श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1371–1380
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1371–1380
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नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः राजा इन्द्रद्युम्न तथा अन्य चिरजीवी प्राणियोंकी कथा वैशम्पायन उवाच मार्कण्डेयमृषयः पाण्डवाः पर्यपृच्छन्नस्ति कश्चिद् भवतश्चिरजाततर इति ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! ऋषियों तथा पाण्डवोंने मार्कण्डेयजीसे पूछा —‘भगवन्! कोई आपसे भी पहलेका उत्पन्न चिरजीवी इस जगत्में है या नहीं? ॥ स तानुवाचास्ति खलु राजर्षिरिन्द्रद्युम्नो नाम क्षीणपुण्यस्त्रिदिवात् प्रच्युतः कीर्तिस्ते व्युच्छिन्नेति स मामुपातिष्ठदथ प्रत्यभिजानाति मां भवानिति ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजीने कहा- ' है क्यों नहीं, सुनो । एक समय राजर्षि इन्द्रद्युम्न अपना पुण्य क्षीण हो जानेके कारण यह कहकर स्वर्गलोकसे नीचे गिरा दिये गये थे कि ‘ जगत्में तुम्हारी कीर्ति नष्ट हो गयी है । ' स्वर्गसे गिरनेपर वे मेरे पास आये और बोले — ' क्या आप मुझे पहचानते हैं? ' ॥ २ ॥
तमहमब्रुवं कार्यचेष्टाकुलत्वान्न वयं वासायनिका ग्रामैकरात्रवासिनो न प्रत्यभिजानीमोऽ प्यात्मनोऽर्थानामनुष्ठानं न शरीरोपतापेनात्मनःसमारभामोऽर्थानामनुष्ठानम् ॥ ३ ॥
' मैंने उनसे कहा — ‘ हमलोग तीर्थयात्रा आदि भिन्न -भिन्न पुण्य कार्योंकी चेष्टाओंमें व्यग्र रहते हैं, अतः किसी एक स्थानपर सदा नहीं रहते । एक गाँवमें केवल एक रात निवास करते हैं । अपने कार्योंका अनुष्ठान भी हमें भूल जाता है । व्रत - उपवास आदिमें लगे रहनेसे अपने शरीरको सदा कष्ट पहुँचानेके कारण आवश्यक कार्योंका आरम्भ भी हमसे नहीं हो पाता है, ऐसी दशामें हम आपको कैसे जान सकते हैं? ' ॥ ३ ॥
(एवमुक्तो राजर्षिरिन्द्रद्युम्नः पुनर्मामब्रवीद् अथास्ति कश्चित् त्वत्तश्चिरं जाततर इति ॥ ) ‘ मेरे ऐसा कहनेपर राजर्षि इन्द्रद्युम्नने पुनः मुझसे पूछा - ' क्या आपसे भी पहलेका पैदा हुआ कोई पुरातन प्राणी है? ' ॥ ( तं पुनः प्रत्यब्रवम्) अस्ति खलु हिमवति प्रावारकर्णो नामोलूकः प्रतिवसति । स मत्तश्चिरजातो भवन्तं यदि जानीयादितः प्रकृष्टे चाध्वनि हिमवांस्तत्रासौ प्रतिवसतीति ॥ ४ ॥
' तब मैंने उन्हें पुनः उत्तर दिया-' हिमालय पर्वतपर प्रावारकर्ण नामसे प्रसिद्ध एक उलूक निवास करता है । वह मुझसे भी पहलेका उत्पन्न हुआ है । सम्भव है, वह आपको जानता हो । यहाँसे बहुत दूरकी यात्रा करनेपर हिमालय पर्वत मिलेगा । वहीं वह रहता है ' ॥ ४ ॥
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ततः स मामश्वो भूत्वा तत्रावहद् यत्र बभूवोलूकः । अथैनं स राजा पप्रच्छ प्रतिजानाति मां भवानिति ॥ ५ ॥
‘ तब इन्द्रद्युम्न अश्व बनकर मुझे वहाँतक ले गये, जहाँ उलूक रहता था । वहाँ जाकर राजाने उससे पूछा — ‘ क्या आप मुझे जानते हैं?' ॥ ५ ॥
स मुहूर्तमिव ध्यात्वाब्रवीदेनं नाभिजानामि भवन्तमिति स एवमुक्त इन्द्रद्युम्नः पुनस्तमुलूक- मब्रवीद् राजर्षिः ॥ ६ ॥
‘ उसने दो घड़ीतक सोच- विचारकर उनसे कहा- ' मैं आपको नहीं जानता हूँ । ' उलूकके ऐसा कहनेपर राजर्षि इन्द्रद्युम्नने पुनः उससे पूछा— ॥ ६ ॥
अथास्ति कश्चिद् भवतः सकाशाच्चिरजात इति स एवमुक्तोऽब्रवीदस्ति खल्विन्द्रद्युम्नं नाम सरस्तस्मिन् नाडीजङ्घो नाम बकः प्रतिवसति सोऽस्मत्तश्चिरजाततरस्तं पृच्छेति तत इन्द्रद्युम्नो मां चोलूकमादाय तत् सरोऽगच्छद् यत्रासौ नाडीजङ्घो नाम बको बभूव ॥ ७ ॥
' क्या आपसे भी पहलेका उत्पन्न हुआ कोई चिरजीवी प्राणी है? ' उनके ऐसा पूछनेपर उलूकने कहा- ' इन्द्रद्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक सरोवर है । वहाँ नाडीजंघ नामसे प्रसिद्ध एक बक निवास करता है । वह हमसे बहुत पहलेका उत्पन्न हुआ है । उससे पूछिये । ' तब इन्द्रद्युम्न मुझको और उलूकको भी साथ लेकर उस सरोवरपर गये जहाँ नाडीजंघ बक निवास करता था ॥ ७ ॥
सोऽस्माभिः पृष्टो भवानिममिन्द्रद्युम्नं राजानमभिजानातीति स एवं मुहुर्तं ध्यात्वाब्रवीन्ना- भिजानाम्यहमिद्रद्युम्नं राजानमिति । ततः सोऽस्माभिः पृष्टः कश्चिद् भवतोऽन्यश्चिरजाततरोऽस्तीति । स नोऽब्रवीदस्ति खल्वस्मिन्नेव सरस्यकूपारो नाम कच्छपः प्रतिवसति । स मत्तश्चिरजाततरः । स यदि कथंचिदभिजानीयादिमं राजानं तमकूपारं पृच्छध्वमिति ॥ ८ ॥
‘ हमलोगोंने उस बकसे पूछा- ' क्या आप - राजा इन्द्रद्युम्नको जानते हैं? ' उसने दो घड़ीतक सोचकर उत्तर दिया- ' मैं राजा इन्द्रद्युम्नको नहीं जानता हूँ। ' तब हमलोगोंने उनसे पूछा- ' क्या दूसरा कोई प्राणी ऐसा है? जिसका जन्म आपसे भी पहले हुआ हो? ' उसने हमसे कहा — ‘ है; इसी सरोवरमें अकूपार नामक एक कछुआ रहता है । वह मुझसे भी पहले उत्पन्न हुआ है । आपलोग उस अकूपारसे ही पूछिये । सम्भव है, वह इन राजर्षिको किसी तरह जानता हो ' ॥ ८ ॥
ततः स बकस्तमकूपारं कच्छपं विज्ञापयामास । अस्माकमभिप्रेतं भवन्तं किञ्चिदर्थमभिप्रष्टुं साध्वागम्यतां तावदिति तच्छ्रुत्वा कच्छपस्तस्मात् सरस उत्थायाभ्यगच्छद् यत्र तिष्ठामो वयं तस्य सरसस्तीरे आगतं चैनं वयमपृच्छाम भवानिन्द्रद्युम्नं राजानमभिजानातीति ॥ ९ ॥
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‘ तब उस बकने अकूपार नामक कछुएको यह सूचना दी कि ' हमलोग आपसे कुछ अभीष्ट प्रश्न पूछना चाहते हैं । कृपया आइये । ' यह संदेश सुनकर वह कछुआ उस सरोवरसे निकलकर वहीं आया, जहाँ हमलोग तटपर खड़े थे । आनेपर उससे हमलोगोंने पूछा — ‘ क्या आप राजा इन्द्रद्युम्नको जानते हैं? ' ॥ ९ ॥
स मुहूर्त ध्यात्वा बाष्पसम्पूर्णनयन उद्विग्न हृदयो वेपमानो विसंज्ञकल्पः प्राञ्जलिरब्रवीत् । किमहमेनं न प्रत्यभिज्ञास्यामीह ह्यनेन सहस्र-कृत्वश्चितिषु यूपा आहिताः ॥ १० ॥
' उसने दो घड़ीतक ध्यान करके नेत्रोंमें आँसू भरकर उद्विग्न हृदयसे काँपते हुए अचेतकी- सी दशामें हाथ जोड़कर कहा - ' मैं इन्हें क्यों नहीं पहचानूँगा । इन्होंने एक हजार बार अग्निस्थापनके समय यज्ञ- यूपोंकी स्थापना की है ॥ १० ॥
सरश्चेदमस्य दक्षिणाभिर्दत्ताभिर्गोभिरति -क्रममाणाभिः कृतम् । अत्र चाहं प्रतिवसामीति ॥ ११ ॥
' इनके द्वारा दक्षिणामें दी हुई गौओंके आने -जानेसे यह सरोवर बन गया है, जिसमें मैं निवास कर रहा हूँ' ॥ ११ ॥
अथैतत् सकलं कच्छपेनोदाहृतं श्रुत्वा तदनन्तरं देवलोकाद् देवरथः प्रादुरासीद् वाचश्चाश्रूयन्तेन्द्रद्युम्नं प्रति प्रस्तुतस्ते स्वर्गो यथोचितं स्थानं प्रतिपद्यस्व कीर्तिमानस्यव्यग्रो याहीति ॥ १२ ॥
‘ कच्छपके मुँहसे ये सारी बातें सुन लेनेके पश्चात् देवलोकसे एक दिव्य रथ आकर प्रकट हुआ और उसमेंसे इन्द्रद्युम्नके प्रति कही हुई कुछ बातें सुनायी देने लगीं — ‘ राजन्! आपके लिये स्वर्गलोक प्रस्तुत है । वहाँ चलकर यथोचित स्थान ग्रहण करें । आप कीर्तिमान् हैं । अतः निश्चिन्त होकर स्वर्गलोककी यात्रा करें' ॥ १२ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः- दिवं स्पृशति भूमिं च शब्दः पुण्यस्य कर्मणः । यावत् स शब्दो भवति तावत् पुरुष उच्यते ॥ १३ ॥
‘इस विषयमें ये श्लोक हैं- 'जबतक मनुष्यके पुण्यकर्मका शब्द भूलोक और देवलोकका स्पर्श करता है, जबतक दोनों लोकोंमें उसकी कीर्ति बनी रहती है, तभीतक वह पुरुष स्वर्गलोकका निवासी बताया जाता है ॥ १३ ॥
अकीर्तिः कीर्त्यते लोके यस्य भूतस्य कस्यचित् । स पतत्यधमाँल्लोकान् यावच्छब्दः प्रकीर्त्यते ॥ १४ ॥
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' संसारमें जिस किसी प्राणीकी अपकीर्ति कही जाती है— जबतक उसके अपयशका शब्द गूँजता रहता है, तबतकके लिये वह नीचेके लोकोंमें गिर जाता है ॥ १४ ॥
तस्मात् कल्याणवृत्तः स्या- दनन्ताय नरः सदा । विहाय चित्तं पापिष्ठं धर्ममेव समाश्रयेत् ॥ १५ ॥
' इसलिये मनुष्यको सदा कल्याणकारी सत्कर्मोंमें ही लगे रहना चाहिये । इससे अनन्त फलकी प्राप्ति होती है । पापपूर्ण चित्त ( चिन्तन या विचार )-का परित्याग करके सदा धर्मका ही आश्रय लेना चाहिये ' ॥ १५ ॥
इत्येतच्छ्रुत्वा स राजाब्रवीत् तिष्ठ तावद् यावदिमौ वृद्धौ यथास्थानं प्रतिपादयामीति ॥ १६ ॥
‘ देवदूतकी यह बात सुनकर राजाने कहा - ' जबतक इन दोनों वृद्धोंको इनके स्थानपर पहुँचा न दूँ तबतक ठहरे रहो ' ॥ १६ ॥
स मां प्रावारकर्णं चोलूकं यथोचिते स्थाने प्रतिपाद्य तेनैव यानेन संस्थितो यथोचितं स्थानं प्रतिपेदे । तन्मयानुभूतं चिरजीविनेदृशमिति पाण्डवानुवाच मार्कण्डेयः ॥ १७ ॥
' यह कहकर राजाने मुझे तथा प्रावारकर्ण नामक उलूकको यथोचित स्थानपर पहुँचा दिया और उसी रथसे स्वर्गकी ओर प्रस्थान करके वहाँ यथोचित स्थान प्राप्त कर लिया । इस -प्रकार मैंने चिरजीवी होकर अनुभव किया है ' – यह बात पाण्डवोंसे मार्कण्डेयजीने कही ॥ पाण्डवाश्चोचुः साधु शोभनं भवता कृतं राजानमिन्द्रद्युम्नं स्वर्गलोकाच्च्युतं स्वे स्थाने प्रतिपादयतेत्यथैतानब्रवीदसौ ननु देवकीपुत्रेणापि कृष्णेन नरके मज्जमानो राजर्षिर्नृगस्तस्मात् कृच्छ्रात् पुनः समुद्धृत्य स्वर्गं प्रापित इति ॥ १८ ॥
पाण्डव बोले — ' आपने यह बहुत अच्छा किया कि स्वर्गलोकसे भ्रष्ट हुए राजा इन्द्रद्युम्नको पुनः अपने स्थानकी प्राप्ति करवा दी । ' तब इनसे मार्कण्डेयजीने कहा —‘देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने भी नरकमें डूबते हुए राजर्षि नृगको उस भारी संकटसे छुड़ाकर फिर स्वर्गमें पहुँचा दिया' ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि इन्द्रद्युम्नोपाख्याने नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९९ ॥ इसप्रकारश्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें इन्द्रद्युम्नोपाख्यानविषयक एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९९ ॥
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द्विशततमोऽध्यायः निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण, दानपात्रके लक्षण, अतिथि - सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय -निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा स राजा राजर्षेरिन्द्रद्युम्नस्य तत् तदा ।
मार्कण्डेयान्महाभागात् स्वर्गस्य प्रतिपादनम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरो महाराज पुनः पप्रच्छ तं मुनिम् । वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! महाभाग मार्कण्डेयजीके मुखसे राजर्षि इन्द्रद्युम्नको पुनः स्वर्गकी प्राप्तिका वृत्तान्त सुनकर राजा युधिष्ठिरने उन मुनीश्वरसे फिर प्रश्न किया ॥ १३ ॥
कीदृशीषु ह्यवस्थासु दत्त्वा दानं महामुने ॥ २ ॥
इन्द्रलोकं त्वनुभवेत् पुरुषस्तद् ब्रवीहि मे । ‘ महामुने! किन अवस्थाओंमें दान देकर मनुष्य इन्द्रलोकका सुख भोगता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ' ॥ २ ॥
गार्हस्थ्येऽप्यथवा बाल्ये यौवने स्थविरेऽपि वा ।
यथा फलं समश्नाति तथा त्वं कथयस्व मे ॥ ३ ॥
‘ मनुष्य बाल्यावस्था या गृहस्थाश्रममें, जवानीमें अथवा बुढ़ापेमें दान देनेसे जैसा फल पाता है, उसका मुझसे वर्णन कीजिये' ॥ ३ ॥
मार्कण्डेय उवाच
वृथा जन्मानि चत्वारि वृथा दानानि षोडश ।
वृथा जन्म ह्यपुत्रस्य ये च धर्मबहिष्कृताः ॥। ४ ॥
परपाकेषु येऽश्नन्ति आत्मार्थं च पचेत् तु यः ।
पर्यश्नन्ति वृथा ये च तदसत्यं प्रकीर्त्यते ॥ ५ ॥
= मार्कण्डेयजीने कहा – ( नीचे लिखे अनुसार) चार प्रकारके जीवन व्यर्थ हैं और सोलह प्रकारके दान व्यर्थ हैं । जो पुत्र- हीन हैं, जो धर्मसे बहिष्कृत ( भ्रष्ट) हैं, जो सदा दूसरोंकी ही रसोईमें भोजन किया करते हैं तथा जो केवल अपने लिये ही भोजन बनाते एवं
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देवता और अतिथियोंको न देकर अकेले ही भोजन कर लेते हैं, उनका वह भोजन असत् कहा गया है । अतः उनका जन्म वृथा है ( इस प्रकार इन चार प्रकारके मनुष्योंका जन्म व्यर्थ है ) ॥ ४-५ ॥
आरूढपतिते दत्तमन्यायोपहृतं च यत् ।
व्यर्थं तु पतिते दानं ब्राह्मणे तस्करे तथा ॥ ६ ॥
‘' आरूढ़- जो वानप्रस्थ या संन्यास आश्रमसे पुनः गृहस्थ आश्रममें लौट आया हो, उसे पतित' कहते हैं । उसको दिया हुआ दान व्यर्थ होता है। अन्यायसे कमाये हुए धनका दान भी व्यर्थ ही है । पतित ब्राह्मण तथा चोरको दिया हुआ दान भी व्यर्थ होता है ॥ ६ ॥
गुरौ चानृतिके पापे कृतघ्ने ग्रामयाजके ।
वेदविक्रयिणे दत्तं तथा वृषलयाजके ॥ ७ ॥
ब्रह्मबन्धुषु यद् दत्तं यद् दत्तं वृषलीपतौ ।
स्त्रीजनेषु च यद् दत्तं व्यालग्राहे तथैव च ॥ ८ ॥
परिचारकेषु यद् दत्तं वृथा दानानि षोडश । पिता आदि गुरुजन, मिथ्यावादी, पापी, कृतघ्न, ग्रामपुरोहित, वेदविक्रय करनेवाले, शूद्रसे यज्ञ करानेवाले, नीच ब्राह्मण, शूद्राके पति ब्राह्मण, साँपको पकड़कर व्यवसाय करनेवाले तथा सेवकों और स्त्री-समूहको दिया हुआ दान व्यर्थ है । इस प्रकार ये सोलह दान निष्फल बताये गये हैं ॥ ७-८३ ॥ तमोवृतस्तु यो दद्याद् भयात् क्रोधात् तथैव च ॥ ९ ॥
भुङ्क्ते च दानं तत् सर्वं गर्भस्थस्तु नरः सदा ।
ददद् दानं द्विजातिभ्यो वृद्धभावेन मानवः ॥ १० ॥
जो तमोगुणसे आवृत हो भय और क्रोधपूर्वक दान देता है, वह मनुष्य वैसे सब प्रकारके दानोंका फल भावी जन्ममें गर्भावस्थामें भोगता है, अर्थात् तामसी दान करनेके कारण वह उसका फल दुःखके रूपमें भोगता है तथा ( श्रेष्ठ ) ब्राह्मणोंको दान देनेवाला मानव उस दानका फल बड़ा होनेपर ( कामनाके अनुसार) भोगता है ॥ ९-१० ॥
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु सर्वदानानि पार्थिव ।
दातव्यानि द्विजातिभ्यः स्वर्गमार्गजिगीषया ॥ ११ ॥
राजन्! इसीलिये मनुष्यको चाहिये कि वह स्वर्ग मार्गपर अधिकार पानेकी इच्छासे सभी अवस्थाओंमें ( श्रेष्ठ ) ब्राह्मणोंको ही सब प्रकारके दान दे ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर उवाच
चातुर्वर्ण्यस्य सर्वस्य वर्तमानाः प्रतिग्रहे ।
केन विप्रा विशेषेण तारयन्ति तरन्ति च ॥ १२ ॥
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युधिष्ठिरने पूछा- महामुने! जो ब्राह्मण चारों वर्णोंमेंसे सभीके दान ग्रहण करते हैं, वे किस विशेष धर्मका पालन करनेसे दूसरोंको तारते और स्वयं भी तरते हैं ॥ १२ ॥
मार्कण्डेय उवाच
जपैर्मन्त्रैश्च होमैश्च स्वाध्यायाध्ययनेन च ।
नावं वेदमयीं कृत्वा तारयन्ति तरन्ति च ॥ १३ ॥
मार्कण्डेयजीने कहा- राजन्! ब्राह्मण जप, मन्त्र ( पाठ ), होम, स्वाध्याय और वेदाध्ययनके द्वारा वेदमयी नौकाका निर्माण करके दूसरोंको भी तारते हैं और स्वयं भी तर जाते हैं ॥ १३ ॥
ब्राह्मणांस्तोषयेद् यस्तु तुष्यन्ते तस्य देवताः ।
वचनाच्चापि विप्राणां स्वर्गलोकमवाप्नुयात् ॥ १४ ॥
जो ब्राह्मणोंको संतुष्ट करता है, उसपर सब देवता संतुष्ट रहते हैं । ब्राह्मणोंके वचनसे अर्थात् आशीर्वादसे भी मनुष्य स्वर्गलोक पा सकता है ॥ १४ ॥
पितृदैवतपूजाभिर्ब्राह्मणाभ्यर्चनेन च ।
अनन्तं पुण्यलोकं तु गन्तासि त्वं न संशयः ॥ १५ ॥
राजन्! तुम पितरों और देवताओंकी पूजासे तथा ब्राह्मणोंका आदर- सत्कार करनेसे अक्षय पुण्यलोकमें जाओगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १५ ॥
श्लेष्मादिभिर्व्याप्ततनुम्रियमाणो विचेतनः ।
ब्राह्मणा एव सम्पूज्याः पुण्यं स्वर्गमभीप्सता ॥ १६ ॥
जिसका शरीर कफ आदिसे भर गया हो, जो मर रहा हो और अचेत हो गया हो, उसे पुण्यमय स्वर्गलोककी प्राप्ति अभीष्ट हो तो ब्राह्मणोंकी पूजा भी करनी चाहिये ॥ १६ ॥
श्राद्धकाले तु यत्नेन भोक्तव्या ह्यजुगुप्सिताः ।
दुर्वर्णः कुनखी कुष्ठी मायावी कुण्डगोलकी ॥ १७ ॥
वर्जनीयाः प्रयत्नेन काण्डपृष्ठाश्च देहिनः ।
जुगुप्सितं हि यच्छ्राद्धं दहत्यग्निरिवेन्धनम् ॥ १८ ॥
श्राद्धकालमें प्रयत्न करके उत्तम ब्राह्मणोंको ही भोजन कराना चाहिये । जिनके शरीरका रंग घृणाजनक हो, नख काले पड़ गये हों, जो कोढ़ी और धूर्त हो, पिताकी जीवित- अवस्थामें ही माताके व्यभिचारसे जिनका जन्म हुआ हो अथवा जो विधवा माताके पेटसे पैदा हुए हों और जो पीठपर तरकस बाँधे क्षत्रियवृत्तिसे जीविका चलाते हों, ऐसे ब्राह्मणोंको श्राद्धमें प्रयत्नपूर्वक त्याग दे; क्योंकि उनको भोजन करानेसे श्राद्ध निन्दित हो जाता है और निन्दित श्राद्ध यजमानको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे अग्नि काष्ठको जला डालती है ॥ १७-१८ ॥ ये ये श्राद्धे न युज्यन्ते मूकान्धबधिरादयः ।
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तेऽपि सर्वे नियोक्तव्या मिश्रिता वेदपारगैः ॥ १ ९ ॥ किंतु अंधे, गूँगे, बहरे आदि जिन- जिन ब्राह्मणोंको श्राद्धमें वर्जित बताया गया है, उन सबको वेदपारंगत ब्राह्मणोंके साथ श्राद्धमें सम्मिलित किया जा सकता है ॥ १ ९ ॥
प्रतिग्रहश्च वै देयः शृणु यस्य युधिष्ठिर ।
प्रदातारं तथाऽऽत्मानं यस्तारयति शक्तिमान् ॥ २० ॥
युधिष्ठिर! अब मैं तुम्हें यह बताता हूँ कि कैसे व्यक्तिको दान देना चाहिये । जो दाताको और अपने - आपको भी तारनेकी शक्ति रखता हो ॥ २० ॥
तस्मिन् देयं द्विजे दानं सर्वागमविजानता ।
प्रदातारं यथाऽऽत्मानं तारयेद् यः स शक्तिमान् ॥ २१ ॥
सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता मानव उसी ब्राह्मणको दान दे, जो दाताका तथा अपना भी
संसारसागरसे उद्धार कर सके । वही शक्तिशाली ब्राह्मण है ॥ २१ ॥
न तथा हविषो होमैर्न पुष्पैर्नानुलेपनैः ।
अग्नयः पार्थ तुष्यन्ति यथा ह्यतिथिभोजने ॥ २२ ॥
कुन्तीनन्दन! अतिथियोंको भोजन करानेसे अग्निदेव जितने संतुष्ट होते हैं, उतना संतोष उन्हें हविष्यका हवन करने तथा पुष्प और चन्दन चढ़ानेसे भी नहीं होता ॥ २२ ॥
तस्मात् त्वं सर्वयत्नेन यतस्वातिथिभोजने ।
पादोदकं पादघृतं दीपमन्नं प्रतिश्रयम् ॥ २३ ॥
प्रयच्छन्ति तु ये राजन् नोपसर्पन्ति ते समम् । इसलिये तुम सभी उपायोंसे अतिथियोंको भोजन देनेका प्रयत्न करो । राजन्! जो लोग अतिथिको चरण धोनेके लिये जल, पैरमें मलनेके लिये तेल, उजालेके लिये दीपक, भोजनके लिये अन्न तथा रहनेके लिये स्थान देते हैं, वे कभी यमराजके यहाँ नहीं जाते ॥ २३ ॥
देवमाल्यापनयनं द्विजोच्छिष्टावमार्जनम् ॥ २४ ॥
आकल्पः परिचर्या च गात्रसंवाहनानि च ।
अत्रैकैकं नृपश्रेष्ठ गोदानाद्धयतिरिच्यते ॥ २५ ॥
नृपश्रेष्ठ! देवविग्रहोंपर चढ़े हुए चन्दन- पुष्प आदिको यथासमय उतारना, ब्राह्मणोंकी जूठन साफ करना, उन्हें चन्दन- माला आदिसे अलंकृत करना, उनकी सेवा--पूजा करना और उनके पैर आदि अंगोंको दबाना, इनमेंसे एक -एक कार्य गोदानसे भी अधिक महत्त्व रखता है ॥ २४-२५ ॥
कपिलायाः प्रदानात् तु मुच्यते नात्र संशयः ।
तस्मादलंकृतां दद्यात् कपिलां तु द्विजातये ॥ २६ ॥
कपिला गौका दान करनेसे मनुष्य निःसंदेह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । इसलिये कपिला गौको अलंकृत करके ब्राह्मणको दान करना चाहिये ॥ २६ ॥
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श्रोत्रियाय दरिद्राय गृहस्थायाग्निहोत्रिणे ।
पुत्रदाराभिभूताय तथा ह्यनुपकारिणे ॥ २७ ॥
दान लेनेवाला ब्राह्मण श्रोत्रिय हो, निर्धन हो, गृहस्थ हो, नित्य अग्निहोत्र करता हो, दरिद्रताके कारण जिसे स्त्री और पुत्रोंके तिरस्कार सहने पड़ते हों तथा दाताने न तो जिससे प्रत्युपकार प्राप्त किया हो और न आगे प्रत्युपकार प्राप्त होनेकी सम्भावना ही हो ॥ २७ ॥
एवंविधेषु दातव्या न समृद्धेषु भारत ।
को गुणो भरतश्रेष्ठ समृद्धेष्वभिवर्जितम् ॥ २८ ॥
भारत! ऐसे ही लोगोंको गोदान करना चाहिये, धनवानोंको नहीं । भरतश्रेष्ठ! धनवानोंको देनेसे क्या लाभ है? ॥ २८ ॥
एकस्यैका प्रदातव्या न बहूनां कदाचन ।
सा गौर्विक्रयमापन्ना हन्यात् त्रिपुरुषं कुलम् ॥ २ ९ ॥
न तारयति दातारं ब्राह्मणं नैव नैव तु । एक गौ एक ही ब्राह्मणको देनी चाहिये; बहुतोंको कभी नहीं ( क्योंकि एक ही गौ यदि बहुतोंको दी गयी, तो वे उसे बेचकर उसकी कीमत बाँट लेंगे ) । दान की हुई गौ यदि बेच दी गयी, तो वह दाताकी तीन पीढ़ियोंको हानि पहुँचाती है । वह न तो दाताको ही पार उतारती है न ब्राह्मणको ही ॥ २ ९ ॥ सुवर्णस्य विशुद्धस्य सुवर्णं यः प्रयच्छति ॥ ३० ॥
सुवर्णानां शतं तेन दत्तं भवति शाश्वतम् । जो उत्तम वर्णवाले विशुद्ध ब्राह्मणको सुवर्ण- दान करता है उसे निरन्तर सौ स्वर्णमुद्राओंके दानका फल प्राप्त होता है ॥ ३० ॥
अनड्वाहं तु यो दद्याद् बलवन्तं धुरंधरम् ॥ ३१ ॥
स निस्तरति दुर्गाणि स्वर्गलोकं च गच्छति । जो लोग कंधेपर जुआ उठानेमें समर्थ बलवान् बैल ब्राह्मणोंको दान करते हैं, वे दुःख और संकटोंसे पार होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ३१ ॥
वसुन्धरां तु यो दद्याद् द्विजाय विदुरात्मने ॥ ३२ ॥
दातारं ह्यनुगच्छन्ति सर्वे कामाभिवाञ्छिताः । जो विद्वान् ब्राह्मणको भूमिदान करता है, उस दाताके पास सभी मनोवाञ्छित भोग स्वतः आ जाते हैं ॥ ३२ ॥
पृच्छन्ति चात्र दातारं वदन्ति पुरुषा भुवि ॥ ३३ ॥
अध्वनि क्षीणगात्राश्च पांसुपादावगुण्ठिताः ।
तेषामेव श्रमार्तानां यो ह्यन्नं कथयेद् बुधः ॥ ३४ ॥
अन्नदातृसमः सोऽपि कीर्त्यते नात्र संशयः ।
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यदि कोई रास्तेके थके - माँदे, दुबले - पतले पथिक धूलभरे पैरोंसे भूखे -प्यासे आ जायँ और पूछें कि क्या यहाँ कोई भोजन देनेवाला है? उस समय उन्हें जो विद्वान् अन्न मिलनेका पता बता देता है, वह भी अन्नदाताके समान ही कहा जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ३३-३४ ॥ तस्मात् त्वं सर्वदानानि हित्वान्नं सम्प्रयच्छ ह ॥ ३५ ॥
न हीदृशं पुण्यफलं विचित्रमिह विद्यते । अतः युधिष्ठिर! तुम सारे दानोंको छोड़कर केवल अन्नदान करते रहो । इस संसारमें अन्नदानके समान विचित्र एवं पुण्यदायक दूसरा कोई दान नहीं है ॥ ३५३ ॥
यथाशक्ति च यो दद्यादन्नं विप्रेषु संस्कृतम् ॥ ३६ ॥
स तेन कर्मणाऽऽप्नोति प्रजापतिसलोकताम् । जो अपनी शक्तिके अनुसार अच्छे ढंगसे तैयार किया हुआ भोजन ब्राह्मणोंको अर्पित करता है वह उस पुण्यकर्मके प्रभावसे प्रजापतिके लोकमें जाता है ॥ ३६ ॥
अन्नमेव विशिष्टं हि तस्मात् परतरं न च ॥ ३७ ॥
अन्नं प्रजापतिश्चोक्तः स च संवत्सरो मतः ।
संवत्सरस्तु यज्ञोऽसौ सर्वं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ ३८ ॥
अतः अन्न ही सबसे महत्त्वकी वस्तु है । उससे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है । वेदोंमें अन्नको प्रजापति कहा गया है । प्रजापति संवत्सर माना गया है । संवत्सर यज्ञरूप है और यज्ञमें सबकी स्थिति है ॥ ३७-३८ ॥
तस्मात् सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
तस्मादन्नं विशिष्टं हि सर्वेभ्य इति विश्रुतम् ॥ ३ ९ ॥
यज्ञसे समस्त चराचर प्राणी उत्पन्न होते हैं । अतः अन्न ही सब पदार्थोंसे श्रेष्ठ है । यह बात सर्वत्र प्रसिद्ध है ॥ ३ ९ ॥ येषां तटाकानि महोदकानि वाप्यश्च कूपाश्च प्रतिश्रयाश्च । अन्नस्य दानं मधुरा च वाणी यमस्य ते निर्वचना भवन्ति ॥ ४० ॥
जो लोग अगाध जलसे भरे हुए तालाब और पोखरे खुदवाते हैं, बावली, कुएँ तथा धर्मशालाएँ तैयार कराते हैं, अन्नका दान करते और मीठी बातें बोलते हैं, उन्हें यमराजकी बात भी नहीं सुननी पड़ती है अर्थात् यमराज उसे वचनमात्रसे भी दण्ड नहीं दे सकते ॥ ४० ॥
धान्यं श्रमेणार्जितवित्तसंचितं विप्रे सुशीले च प्रयच्छते यः । वसुन्धरा तस्य भवेत् सुतुष्टा