सावित्र्युपाख्यान : पति की मृत्यु के बाद एक पत्नी अपने पति को पुनर्जीवित कैसे कर सकती है?
सङ्कल्प और तप की शक्ति
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
वनपर्व → पतिव्रतामाहात्म्यपर्व · अध्याय 293–299 · पृष्ठ 1962–2019
मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर से कहा
द्रौपदी के प्रति युधिष्ठिर के शोक को शान्त करने हेतु
युधिष्ठिर बोले— "महामुने! इस द्रुपदकुमारी के लिये मुझे जैसा शोक होता है, वैसा न तो अपने लिये, न इन भाइयों के लिये, न राज्य छिन जाने के लिये ही होता है। दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रों ने जूए के समय हमलोगों को भारी सङ्कट में डाल दिया था, परन्तु इस द्रौपदी ने हमें बचा लिया। फिर जयद्रथ ने इस वन से इसका बलपूर्वक अपहरण किया। क्या आपने किसी ऐसी परम सौभाग्यवती पतिव्रता नारी को पहले कभी देखा अथवा सुना है, जैसी यह द्रौपदी है?"
मार्कण्डेयजी बोले— "राजा युधिष्ठिर! राजकन्या सावित्री ने कुलकामिनियों के लिये परम सौभाग्यरूप यह पातिव्रत्य आदि सब सद्गुणसमूह जिस प्रकार प्राप्त किया था, वह बताता हूँ, सुनो। प्राचीन काल की बात है, मद्र देश में एक परम धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। वे ब्राह्मण-भक्त, विशाल हृदय, सत्य-प्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय थे। वे यज्ञ करने वाले, दानाध्यक्ष, कार्यकुशल, नगर और जनपद के लोगों के परम प्रिय तथा सम्पूर्ण भूतों के हित में तत्पर रहने वाले भूपाल थे। उनका नाम अश्वपति था।"
राजा अश्वपति क्षमाशील, सत्यवादी और जितेन्द्रिय होने पर भी सन्तानहीन थे। बहुत अधिक अवस्था बीत जाने पर इस कारण उनके मन में बड़ा सन्ताप हुआ। अतः उन्होंने सन्तान की उत्पत्ति के लिये कठोर नियमों का आश्रय लिया। वे निश्चित समय पर थोड़ा-सा भोजन करते और ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए इन्द्रियों को संयम में रखते थे। राजाओं में श्रेष्ठ अश्वपति ब्राह्मणों के साथ प्रतिदिन गायत्री मन्त्र से एक लाख आहुति देकर दिन के छठे भाग में परिमित भोजन करते थे। उन्हें इस नियम से रहते हुए अठारह वर्ष बीत गये। अठारहवाँ वर्ष पूर्ण होने पर सावित्री देवी सन्तुष्ट हुईं।
एतेन नियमेनासीद् वर्षाण्यष्टादशैव तु ।
पूर्णे त्वष्टादशे वर्षे सावित्री तुष्टिमभ्यगात् ॥
उनको इस नियमसे रहते हुए अठारह वर्ष बीत गये । अठारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर सावित्रीदेवी संतुष्ट हुईं ।
तभी, अग्निहोत्र की अग्नि से प्रसन्न होकर सावित्री देवी प्रकट हुईं। उन्होंने बड़े हर्ष के साथ राजा को प्रत्यक्ष दर्शन दिए और वर देने के लिये उद्यत होकर उस अनुष्ठान में स्थित राजा अश्वपति से कहा— "राजन्! मैं तुम्हारे विशुद्ध ब्रह्मचर्य, इन्द्रिय-संयम, मनोनिग्रह तथा सम्पूर्ण हृदय से की हुई भक्ति के द्वारा बहुत सन्तुष्ट हुई हूँ। मद्रराज अश्वपते! तुम्हें जो अभीष्ट हो, वह वर माँगो।"
अश्वपति ने कहा— "देवि! मैंने धर्म प्राप्ति की इच्छा से सन्तान के लिये यह अनुष्ठान आरम्भ किया था। आपकी कृपा से मुझे बहुत-से वंशप्रवर्तक पुत्र प्राप्त हों। यदि आप प्रसन्न हैं तो मैं आपसे यह सन्तान सम्बन्धी वर ही माँगता हूँ; क्योंकि द्विजातिगण मुझसे बराबर यही कहते हैं कि 'न्याययुक्त सन्तानोत्पादन भी परम धर्म है'।"
तुष्टासि यदि मे देवि वरमेतं वृणोम्यहम् ।
संतानं परमो धर्म इत्याहुर्मां द्विजातयः ॥
देवि! यदि आप प्रसन्न हैं तो मैं आपसे यह संतानसम्बन्धी वर ही माँगता हूँ; क्योंकि द्विजातिगण मुझसे बराबर यही कहते हैं कि 'न्याययुक्त संतानोत्पादन ( भी ) परम धर्म है '
सावित्री बोली— "राजन्! मैंने पहले ही तुम्हारे इस अभिप्राय को जानकर पुत्र के लिये भगवान् ब्रह्माजी से निवेदन किया था। अतः सौम्य! भगवान् ब्रह्माजी के कृपा-प्रसाद से तुम्हें शीघ्र ही इस पृथ्वी पर एक तेजस्विनी कन्या प्राप्त होगी। इस विषय में तुम्हें किसी तरह भी कोई प्रतिवाद या उत्तर नहीं देना चाहिये। मैं ब्रह्माजी की आज्ञा से सन्तुष्ट होकर तुमसे यह बात कहती हूँ।"
सावित्री देवी की बात सुनकर राजा ने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा का पालन करने की प्रतिज्ञा की। जब सावित्री देवी अन्तर्धान हो गयीं, तब वीर राजा अश्वपति अपने नगर को चले गये और प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करते हुए रहने लगे। समय प्राप्त होने पर महारानी ने एक कमलनयनी कन्या को जन्म दिया। यज्ञ-आहुति से प्रसन्न हुई सावितली देवी के कारण ब्राह्मणों तथा पिता ने उस कन्या का नाम 'सावित्री' ही रखा।
वह राजकन्या लक्ष्मी के समान बढ़ने लगी और यथासमय युवावस्था में प्रवेश किया। उसके शरीर का कटि भाग परम सुन्दर था; वह सुवर्ण की बनी हुई प्रतिमा सी जान पड़ती थी। उसके नेत्र विकसित नील कमलदल के समान मनोहर थे। उसके तेज से कोई भी राजा या राजकुमार उसका वरण नहीं कर सका।
एक दिन पर्व के अवसर पर सावित्री ने विधिपूर्वक अग्नि में आहुति दी और ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराया। तत्पश्चात वह इष्टदेवता का प्रसाद लेकर अपने पिता के समीप गयी। उसने पिता के चरणों में प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी। अपनी पुत्री को युवावस्था में देख, जिसके लिये अभी तक किसी ने वर की याचना नहीं की थी, राजा अश्वपति को बड़ा दुःख हुआ।
राजा बोले— "बेटी! अब किसी वर के साथ तेरा ब्याह कर देने का समय आ गया है, परन्तु तेरे तेज से प्रतिहत हो जाने के कारण कोई भी मुझसे तुझे माँग नहीं रहा है। इसलिये तू स्वयं ही ऐसे वर की खोज कर ले जो गुणों में तेरे समान हो। जिस पुरुष को तू पतिरूप में प्राप्त करना चाहे, उसका मुझे परिचय दे देना; फिर मैं सोच-विचार कर उसके साथ तेरा ब्याह कर दूँगा। कल्याणि! 'विवाह के योग्य हो जाने पर कन्या का दान न करने वाला पिता निन्दनीय है।' मेरी यह बात सुनकर तू पतिकी खोज करने में शीघ्रता कर।"
अप्रदाता पिता वाच्यो वाच्यश्चानुपयन् पतिः ।
मृते भर्तरि पुत्तश्च वाच्यो मातुररक्षिता ॥
‘ विवाहके योग्य हो जानेपर कन्याका दान न करनेवाला पिता निन्दनीय है । ऋतुकालमें पत्नीके साथ समागम न करनेवाला पति निन्दाका पात्र है तथा पतिके मर जानेपर विधवा माताकी रक्षा न करनेवाला पुत्र धिक्कारके योग्य है '
राजा ने बूढ़े मन्त्रियों को आज्ञा दी कि वे सावित्री के साथ यात्रा हेतु आवश्यक सामग्री लेकर चलें। मनस्विनी सावित्री ने पिता के चरणों में प्रणाम किया और बिना कुछ सोच-विचार किये प्रस्थान कर दिया। वह सुवर्णमय रथ पर सवार होकर, बूढ़े मन्त्रियों से घिरी हुई राजर्षियों के सुरम्य तपोवनों में गयी। उसने विभिन्न तीर्थों में भ्रमण किया और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को धनदान दिया।
एक दिन जब सावित्री अपने मन्त्रियों के साथ पिता के घर लौटी, तो राजा अश्वपति देवर्षि नारद के साथ बैठे थे। नारदजी ने पूछा— "राजन्! आपकी यह पुत्री कहाँ गयी थी और कहाँ से आ रही है? अब तो यह युवती हो गयी है। आप किसी वर के साथ इसका विवाह क्यों नहीं कर देते हैं?"
अश्वपतिरुवाच कार्येण खल्वनेनैव प्रेषिताद्यैव चागता ।
एतस्याः शृणु देवर्षे भर्तारं योऽनया वृतः ॥
अश्वपतिने कहा —देवर्षे! इसे मैंने इसी कार्यसे भेजा था और यह अभी- अभी लौटी है । इसने अपने लिये जिस पतिका वरण किया है, उसका नाम इसीके मुखसे सुनिये ।
अश्वपति ने कहा— "देवर्षे! इसे मैंने इसी कार्य से भेजा था और यह अभी-अभी लौटी है। इसने अपने लिये जिस पति को वरण किया है, उसका नाम इसी के मुख से सुनिये।" पिता के कहने पर सावित्री बोली— "पिताजी! शाल्व देश में द्युमत्सेन नाम से प्रसिद्ध एक धर्मात्मा क्षत्रिय राजा राज्य करते थे। पीछे वे अन्धे हो गये; उनकी आँखें चली गयीं और पुत्र अभी बाल्यावस्था में था, यह अवसर पाकर उनके पूर्व शत्रु ने उनका राज्य हर लिया।"
"वे अपनी छोटी अवस्था के पुत्र और उसकी पत्नी के साथ विशाल वन में चले आए और वहीं रहकर बड़े-बड़े व्रतों का पालन करते हुए तपस्या करने लगे। उनका एक पुत्र है सत्यवान्, जो पैदा तो नगर में हुआ है, परन्तु उसका पालन-पोषण और संवर्धन इसी तपोवन में हुआ है। वही मेरे योग्य पति हैं; मैंने उन्हीं का मन ही मन वरण किया है।"
यह सुनकर देवर्षि नारदजी बोल उठे— "अहो! यह बड़े खेद की बात है, राजन्! सावित्री ने बिना जाने ही अपना बड़ा अनिष्ट कर लिया है, जो कि इसने सत्यवान् को गुणवान् समझकर वरण कर लिया है।"
अहो बत महत् पापं सावित्र्या नृपते कृतम् ।
अजानन्त्या यदनया गुणवान् सत्यवान् वृतः ॥
( यह सुनकर नारदजी बोल उठे - अहो! यह बड़े खेदकी बात है । राजन्! सावित्रीने बिना जाने ही अपना बड़ा अनिष्ट किया है, जो कि इसने सत्यवान्को गुणवान् समझकर वरण कर लिया है ।
राजा अश्वपति ने जिज्ञासावश पूछा— "देवर्षे! इस समय पितृभक्त राजकुमार सत्यवान् तेजस्वी, बुद्धिमान्, क्षमावान् और शूरवीर तो है न?"
नारदजी बोले— "वह राजकुमार सूर्य के समान तेजस्वी, बृहस्पतिके समान बुद्धिमान्, इन्द्र के समान वीर और पृथ्वी के समान क्षमाशील है। वह अपनी शक्ति के अनुसार दान देने में सङ्कृति-नन्दन रन्तिदेव के समान है तथा उशीनर-पुत्र शिबि के समान ब्राह्मणभक्त और सत्यवादी है। वह ययाति की भाँति उदार और चन्द्रमा के समान प्रियदर्शन है। द्युमत्सेन का वह बलवान् पुत्र रूपवान् तो इतना है मानो अश्विनीकुमारों में से ही एक हो। वह जितेन्द्रिय, मृदुल, शूरवीर, सत्यस्वरूप, इन्द्रियसंयमी, सबके प्रति मैत्रीभाव रखने वाला, अदोषदर्शी, लज्जावान् और कान्तिमान् है। तप और शील में बढ़े हुए वृद्ध पुरुष उसके विषय में सङ्क्षेप में कहते हैं कि राजकुमार सत्यवान् में सरलता का नित्य निवास है और उस सद्गुण में उसकी अविचल स्थिति है।"
अश्वपति बोले— "भगवन्! आप तो उसे सभी गुणों से सम्पन्न ही बता रहे हैं, यदि उसमें कोई दोष हो तो उन्हें भी बताइए।"
एको दोषोऽस्ति नान्योऽस्य सोऽद्यप्रभृति सत्यवान् ।
संवत्सरेण क्षीणायुर्देहन्यासं करिष्यति ॥
आजसे लेकर एक वर्ष पूर्ण होनेतक सत्यवान्की आयु पूर्ण हो जायगी और वह शरीर त्याग देगा । केवल यही दोष उसमें है, दूसरा नहीं ।
नारदजी ने गम्भीर स्वर में कहा— "दोष तो एक ही है, जो उसके सभी गुणों को दबाकर स्थित है। उस दोष को प्रयत्न करके भी हटाया नहीं जा सकता। आज से लेकर एक वर्ष पूर्ण होने तक सत्यवान् की आयु पूर्ण हो जाएगी और वह शरीर त्याग देगा। केवल यही दोष उसमें है, दूसरा नहीं।"
राजा अश्वपति व्याकुल होकर बोले— "बेटी सावित्री! यहाँ आ। तू पुनः यात्रा कर और दूसरे किसी पुरुष का वरण कर ले। सत्यवान् का यह एक ही बहुत बड़ा दोष है जो उसके सभी गुणों को दबाकर स्थित है। जैसा कि देववदिन्त भगवान नारदजी कह रहे हैं, सत्यवान् की आयु बहुत थोड़ी है और वह एक ही वर्ष में देहत्याग कर देगा।"
सावित्री ने अडिग स्वर में कहा— "भाइयों में धन का बँटवारा एक ही बार होता है, कन्या एक ही बार दी जाती है तथा श्रेष्ठ दाता 'मैं दूँगा' कहकर एक ही बार वचनदान करता है। ये तीन बातें एक-एक बार ही होती हैं। सत्यवान् दीर्घायु हों या अल्पायु, गुणवान् हों या गुणहीन; मैंने उन्हें एक बार अपना पति चुन लिया है। अब मैं दूसरे किसी पुरुष का वरण नहीं कर सकती। पहले मन से निश्चय करके फिर वाणी द्वारा कहा जाता है और तत्पश्चात् उसे कार्य रूप में परिणत किया जाता है; अतः इस विषय में मेरा मन ही प्रमाण है।"
स्थिरा बुद्धिर्नरश्रेष्ठ सावित्र्या दुहितुस्तव ।
नैषा वारयितुं शक्या धर्मादस्मात् कथंचन ॥
नारदजी बोले – नरश्रेष्ठ! आपकी पुत्री सावित्रीकी बुद्धि स्थिर है । इसे इस धर्ममार्गसे किसी तरह हटाया नहीं जा सकता ।
नारदजी ने राजा से कहा— "नरश्रेष्ठ! आपकी पुत्री सावित्री की बुद्धि स्थिर है। इसे इस धर्ममार्ग से किसी तरह हटाया नहीं जा सकता। सत्यवान् में जो गुण हैं, वे दूसरे किसी पुरुष में हैं भी नहीं। अतः मुझे आपकी पुत्री का सत्यवान् के साथ विवाह कर देना ही ठीक मालूम पड़ता है।"
राजा अश्वपति ने भारी मन से कहा— "देवर्षे! आपने जो बात कही है, वह ठीक है। उसे टाला नहीं जा सकता। अतः मैं ऐसा ही करूँगा, क्योंकि आप मेरे गुरु हैं।"
राजोवाच अविचाल्यं तदुक्तं यत् तथ्यं भगवता वचः ।
करिष्याम्येतदेवं च गुरुर्हि भगवान् मम ॥
राजा बोले — देवर्षे! आपने जो बात कही है, वह ठीक है । उसे टाला नहीं जा सकता । अतः मैं ऐसा ही करूंगा, क्योंकि आप मेरे गुरु हैं ।
नारदजी स्वर्गलोक चले गए और राजा अपनी पुत्री के विवाह की तैयारी कराने लगे। राजा अश्वपति ने विवाह की सारी सामग्री एकत्र करवाई और बूढ़े ब्राह्मणों तथा पुरोहितों को बुलाकर एक शुभ दिन में कन्या के साथ तपोवन की ओर प्रस्थान किया।
पवित्र वन में द्युमत्सेन के आश्रम के निकट पहुँचकर राजा अश्वपति ब्राह्मणों के साथ पैदल ही उस राजर्षि के पास गए। उन्होंने द्युमत्सेन की यथायोग्य पूजा की और अपना परिचय दिया। धर्मज्ञ द्युमत्सेन ने उन्हें अर्घ्य, आसन और गौ-निवेदन देकर पूछा— "किस उद्देश्य से आपका यहाँ शुभागमन हुआ है?"
अश्वपति ने स्पष्ट करते हुए कहा— "धर्मज्ञ राजर्षे! सावित्री नाम से प्रसिद्ध मेरी यह सुन्दरी कन्या है। इसे आप धर्मतः अपनी पुत्रवधू बनाने के लिये स्वीकार करें।"
द्युमत्सेन ने चिन्ता व्यक्त की— "महाराज! हम राज्य से भ्रष्ट हो चुके हैं और वन का आश्रय लेकर तपस्वी जीवन बिताते हैं। आपकी कन्या ये सब कष्ट सहन करने योग्य नहीं है। ऐसी दशा में वह इस आश्रम में रहकर वनवास के कष्ट को कैसे सह सकेगी?"
अश्वपति ने उत्तर दिया— "राजन्! सुख और दुःख तो उत्पन्न और नष्ट होने वाले हैं। मैं सौहार्दभाव से आपकी शरण में आया हूँ। आप मेरी आशा भग्न न करें। आप सर्वथा मेरे अनुरूप और योग्य हैं। मैं भी आपके योग्य हूँ। आप मेरी इस कन्या को अपने श्रेष्ठ पुत्र सत्यवान् की पत्नी के रूप में ग्रहण कीजिये।"
आशां नार्हसि मे हन्तुं सौहृदात् प्रणतस्य च ।
अभितश्चागतं प्रेम्णा प्रत्याख्यातुं न मार्हसि ॥
मैं सौहार्दभावसे आपकी शरणमें आया हूँ । आप मेरी आशा भग्न न करें - प्रेमपूर्वक अपने पास आये हुए मुझ प्रार्थीको निराश न लौटावें ।
द्युमत्सेन ने प्रसन्न होकर कहा— "महाराज! मैं तो पहले से ही आपके साथ सम्बन्ध करना चाहता था; परन्तु राज्य से भ्रष्ट होने के कारण मैंने सोचा था कि अब यह सम्बन्ध नहीं हो सकेगा। किन्तु यदि मेरा यह अभिप्राय आज ही सिद्ध होना चाहता है, तो अवश्य हो।"
अभिप्रायस्त्वयं यो मे पूर्वमेवाभिकाङ्क्षितः ।
स निर्वर्ततु मेऽद्यैव काङ्क्षितो ह्यसि मेऽतिथिः ॥
किंतु मेरा यह अभिप्राय, जो मुझे पहलेसे ही अभीष्ट था, यदि आज ही सिद्ध होना चाहता है तो अवश्य हो । आप मेरे मनोवांछित अतिथि हैं ।
ततपश्चात् दोनों राजाओं ने विधिवत विवाह संस्कार सम्पन्न कराया। राजा अश्वपति प्रसन्नता के साथ अपनी राजधानी लौट गए। उस सर्वसद्गुण-सम्पन्न भार्या को पाकर सत्यवान् को बड़ी प्रसन्नता हुई और अपने मनोवाञ्छित पति को पाकर सावित्री को भी बड़ा आनन्द हुआ।
सावित्री ने सेवा, गुण, विनय और संयम से सबको प्रसन्न कर लिया। उसने शारीरिक सेवा द्वारा अपनी सास को और वाणी के संयम द्वारा अपने ससुर को सन्तुष्ट किया। इस प्रकार आश्रम में कुछ काल व्यतीत हो गया।
इधर सावित्री निरन्तर चिन्ता से गली जा रही थी। नारदजी की कही हुई बात उसके मन में बसी रहती थी। एक दिन वह समय आ पहुँचा जब सत्यवान् की मृत्यु होने वाली थी। सावितri प्रत्येक दिन की गणना करती रहती थी।
गणयन्त्याश्च सावित्र्या दिवसे दिवसे गते ।
यद् वाक्यं नारदेनोक्तं वर्तते हृदि नित्यशः ॥
सावित्री एक -एक दिन बीतनेपर उसकी गणना करती रहती थी । नारदजीने जो बात कही थी, वह उसके हृदयमें सदा विद्यमान रहती थी ।
जब उसे निश्चय हो गया कि मेरे पति को आज से चौथे दिन मरना है, तब उसने तीन रात का कठोर व्रत धारण किया। यह सुनकर द्युमत्सेन दुखी होकर बोले— "राजकुमारी! तुमने यह बड़ा कठोर व्रत आरम्भ किया है। तीन दिनों तक निराहार रहना तो अत्यन्त दुष्कर कार्य है।"
सावित्री ने कहा— "पिताजी! आप चिन्ता न करें। मैं इस व्रत को पूर्ण कर लूँगी। दृढ़ निश्चय ही व्रत के निर्वाह में कारण होता है।"
द्युमत्सेन चुप हो गए। सावित्री एक स्थान पर खड़ी काठ जैसी प्रतीत होने लगी। कल ही पति की मृत्यु होने वाली है, यह सोचकर वह दुःख में डूबी रात काटती रही। दूसरे दिन उसने सूर्योदय होते ही पूर्वाह्न के सारे कार्य पूरे किए और अग्नि में आहुति दी। फिर ब्राह्मणों और अपने सास-ससुर को प्रणाम करके हाथ जोड़कर खड़ी हो गई।
ततः सर्वान् द्विजान् वृद्धान् श्वश्रूं श्वशुरमेव च ।
अभिवाद्यानुपूर्व्येण प्राञ्जलिर्नियता स्थिता ॥
फिर सभी ब्राह्मणों, बड़े -बूढ़ों और सास- ससुरको क्रमशः प्रणाम करके वह नियमपूर्वक हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ी रही ।
तपस्वियों ने उसे सौभाग्यवर्धक आशीर्वाद दिए और सावित्री ने 'एवमस्तु' कहकर उन्हें शिरोधार्य किया।
नारदजी के उन वचनों को याद कर राजकुमारी सावित्री का हृदय अत्यन्त दुःखी हो गया था। वह पति की मृत्यु से सम्बन्ध रखने वाले समय और उस विशेष मुहूर्त की प्रतीक्षा में व्याकुल थी।
तं कालं तं मुहूर्तं च प्रतीक्षन्ती नृपात्मजा ।
यथोक्तं नारदवचश्चिन्तयन्ती सुदुःखिता ॥
फिर पतिकी मृत्युसे सम्बन्ध रखनेवाले समय और मुहूर्तकी प्रतीक्षा करती हुई राजकुमारी सावित्री नारदजीके पूर्वोक्त वचनका चिन्तन करके बहुत दुःखी हो गयी ।
उस समय सास और ससुर ने एकान्त में बैठकर राजकुमारी सावित्री से बड़े प्रेमपूर्वक कहा— "बेटी! तुमने शास्त्र के उपदेशों के अनुसार अपना व्रत पूरा कर लिया है, अब पारण करने का समय हो गया है। अतः जो तुम्हारा कर्तव्य है, वह करो।"
सावित्री ने अपने सङ्कल्प को अडिग रखते हुए उत्तर दिया— "सूर्यास्त होने पर जब मेरा मनोरथ पूर्ण हो जाएगा, तभी मैं भोजन करूँगी। यह मेरे मन का सङ्कल्प है और मैंने ऐसा करने की प्रतिज्ञा कर ली है।"
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! जब सावित्री भोजन के सम्बन्ध में इस प्रकार बातें कर रही थी, उसी समय सत्यवान कन्धे पर कुल्हाड़ी रखकर फल-फूल और समिधा लाने के लिए वन की ओर चल दिए। यह देखकर सावित्री ने अपने पति से कहा— "नाथ! आप अकेले न जाइये। मैं भी आपके साथ चलूँगी। आज मैं आपको अकेला नहीं छोड़ सकती।"
एवं सम्भाषमाणायाः सावित्र्या भोजनं प्रति ।
स्कन्धे परशुमादाय सत्यवान् प्रस्थितो वनम ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! जब सावित्री भोजनके सम्बन्धमें इस प्रकार बातें कर रही थी, उसी समय सत्यवान् कंधेपर कुल्हाड़ी रखकर ( फल- फूल, समिधा आदि लानेके लिये ) वनकी ओर चले ।
सत्यवान ने उसे समझाते हुए कहा— "सुन्दरी! तुम पहले कभी वन में नहीं गयी हो। वन का रास्ता बड़ा दुःखदायक होता है। तुम व्रत और उपवास करने के कारण दुर्बल हो रही हो, ऐसी दशा में पैदल कैसे चल सकोगी?"
परन्तु सावित्री के मन में उत्साह था। उसने कहा— "उपवास के कारण मुझे किसी प्रकार की शिथिलता और थकावट नहीं है। चलने के लिए मेरे मन में पूर्ण उत्साह है, अतः आप मुझे मना न कीजिये।" सास-ससुर की आज्ञा पाकर यशस्विनी सावित्री अपने पतिदेव के साथ चल दी। वह ऊपर से तो हँसती हुई जान पड़ती थी, किन्तु उसका हृदय दुःख की ज्वाला से दग्ध हो रहा था।
रास्ते में विशाल नेत्रों वाली सावित्री ने मयूरसमूहों से सजे रमणीय और विचित्र वन देखे। पवित्र जल बहाने वाली नदियों और फूलों से लदे सुन्दर वृक्षों को देखकर सत्यवान मधुर वाणी में बोले— "प्रिये! देखो, कैसा मनोहर दृश्य है!"
सती-साध्वी सावित्री अपने पति की हर अवस्था का निरीक्षण कर रही थी। नारदजी के वचनों को स्मरण करके उसे अब यह निश्चय हो गया था कि समय आ गया है; उसके पति की मृत्यु अब अवश्यम्भावी है। वह मन्द गति से चलते हुए मानो अपने हृदय के दो भाग कर रही थी— एक भाग से अपने पति का अनुसरण करती और दूसरे भाग से प्रतिक्षण उनके मृत्युकाल की प्रतीक्षा करती।
अनुव्रजन्ती भर्तारं जगाम मृदुगामिनी ।
द्विधेव हृदयं कृत्वा तं च कालमवेक्षती ॥
मन्दगतिसे चलनेवाली सावित्री मानो अपने हृदयके दो भाग करके एकसे अपने पतिका अनुसरण करती और दूसरेसे प्रतिक्षण उनके मृत्युकालकी प्रतीक्षा कर रही थी ।
तदनन्तर, पत्नी सहित शक्तिशाली सत्यवान ने फल चुनकर एक काठ की टोकरी भर ली। उसके पश्चात वे लकड़ी चीरने लगे। लकड़ी चीरते समय अत्यधिक परिश्रम के कारण सत्यवान के शरीर से पसीना निकलने लगा और उनके सिर में तीव्र दर्द होने लगा। श्रम से पीड़ित होकर वे अपनी प्यारी पत्नी के पास आए और बोले— "सावित्री! आज लकड़ी काटने के परिश्रम से मेरे सिर में दर्द होने लगा है, सारे अङ्गों में पीड़ा हो रही है और हृदय दग्ध-सा होता जान पड़ता है। मैं स्वयं को अस्वस्थ देख रहा हूँ। ऐसा जान पड़ता है जैसे कोई शूलों से मेरे सिर को छेद रहा हो। कल्याणी! अब मैं सोना चाहता हूँ। मुझमें खड़े रहने की शक्ति नहीं रह गई है।"
यह सुनकर सावित्री शीघ्र उनके पास आई और उनका सिर अपनी गोदी में लेकर पृथ्वी पर बैठ गई। वह तपस्विनी राजकन्या मन ही मन उस मुहूर्त और क्षण का योग मिलाने लगी। तभी अचानक उसने देखा कि एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए हैं, जिनके शरीर पर लाल रङ्ग का वस्त्र शोभा पा रहा है। सिर पर मुकुट बँधा हुआ है और वे सूर्य के समान तेजस्वी हैं। उनका शरीर श्याम वर्ण का है और नेत्र लाल हैं। उनके हाथ में एक पाश है। वह डरावना स्वरूप लिए बार-बार सत्यवान की ओर देख रहे हैं।
उन्हें देखते ही सावित्री ने धीरे से पति का मस्तक भूमि पर रख दिया और सहसा खड़ी होकर, हाथ जोड़कर, काँपते हुए हृदय से आर्त वाणी में पूछा— "मैं समझती हूँ आप कोई देवता हैं; क्योंकि आपका यह शरीर मनुष्यों जैसा नहीं है। देवेश्वर! यदि आपकी इच्छा हो तो बताइये आप कौन हैं और क्या करना चाहते हैं?"
यमराज ने उत्तर दिया— "सावित्री! तू पतिव्रता और तपस्विनी है, इसलिये मैं तुझसे वार्तालाप कर सकता हूँ। शुभे! तू मुझे यमराज जान। तेरे पति इस राजकुमार सत्यवान की आयु समाप्त हो गयी है, अतः मैं इसे बाँधकर ले जाऊँगा। बस, मैं यही करना चाहता हूँ।"
अयं ते सत्यवान् भर्ता क्षीणायुः पार्थिवात्मजः ।
नेष्यामि तमहं बद्ध्वा विद्धयेतन्मे चिकीर्षितम् ॥
तेरे पति इस राजकुमार सत्यवान्की आयु समाप्त हो गयी है, अतः मैं इसे बाँधकर ले जाऊँगा । बस, मैं यही करना चाहता हूँ ।
सावित्री ने विस्मय से पूछा— "भगवन्! मैंने तो सुना है कि मनुष्यों को ले जाने के लिये आपके दूत आया करते हैं। प्रभो! आप स्वयं यहाँ कैसे चले आये?"
यमराज ने उसका प्रिय करने के लिए यथार्थ रूप से अपना अभिप्राय बताया— "यह सत्यवान धर्मात्मा, रूपवान और गुणों का समुद्र है। मेरे दूतों द्वारा ले जाया जाने योग्य नहीं है, इसलिये मैं स्वयं आया हूँ।" इतना कहकर यमराज ने सत्यवान के शरीर से पाश में बँधे हुए अङ्गूष्ठमात्र परिमाण वाले विवश जीव को बलपूर्वक खींचकर निकाला।
ततः समुद्धृतप्राणं गतश्वासं हतप्रभम् ।
निर्विचेष्टं शरीरं तद् बभूवाप्रियदर्शनम् ॥
फिर तो प्राण निकल जानेसे उसकी साँस बंद हो गयी – अंगकान्ति फीकी पड़ गयी और शरीर निश्चेष्ट होकर अपरूप दिखायी देने लगा ।
प्राण निकल जाने से सत्यवान के अङ्ग की कान्ति फीकी पड़ गयी और उनका शरीर निश्चेष्ट होकर अपरूप दिखने लगा। यमराज उस जीव को बाँधकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिए। सावित्री दुःख से आतुर होकर यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ी। वह परम सौभाग्यवती पतिव्रता राजकन्या अपने व्रतों से पूर्णतः सिद्ध हो चुकी थी, इसलिए वह निर्बाध गति से उनके पीछे चलने में समर्थ थी।
यमराज ने उसे रोका और कहा— "सावित्री! अब तू लौट जा, सत्यवान का अन्त्येष्टि संस्कार कर। अब तू पतिके ऋण से उऋण हो गयी। पतिके पीछे तुझे जहाँ तक आना चाहिये था, तू वहाँ तक आ चुकी।"
सावित्री ने दृढ़ता से कहा— "जहाँ मेरे पति ले जाये जाते हैं अथवा ये स्वयं जहाँ जा रहे हैं, वहीं मुझे भी जाना चाहिये; यही सनातन धर्म है। तपस्या, गुरुभक्ति, पतिप्रेम और व्रतपालन तथा आपकी कृपा से मेरी गति कहीं भी रुक नहीं सकती। विद्वान कहते हैं कि सात पग साथ चलने मात्र से मैत्री सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। उसी मित्रता को सामने रखकर मैं आपसे कुछ निवेदन करूँगी, उसे सुनिये। जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियों को वश में नहीं किया है, वे वन में रहकर धर्मपालन और कष्टसहन रूप तपस्या नहीं कर सकते। केवल जितेन्द्रिय पुरुष ही यह सब करने में समर्थ हैं। साधु पुरुष केवल वर्ण-धर्म को ही प्रधानता देते हैं।"
नानात्मवन्तस्तु वने चरन्ति धर्मं च वासं च परिश्रमं च ।
विज्ञानतो धर्ममुदाहरन्ति तस्मात् सन्तो धर्ममाहुः प्रधानम् ॥
जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें नहीं किया है, वे वनमें रहकर धर्मपालन, गुरुकुलवास तथा कष्टसहनरूप तपस्या नहीं कर सकते हैं । जितेन्द्रिय पुरुष ही यह सब कुछ करनेमें समर्थ हैं । महात्मालोग विवेक विचारसे ही धर्म-प्राप्ति बताते हैं, अतः सभी सत्पुरुष धर्मको ही श्रेष्ठ मानते हैं ।
यमराज प्रसन्न होकर बोले— "अनिन्दिते! तू लौट जा। तेरी इन बातों से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। तू यहाँ मुझसे कोई वर माँग ले। सत्यवान के जीवन के सिवा मैं तुझे और सब कुछ दे सकता हूँ।"
सावित्री बोली— "भगवन्! मेरे श्वशुर अपने राज्य से भ्रष्ट होकर वन में रहते हैं। उनकी आँखें भी नष्ट हो गयी हैं। मैं चाहती हूँ कि आपकी कृपा से उन महाराज को उनकी आँखें मिल जायें और वे अग्नि एवं सूर्य के समान तेजस्वी हो जायें।"
यमराज ने वरदान देते हुए कहा— "अनिन्दिते! मैं तुझे यह वर देता हूँ। तूने जैसा कहा है, वैसा ही होगा। अब लौट जा, जिससे तुझे अधिक परिश्रम न हो।"
सावित्री ने हार नहीं मानी और कहा— "स्वामी के समीप रहते हुए मुझे श्रम कैसे हो सकता है? जहाँ मेरे पतिदेव रहेंगे, वहीं मेरी भी गति निश्चित है। आप जहाँ मेरे प्राणनाथ को ले जायेंगे, वहीं मेरा जाना भी अवश्यम्भावी है। देवेश्वर! आप फिर मेरी बात सुनिये। सत्पुरुषों का एक बार का समागम भी अत्यन्त अभीष्ट होता है। उनके साथ मित्रता हो जाना उससे भी बढ़कर है; साधु पुरुष का सङ्ग कभी निष्फल नहीं होता।"
सतां सकृत्संगतमीप्सितं परं ततः परं मित्रमिति प्रचक्षते ।
न चाफलं सत्पुरुषेण सङ्गतं ततः सतां सन्निवसेत् समागमे ॥
सत्पुरुषोंका एक बारका समागम भी अत्यन्त अभीष्ट होता है । उनके साथ मित्रता हो जाना उससे भी बढ़कर बताया गया है । साधु पुरुषका संग कभी निष्फल नहीं होता; अतः सदा सत्पुरुषोंके ही समीप रहना चाहिये ।
यमराज बोले— "भामिनी! तूने जो सबके हित की बात कही है, वह मेरे मन के अनुकूल है तथा विद्वानों की भी बुद्धिको बढ़ाने वाली है; अतः इस सत्यवान् के जीवन को छोड़कर तू दूसरा कोई वर और माँग ले।"
सावित्री ने धीरता से उत्तर दिया— "मेरे बुद्धिमान श्वशुर का राज्य, जो पहले उनसे छीन लिया गया है, उसे वे महाराज पुनः प्राप्त कर लें तथा वे मेरे पूज्य गुरु महाराज द्युमत्सेन कभी अपना धर्म न छोड़ें; यही दूसरा वर मैं आपसे माँगती हूँ।"
यमराज बोले— "राजा द्युमत्सेन शीघ्र एवं अनायास ही अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे और वे कभी अपने धर्म का भी परित्याग नहीं करेंगे। राजकुमारी! मेरे द्वारा अब तेरी इच्छा पूरी हो गयी। तू लौट जा, जिससे तुझे परिश्रम न हो।"
स्वमेव राज्यं प्रतिपत्स्यतेऽचिरा- न्न च स्वधर्मात् परिहास्यते नृपः ।
कृतेन कामेन मया नृपात्मजे निवर्त गच्छस्व न ते श्रमो भवेत् ॥
यमराज बोले- राजा द्युमत्सेन शीघ्र एवं अनायास ही अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे और वे कभी अपने धर्मका भी परित्याग नहीं करेंगे । राजकुमारी! मेरेद्वारा अब तेरी इच्छा पूरी हो गयी । तू लौट जा, जिससे तुझे परिश्रम न हो ।
परन्तु सावित्री रुकी नहीं। वह बोली— "देव! इस सारी प्रजा को आप नियम से संयम में रखते हैं और उसका नियमन करके आप अपनी इच्छा के अनुसार उसे विभिन्न लोकों में ले जाते हैं। इसलिये आपका ‘यम' नाम सर्वत्र विख्यात है। मैं जो बात कहती हूँ, उसे सुनिये— मन, वाणी और क्रिया द्वारा किसी भी प्राणी से द्रोह न करना, सब पर दयाभाव बनाये रखना और दान देना यह साधु पुरुषों का सनातन धर्म है।"
सावित्र्युवाच प्रजास्त्वयैता नियमेन संयता नियम्य चैता नयसे निकामया ।
ततो यमत्वं तव देव विश्रुतं निबोध चेमां गिरमीरितां मया ॥
सावित्री बोली – देव! इस सारी प्रजाको आप नियमसे संयममें रखते हैं और उसका नियमन करके आप अपनी इच्छाके अनुसार उसे विभिन्न लोकोंमें ले जाते हैं । इसीलिये आपका ‘ यम' नाम सर्वत्र विख्यात है । मैं जो बात कहती हूँ, उसे सुनिये ।
यमराज के मुख पर सन्तोष के भाव आए। वे बोले— "शुभे! जैसे प्यासे मनुष्य को प्राप्त हुआ जल आनन्ददायक होता है, उसी प्रकार तेरी कही हुई यह बात मुझे अत्यन्त सुख दे रही है। अतः तू सत्यवान् के जीवन के सिवा और कोई वर, जिसे तू लेना चाहे, माँग ले।"
सावित्री ने अपनी अगली कामना रखते हुए कहा— "भगवन्! मेरे पिता महाराज अश्वपति पुत्रहीन हैं; उन्हें सौ ऐसे औरस पुत्र प्राप्त हों, जो उनके कुल की सन्तान परम्परा को चलाने वाले हों। मैं आपसे यही तीसरा वर माँगती हूँ।"
यमराज बोले— "शुभे! तेरे पिता के कुल की सन्तान-परम्परा को चलाने वाले सौ तेजस्वी पुत्र होंगे। राजकुमारी! तेरी यह कामना भी पूरी हुई। अब लौट जा, तू रास्ते से बड़ी दूर चली आयी है।"
कुलस्य सन्तानकरं सुवर्चसं शतं सुतानां पितुरस्तु ते शुभे ।
कृतेन कामेन नराधिपात्मजे निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता ॥
यमराज बोले- शुभे! तेरे पिताके कुलकी संतान - परम्पराको चलानेवाले सौ तेजस्वी पुत्र होंगे । राजकुमारी! तेरी यह कामना भी पूरी हुई। अब लौट जा, तू रास्तेसे बड़ी दूर चली आयी है ।
सावित्री का सङ्कल्प अभी थमा नहीं था। वह बोली— "भगवन्! मैं अपने स्वामी के समीप हूँ। इसलिये यह स्थान मेरे लिये दूर नहीं है। मेरा मन तो और भी दूर तक दौड़ लगाता है। आप चलते-चलते ही मेरी कही हुई ये प्रस्तुत बातें पुनः सुनें। देवेश्वर! आप विवस्वान् के प्रतापी पुत्र हैं; इसलिये विद्वान् पुरुष आपको वैवस्वत कहते हैं। आप समस्त प्रजा के साथ समतापूर्वक धर्मानुसार आचरण करते हैं, इसलिये आप धर्मराज कहलाते हैं। मनुष्य को अपने-आप पर भी उतना विश्वास नहीं होता है, जितना सन्तों पर होता है। इसलिये सब लोग सन्तों से विशेष प्रेम करना चाहते हैं। सौहार्द से ही समस्त प्राणियों का एक-दूसरे के प्रति विश्वास उत्पन्न होता है। सन्तों में सौहार्द होने के कारण ही सब लोग उन पर अधिक विश्वास करते हैं।"
यमराज ने आश्चर्य और प्रसन्नता के मिश्रित भाव से कहा— "कल्याणि! तूने जैसी बात कही है, वैसी मैंने तेरे सिवा किसी दूसरे के मुख से नहीं सुनी है। शुभे! तेरी इस बात से मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ; तू सत्यवान् के जीवन के सिवा और कोई चौथा वर माँग ले और यहाँ से लौट जा।"
सावित्री ने अपना चौथा वर प्रस्तुत किया— "मेरे और सत्यवान् दोनों के संयोग से कुल की वृद्धि करने वाले, बल और पराक्रम से सुशोभित सौ औरस पुत्र हों। यह मैं आपसे चौथा वर माँगती हूँ।"
यमराज बोले— "अबले! तुझे बल और पराक्रम से सम्पन्न सौ पुत्र प्राप्त होंगे; जो तेरी प्रसन्नता को बढ़ाने वाले होंगे। राजकुमारी! अब तू लौट जा, जिससे तुझे थकावट न हो। तू रास्ते से बहुत दूर चली आयी है।"
शतं सुतानां बलवीर्यशालिनां भविष्यति प्रीतिकरं तवाबले ।
परिश्रमस्ते न भवन्नृपात्मजे निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता ॥
यमराज बोले — अबले! तुझे बल और पराक्रमसे सम्पन्न सौ पुत्र प्राप्त होंगे; जो तेरी प्रसन्नताको बढ़ानेवाले होंगे । राजकुमारी! अब तू लौट जा, जिससे तुझे थकावट न हो । तू रास्तेसे बहुत दूर चली आयी है ।
सावित्री के शब्द अभी भी बह रहे थे— "सत्पुरुषों की वृत्ति निरन्तर धर्म में ही लगी रहती है। श्रेष्ठ पुरुष कभी दुःखी या व्यथित नहीं होते। सत्पुरुषों का सन्तों के साथ जो समागम होता है, वह कभी निष्फल नहीं होता। श्रेष्ठ पुरुष सन्तों से कभी भय नहीं मानते हैं। श्रेष्ठ पुरुष सत्य के बल से सूर्य का सञ्चालन करते हैं। सन्त-महात्मा अपनी तपस्या से इस पृथ्वी को धारण करते हैं। राजन्! सत्पुरुष ही भूत, वर्तमान और भविष्य के आश्रय हैं। श्रेष्ठ पुरुष सन्तों के बीच में रहकर कभी दुःख नहीं उठाते हैं। यह सनातन सदाचार सत्पुरुषों द्वारा सेवित है। यह जानकर सभी श्रेष्ठ पुरुष परोपकार करते हैं और आपस में एक-दूसरे की ओर स्वार्थ की दृष्टि से कभी नहीं देखते हैं। सत्पुरुषों का प्रसाद कभी व्यर्थ नहीं जाता। वहाँ किसी को स्वार्थ की हानि नहीं उठानी पड़ती है और न ही मान-सम्मान ही नष्ट होता है है। ये तीनों— प्रसाद, अर्थ और मान— सन्तों में नित्य-निरन्तर बने रहते हैं; इसलिये वे सम्पूर्ण जगत् के रक्षक होते हैं।"
यमराज भावविभोर होकर बोले— "पतिव्रते! जैसे-जैसे तू गम्भीर अर्थ से युक्त और सुन्दर पदों से विभूषित, मन के अनुकूल धर्मसङ्गत बातें मुझे सुनाती जा रही है, वैसे-वैसे तेरे प्रति मेरी उत्तम भक्ति बढ़ती जाती है; अतः तू मुझसे कोई अनुपम वर माँग ले।"
अब सावित्री ने अपने हृदय का अन्तिम सत्य प्रकट किया— "मानद! आपने मुझे जो पुत्र प्राप्ति का वर दिया है, वह पुण्यमय दाम्पत्य-संयोग के बिना सफल नहीं हो सकता। अन्य वरों की जैसी स्थिति है, वैसी इस अन्तिम वर की नहीं है। इसलिये मैं पुनः यह वर माँगती हूँ कि ये सत्यवान् जीवित हो जायें; क्योंकि इन पतिदेवता के बिना मैं मरी हुई के ही समान हूँ। पतिके बिना यदि कोई सुख मिलता है तो वह मुझे नहीं चाहिये। पतिदेव के बिना मैं स्वर्गलोक में भी जाने की इच्छा नहीं रखती। पतिके बिना मुझे धन-सम्पत्ति की भी इच्छा नहीं है। अधिक क्या कहूँ, मैं पतिके बिना जीवित रहना भी नहीं चाहती। आपने ही मुझे सौ पुत्र होने का वर दिया है और आप ही मेरे पति को अन्यत्र लिये जा रहे हैं; अतः मैं वही वर माँगती हूँ कि ये सत्यवान् जीवित हो जायें; इससे आपका ही वचन सत्य होगा।"
वरातिसर्गः शतपुत्रता मम त्वयैव दत्तो ह्रियते च मे पतिः ।
वरं वृणे जीवतु सत्यवानयं तवैव सत्यं वचनं भविष्यति ॥
आपने ही मुझे सौ पुत्र होनेका वर दिया है और आप ही मेरे पतिको अन्यत्र लिये जा रहे हैं; अतः मैं वही वर माँगती हूँ कि ये सत्यवान् जीवित हो जायँ, इससे आपका ही वचन सत्य होगा ।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर 'तथास्तु' कहकर सूर्यपुत्र धर्मराज यमने सत्यवान् का बन्धन खोल दिया और प्रसन्नचित्त होकर सावित्री से इस प्रकार कहा— "एष भद्रे मया मुक्तो भर्ता ते कुलनन्दिनि। (तोषितोऽहं त्वया साध्वि वाक्यैर्धर्मार्थसंहितैः।) अरोगस्तव नेयश्च सिद्धार्थः स भविष्यति।"
"भद्रे! यह ले, मैंने तेरे पति को छोड़ दिया। कुलनन्दिनी! तूने अपने धर्मार्थयुक्त वचनों द्वारा मुझे पूर्ण सन्तुष्ट कर दिया है। साध्वी! यह सत्यवान् नीरोग, सफल-मनोरथ तथा तेरे द्वारा ले जाने योग्य हो गया है। यह तेरे साथ रहकर चार सौ वर्षों की आयु प्राप्त करेगा। यज्ञों द्वारा भगवान का यजन करके यह अपने धर्माचरण के द्वारा सम्पूर्ण विश्व में विख्यात होगा। सत्यवान् तेरे गर्भ से सौ पुत्र उत्पन्न करेगा और वे सभी राजकुमार राजा होने के साथ ही पुत्र-पौत्रों से सम्पन्न होंगे। तेरे ही नाम से उनकी सदा ख्याति होगी अर्थात् वे सावित्री नाम से प्रसिद्ध होंगे। तेरे पिता के भी तेरी माता के ही गर्भ से सौ पुत्र होंगे। वे तेरी माता मालवी से उत्पन्न होने के कारण मालव नाम से विख्यात होंगे। तेरे भाई मालव क्षत्रिय पुत्र-पौत्रों से सम्पन्न तथा देवताओं के समान तेजस्वी होंगे।"
एवं तस्यै वरं दत्त्वा धर्मराजः प्रतापवान् ।
निवर्तयित्वा सावित्रीं स्वमेव भवनं ययौ ॥
सावित्रीको इस प्रकार वरदान दे प्रतापी धर्मराज उसे लौटाकर अपने लोकको चले गये ।
सावित्री को इस प्रकार वरदान देकर प्रतापी धर्मराज उसे लौटाकर अपने लोक को चले गये।
यमराज के चले जाने पर सावित्री अपने पति को पाकर उसी स्थान पर गयी, जहाँ सत्यवान का मृत शरीर पड़ा था। वह पृथ्वी पर अपने पति को पड़ा देख उनके पास गयी और पृथ्वी पर बैठ गयी; फिर उन्हें उठाकर उसके मस्तक को अपनी गोद में रख लिया।
तदनन्तर चेतना प्राप्त करके सत्यवान्, परदेश में रहकर लौटे हुए पुरुष की भाँति बार-बार प्रेमपूर्वक सावित्री की ओर देखते हुए बोले— "प्रिये! खेद है कि मैं बहुत देर तक सोता रह गया। तुमने मुझे जगाया क्यों नहीं? वे श्यामवर्ण के पुरुष कहाँ हैं जिन्होंने मुझे खींचा था?"
सावित्री बोली— "नरश्रेष्ठ! आप मेरी गोद में बहुत देर तक सोते गये। वे श्यामवर्ण के पुरुष प्रजा को संयम में रखने वाले साक्षात् भगवान् यम थे, जो अब चले गये हैं। महाभाग! आपने विश्राम कर लिया। राजकुमार! अब आपकी नींद भी टूट चुकी है। यदि शक्ति हो तो उठिये; देखिये, प्रगाढ़ अन्धकार से युक्त रात्रि हो गयी है।"
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तब होश में आकर सत्यवान् सुखपूर्वक सोये हुए पुरुष की भाँति उठकर सम्पूर्ण दिशाओं तथा वन-प्रान्त की ओर दृष्टि डालकर बोले— "सुमध्यमे! मैं फल लाने के लिये तुम्हारे साथ घर से निकला था, फिर लकड़ी चीरते समय मेरे सिर में जोर-जोर से दर्द होने लगा था। शुभे! मस्तक की उस पीड़ा से सन्तप्त हो मैं देर तक खड़ा रहने में असमर्थ हो गया और तुम्हारी गोद में सिर रखकर सो रहा। ये सारी बातें मुझे क्रमशः याद आ रही हैं। तुम्हारे अङ्गों का स्पर्श होने से मेरा मन नींद में खो गया। तत्पश्चात् मुझे घोर अन्धकार दिखाई दिया। साथ ही एक महातेजस्वी दिव्य पुरुष का दर्शन हुआ। सुमध्यमे! यदि तुम जानती हो तो बताओ; वह सब क्या था? मैंने जो कुछ देखा है वह स्वप्न तो नहीं था? अथवा वह सब सत्य ही था?"
तमुवाचाथ सावित्री रजनी व्यवगाहते ।
श्वस्ते सर्वं यथावृत्तमाख्यास्यामि नृपात्मज ॥
तब सावित्री उनसे बोली - राजकुमार! रात बढ़ती जा रही है । कल सबेरे मैं आपसे सब बातें ठीक - ठीक बताऊँगी ।
तब सावित्री उनसे बोली— "राजकुमार! रात बढ़ती जा रही है। कल सबेरे मैं आपसे सब बातें ठीक-ठीक बताऊँगी। सुव्रत! उठिये, उठिये, आपका कल्याण हो। आप चलकर माता-पिता का दर्शन तो कीजिये। सूर्य डूब गये तथा रात घनी हो गयी है। ये क्रूर बोली बोलने वाले निशाचर यहाँ प्रसन्नतापूर्वक विचर रहे हैं। वन में घूमते हुए मृगों के पैरों से लगकर पत्तों के मर्मर शब्द सुनाई पड़ते हैं।"
"दक्षिण और पश्चिम के कोण की दिशा में जाकर ये उग्र सियारिनें भयङ्कर शब्द कर रही हैं, जिससे मेरा हृदय काँप उठता है।"
एता घोरं शिवा नादान् दिशं दक्षिणपश्चिमाम् ।
आस्थाय विरुवन्त्युग्राः कम्पयन्त्यो मनो मम ॥
' दक्षिण और पश्चिमके कोणकी दिशामें जाकर ये उग्र सियारिनें भयंकर शब्द कर रही हैं, जिससे मेरा हृदय काँप उठता है ।
वन के उस घने अन्धकार में सत्यवान के मुख से ये शब्द निकले। उन्होंने सावित्री की ओर देखा और बोले— "प्रिये! यह वन गाढ अन्धकार से आच्छादित होकर अत्यन्त भयङ्कर दिखाई दे रहा है। इस समय न तो तुम्हें रास्ता सूझेगा और न तुम चल ही सकोगी।"
सावित्री ने धैर्य के साथ उत्तर दिया— "आज इस वन में आग लगी थी। इसमें एक सूखा वृक्ष खड़ा है, जो जल रहा है। हवा लगने से उसमें कहीं-कहीं आग दिखाई देती है। वहीं से आग ले आकर मैं सब ओर लकड़ियाँ जलाऊँगी। यहाँ बहुत से काठ-कबाड़ पड़े हैं। आप मन से चिन्ता निकाल दीजिए।"
सावित्री की आँखों में चिन्ता थी, पर वह सत्यवान के स्वास्थ्य को लेकर चिन्तित थी। उसने आगे कहा— "परन्तु मैं आपको रुग्ण देख रही हूँ। ऐसी दशा में यदि आपके मन में चलने का उत्साह न हो अथवा इस तिमिराच्छन्न वन में यदि आपको रास्ते का ज्ञान न हो सके, तो आपकी अनुमति होने पर हम दोनों कल सबेरे, जब वन की हर एक वस्तु स्पष्ट दिखने लगे, घर चलेंगे। अनघ! यदि आपकी रुचि हो तो एक रात हम लोग यहीं निवास करें।"
सत्यवान ने अपने शरीर की शक्ति को परखते हुए कहा— "प्रिये! मेरे सिर का दर्द दूर हो गया है। मुझे अपने सब अङ्ग स्वस्थ दिखाई देते हैं। अब तुम्हारे कृपाप्रसाद से मैं अपने माता-पिता से मिलना चाहता हूँ। आज से पहले कभी भी मैं इतनी देर करके असमय में अपने आश्रम पर नहीं लौटा हूँ। सन्ध्या होने से पहले ही माता मुझे रोक लेती है, आश्रम से बाहर नहीं जाने देती। दिन में भी यदि मैं आश्रम से दूर निकल जाता हूँ तो मेरे माता-पिता व्याकुल हो उठते हैं एवं पिताजी आश्रमवासियों के साथ मुझे खोजने निकल पड़ते हैं।"
न कदाचिद् विकालं हि गतपूर्वो मयाऽऽश्रमः ।
अनागतायां सन्ध्यायां माता मे प्ररुणद्धि माम् ॥
आजसे पहले कभी भी मैं इतनी देर करके असमयमें अपने आश्रमपर नहीं लौटा हूँ । संध्या होनेसे पहले ही माता मुझे रोक लेती है— आश्रमसे बाहर नहीं जाने देती ।
सत्यवान की आवाज़ में एक भारीपन था। उसने अपनी चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा— "मेरे माता-पिता ने अत्यन्त दुःखी होकर पहले कई बार मुझे उलाहना दिया है कि 'तुम देर से घर लौटते हो'। आज मेरे लिए उन दोनों की क्या अवस्था हुई होगी? यह सोचकर मुझे बड़ी चिन्ता हो रही है। मुझे न देखने पर उन दोनों को महान दुःख होगा।"
वह रुक गया, जैसे स्मृतियों के बोझ तले दब गया हो। उसने आगे कहा— "पहले की बात है, मेरे वृद्ध माता-पिता ने अत्यन्त दुःखी होकर रात में आँसू बहाते हुए मुझसे बारम्बार प्रेमपूर्वक कहा था— 'बेटा! तुम्हारे बिना हम दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकते। वत्स! तुम जब तक जीवित रहोगे, तभी तक हमारा भी जीवन निश्चित है। हम दोनों बूढ़े और अन्धे हैं। तुम्हीं हमारी दृष्टि हो तथा तुम्हीं पर हमारा वंश प्रतिष्ठित है। हम दोनों का पिण्ड, कीर्ति और कुल-परम्परा सब कुछ तुम पर ही अवलम्बित है।' मेरी माता बूढ़ी है, पिता भी वृद्ध हैं; केवल मैं ही उन दोनों के लिये लाठी का सहारा हूँ। वे दोनों रात में मुझे न देखकर पता नहीं किस दशा को पहुँच जाएँगे?"
वृद्धयोरन्धयोर्दृष्टिस्त्वयि वंशः प्रतिष्ठितः ।
त्वयि पिण्डश्च कीर्तिश्च संतानं चावयोरिति ॥
' हम दोनों बूढ़े और अंधे हैं । तुम्हीं हमारी दृष्टि हो तथा तुम्हींपर हमारा वंश प्रतिष्ठित है । हम दोनोंका पिण्ड, कीर्ति और कुलपरम्परा सब कुछ तुमपर ही अवलम्बित है '
सत्यवान का स्वर करुणा से भर गया। उसने स्वयं को कोसते हुए कहा— "मैं अपनी इस नींद को कोसता हूँ, जिसके कारण मेरे पिता तथा कभी मेरा अपकार न करने वाली मेरी माता का जीवन संशय में पड़ गया है। मैं भी कठिन विपत्ति में फँसकर प्राण-संशय की दशा में आ पहुँचा हूँ। माता-पिता के बिना तो मैं कदापि जीवित नहीं रह सकता। निश्चय ही इस समय मेरे प्रज्ञाचक्षु पिता व्याकुल हृदय से एक-एक आश्रमवासी के पास जाकर मेरे विषय में पूछ रहे होंगे।"
उसने गहरी साँस ली और बोला— "शुभे! मुझे अपने लिये उतना शोक नहीं है, जितना कि पिता के लिये और उन्हीं का अनुसरण करने वाली दुबली-पतली माता के लिये है। मेरे कारण आज मेरे माता-पिता बहुत सन्तप्त होंगे। उन्हें जीवित देखकर ही मैं जी रहा हूँ। मुझे उन दोनों का भरण-पोषण करना चाहिए। मैं यह भी जानता हूँ कि माता-पिता का प्रिय करना ही मेरा कर्तव्य है।"
यह कहते हुए सत्यवान धर्मपरायण, गुरुभक्त और सत्यवादी था। वह अपनी बाँहें ऊपर उठाकर दुःख से आतुर होकर फूट-फूटकर रोने लगा। अपने पति को इस प्रकार शोक से व्याकुल देख सावित्री ने अपने नेत्रों से बहते हुए आँसुओं को पोंछा और कहा— "यदि मैंने कोई तपस्या की हो, यदि दान दिया हो और होम किया हो, तो मेरे सास-ससुर और पति के लिये यह रात पुण्यमयी हो। मैंने पहले कभी इच्छानुसार किये जाने वाले क्रीडा-विनोद में भी झूठी बात कही हो, मुझे इसका स्मरण नहीं है। उस सत्य के प्रभाव से इस समय मेरे सास-ससुर जीवित रहें।"
सत्यवान ने अपनी आँखों के आँसू पोंछते हुए कहा— "सावित्री! चलो, मैं शीघ्र ही माता-पिता का दर्शन करना चाहता हूँ। क्या मैं उन दोनों को प्रसन्न देख सकूँगा? मैं सत्य की शपथ खाकर अपना शरीर छूकर कहता हूँ, यदि मैं माता अथवा पिता का अप्रिय देखूँगा तो जीवित नहीं रहूँगा। यदि तुम्हारी बुद्धि धर्म में रत है, यदि तुम मुझे जीवित देखना चाहती हो अथवा मेरा प्रिय करना अपना कर्तव्य समझती हो, तो हम दोनों शीघ्र ही आश्रम के समीप चलें।"
यदि धर्मे च ते बुद्धिर्मां चेज्जीवन्तमिच्छसि ।
मम प्रियं वा कर्तव्यं गच्छावाश्रममन्तिकात् ॥
यदि तुम्हारी बुद्धि धर्ममें रत है, यदि तुम मुझे जीवित देखना चाहती हो अथवा मेरा प्रिय करना अपना कर्तव्य समझती हो तो हम दोनों शीघ्र ही आश्रमके समीप चलें ।
सावित्री ने पति के हित का चिन्तन किया। उसने उठकर अपने खुले हुए केशों को बाँधा और दोनों हाथों से पकड़कर पति को उठाया। सत्यवान ने भी उठकर एक हाथ से अपने सभी अङ्ग पोंछे और चारों ओर देखकर फलों की टोकरी पर दृष्टि डाली। सावित्री ने कहा— "कल सबेरे फलों को ले चलियेगा। इस समय आपके योग-क्षेम के लिये मैं इस कुल्हाड़ी को साथ ले चलूँगी।"
उसने टोकरी के बोझ को पेड़ की डाल में लटका दिया और कुल्हाड़ी लेकर पुनः पति के पास आ गई। सावित्री ने सत्यवान की दाहिनी भुजा को अपने बायें कन्धे पर रखा और उन्हें अपने पार्श्व भाग से सटाकर धीरे-धीरे चलने लगी।
सत्यवान ने उसे ढाँढस बँधाते हुए कहा— "भीरु! बार-बार आने-जाने से यहाँ के सभी मार्ग मेरे परिचित हैं। वृक्षों के भीतर से दिखाई देने वाली चाँदनी से भी मैं रास्तों की पहचान कर लेता हूँ। यह वही मार्ग है जिससे हम दोनों आए थे और हमने फल चुने थे। शुभे! तुम जैसे आयी हो वैसे चली चलो, रास्ते का विचार न करो।"
सत्यवान आगे बढ़ते हुए बोला— "यह पलाश-वृक्षों के इस वन प्रदेश में मार्ग अलग-अलग दो दिशाओं की ओर मुड़ जाता है। इन दोनों में से जो मार्ग उत्तर की ओर से जाता है, उसी से चलो और शीघ्रतापूर्वक पैर बढ़ाओ। अब मैं स्वस्थ हूँ, बलवान हूँ और अपने माता तथा पिता दोनों को देखने के लिये उत्सुक हूँ।"
पलाशखण्डे चैतस्मिन् पन्था व्यावर्तते द्विधा ।
तस्योत्तरेण यः पन्थास्तेन गच्छ त्वरस्व च ॥
स्वस्थोऽस्मि बलवानस्मि दिदृक्षुः पितरावुभौ । पलाश- वृक्षोंके इस वनप्रदेशमें यह मार्ग अलग- अलग दो दिशाओंकी ओर मुड़ जाता है । इन दोनोंमेंसे जो मार्ग उत्तरकी ओरसे जाता है, उसीसे चलो और शीघ्रतापूर्वक पैर बढ़ाओ । अब मैं स्वस्थ हूँ, बलवान् हूँ और अपने माता तथा पिता दोनोंको देखनेके लिये उत्सुक हूँ ।
ऐसा कहते हुए सत्यवान बड़ी उतावली के साथ आश्रम की ओर चलने लगा।
धौम्य ऋषि ने कहा—"महाराज! आपका यह पुत्र जिस प्रकार समस्त सद्गुणों से सम्पन्न, जनप्रिय तथा चिरजीवी पुरुषों के लक्षणों से युक्त है, उसके अनुसार यही मानना चाहिए कि सत्यवान जीवित है।"
सर्वैर्गुणैरुपेतस्ते यथा पुत्रो जनप्रियः ।
दीर्घायुर्लक्षणोपेतस्तथा जीवति सत्यवान् ॥
धौम्यने कहा —महाराज! आपका यह पुत्र जिस प्रकार समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न, जनप्रिय तथा चिरजीवी पुरुषोंके लक्षणोंसे युक्त है, उसके अनुसार यही मानना चाहिये कि सत्यवान् जीवित है ।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—"युधिष्ठिर! इस प्रकार सत्यवादी एवं तपस्वी मुनियों ने जब राजा द्युमत्सेन को पूर्णतः आश्वासन दिया, तब उन सबका समादर करते हुए उनकी बात मानकर वे स्थिर हो गये। तदनन्तर दो ही घड़ी में सावित्री अपने पति सत्यवान के साथ रात में वहाँ आयी और बड़े हर्ष के साथ उसने आश्रम में प्रवेश किया।"
ततो मुहूर्तात् सावित्री भर्त्रा सत्यवता सह ।
आजगामाश्रमं रात्रौ प्रहृष्टा प्रविवेश ह ॥
तदनन्तर दो ही घड़ीमें सावित्री अपने पति सत्यवान् के साथ रातमें वहाँ आयी और बड़े हर्षके साथ उसने आश्रममें प्रवेश किया ।
आश्रम में ब्राह्मणों ने राजा का अभिनन्दन करते हुए कहा—"महाराज! पुत्र के साथ आपका मिलन हुआ और आपको नेत्र भी प्राप्त हो गये, इस अवस्था में आपको देखकर हम सब लोग आपका अभ्युदय मना रहे हैं। बड़े सौभाग्य की बात है कि आपको पुत्र का समागम प्राप्त हुआ, बहू सावित्री का दर्शन हुआ और अपने खोये हुए नेत्र पुनः मिल गये। इन तीनों बातों से आपका अभ्युदय सूचित होता है। हम सब लोगों ने जो बात कही है, वह ज्यों-की-त्यों सत्य निकली, इसमें संशय नहीं है। आगे भी शीघ्र ही आपकी बारम्बार समृद्धि होने वाली है।"
युधिष्ठिर! तदनन्तर सभी ब्राह्मण वहाँ आग जलाकर राजा द्युमत्सेन के पास बैठ गये। शैब्या, सत्यवान तथा सावित्री—ये तीनों भी एक ओर खड़े थे, जो उन सब महात्माओं की आज्ञा पाकर शोकरहित हो बैठे। तत्पश्चात् वनवासी ऋषि राजा के साथ बैठे हुए कौतूहलवश राजकुमार सत्यवान से पूछने लगे।
ऋषि बोले—"राजकुमार! तुम अपनी पत्नी के साथ पहले ही क्यों नहीं चले आये? क्यों इतनी रात बिताकर आये? तुम्हारे सामने कौन-सी अड़चन आ गयी थी? राजपुत्र! तुमने आने में विलम्ब करके अपने माता-पिता तथा हमलोगों को भी भारी सन्ताप में डाल दिया था। तुमने ऐसा क्यों किया? यह हम नहीं जान पाते हैं, अतः सब बातें स्पष्ट रूप से बताओ।"
सत्यवान बोला—"मैं पिता की आज्ञा पाकर सावित्री के साथ वन में गया। फिर वन में लकड़ियों को चीरते समय मेरे सिर में बड़े जोर से दर्द होने लगा। मैं समझता हूँ कि मैं वेदना से व्याकुल होकर देर तक सोता रह गया। उतने समय तक मैं उसके पहले कभी नहीं सोया था। नींद खुलने पर मैं इतनी रात के बाद भी इसलिये चला आया कि आप सब लोगों को मेरे लिये चिन्तित न होना पड़े। इस विलम्ब में और कोई कारण नहीं है।"
गौतम ऋषि ने कहा—"तुम्हारे पिता द्युमत्सेन को जो सहसा नेत्रों की प्राप्ति हुई है, इसका कारण तुम नहीं जानते। सम्भवतः सावित्री बता सकती है। सावित्री! मैं इसका रहस्य तुमसे सुनना चाहता हूँ; क्योंकि तुम भूत और भविष्य सब कुछ जानती हो। मैं तुम्हें साक्षात् सावित्री देवी के समान तेजस्विनी जानता हूँ। राजा को जो सहसा नेत्रों की प्राप्ति हुई है, इसका कारण तुम जानती हो। सच-सच बताओ, यदि इसमें कुछ छिपाने की बात न हो तो हमसे अवश्य कहो।"
श्रोतुमिच्छामि सावित्रि त्वं हि वेत्थ परावरम् ।
त्वां हि जानामि सावित्रि सावित्रीमिव तेजसा ॥
त्वमत्र हेतुं जानीषे तस्मात् सत्यं निरूच्यताम् ।
रहस्यं यदि ते नास्ति किंचिदत्र वदस्व नः ॥
सावित्री! मैं इसका रहस्य तुमसे सुनना चाहता हूँ; क्योंकि तुम भूत और भविष्य सब कुछ जानती हो । मैं तुम्हें साक्षात् सावित्रीदेवीके समान तेजस्विनी जानता हूँ । राजाको जो सहसा नेत्रोंकी प्राप्ति हुई है, इसका कारण तुम जानती हो । सच-सच बताओ, यदि इसमें कुछ छिपानेकी बात न हो तो हमसे अवश्य कहो ।
सावित्री बोली—"मुनीश्वरो! आप लोग जैसा समझते हैं, ठीक है। आप लोगों का सङ्कल्प अन्यथा नहीं हो सकता। मेरे लिये कोई छिपाने की बात नहीं है। मैं सब घटनाएँ ठीक-ठीक बताती हूँ, सुनिये। महात्मा नारद जी ने मुझसे मेरे पति की मृत्यु का हाल बताया था। वह मृत्यु दिवस आज ही आया था; इसलिये मैं इन्हें अकेला नहीं छोड़ती थी। जब ये सिर के दर्द से व्याकुल होकर सो गये, उस समय साक्षात् भगवान यमराज अपने सेवक के साथ पधारे। वे इन्हें बाँधकर दक्षिण दिशा की ओर ले चले। उस समय मैंने सत्यवचनों द्वारा उन भगवान यम की स्तुति की। तब उन्होंने मुझे पाँच वर दिये। उन वरों को आप मुझसे सुनिये। नेत्र तथा अपने राज्य की प्राप्ति—ये दो वर मेरे श्वशुर के लिये प्राप्त हुए हैं। इसके सिवा मैंने अपने पिता के लिये सौ पुत्र तथा अपने लिये भी सौ पुत्र होने के दो वर और पाये हैं। पाँचवें वर के रूप में मुझे मेरे पति सत्यवान चार सौ वर्षों की आयु लेकर प्राप्त हुए हैं। पति के जीवन की रक्षा के लिये ही मैंने यह व्रत किया था। इस प्रकार मैंने आप लोगों से विलम्ब से आने का कारण और उसका यथावत् वृत्तान्त विस्तारपूर्वक बताया है। मुझे जो यह महान दुःख उठाना पड़ा है, उसका अन्तिम फल सुख ही हुआ है।"
ऋषि बोले—"पतिव्रते! राजा द्युमत्सेन का कुल भाँति-भाँति की विपत्तियों से ग्रस्त होकर दुःख के अन्धकारमय गढ़े में डूबा जा रहा था; परन्तु तुझ जैसी सुशीला, व्रतपरायणा और पवित्र आचरण वाली कुलीन वधू ने आकर इसका उद्धार कर दिया।"
मार्कण्डेयजी कहते हैं—"युधिष्ठिर! इस प्रकार वहाँ आये हुए महर्षियों ने स्त्रियों में श्रेष्ठ सावित्री की भूरि-भूरि प्रशंसा तथा आदर-सत्कार करके पुत्र सहित राजा द्युमत्सेन की अनुमति ले सुख और प्रसन्नता के साथ अपने-अपने घर को प्रस्थान किया। जब वह रात बीत गयी और सूर्यमण्डल का उदय हुआ, उस समय सब तपोधन ऋषिगण पूर्वाह्णकाल का नित्यकृत्य पूरा कर पुनः उसी आश्रम में एकत्र हुए। वे महर्षिगण राजा द्युमत्सेन से सावित्री के उस परम सौभाग्य का बारम्बार वर्णन करते हुए भी तृप्त नहीं होते थे।"
तभी शाल्वे देश से प्रजाएँ वहाँ आकर कहने लगीं—"प्रभो! आपका शत्रु अपने ही मन्त्री के हाथों मारा गया है। उसके सहायक और बन्धु-बान्धव भी मन्त्री के ही हाथों मर चुके हैं। शत्रु की सारी सेना पलायन कर गयी है। यह यथावत् वृत्तान्त सुनकर सब लोगों का एकमत से यह निश्चय हुआ है कि हमें पूर्व नरेश पर ही विश्वास है। उन्हें दिखायी देता हो या न दीखता हो, वे ही हमारे राजा हों। नरेश्वर! ऐसा निश्चय करके ही हमें यहाँ भेजा गया है। ये सवारियाँ प्रस्तुत हैं और आपकी चतुरङ्गिणी सेना भी सेवा में उपस्थित है। राजन्! आपका कल्याण हो। अब अपने राज्य में पधारिये। नगर में आपकी विजय घोषित कर दी गयी है। आप दीर्घकाल तक अपने बाप-दादों के राज्य पर प्रतिष्ठित रहें।"
राजा द्युमत्सेन को नेत्रयुक्त और स्वस्थ शरीर से सुशोभित देखकर उन सबके नेत्र आश्चर्य से खिल उठे और सबने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। इसके बाद राजा ने आश्रम में रहने वाले उन वृद्ध ब्राह्मणों का अभिवादन किया और उन सबसे समादृत हो वे अपनी राजधानी की ओर चले। शैब्या भी अपनी बहू सावित्री के साथ सुन्दर बिछावन से युक्त तेजस्वी शिबिका पर, जिसे कई कहार ढो रहे थे, आरूढ़ होकर सेना से घिरी हुई चल दी।
वहाँ पहुँचने पर पुरोहितों ने बड़ी प्रसन्नता के साथ द्युमत्सेन का राज्याभिषेक किया। साथ ही उनके महामना पुत्र सत्यवान को भी युवराज के पद पर अभिषिक्त कर दिया। तदनन्तर दीर्घकाल के पश्चात् सावित्री के गर्भ से उसकी कीर्ति बढ़ाने वाले सौ पुत्र उत्पन्न हुए। वे सब के सब शूरवीर तथा सङ्ग्राम में कभी पीछे न हटने वाले थे। इसी प्रकार मद्रराज अश्वपति के भी मालवी के गर्भ से सावित्री के सौ सहोदर भाई उत्पन्न हुए, जो अत्यन्त बलशाली थे।
इस तरह सावित्री ने अपने आपको, पिता-माता को, सास-ससुर को तथा पति के समस्त कुल को भी भारी सङ्कट से बचा लिया था। सावित्री की ही भाँति यह कल्याणमयी उत्तम कुल वाली सुशीला द्रौपदी तुम सब लोगों का महान सङ्कट से उद्धार करेगी।
तथैवैषा हि कल्याणी द्रौपदी शीलसम्मता ।
तारयिष्यति वः सर्वान् सावित्रीव कुलाङ्गना ॥
सावित्रीकी ही भाँति यह कल्याणमयी उत्तम कुलवाली सुशीला द्रौपदी तुम सब लोगोंका महान् संकटसे उद्धार करेगी ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—"जनमेजय! इस प्रकार उन महात्मा मार्कण्डेय जी के समझाने-बुझाने और आश्वासन देने पर उस समय पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिर शोक तथा चिन्ता से रहित होकर काम्यकवन में सुखपूर्वक रहने लगे। जो इस परम उत्तम सावित्री-उपाख्यान को भक्तिभाव से सुनेगा, वह मनुष्य सदा समस्त मनोरथों के सिद्ध होने से सुखी होगा और कभी दुःख नहीं पायेगा।"
यश्चेदं शृणुयाद् भक्त्या सावित्र्याख्यानमुत्तमम् ।
स सुखी सर्वसिद्धार्थो न दुःखं प्राप्नुयान्नरः ॥
जो इस परम उत्तम सावित्री - उपाख्यानको भक्तिभावसे सुनेगा, वह मनुष्य सदा अ समस्त मनोरथोंके सिद्ध होनेसे सुखी होगा और कभी दुःख नहीं पायेगा ।
In English
The Story of Savitri and Satyavan
King Ashvapati performs a long penance to receive a daughter, and Savitri is born. After Savitri chooses Satyavan as her husband, Narada warns that Satyavan will die within a year. Despite this, Savitri remains firm in her decision to marry him.
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