब्दाद् अनावृत्तिः शब्दात् ॥ ४.४.२२ ॥

चतुर्थ अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ४.४.२२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 916

पदच्छेद — अनावृत्तिः , शब्दात् , अनावृत्ति , शब्दात् । सूत्रार्थं - ( अनावृत्तिः ) अचिरादि पर्व युक्त देवयान मार्गसे जो उपासक ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती , ( शब्दात् ) क्योंकि ' न च पुनरावर्तते ' इत्यादि श्रुति है | सूत्रकी

शाङ्करभाष्य

नाडीरश्मिसमन्वितेन अर्चिरादिपर्वणा देवयानेन पथा ये ब्रह्मलोकं शास्त्रोक्तविशेषणं गच्छन्ति यस्मिन्नरश्च ह वै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके तृतीयस्यामितो दिवि यस्मिन्नैरं मदीयं सरः यस्मिन्नश्वत्थः सोमसवनः यस्मिन्नपराजिता पूर्ब्रह्मणः यस्मिंश्च प्रभुविमितं हिरण्मयं वेश्म यश्चानेकधा मन्त्रार्थवादादिप्रदेशेषु प्रपञ्च्यते ते तं प्राप्य न चन्द्रलोकादिव भुक्तभोगा आवर्तन्ते कुतः तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति तेषां न पुनरावृत्तिः एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते ब्रह्मलोकमभिसंपद्यन्ते न च पुनरावर्तते इत्यादिशब्देभ्यः। अन्तवत्त्वेऽपि तु ऐश्वर्यस्य यथा अनावृत्तिः तथा वर्णितम् कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परम् इत्यत्र सम्यग्दर्शनविध्वस्ततमसां तु नित्यसिद्धनिर्वाणपरायणानां सिद्धैव अनावृत्तिः तदाश्रयणेनैव हि सगुणशरणानामप्यनावृत्तिसिद्धिरिति। अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात् इति सूत्राभ्यासः शास्त्रपरिसमाप्तिं द्योतयति।। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यास्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ शारीरकमीमांसासूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः।। ।।इति श्रीमच्छारीरकमीमांसासूत्रभाष्यं संपूर्णम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु ऐसा होनेपर - उपासकोंका ऐश्वयं साङ्कश होनेपर सातिशय होने से उनका ऐश्वर्यं विनाशी होगा इससे इनको आवृत्ति ( संसारागमन ) प्रसक्त होगी? इससे भगवान् बादरायण आचार्यं उत्तर कहते हैं-

* नाडीरश्मिसमन्वितेनार्चिरादिपर्वणा देवयानेन पथा ये ब्रह्मलोकं शास्त्रोक्तविशेषणं गच्छन्ति ‘ यस्मिन्नरश्च ह नै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके तृतीयस्यामितो दिवि, यस्मिन्नैरं मदीयं

जो उपासक नाड़ीरश्मि समन्वित अधिरादिपवं युक्त देवयानमागंसे शास्त्रोक्त विशेषण विशिष्ट ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं - ' इस पृथिवी नामक लोकसे तृतीय द्युलोक में जो ब्रह्मलोक है, उस ब्रह्मलोक में अर और ण्य नामके दो समुद्र - समुद्र तुल्य तालाब हैं, वहीं अन्नमय मण्डसे पूर्ण मदका हर्षोत्पादक सर है, वहीं अमृतका स्रोत बहानेवाला अश्वत्थ वृक्ष है, वहाँपर ब्रह्माकी अपराजितापुरी है, वहीं ब्रह्माद्वारा निर्मित सुवर्णमय गृह है, जिसका अनेक प्रकारसे मन्त्र, अर्थवाद आदि प्रदेशों में विस्तार से वर्णन किया जाता है, वे उसे प्राप्तकर जैसे कमंठ लोग भुक्त मोग होकर चन्द्रलोकसे लौटते हैं, वैसे नहीं लौटते।

किससे? इससे कि ' तयोर्ध्वमायन्न ० ' ( उस मूर्धन्य नाड़ीसे ऊध्वंको जानेवाला अमृतत्वको प्राप्त होता है ) ' तेषां न पुनरावृत्ति : ' ( उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती ) ' एतेन प्रतिपद्यमाना ० ' ( इस देवमागंसे जानेवाले इस मानव मण्डल में पुनः नहीं लौटते ) ब्रह्मन्तोकमभिसंपद्यते ' ( ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ), ' न च पुनरावर्तते ' ( और पुनः नहीं लौटता ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं।

ऐश्वयंके विनाशी होनेपर भी जैसे अनावृत्ति होती है, वैसे ही ' कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परम् ' इस सूत्र में वर्णित है। सम्यग्दर्शनसे विध्वस्त अज्ञानवाले नित्यसिद्ध निर्वाण परायण मुक्त पुरुषोंकी अनावृत्ति तो सिद्ध ही है। सगुण रणवालोंकी भी उस ज्ञानके आश्रयसे ही अनावृत्ति सिद्ध होती है। ' अनावृत्ति शब्दसे, अनावृत्ति शब्दसे ' इसप्रकार सूत्रकी पुनरुक्ति शास्त्रकी परिसमाप्ति सूचित करती है।। २२

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — # यहाँ ' बादरायण ' शब्द से बदरिकाश्रम में निवासका कथन होनेके कारण सदा सर्वज्ञ परम गुरु नारायण प्रसादका द्योतक होनेसे तत्प्रणीत शास्त्रमें निदुष्टत्व सूचित होता है। यद्यपि सगुण विद्याका फल सातिशय होनेसे विनाशी है, तो भी ब्रह्मलोक में ईश्वरके अचिन्त्य प्रसादसे ब्रह्मात्मकत्व ज्ञान हो जाता है जिससे वह पुनः संसारमें लौटकर नहीं आता।

जो सगुण उपासना - दहरविद्या आदिसे रहित केवल ब्रह्मचयं, अश्वमेध आदि साधनोंद्वारा ब्रह्मलोक में जाते हैं, वे वहीं फल भोगकर मानव लोकमें लौट आते हैं, क्योंकि वे तत्त्वज्ञान से रहित होते हैं। जैसे चन्द्रलोक में गए हुए केवल कमंठ लोग फल भोगकर लौट खाते हैं। ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि वेदान्तवाक्योंसे जिसका आत्मैकत्व ज्ञानसे अज्ञान निवृत्त हो गया है उसका तो ' अत्रैव ब्रह्म समश्नुते ' यहाँ जीवितावस्थामें ही ब्रह्म प्राप्तिरूप मोक्ष सिद्ध है।

सगुण उपासक भी उसी आत्मज्ञानको पाकर ब्रह्माके साथ मुक्त हो जाता है, अतः उनकी पुनः आवृत्ति नहीं होती, क्योंकि ' न च पुनरावर्तते ' ( वह पुनः संसारमें नहीं आता ) • इत्यादि श्रुतियाँ हैं | इस माँति सगुण उपासकोंकी क्रम मुक्ति होती है। इसप्रकार समन्वयके कथनसे ब्रह्मात्मैकत्वमें वेदान्त - उपनिषद् वाक्य प्रमाण हैं, ऐसा निश्चय किया गया है। वाक्यार्थं ज्ञानमें स्मृति, तर्क आदि सर्वप्रकारके विशेषका परिहार किया गया है और साधन सम्पत्ति भी दिखलाई गई है।

इससे विवेक आदि साधन सम्पन्न और वेदान्तवाक्योंके श्रवण आदिको आवृत्तिसे समस्त प्रतिबन्धसे रहित पुरुषकी समूल बन्धकी निवृत्ति होनेपर याविभूत निष्कल, अनन्त, स्वप्रकाश, चिदानन्दरूप से अवस्थिति होती है॥२२

उपसंहार

इन सूत्रों का सार यह है कि ब्रह्म कोई भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि चेतना का शुद्ध स्वरूप है जो संकल्प द्वारा ही आभासित होता है। यह विवेचन सिद्ध करता है कि जगत के परिवर्तनशील संसार और ब्रह्म की अपरिवर्तनीय स्थिति के बीच का भेद केवल दृष्टि का है। अंततः ये सूत्र ज्ञान के माध्यम से जीव को परम सत्य की ओर ले जाने वाले तार्किक सोपान हैं।

In English

Brahma Sutra: Chapter 4, Section 4

This commentary explains the final section of the Brahma Sutras, focusing on the nature of liberation (moksha). It clarifies that liberation is not a new state or an external arrival, but rather the realization of one's eternal self through the removal of ignorance.

This article answers

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — ब्रह्मसूत्र।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-09-27।

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