श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1361–1370

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1361–1370

पृष्ठ 1361

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जो राजा अपनी शरणमें आये हुए भयभीत प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसकी पैदा हुई संतान छोटी अवस्थामें ही मर जाती है । उसके पितरोंको कभी पितृलोकमें रहनेके लिये स्थान नहीं मिलता और देवता उसका दिया हुआ हविष्य नहीं ग्रहण करते ॥ १३ ॥

मोघमन्नं विन्दति चाप्रचेताः स्वर्गाल्लोकाद् भ्रश्यति शीघ्रमेव । भीतं प्रपन्नं यो हि ददाति शत्रवे सेन्द्रा देवाः प्रहरन्त्यस्य वज्रम् ॥ १४ ॥

जो राजा शरणमें आये हुए भयभीत प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसका खाना- पीना निष्फल है । वह अनुदार हृदयका मनुष्य शीघ्र ही स्वर्गलोकसे भ्रष्ट हो जाता है और इन्द्र आदि देवता उसके ऊपर वज्रका प्रहार करते हैं ॥ १४ ॥

उक्षाणं पक्त्वा सह ओदनेन अस्मात् कपोतात् प्रति ते नयन्तु । यस्मिन् देशे रमसेऽतीव श्येन तत्र मांसं शिबयस्ते वहन्तु ॥ १५ ॥

‘ अतः बाज! इस कबूतरके बदले मेरे सेवक ले जायँ तुम्हारी पुष्टिके लिये भातके साथ ऋषभकन्द पकाकर दूँगा । तुम जिस स्थानपर प्रसन्नतापूर्वक रह सको, वहीं चलकर रहो । ये शिबिवंशी क्षत्रिय वहीं तुम्हारे लिये भात और ऋषभकन्दका गूदा पहुँचा दें ॥ १५ ॥

श्येनउवाच

नोक्षाणं राजन् प्रार्थयेयं न चान्य- दस्मान्मांसमधिकं वा कपोतात् ।

देवैर्दत्तः सोऽद्य ममैष भक्ष- स्तन्मे ददस्व शकुनानामभावात् ॥ १६ ॥

बाज बोला— राजन्! मैं आपसे ऋषभकन्द नहीं माँगता और न मुझे इस कबूतरसे अधिक कोई दूसरा मांस ही चाहिये । आज दूसरे पक्षियोंके अभाव में यह कबूतर ही मेरे लिये देवताओंका दिया हुआ भोजन है । अतः यही मेरा आहार होगा । इसे ही मुझे दे दीजिये ॥ १६ ॥

राजोवाच उक्षाणं वेहतमनूनं नयन्तु ते पश्यन्तु पुरुषा ममैव । भयाहितस्य दायं ममान्तिकात् त्वां प्रत्याम्नायं तु त्वं ह्येनं मा हिंसीः ॥ १७ ॥

पृष्ठ 1362

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राजाने कहा — बाज! उक्षा (ऋषभकन्द ) अथवा वेहत नामक ओषधियाँ बड़ी पुष्टिकारक होती हैं । मेरे सेवक जाकर उनकी खोज करें और पर्याप्त मात्रामें भातके साथ उन्हें पकाकर तुम्हारे पास पहुँचा दें । भयभीत कपोतके बदलेमें मेरे पाससे मिलनेवाला यह उचित मूल्य होगा । इसे ले लो, किंतु इस कबूतरको न मारो ॥ १७ ॥

त्यजे प्राणान् नैव दद्यां कपोतं सौम्यो ह्ययं किं न जानासि श्येन । यथा क्लेशं मा कुरुष्वेह सौम्य नाहं कपोतमर्पयिष्ये कथंचित् ॥ १८ ॥

मैं अपने प्राण दे दूँगा, किंतु इस कबूतरको नहीं दूँगा । बाज! क्या तुम नहीं जानते, यह कितना सुन्दर स्वयं कैसा भोला - भाला है? सौम्य! अब तुम यहाँ व्यर्थ कष्ट न उठाओ । मैं इस कबूतरको किसी तरह तुम्हारे हाथमें नहीं दूँगा ॥ १८ ॥

यथा मां वै साधुवादैः प्रसन्नाः प्रशंसेयुः शिबयः कर्मणा तु 1 यथा श्येन प्रियमेव कुर्यां प्रशाधि मां यद् वदेस्तत् करोमि ॥ १ ९ ॥ बाज! जिस कर्मसे शिबिदेशके लोग प्रसन्न होकर मुझे साधुवाद देते हुए मेरी भूरि- भूरि प्रशंसा करें और जिससे मेरेद्वारा तुम्हारा भी प्रिय कार्य बन सके, वह बताओ । उसीके लिये

मुझे आज्ञा दो । मैं वही करूँगा ॥ १ ९ ॥

श्येन उवाच ऊरोर्दक्षिणादुत्कृत्य स्वपिशितं तावद् राजन् यावन्मांसं कपोतेन समम् । तथा तस्मात् साधु त्रातः कपोतः प्रशंसेयुश्च शिबयः कृतं च प्रियं स्यान्ममेति ॥ २० ॥

बाज बोला— राजन्! अपनी दायीं जाँघसे उतना ही मांस काटकर दो, जितना इस कबूतरके बराबर हो सके । ऐसा करनेसे कबूतरकी भलीभाँति रक्षा हो सकती है । इसीसे शिबिदेशकी प्रजा आपकी भूरि- भूरि प्रशंसा करेगी और मेरा भी प्रिय कार्य सम्पन्न हो जायगा ॥ २० ॥

अथ स दक्षिणादूरोरुत्कृत्य स्वमांसपेशीं तुलयाऽऽधारयत् । गुरुतर एव कपोत आसीत् ॥ २१ ॥

तब राजाने अपनी दायीं जाँघसे मांस काटकर उसे तराजूके एक पलड़ेपर रखा, किंतु कबूतरके साथ तौलनेपर वही अधिक भारी निकला ॥ २१ ॥

पुनरन्यमुञ्चकर्त गुरुतर एव कपोतः । एवं सर्वं समधिकृत्य शरीरं

तुलायामारोपयामास । तत् तथापि गुरुतर एव कपोत आसीत् ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1363

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राजाने फिर दूसरी बार अपने शरीरका मांस काटकर रखा, तो भी कबूतरका ही पलड़ा भारी रहा । इस प्रकार क्रमशः उन्होंने अपने सभी अंगोंका मांस काट- काटकर तराजूपर चढ़ाया तो भी कबूतर ही भारी रहा ॥ २२ ॥

अथ राजा स्वयमेव तुलामारुरोह । न च व्यलीकमासीद् राज्ञ एतद् वृत्तान्तं दृष्ट्वा त्रात इत्युक्त्वा प्रालीयत श्येनोऽथ राजा अब्रवीत् ॥ २३ ॥

तब राजा स्वयं ही तराजूपर चढ़ गये । ऐसा करते समय उनके मनमें क्लेश नहीं हुआ । यह घटना देखकर बाज बोल उठा- ' हो गयी कबूतरकी प्राणरक्षा । ' ऐसा कहकर वह वहीं

अन्तर्धान हो गया । अब राजा शिबि कबूतरसे बोले— ॥ २३ ॥

कपोतं विद्युः शिबयस्त्वां कपोत

पृच्छामि ते शकुने को नु श्येनः ।

नानीश्वर ईदृशं जातु कुर्या- देतं प्रश्नं भगवन् मे विचक्ष्व ॥ २४ ॥

‘ कपोत! ये शिबिलोग तो तुम्हें कबूतर ही समझते थे । पक्षिप्रवर! मैं तुमसे पूछता हूँ, बताओ, यह बाज कौन था? ईश्वरके सिवा दूसरा कोई कभी ऐसा चमत्कारपूर्ण कार्य नहीं कर सकता । भगवन्! मेरे इस प्रश्नका यथावत् उत्तर दो ' ॥ २४ ॥

कपोत उवाच वैश्वानरोऽहं ज्वलनो धूमकेतु- रथैव श्येनो वज्रहस्तः शचीपतिः । साधु ज्ञातुं त्वामृषभं सौरथेय नौ जिज्ञासया त्वत्सकाशं प्रपन्नौ ॥ २५ ॥

कबूतर बोला— राजन्! मैं धूममयी ध्वजासे विभूषित वैश्वानर अग्नि हूँ और उस बाजके रूपमें साक्षात् वज्रधारी शचीपति इन्द्र थे । सुरथानन्दन! तुम एक श्रेष्ठ पुरुष हो । हम दोनों तुम्हारी श्रेष्ठताकी परीक्षाके लिये यहाँ आये थे ॥ २५ ॥

यामेतां पेशीं मम निष्क्रयाय प्रादाद् भवानसिनोत्कृत्य राजन् । एतद् वो लक्ष्म शिवं करोमि हिरण्यवर्णं रुचिरं पुण्यगन्धम् ॥ २६ ॥

राजन्! तुमने मेरी रक्षाके लिये जो तलवारसे काटकर अपना यह मांस दिया है, इसके घावको मैं अभी अच्छा कर देता हूँ । यहाँकी चमड़ीका रंग सुन्दर और सुनहला हो जायगा तथा इससे बड़ी पवित्र सुगन्ध फैलती रहेगी, यह तुम्हारा राजचिह्न होगा ॥ २६ ॥

एतासां प्रजानां पालयिता यशस्वी सुरर्षीणामथ सम्मतो भृशम् ।

पृष्ठ 1364

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एतस्मात् पार्श्वात् पुरुषो जनिष्यति कपोतरोमेति च तस्य नाम ॥ २७ ॥

तुम्हारे इस दक्षिण पार्श्वसे एक पुत्र उत्पन्न होगा, जो इन प्रजाओंका पालक और यशस्वी होनेके साथ ही देवर्षियोंके अत्यन्त आदरका पात्र होगा। उसका नाम होगा, ‘ कपोतरोमा' ॥ २७ ॥

कपोतरोमाणं शिबिनौद्भिदं पुत्रं प्राप्स्यसि नृप वृषसंहननं यशोदीप्यमानं द्रष्टासि शूरमृषभं सौरथानाम् ॥ २८ ॥

राजन्! तुम्हारे द्वारा उत्पन्न किया हुआ वह पुत्र, जिसे तुम भविष्यमें प्राप्त करोगे, तुम्हारी जाँघका भेदन करके प्रकट होगा; इसीलिये औद्भिद कहलायेगा । उसके शरीरके रोएँ कबूतरके समान होंगे । उसका शरीर साँड़के समान हृष्ट- पुष्ट होगा । तुम देखोगे कि वह

सुयशसे प्रकाशित हो रहा है । सुरथाके वंशजोंमें वह सर्वश्रेष्ठ शूरवीर होगा ॥

(इतना कहकर अग्निदेव अन्तर्धान हो गये । ) इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि शिबिचरिते सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें शिबिचरित्रविषयक एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९७ ॥ * राजाका यह कठोर नियम था कि वे सोना - चाँदीके सिवा और कुछ ब्राह्मणको नहीं देते थे, जो उनसे ये ही वस्तुएँ माँगता, उसे प्रसन्नतापूर्वक देते थे । जो दूसरी कोई चीज माँगता, उसे यह समझकर कि यह मेरा नियम भंग करना चाहता है, दण्ड देते थे । ब्राह्मण देवता दूसरेके भेजनेसे आये थे, इसलिये राजाने एक हजार अश्वोंके मूल्यसे अधिक सोना- चाँदी उन्हें दिया ।

पृष्ठ 1365

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अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः देवर्षि नारदद्वारा शिबिकी महत्ताका प्रतिपादन वैशम्पायन उवाच भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत् पाण्डवो मार्कण्डेयम् । अथाचष्ट मार्कण्डेयः । अष्टकस्य वैश्वामित्रेरश्वमेधे सर्वे राजानः प्रागच्छन् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे पुनः प्रार्थना की — ' मुने! क्षत्रिय नरेशोंके माहात्म्यका पुनः वर्णन कीजिये । ' तब मार्कण्डेयजीने कहा — ‘ धर्मराज! विश्वामित्रके पुत्र अष्टकके अश्वमेधयज्ञमें सब राजा पधारे थे ॥ १ ॥

प्रतर्दनो वसुमनाः शिबिरौशीनर इति । स च समाप्तयज्ञो भ्रातृभिः सह भ्रातरश्चास्यरथेन प्रायात् च नारदमागच्छन्तमभिवाद्यारोहतु भवान्रथमित्यब्रुवन् ॥ २ ॥

‘ अष्टकके तीन भाई प्रतर्दन, वसुमना तथा उशीनर- पुत्र शिबि भी उस यज्ञमें आये थे । यज्ञ समाप्त होनेपर एक दिन अष्टक अपने भाइयोंके साथ रथपर आरूढ़ हो ( स्वर्गकी ओर) जा रहे थे । इसी समय रास्तेमें देवर्षि नारदजी आते दिखायी दिये । तब उन तीनोंने उन्हें प्रणाम करके कहा — ‘ भगवन् आप भी रथपर आ जाइये ' ॥ २ ॥

तांस्तथेत्युक्त्वा रथमारुरोह । अथ तेषामेकः सुरर्षि नारदमब्रवीत् । प्रसाद्य भगवन्तं किञ्चिदिच्छेयं प्रष्टुमिति ॥ ३ ॥

‘ तब नारदजी ' तथास्तु' कहकर उस रथपर बैठ गये । तदनन्तर उनमेंसे एकने देवर्षि नारदसे कहा— ‘ भगवन्! मैं आपको प्रसन्न करके कुछ पूछना चाहता हूँ' ॥ ३ ॥

पृच्छेत्यब्रवीदृषिः । सोऽब्रवीदायुष्मन्तः सर्वगुणप्रमुदिताः । अथायुष्मन्तं स्वर्गस्थानं चतुर्भि -र्यातव्यं स्यात् कोऽवतरेत् । अयमष्टकोऽवतरे - दित्यब्रवीदृषिः ॥ ४ || ‘ देवर्षिने कहा — ‘ पूछो’ तब उसने इस प्रकार कहा— ' भगवन्! हम सब लोग दीर्घायु तथा सर्वगुणसम्पन्न होनेके कारण सदा प्रसन्न रहते हैं । हम चारोंको दीर्घकालतक उपभोगमें आनेवाले स्वर्ग- लोकमें जाना है, किंतु वहाँसे सर्वप्रथम कौन इस भूतलपर उतर आयेगा? ’ देवर्षिने कहा — ' सबसे पहले अष्टक उतरेगा' ॥ ४ ॥

किं कारणमित्यपृच्छत् । अथाचष्टाष्टकस्य गृहे मया उषितं स मां रथेनानुप्रावहदथापश्यमनेकानि गोसहस्राणि वर्णशो विविक्तानि तमहमपृच्छं

कस्येमा गाव इति सोऽब्रवीत् । मया निसृष्टा इत्येतास्तेनैव स्वयं श्लाघति कथितेन ।

एषोऽवतरेदथ त्रिभिर्यातव्यं साम्प्रतं कोऽवतरेत् ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1366

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‘ फिर उसने पूछा — ' क्या कारण है कि अष्टक ही उतरेगा? ' तब नारदजीने कहा – एक दिन मैं अष्टकके घर ही ठहरा था । उस दिन अष्टक मुझे रथपर बिठाकर भ्रमणके लिये ले जा रहे थे । मैंने रास्तेमें देखा, भिन्न-भिन्न रंगकी कई हजार गौएँ पृथक् - पृथक् चर रही हैं । उन्हें देखकर मैंने अष्टकसे पूछा— ' ये किसकी गौएँ हैं । ' इन्होंने उत्तर दिया- ' ये मेरी दान की हुई गौएँ हैं। ' इस प्रकार ये स्वयं अपने किये हुए दानका बखान करके आत्मश्लाघा करते हैं । इसीलिये इन्हें स्वर्गसे पहले उतरना पड़ेगा । ' तत्पश्चात् उन लोगोंने पुनः प्रश्न किया -'यदि हम शेष तीनों भाई स्वर्गमें जायँ, तो सबसे पहले किसको उतरना पड़ेगा? ' ॥ ५ ॥

प्रतर्दन इत्यब्रवीदृषिः । तत्र किं कारणं प्रतर्दनस्यापि गृहे मयोषितं स मां रथेनानुप्रावहत् ॥ ६ ॥

अथैनं ब्राह्मणोऽभिक्षेताश्वं मे ददातु भवान् निवृत्तो दास्यामीत्यब्रवीद् ब्राह्मणं त्वरितमेव दीयता- मित्यब्रवीद् ब्राह्मणस्त्वरितमेव स ब्राह्मणस्यैवमुक्त्वा दक्षिणं पार्श्वमददत् ॥ ७ ॥

‘ देवर्षिने उत्तर दिया — ‘ प्रतर्दनको । ' ‘ इसमें क्या कारण है?' ऐसा प्रश्न होनेपर देवर्षिने उत्तर दिया — ' एक दिन मैं प्रतर्दनके घर भी ठहरा था । ये मुझे रथसे ले जा रहे थे । उस समय एक ब्राह्मणने आकर इनसे याचना की-' आप मुझे एक अश्व दे दीजिये । ' तब उन्होंने ब्राह्मणको उत्तर दिया –' लौटनेपर दे दूँगा। ' ब्राह्मणने कहा —' नहीं, तुरंत दे दीजिये । ' ' अच्छा तो तुरंत ही लीजिये ' यों कहकर इन्होंने रथके दाहिने पार्श्वका घोड़ा खोलकर उसे दे दिया ' ॥ ६-७ ॥ अथान्योऽप्यश्वार्थी ब्राह्मण आगच्छत् । तथैव चैनमुक्त्वा वामपार्ष्णिमभ्यदादथ प्रायात् पुनरपि चान्योऽप्यश्वार्थी ब्राह्मण आगच्छत् त्वरितोऽथ तस्मै अपनह्य वामं धुर्यमददत् ॥ ८ ॥

' इतनेहीमें एक -दूसरा ब्राह्मण आया । उसे भी घोड़ेकी ही आवश्यकता थी । जब उसने याचना की, तब राजाने पूर्ववत् उससे भी यही कहा – ' लौटनेपर दूँगा । ' परंतु उसके आग्रह करनेपर उन्होंने रथके वाम पार्श्वका एक घोड़ा दिया । फिर वे आगे बढ़ गये । तदनन्तर एक घोड़ा माँगनेवाला दूसरा ब्राह्मण आया । उसने भी जल्दी ही माँगा । तब राजाने उसे बायें धुरेका बोझ ढोनेवाला अश्व खोल करके दे दिया ॥ ८ ॥

अथ प्रायात् पुनरन्य आगच्छदश्वार्थी ब्राह्मणस्तमब्रवीदतियातो दास्यामि त्वरितमेव मे दीयतामित्यब्रवीद् ब्राह्मणस्तस्मै दत्त्वाश्वं रथधुरं गृह्णता व्याहृतं ब्राह्मणानां साम्प्रतं नास्ति किंचिदिति ॥ ९ ॥

‘ तत्पश्चात् जब वे आगे बढ़े, तब फिर एक अश्वका इच्छुक ब्राह्मण आ पहुँचा । उसके माँगनेपर राजाने कहा- ' मैं शीघ्र ही अपने लक्ष्यतक पहुँचकर घोड़ा दे दूँगा। ' ब्राह्मण बोला - ' मुझे तुरंत दीजिये । ' तब उन्होंने ब्राह्मणको अश्व देकर स्वयं रथका धुरा पकड़ लिया और कहा — ‘ ब्राह्मणोंके लिये ऐसा करना सर्वथा उचित नहीं है ' ॥ ९ ॥

पृष्ठ 1367

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य एष ददाति चासूयति च तेन व्याहृतेन तथावतरेत् । अथ द्वाभ्यां यातव्यमिति कोऽवतरेत् ॥ १० ॥

‘ ये प्रतर्दन दान देते हैं और ब्राह्मणकी निन्दा भी करते हैं, अतः वह निन्दायुक्त वचन बोलनेके कारण पहले इन्हींको स्वर्गसे उतरना पड़ेगा । तब पुनः प्रश्न किया गया, ' हम शेष दो भाई जा रहे हैं, उनमें से कौन पहले स्वर्गसे नीचे उतरेगा? ' ॥ १० ॥

वसुमना अवतरेदित्यब्रवीदृषिः ॥ ११ ॥

‘ देवर्षिने उत्तर दिया— ' वसुमना पहले उतरेंगे ' ॥

किं कारणमित्यपृच्छदथाचष्ट नारदः । अहं परिभ्रमन् वसुमनसो गृहमुपस्थितः ॥

१२ ॥

‘ तब उन्होंने पूछा — ‘ इसका क्या कारण है? ' नारदजी बोले – 'एक दिन मैं घूमता-घामता वसुमनाके घरपर जा पहुँचा ॥ १२ ॥

स्वस्तिवचनमासीत् पुष्परथस्य प्रयोजनेन तमहमन्वगच्छं स्वस्तिवाचितेषु ब्राह्मणेषु रथो ब्राह्मणानां दर्शितः ॥ १३ ॥

‘ उस दिन उनके यहाँ स्वस्तिवाचन हो रहा था । राजाके यहाँ एक ऐसा रथ था, जो पर्वत, आकाश और समुद्र आदि दुर्गम स्थानोंपर भी सुगमतासे आ - जा सकता था । उसका नाम था ' पुष्परथ' । मैं उसीके प्रयोजनसे राजाके यहाँ गया था । जब ब्राह्मणलोग स्वस्तिवाचन कर चुके, तब राजाने ब्राह्मणोंको अपना वह रथ दिखाया ॥ १३ ॥

तमहं रथं प्राशंसमथ राजाब्रवीद् भगवता रथः प्रशस्तः । एष भगवतो रथ इति ॥ १४ ॥

‘ उस समय मैंने उस रथकी बड़ी प्रशंसा की । ' राजा बोले— ' भगवन्! आपने इस रथकी

प्रशंसा की है । अतः यह रथ आपहीका है ' ॥ १४ ॥

अथ कदाचित् पुनरप्यहमुपस्थितः पुनरेव च रथप्रयोजनमासीत् । सम्यगयमेष भगवत इत्येवं राजाब्रवीदिति पुनरेव तृतीयं स्वस्तिवाचनं समभावयमथ राजा ब्राह्मणानां दर्शयन् मामभिप्रेक्ष्याब्रवीत् । अथो भगवता पुष्परथस्य स्वस्तिवाचनानि सुष्ठु सम्भावितानि एतेन द्रोहवचने नावतरेत् ॥ १५ ॥

‘ तदनन्तर एक दिन और मैं राजाके यहाँ उपस्थित हुआ । पुनः मेरे जानेका उद्देश्य पुष्परथको प्राप्त करना ही था। उस दिन भी राजाने बड़ी आवभगतके साथ कहा —‘भगवन्! यह रथ आपका ही है । ' फिर तीसरी बार मैंने उनके यहाँ जाकर स्वस्तिवाचनका कार्य सम्पन्न किया । राजाने ब्राह्मणोंको उस रथका दर्शन कराते हुए मेरी ओर देखकर कहा — ‘ भगवन्! आपने पुष्परथके लिये अच्छे स्वस्तिवाचन किये । ' ( ऐसा कहकर भी उन्होंने रथ नहीं दिया । ) इस (छलयुक्त ) वचनसे वसुमना ही पहले स्वर्गसे पृथ्वीपर उतरेंगे' ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1368

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अथैकेन यातव्यं स्यात् कोऽवतरेत् पुनर्नारद आह शिबिर्यायादहमवतरेयमत्र किं कारणमित्यब्रवीत् असावहं शिबिना समो नास्मि यतो ब्राह्मणःकश्चिदेनमब्रवीत् ॥ १६ ॥

शिबे अन्नार्थ्यस्मीति तमब्रवीच्छिबिः किं क्रियतामाज्ञापयतु भवानिति ॥ १७ ॥

‘ यदि आपके साथ हममेंसे एकमात्र शिबिको ही स्वर्गलोकमें जाना हो तो वहाँसे पहले कौन उतरेगा? ' ऐसा प्रश्न होनेपर नारदजीने फिर कहा - ' शिबि जायँगे और मैं उतरूंगा । ‘ इसमें क्या कारण है? ' यह पूछे जानेपर देवर्षि नारदने कहा- ' मैं राजा शिबिके समान नहीं हूँ, क्योंकि एक दिन एक ब्राह्मणने शिबिसे कहा - ' शिबे! मैं भोजन करना चाहता हूँ । ' राजाने पूछा — ‘ आपके लिये क्या रसोई बनायी जाय, आज्ञा कीजिये ' ॥ १६-१७ ॥ अथैनं ब्राह्मणोऽब्रवीद् य एष ते पुत्रो बृहद्गर्भो नाम एष प्रमातव्य इति तमेनं संस्कुरु अन्नं चोपपादय ततोऽहं प्रतीक्ष्य इति । ततः पुत्रं प्रमाथ्य संस्कृत्य विधिना साधयित्वा पात्र्यामर्पयित्वा शिरसा प्रतिगृह्य ब्राह्मणममृगयत् ॥ १८ ॥

‘ तब इनसे ब्राह्मणने कहा – ' यह जो तुम्हारा पुत्र बृहद्गर्भ है, इसे मार डालो । ' फिर उसका दाह - संस्कार करो । तत्पश्चात् अन्न तैयार करो और मेरी प्रतीक्षा करो। ' तब राजाने पुत्रको मारकर उसका दाह - संस्कार कर दिया और फिर विधिपूर्वक अन्न तैयार करके उसे बटलोईमें डालकर (और ढक्कनसे ढककर) अपने सिरपर रख लिया, फिर वे उस ब्राह्मणकी खोज करने लगे ॥ १८ ॥

अथास्य मृगयमाणस्य कश्चिदाचष्ट एष ते ब्राह्मणो नगरं प्रविश्य दहति ते गृहं कोशागारमायुधागारं स्त्र्यगारमश्वशालां हस्तिशालां च क्रुद्ध इति ॥ १ ९ ॥ ' खोज करते समय किसी मनुष्यने उनके पास आकर कहा- राजन्! आपका ब्राह्मण इधर है । यह नगरमें प्रवेश करके आपके भवन, कोषागार, शस्त्रागार, अन्तःपुर, अश्वशाला और गजशाला सबमें कुपित होकर आग लगा रहा है ' ॥ १ ९ ॥ अथ शिबिस्तथैवाविकृतमुखवर्णो नगरं प्रविश्य ब्राह्मणं तमब्रवीत् सिद्धं भगवन्नन्नमिति ब्राह्मणो न किंचिद् व्याजहार विस्मयादधोमुखश्चासीत् ॥ २० ॥

‘ यह सब सुनकर भी राजा शिबिके मुखकी कान्ति पूर्ववत् बनी रही । उसमें तनिक भी विकार न आया । वे नगरमें घुसकर ब्राह्मणसे बोले – ' भगवन्! आपका भोजन तैयार है । '

ब्राह्मण कुछ न बोला । वह आश्चर्यसे मुँह नीचा किये देखता रहा ॥ २० ॥

ततः प्रासादयद् ब्राह्मणं भगवन् भुज्यतामिति । मुहूर्तादुद्वीक्ष्य शिबिमब्रवीत् ॥

२१ ॥

‘ तब राजाने ब्राह्मणको मनाते हुए कहा-' भगवन्! भोजन कर लीजिये । ' ब्राह्मणने दो घड़ीतक ऊपरकी ओर देखनेके पश्चात् शिबिसे कहा— ॥ २१ ॥

त्वमेवैतदशानेति तत्राह तथेति शिबिस्तथैवाविमना महित्वा कपालमभ्युद्धार्य भोक्तुमैच्छत् ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1369

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' तुम्हीं यह सब खा जाओ । ' शिबिने उसी प्रकार मनको प्रसन्न रखते हुए ' बहुत अच्छा ' कहकर ब्राह्मणकी आज्ञा स्वीकार की और उनका पूजन करके ( सिरपर रखे हुए ) ढक्कनको उघाड़कर वह सब खानेकी इच्छा की ॥ २२ ॥

अथास्य ब्राह्मणो हस्तमगृह्णात् । अब्रवीच्चैनं जितक्रोधोऽसि न ते किञ्चिदपरित्याज्यं ब्राह्मणार्थे ब्राह्मणोऽपि तं महाभागं सभाजयत् ॥ २३ ॥

‘ तब ब्राह्मणने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा - ' राजन्! तुमने क्रोधको जीत लिया है । तुम्हारे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे तुम ब्राह्मणके लिये न दे सको । ' ऐसा कहकर ब्राह्मणने भी उन महाभाग नरेशका समादर किया ॥ २३ ॥

सह्युद्वीक्षमाणः पुत्रमपश्यदग्रे तिष्ठन्तं देवकुमारमिव पुण्यगन्धान्वितमलङ्कृतं सर्वं च तमर्थं विधाय ब्राह्मणोऽन्तरधीयत ॥ २४ ॥

‘ राजाने जब आँख उठाकर देखा, तब उनका पुत्र आगे खड़ा था । वह देवकुमारकी

भाँति दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित था । उसके शरीरसे पवित्र सुगन्ध निकल रही थी ।

ब्राह्मण- देवता सब वस्तुओंको पूर्ववत् ठीक करके अन्तर्धान हो गये ॥ २४ ॥

तस्य राजर्षेर्विधाता तेनैव वेषेण परीक्षार्थमागत इति तस्मिन्नन्तर्हिते अमात्या राजानमूचुः । किं प्रेप्सुना भवता इदमेवं जानता कृतमिति ॥ २५ ॥

साक्षात् विधाता ब्राह्मणके वेशमें राजर्षि शिबिकी परीक्षा लेने आये थे । उनके अन्तर्धान हो जानेपर राजाके मन्त्रियोंने उनसे पूछा — ' महाराज! आप क्या चाहते हैं? जिसके लिये सब कुछ जानते हुए भी ऐसा दुःसाहसपूर्ण कार्य किया है? ' ॥ २५ ॥

शिबिरुवाच नैवाहमेतद् यशसे ददानि न चार्थहेतोर्न च भोगतृष्णया । पापैरनासेवित एष मार्ग इत्येवमेतत् सकलं करोमि ॥ २६ ॥

शिबि बोले- मैं यशके लिये यह दान नहीं देता । धनके लिये अथवा भोगकी लिप्सासे भी दान नहीं करता । यह धर्मात्माओंका मार्ग है । पापी मनुष्य इसपर नहीं चल सकते । ऐसा समझकर ही मैं यह सब कुछ करता रहता हूँ ॥ २६ ॥

सद्भिः सदाध्यासितं तु प्रशस्तं तस्मात् प्रशस्तं श्रयते मतिर्मे । एतन्महाभाग्यवरं शिबेस्तु तस्मादहं वेद यथावदेतत् ॥ २७ ॥

श्रेष्ठ पुरुष सदा जिस मार्गसे चले हैं, वही उत्तम मार्ग है । इसीलिये मेरी बुद्धि सदा उस उत्तम पथका ही आश्रय लेती है । यह है राजा शिबिकी सर्वश्रेष्ठ महिमा, जिसे मैं ( अच्छी

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तरह ) जानता हूँ । इसीलिये इन सब बातोंका यथावत् वर्णन किया है ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि राजन्यमहाभाग्ये शिबिचरिते अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें क्षत्रियमाहात्म्यके प्रकरणमें शिबिचरित्रविषयक एक सौ अट्ठानबेवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९८ ॥