व्याख्या · ब्रह्मसूत्र
ब्रह्मसूत्र — चतुर्थ अध्याय, तृतीय पाद
16 मूल पद्य 14 संस्करणसे मिलाये गये
ये सूत्र प्रपंच के सूक्ष्म तत्वों और उनके अंतर्संबंधों की तार्किक व्याख्या करते हैं। इनमें इंद्रिय-बोध से लेकर भौतिक जगत के विभिन्न घटकों के बीच कार्य-कारण संबंध को क्रमिक रूप से स्पष्ट किया गया है। पाठक को इन सूत्रों के माध्यम से दृश्य जगत की विविधता और उसके पीछे छिपे सूक्ष्म नियमों का बोध प्राप्त होगा।
अर्चिराद्यधिकरणम्
4.3.1 · चतुर्थ अध्याय तृतीय पाद सूत्र १
अर्चिरादिना तत्प्रथितेः ॥ ४.३.१ ॥
पदच्छेद — अचिरादिना तत्प्रथितेः
सूत्रार्थ — ( अचिरादिना ) ब्रह्मलोक प्राप्तिके अभिलाषी सब उपासक अर्चिरादि मागंसे ही जाते हैं, ( तथिः ) क्योंकि सब विद्वानोंमें यह मार्ग प्रसिद्ध है।
शाङ्करभाष्य
अर्चिरादिनेति सर्वो ब्रह्म प्रेप्सुः अर्चिरादिनैवाध्वना रंहतीति प्रतिजानीमहे कुतः तत्प्रथितेः प्रथितो ह्येष मार्गः सर्वेषां विदुषाम् तथा हि पञ्चाग्निविद्याप्रकरणे येचामी अरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते इति विद्यान्तरशीलिनामपि अर्चिरादिका सृतिः श्राव्यते।
स्यादेतत् यासु विद्यासु न काचिद्गतिरुच्यते तासु इयमर्चिरादिका उपतिष्ठताम् यासु तु अन्या श्राव्यते तासु किमित्यर्चिराद्याश्रयणमिति अत्रोच्यते भवेदेतदेवम् यद्यत्यन्तभिन्ना एव एताः सृतयः स्युः एकैव त्वेषा सृतिः अनेकविशेषणा ब्रह्मलोकप्रपदनी क्वचित् केनचित् विशेषणेनोपलक्षितेति वदामः सर्वत्रैकदेशप्रत्यभिज्ञानात् इतरेतरविशेषणविशेष्यभावोपपत्तेः प्रकरणभेदेऽपि हि विद्यैकत्वे भवति इतरेतरविशेषणोपसंहारवत् गतिविशेषणानामप्युपसंहारः विद्याभेदेऽपि तु गत्येकदेशप्रत्यभिज्ञानात् गन्तव्याभेदाच्च गत्यभेद एव तथा हि ते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति तस्मिन्वसन्ति शाश्वतीः समाः सा या ब्रह्मणो जितिर्या व्युष्टिस्तां जितिं जयति तां व्युष्टिं व्यश्नुते तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दति इति च तत्र तत्र तदेव एकं फलं ब्रह्मलोकप्राप्तिलक्षणं प्रदर्श्यते।
यत्तु एतैरेव इत्यवधारणम् अर्चिराद्याश्रयणे न स्यादिति नैष दोषः रश्मिप्राप्तिपरत्वादस्य न हि एक एव शब्दो रश्मींश्च प्रापयितुमर्हति अर्चिरादींश्च व्यावर्तयितुम् तस्मात् रश्मिसंबन्ध एवायमवधार्यत इति द्रष्टव्यम्। त्वरावचनं तु अर्चिराद्यपेक्षायामपि गन्तव्यान्तरापेक्षया क्षैप्र्यार्थत्वात् नोपरुध्यते यथा निमेषमात्रेणात्रागम्यत इति।
अपि च अथैतयोः पथोर्न कतरेणचन इति मार्गद्वयभ्रष्टानां कष्टं तृतीयं स्थानमाचक्षाणा पितृयाणव्यतिरिक्तमेकमेव देवयानमर्चिरादिपर्वाणं पन्थानं प्रथयति भूयांस्यर्चिरादिसृतौ मार्गपर्वाणि अल्पीयांसि त्वन्यत्र भूयसां च आनुगुण्येन अल्पीयसां नयनं न्याय्यमित्यतोऽपि अर्चिरादिना तत्प्रथितेरित्युक्तम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यह कहा जा चुका है कि मार्गके उपक्रम तक उत्क्रान्ति समान है। परन्तु मागं तो अन्य श्रुतियोंमें अनेक प्रकारसे सुना जाता है। ' अथैतैरेव ० ' ( मरणानन्तर इन रश्मियोंसे ही ऊर्ध्वको चढ़ता है ) इसप्रकार नाड़ी बोर रश्मि सम्बन्धसे एक मार्ग है। ' तेऽर्चिषमभि ० ' ( ये ज्योति के अभिमानी देवताको प्राप्त होते हैं, ज्योति अभिमानी देवतासे अह अभिमानी देवताको प्राप्त होते हैं ) इसप्रकार यह दूसरा अचिरादिमांगं है।
' स एतं देवयानं ० ' ( वह इस देवयान मार्गको प्राप्तकर अग्निलोकको प्राप्त होता है ) यह अन्य मार्ग है। ' यदा बै ० ' ( जिस समय यह उपासक पुरुष इस लोकसे प्रायण कर जाता है उस समय वह वायुको प्राप्त होता है ) यह दूसरा मार्ग है। ' सूर्यद्वारेण ० ' ( वे पाप रहित होकर सूर्यद्वारा- उत्तरायण मार्ग से वहां जाते हैं ) यह और अन्य मार्ग है। उसमें संशय होता है कि क्या ये परस्पर भिन्न - भिन्न मार्ग हैं अथवा क्या अनेक विशेषण विशिष्ट एक ही मार्ग है?
पूर्वपक्षी - इस संशय में ऐसा प्राप्त होता है कि ये मार्ग तो मिन्न - भिन्न हैं, क्योंकि भिन्न प्रकरण हैं और भिन्न उपासनाके अङ्ग हैं। और ' अथैतैरेव रश्मिभिः ' ( अनन्तर इन रश्मियोंसे ही ) इस अवधारणका अचिरादिकी अपेक्षा होनेपर बाघ होगा। और ' स यावत्क्षिप्येन्मनः ० ' ( वह जितने समयमें मनको प्रेरित करता है उतने ही समय में आदित्यको प्राप्त हो जाता है ) यह त्वरावचन बाधित होगा। इसलिए ये मागं परस्पर भिन्न हैं।
सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं --- ' अविरादिना ' | ऐसी हम प्रतिज्ञा करते हैं कि ब्रह्मलोक प्राप्त करनेकी इच्छ वाले सब उपासक अचिरादि मार्गसे ही जाते हैं। किससे? इससे कि उसकी प्रसिद्धि है। यह मार्ग सब विद्वानोंमें प्रसिद्ध ही है। जैसे कि पञ्चाग्नि विद्याके प्रकरण में ' ये चामी अरण्ये ० ' ( तथा जो संन्यासी अथवा वानत्रस्य वनमें श्रद्धायुक्त होकर सत्यहिरण्यगर्भकी उपासना करते हैं ) इसप्रकार अन्य विद्याका परिशीलन करनेवालों के लिए भी अचिरादि मार्ग सुनाया जाता है।
ऐसा हो, परन्तु जिन विद्याओं में कोई गति ( मार्ग ) नहीं कही जाती है उनमें तो यह अचिरादि गति स्थापित हो, जिनमें अन्य गति सुनाई जाती है उनमें अचिरादि गतिका आश्रयण क्यों होना चाहिए? इसपर कहते हैं - यदि ये मार्ग अत्यन्त भिन्न हों तो ऐसा ही हो। परन्तु यह तो ब्रह्मलोक प्राप्त करानेवाला अनेक विशेषणोंसे युक्त एक ही मार्ग है और वह कहीं पर किसी एक विशेषणसे उपलक्षित होता है, ऐसा हम कहते हैं, क्योंकि सर्वत्र एक देशका प्रत्यभिज्ञान होनेसे अन्योन्य विशेषण - विशेष्यभाव उपपन्न होता है।
प्रकरणके भेद होनेपर भी विद्याके एक होनेपर अन्योन्य विशेषण के उपसंहारके समान मागं विशेषणोंका भी उपसंहार होता है। विद्याके भिन्न होनेपर भी तो गति के एकदेशका प्रत्यभिज्ञान होनेसे और गन्तव्यका अभेद होनेसे गतिका अभेद ही है।
क्योंकि ' ते तेषु ब्रह्मलोकेषु ० ' ( वे उस ब्रह्मलोकों में दीर्घायु हिरण्यगर्भके अनन्त संवत्सर पर्यन्त रहते हैं ) ' तस्मिन्वसन्ति ० ' ( उसमें ब्रह्मा के अनेक कल्पोंतक निवास करते हैं ) ' सा या ब्रह्मणो ० ' ( वह जो हिरण्यगर्भका सर्वलोक जय है और जो व्याप्ति है उस जय और व्याप्तिको प्राप्त करता है ) ' तद्य एवैतं ० ' ( वहाँ ऐसा होनेके कारण जो इस ब्रह्मलोकको ब्रह्मचयंसे शास्त्र और आचार्यके उपदेश अनुसार प्राप्त होया है ) इसप्रकार उस श्रुतिमें वही ब्रह्मलोक प्राप्तिरूप एक फल दिखाया जाता है।
जो यह कहा गया है कि अचिरादिके आश्रयण करनेपर ' एतैरेव ' ( इन रश्मियोंसे ही ) यह अवधारण न होगा | यह दोष नहीं है, क्योंकि यह रश्मि प्राप्ति परक है। कारण कि एक ही ' एव ' शब्द रश्मि प्राप्ति के लिए और अचिरादिकी व्यावृत्तिके लिए हो यह युक्त नहीं है। इससे यह रश्मि सम्बन्ध ही अवधारित होता है, ऐसा जानना चाहिए | त्वरावचन तो अचिरादिकी अपेक्षा में भी अन्य गन्तव्यको अपेक्षासे शीघ्रता अर्थके लिए होनेसे बाधित रहीं होता।
' जैसे निमिषमात्र में यहां आ जाता है ' और ' अथैतयोः पथोर्न ० ' ( जब उपासना और इष्ट आदि कर्म इन दोनोंमें एकका भी सेवन नहीं करता तब अर्चिरादि मार्ग और धूम मार्ग दोनोंमेंसे किसी भी मार्गसे नहीं जाता ) इन दो मार्गों से भ्रष्ट हुए लिए कष्टप्रद तृतीय स्थान कहती हुई श्रुति पितृयाणसे पृथक् अचिरादि पर्ववाले एक ही देवयान मार्गको प्रसिद्ध करती है। अचिरादि गति में बहुतसे मार्ग पर्व हैं और अन्यत्र थोड़े से पर्व हैं। बहुतों के अनुरूपसे ही अल्पों का ग्रहण न्याय है।
इससे भी ' अर्चिरादिना तत्प्रथितेः ' ऐसा कहा गया है॥१
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * उत्क्रान्तिका निरूपण कर अब उससे साध्य जोर गन्तव्यमार्गका निरूपण करनेके लिए इस पादका आरम्भ किया जाता है। उसमें भी पहले गत अधिकरण में जिस किसी समय मृत उपासककी फल प्राप्ति कही गई है, उसके समान जिस किसी मागंसे गति भी होनी चाहिए। इसप्रकार दृष्टान्त संगति से पूर्वपक्ष होनेपर इस अधिकरणका आरम्भ किया जाता है। इस अधिकरण में विचार का विषय मागं है।
* ' अथैतैरेव रश्मिभिः ' अवधारणात्मक यह ' एव ' शब्द रातमें स्पष्टरूपसे किरणोंकी प्रतीति न होनेपर रात में मृतोपासकका किरणों के साथ असम्बन्धकी शङ्का से निवृत्तिके लिए है। किसी मी समय मृतोपासकका किरणोंके साथ सम्बन्ध अवश्यंभावी है, इसको ' एव ' शब्द सूचित करता है॥१
वाय्यधिकरणम्
4.3.2 · चतुर्थ अध्याय तृतीय पाद सूत्र २
वायुमब्दादविशेषविशेषाभ्याम् ॥ ४.३.२ ॥
पदच्छेद — वायुम् , अब्दात् , अविशेषविशेषाभ्याम्
सूत्रार्थ — ( अब्दात् ) संवत्सर के अनन्तर आदित्यके पूर्वं ( वायुम् ) वायुलोकको प्राप्त होते हैं, ( विशेषविशेषाभ्याम् ) क्योंकि ' स वायुलोकम् ' सामान्य और ' यदा वै पुरुषो ० ' विशेष श्रुति है।
शाङ्करभाष्य
केन पुनः संनिवेशविशेषेण गतिविशेषणानाम् इतरेतरविशेषणविशेष्यभावः इति तदेतत् सुहृद्भूत्वा आचार्यो ग्रथयति।
स एतं देवयानं पन्थानमासाद्याग्निलोकमागच्छति स वायुलोकं स वरुणलोकं स इन्द्रलोकं स प्रजापतिलोकं स ब्रह्मलोकम् इति कौषीतकिनां देवयानः पन्थाः पठ्यते तत्र अर्चिरग्निलोकशब्दौ तावत् एकार्थौ ज्वलनवचनत्वादिति नात्र संनिवेशक्रमः कश्चिदन्वेष्यः वायुस्तु अर्चिरादौ वर्त्मनि कतमस्मिन्स्थाने निवेशयितव्य इति उच्यते तेऽर्चिषमेवाभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति मासांस्तान्मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यम् इत्यत्र संवत्सरात्पराञ्चम् आदित्यादर्वाञ्चं वायुमभिसंभवन्ति कस्मात् अविशेषविशेषाभ्याम्।
तथा हि स वायुलोकम् इत्यत्र अविशेषोपदिष्टस्य वायोः श्रुत्यन्तरेण विशेषोपदेशो दृश्यते यदा वै पुरुषोऽस्माल्लोकात्प्रैति स वायुमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा रथचक्रस्य खं तेन स ऊर्ध्वमाक्रमते स आदित्यमागच्छति इति एतस्मात् आदित्यात् वायोः पूर्वत्वदर्शनात् विशेषात् अब्दादित्ययोरन्तराले वायुर्निवेशयितव्यः।
कस्मात्पुनरग्नेः परत्वदर्शनाद्विशेषादर्चिषोऽनन्तरं वायुर्न निवेश्यते नैषोऽस्ति विशेष इति वदामः ननूदाहृता श्रुतिः स एतं देवयानं पन्थानमासाद्याग्निलोकमागच्छति स वायुलोकं स वरुणलोकम् इति उच्यते केवलोऽत्र पाठः पौर्वापर्येणावस्थितः नात्र क्रमवचनः कश्चिच्छब्दोऽस्ति पदार्थोपदर्शनमात्रं ह्यत्र क्रियते एतं एतं च आगच्छतीति इतरत्र पुनः वायुप्रत्तेन रथचक्रमात्रेण च्छिद्रेण ऊर्ध्वमाक्रम्य आदित्यमागच्छतीति अवगम्यते क्रमः तस्मात् सूक्तम् अविशेषविशेषाभ्यामिति।
वाजसनेयिनस्तु मासेभ्यो देवलोकं देवलोकादादित्यम् इति समामनन्ति तत्र आदित्यानन्तर्याय देवलोकाद्वायुमभिसंभवेयुः वायुमब्दात् इति तु च्छन्दोगश्रुत्यपेक्षयोक्तम्। छान्दोग्यवाजसनेयकयोस्तु एकत्र देवलोको न विद्यते परत्र संवत्सरः तत्र श्रुतिद्वयप्रत्ययात् उभावपि उभयत्र ग्रथयितव्यौ तत्रापि माससंबन्धात्संवत्सरः पूर्वः पश्चिमो देवलोक इति विवेक्तव्यम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पुन : किस संनिवेश ( सम्बन्ध ) विशेष से गति विशेषणोंका अन्योन्य ( एक दूसरेका ) विशेषण विशेष्यभाव है? आचार्यं सुहृद होकर इसका प्रतिपादन करते हैं। ' स एतं देवयानं ० ' ( वह इस देवयान मार्गको प्राप्तकर अग्निलोकको जाता है, अनन्तर वह वायुलोकमें, वह वरुणलोकमें, वह इन्द्रलोकमें, वह प्रजापतिलोकमें, वह ब्रह्मलोकमें जाता है ) इस प्रकार कौषीतकी शाखावालोंकी उपनिषद् में देवयान मार्ग पठित है।
उसमें अचि और अग्निलोक शब्द तो एकार्थक हैं, क्योंकि वे अग्निवाचक हैं, इसलिए इसमें कहीं पर संनिवेश क्रम अन्वेषणीय नहीं है। परन्तु वायु अचिरादि मार्गमें श्रुत नहीं है इससे उसका किसी स्थानमें निवेश होना चाहिए?
कहते हैं- ' तेऽर्चिषम ० ' ( वे प्रायण के अनन्तर अचिअचि अभिमानी देवताको प्राप्त होते हैं, अर्चिसे अह - दिनको, अह - दिनसे शुक्लपक्षको शुक्लपक्षसे जिन छः मासोंमें सूर्यं उत्तर जाता है उन छः मासोंको, मासोंसे संवत्सरको, संवत्सरसे आदित्यको प्राप्त होते हैं ) इसमें संवत्सर के अनन्तर और आदित्य से पूर्वं वायुको प्राप्त होते हैं, किससे? इससे कि सामान्य और विशेष श्रुति है।
जैसे कि ' स वायुलोकम् ' ( वह वायुलोकको प्राप्त होता है ) इस श्रुतिमें अविशेष रूप से उपदिष्ट . वायुका ' यदा बै ० ' ( जिस समय यह उपासक इस शरीररूपी लोकसे प्रायण कर जाता है उस समय वह वायुको प्राप्त होता है। वहीं वह वायु उसके लिए छिद्र युक्त हो जाता है - मागं दे देता है, जैसा कि रथ के पहिएका छिद्र होता है। उसके द्वारा वह ऊर्ध्वं होकर चढ़ता है।
वह सूर्यलोक में पहुँच जाता है ) इस प्रकार इस अन्य श्रुतिद्वारा विशेषरूपसे उपदेश देखा जाता है, इस आदित्य से वायुका पूर्व दर्शन है इस विशेष से संवत्सर और आदित्यके बीचमें वायुका निवेश करना चाहिए। परन्तु अग्निके अनन्तर वायुका दर्शन है, इस विशेषसे अर्चिके अनन्तर वायुका निवेश क्यों नहीं किया जाता है? यह विशेष नहीं है, ऐसा हम कहते हैं।
परन्तु ' स एतं देवयानम् ' ० ( इस देवयान मार्गको प्राप्त कर वह अग्निलोकको प्राप्त होता है, वह वायुलोकको, वह वरुणलोकको प्राप्त होता है ) यह श्रुति उदाहृत है? कहते हैं- इसमें पौर्वापयंसे केवल पाठ ही अवस्थित है किन्तु यहाँ क्रमवाची कोई शब्द नहीं है। ' वह इस इस स्थानको जाता है ' इसप्रकार यहां पर केवल पदार्थका उपदर्शन मात्र किया जाता है। अन्य श्रुति में वायुके दिए हुए रथचक्र जैसे छिद्रसे ऊर्ध्वं जाकर आदित्यको पहुँचता है, ऐसा क्रम ... ra गत होता है।
इसलिए ' अविशेष और विशेषसे ' यह ठीक कहा गया है। वाजसनेयी तो ' मासेभ्यो ० ' ( मासों से देवलोक और देवलोकसे आदित्यको जाता है ) ऐसा कहते हैं। उसमें आदित्य के मनन्तयं के लिए देवलोक से वायुको प्राप्त होने चाहिए। ' वायुमब्दात् ० ' ( संवत्सर से वायुको प्राप्त होता है ) यह सूत्रपाठ छान्दोग्य श्रुतिकी अपेक्षासे कहा गया है। छान्दोग्य और वाजसनेयकमें तो एकमें देवलोक नहीं है और अन्य में संवत्सर नहीं है। उसमें दोनों श्रुतियोंके प्रत्यय होनेसे दोनोंका दोनों स्थलोंमें संनिवेश होना चाहिए।
उसमें भी मासके साथ सम्बन्ध होने से संवत्सरका पूर्व और देवलोकका पश्चात् संनिवेश है। ऐसा विवेक करना चाहिए॥ २
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * अचिरादि एक ही मार्ग है, इस आधारपर विशेषण - विशेष्यभावक्रम ' स एतं देवयानं ० ' इस प्रकार पूर्व - पूर्व उत्तर - उत्तरका विशेषण और उत्तर - उत्तर विशेष्य समझना चाहिए। इस प्रकार अधिकरणका तात्पर्य कहकर अब ' स एतं देवयानं ० ' इत्यादिसे विषय कहते हैं। इसमें अग्निके अनन्तर पठित वायु विषय है। क्या इस वायुका पाठ अचिरूप अग्नि के अनन्तर है अथवा संवत्सर के? यह संशय इसलिए होता है कि ' अग्निलोकमागच्छति स वायुलोकम् ' इस पाठक्रमसे तो अग्निके अनन्तर वायुका पाठ है और ' यदा वै पुरुषो ० ' इस विशेष श्रुतिमें आदित्य के पहले पाठ है, और ' तेऽर्चिषम् ० ' इस श्रुतिमें संवत्सरका आदित्यसे पूर्व पाठ है और वायुका पाठ ही नहीं है। तब वायुका कहाँ निवेश होना चाहिए? सिद्धान्ती - पाठक्रम श्रुतिसे दुर्बल है, अतः ' यदा व पुरुषो ' इस विशेष श्रुति वायुका संवत्सर और आदित्य के बीचमें निवेश होना चाहिए।
* पाठक्रमके आधारपर पूर्वपक्षी कहते हैं - ' स एतं देवयानम् ' इस कौषीतकी श्रुति अग्न के अनन्तर वायुका पाठ है। तो ' तेऽर्चिषम् ' इस छान्दोग्य श्रुतिमें मो अचिके अनन्तर वायुका संनिवेश होना चाहिए? सिद्धान्ती - ' स एतं देवयानं ' यह अग्निके पश्चात् वायुका पाठ विशेष नहीं है केवल क्रमशः पाठमात्र है, क्योंकि इस श्रुतिमें क्रम वाची कोई शब्द नहीं है।
और ' तेन स ऊर्ध्वमाक्रम ' ( वायुके दिए हुए रथचक्र के समान छिद्रसे वे उपासक ऊर्ध्वं जाकर आदित्यको प्राप्त होते हैं ) इस काण्व श्रुतिमें विशेषशब्द द्वारा क्रमका निश्चय होनेसे पाठक्रम बाधित है। और ' मासेभ्यो देवलोकम् ' इस बृहदारण्यक श्रुतिमें मासोंके अनन्तर देवलोकका पाठ युक्त नहीं है, क्योंकि मास और देवलोकका कोई सम्बन्ध नहीं है। इसलिए छान्दोग्य श्रुति के अनुसार मासोंके अनन्तर मासोंके अवयवी संवत्सरका पाठ युक्त है।
इससे ' संवत्सरखे देवलोक, देवलोकसे वायुलोक और वायुलोकसे आदित्यलोक ' इसप्रकार दोनों श्रुतियोंमें क्रम निष्पन्न होता है। इसलिए देवलोक और आदित्य के मध्य में वायुका निवेश युक्त है। ' वायुमब्दाद् ' यह सूत्र छान्दोग्य श्रुतिकी अपेक्षा से है। बृहदारण्यक श्रुति अनुसार तो ' देवलोकाद्वायुम् ' ऐसा सूत्र होना चाहिए। किन्तु दोनों श्रुतियोंमें वायुका स्थान देवलोक और आदित्य के बीच में है॥ २
4.3.3 · चतुर्थ अध्याय तृतीय पाद सूत्र ३
तटितोऽधि वरुणः संबन्धात् ॥ ४.३.३ ॥
पदच्छेद — तडितः , अघि , वरुणः , सम्बन्धात्
सूत्रार्थ — ( वडितः ) विद्युत् लोकसे ( अधि ) ऊपर ( वरुणः ) वरुण लोक है, ( संबन्धात् ) क्योंकि वरुणका विद्युत् के साथ सम्बन्ध है।
शाङ्करभाष्य
आदित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतम् इत्यस्या विद्युत उपरिष्टात् स वरुणलोकम् इत्ययं वरुणः संबध्येत अस्ति हि संबन्धो विद्युद्वरुणयोः यदा हि विशाला विद्युतस्तीव्रस्तनितनिर्घोषा जीमूतोदरेषु प्रनृत्यन्ति अथ आपः प्रपतन्ति विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा इति च ब्राह्मणम् अपां च अधिपतिर्वरुण इति श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धिः वरुणादधि इन्द्रप्रजापती स्थानान्तराभावात् पाठसामर्थ्याच्च आगन्तुकत्वादपि वरुणादीनामन्ते एव निवेशः वैशेषिकस्थानाभावात् विद्युच्च अन्त्या अर्चिरादौ वर्त्मनि।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' आदित्याच्चन्द्रमसं ० ' ( आदित्य से चन्द्रमाको और चन्द्रमासे विद्युतको प्राप्त होता है ) इस प्रकार इस विद्युत्से ऊपर वह वरुणलोकको जाता है, ऐसा इस वरुणका सम्बन्ध है। विद्युत् और वरुणका सम्बन्ध है | जब तीव्र गर्जना निर्घोष करती हुई विशाल विद्युत् मेघोंके उदरमें नृत्य करती है यथा हि लोके कश्चिद्ग्रामं नगरं वा प्रतिष्ठा समानोऽनुशिष्यते - गच्छेत स्त्वममुं गिरिं ततो न्यग्रोधं ततो नदीं ततो ग्रामं ततो नगरं वा प्राप्स्यसीत्येवमिहाप्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणतब जल गिरता है — ' विद्योतते स्तनयति ' ( विद्युत् चमकती है, मेघ गर्जता है वृष्टि होगी ऐसा लोग कहते हैं ) यह ब्राह्मण - श्रुति है | श्रुति और स्मृति में यह प्रसिद्ध है कि जलका अधिपति वरुण हैं। वरुणलोक के ऊपर इन्द्र और प्रजापति लोक हैं, क्योंकि उनके लिए अन्य स्थान नहीं है और पाठकी सामथ्यं है। वरुण आदिका आगन्तुक होनेसे भी अन्तमें ही निवेश है। कारण कि विशेष स्थानके न होनेसे अचिरादि मार्गमें विद्युत् अन्तिम स्थान है॥ ३
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' स वायुलोकं स वरुणलोकम् ' इस कौषीतकी श्रुतिस्थ पाठक्रमसे वायुलोक के वनन्तर वरुणलोकका संनिवेश होना चाहिए। पूर्वपक्षी - वरुणका किसी विशेष श्रुतिद्वारा निर्धारित स्था . न होनेसे उसका पाठ अदृष्टार्थक है। सिद्धान्ती - ' स वायुलोकं स वरुणलोकम् ' इत्यादि श्रुतिसे पाठन क्रम तो है, किन्तु उसका किसी विशेष श्रुतिसे स्थान निश्चित नहीं है, इसलिए आगन्तुक वरुण, इन्द्र और प्रजापति लोकोंका विद्युत् के अनन्तर ही अर्चिरादि मार्गमें स्थान युक्त है। इससे आदित्य से चन्द्रलोक, चन्द्रसे विद्युत्, विद्युत्से वरुण, वरुणसे इन्द्रलोक, इन्द्र लोकसे प्रजापतिलोकको जाता है॥३
आतिवाहिकाधिकरणम्
4.3.4 · चतुर्थ अध्याय तृतीय पाद सूत्र ४
आतिवाहिकास् तल्लिङ्गात् ॥ ४.३.४ ॥
पदच्छेद — अतिवाहिका , तल्लिङ्गात्
सूत्रार्थ — ( अतिवाहिका : ) वे अचिरादि ब्रह्मलोक में ले जानेके लिए आतिवाहिक हैं। ( तल्लिङ्गात् ) क्योंकि ' अमानवः स एतान्ब्रह्म गमयति ' इसप्रकार उसका लिङ्ग है।
शाङ्करभाष्य
तेष्वेव अर्चिरादिषु संशयः किमेतानि मार्गचिह्नानि उत भोगभूमयः अथवा नेतारो गन्तृ़णामिति। तत्र मार्गलक्षणभूता अर्चिरादय इति तावत्प्राप्तम् तत्स्वरूपत्वादुपदेशस्य यथा हि लोके कश्चिद्ग्रामं नगरं वा प्रतिष्ठासमानोऽनुशिष्यते गच्छ इतस्त्वममुं गिरिं ततो न्यग्रोधं ततो नदीं ततो ग्रामं ततो नगरं वा प्राप्स्यसीति एवमिहापि अर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षम् इत्याद्याह।
अथवा भोगभूमय इति प्राप्तम् तथाहि लोकशब्देन अग्न्यादीननुबध्नाति अग्निलोकमागच्छति इत्यादि लोकशब्दश्च प्राणिनां भोगायतनेषु भाष्यते मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोकः इति च तथा च ब्राह्मणम् अहोरात्रेषु ते लोकेषु सज्जन्ते इत्यादि। तस्मान्नातिवाहिका अर्चिरादयः। अचेतनत्वादप्येषामातिवाहिकत्वानुपपत्तिः चेतना हि लोके राजनियुक्ताः पुरुषा दुर्गेषु मार्गेष्वतिवाह्यान् अतिवाहयन्तीति।
एवं प्राप्ते ब्रूमः आतिवाहिका एवैते भवितुमर्हन्ति कुतः तल्लिङ्गात् तथा हि चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स एतान्ब्रह्म गमयति इति सिद्धवद्गमयितृत्वं दर्शयति तद्वचनं तद्विषयमेवोपक्षीणमिति चेत् न प्राप्तमानवत्वनिवृत्तिपरत्वाद्विशेषणस्य यद्यर्चिरादिषु पुरुषा गमयितारः प्राप्ताः ते च मानवाः ततो युक्तं तन्निवृत्त्यर्थं पुरुषविशेषणम् अमानव इति।। ननु तल्लिङ्गमात्रमगमकम् न्यायाभावात् नैष दोषः
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इन अर्चिरादिमें संशय होता है कि क्या ये मार्गचिह्न हैं वा मोगस्थान हैं अथवा ब्रह्मलोकको जानेवालोंके नेता - ले जानेवाले हैं? पूर्वपक्षी - ऐसा संशय होनेपर ये अचिरादि मार्गके चिह्नरूप हैं, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि उस मार्ग के स्वरूपको कहनेवाला उपदेश है।
जैसे लोकमें ग्राम अथवा नगरको प्रस्थानकी इच्छा करनेवाले किसीको यह उपदेश किया जाता है कि तुम वहांसे उस पर्वतकी ओर जाओ, वहाँसे उस वटवृक्षकी ओर, वहाँसे नदीको, उससे आगे ग्राम अथवा नगरको प्राप्त हो जाओगे, वैसे यहाँ भी अर्चिसे अहको, अहमे आपूर्यमाणपक्षको प्राप्त होता है, इत्यादि श्रुति कहती है। अथवा ये अचिरादि भोगस्थान हैं, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि ' अग्निलोकमा ० ' ( अग्निलोकको आ जाता है ) इत्यादि श्रुति लोकशब्द के साथ अग्नि आदिका सम्बन्ध करती है।
' मनुष्यलोकः ० ' ( मनुष्यलोक, पितृलोक, देवलोक ) इसप्रकार लोकशब्द प्राणियोंके भोगस्थानोंमें कहा जाता है। और इसीप्रकार ' अहोरात्रेषु ' ( उन अह और रात्रिलोकोंमें वे कर्मी और उपासक भोगका अनुभव करते हैं ) इत्यादि ब्राह्मणवचन है। इसलिए अर्चिरादि अतिवाहिक नहीं हैं, अचेतन होनेसे भी ये आतिवाहिक नहीं हो सकते, क्योंकि लोकमें राजासे नियुक्त चेतन ही दुर्ग मार्गों में जानेवालों को ले जाते हैं। सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- ये अचिरादि आतिवाहिक ही हो सकते हैं, किससे?
इससे कि उनका लिङ्ग है। जैसे कि ' चन्द्रमसो विद्युतं ' ( वे उपासक चन्द्रलोकसे विद्युत्को प्राप्त होते हैं, वहां से वह अमानव पुरुष इन्हें सत्यलोकस्थ ब्रह्माको प्राप्त करा देता है ) यह श्रुति सिद्ध - सा गमयितृत्व दिखलाती है। यदि कहो कि वह वचन उसके विषयमें ही उपक्षीण होता है तो ऐसा नहीं, क्योंकि ' अमानव ' यह विशेषण प्राप्त हुए मानवत्वकी निवृत्तिके लिए है। अचिरादिमें जो ले जानेवाले पुरुष प्राप्त हैं यदि वे मानव हों तो उनकी निवृत्तिके लिए ' अमानव ' यह पुरुष .. विशेषण युक्त है॥ ४
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * उपासक उत्क्रान्तिके अनन्तर • रश्मिद्वारा अर्चिको प्राप्त होता है, अर्चिसे अह, शुक्लपक्ष, षड्मास, उत्तरायण, संवत्सर, देवलोक, वायुलोक, आदित्यलोक, चन्द्रलोक, विद्युत्लोक, वरुणलोक, इन्द्रलोक, प्रजापतिलोक इस क्रमसे ब्रह्मलोकको जाता है। इसप्रकार अर्चिरादि क्रमका निरूपण किया गया है। अब उनके स्वरूपका निरूपण किया जाता है | चिह्न निर्देश के साम्य, लोकशब्द और नेतृत्व लिङ्गसे संशय होता है। पूर्वपक्षी - ये अचिरादि वृक्ष, नदी आदिके समान मार्गके चिह्न अथवा भोगके स्थान हैं, क्योंकि दोनों प्रकार उपपन्न हो सकते हैं। अचिरादि जड़ हैं। अतः आतिवाहिक नहीं हो सकते। सिद्धान्ती - अचिरादि अभिमानी देवताविशेष आतिवाहिक हैं॥ ४
4.3.5 · चतुर्थ अध्याय तृतीय पाद सूत्र ५
उभयव्यामोहात्तत्सिद्धेः ॥ ४.३.५ ॥
पदच्छेद — उभयव्यामोहात् , तत्सिद्धेः
सूत्रार्थ — ( उमयव्यामोहात् ) मार्ग और गन्ता जड़ और अस्वतन्त्र होनेसे उपासककी ऊर्ध्वं - गति नहीं हो सकती, इसलिए ' स्वयं प्रयत्न शून्य अन्य चेतनसे ले जाया जाता है ' इस न्वायसे अनुगृहीत लिङ्गसे ( तत्सिद्धे : ) नेतृत्वको सिद्धि होती है।
शाङ्करभाष्य
ननु तल्लिङ्गमात्रमगमकम्, न्यायाभावात्। नैष दोष : -
* ये तावदर्चिरादिमार्गगास्ते देहवियोगात्संपिण्डितकरणग्रामा इत्यस्वतन्त्रा अर्चिरादीनामप्यचेतनत्वादस्वातन्त्र्यमित्यतोऽचिराद्यभिमानिनश्चेतना देवताविशेषा अतिया - त्रायां नियुक्ता इति गम्यते। लोकेऽपि हि मत्तमूर्छितादयः संपिण्डित करणाः परप्रयुक्तवर्मानो भवन्ति। अनवस्थितत्वादप्यर्चिरादीनां न मार्गलक्षणत्वोपपत्तिः, नहि रात्रौ प्रेतस्याहः स्वरूपाभिसंभव उपपद्यते। नच प्रतिपालनमस्तीत्युक्तं पुरस्तात्। ध्रुवत्वात्तु देवतात्मनां नायं दोषो भवति।
अर्चिरादिशब्दता चैषामर्चिराद्यभिमानादुपपद्यते। ' अर्चिषोऽहः ' ( छा ० ४।१५।५,५।१०।१ ) इत्यादिनिर्देशस्त्वातिवाहिकत्वेऽपि न विरुध्यते - अर्चिषा हेतुनाऽहरभिसंभवति। अह्ना हेतुना आपूर्यमाणपक्षमिति। तथा च लोके प्रसिद्वेष्वप्यातिवाहिकेष्वेवं जातीयक उपदेशो दृश्यते। गच्छ त्वमितो बलवर्माणं ततो जयसिंहं ततः कृष्णगुप्तमिति। * अपि चोपक्रमे ' तेऽर्चिरभिसंभवन्ति ' ( बृह ० ६।२।१५ ) इति संबन्धमात्रमुक्तम्, न संबन्धविशेषः कश्चित्।
उपसंहारे तु ' स एतान्ब्रह्म गययति ' ( छा ० ४।१५।६ ) इति संबन्धविशेषोऽतिवाह्यातिवाहकत्वलक्षण उक्तः। तेन स एवोपक्रमेऽपीति निर्धा र्यंते। संपिण्डितकरणत्वादेव च गन्तॄणां न तत्रोपभोगसंभवः। लोकशब्दस्त्वनुपभुञ्जानेष्वपि गन्तृषु गमयितुं शक्यते, अन्येषां तल्लोकवासिनां भोगभूमित्वात्। अतोऽग्निस्वामिकं लोकं प्राप्तोऽग्निनाऽतिवाह्यते, वायुस्वामिकं प्राप्तो वायुनेति योजयितव्यम् || ५ |
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु वह लिङ्गमात्र उक्तार्थका बोधक नहीं है, क्योंकि न्याय नहीं है? यह दोष नहीं है-
जो अचिरादि मार्ग जानेवाले हैं वे देहके वियोगसे एकीभूत करण समुदायवाले अस्वतन्त्र होते हैं और अचिरादि भी अचेतन होनेसे अस्वतन्त्र हैं, इसलिए अर्चिरादि अभिमानी चेतन देवता विशेष अतियात्रा में नियुक्त हैं, ऐसा ज्ञात होता है। लोकमें भी एकीभूत इन्द्रिय समुदायवाले मत्त और मूच्छित आदि अन्यसे प्रयुक्त हुए मार्गगामी होते हैं।
अनवस्थित होने से भी अर्चिरादिमें मार्ग ह्नित्व उपपन्न नहीं होता, क्योंकि रात्रिके मृतक में दिन स्वरूपका संभव उपपन्न नहीं होता, उसी प्रकार रात्रिके मृतक दिनकी प्रतीक्षा नहीं होती, यह पहले कहा जा चुका है। देवताओंके ध्रुव होने से यह दोष नहीं होता। अर्चिरादिके अभिमानसे इन देवताओं में अचिरादि शब्द उपपन्न होता है। ' अर्चिषो s हः ' ( असेि अहको प्राप्त होता है ) इत्यादि निर्देश तो अचिरादिके अतिवाहिक होनेपर मी विरुद्ध नहीं होता।
अचिरूप हेतु द्वारा अहको प्राप्त होते हैं, यह हेतुसे शुक्लपक्षको प्राप्त होते हैं। इसीप्रकार लोकमें प्रसिद्ध आतिवाहिकों में भी ' तू यहाँसे बलवर्माके पास जा, वहाँसे जयसिंहके पास, वहाँसे कृष्णगुप्तके पास जा ' इस प्रकारका उपदेश देखा जाता है। बौर ' तेऽचिरभिसंभवन्ति ' ( वे ज्योतिके अभिमानी देवताको प्राप्त होते हैं ) इस उपक्रममें भी सम्बन्धमात्र कहा गया है कोई सम्बन्ध विशेष नहीं कहा गया है।
और ' स एतान्ब्रह्म गमयति ' इस उपसंहार में तो अतिवाह्य और अतिवाहकत्वरूप सम्बन्ध विशेष कहा गया है। इससे उपक्रममें भी वही सम्बन्ध विशेष निर्धारित किया जाता है। एकीभूत हुए इन्द्रिय समग्रवाले होनेसे जानेवाले उपासकोंका वहाँ उपभोग संभव नहीं है। लोकशब्द तो उपभोग न करनेवाले गमन करने वालोंमें जाना जा सकता है, क्योंकि अन्य उस लोकवासियोंकी वह मोगभूमि है, इसलिए अग्निस्वामीवाले लोक में प्राप्त हुएको अग्नि ले जाता है। उसी प्रकार वायुस्वामी लोकमें प्राप्त हुएको वायु ले जाता है।
ऐसी योजना करनी चाहिए || ५ ||
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यदि अधिरादि अनेता और अचेतन हैं, और ब्रह्मलोक जानेवाले भी देहके न होनेसे इन्द्रिय व्यापार रहित हैं, तो मार्ग और गन्ता दोनोंके अज्ञानसे ऊर्ध्वगति नहीं होगी। इसलिए ' स्वयं प्रयत्नशून्यश्चेतनान्तरेण नेयः ' ' स्वयं प्रयत्न शून्य पुरुष अन्य चेतनसे ले जाया जाना युक्त है ' इस लौकिक न्यायके अनुग्रह से अचिरादिमें नेतृत्व सिद्ध होता है।
* ' स एतान्ब्रह्म गमयति ' इस वाक्यशेष से यह सिद्ध होता है कि अर्चिरादि आतिवाहिक चेतन देवता हैं, मार्ग के चिह्न नहीं हैं, वे उपासकको ऊर्ध्वं ले जाते हैं, वे अपने - अपने लोक में प्राप्त हुए उपासकको अपने - अपने लोकसे आगे - आगे के लोकमें पहुँचाते हैं॥ ५
4.3.6 · चतुर्थ अध्याय तृतीय पाद सूत्र ६
वैद्युतेनैव ततस् तच्छ्रुतेः ॥ ४.३.६ ॥
शाङ्करभाष्य
ततो विद्युदभिसंभवनादूर्ध्वं विद्युदनन्तरवर्तिनैवामानवेन पुरुषेण वरुणलोकादिष्वतिवाह्यमाना ब्रह्मलोकं गच्छन्तीत्यवगन्तव्यम् तान्वैद्युतात्पुरुषोऽमानवः स एत्य ब्रह्मलोकं गमयति इति तस्यैव गमयितृत्वश्रुतेः। वरुणादयस्तु तस्यैव अप्रतिबन्धकरणेन साहाय्यानुष्ठानेन वा केनचित् अनुग्राहका इत्यवगन्तव्यम्। तस्मात्साधूक्तम् आतिवाहिका देवतात्मानोऽर्चिरादय इति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु अतिवाहकत्व पक्षमें वरुण आदिमें आतिवाहिकत्व कैसे संभव होगा? क्योंकि विद्युत् लोकके ऊपर ही वरुण आदि कहे गये हैं और विद्युत् के अनन्तर ब्रह्मलोक प्राप्ति पर्यन्त अमानव पुरुष ही गमयिता सुना गया है? इसपर उत्तर कहते हैं-
पदच्छेद - वैद्युतेन, एव, ततः, तच्छू तेः।
सूत्रार्थ - ( वैद्युतेनंव ) विद्युत् लोकमे स्थित हुए अमानव पुरुषसे ही ( ततः ) विद्युत् प्राप्तिसे ऊपर नीयमान उपासक कार्यं ब्रह्मको प्राप्त करते हैं, ( तच्छ्रुतेः ) क्योंकि उसके विषय में ' अमानवः स एत्थ ब्रह्मलोकं गमयति ' यह श्रुति है। ठीक कहा गया है कि अचिरादि आतिवाहिक देवतात्मा हैं॥ ६
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.३.८ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
कार्याधिकरणम्
4.3.7 · चतुर्थ अध्याय तृतीय पाद सूत्र ७
कार्यं बादरिरस्य गत्युपपत्तेः ॥ ४.३.७ ॥
पदच्छेद — कार्यम् , बादरि , अस्य गत्युपपत्तेः । सूत्रार्थं - ( कार्यम् ) कार्यं ब्रह्मका ही ' स एतान्ब्रह्म गमयति ' इस श्रुतिमें गन्तव्यरूपसे ग्रहण
शाङ्करभाष्य
स एनान्ब्रह्म गमयति इत्यत्र विचिकित्स्यते किं कार्यमपरं ब्रह्म गमयति आहोस्वित्परमेवाविकृतं मुख्यं ब्रह्मेति। कुतः संशयः ब्रह्मशब्दप्रयोगात् गतिश्रुतेश्च। तत्र कार्यमेव सगुणमपरं ब्रह्म एनान्गमयत्यमानवः पुरुष इति बादरिराचार्यो मन्यते कुतः अस्य गत्युपपत्तेः अस्य हि कार्यब्रह्मणो गन्तव्यत्वमुपपद्यते प्रदेशवत्त्वात् न तु परस्मिन्ब्रह्मणि गन्तृत्वं गन्तव्यत्वं गतिर्वा अवकल्पते सर्वगतत्वात्प्रत्यगात्मत्वाच्च गन्तृ़णाम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' स ' एनान्ब्रह्म गमयति ' ( वह अमानव पुरुष इन उपासकों को ब्रह्मके
पास पहुँचता है ) यहां सन्देह होता है कि क्या कार्यं अपर ब्रह्म के पास पहुँचता है अथवा विकृत
मुख्य परब्रह्म के पास ले
श्रुति है। संशय होनेपर • जाता है? संशय किससे होता है? इससे कि ब्रह्म शब्दका प्रयोग और गति अमानव पुरुष इन उपासकों को कार्यं सगुण अपरब्रह्मके प्रति ही ले जाता है,
ऐसा बादरि आचार्य . मानते हैं। किससे? इससे कि उसमें गति उपपन्न होती है। इस कार्य ब्रह्ममें
गन्तव्यत्व उपपन्न होता है, क्योंकि परिच्छिन्न है। परन्तु परब्रह्म में गन्तृत्व, गन्तव्य अथवा गति नहीं हो सकती, करण कि वह सवंगत है और गन्ताओंका प्रत्यक् आत्मा है॥ ७
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.३.८ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
4.3.8 · चतुर्थ अध्याय तृतीय पाद सूत्र ८
विशेषितत्वाच् च ॥ ४.३.८ ॥
पदच्छेद — विशेषितत्वात् , च
सूत्रार्थ — और ' ब्रह्मलोकान्नगमयति ' अन्य श्रुतिमें विशेषित होने से कार्यं ब्रह्मविषयक ही गति अवगत होती है। वहाँसे विद्युत्लोकमें प्राप्त होनेके पश्चात् विद्युत् के अनन्तरवर्ती अमानव पुरुष से ही वरुणलोक आदि अतिवाह्यमान ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं, ऐसा समझना चाहिए, क्योंकि ' तान्वैद्युतात्पुरुषो ० ' ( विद्युत्लोक में पहुँचे हुए उन उपासक लोगोंको वह अमानव पुरुष आकर विद्युत् लोकसे ब्रह्मलोकमें तो उसके अप्रतिबन्धले जाता है ) यह उस अमानव पुरुषकी गमयितृत्व श्रुति है। वरुण आदि करण अथवा किसी सहायता के अनुष्ठानसे अनुग्राहक होते हैं, ऐसा समझना चाहिए। इसलिए यह
शाङ्करभाष्य
ब्रह्मलोकान्गमयति ते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति इति च श्रुत्यन्तरे विशेषितत्वात् कार्यब्रह्मविषयैव गतिरिति गम्यते न हि बहुवचनेन विशेषणं परस्मिन्ब्रह्मण्यवकल्पते कार्ये तु अवस्थाभेदोपपत्तेः संभवति बहुवचनम्। लोकश्रुतिरपि विकारगोचरायामेव संनिवेशविशिष्टायां भोगभूमावाञ्जसी गौणी त्वन्यत्र ब्रह्मैव लोक एष सम्राट् इत्यादिषु। अधिकरणाधिकर्तव्यनिर्देशोऽपि परस्मिन्ब्रह्मणि अनाञ्जसः स्यात्। तस्मात् कार्यविषयमेवेदं नयनम्।। ननु कार्यविषयेऽपि ब्रह्मशब्दो नोपपद्यते समन्वये हि समस्तस्य जगतो जन्मादिकारणं ब्रह्मेति स्थापितम् इत्यत्रोच्यते
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' ब्रह्मलोकान् ' ( एक अमानव पुरुष आकर इन्हें ब्रह्मलोकों में ले जाता है वे उन ब्रह्मलोकों में हिरण्यगर्भकी परमायु तक अनन्त संवत्सरों तक निवास करते हैं ) इसप्रकार अन्य श्रुतिमें विशेषित होनेसे कार्यं ब्रह्मविषयक ही गति है, ऐसा ज्ञात होता है। क्योंकि परब्रह्म में बहुवचन से विशेषण उपपन्न नहीं होता। कार्यं ब्रह्ममें तो अवस्थाभेदकी उपपत्ति होनेसे बहुवचन संभव है। लोकश्रुति मी ( लोकोंका श्रवण मी ) विकार विषयक संनिवेश ( सम्बन्ध ) विशिष्ट मोगभूमि में ही मुख्य है और अन्यत्र ' ब्रह्मैव लोक एष सम्राट् ' ( हे सम्राट्! यह ब्रह्म ही लोक है ) इत्यादिमें तो गौणी है। अधिकरण और अधिकतंव्य निर्देश भी परब्रह्ममें मुख्य नहीं होगा। इसलिए यह उपासकका नयन कार्यब्रह्मविषयक ही है॥ ८
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — & कार्यं ब्रह्म गन्तव्य है, अब इसमें ' विशेषितत्वाच्च ' यह दूसरा हेतु कहते हैं। ' ब्रह्मलोकेषु ' इस श्रुतिमें बहुवचन, लोकशब्द और बाधारार्थंक सप्तमी विभक्ति इन हेतुबोंसे कार्यं ब्रह्म ही गन्तव्य सिद्ध होता है, क्योंकि उपाधिसे कार्यब्रह्ममें बहुवचन आदि उपपन्न होते हैं॥ ८
4.3.9 · चतुर्थ अध्याय तृतीय पाद सूत्र ९
सामीप्यात् तु तद्व्यपदेशः ॥ ४.३.९ ॥
पदच्छेद — सामीप्यात् , तु , तद्वयपदेशः
सूत्रार्थ — ( सामीप्यात् ) कार्यब्रह्म कारणब्रह्मकी संनिधिमें है, अतः ( तद्वयपदेशः ) कार्यब्रह्ममें भी कारण ब्रह्मका शब्द प्रयोग होता है। ( तु ) शब्द शङ्का निवृत्यर्थ है।
शाङ्करभाष्य
तुशब्द आशङ्काव्यावृत्त्यर्थः परब्रह्मसामीप्यात् अपरस्य ब्रह्मणः तस्मिन्नपि ब्रह्मशब्दप्रयोगो न विरुध्यते। परमेव हि ब्रह्म विशुद्धोपाधिसंबन्धं क्वचित्कैश्चिद्विकारधर्मैर्मनोमयत्वादिभिः उपासनाय उपदिश्यमानम् अपरमिति स्थितिः।। ननु कार्यप्राप्तौ अनावृत्तिश्रवणं न घटते न हि परस्माद्ब्रह्मणोऽन्यत्र क्वचिन्नित्यतां संभावयन्ति दर्शयति च देवयानेन पथा प्रस्थितानामनावृत्तिम् एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते इति तेषामिह न पुनरावृत्तिरस्ति तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति इति च अत्र ब्रूमः
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु कार्यब्रह्मविषयक भी ब्रह्मशब्द उपपन्न नहीं होता, क्योंकि समन्वय अधिकरणमें समस्त जगत् के जन्म आदिका कारण ब्रह्म ही है - ऐसा प्रतिपादित किया गया है? इसपर कहते हैं-
' तु ' शब्द शङ्काकी व्यावृत्तिके लिए है। अपरब्रह्मको परब्रह्म के समीप होनेसे उसमें भी ब्रह्म शब्दका प्रयोग विरुद्ध नहीं है, क्योंकि विशुद्ध उपाधि विशिष्ट परब्रह्म ही कहींपर किन्हीं मनोमयाव आदि विकार धर्मोसे उपासनाके लिए उपदिष्ट हुआ अपरब्रह्म होता है, ऐसी स्थिति है॥ ९
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यद्यपि ब्रह्म शब्द कार्यब्रह्म में मुख्य - वृत्ति से अनुपपन्न है, तो भी उसमें उपासना के लिए गौणी वृत्तिसे ब्रह्मशब्दका प्रयोग हो सकता है, क्योंकि परब्रह्म ही विशुद्ध उपाधि विशिष्ट होकर कार्यं ब्रह्म है || ९ ||
4.3.10 · चतुर्थ अध्याय तृतीय पाद सूत्र १०
कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परम् अभिधानात् ॥ ४.३.१० ॥
पदच्छेद — कार्यात्यये , तदध्यक्षेण , सह , अतः , परम् अभिधानात्
सूत्रार्थ — ( कार्यात्यये ) कार्यं ब्रह्मलोकका विनाश होनेपर उस लोक में उत्पन्न आत्मसाक्षादकारवाले तत्त्वज्ञानी ( तदध्यक्षेण सह ) उस लोकके अध्यक्ष - हिरण्यगर्भके साथ ( अतः ) कार्यब्रह्मसे ( परम् ) परब्रह्मको प्राप्त होते हैं, ( अभिधानात् ) क्योंकि ऐसा श्रुतिमें अभिधान है।
शाङ्करभाष्य
कार्यब्रह्मलोकप्रलयप्रत्युपस्थाने सति तत्रैव उत्पन्नसम्यग्दर्शनाः सन्तः तदध्यक्षेण हिरण्यगर्भेण सह अतः पर परिशुद्धं विष्णोः परमं पदं प्रतिपद्यन्ते इतीत्थं क्रममुक्तिः अनावृत्त्यादिश्रुत्यभिधानेभ्योऽभ्युपगन्तव्या। न ह्यञ्जसैव गतिपूर्विका परप्राप्तिः संभवतीत्युपपादितम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु उपासकको कार्यब्रह्मकी प्राप्ति होनेपर अनावृत्ति श्रुति नहीं घटती, क्योंकि परब्रह्मक्षे इत्यादिनेति। इदानीं सूत्रैरेवोपदर्श्यतेलाती है। उनकी इस संसार में पुनरावृत्ति नहीं होती, क्योंकि ' तयोर्ध्वमावनमृतत्वमेति ' ऐसी श्रुति है। ऐसा यदि कहो तो इसपर हम कहते हैं-
कार्यं ब्रह्मलोकका प्रलय उपस्थित होनेपर वहाँपर जिनको सम्यग्दर्शन उत्पन्न हुजा है ऐसे उत्पन्न हुए सम्यग्दर्शनवाले तत्त्वदर्शीलोग उस लोकके अध्यक्ष - हिरण्यगमंके साथ इससे पर परिशुद्ध विष्णु के परमपदको प्राप्त होते हैं। इसप्रकार क्रम मुक्ति अनावृत्ति आदि श्रुति अभिधानों - वचनों से स्वीकार करनी चाहिए, क्योंकि परब्रह्मकी प्राप्ति गति पूर्वक मुख्य नहीं हो सकती, ऐसा हमने ' उपपत्ति ' पदसे उपपादन किया है॥ १०
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * उत्क्रान्तिके अनन्तर अर्चिरादि गति पूर्वक परब्रह्मकी प्राप्ति नहीं हो सकती। अतः छान्दोग्य आदिमें अनावृत्ति आदिका कथन क्रममुक्तिको लेकर है, इसलिए कोई विरोध नहीं है॥ १०
4.3.11 · चतुर्थ अध्याय तृतीय पाद सूत्र ११
स्मृतेश् च ॥ ४.३.११ ॥
पदच्छेद — स्मृतेः च
सूत्रार्थ — और ' ब्रह्मणा सह ' इस स्मृतिसे भी कार्यं ब्रह्म विषयक गति सुनी जाती है।
शाङ्करभाष्य
स्मृतिरप्येतमर्थमनुजानाति ब्रह्मणा सह ते सर्वे संप्राप्ते प्रतिसंचरे। परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् इति। तस्मात्कार्यब्रह्मविषया एव गतिश्रुतयः इति सिद्धान्तः।। कं पुनः पूर्वपक्षमाशङ्क्य अयं सिद्धान्तः प्रतिष्ठापितः कार्यं बादरिः इत्यादिनेति स इदानीं सूत्रैरेवोपदर्श्यते
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' ब्रह्मणा सह ० ' ( महाप्रलय प्राप्त होनेपर पर हिरण्यगमं ( समष्टि लिङ्ग शरीररूप विकार ) का अन्त होनेपर ब्रह्मलोकवासी वे सब तत्त्वदर्शी ब्रह्मा के साथ परब्रह्मको प्रविष्ट प्राप्त होते हैं ) यह स्मृति मी इस अर्थका अनुमोदन करती है। इसलिए कार्यं ब्रह्मविषयक गति श्रुति है, ऐसा सिद्धान्त है॥ ११
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.३.१४ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
4.3.12 · चतुर्थ अध्याय तृतीय पाद सूत्र १२
परं जैमिनिर् मुख्यत्वात् ॥ ४.३.१२ ॥
पदच्छेद — परम , जैमिनिः , मुख्यत्वात् । मन्यत्र कहीं भी नित्यताकी संभावना नहीं है । ' एतेन प्रतिपद्यमाना ० ' ( इस देवपथ से जानेवाले इस मानव आवर्त में नहीं लौटते ) यह श्रुति देवयान मार्गसे प्रस्थान किये हुएके लिए अनावृत्ति दिख
शाङ्करभाष्य
जैमिनिस्त्वाचार्यः स एनान्ब्रह्म गमयति इत्यत्र परमेव ब्रह्म प्रापयतीति मन्यते कुतः मुख्यत्वात्। परं हि ब्रह्म ब्रह्मशब्दस्य मुख्यमालम्बनम् गौणमपरम् मुख्यगौणयोश्च मुख्ये संप्रत्ययो भवति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु पुन : किस पूर्वपक्षकी शङ्क। कर ' कार्य बादरिः ' इत्यादिसे यह सिद्धान्त प्रतिष्ठापित किया गया है? अब वह सूत्रोंसे ही दिखलाया जाता है-
सूत्रार्थ - ( जैमिनि : ) जैमिनि आचार्यका मत है कि ( परम् ) गतिका विषय परब्रह्म है, ( मुख्यत्वात् ) क्योंकि परब्रह्म ही ब्रह्मशब्दका मुख्य आलम्बन है।
जैमिनि आचार्यं तो ' स एनान्ब्रह्म गमयति ' यहाँ परब्रह्मको ही प्राप्त कराता है, ऐसा मानते हैं। किससे? इससे कि वह मुख्य है। परब्रह्म ही ब्रह्मशब्दका मुख्य बालम्बन है और अपर गौण है। मुख्य और गौण में मुख्य में संप्रत्यय होता है॥ १२
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.३.१४ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
4.3.13 · चतुर्थ अध्याय तृतीय पाद सूत्र १३
दर्शनाच् च ॥ ४.३.१३ ॥
पदच्छेद — दर्शनात् च
सूत्रार्थ — और ' तयोर्ध्वमायन्नमृवमेति ' इत्यादि श्रुति भी गतिपूर्वक अमृतत्व दिखलाती है।
शाङ्करभाष्य
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति इति च गतिपूर्वकममृतत्वं दर्शयति अमृतत्वं च परस्मिन्ब्रह्मण्युपपद्यते न कार्ये विनाशित्वात्कार्यस्य अथ यत्रान्यत्पश्यति तदल्पं तन्मर्त्यम् इति प्रवचनात् परविषयैव च एषा गतिः कठवल्लीषु पठ्यते न हि तत्र विद्यान्तरप्रक्रमोऽस्ति अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मात् इति परस्यैव ब्रह्मणः प्रक्रान्तत्वात्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति ' ( हृदय देशसे निकली हुई उस मुख्य सुषुम्ना नाड़ीसे ऊध्वं जाकर अमृतभावको प्राप्त होता है ) यह श्रुति गतिपूर्वक अमृतत्व दिखलाती है, और अमृतत्त्व परब्रह्ममें उपपन्न होता है कार्यं ब्रह्ममें नहीं, क्योंकि कायं ब्रह्म विनाशी है। ' अथ यन्त्रान्यत् ० ' ( अब जिस विद्यावस्थामें अन्यको देखता है वहु अल्प है वह मर्त्य है ) इस प्रवचन से परविषयक ही यह गति कठवल्लीमें पठित है। उसमें अन्य अपर विद्याका प्रक्रम- प्रकरण नहीं है, क्योंकि ' अन्यत्र धर्माद ० ' ( धर्मसे भिन्न और अधर्मं से भिन्न है ) इस प्रकार परब्रह्मका ही उपक्रम किया गया है।। १३
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.३.१४ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
4.3.14 · चतुर्थ अध्याय तृतीय पाद सूत्र १४
न च कार्ये प्रविपचयभिसंधिः ॥ ४.३.१४ ॥
पदच्छेद — न , च , कार्ये , प्रतिपत्त्यभिसन्धिः
सूत्रार्थ — ( प्रतिपत्त्यभिसन्धि : ) ' प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये ' यह गृह प्राप्तिरूप सङ्कल्प ( च ) मी ( न कार्ये ) कार्यं ब्रह्मविषयक नहीं है, क्योंकि ' ते यदन्तरा ' इससे कार्य ब्रह्मसे मित्र परब्रह्म ही प्रकृत है। यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि वाक्य और श्रुति प्रमाणसे दुर्बल प्रकरण बाधित है, अतः गृहप्राप्तिरूप सङ्कल्प कार्यब्रह्म विषयक है, इसलिए कार्यं ब्रह्म ही गन्तव्य है।
शाङ्करभाष्य
* अपि च ' प्रजापतेः समां वेश्म प्रपद्ये ' ( छा ० ८ | १४ | १ ) इति नायं कार्यविषयः प्रतिपत्त्यभिसंधिः, ' नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म ' ( छा ० ८ १४ 1१ ) इति कार्यविलक्षणस्य परस्यैव ब्रह्मणः प्रकृतत्वात्, ' यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानाम् ' ( छा ० ८ | १४ | १ ) इति च सर्वात्मत्वेनोपक्रमणात्, ' न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ' ( श्वेता ० ४। १ ९ ) इति च परस्यैव ब्रह्मणो यशोना मत्वप्रसिद्धेः।
सा चेयं वेश्मप्रतिपत्तिर्गतिपूर्विका हार्दविद्यायामुदिता - ' तदपराजिता पूर्ब्रह्मण प्रभुविमितं हिरण्मयम् ' ( छा ० ८/५/३ ) इत्यत्र। पदेरपि च गत्यर्थत्वान्मार्गापेक्षाऽवसीयते। तस्मात्परब्रह्मविषया गतिश्रुनय इति पक्षान्तरम्। तावेतौ द्वौ पक्षावाचार्येण सूत्रितौ गत्युपपत्त्यादिभिरेको मुख्यत्वादिभिरपरः। तत्र गत्युपपच्यादयः प्रभवन्ति मुख्यत्वादीनाभासयितुं नतु मुख्यत्वादयो गत्युपपत्यादीनित्याद्य एव सिद्धान्तो व्याख्यातो द्वितीयस्तु पूर्वपक्षः।
न ह्यसत्यपि संभवे मुख्यस्यैवार्थस्य ग्रहणमिति कश्चिदाज्ञापयिता विद्यते। परविद्याप्रकरणेऽपि च तत्स्तुत्यर्थं विद्यान्तराश्रयगत्यनुकीर्त नमुपपद्यते - ' विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ' ( छा ० ८/६/६ ) इतिवत्। ' प्रजापतेः समां बेइम प्रपद्ये ' ( छा ० ८ १४। १ ) इति तु पूर्ववाक्य विच्छेदेन कार्येऽपि प्रतिपत्त्याभिसंधिर्न विरुध्यते। सगुणेऽपि च ब्रह्मणि ' सर्वात्मत्व संकीर्तनं ' सर्वकर्मा सर्वकामः ' इत्यादिवदवकल्पते। तस्मादपरविपया एव गतिश्रुतयः।
केचित्पुनः- पूर्वाणि पूर्वपक्ष सूत्राणि भवन्त्युत्तराणि सिद्धान्तसूत्राणीत्येतां व्यवस्थामनुरुध्यमानाः परविषया एव गतिश्रुतीः प्रतिष्ठापयन्ति, तदनुपपन्नम्, गन्तव्यत्वानुपपत्ते ब्रह्मणः - ' यत्सर्वगतं सर्वान्तरं सर्वात्मकं च परं ब्रह्म ', आकाशवत्सर्वग तश्च नित्यः ', ' यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म ' ( बृह ० ३ | ४ | १ ), ' य आत्मा सर्वान्तरः ' ( बृह ० ३।४।१ ), आत्मैवेदं सर्वम् ' ( छा ० ७।२५ / २ ), ' ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ' ( मु ० २।२।११ ) इत्यादिश्रुतिनिर्धारितविशेषम्, तस्य गन्तव्यता न कदाचिदप्युपपद्यते।
नहि गतमेव गम्यते। अन्यो ह्यन्यद्गच्छतीति प्रसिद्धं लोके। ननु लोके गतस्यापि गन्तव्यता देशान्तरविशिष्टस्य दृष्टा। यथा पृथिवीस्थ एव पृथिवीं देशान्तरद्वारेण गच्छतीति। यथाऽनन्यत्वेऽपि बालस्य कालान्तरविशिष्टं वार्धकं स्वात्मभूतमेव गन्तव्यं दृष्टम्, तद्वद्ब्रह्मणोऽपि सर्वशक्त्युपेतत्वात्कथंचिद्गन्तव्यता स्यादिति - न, प्रतिषिद्धसर्वविशेषत्वाद्ब्रह्मणः।
' निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् ' ( श्वेता ० ६।१ ९ ) ' अस्थूलमनण्वहस्व मदीर्घम् ' ( बृह ० ३1८1८ ), ' स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ' ( मु ० २।१।२ ), ' स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽमयो ब्रह्म ' ( बृह ० ४।४।२५ ), ' स एष नेति नेत्यात्मा ' ( बृह ० ३।९।२६ ) इत्यादिश्रुतिस्मृतिन्यायेभ्यो न देशकालादिविशेषयोगः परमात्मनि कल्पयितुं शक्यते। येन भूप्रदेशवयोवस्थान्यायेनास्य गन्तव्यता स्यात्। भूवयसोस्तु प्रदेशावस्थादिविशेष योगादुपपद्यते देशकालविशिष्टा गन्तव्यता।
जगदुत्पत्तिस्थितिप्रलयहेतुत्वश्रुतेरनेकशक्तित्वं ब्रह्मण इति चेत् - न, विशेषनिराकरणश्रुतीनामनन्यार्थ - त्वात्। उत्पत्त्यादिश्रुतीनामपि समानमनन्यार्थत्वमिति चेत् - न, तासामेकत्वप्रतिपादनपरत्वात्। मृदादिदृष्टान्तैर्हि सतो ब्रह्मण एकस्य सत्यत्वं विकारस्य चानृतत्वं प्रतिपादयच्छास्त्रं नोत्पत्त्यादिपरं भवितुमर्हति। कस्मात्पुनरुत्पत्त्यादिश्रुतीनां विशेष निराकरणश्रुतिशेषत्वं न पुनरितरशेषत्वमितरासामिति? उच्यते- विशेषनिराकरणश्रुतीनां निराकाङ्क्षार्थत्वात्।
न ह्यात्मन एकत्वनित्यत्वशुद्धत्वाद्यवगतौ सत्यां भूयः काचिदाकाङ्गोपजायते, पुरुषार्थसमाप्तिबुद्धयुपपत्तेः, ' तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ' ( ईशा ० ७ ), ‘ अमयं वै जनक प्राप्तोऽसि ' ( बृह ० ४।२।४ ), ' विद्वान्न विभेति कुतश्चन। एतं ह वाव न तपति, किमहं साधु नाकरवं, किमहं पाप अकरवम् ' ( तैत्ति ० २।९।१ ), इत्यादिश्रुतिभ्यः, तथैव च विदुषां तुष्ट्यनुभवादिदर्शनात्। विकारानृताभिसंध्यपवादाच्च ' मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ' इति।
अतो न विशेषनिराकरण तीनामन्य शेषत्वमवगन्तुं शक्यम्। नैवमुत्पत्त्यादिश्रुतीनां निराकाङ्क्षार्थप्रतिपादन सामर्थ्य मस्ति। प्रत्यक्षं तु तासामन्यार्थत्वं समनुगम्यते। तथा हि' तमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यति ' ( छा ० ६।८।३ ) इत्युपन्यस्योदर्के सत एवैकस्य जगन्मूलस्य विज्ञेयत्वं दर्शयति। ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व। तद्ब्रह्मेति ' ( तै ० ३ | १ | १ ) इति च।
एवमुत्पत्त्यादिश्रुतीनामैकात्म्यावगमपरत्वान्नानेकशक्तियोगो ब्रह्मणः। अतश्चगन्तव्यत्वानुपपत्तिः। ' न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति ' ( वृह ० ४। ४। ६ ) इति च परस्मिन् ब्रह्मणि गतिं निवार1 अ ० ४ पा ० ३ यति। तद्व्याख्यातम् -'स्पष्टो ह्येकेषाम् ' ( ब्रह्मसूत्र ४।२।१३ ) इत्यत्र। गतिकल्पनायां च गन्ता जीवो गन्तव्यस्य ब्रह्मणोऽवयवो विकारो वाऽन्यो वा ततः स्यात्। अत्यन्ततादात्म्ये गमनानुपपत्तेः। यद्येवं ततः किं स्यात् उच्यते?
यद्येकदेशस्ते नैकदेशिनो नित्यप्राप्तत्वान्न पुनर्ब्रह्मगमनमुपपद्यते, एकदेशैकदेशित्वकल्पनाच ब्रह्मण्यनुपपन्ना निरवयवत्वप्रसिद्धेः विकारपक्षेऽप्येतत्तुल्यम्, विकारेणापि विकारिणो नित्यप्राप्तत्वात्। नहि घटो मृदात्मतां परित्यज्यावतिष्ठते, परित्यागे वाऽभावप्राप्तेः। विकारावयवपक्षयोश्च तद्वतः स्थिरत्वाद्ब्रह्मणः संसारगमनमप्यनवक्लृप्तम्। अथान्य एव जीवो ब्रह्मणः। सोऽणुर्व्यापी मध्यमपरिमाणो वा भवितुमर्हति। व्यापित्वे गमनानुपपत्तिः, मध्यमपरिमाणत्वे चानित्यत्वप्रसङ्गः।
अणुत्वे कृत्स्नशरीरवेदनानुपपत्तिः। प्रतिषिद्धे चाणुत्वमध्यम परिमाणत्वे विस्तरेण पुरस्तात्। परस्माच्चान्यत्वे जीवस्य'तत्त्वमसि ' ( छा ० ६।। ७ ) इत्यादिशास्त्रबाधप्रसङ्गः। विकारावयवपक्षयोरपि समानोऽयं दोषः। विकारावयवयोस्तद्वतोऽनन्यत्वाददोष इति चेत् - न, मुख्यैकत्वानुपपत्तेः। सर्वेष्वेतेषु पक्षेध्वनिर्मोक्षप्रसङ्गः। संसार्यात्मत्वानिवृत्तेः। निवृत्तौ वा स्वरूपनाशप्रसङ्गः, ब्रह्मात्मत्वानभ्युपगमाच्च।
यत्तु कैश्चिज्जल्प्यते - मित्यानि नैमित्तिकानि कर्माण्यनुष्ठीयन्ते प्रत्यवायानुत्पत्तये, काम्यानि प्रतिषिद्धानि च परिहियन्ते स्वर्गनरकानवाप्तये, सांप्रतदेहोपभोग्यानि च कर्माण्युपभोगेनैव क्षिप्यन्त इत्यतो वर्तमानदेहपातादूर्ध्वं देहान्तरप्रतिसंधानकारणाभावात्स्वरूपावस्थानलक्षणं कैवल्यं विनापि ब्रह्मात्मतयैवंवृत्तस्य सेत्स्यतीति - तदसत्, प्रमाणाभावात्। न ह्येतच्छास्त्रेण केनचित्प्रतिपादितं मोक्षार्थीत्थं समाचरेदिति।
स्वमनीषया त्वेतत्तर्कितं यस्मात्कर्मनिमित्तः संसारस्तस्मान्निमित्ताभावान्न भविष्यतीति। न चैतत्तर्कयितुमपि शक्यते, निमित्ताभावस्य दुर्ज्ञानत्वात्। बहूनि हि कर्माणि जात्यन्तरसंचितानीष्टानिष्टविपाकान्येकैकस्य जन्तोः संभाव्यन्ते। तेषां विरुद्धफलानां युगपदुपभोगासंभवात्का निचिल्लब्धावसराणीदं जन्म निर्मिमते, कानिचित्तु देशकालनिमित्तप्रतीक्षाण्यासत इत्यतस्तेषामवशिष्टानां सांप्रतेनोपभोगेन क्षपणासंभवान्न यथावर्णितचरितस्थापि वर्तमानदेहपाते देहान्तरनिमित्ताभावः शक्यते निश्चेतुम्।
कर्मशेष सद्भावसिद्धिश्च तद्य इह रमणीयचरणाः ', ' ततः शेषेण ' इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः। स्यादेतत्- नित्यनैमित्तिकानि तेषां क्षेपकाणि भविष्यन्तीति, तन्न, विरोधाभावात्। सति हि विरोधे क्षेप्यक्षेपकभावो भवति। नच जन्मान्तरसंचितानां सुकृतानां नित्यनैमित्तिकैरस्ति विरोधः। शुद्धिरूपत्वाविशेषात्। दुरितानि त्वशुद्धिरूपत्वात्सति विरोधे भवतु क्षपणं नतु अं ० ४ पा ० ३ तावता देहान्तर निमित्ताभावसिद्धिः सुकृतनिमित्तत्वोपपत्तेः, दुरितस्याप्यशेषक्षपणानवगमात्।
नच नित्यनैमित्तिकानुष्ठानात्प्रत्यवायानुत्पत्तिमात्रम्, न पुनः फलान्तरोत्पत्तिरिति प्रमाणमस्ति, फलान्तरस्याप्यनुनिष्पादिनः संभवात्। स्मरति ह्यापस्तम्बः - ' तद्यथा फलार्थे निमिते छायागन्धावनूत्पद्येते एवं धर्मं चर्यमाणमर्था अनुत्पद्यन्ते ' इति। न चासति सम्यग्दर्शने सर्वात्मना काम्यप्रतिषिद्धवर्जनं जन्मप्रायणान्तराले केनचित्प्रतिज्ञातुं शक्यम्। सुनिपुणानामपि सूक्ष्मापराधदर्शना। संशयितव्यं तु भवति, तथापि निमित्ताभावस्य दुर्ज्ञानत्वमेव।
न चानभ्युपगम्यमाने ज्ञानगम्ये ब्रह्मात्मत्वे कर्तृत्वभोक्तृत्वस्वभावस्या त्मन कैवल्यमाकाङ्क्षितुं शक्यम्। अग्न्यौष्ण्यवत्स्वभावस्यापरिहारार्यत्वात्। स्यादेतत्। कर्तृत्वभोक्तृत्व कार्यमनर्थो न तच्छक्तिस्तेन शक्यत्यवस्थानेऽपि कार्यपरिहारा दुपपन्नो मोक्ष इति तच्च न, शक्तिसद्भावे कार्यप्रसवस्य दुर्निवारत्वात्। अथापि स्यान्न केवला शक्तिः कार्यमारभतेऽनपेक्ष्यान्यानि निमित्तानि, अत एकाकिनी सा स्थितापि नापराध्यतीति - तच्च न, निमित्तानामपि शक्तिलक्षणेन संबन्धेन नित्यसंबद्धत्वात्।
तस्मात्कर्तृत्वभोक्तृत्वस्वभावे सत्यात्मन्यसत्यां विद्यागस्यायां ब्रह्मात्मतायां न कथंचन मोक्षं प्रत्याशास्ति। श्रुतिश्च - ' नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' ( श्वेता ० ३।८ ) इति ज्ञानादन्यं मोक्षमार्ग वारयति। परस्मादनन्यत्वेऽपि जीवस्य सर्वव्यवहारलोपप्रसङ्गः।
प्रत्याक्षादिप्रमाणाप्रवृत्तेरिति चेत् - न, प्रोकप्रबोधात्स्वप्नव्यवहारवत्तदुपपत्तेः शास्त्रं च ' यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति ' ( बृह ० २ | ४ | १४, ४/५/१५ ) इत्यादिनाऽप्रबुद्धविषये प्रत्य क्षादिव्यवहार मुक्त्वा पुनः प्रबुद्धविषये ' यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् ' ( बृह ० २।४।१४, ४/५/१५ ) इत्यादिना तदभावं दर्शयति। तदेवं परब्रह्मविदो गन्तव्यादिविज्ञालस्य बाधितत्वान्न कथंचन गतिरुपपादयितुं शक्या। किंविषयाः पुनर्गतिश्रुतय इति?
उच्यतेसगुण विद्याविषया भविष्यन्ति। तथा हि- कचित्पञ्चाग्निविद्यां प्रकृत्य गतिरुच्यते, क्वचित्पर्यङ्कविद्यां क्वचिद्वैश्वानर विद्याम्। यत्रापि ब्रह्म प्रकृत्य गतिरुच्यते- ' यथा प्राणो ब्रह्मकं ब्रह्म खं ब्रह्म ' ( छा ० ४।१०१५ ) इति, ' अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म ' ( छा ० ७।१।१ ) इति च, तत्रापि वामनीत्वादिभिः सत्यकामादिभिश्च गुणैः सगुणस्यैवोपास्यत्वात्संभवति गतिः।
न कचित्परब्रह्मविषया गतिः श्राव्यते, यथा गतिप्रतिषेधः श्रावितः - ' न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ' ( बृह ० ४।४।६ ) इति। ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' ( तै ० २1१1१ ) इत्यादिषु तु सत्यप्यानोतेर्गत्यर्थत्वे वर्णितेन न्यायेन देशान्तरप्राप्त्यसंभवात्स्वरूपप्रतिपत्तिरेवेयम विद्याध्यारोपितनामरूपप्रविलयापेक्षयाऽभिधीयते - ' ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति ( बृह ० ४।४।७ ) इत्यादिवदिति द्रष्टव्यम्। अपि च परविषया गतिर्व्याख्यायमाना प्ररोचनाय वा स्यादनुचिन्तनाय वा?
तत्र प्ररोचनं तावद्ब्रह्माविदो न गत्युक्त्या क्रियते, स्वसंवेद्येनैवाव्यवहितेन विद्यासमर्पितेन स्वास्थ्येन तत्सिद्धेः। नच नित्यसिद्ध निःश्रेयसनिवेदनस्या साध्यफलस्य विज्ञानस्य गत्यनुचिन्तने काचिदपेक्षोपपद्यते। तस्मादपरब्रह्मविषया गतिः। तत्र परापरब्रह्म विवेकानवधारन परस्मिन्ब्रह्मणि वर्तमाना गतिश्रुतयः परस्मिन्नध्यारोप्यन्ते। किं द्वे ब्रह्मणी - परमपरं चेति? बाढं द्वे - ' एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारः ' ( प्र ० ५१२ ) इत्यादिदर्शनात्। किं पुनः ब्रह्म किमपरमिति?
उच्यते - यत्राविद्याकृतनामरूपादिविशेषप्रतिषेधादस्थूलादिशब्दैर्ब्रह्मोपदिश्यते, तत्परम्। तदेव यत्र नामरूपादिविशेषेण केनचिद्विशिष्टमुपासनायोपदिश्यते – ' मनोमयः प्राणशरीरो मारूप : ' ( छा ० ३ | १४ | २ ) इत्यादिशब्दैस्तदपरम्। नन्वेवमद्वितीयश्रुतिरुपरुध्येत, ' नः अविद्याकृतनामरूपोपाधिकतया परिहृतत्वात्। तस्य चापरब्रह्मोपासनस्य संनिधौ श्रूयमाणम् स यदि पितृलोककामो मवति ' ( छा ० ८।२1१ ) इत्यादि जगदैश्वर्य लक्षणं संसारगोचरमेव फलं भवति ' अनिवर्तितत्वादविद्यायाः।
तस्य च देशविशेषावबद्धत्वात्तत्प्रार्थं गमनमविरुद्धम्। सर्वगतत्वेऽपि चात्मन आकाशस्येव घटादिगमने, बुद्धाद्युपाधिगमने गमनप्रसिद्धिरित्यवादिष्म ' तद्गुणसारत्वात् ' ( ब्रह्मसूत्र २।३।२ ९ ) इत्यत्र। तस्मात् ' कार्यं बादरिः ' ( ब्रह्मसूत्र ४।३।७ ) इत्येष एव स्थितः पक्षः। ' परं जैमिनिः ' ( ब्रह्मसूत्र ४ | ३ | १२ ) इति तु पक्षान्तरप्रतिभानमात्र प्रदर्शनं प्रज्ञाविकासनोयेति द्रष्टव्तम्॥१४
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और ' प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये ' ( मैं प्रजापतिके सभागृहमें जाऊं ) यह प्राप्तिका सङ्कल्प कार्यब्रह्मविषयक नहीं है। क्योंकि ' नामरूपयोर्निर्वहिता ० ' ( वह खाकाश नाम से प्रसिद्ध आत्मा अपने में स्थित जगद्बीजभूत नाम और रूपको अभिव्यक्त करनेवाला है, वे जिसके अन्तर हैं वह ब्रह्म है ) इस प्रकार कार्यब्रह्म से विलक्षण परब्रह्म ही प्रकृत है।
' यशोऽहं ० ' ( मैं ब्राह्मणोंका यश - आत्मा होता हूँ ) ऐसा सर्वात्मरूपसे उपक्रम है . कारण कि ' न तस्य प्रतिमाऽस्ति ० ' ( जिस ईश्वरका नाम महद्यश- सर्वत्र पूर्ण है ऐसे उस ब्रह्मकी कोई उपमा भी नहीं है ) इस प्रकार परब्रह्म ही यश नामसे प्रसिद्ध है। और यह वेश्म प्राप्ति गति पूर्वक है, वह ' तदपराजिता ० ' ( वहां अपराजित नामवाली ब्रह्मा की पुरी है, प्रभुहिरण्यगर्भसे विशेषरूप से निर्मित और सुवर्णमय है ) यहाँ हार्दविद्यामें कही गई है।
पद् धातु भी गत्यर्थक होनेसे उसे मागंकी अपेक्षा निश्चित होती है। इसलिए गति वोधक श्रुतियाँ परब्रह्म विषयक हैं, ऐसा पक्षान्तर है। वे ये दोनों पक्ष आचार्यने सूत्रसे दिखलाए हैं। एक गतिकी उपपत्ति आदिसे और दूसरा मुख्यत्व आदिसे। उनमें गतिकी उपपत्ति आदि मुख्यत्व आदिका आभासरूपसे प्रतिपादन करनेमें समर्थ हैं, परन्तु मुख्यत्व आदि गतिकी उपपत्ति आदिका आभासरूपसे प्रतिपादन करनेमें समर्थ नहीं है।
इसलिए माद्य ही सिद्धान्त कहा गया है और द्वितीय पूर्वपक्ष | क्योंकि संभव न होनेपर भी मुख्य अर्थका ही ग्रहण हो, ऐसा कोई आज्ञा करनेवाला प्रमाण विद्यमान नहीं है। परविद्याके प्रकरण में मी अपरविद्या आश्रय गतिका अनुकीर्तन परविद्याकी स्तुतिके लिए ' विश्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ' ( भिन्न - भिन्न गतिवाली नाड़ियाँ केवल उत्क्रान्तिके लिए हैं ) इसके समान उपपन्न होता है।
' प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये ' इसमें तो पूर्ववाक्यसे विच्छेदकर कार्यब्रह्म में भी प्राप्तिका सङ्कल्प विरुद्ध नहीं है। सगुणब्रह्म में भी सर्वात्मत्व संकीर्तन ' सर्वकर्मा सर्वकामः ' इत्यादिके समान हो सकता है। इसलिए गति बोधक श्रुतियाँ अपरब्रह्म विषयक ही हैं। पुनः कोई लोग पूर्वसूत्र पूर्वपक्षसूत्र हैं और उत्तरसूत्र सिद्धान्तसूत्र हैं, ऐसी व्यवस्थाको जानते हुए गतिबोधक श्रुति परब्रह्म विषयक ही प्रतिष्ठापित करते हैं।
परन्तु वह अयुक्त है, क्योंकि ब्रह्ममें गन्तव्यत्वको उपपत्ति नहीं होती।
' यत्सर्वगतं . ' ( जो सर्वगत, सर्वान्तर, सर्वात्मक और परब्रह्म है ) ' आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः ' ( आत्मा आकाशके समान सवंगत और नित्य है ) ' यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म ' ( जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है ) ' य आत्मा ' ( जो बात्मा सबके अन्तर है ) ' आत्मैवेदं सर्वम् ' ' ब्रह्मैवेदं ० ' ( यह सम्पूर्ण जगत् सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है ) इत्यादि श्रुतियोंसे सर्वगत, सर्वान्तर, सर्वात्मक परब्रह्म जो विशेषरूपसे निर्धारित किया गया है, उसमें गन्तव्यता कदाचिद् मी उपपन्न नहीं होती, क्योंकि प्राप्त ही प्राप्य नहीं होता।
लोकमें यह प्रसिद्ध है कि अन्य ही अन्यके प्रति जाता है। परन्तु लोकमें प्राप्तकी मी देशान्तर विशिष्ट - रूपसे गन्तव्यता देखी जाती है। जैसे पृथिवीपर स्थित हुआ ही अन्य देशद्वारा पृथिवीके प्रति जाता है। जिस प्रकार बालक के अनन्य होनेपर भी अन्यकालसे विशिष्ट स्वात्मभूत ही वार्धक्य गन्तव्यरूपसे देखा जाता है | वैसे ही सम्पूर्ण शक्तियोंसे युक्त होनेके कारण ब्रह्ममें भी किसी प्रकार गन्तव्यता हो सकती है?
नहीं, क्योंकि सर्वविशेषोंका ब्रह्ममें प्रतिषेध है, ' निष्कलं ० ' ( ब्रह्म अवयवरहित, निष्क्रिय, शान्त, अनिंद्य, निर्लेप है ) ' अस्थूलम ० ' ( वह न स्थूल, न अणु, न ह्रस्व और न दीर्घं है ) ' स बाह्याभ्यन्तरो - ह्यजः ० ' ( वह बाह्य और मीतर विद्यमान है, अज है ) ' स वा एष ० ' ( वह यह आत्मा महानू, अज, अजर, अमर, अमृत, अमय ब्रह्म है ) ' स एष ० ' ( जिसका मधुकाण्ड में ' यह नहीं, यह नहीं ' ऐसा कहकर निरूपण किया गया है वह यह आत्मा है ) इत्यादि श्रुति, स्मृति और अनुकूल तर्कोंसे देश, काल आदि विशेष योगकी परमात्मामें कल्पना नहीं की जा सकती, जिससे कि भू - प्रदेश, वय अवस्था न्यायसे इस ब्रह्ममें गन्तव्यता हो, पृथिवी और वयमें तो प्रदेश और अवस्था आदि विशेषके योगसे देश काल विशिष्ट गन्तव्यता उपपन्न होती है।
यदि कहो कि जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय कारणत्व बोधक श्रुतिसे ब्रह्म में अनेक शक्तित्व है? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि विशेष निराकरणक श्रुतियाँ अनन्यार्थक हैं। यदि कहो तो उत्पति आदि श्रुतियोंमें भी अनन्यार्थत्व समान है, तो ऐसा नहीं है, क्योंकि वे एकत्व प्रतिपादन परक हैं। मृत्तिका आदि दृष्टान्तोंसे सत् अद्वितीय ब्रह्ममें सत्यत्वका और विकार में नृतत्वका प्रतिपादन करता हुबा शास्त्र उत्पत्ति आदि परक नहीं हो सकता।
परन्तु यह कैसे जाना जाय कि उत्पत्ति आदि प्रतिपादक श्रुतियाँ विशेष निराकरण करनेवाली श्रुतियोंके अङ्गभूत हैं और विशेष प्रतिषेधक श्रुतियाँ उत्पत्ति आदि प्रतिपादक श्रुतियोंके अङ्ग नहीं हैं? कहते हैंविशेष निराकरणक श्रुतियाँ निराङ्काक्षार्थक हैं, क्योंकि आत्मका एकत्व, नित्यत्व, शुद्धत्व आदि ज्ञान होनेपर पुनः कोई भी आकांक्षा उत्पन्न नहीं होती। कारण कि ' तन को मोह : ० ' ( उस समय एकत्वदर्शी उस विद्वान् में क्या मोह और शोक हो सकते हैं? अर्थात् नहीं हो सकते ) ' अमयं वै . ' ( हे जनक!
निश्चय तू अभयको प्राप्त हो गया है ) ' विद्वान्न ० ' ( उस ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाला विद्वान् किसीसे भी मयमीत नहीं होता उस विद्वान्को मैंने शुभ कर्म क्यों नहीं किया, पाप कर्म क्यों किया इसप्रकारको चिन्ता सन्तप्न नहीं करती ) इत्यादि श्रुतिसे पुरुषार्थ पुरुषको अभीष्ट वस्तुकी समाप्ति विषयक बुद्धि उपपन्न होती है। उसी प्रकार तत्त्ववेत्ताविद्वानोंमें सन्तुष्टि अनुभव आदि देखने में आते हैं।
और विकार एवं अनृत में अभिसन्धि - आग्रहका अपवाद भी है, क्योंकि ' मृत्योः स ० ' ( जो अद्वितीय ब्रह्ममें नाना - सा देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ) ऐसी श्रुति है। इसलिए विशेष निराकरण करनेवाली श्रुतियोंमें अन्य शेषत्व नहीं जाना जा सकता। इसीप्रकार उत्पत्ति आदि प्रतिपादक श्रुतियों में निराङ्काक्ष अर्थ प्रतिपादन करनेकी सामथ्यं नहीं है, क्योंकि उनका तो अन्यार्थत्व प्रत्यक्ष समनुगत है। जैसे कि ‘ तत्रैतच्छुङ्गम् ० ' ( हे सोम्य!
उस जलसे ही तू इस शरीररूप अङ्कुर- कायँको उत्पन्न हुआ समझ क्योंकि यह निर्मूल कारण रहित नहीं हो सकता ) इसप्रकार उपक्रमकर उपसंहार - अन्त में जगत् के मूलभूत एक ही सत्को विज्ञेयरूपसे दिखलाती है। और ' यतो वा ० ' ( जिससे निश्चय ही ये सब भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके आश्रयसे ये जीवित रहते हैं और अन्त में विनाशोन्मुख होकर जिसमें लीन होते हैं, उसे विशेषरूपसे जानने की इच्छाकर वहीं ब्रह्म है ) यह श्रुति है।
इसप्रकार उत्पत्ति आदि प्रतिपादक श्रुतियाँ एकात्म्य अवगम परक होनेसे ब्रह्ममें अनेक शक्तिका योग नहीं हो सकता। इसलिए ब्रह्ममें गन्तव्यत्वकी अनुपपत्ति है। ' न तस्य प्राणा ० ' ( उस ब्रह्मवेत्ता के प्राण इस शरीरखे उत्क्रमण नहीं करते, ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ) इसप्रकार श्रुति परब्रह्म में गतिका निवारण करती | उसका ' स्पष्टो ह्येषाम् ' इस सूत्र में व्याख्यान किया जा चुका है। गतिकी कल्पना होनेपर वह गन्ता जीव गन्तव्य ब्रह्मका अवयव वा विकार अथवा उससे अन्य होना चाहिए?
क्योंकि अत्यन्त तादात्म्यमें गमन अनुपपन्न है। यदि ऐसा हो तो उससे क्या होगा? कहते हैं- यदि जीव ब्रह्मका एक देश- माग- अवयव हो तो उस एक देशी ब्रह्मके नित्य प्राप्त होनेसे पुनः ब्रह्मगमन उपपन्न नहीं होता। एक देश और एकदेशित्व कल्पना ब्रह्ममें अनुपपन्न है, क्योंकि वह निरवयवरूपसे प्रसिद्ध है। विकारपक्षमें भी यह अनुपपत्ति समान है, कारण कि विकारसे विकारी नित्य प्राप्त है। घट मृदात्मताका परित्याग कर अवस्थित नहीं होता, क्योंकि परित्याग करनेपर उसका अभाव प्राप्त होगा।
विकारपक्ष और अवयवपक्ष में विकारी और अवयवी ब्रह्मके स्थिर होनेसे संसारगमन भी अनिश्चित हैं। यदि जोव ब्रह्मसे अन्य है तो यह अणु, व्यापी अथवा मध्यमपरिमाण वाला हो सकता है। व्यापी - व्यापक होनेपर तो गमनकी अनुपपत्ति है। मध्यपरिमाणवाला होनेपर अनित्यत्व प्रसङ्ग है। अणुत्व होनेपर समस्त शरीरगत वेदना नहीं हो सकती। अणुत्व और मध्यम परिमाणत्वका तो विस्तारसे पूर्व प्रतिषेध किया गया है। जीवका परमात्मा से अन्य होनेपर ' तत्वमसि ' इत्यादि एकत्व बोधक शास्त्रका बाघ प्रसङ्ग होगा।
यह दोष तो विकार और अवयव पक्ष में भी समान है। यदि कहो कि विकार और अवयव तो विकारी और अवयवीसे अनन्य हैं, अतः उक्त दोष नहीं है, तो ऐसा नहीं है, क्योंकि मुख्य एकवकी अनुपपत्ति होती है, और इन सब पक्षोंमें अनिर्मोक्ष प्रसङ्ग है, कारण कि संसार्यात्मत्वकी निवृत्ति नहीं होगी, अथवा निवृत्ति होनेपर उसके स्वरूपका नाश प्रसंग होगा, क्योंकि उसमें ब्रह्मात्मत्वका स्वीकार नहीं किया गया है। कुछ लोग तो यह कहते हैं - नित्य और नैमित्तिक कर्मोंका अनुष्ठान प्रत्यवायकी अनुत्पत्तिके लिए किया जाता है।
काम्य और प्रतिषिद्ध कर्मोंका स्वगं और नरककी प्रतिके लिए परिहार किया जाता है। वर्तमान देहके उपयोग योग्य कर्म उपभोगसे ही क्षय हो जाते हैं, अतः वर्तमान देहपातके अनन्तर अन्य देहके प्रतिसंधान कारणका अभाव होने से स्वरूपावस्थानरूप कैवल्य ब्रह्मात्मता के विना भी एवंवृत्त पुरुषको सिद्ध होगा। वह ठीक नहीं है, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है। -मोक्षार्थी इसप्रकार आचारण करे यह किसी भी शास्त्र से प्रतिपादित नहीं है।
यह अपनी बुद्धिसे हो तर्क किया गया है, क्योंकि कर्म निमित्तक संसार है, बतः निमित्तके अभाव से संसार नहीं होगा। परन्तु यह तर्क भी नहीं किया जा सकता, कारण कि निमित्त का अभाव दुर्ज्ञेय है। एक एक प्राणीके अन्य अन्य जन्ममें संचित इष्ट, अनिष्ट फलवाले अनेक कर्म संभावित हैं। अत्यन्त विरुद्ध फलवाले उन कर्मोंका युगपत् उपभोग संभव न होने से उनमें से फल देनेका अवसर प्राप्त किए हुए कुछ कर्म इस जन्मका निर्माण करते हैं और देश, काल और निमित्त की प्रतीक्षा करनेवाले कुछ कर्म रहते हैं।
इसलिए उन अवशिष्ट कर्मोंका संप्राप्त उपभोगखे क्षपण असंभव होनेसे यथावणित चरितवालेका भी वर्तमानदेहके पात होनेपर अन्य देहके निमित्तका अभाव निश्चित नहीं किया जा सकता है। ' तद्य इह ० ' ( इसलिए जो यहाँ रमणीय चरणवाले हैं ) ‘ ततः शेषेण ' ( पीछे शेषसे ) इत्यादि श्रुति और स्मृतिसे कर्मशेषके सद्भावकी सिद्धि होती है। परन्तु यह शङ्का हो सकती है - नित्य और नैमित्तिककर्म उन अवशिष्ट कर्मोके क्षेपक ( नाशक ) होंगे, वह युक्त नहीं है, क्योंकि उनमें विरोधका अभाव है।
विरोध होनेपर ही नाश्य - नाशक भाव होता है | जन्मान्तरमें सचित सुकृत कर्मोका वर्तमान नित्य नैमित्तिक के साथ विरोध नहीं है, कारण कि दोनों में शुद्धरूपत्व समान है। दुरितों का अशुद्धिरूप होनेसे विरोध होनेपर विनाय मले हो, परन्तु इतनेसे देहान्तर निमित्तके अभावकी सिद्धि नहीं होती, क्योंकि सुकृतोंमें निमित्तत्व उपपन्न है और दुरितका मी अशेष विनाश अवगत नहीं होता।
इसीप्रकार नित्य नैमित्तिक अनुष्ठान से प्रत्यवाय की अनुत्पत्तिमात्र होती है और अन्य फलकी उत्पत्ति नहीं होती, ऐसा होने में कोई प्रमाण नहीं है। क्योंकि अन्य फलका भी उसके साथ निष्पन्न होना सम्भव है | ' तद्यथात्रे ० ' ( जैसे फलके लिए निमिट आम्रवृक्षके पीछे छाया और गन्ध उत्पन्न होते हैं, वैसे धर्मं अनुष्ठान के पीछे अर्थ उत्पन्न होते हैं ) यह आपस्तम्ब स्मृति है।
सम्यग्दर्शनके न होने तक जन्म - मरण के मध्य में सर्वात्मना काम्य और प्रतिषिद्ध के त्यागकी किसीसे भी प्रतिज्ञा नहीं की जा सकती, क्योंकि कर्मकुशल पुरुषोंमें भी सूक्ष्म अपराध देखनेमें खाता है। संशयका विषय तो हो सकता है, तो मी निमित्तका अभाव दुर्विज्ञेय ही है | ज्ञानगम्य ब्रह्मात्मत्व स्वीकार न करनेपर तो कर्तृत्व मोक्तृत्व स्वभाववाले आत्माके कैवल्यकी बाकाङ्क्षा नहीं की जा सकती, कारण कि अग्नि - औष्ण्यके समान स्वभाव अपरिहार्य है।
ऐसा हो, परन्तु कर्तृत्व, भोक्तृत्वरूप कार्य अनर्थक है उसकी शक्ति नहीं, इससे शक्तिके अवस्थित होनेपर भी कार्यके परिहारसे मोक्ष उपपन्न होता है? वह युक्त नहीं है, क्योंकि शक्तिके सद्भावमें कार्यका जन्म दुर्निवार है। और भी शङ्का होती है कि केवल शक्ति अन्य देश, काल आदि निमित्तों की अपेक्षा न कर कार्यका आरम्भ नहीं करती, इससे वह एकाकी स्थित होती हुई भी अपराध नहीं करती? वह मी ठीक नहीं, क्योंकि निमित्त भी शक्तिरूप सम्बन्धसे नित्य सम्बद्ध हैं।
इसलिए कर्तृत्व मोक्तृश्व स्वभाव के विद्यमान होने पर और आत्मा में विद्यागम्य ब्रह्मात्मत्व न होनेपर तो किसी प्रकार भी मोक्ष की आज्ञा नहीं है। और ' नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' ( ज्ञानके विना मोक्षके लिए अन्य साधन नहीं है ) यह श्रुति ज्ञानसे अन्य मोक्षमामंका वारण करती है।
जीवका परमात्मासे अनन्य होनेपर भी सब व्यवहारका लोप प्रसङ्ग होगा, क्योंकि इस पक्षमें प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों की प्रवृत्ति नहीं है, ऐसा यदि कहो तो नहीं, क्योंकि तत्त्वज्ञानके पूर्व स्वप्नव्यवहारके समान उसकी उपपत्ति होती है।
' तत्र हि ० ' ( जहाँ द्वैत -सा होता है वहाँ अन्य - अभ्यको देखता है ) इत्यादिसे शास्त्र अप्रबुद्ध विषय में प्रत्यक्ष आदि व्यवहार कहकर पुन : प्रबुद्धविषयमें ' यत्र स्वस्थ . ० ' ( जिस समय इस विद्वान् के लिए सब आत्मा ही हो गया तब किससे किसे देखे ) इत्यादि शास्त्रसे उसका अभाव दिखलाते हैं। इसलिए परब्रह्मज्ञानीके गन्तव्य आदि विज्ञानका बाघ होनेसे किसीप्रकार मो गतिका उपपादन नहीं किया जा सकता। तब गति प्रतिपादक श्रुतियाँ किसको विषय करती हैं? कहते हैं - सगुण विद्या विषयक होंगी।
जैसे कि कहीं पञ्चाग्नि विद्याको प्रस्तुतकर गति कही जाती है, तो कहींपर पर्यङ्कविद्या और कहीं पर वैश्वानरविद्याका उपक्रम कर कही जाती है। और जहाँ ब्रह्मको प्रस्तुतकर गति कही जाती है, जैसे ' प्राणो ब्रह्म ० ' ( प्राण ब्रह्म है, सुख ब्रह्म आकाश ब्रह्म है। ) और ' अथ यदिदम ० ' ( अब इस शरीर रूपी ब्रह्मपुरके भीतर जो यह सूक्ष्म कमलाकार गृह है ) यह श्रुति है | वहाँपर भी वामनीत्व आदि और सत्यकामत्व आदि गुणोंसे सगुण ब्रह्मके ही उपास्य होनेसे गति सम्भव है।
जैसे ' न तस्य To ० ' ' ( उस ब्रह्मवित् के शरीर से प्राण उत्क्रमण नहीं करते ) इसप्रकार गतिका प्रतिषेध सुनाया गया है, वैसे कहींपर परब्रह्म विषयक गति नहीं सुनाई जाती। ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' इत्यादि श्रुतिमें ' अप् ' घातु गत्यर्थक होनेपर भी वर्णित न्याय ( ब्रह्म सवंगत सर्वान्तर और सर्वात्मा है ) से देशान्तर प्राप्तिका असंभव होनेसे अविद्या अध्यारोपित नाम, रूपके विलयकी अपेक्षा ' ब्रह्म सन्ब्रह्माप्येति ' इत्यादिके समान यह स्वरूपप्राप्ति ही अभिहित है, ऐसा समझना चाहिए।
और परब्रह्म विषयक व्याख्यान की हुई गति प्ररोचनके लिए अथवा मनुचिन्तनके लिए होगी? उसमें ब्रह्मतत्ववित् पुरुषमें तो गतिकी उक्ति से प्ररोचन नहीं किया जाता, क्योंकि वह तो स्व संवेद्य विद्यासे समर्पित अव्यवहित स्वास्थ्यसे सिद्ध है | और नित्य सिद्ध निश्रेयस निवेदन विशिष्ट असाध्यफलवाले विज्ञानकी गति अनुचिन्तनमें कोई अपेक्षा उपपन्न नहीं होती। इससे अपरब्रह्मविषयक गति है।
उसमें पर और अपर ब्रह्मके विवेकका निश्चय न होनेसे अपरब्रह्ममें वर्तमान गतिबोधक श्रुतियाँ परब्रह्म में अध्यारोपित की जाती हैं। क्या पर और अपर दो ब्रह्म हैं? हाँ, ठीक, दो ब्रह्म हैं। क्योंकि ' एतद्वै सत्यकाम ० ' ( पिप्पलादने कहा – हे सत्यकाम! यह जो ओंकार है वही निश्चय पर और अपर ब्रह्म है ) इत्यादि देखने में बाता है। तो परब्रह्म क्या है और अपर ब्रह्मवश है?
कहते हैं - जहाँ अविद्याकृत नाम - रूप आदि विशेषके प्रतिषेधसे अस्थूल आदि शब्दोंसे ब्रह्म उपदिष्ट है वह परब्रह्म है, और वही जब नाम - रूप आदि किसी विशेषणसे विशिष्ट होता हुआ उपासना के लिए ' मनोमयः प्राणशरीरो मारूपः ० ' ( ब्रह्म मनोमय, प्राणशरीर मारूप है ) इत्यादि शब्दों से उपदिष्ट होता है वह अपर ब्रह्म है। परन्तु ऐसा होनेपर अद्वैत प्रतिपादक श्रुति बाधित होगी? नहीं, क्योंकि अविद्याकृत नाम रूप उपाधि युक्त होनेके कारण वह परिहृत है।
और अपरब्रह्मकी उपासनाका उसके समीपमें ' स यदि ० ' ( यदि वह पितृलोककी कामनावाला होता है ) इत्यादि जगत् ऐश्वयंरूप संसार विषयक ही श्रूयमाण फल होता है, क्योंकि उसकी अभी तक अविद्या निवृत्त नहीं हुई है। और वह देशविशेषमें अवबद्ध है, इसलिए उस देशकी प्राप्तिके लिए गमन विरुद्ध नहीं है। आत्मा के सर्वव्यापक होनेपर भी जैसे घट आदिके गमनसे आकाशका गमन होता है, वैसे ही बुद्धि आदि उपाधिके गमन होनेपर आत्मामें गमन प्रसिद्ध है, ऐसा ' तद्गुणसारत्वात् ' इस सूत्रमें हमने कहा है। इसलिए ' कार्य बादरि।
' ( बादरि आचार्य के मतमें कार्यब्रह्म ही गम्य है ) यही सिद्धान्त पक्ष है। ' परं जैमिनि : ' ( जैमिनि आचार्यके मतमें परब्रह्म ही गम्य है ) इसप्रकार अन्यपक्षका प्रतिमानमात्र प्रदर्शन तो केवल बुद्धिकी विशदताके लिए है, ऐसा समझना चाहिए॥ १४
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये ' इससे वेश्म प्राप्तिका संकल्प परब्रह्म विषयक कहा गया है, वह ठीक नहीं है, क्योंकि प्रजापति, सभा और वेश्म इन तीन शब्दात्मक श्रुतियोंसे और उनके संघातात्मक वाक्यसे प्रकरण बाधित है। कारण कि वे सवंगत ब्रह्ममें संगत नहीं होते। श्रुति और वाक्यकी अपेक्षा प्रकरण दुर्बल है। इसलिए गति बोधक श्रुतियाँ कार्यं ब्रह्म विषयक ही हैं। इस प्रकार स्व सिद्धान्त कहकर अब अन्य मतका ' केचित् ' इत्यादिसे निराकरण करते हैं।
* निर्विशेष श्र ुतियाँ निराकांक्ष होनेसे स्वार्थमें फलवाली हैं, अतः अङ्गी हैं और विशेष श्रुतियाँ अफलवाली हैं, अत : निषेध्य विशेषके समर्पण आदि द्वारा अङ्गभूत हैं, क्योंकि ' फलवत्सन्निधावफलं तदङ्गम् ' ( फलवान्को सन्निधिमें अफलवान् उसका अङ्ग है ) यह न्याय है। इससे निर्विशेष श्रुतियाँ सविशेष श्रुतियोंके अङ्ग नहीं हो सकतीं। इसप्रकार न्यायसे सविशेष श्रुतियोंमें बङ्गत्व कहकर बाब श्रतिषे मी ' प्रत्यक्षं तु ' आदिसे कहते हैं।
# यदि गन्ता जीवकी गतिकी कल्पना की जाय तो यह प्रश्न उठता है कि गन्ता जीवका गन्तव्य ब्रह्मके साथ क्या सम्बम्ध है? क्या वह गन्तव्य ब्रह्मका अवयव है वा विकार हैं अथवा अन्य है? प्रथम दो विकल्प भेद और अभेदसे हैं खौर तृतीय अत्यन्त भेदमें है। अत्यन्त अभेदमें तो गमन नहीं हो सकता। अतः ' उच्यते ' आदिसे सब विकल्पोंका समाधान किया गया है।
* अब अन्य मतका ' यत्तु ' इत्यादिसे उपन्यास कर खण्डन करते हैं। संसारका निमित्त कर्म हैं उनके अभाव से संसारका अभावरूप मोक्ष स्वतः सिद्ध है। इसलिए ब्रह्मज्ञानके विना मी संसारके अभाव होने से मोक्ष होता है। जैसे रोगके निमित्तका अभाव होनेसे रोग निवृत्त हो जाता है और पुनः नहीं होता। परन्तु यह कथन असङ्गत है, क्योंकि प्रमाणके विना केवल तर्क से किसी सिद्धान्तकी सिद्धि नहीं हो सकती है 1
। कर्म तर्क अगम्य हैं, अतएव ' गहना कर्मणो गतिः ' ( गीता ० ४।१७ ) इत्यादि स्मृति और ' तद्य इह ' इत्याति श्रुतिसे अवशिष्ट कर्मोंका अस्तित्व सिद्ध होता है।
* अनारब्ध फलवाले पुण्य - पाप भले हों, परन्तु उनका नित्य नैमित्तिक कर्मों के अनुष्ठानसे नाश होनेपर जन्मान्तर न होगा, इस आशय से ' स्यादेतत् ० ' इत्यादिसे शङ्का करते हैं। परन्तु यहाँ यह प्रश्न उठता है कि कर्तृत्व आदि आत्माका स्वभाव है अथवा उसमें आरोपित है? प्रथमपक्ष में— क्या वह स्वभावकार्य है अथवा शक्ति? कार्यपक्ष में-- उस कार्यकी निवृत्ति में मोक्ष है अथवा उसकी स्थिति में? प्रथमपक्ष - अग्नि - औष्ण्यके समान स्वभाव निवृत्त नहीं किया जा सकता। द्वितीय स्थितिमें तो वदतोव्याघात है, क्योंकि जब कार्यं विद्यमान है तो मोक्ष कैसे हो सकता है। अब स्वभाव शक्ति है, इस पक्ष की ' स्यादेतत् ' इत्यादिसे शङ्का करते हैं।
* यदि कर्तृत्व आदि आत्मामें आरोपित है, यह द्वितीय पक्ष कहो तो वह तत्वज्ञान से ही निवृत्त हो जाता है, इस विषय में ' नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' ' ज्ञानादेव ' तु कैवल्यम् ' इत्यादि श्रुति प्रमाण हैं। इसप्रकार प्रासङ्गिकका परिहारकर अब प्रकृत परमतत्त्वका ' तदेवम् ' इत्यादिसे उपसंहार करते हैं। इसलिए सवंगत सर्वान्तरात्मा ब्रह्म गन्तव्य न होनेसे परब्रह्मवित्की गति नहीं हो सकती।
* माया उपाधि रहित शुद्ध ब्रह्म पर है और माया उपाधि युक्त वही ब्रह्म अपर है। ' अस्थूलमन्वणु ' इत्यादि श्रुतियाँ अविद्याकृत नाम - रूप विशेषका प्रतिषेध करती हुई परब्रह्मका प्रतिपादन करती हैं | ‘ यः सर्वज्ञः सर्ववित् ’ ‘ सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः ' इत्यादि श्रुतियाँ सोपाधिक अपर ब्रह्मका प्रतिपादन
' नेह नानास्ति किञ्चन ' इत्यादि अद्वैत प्रतिपादक श्रुतियोंका करती हैं। परन्तु ' एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म '
भी बाध नहीं हो सकता है, क्योंकि वह कल्पित होनेसे ज्ञानऔपाधिक अपरब्रह्मके स्वीकार करनेपर दृष्टि परिहृत है॥१४
अप्रतीकालम्बनाधिकरणम्
4.3.15 · चतुर्थ अध्याय तृतीय पाद सूत्र १५
अप्रतीकालम्बनान् नयतीति बादरायण उभयथा च दोषात् तत्क्रतुश् च ॥ ४.३.१५ ॥
पदच्छेद — अप्रतीकालम्बनान् , नयति , इति , बादरायणः , उमयथा , अदोषात् , तत्क्रतुः च
सूत्रार्थ — ( अप्रतीकालम्बनान् ) अमानव पुरुष अप्रतीकोपासकों को ( नयति ) ब्रह्मलोक में ले जाता है, ( बादरायणः ) ऐसा आचार्य बादरायणका मत है। ( उभयथाऽदोषात् ) क्योंकि कुछ उपासकों को ले जाता है और कुछको नहीं ले जाता, ऐसा होनेपर भी दोष नहीं है, कारण कि ( तक्रतुश्च ) ब्रह्मक्रतु ब्रह्मलोक में ले जाया जाता है।
शाङ्करभाष्य
स्थितमेतत् कार्यविषया गतिः न परविषयेति। इदमिदानीं संदिह्यते किं सर्वान्विकारालम्बनान् अविशेषेणैव अमानवः पुरुषः प्रापयति ब्रह्मलोकम् उत कांश्चिदेवेति। किं तावत्प्राप्तम् सर्वेषामेव एषां विदुषाम् अन्यत्र परस्माद्ब्रह्मणः गतिः स्यात् तथा हि अनियमः सर्वासाम् इत्यत्र अविशेषेणैव एषा विद्यान्तरेष्ववतारितेति। एवं प्राप्ते प्रत्याह अप्रतीकालम्बनानिति प्रतीकालम्बनान्वर्जयित्वा सर्वानन्यान्विकारालम्बनान् नयति ब्रह्मलोकम् इति बादरायण आचार्यो मन्यते न हि एवम् उभयथाभावाभ्युपगमे कश्चिद्दोषोऽस्ति अनियमन्यायस्य प्रतीकव्यतिरिक्तेष्वप्युपासनेषूपपत्तेः। तत्क्रतुश्च अस्य उभयथाभावस्य समर्थको हेतुर्द्रष्टव्यः यो हि ब्रह्मक्रतुः स ब्राह्ममैश्वर्यमासीदेत् इति श्लिष्यते तं यथा यथोपासते तदेव भवति इति श्रुतेः न तु प्रतीकेषु ब्रह्मक्रतुत्वमस्ति प्रतीकप्रधानत्वादुपासनस्य। ननु अब्रह्मक्रतुरपि ब्रह्म गच्छतीति श्रूयते यथा पञ्चाग्निविद्यायाम् स एनान्ब्रह्म गमयति इति भवतु यत्र एवम् आहत्यवाद उपलभ्यते तदभावे तु औत्सर्गिकेण तत्क्रतुन्यायेन ब्रह्मक्रतूनामेव तत्प्राप्तिः न इतरेषाम् इति गम्यते।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — * स्थितमेतत्कार्यविषया गतिर्न परविषयेति। इदमिदानीं संदिह्यते - किं सर्वान्वि
कार्यब्रह्मविषयक गति है और परब्रह्म विषयक गति नहीं है, यह सिद्ध हो चुका। अब यह सन्देह होता है कि क्या विकारका आलम्बन करनेवाले सब उपासकों को अमानव पुरुष समानरूपस्चे ब्रह्मलोक प्राप्त कराता है अथवा किन्हींको ही? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - इन सभी उपासकों की परब्रह्मसे अन्यत्र - कार्यब्रह्ममें गति होनी चाहिए, क्योंकि ' अनियमः सर्वासाम् ' इस सूत्र में समानरूपसे ही इस गतिका अन्य उपासनाओं में भी अवतरण किया गया है।
सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर निराकरण करते हैं - ' अप्रतीकालम्बनान् ' प्रतीकका आलम्बन करनेवालोंको छोड़कर अन्य विकारालम्बी सभी उपासकोंको अमानव पुरुष ब्रह्मलोक में ले जाता है, ऐसा बादरायण आचार्य मानते हैं। इस प्रकार उभयथाभाव ( प्रतीकालम्बियों को नहीं ले जाता और विकारालम्बियोंको ले जाता है ) स्वीकार करने पर भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि अनियम न्याय प्रतीकसे व्यतिरिक्त उपासनाबों में उपपन्न होता है।
‘ तत्क्रतुश्च ' ( कार्यब्रह्मकी उपासना करनेवाला ) इसे उमयथाभावका समर्थक हेतु समझना चाहिए। जो ब्रह्मक्रतु है वह ब्रह्मके ऐश्वर्यको प्राप्त होता है यह घटता है, क्योंकि ' तं यथा ० ' ( जो उसकी जिसजिस प्रकार से उपासना करता है वही होता है ) ऐसी श्रुति है I। प्रतीकों में ब्रह्मक्रतुत्व नहीं है, कारण कि
अब्रह्मक्रतु भी ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है, ऐसी श्रुति है। जैसे कि उपासना प्रतीक प्रधान होती है। परन्तु
पुरुष इन उपासकोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचाता है ) इस प्रकार ' स एनान्ब्रह्म गमयति ' ( वह अमानव पञ्चाग्नि विद्यामें है। परन्तु जहाँपर इसप्रकार साक्षादपवादक- साक्षात् उपलब्ध हो वहाँपर मले ऐसा हो, किन्तु उसके अभाव में तो औत्सर्गिक तत्क्रतुन्याय से ब्रह्मक्रतुओंको ही ब्रह्मलोक प्राप्ति है अन्योंको नहीं, ऐसा ज्ञात होता है।। १५
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — सामान्य श्रुति है। ' जो जिसकी उपासना करता है वही होता
* ' स . एनान्ब्रह्म गमयति ' यह है ' इस तत्क्रतुन्यायसे संशय होता है कि यावत् विकार उपासकोंको ब्रह्मलोक प्राप्त होता है अथवा किन्हीं उपासकोंको? ऐसा संशय होनेपर ' सर्वेषामे ० ' आादिसे पूर्वपक्ष दिखलाकर सिद्धान्ती - ' मनो ब्रह्मेत्युपासीत ' ( मन ब्रह्म है ऐसी उपासना करनी चाहिए ) यह प्रतीक आलम्बन है। इस प्रकार प्रतीकका आलम्बन करनेवालोंको छोड़कर सब विकार आलम्बी उपासकोंको ब्रह्मलोक प्राप्त होता है। प्रतीकोपासक अचिरादि मागंसे विद्युत् लोक तक जाते हैं, ब्रह्मलोक तक नहीं, क्योंकि वे ब्रह्मोपासक नहीं है। प्रतीकोपासनाओं में नाम बादि प्रतीक प्रधान होता है और ब्रह्म गौण। किन्तु ब्रह्मोपासनाओंमें ब्रह्म प्रधान होता है। ' तं यथा ० ' यह तत्क्रतुन्याय श्रुतिमूलक है। यद्यपि पञ्चाग्निविद्यामें उपासक ब्रह्मक्रतु नहीं है, तो भी वहां स्पष्टरूपसे उन पञ्चाग्निविद्या उपासकोंके लिए ब्रह्मलोक प्राप्ति कही गई है, अतः यहाँ तत्क्रतुन्यायका बाघ है। इससे सिद्ध हुआ है कि अप्रतीक ब्रह्मोपासकोंके लिए ही ब्रह्मलोक प्राप्ति है॥ १५
4.3.16 · चतुर्थ अध्याय तृतीय पाद सूत्र १६
विशेषं च दर्शयति ॥ ४.३.१६ ॥
पदच्छेद — विशेषम् , च , दर्शयति
सूत्रार्थ — ( च ) और ( विशेषम् ) नाम आदि प्रतीकोपासनाओं में पूर्व - पूर्व से उत्तरोत्तर उपासनाओंमें और अधिक फल ( दर्शयति ) श्रुति दिखलाती है, अतः प्रतीकोपासक ब्रह्मलोकमें नहीं जाते।
शाङ्करभाष्य
नामादिषु प्रतीकोपासनेषु पूर्वस्मात्पूर्वस्मात् फलविशेषम् उत्तरस्मिन्नुत्तरस्मिन् उपासने दर्शयति यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति वाग्वाव नाम्नो भूयसी यावद्वाचो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति मनो वाव वाचो भूयः इत्यादिना। स च अयं फलविशेषः प्रतीकतन्त्रत्वादुपासनानाम् उपपद्यते। ब्रह्मतन्त्रत्वे तु ब्रह्मणोऽविशिष्टत्वात् कथं फलविशेषः स्यात्। तस्मात् न प्रतीकालम्बनानाम् इतरैस्तुल्यफलत्वमिति।। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ शारीरकमीमांसासूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — नाम आदि प्रतीकोपासनाओंमें पूर्व पूर्वकी अपेक्षा उत्तरोत्तर उपासनाओं में ' यावन्नाम्नो गतं ० ' ( वह जो कि नामकी ' यह ब्रह्म है ' ऐसी उपासना करता है उसकी जहाँ तक नामकी गति होती है। वहाँ तक यथेच्छ गति हो जाती है ) ' वाग्वाव नाम्नो भूयसी ' ( वाक् ही नामसे बढ़कर है ) ' यद्वाचो गतं ० ' ( वह जो वाणीकी ' यह ब्रह्म है ' ऐसी उपासना करता है उसकी जहाँ तक वाणीकी गति होती है वहाँ तक स्वेच्छ गति हो जाती है ) ' मनो वाव वाचो भूयः ' ( मन ही वाणीसे उत्कृष्ट है ) इत्यादिसे श्रुति फलविशेष दिखलाती है। यह फलविशेष प्रतीक के अधीन होनेसे उपासनाओं में उपपन्न होता है। उपासनाथोंको ब्रह्म अधीन होनेपर तो फलविशेष कैसे होगा, क्योंकि ब्रह्म अविशष्ट है। इससे प्रतीकालम्बियोंको अन्योंके समान फल नहीं है॥ १६
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इस वक्ष्यमाण हेतु से भी प्रतीकोपासक ब्रह्मलोकमें नहीं जाते ' विशेषं च दर्शयति ' इस सूत्रसे कहते हैं। ' नाम ब्रह्मत्युपासीत ' ( नाम ब्रह्म है, ऐसी उपासना करे ) इस प्रकार ब्रह्मदृष्टिसे नाम आदि की उपासना प्रतीकोपासना कही जाती है। प्रतीकके तारतम्यसे फलतारतम्य की श्रुति है। नाम आदि प्रतीकों में भेद होने से उपासना में भेद उसके फलमें भेद स्वाभाविक है, अतः प्रतीकोपासक ब्रह्मलोक में नहीं जाते | परन्तु ब्रह्म तो सर्वत्र समान है, अतः उसकी उपासनाका फल भी समान है। इसलिए ब्रह्मोपासक ही ब्रह्मलोक में जाते हैं॥ १६
उपसंहार
ये सूत्र दृश्य जगत के विविध तत्वों के आपसी संबंधों और उनके तार्किक आधार को सिद्ध करते हैं। इनमें भौतिक घटकों के बीच भेद और उनके कार्य-कारण संबंध को अत्यंत सूक्ष्मता से जोड़ा गया है। अंततः, यह विवेचन जगत की विविधता के पीछे एक सुव्यवस्थित क्रम को प्रतिपादित करता है।
In English
Brahma Sutra: The Path of Light and the Air Realm
This commentary explains verses from the Brahma Sutras regarding the Devayana path. It clarifies that various descriptions of celestial realms—such as the path of rays, light, and air—all refer to a single unified journey toward the Brahma-loka.
This article answers
- Brahma sutra 4.3.1 meaning?
- What is the archiradi marga in vedic cosmology?
- Brahma sutra 4.3.2 explanation of वायुलोक?
- Difference between devayana and pitriyana paths?