श्रीगणेशाय नमः।

इन्द्रद्युम्नोपाख्यान : पुण्य क्षीण होने पर मनुष्य का पतन कैसे होता है?

सत्कर्म और कीर्ति का महत्व

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड २ · वनपर्व → मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 199 · पृष्ठ 1370–1374

722 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 6 श्लोक

मार्कण्डेय ने पाण्डव से कहा

चिरजीवी और पुण्य के प्रभाव को समझाने हेतु

वैशम्पायनजी ने कहा— जनमेजय! जब ऋषियों तथा पाण्डवों ने मार्कण्डेयजी से पूछा कि 'भगवन्! क्या इस जगत् में आपसे भी पहले का उत्पन्न कोई चिरजीवी है?' तब मार्कण्डेयजी ने यह कथा सुनाई।

मार्कण्डेयजी बोले— 'है, क्यों नहीं! सुनो। एक समय की बात है, राजर्षि इन्द्रद्युम्न अपना पुण्य क्षीण हो जाने के कारण स्वर्गलोक से नीचे गिर गए थे। उन्हें स्वर्ग से यह कहकर गिरा दिया गया था कि— जगत् में तुम्हारी कीर्ति नष्ट हो गयी है।' स्वर्ग से गिरने के पश्चात वे व्याकुल होकर मेरे पास आए और बोले— 'क्या आप मुझे पहचानते हैं?'

अथैतत् सकलं कच्छपेनोदाहृतं श्रुत्वा तदनन्तरं देवलोकाद् देवरथः प्रादुरासीद् वाचश्चाश्रूयन्तेन्द्रद्युम्नं प्रति प्रस्तुतस्ते स्वर्गो यथोचितं स्थानं प्रतिपद्यस्व कीर्तिमानस्यव्यग्रो याहीति ॥

‘ कच्छपके मुँहसे ये सारी बातें सुन लेनेके पश्चात् देवलोकसे एक दिव्य रथ आकर प्रकट हुआ और उसमेंसे इन्द्रद्युम्नके प्रति कही हुई कुछ बातें सुनायी देने लगीं — ‘ राजन्! आपके लिये स्वर्गलोक प्रस्तुत है । वहाँ चलकर यथोचित स्थान ग्रहण करें । आप कीर्तिमान् हैं । अतः निश्चिन्त होकर स्वर्गलोककी यात्रा करें'

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 199 · श्लोक 12पृष्ठ 1373

मैंने उनसे कहा— 'हम लोग तीर्थयात्रा आदि भिन्न-भिन्न पुण्य कार्यों की चेष्टाओं में इतने व्यग्र रहते हैं कि किसी एक स्थान पर सदा नहीं रहते। एक गाँव में केवल एक रात निवास करते हैं। अपने कार्यों का अनुष्ठान भी हमें भूल जाता है। व्रत और उपवास आदि में लगे रहने से अपने शरीर को सदा कष्ट पहुँचाने के कारण आवश्यक कार्यों का आरम्भ भी हमसे नहीं हो पाता; ऐसी दशा में हम आपको कैसे जान सकते हैं?'

वैशम्पायन उवाच

तमहमब्रुवं कार्यचेष्टाकुलत्वान्न वयं वासायनिका ग्रामैकरात्रवासिनो न प्रत्यभिजानीमोऽ प्यात्मनोऽर्थानामनुष्ठानं न शरीरोपतापेनात्मनःसमारभामोऽर्थानामनुष्ठानम् ॥

' मैंने उनसे कहा — ‘ हमलोग तीर्थयात्रा आदि भिन्न -भिन्न पुण्य कार्योंकी चेष्टाओंमें व्यग्र रहते हैं, अतः किसी एक स्थानपर सदा नहीं रहते । एक गाँवमें केवल एक रात निवास करते हैं । अपने कार्योंका अनुष्ठान भी हमें भूल जाता है । व्रत - उपवास आदिमें लगे रहनेसे अपने शरीरको सदा कष्ट पहुँचानेके कारण आवश्यक कार्योंका आरम्भ भी हमसे नहीं हो पाता है, ऐसी दशामें हम आपको कैसे जान सकते हैं? '

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 199 · श्लोक 3पृष्ठ 1371

मेरा ऐसा कहना सुनकर राजर्षि इन्द्रद्युम्न ने पुनः मुझसे पूछा— 'क्या आपसे भी पहले का पैदा हुआ कोई पुरातन प्राणी है?' मैंने उन्हें उत्तर दिया— 'हिमालय पर्वत पर प्रावारकर्ण नाम से प्रसिद्ध एक उलूक निवास करता है। वह मुझसे भी पहले का उत्पन्न हुआ है। सम्भव है, वह आपको जानता हो। यहाँ से बहुत दूर की यात्रा करने पर हिमालय पर्वत मिलेगा, वहीं वह रहता है।'

तब इन्द्रद्युम्न अश्व बनकर मुझे वहाँ तक ले गए जहाँ वह उलूक रहता था। वहाँ जाकर राजा ने उससे पूछा— 'क्या आप मुझे जानते हैं?' उलूक ने दो घड़ी तक सोच-विचार किया और कहा— 'मैं आपको नहीं जानता हूँ।' तब राजर्षि ने पुनः पूछा— 'क्या आपसे भी पहले का उत्पन्न हुआ कोई चिरजीवी प्राणी है?' उलूक ने उत्तर दिया— 'इन्द्रद्युम्न नाम से प्रसिद्ध एक सरोवर है, वहाँ नाडीजङ्घ नाम का एक बक निवास करता है। वह हमसे बहुत पहले का उत्पन्न हुआ है। उससे पूछिये।'

फिर इन्द्रद्युम्न मुझे और उलूक को साथ लेकर उस सरोवर पर गए जहाँ नाडीजङ्घ बक रहता था। हमने उससे पूछा— 'क्या आप राजा इन्द्रद्युम्न को जानते हैं?' उसने भी दो घड़ी तक सोचकर कहा— 'मैं राजा इन्द्रद्युम्न को नहीं जानता हूँ।' तब हमने पूछा— 'क्या दूसरा कोई प्राणी ऐसा है जिसका जन्म आपसे भी पहले हुआ हो?' उसने कहा— 'है; इसी सरोवर में अकूपार नामक एक कछुआ रहता है। वह मुझसे भी पहले उत्पन्न हुआ है। आप लोग उस अकूपार से ही पूछिये।'

सोऽस्माभिः पृष्टो भवानिममिन्द्रद्युम्नं राजानमभिजानातीति स एवं मुहुर्तं ध्यात्वाब्रवीन्ना- भिजानाम्यहमिद्रद्युम्नं राजानमिति ।
ततः सोऽस्माभिः पृष्टः कश्चिद् भवतोऽन्यश्चिरजाततरोऽस्तीति ।
स नोऽब्रवीदस्ति खल्वस्मिन्नेव सरस्यकूपारो नाम कच्छपः प्रतिवसति ।
स मत्तश्चिरजाततरः ।
स यदि कथंचिदभिजानीयादिमं राजानं तमकूपारं पृच्छध्वमिति ॥

‘ हमलोगोंने उस बकसे पूछा- ' क्या आप - राजा इन्द्रद्युम्नको जानते हैं? ' उसने दो घड़ीतक सोचकर उत्तर दिया- ' मैं राजा इन्द्रद्युम्नको नहीं जानता हूँ। ' तब हमलोगोंने उनसे पूछा- ' क्या दूसरा कोई प्राणी ऐसा है? जिसका जन्म आपसे भी पहले हुआ हो? ' उसने हमसे कहा — ‘ है; इसी सरोवरमें अकूपार नामक एक कछुआ रहता है । वह मुझसे भी पहले उत्पन्न हुआ है । आपलोग उस अकूपारसे ही पूछिये । सम्भव है, वह इन राजर्षिको किसी तरह जानता हो '

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 199 · श्लोक 8पृष्ठ 1372

उस बक ने अकूपार को सूचना दी कि 'हम आपसे कुछ अभीष्ट प्रश्न पूछना चाहते हैं, कृपया आइये।' यह सुनकर वह कछुआ सरोवर से निकलकर वहीं आया जहाँ हम तट पर खड़े थे। हमने उससे पूछा— 'क्या आप राजा इन्द्रद्युम्न को जानते हैं?'

वह कछुआ दो घड़ी तक ध्यान करने के बाद, अचानक उसके नेत्रों में आँसू भर आए। वह उद्विग्न हृदय से काँपते हुए और अचेत जैसी दशा में हाथ जोड़कर बोला— 'मैं इन्हें क्यों नहीं पहचानूँगा! इन्होंने एक हजार बार अग्निस्थापन के समय यज्ञों में यूप स्थापित किए हैं। इनके द्वारा दक्षिणा में दी हुई गौओं के आने-जाने से ही यह सरोवर बन गया है, जिसमें मैं निवास कर रहा हूँ!'

सरश्चेदमस्य दक्षिणाभिर्दत्ताभिर्गोभिरति -क्रममाणाभिः कृतम् ।
अत्र चाहं प्रतिवसामीति ॥

' इनके द्वारा दक्षिणामें दी हुई गौओंके आने -जानेसे यह सरोवर बन गया है, जिसमें मैं निवास कर रहा हूँ'

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 199 · श्लोक 11पृष्ठ 1373

कछुए के मुँह से ये बातें सुनते ही देवलोक से एक दिव्य रथ आकर प्रकट हुआ। उस रथ से इन्द्रद्युम्न के लिए निर्देश सुनाई देने लगे— 'राजन्! आपके लिये स्वर्गलोक प्रस्तुत है। वहाँ चलकर यथोचित स्थान ग्रहण करें। आप कीर्तिमान् हैं, अतः निश्चिन्त होकर स्वर्गलोक की यात्रा करें।'

मार्कण्डेयजी बोले— 'जब तक मनुष्य के पुण्यकर्म का शब्द भूलोक और देवलोक का स्पर्श करता है, जब तक दोनों लोकों में उसकी कीर्ति बनी रहती है, तभी तक वह पुरुष स्वर्गलोक का निवासी कहलाता है। संसार में जिस किसी प्राणी की अपकीर्ति कही जाती है, जब तक उसके अपयश का शब्द गूँजता रहता है, वह नीचे के लोकों में गिर जाता है। इसलिए मनुष्य को सदा कल्याणकारी सत्कर्मों में ही लगे रहना चाहिए; इससे अनन्त फल की प्राप्ति होती है। पापपूर्ण चिन्तन का त्याग करके सदा धर्म का ही आश्रय लेना चाहिए।'

तस्मात् कल्याणवृत्तः स्या- दनन्ताय नरः सदा ।
विहाय चित्तं पापिष्ठं धर्ममेव समाश्रयेत् ॥

' इसलिये मनुष्यको सदा कल्याणकारी सत्कर्मोंमें ही लगे रहना चाहिये । इससे अनन्त फलकी प्राप्ति होती है । पापपूर्ण चित्त ( चिन्तन या विचार )-का परित्याग करके सदा धर्मका ही आश्रय लेना चाहिये '

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 199 · श्लोक 15पृष्ठ 1374

देवदूत की यह बात सुनकर राजा ने कहा— 'जब तक इन दोनों वृद्धों को इनके स्थान पर न पहुँचा दूँ, तब तक ठहरे रहो।' यह कहकर राजा ने मुझे और प्रावारकर्ण नामक उलूक को उनके यथोचित स्थान पर पहुँचा दिया। फिर स्वयं उसी रथ से स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर अपने स्थान को प्राप्त किया। इस प्रकार मैंने चिरजीवी होकर यह अनुभव किया है।'

इत्येतच्छ्रुत्वा स राजाब्रवीत् तिष्ठ तावद् यावदिमौ वृद्धौ यथास्थानं प्रतिपादयामीति ॥

‘ देवदूतकी यह बात सुनकर राजाने कहा - ' जबतक इन दोनों वृद्धोंको इनके स्थानपर पहुँचा न दूँ तबतक ठहरे रहो '

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 199 · श्लोक 16पृष्ठ 1374

In English

The Story of King Indradyumna and the Ancient Turtle

After losing his place in heaven, King Indradyumna seeks an ancient being who might recognize him. He travels from an owl to a crane, finally meeting a turtle named Akupara who recognizes the king through his past sacrificial deeds. Upon hearing this, a divine chariot returns to take Indradyumna back to heaven.

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