श्रीगणेशाय नमः।

ब्राह्मणमाहात्म्य : राजा की सत्ता और दैवीय पद के बीच क्या सम्बन्ध है?

राजसत्ता की दैवीय प्रधानता

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड २ · वनपर्व → मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 185 · पृष्ठ 1257–1263

978 शब्द · 5 मिनटका पाठ · 26 श्लोक

मार्कण्डेय ने कहा

ब्राह्मणों के माहात्म्य और राजधर्म को समझाने हेतु

मार्कण्डेय जी कहते हैं— राजन्! ब्राह्मणों का और भी माहात्म्य मुझसे सुनो। पूर्वकाल में वैन्य के नाम से प्रसिद्ध राजर्षि पृथु ने अश्वमेध यज्ञ की दीक्षा ली थी। उन दिनों महात्मा अत्रि ने धन माँगने की इच्छा से उनके पास जाने का विचार किया; परन्तु ऐसा करने से उन्हें अपना धर्मात्मापन प्रकट करना पड़ता। इसलिए उन्होंने मन ही मन कुछ सोच-विचार कर तपस्या के लिए वन में ही जाने का निश्चय किया।

स्तुति मार्कण्डेय उवाच

भूय एव महाभाग्यं ब्राह्मणानां निबोध मे ।
वैन्यो नामेह राजर्षिरश्वमेधाय दीक्षितः ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं-राजन्! ब्राह्मणोंका और भी माहात्म्य मुझसे सुनो । पूर्वकालमें वेनके पुत्र राजर्षि पृथुने, जो यहाँ वैन्यके नामसे प्रसिद्ध थे, किसी समय अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा ली ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 185 · श्लोक 1पृष्ठ 1258

उन्होंने अपनी धर्मपत्नी और पुत्रों को बुलाकर कहा, ‘हम लोग वन में रहकर तप द्वारा धर्म का बहुत अधिक उपद्रवशून्य फल पा सकते हैं। अतः शीघ्र वन में चलने का विचार तुम सब लोगों को रुचिकर होना चाहिए; क्योंकि ग्राम्य-जीवन की अपेक्षा वन में रहना अधिक लाभप्रद है।’

स्तुति

तत्र स्म वाचं कल्याणीं धर्मकामार्थसंहिताम् ।
मयोक्तामन्यथा ब्रूयुस्ततस्ते वै निरर्थिकाम् ॥

यदि मैं वहाँ जाकर धर्म, अर्थ और कामसे युता कल्याणमयी वाणी भी बोलूँगा तो वे उसे धर्म और अर्थके विपरीत ही बतायेंगे; निरर्थक सिद्ध करेंगे ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 185 · श्लोक 10पृष्ठ 1259

अत्रि की पत्नी भी धर्म का ही अनुसरण करने वाली थी। उसने यज्ञ-यागादि के रूप में धर्म के विस्तार पर दृष्टि रखकर पति को उत्तर दिया, ‘प्राणनाथ! आप धर्मात्मा राजा वैन्य के पास जाकर अधिक धन की याचना कीजिये। वे राजर्षि इन दिनों यज्ञ कर रहे हैं, अतः इस अवसर पर यदि आप उनसे माँगेंगे तो वे आपको अधिक धन देंगे। ब्रह्मर्षे! वहाँ से प्रचुर धन लाकर भरण-पोषण करने योग्य इन पुत्रों को बाँट दीजिये; फिर इच्छानुसार वन को चलिये। धर्मज्ञ महात्माओं ने यही परम धर्म बताया है।’

स्तुति

गमिष्यामि महाप्राज्ञे रोचते मे वचस्तव ।
गाश्च मे दास्यते वैन्यः प्रभूतं चार्थसंचयम् ॥

तथापि महाप्राज्ञे! मैं वहाँ अवश्य जाऊँगा, मुझे तुम्हारी बात ठीक जँचती है । राजा पृथु मुझे बहुत - सी गौएँ तो देंगे ही, पर्याप्त धन भी देंगे ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 185 · श्लोक 11पृष्ठ 1259

अत्रि ने आगे कहा— ‘महाभागे! महात्मा गौतम ने मुझसे कहा है कि वेनपुत्र राजा पृथु धर्म और अर्थ के साधन में संलग्न रहते हैं और सत्यव्रती हैं। परन्तु एक बात विचारणीय है— वहाँ उनके यज्ञ में जितने ब्राह्मण रहते हैं, वे सभी मुझसे द्वेष रखते हैं, यही बात गौतम ने भी कही है। इसीलिए मैं वहाँ जाने का विचार नहीं कर रहा। यदि मैं वहाँ जाकर धर्म, अर्थ और काम से युता कल्याणमयी वाणी भी बोलूँगा, तो वे उसे धर्म और अर्थ के विपरीत ही बतायेंगे और निरर्थक सिद्ध करेंगे। तथापि महाप्राज्ञे! मैं वहाँ अवश्य जाऊँगा, मुझे तुम्हारी बात ठीक जँचती है। राजा पृथु मुझे बहुत-सी गौएँ तो देंगे ही, पर्याप्त धन भी देंगे।’

स्तुति

राजन् धन्यस्त्वमीशश्च भुवि त्वं प्रथमो नृपः ॥

अत्रि बोले — राजन्! तुम इस भूतलके सर्वप्रथम राजा हो; अतः धन्य हो, सब प्रकारके ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 185 · श्लोक 13पृष्ठ 1260

ऐसा कहकर महातपस्वी अत्रि शीघ्र ही राजा पृथु के यज्ञ में गये। यज्ञ-मण्डप में पहुँचकर उन्होंने उस राजा का माङ्गलिक वचनों द्वारा स्तवन किया और उनका समादर करते हुए कहा— ‘राजन्! तुम इस भूतल के सर्वप्रथम राजा हो; अतः धन्य हो, सब प्रकार के ऐश्वर्य से सम्पन्न हो। महर्षिगण तुम्हारी स्तुति करते हैं। तुम्हारे सिवा दूसरा कोई नरेश धर्म का ज्ञाता नहीं है।’

स्तुति

स्तुवन्ति त्वां मुनिगणास्त्वदन्यो नास्ति धर्मवित् ।
तमब्रवीदृषिः क्रुद्धो वचनं वै महातपाः ॥

महर्षिगण तुम्हारी स्तुति करते हैं । तुम्हारे सिवा दूसरा कोई नरेश धर्मका ज्ञाता नहीं है । उनकी यह बात सुनकर महातपस्वी गौतम मुनिने कुपित होकर कहा ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 185 · श्लोक 14पृष्ठ 1260

उनकी यह बात सुनकर महातपस्वी गौतम मुनि कुपित होकर बोले— ‘अत्रे! फिर कभी ऐसी बात मुँह से न निकालना। तुम्हारी बुद्धि एकाग्र नहीं है। यहाँ हमारे प्रथम प्रजापतिके रूप में साक्षात् इन्द्र उपस्थित हैं।’

स्तुति गौतम उवाच

मैवमत्रे पुनर्ब्रया न ते प्रज्ञा समाहिता ।
अत्र नः प्रथमं स्थाता महेन्द्रो वै प्रजापतिः ॥

गौतम बोलें— अत्रे! फिर कभी ऐसी बात मुँहसे न निकालना । तुम्हारी बुद्धि एकाग्र नहीं है । यहाँ हमारे प्रथम प्रजापतिके रूपमें साक्षात् इन्द्र उपस्थित हैं ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 185 · श्लोक 15पृष्ठ 1260

अत्रि ने भी गौतम को उत्तर दिया— ‘मुने! ये पृथु ही विधाता हैं, ये ही प्रजापति इन्द्र के समान हैं। तुम्हीं मोह से मोहित हो रहे हो; तुम्हें उत्तम बुद्धि प्राप्त नहीं है।’

स्तुति गौतम उवाच

अथात्रिरपि राजेन्द्र गौतमं प्रत्यभाषत ।
अयमेव विधाता हि यथैवेन्द्रः प्रजापतिः ।
त्वमेव मुह्यसे मोहान्न प्रज्ञानं तवास्ति ह ॥

राजेन्द्र! तब अत्रिने भी गौतमको उत्तर देते हुए कहा – ' मुने! ये पृथु ही विधाता हैं, ये ही प्रजापति इन्द्रके समान हैं । तुम्हीं मोहसे मोहित हो रहे हो; तुम्हें उत्तम बुद्धि नहीं प्राप्त है '

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 185 · श्लोक 16पृष्ठ 1260

गौतम बोले— ‘मैं मोह में नहीं पड़ा हूँ, तुम्हीं यहाँ आकर मोहित हो रहे हो। मैं खूब समझता हूँ, तुम राजा से मिलने की इच्छा लेकर ही भरी सभामें स्वार्थवश उनकी स्तुति कर रहे हो। उत्तम धर्म का तुम्हें बिलकुल ज्ञान नहीं है। तुम धर्म का प्रयोजन भी नहीं समझते हो। मेरी दृष्टि में तुम मूढ़ हो, बालक हो; किसी विशेष कारण से बूढ़े बने हुए हो अर्थात् केवल अवस्था से बूढ़े हो।’

स्तुति गौतम उवाच

जानामि नाहं मुह्यामि त्वमेवात्र विमुह्यते ।
स्तौषि त्वं दर्शनप्रेप्सू राजानं जनसंसदि ॥

गौतम बोले — मैं नहीं मोहमें पड़ा हूँ, तुम्हीं यहाँ आकर मोहित हो रहे हो । मैं खूब समझता हूँ, तुम राजासे मिलनेकी इच्छा लेकर ही भरी सभामें स्वार्थवश उनकी स्तुति कर रहे हो ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 185 · श्लोक 17पृष्ठ 1260

मुनियों के सामने जब वे दोनों इस प्रकार विवाद कर रहे थे, तब यज्ञ में वरण हो चुके ब्राह्मण पूछने लगे— ‘ये दोनों कैसे लड़ रहे हैं? किसने इन दोनों को महाराज पृथु के यज्ञ मण्डप में घुसने दिया है? ये दोनों जोर-जोर से बातें करते और झगड़ते यहाँ किस काम से खड़े हैं?’ उस समय सम्पूर्ण धर्मों के ज्ञाता कणाद ने बताया कि ये दोनों किसी विषय को लेकर परस्पर विवाद कर रहे हैं और उसी के निर्णय के लिये यहाँ आये हैं।

स्तुति गौतम उवाच

न वेत्थ परमं धर्मं न चावैषि प्रयोजनम् ।
बालस्त्वमसि मूढश्च वृद्धः केनापि हेतुना ॥

उत्तम धर्मका तुम्हें बिलकुल ज्ञान नहीं है । तुम धर्मका प्रयोजन भी नहीं समझते हो । मेरी दृष्टिमें तुम मूढ हो, बालक हो; किसी विशेष कारणसे बूढ़े बने हुए हो अर्थात् केवल अवस्थासे बूढ़े हो ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 185 · श्लोक 18पृष्ठ 1260

गौतम मुनि ने श्रेष्ठ ब्राह्मणों से कहा— ‘श्रेष्ठ ब्राह्मणो! हम दोनों के प्रश्न को आप लोग सुनें। अत्रिने राजा पृथु को विधाता कहा है; इस बात को लेकर हम दोनों में महान संशय एवं विवाद उपस्थित हो गया है।’ यह सुनकर वे महात्मा मुनि तुरन्त ही धर्मज्ञ सनत्कुमार जी के पास दौड़े गये।

स्तुति मार्कण्डेय उवाच

तमत्रिर्गन्तुमारेभे वित्तार्थमिति नः श्रुतम् ।
भूयोऽर्थं नानुरुध्यत् स धर्मव्यक्तिनिदर्शनात् ॥

उन दिनों महात्मा अत्रिने धन माँगनेकी इच्छासे उनके पास जानेका विचार किया, यह बात हमारे सुननेमें आयी है; परंतु ऐसा करनेसे उनको अपना धर्मात्मापन प्रकट करना पड़ता । इसलिये फिर उन्होंने धनके लिये अनुरोध नहीं किया ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 185 · श्लोक 2पृष्ठ 1258

उन महातपस्वी सनत्कुमार ने सब बातें सुनकर यह वचन कहा— ‘ब्राह्मण और क्षत्रिय से, और क्षत्रिय ब्राह्मण से संयुक्त हो जायें तो वे दोनों मिलकर शत्रुओं को उसी प्रकार दग्ध कर डालते हैं, जैसे अग्नि और वायु परस्पर सहयोगी होकर कितने ही वनों को भस्म कर डालते हैं। राजा धर्म रूप से विख्यात है। वही प्रजापति, इन्द्र, शुक्राचार्य, धाता और बृहस्पति भी है। जिस राजा की पूजा प्रजापति, विराट्, सम्राट्, क्षत्रिय, भूपति, नृप आदि शब्दों द्वारा की जाती है, उसकी पूजा कौन नहीं करेगा? पुरायोनि, युधाजित्, अभिया, मुदित, भव, स्वर्णेता, सहजित् तथा बभ्रु— इन नामों द्वारा राजा का वर्णन किया जाता है। राजा सत्य का कारण, प्राचीन बातों को जानने वाला तथा सत्यधर्म में प्रवृत्ति कराने वाला है। अधर्म से डरे हुए ऋषियों ने अपना ब्राह्मबल भी क्षत्रियों में स्थापित कर दिया था। जैसे देवलोक में सूर्य अपने तेज से सम्पूर्ण अन्धकार का नाश करता है, उसी प्रकार राजा इस पृथ्वी पर रहकर अधर्मों को सर्वथा हटा देता है। अतः शास्त्र-प्रमाण पर दृष्टिपात करने से राजा की प्रधानता सूचित होती है। इसलिये जिसने राजा को प्रजापति बतलाया है, उसी का पक्ष उत्कृष्ट सिद्ध होता है।’

स्तुति

वैन्यं विधातेत्याहात्रिरत्र नौ संशयो महान् ।
श्रुत्वैव तु महात्मानो मुनयोऽभ्यद्रवन् द्रुतम् ॥

सनत्कुमारं धर्मज्ञं संशयच्छेदनाय वै ।
स च तेषां वचः श्रुत्वा यथातत्त्वं महातपाः ।
प्रत्युवाचाथ तानेवं धर्मार्थसहितं वचः ॥

तब गौतमने सदस्यरूपसे बैठे हुए उन श्रेष्ठ मुनियोंसे कहा- ' श्रेष्ठ ब्राह्मणो! हम दोनोंके प्रश्नको आपलोग सुनें। अत्रिने राजा पृथुको विधाता कहा है । इस बातको लेकर हम दोनोंमें महान् संशय एवं विवाद उपस्थित हो गया है । ' यह सुनकर वे महात्मा मुनि उक्त संशयका निवारण करनेके लिये तुरंत ही धर्मज्ञ सनत्कुमारजीके पास दौड़े गये । उन महातपस्वीने इनकी सब बातें यथार्थरूपसे सुनकर उनसे यह धर्म एवं अर्थयुक्त वचन कहा – ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 185 · श्लोक 22–24पृष्ठ 1261

तदनन्तर एक पक्ष की उत्कृष्टता सिद्ध हो जाने पर महामना राजा पृथु बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने अत्रि मुनि से कहा— ‘ब्रह्मर्षे! आपने यहाँ मुझे मनुष्यों में प्रथम, श्रेष्ठ, ज्येष्ठ तथा सम्पूर्ण देवताओं के समान बताया है; इसलिये मैं आपको प्रचुर मात्रा में नाना प्रकार के रत्न और धन दूँगा, सुन्दर वस्त्राभूषणों से विभूषित सहस्रों युवती दासियाँ अर्पित करूँगा तथा दस करोड़ स्वर्ण मुद्रा और दस भार सोना भी दूँगा। विप्रर्षे! ये सब वस्तुएँ आपको अभी दे रहा हूँ, मैं समझता हूँ, आप सर्वज्ञ हैं।’

स्तुति

प्रजापतिर्विराट् सम्राट् क्षत्रियो भूपतिर्नृपः ।
य एभिः स्तूयते शब्दैः कस्तं नार्चितुमर्हति ॥

पुरायोनिर्युधाजिच्च अभिया मुदितो भवः ।
स्वर्णेता सहजिद् बभ्रुरिति राजाभिधीयते ॥

सत्ययोनिः पुराविच्च सत्यधर्मप्रवर्तकः ।
अधर्मादृषयो भीता बलं क्षत्रे समादधन् ॥

जिस राजाकी प्रजापति, विराट्, सम्राट्, क्षत्रिय, भूपति, नृप आदि शब्दोंद्वारा स्तुति की जाती है, उसकी पूजा कौन नहीं करेगा? पुरायोनि ( प्रथम कारण ), युधाजित् ( संग्रामविजयी ), अभिया (रक्षाके लिये सर्वत्र गमन करनेवाला ), मुदित ( प्रसन्न ), भव ( ईश्वर ), स्वर्णेता ( स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला), सहजित् ( तत्काल विजय करनेवाला ) तथा बभ्रु ( विष्णु ) – इन नामोंद्वारा राजाका वर्णन किया जाता है । राजा सत्यका कारण, प्राचीन बातोंको जाननेवाला तथा सत्यधर्ममें प्रवृत्ति करानेवाला है । अधर्मसे डरे हुए ऋषियोंने अपना ब्राह्मबल भी क्षत्रियोंमें स्थापित कर दिया था ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 185 · श्लोक 27–29पृष्ठ 1262

तब महान तपस्वी अत्रि मुनि राजा से समादृत होकर उस सम्पूर्ण धन को लेकर अपने घर चले गये। फिर मन पर संयम रखने वाले वे महामुनि अपने पुत्रों को प्रसन्नतापूर्वक वह सारा धन बाँटकर, तपस्या का शुभ सङ्कल्प मन में लेकर वन में ही चले गये।

In English

The Dispute Between Atri and Gautama

Atri visits King Prithu to ask for wealth, but a dispute arises with Gautama over whether the King deserves to be called a creator figure like Indra. Sanatkumara intervenes to support the status of the King, leading Prithu to grant Atri vast riches and gold.

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  • Why did atri go to king prithu?
  • What was the argument between atri and gautama?
  • How did sanatkumara resolve the dispute?
  • What gifts did king prithu give to atri?

Also written: Brahmanamahatmya, Brahmana, Atri, Gautama, Kashyapa, Sanatkumara, ब्राह्मणमाहात्म्य