गालवचरित : अहङ्कार और हठ किस प्रकार मनुष्य के अर्जित पुण्य का विनाश कर देते हैं?
अभिमानी अहङ्कार का पतन
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ३ · उद्योगपर्व → भगवद्यानपर्व · अध्याय 106–123 · पृष्ठ 737–808
8,085 शब्द · 41 मिनटका पाठ · 40 श्लोक
नारद ने जनमेजय से कहा
दुर्योधन को सुहृदों के उपदेश सुनने और हठ त्यागने की प्रेरणा देने हेतु।
जनमेजय ने कहा – भगवन्! दुर्योधन का अनर्थकारी कार्यों में ही अधिक आग्रह था। पराये धन के प्रति अधिक लोभ रखने के कारण वह मोहित हो गया था। दुर्जनों में ही उसका अनुराग था। उसने मरने का ही निश्चय कर लिया था। वह कुटुम्बीजनों के लिये दुःख-दायक और भाई-बन्धुओं के शोक को बढ़ाने वाला था। सुहृदों को क्लेश पहुँचाता और शत्रुओं का हर्ष बढ़ाता था। ऐसे कुमार्ग पर चलने वाले इस दुर्योधन को उसके भाई-बन्धु रोकते क्यों नहीं थे? कोई सुहृद्, स्नेही अथवा पितामह भगवान् व्यास उसे सौहार्दवश मना क्यों नहीं करते थे?
अनर्थे जातनिर्बन्धं परार्थे लोभमोहितम् ।
अनार्यकेष्वभिरतं मरणे कृतनिश्चयम् ॥
ज्ञातीनां दुःखकर्तारं बन्धूनां शोकवर्धनम् ।
सुहृदां क्लेशदातारं द्विषतां हर्षवर्धनम् ॥
कथं नैनं विमार्गस्थं वारयन्तीह बान्धवाः ।
सौहृदाद् वा सुहृत् स्निग्धो भगवान् वा पितामहः ॥
जनमेजयने कहा – भगवन्! दुर्योधनका अनर्थकारी कार्योंमें ही अधिक आग्रह था । पराये धनके प्रति अधिक लोभ रखनेके कारण वह मोहित हो गया था । दुर्जनोंमें ही उसका अनुराग था । उसने मरनेका ही निश्चय कर लिया था । वह कुटुम्बीजनोंके लिये दुःख-दायक और भाई - बन्धुओंके शोकको बढ़ानेवाला था। सुहृदोंको क्लेश पहुँचाता और शत्रुओंका हर्ष बढ़ाता था । ऐसे कुमार्गपर चलनेवाले इस दुर्योधनको उसके भाई- बन्धु रोकते क्यों नहीं थे? कोई सुहृद्, स्नेही अथवा पितामह भगवान् व्यास उसे सौहार्दवश मना क्यों नहीं करते थे?
वैशम्पायनजी बोले – राजन्! भगवान् वेदव्यास ने भी दुर्योधन से उसके हित की बात कही। भीष्मजी ने भी जो उचित कर्तव्य था, वह बताया। इसके सिवा नारदजी ने भी नाना प्रकार के उपदेश दिये। वह सब तुम सुनो।
उक्तं भगवता वाक्यमुक्तं भीष्मेण यत् क्षमम् ।
उक्तं बहुविधं चैव नारदेनापि तच्छृणु ॥
वैशम्पायनजी बोले – राजन्! भगवान् वेदव्यासने भी दुर्योधनसे उसके हितकी बात कही । भीष्मजीने भी जो उचित कर्तव्य था, वह बताया । इसके सिवा नारदजीने भी नाना प्रकारके उपदेश दिये । वह सब तुम सुनो ।
नारदजी ने कहा— अकारण हित चाहने वाले सुहृद् की बातों को जो मन लगाकर सुने, ऐसा श्रोता दुर्लभ है। हितैषी सुहृद् भी दुर्लभ ही है; क्योंकि महान् सङ्कट में सुहृद् ही खड़ा हो सकता है, वहाँ भाई-बन्धु नहीं ठहर सकते। कुरुनन्दन! मैं देखता हूँ कि तुम्हें अपने सुहृदों के उपदेश को सुनने की विशेष आवश्यकता है; अतः तुम्हें किसी एक बात का दुराग्रह नहीं रखना चाहिये। आग्रह का परिणाम बड़ा भयङ्कर होता है। इस विषय में विज्ञ पुरुष इस पुरातन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं, जिससे ज्ञात होता है कि महर्षि गालव ने हठ या दुराग्रह के कारण पराजय प्राप्त की थी।
श्रोतव्यमपि पश्यामि सुहृदां कुरुनन्दन ।
न कर्तव्यश्च निर्बन्धो निर्बन्धो हि सुदारुणः ॥
कुरुनन्दन! मैं देखता हूँ कि तुम्हें अपने सुहृदोंके उपदेशको सुननेकी विशेष आवश्यकता है; अतः तुम्हें किसी एक बातका दुराग्रह नहीं रखना चाहिये । आग्रहका परिणाम बड़ा भयंकर होता है ।
पहले की बात है, साक्षात् धर्मराज महर्षि भगवान् वसिष्ठ का रूप धारण करके, तपस्या में लगे हुए विश्वामित्र के पास उनकी परीक्षा लेने के लिये आये। वे भूख से पीड़ित थे और भोजन की इच्छा लेकर विश्वामित्र के आश्रम पर पहुँचे। विश्वामित्रजी ने बड़ी उतावली के साथ उनके लिये उत्तम भोजन देने की इच्छा से यत्नपूर्वक चरुपाक बनाना आरम्भ किया; परन्तु ये अतिथिदेवता उनकी प्रतीक्षा न कर सके। उन्होंने जब दूसरे तपस्वी मुनियों का दिया हुआ अन्न खा लिया, तब विश्वामित्रजी भी अत्यन्त उष्ण भोजन लेकर उनकी सेवा में उपस्थित हुए। उस समय भगवान् धर्म ने यह कहकर कि "मैंने भोजन कर लिया, अब तुम रहने दो", वहाँ से प्रस्थान किया।
सप्तर्षीणामन्यतमं वेषमास्थाय भारत ।
बुभुक्षुः क्षुभितो राजन्नाश्रमं कौशिकस्य तु ॥
भारत! धर्म सप्तर्षियोंमेंसे एक ( वसिष्ठजी )) -- का वेष धारण करके भूखसे पीड़ित हो भोजनकी इच्छासे विश्वामित्रके आश्रमपर आये ।
महातेजस्वी विश्वामित्र मुनि वहीं उसी अवस्थामें खड़े रह गये। उन्होंने कठोर व्रत का पालन करते हुए दोनों हाथों से उस भोजनपात्र को थामकर माथे पर रख लिया और आश्रम के समीप ही ठूंठे पेड़ की भाँति निश्चेष्ट खड़े रहे। उस अवस्था में केवल वायु ही उनका आहार था। उन दिनों गालव मुनि उनकी प्रसन्नता के लिये यत्नपूर्वक उनकी सेवा-शुश्रूषा में लगे रहते थे।
बहुवर्षसहस्रान्तं प्रजापालनवर्धितम् ।
अनेकक्रतुदानौघैर्यत् त्वयोपार्जितं फलम् ॥
तदनेनैव दोषेण क्षीणं येनासि पातितः ।
अभिमानेन राजेन्द्र धिक्कृतः स्वर्गवासिभिः ॥
ब्रह्माजी बोले – राजेन्द्र! तुमने कई हजार वर्षोंतक अनेकानेक यज्ञों और दानोंके द्वारा जिस पुण्यफलका उपार्जन किया और प्रजापालनरूपी धर्मके द्वारा जिसे उत्तरोत्तर बढ़ाया, वह सब इस अभिमानरूपी दोषके कारण ही नष्ट हो गया था, जिससे तुम नीचे गिराये गये । तुम्हारे अभिमानके ही कारण स्वर्गलोकके निवासियोंने तुम्हें धिक्कार दिया था ।
तदनन्तर सौ वर्ष पूर्ण होने पर पुनः धर्मदेव वसिष्ठ मुनियों का वेष धारण करके भोजन की इच्छा से विश्वामित्र के पास आये। उन्होंने देखा कि परम बुद्धिमान् महर्षि विश्वामित्र केवल वायु पीकर रहते हुए सिर पर भोजनपात्र रखे खड़े हैं। यह देखकर धर्म ने वह भोजन ले लिया। वह अन्न उसी प्रकार तुरन्त की तैयार की हुई रसोई के समान गरम था। उसे खाकर वे बोले— "ब्रह्मर्षे! मैं आप पर बहुत प्रसन्न हूँ।" ऐसा कहकर मुनिवेषधारी धर्मदेव चले गये। क्षत्रियत्व से ऊँचे उठकर ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए विश्वामित्र को उस समय बड़ी प्रसन्नता हुई।
क्षत्रभावादपगतो ब्राह्मणत्वमुपागतः ।
धर्मस्य वचनात् प्रीतो विश्वामित्रस्तदाभवत् ॥
क्षत्रियत्वसे ऊँचे उठकर ब्राह्मणत्वको प्राप्त हुए विश्वामित्रको धर्मके वचनसे उस समय बड़ी प्रसन्नता हुई ।
गालव ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए मधुर वाणी में महातेजस्वी विश्वामित्र से पूछा— "भगवन्! मैं आपको गुरुदक्षिणा के रूप में क्या दूँ? मानद! दक्षिणा युक्त कर्म ही सफल होता है। दक्षिणा देने वाले पुरुष को ही सिद्धि प्राप्त होती है। स्वर्गे क्रतुफल तद्धि दक्षिणा शान्तिरुच्यते। किमाहरामि गुर्वर्थं ब्रवीतु भगवानिति— अर्थात् पूज्य गुरुदेव! बतावें कि मैं क्या गुरुदक्षिणा ले आऊँ?"
पुनस्त्वयैव राजर्षे सुकृतेन विघातितम् ।
आवृतं तमसा चेतः सर्वेषां स्वर्गवासिनाम् ॥
येन त्वां नाभिजानन्ति ततोऽज्ञातोऽसि पातितः ।
प्रीत्यैव चासि दौहित्रैस्तारितस्त्वमिहागतः ॥
‘ राजर्षे! फिर तुम्हींने ‘ अभिमानपूर्ण बर्तावसे ' अपने पुण्यका नाश किया था । उस समय समस्त स्वर्गवासियोंका चित्त तमोगुणसे व्याप्त हो गया था, जिससे वे तुम्हें नहीं जानते या नहीं पहचानते थे; अतः सबके लिये अज्ञात होनेके कारण तुम स्वर्गसे नीचे गिरा दिये गये । फिर तुम्हारे दौहित्रोंने प्रेमपूर्वक तुम्हें तार दिया है, जिससे तुम पुनः यहाँ आ गये हो ।
गालव की सेवा-शुश्रूषा से विश्वामित्र उनके वश में हो गये थे। उन्होंने बार-बार कहा— "जाओ, जाओ।" परन्तु गालव ने अनेक बार आग्रहपूर्वक पूछा— "मैं आपको क्या गुरुदक्षिणा दूँ?" तपस्वी गालव के इस अनवरत आग्रह को देखकर विश्वामित्र को कुछ क्रोध आ गया। उन्होंने कहा— "गालव! तुम मुझे चन्द्रमा के समान श्वेत रङ्गवाले ऐसे आठ सौ घोड़े दो, जिनके कान एक ओर से श्याम वर्ण के हों। जाओ, देर न करो!"
एवमुक्तस्तदा तेन विश्वामित्रेण धीमता ।
नास्ते न शेते नाहारं कुरुते गालवस्तदा ॥
नारदजीने कहा — राजन्! उस समय परम बुद्धिमान् विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर गालव मुनि तबसे न कहीं बैठते, न सोते और न भोजन ही करते थे ।
नारदजी ने कहा — राजन्! उस समय परम बुद्धिमान् विश्वामित्र के ऐसा कहने पर गालव मुनि अत्यन्त शोक और चिन्ता में डूब गये। वे पाण्डुवर्ण के हो गये और उनके शरीर में केवल अस्थि-चर्म ही शेष रह गये थे। दुःखी गालव विलाप करने लगे— "मेरे ऐसे मित्र कहाँ, जो धन से पुष्ट हों? मुझे कहाँ से चन्द्रमा के समान श्वेत वर्णवाले आठ सौ घोड़े प्राप्त होंगे? इस जीवन से मुझे क्या प्रयोजन है? मैं पापी, कृतघ्न और मिथ्यावादी हूँ, जिसने गुरु से तो अपना काम करा लिया, परन्तु स्वयं जो उन्हें देने की प्रतिज्ञा की है, उसकी पूर्ति नहीं कर पा रहा हूँ। अतः मैं कोई उत्तम प्रयत्न करके अपने प्राणों का परित्याग कर दूँगा। अब मैं त्रिभुवन के स्वामी और समस्त जीवों के सर्वश्रेष्ठ आश्रय भगवान् विष्णु की शरण में जाता हूँ। उन्हीं अविनाशी योगी भगवान् विष्णु का मैं प्रणतभाव से दर्शन करना चाहता हूँ।"
सोऽहं पापः कृतघ्नश्च कृपणश्चानृतोऽपि च ।
गुरोर्यः कृतकार्यः संस्तत् करोमि न भाषितम् ॥
‘ मैं पापी, कृतघ्न, कृपण और मिथ्यावादी हूँ, जिसने गुरुसे तो अपना काम करा लिया, परंतु स्वयं जो उन्हें देनेकी प्रतिज्ञा की है, उसकी पूर्ति नहीं कर पा रहा हूँ ।
गालव के इस विलाप को सुनकर उनके सखा विनतानन्दन गरुड़ अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन दिए। गरुड़ ने कहा— "गालव! तुम मेरे प्रिय सुहृद् हो। मेरे सबसे बड़े वैभव हैं इन्द्र के छोटे भाई भगवान् विष्णु। मैंने पहले तुम्हारे लिये उनसे निवेदन किया था और उन्होंने मेरी प्रार्थना स्वीकार कर मेरा मनोरथ पूर्ण किया था। अनादिदेव भगवान् विष्णु ने मुझे आज्ञा दी है कि मैं तुम्हारी सहायता करूँ। बताओ, मैं सबसे पहले किस दिशा की ओर चलूँ?"
अहं तु विबुधश्रेष्ठं देवं त्रिभुवनेश्वरम् ।
विष्णुं गच्छाम्यहं कृष्णं गतिं गतिमतां वरम् ॥
‘ अब मैं त्रिभुवनके स्वामी एवं जंगम जीवोंके सर्वश्रेष्ठ आश्रय सुरश्रेष्ठ सच्चिदानन्दघन भगवान् विष्णुकी शरणमें जाता हूँ ।
गालव ने पूछा तो गरुड़ ने दिशाओं का वर्णन करना आरम्भ किया। उन्होंने बताया कि पूर्व दिशा देवताओं के लक्ष्मी का मूलस्थान है। इसी दिशा में इन्द्र का प्रथम अभिषेक हुआ और यहीं पर पुरातन महर्षि वसिष्ठ की उत्पत्ति हुई। इस दिशा को 'पूर्वा' कहा जाता है क्योंकि यह देवताओं से आवृत थी। गरुड़ ने गालव को बताया कि इसी दिशा में सूर्यदेव ने महर्षि याज्ञवल्क्य को मन्त्र दिये थे और यहीं यज्ञों के सोमरस का पान किया जाता है।
अनुशिष्टोऽस्मि देवेन गालवाज्ञातयोनिना ।
ब्रूहि कामं तु कां यामि द्रष्टुं प्रथमतो दिशम् ॥
गरुड़ने कहा — गालव! अनादिदेव भगवान् विष्णुने मुझे आज्ञा दी है कि मैं तुम्हारी सहायता करूँ । अतः तुम अपनी इच्छाके अनुसार बताओ कि मैं सबसे पहले किस दिशाकी ओर चलूँ?
गरुड़ ने गालव को दिशाओं का ज्ञान देते हुए कहा—"गालव! यह पूर्व दिग्विभाग ही त्रिलोकी का, स्वर्ग का और सुख का द्वार है। इस दिशा में वेदों की सहस्रों शाखाएँ प्रकट हुई हैं और यहीं महर्षिगण हविष्य के धूमका पान करते हैं। देवराज इन्द्र ने यज्ञ भाग की सिद्धि के लिए इसी दिशा में जङ्गली सूतादि हिंसक पशुओं को प्रोक्षित कर देवताओं को सौंपा था। यहाँ उदित होने वाले भगवान सूर्य कृतघ्न मनुष्यों और असुरों का क्रोधपूर्वक विनाश कर देते हैं।"
एतद् द्वारं त्रिलोकस्य स्वर्गस्य च सुखस्य च ।
एष पूर्वो दिशां भागो विशावोऽत्र यदीच्छसि ॥
गालव! यह पूर्व दिग्विभाग ही त्रिलोकीका, स्वर्गका और सुखका भी द्वार है । तुम्हारी इच्छा हो तो हम दोनों इसमें प्रवेश करें ।
गरुड़ आगे बोले—"गालव! यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो हम दोनों इस दिशा में प्रवेश करें। मैं जिनकी आज्ञा के अधीन हूँ, उन भगवान विष्णु का प्रिय कार्य मुझे अवश्य करना है। क्या तुम पूर्व दिशा में चलना चाहते हो अथवा दूसरी दिशा का वर्णन सुनोगे?"
गालव ने गरुड़ की बातें सुनीं और वे दक्षिण दिशा की ओर मुड़े। गरुड़ ने उस मार्ग का विस्तार करते हुए कहा—"गालव! पूर्वकाल में भगवान सूर्य ने वेदोक्त विधि से यज्ञ करके आचार्य कश्यप को दक्षिणा स्वरूप इस दिशा का दान किया था, इसीलिए इसे दक्षिण दिशा कहते हैं। यहाँ तीनों लोकों के पितृगण प्रतिष्ठित हैं और 'ऊष्मप' नामक देवताओं का निवास है। पितरों के साथ विश्वेदेवगण सदा दक्षिण दिशा में वास करते हैं।"
गरुड़ ने मार्ग की गम्भीरता बताते हुए कहा—"विप्रवर! विद्वान पुरुष इस दक्षिण दिशा को धर्म-देवता का दूसरा द्वार कहते हैं। यहीं चित्रगुप्त आदि सूक्ष्म कालांशों पर दृष्टि रखते हुए प्राणियों की आयु की गणना करते हैं। मृत्यु के पश्चात सभी प्राणियों को इसी दिशा में जाना पड़ता है। यह दिशा सदा अज्ञानान्धकार से आवृत रहती है, इसलिए यहाँ सुखपूर्वक यात्रा सम्भव नहीं होती। ब्रह्माजी ने इस दिशा में प्रतिकूल स्वभाव वाले सहस्रों राक्षसों की सृष्टि की है, जिनका दर्शन केवल अशुद्ध अन्तःकरण वाले पुरुषों को ही होता है।"
नैर्ऋतानां सहस्राणि बहून्यत्र द्विजर्षभ ।
सृष्टानि प्रतिकूलानि द्रष्टव्यान्यकृतात्मभिः ॥
द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्माजीने इस दिशामें प्रतिकूल स्वभाव एवं आचरणवाले सहस्रों राक्षसोंकी सृष्टि की है, जिनका दर्शन अशुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुषोंको ही होता है ।
गरुड़ ने कथा जारी रखी—"ब्रह्मन्! इसी दिशा में गन्धर्वगण मन्दराचल के कुञ्जों में मन और बुद्धि को आकर्षित करने वाली गाथाओं का गान करते हैं। पूर्वकाल में यहीं राजा रैवत गाथाएं सुनते-सुनते अपनी स्त्री, मन्त्री और राज्य से वियुक्त होकर वन में चले गए थे। यहाँ सावर्णि मनु ने सूर्य की गति के लिए मर्यादा स्थापित की थी। इसी दिशा में तपस्या करके राक्षसराज रावण ने देवताओं से अवध्य होने का वरदान प्राप्त किया था। दक्षिण दिशा में ही आकर सबके प्राण पाँच भागों में बँट जाते हैं और यहीं वह वैतरणी नदी है, जो पापियों को घेरे रहती है।"
गरुड़ ने आगे कहा—"मनुष्य इसी दिशा में जाकर सुख और दुःख के अन्त को प्राप्त होता है। पूर्वकाल की बात है गालव! मैं भूख से पीड़ित होकर चिन्ता में था, परन्तु इसी दिशा में आने पर मुझे दो विशाल प्राणी—हाथी और कछुआ मिले जो आपस में लड़ रहे थे। यहाँ सूर्य के समान तेजस्वी महर्षि कर्दम से उत्पन्न 'चक्रधनु' नामक महर्षि रहते थे, जिन्हें सब कपिलदेव कहते हैं। इसी दिशा में कुछ सिद्ध ब्राह्मण भी रहते थे जिन्होंने वेदों के अध्ययन से अक्षय मोक्ष प्राप्त कर लिया।"
अत्राहं गालव पुरा क्षुधार्तः परिचिन्तयन् ॥
लब्धवान् युध्यमानौ द्वौ बृहन्तौ गजकच्छपौ । गालव! पूर्वकालकी बात है, मैं भूखसे पीड़ित होकर भारी चिन्तामें पड़ गया था, परंतु इसी दिशामें आनेपर दो विशाल प्राणी- हाथी और कछुआ मेरे हाथ लग गये, जो आपसमें लड़ रहे थे ।
गरुड़ ने मार्ग की विचित्रता बताते हुए कहा—"दक्षिण में ही वासुकि द्वारा पालित और तक्षक एवं ऐरावत नाग द्वारा सुरक्षित 'भोगवती' नामक पुरी है। मृत्यु के पश्चात यहाँ आने वाले प्राणी को ऐसे घोर अन्धकार का सामना करना पड़ता है जो साक्षात् अग्नि और सूर्य के लिए भी अभेद्य है। गालव! तुम मेरे द्वारा परिचर्या पाने के योग्य हो, अतः तुम्हें यह दक्षिण मार्ग बताया है। यदि इस दिशा में चलना हो तो मुझसे कहो, अन्यथा अब तीसरी पश्चिम दिशा का वर्णन सुनो।"
गालव ने पश्चिम दिशा की ओर दृष्टि डाली। गरुड़ बोले—"गालव! जो सामने की दिशा है, वह जल के स्वामी राजा वरुण को अत्यन्त प्रिय है। दिन के पश्चात् सूर्यदेव इसी दिशा में अपनी किरणों का विसर्जन करते हैं, इसलिए यह 'पश्चिम' कहलाती है। पूर्वकाल में भगवान कश्यप ने जल की रक्षा हेतु यहीं वरुण का अभिषेक किया था। चन्द्रमा भी इसी दिशा में आकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को नूतनता प्राप्त कर उदित होते हैं।"
गरुड़ ने आगे बताया—"इसी दिशा में वायुदेव ने युद्ध में दैत्यों को पराङ्मुख कर धराशायी किया था। यहाँ अस्ताचल पर्वत है जो सूर्यदेव को प्रतिदिन ग्रहण करता है। इसी दिशा से दिन के अन्त में रात्रि और निद्रा का प्राकट्य होता है। यहाँ हिमालय का मूल भाग मन्दराचल तक फैला है। पश्चिम दिशा में ही समुद्र के भीतर उस राहु का धड़ दिखाई देता है जो सूर्य और चन्द्रमा को मार डालने की इच्छा रखता है।"
गरुड़ ने गालव को मार्ग समझाते हुए कहा—"यहाँ सुवर्णशिरा नामक मुनि सामगान करते हैं। इसी दिशा में हरिमेधा मुनि की कन्या ध्वजवती निवास करती है। यहाँ वायु, अग्नि, जल और आकाश का स्पर्श सुखद रहता है। इस दिशा से ही उन नदियों का प्राकट्य हुआ है जो समुद्र को भरती हैं। गालव! मैंने तुम्हें सङ्क्षेप में पश्चिम का मार्ग बताया है। अब बताओ, तुम्हारा क्या विचार है? हम दोनों किस दिशा की ओर चलें?"
एष ते पश्चिमो मार्गो दिग्द्वारेण प्रकीर्तितः ।
ब्रूहि गालव गच्छावो बुद्धिः का द्विजसत्तम ॥
द्विजश्रेष्ठ गालव! इस प्रकार मैंने तुम्हें संक्षेपसे पश्चिमका मार्ग बताया है । अब बताओ, तुम्हारा क्या विचार है? हम दोनों किस दिशाकी ओर चलें?
गालव ने उत्तर दिशा की ओर सङ्केत किया। गरुड़ बोले—"गालव! इस मार्ग से जाने पर मनुष्य का पाप से उद्धार हो जाता है और वह स्वर्गीय सुख पाता है, इसीलिए इसे 'उत्तर' कहते हैं। यह दिशा सुवर्ण आदि निधियों की अधिष्ठान है। यहाँ बदरिकाश्रम है जहाँ श्री नारायण और सनातन ब्रह्माजी निवास करते हैं। हिमालय के शिखर पर भगवान महेश्वर भगवती उमा के साथ नित्य निवास करते हैं। वे केवल उन लोगों को दिखाई देते हैं जो साक्षात् भगवान विष्णु के उपासक हों।"
गरुड़ ने आगे कहा—"उत्तर दिशा में ही चन्द्रमा का अभिषेक हुआ था और यहीं से आकाश से गिरती गङ्गा को महादेव ने अपने मस्तक पर धारण कर मनुष्य लोक में छोड़ा। इसी दिशा में पार्वती देवी ने कठोर तपस्या की थी। गालव! इसी दिशा में कुबेर का अभिषेक हुआ था। यहाँ रमणीय चैत्ररथवन और वैखानस ऋषियों के आश्रम हैं। यहाँ कल्पवृक्ष शोभा पाते हैं और सिद्ध जन अपनी इच्छानुसार विमानों में विचरते हैं।"
गरुड़ ने मार्ग का अन्तिम भाग बताते हुए कहा—"यहाँ अरुन्धती देवी और सप्तर्षि प्रकाशित होते हैं। ब्रह्माजी भी यहीं नियमित रूप से निवास करते हैं। 'धाम' नामक सत्यवादी महात्मा यहाँ की रक्षा करते हैं। गालव! मनुष्य जैसे-जैसे गङ्गामहाद्वार से आगे बढ़ता है, वह हिमराशि में गलता जाता है। साक्षात् भगवान नारायण को छोड़कर दूसरा कोई इस द्वार से आगे नहीं गया है। इसी दिशा में उशीरबीज नामक स्थान पर राजा मरुत्त ने यज्ञ किया था।"
तथा तथा द्विजश्रेष्ठ प्रविलीयति गालव ।
नैतत् केनचिदन्येन गतपूर्वं द्विजर्षभ ॥
ऋते नारायणं देवं नरं वा जिष्णुमव्ययम् ।
अत्र कैलासमित्युक्तं स्थानमैलविलस्य तत् ॥
द्विजश्रेष्ठ! मनुष्य ज्यों- ज्यों गंगामहाद्वारसे आगे बढ़ता है, वैसे - ही - वैसे वहाँकी हिमराशिमें गलता जाता है । विप्रवर गालव! साक्षात् भगवान् नारायण तथा विजयशील अविनाशी महात्मा नरको छोड़कर दूसरा कोई मनुष्य पहले कभी गंगामहाद्वारसे आगे नहीं गया है । इसी दिशामें कैलासपर्वत है, जो कुबेरका स्थान बताया गया है ।
ब्रह्मर्षि महात्मा जीमूत के समक्ष हिमालय की वह पवित्र एवं निर्मल स्वर्णनिधि प्रकट हुई थी, जो साक्षात् दैवीय वैभव से परिपूर्ण थी। उस विशाल धनराशिका को उन्होंने ब्राह्मणों में बाँटकर उसका सदुपयोग किया और फिर उन ब्राह्मणों से यह वर माँगा कि यह धन सदैव उनके नाम से प्रसिद्ध हो। इस कारण वह धन 'जैमूत' नाम से जाना जाने लगा।
ब्राह्मणेषु च यत् कृत्स्नं स्वन्तं कृत्वा धनं महत् ॥
वव्रे धनं महर्षिः स जैमूतं तद् धनं ततः । उस सम्पूर्ण विशाल धनराशिको उन्होंने ब्राह्मणोंमें बाँटकर उसका सदुपयोग किया और ब्राह्मणोंसे यह वर माँगा कि यह धन मेरे नामसे प्रसिद्ध हो । इस कारण वह धन ' जैमूत' नामसे प्रसिद्ध हुआ ।
"विप्रवर गालव! यहाँ प्रतिदिन सबेरे और सन्ध्या के समय सभी दिक्पाल एकत्र होकर उच्च स्वर में पूछते हैं— किसको क्या काम है?" गरुड़ ने दिशाओं का ज्ञान देते हुए पूछा।
गालव की जिज्ञासा पर उत्तर मिला— "इन समस्त कारणों से और अन्यान्य गुणों के कारण यह दिशा उत्कृष्ट है तथा समस्त शुभ कर्मों के लिए उत्तम मानी गई है। इसलिए इसे 'उत्तर' कहते हैं।"
गरुड़ ने विस्तारपूर्वक चारों दिशाओं का वर्णन करने के पश्चात कहा— "तात! मैंने इस प्रकार क्रमशः चारों दिशाओं का तुम्हारे सामने विस्तारपूर्वक वर्णन कर दिया है। अब कहो, तुम किस दिशा में चलना चाहते हो? मैं तुम्हें सम्पूर्ण पृथ्वी तथा समस्त दिशाओं का दर्शन कराने के लिए उद्यत हूँ; अतः तुम मेरी पीठ पर बैठ जाओ।"
उद्यतोऽहं द्विजश्रेष्ठ तव दर्शयितुं दिशः ।
पृथिवीं चाखिलां ब्रह्मंस्तस्मादारोह मां द्विज ॥
द्विजश्रेष्ठ! मैं तुम्हें सम्पूर्ण पृथ्वी तथा समस्त दिशाओंका दर्शन करानेके लिये उद्यत हूँ; अतः तुम मेरी पीठपर बैठ जाओ ।
गालव ने गरुड़ की ओर देखते हुए कहा— "गरुत्मन्! भुजगराजशत्रो! सुपर्ण! विनतानन्दन! तार्क्ष्य! तुम मुझे पूर्व दिशा की ओर ले चलो, जहाँ धर्म के नेत्रस्वरूप सूर्य और चन्द्रमा प्रकाशित होते हैं।"
नारदजी कहते हैं कि तब विनतानन्दन गरुड़ ने कहा— "तुम मेरे ऊपर चढ़ जाओ।" और गालव मुनि गरुड़ की पीठ पर विराजमान हो गए।
उड़ान शुरू होते ही गालव का अनुभव अद्भुत था। उन्होंने कहा— "सर्वभोजी गरुड़! पूर्वाह्नकाल में सहस्र किरणों से सुशोभित भुवनभास्कर सूर्य का स्वरूप जैसा दिखता है, आकाश में उड़ते समय तुम्हारा स्वरूप भी वैसा ही दृष्टिगोचर हो रहा है। हे खेचर! तुम्हारे पङ्खों की हवा से उखड़कर ये वृक्ष पीछे-पीछे चले आ रहे हैं; मैं इनकी इतनी तीव्र गति देख रहा हूँ, मानो ये भी हमारे साथ चलने के लिए प्रस्थित हुए हों।"
जैसे-जैसे वेग बढ़ा, गालव का विस्मय बढ़ता गया— "आकाशचारी गरुड़! तुम अपने पङ्खों के वेग से उठी हुई वायु द्वारा समुद्र की जलराशि, पर्वत, वन और काननों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी को अपनी ओर खींचते हुए प्रतीत होते हो। तुम्हारे पङ्खों के हिलने से उठती इस प्रचण्ड वायु के वेग से मत्स्य, जलहस्ती तथा मगरों सहित समुद्र का जल मानो आकाश में उछाल दिया जाता है! इन भीषण गर्जनाओं ने मेरे कान बहरे कर दिए हैं। मैं न तो कुछ सुन पा रहा हूँ, न देख पा रहा हूँ और न ही अपने बचाव का कोई उपाय समझ पा रहा हूँ।"
सङ्कट गहराता जा रहा था। गालव घबराकर बोले— "तात गरुड़! तुमसे कहीं ब्रह्महत्या न हो जाए, इसका ध्यान रखते हुए धीरे-धीरे चलो। मुझे इस समय न तो सूर्य दिख रहे हैं, न दिशाएँ सूझती हैं और न ही आकाश दृष्टिगोचर हो रहा है। मुझे केवल अन्धकार दिखाई दे रहा है। मैं तुम्हारे शरीर को भी नहीं देख पा रहा हूँ। हे अण्डज! तुम्हारी दोनों आँखें मुझे उत्तम जाति की दो मणियों के समान चमकती दिख रही हैं। मैं न तो अपने शरीर को देखता हूँ और न तुम्हारे। तुम्हारे अङ्गों से आग की लपटें उठती प्रतीत हो रही हैं!"
शनैः स तु भवान् यातु ब्रह्मवध्यामनुस्मरन् ।
न दृश्यते रविस्तात न दिशो न च खं खग ॥
तात गरुड़! तुमसे कहीं ब्रह्महत्या न हो जाय, इसका ध्यान रखते हुए धीरे - धीरे चलो । मुझे इस समय न तो सूर्य दिखायी देते हैं, न दिशाएँ सूझती हैं और न आकाश ही दृष्टिगोचर होता है ।
गालव ने व्याकुल होकर आग्रह किया— "विनतानन्दन! उस आग को सहसा बुझाकर पुनः अपने नेत्रों को शान्त करो और इस गति को रोको। इस यात्रा से मेरा कोई प्रयोजन नहीं है, अतः लौट चलो। महाभाग! मैं तुम्हारे इस वेग को सहन नहीं कर सकता। मैंने गुरु को ऐसे आठ सौ घोड़े देने की प्रतिज्ञा की है, जो चन्द्रमा के समान उज्ज्वल कान्ति वाले हों और जिनके कान एक ओर से श्याम रङ्ग के हों; किन्तु अण्डज! उन घोड़ों को प्राप्त करने का मुझे कोई मार्ग नहीं दिख रहा। इसलिए मैंने अपने जीवन के परित्याग का ही मार्ग चुना है। मेरे पास न थोड़ा भी धन है, न कोई धनी मित्र; यह कार्य प्रचुर धन व्यय करके भी सिद्ध नहीं हो सकता।"
नारदजी कहते हैं कि गालव के इन दीन वचनों को सुनकर गरुड़ ने उड़ते हुए ही हँसकर कहा— "ब्रह्मर्षे! यदि तुम अपने प्राणों का परित्याग करना चाहते हो, तो तुम बुद्धिमान नहीं हो; क्योंकि मृत्यु कृत्रिम नहीं होती, वह तो परमेश्वर का ही स्वरूप है। तुमने यह बात पहले क्यों नहीं कही? मेरी दृष्टि में एक महान उपाय है। गालव! समुद्र के निकट 'ऋषभ' नामक पर्वत है, वहाँ विश्राम और भोजन करके हम दोनों लौट चलेंगे।"
नातिप्रज्ञोऽसि विप्रर्षे योऽऽत्मानं त्यक्तुमिच्छसि ।
न चापि कृत्रिमः कालः कालो हि परमेश्वरः ॥
'ब्रह्मर्षे! यदि तुम अपने प्राणोंका परित्याग करना चाहते हो तो विशेष बुद्धिमान् नहीं हो; क्योंकि मृत्यु कृत्रिम नहीं होती (उसका अपनी इच्छासे निर्माण नहीं किया जा सकता ) । वह तो परमेश्वरका ही स्वरूप है ।
गालव और गरुड़ ऋषभ पर्वत पर उतरे। वहाँ उन्होंने एक तपस्विनी शाण्डिली को देखा। गरुड़ ने उन्हें प्रणाम किया और गालव ने उनका आदर-सम्मान किया। तपस्विनी ने उन्हें आसन दिया और 'बलि-मन्त्र' से अभिमन्त्रित सिद्ध अन्न अर्पण किया। उसे खाकर वे दोनों तृप्त हुए और भूमि पर ही सो गए। निद्रा के वश वे अचेत हो गए।
दो घड़ी बाद गरुड़ की नींद खुली। उन्होंने उठने का प्रयास किया, तो देखा कि उनके शरीर से पङ्ख गायब थे! वे मांस के लोँदे बन गए थे। यह देखकर गालव अत्यन्त उदास हुए और पूछा— "सखे! तुम्हें यहाँ आने का यह क्या फल मिला? इस अवस्था में हमें यहाँ कितने समय तक रहना पड़ेगा?"
गालव की चिन्ता देख गरुड़ ने कहा— "ब्रह्मन्! मैंने तो मन में यह सोचा था कि इस सिद्ध तपस्विनी को वहाँ पहुँचा दूँ, जहाँ प्रजापति ब्रह्मा, महादेव और सनातन भगवान विष्णु हैं; जहाँ धर्म और यज्ञ का निवास है। अतः मैं आपके चरणों में गिरकर प्रार्थना करता हूँ कि मेरा यह विचार आपके प्रिय होने के कारण ही था। यदि मेरे इस चिन्तन से आपको कष्ट हुआ हो, तो मुझे क्षमा कर दें।"
यह सुनकर तपस्विनी सन्तुष्ट हुईं और बोलीं— "सुपर्ण! घबराओ मत, तुम्हारे पङ्ख पुनः सुन्दर हो जाएंगे। वत्स! तुमने मेरी निन्दा की है, मैं निन्दा सहन नहीं करती। जो पापी मेरी निन्दा करता है, वह पुण्यलोकों से भ्रष्ट हो जाता है। मैंने इस सिद्धि को सदाचार से प्राप्त किया है। आचार ही धर्म को सफल बनाता है, आचार ही धन देता है और अशुभ लक्षणों का नाश करता है। अतः आयुष्मत्! अब तुम अपने अभीष्ट स्थान जाओ। आज से मेरी निन्दा मत करना; किसी भी स्त्री की निन्दा करना उचित नहीं है। अब तुम पुनः बलवान हो जाओगे।"
आचारः फलते धर्ममाचारः फलते धनम् ।
आचाराच्छ्रियमाप्नोति आचारो हन्त्यलक्षणम् ॥
‘ आचार ही धर्मको सफल बनाता है, आचार ही धनरूपी फल देता है, आचारसे मनुष्यको सम्पत्ति प्राप्त होती है और आचार ही अशुभ लक्षणोंका भी नाश कर देता है ।
शाण्डिली के इतना कहते ही गरुड़ के पङ्ख पहले से भी अधिक शक्तिशाली हो गए। वे आशीर्वाद लेकर वहाँ से चले गए, किन्तु गालव के बताए अनुसार उन्हें 'श्यामकर्ण' घोड़े प्राप्त नहीं हुए।
जब गालव मार्ग में आ रहे थे, तो विश्वामित्र जी ने उनका स्वागत किया और बोले— "ब्रह्मन्! तुमने जिस धन को देने की प्रतिज्ञा की थी, उसका समय आ गया है। तुम जैसा ठीक समझो, वैसा करो। मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ।"
गालव अत्यन्त दुखी थे। गरुड़ ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा— "द्विजश्रेष्ठ! विश्वामित्र जी ने जो कहा है, उस पर विचार करें। आपको अपने गुरु का ऋण चुकाना ही होगा।"
सुपर्णोऽथाब्रवीद् दीनं गालवं भृशदुःखितम् ।
प्रत्यक्षं खल्विदानीं मे विश्वामित्रो यदुक्तवान् ॥
तदागच्छ द्विजश्रेष्ठ मन्त्रयिष्याव गालव ।
नादत्त्वा गुरवे शक्यं कृत्स्नमर्थं त्वयाऽऽसितुम् ॥
तदनन्तर दीन और अत्यन्त दुःखी हुए गालव मुनिसे गरुड़ने कहा- ' द्विजश्रेष्ठ गालव! विश्वामित्रजीने मेरे सामने जो कुछ कहा है, आओ, उसके विषयमें हम दोनों सलाह करें । तुम्हें अपने गुरुको उनका सारा धन चुकाये बिना चुप नहीं बैठना चाहिये '
तदुपरान्त गरुड़ ने धन के विषय में ज्ञान देते हुए कहा— "पृथ्वी के भीतर जो सार है, उसे अग्नि ने बनाया है और वायु ने शुद्ध किया है; उस सुवर्ण को 'हिरण्य' कहते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् हिरण्यप्रधान है। पूर्वभाद्रपद और उत्तरभाद्रपद नक्षत्रों में शुक्रवार का योग हो, तो अग्निदेव कुबेर के लिए धन का निर्माण कर देते हैं। अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य और कुबेर इस धन की रक्षा करते हैं। बिना प्रारब्ध के यह धन प्राप्त नहीं होता, इसलिए बिना धन के तुम्हें श्यामकर्ण घोड़ों की प्राप्ति नहीं हो सकती।"
नित्यं प्रोष्ठपदाभ्यां च शुक्रे धनपतौ तथा ।
मनुष्येभ्यः समादत्ते शुक्रश्चित्तार्जितं धनम् ॥
अजैकपादहिर्बुध्न्यै रक्ष्यते धनदेन च ।
एवं न शक्यते लब्धुमलब्धव्यं द्विजर्षभ ।
ऋते च धनमश्वानां नावाप्तिर्विद्यते तव ॥
'द्विजश्रेष्ठ! पूर्वभाद्रपद और उत्तरभाद्रपद इन दो नक्षत्रोंमेंसे किसी एकके साथ शुक्रवारका योग हो तो अग्निदेव कुबेरके लिये अपने संकल्पसे धनका निर्माण करके उसे मनुष्योंको दे देते हैं । पूर्वभाद्रपदके देवता अजैकपाद, उत्तरभाद्रपदके देवता अहिर्बुध्न्य और कुबेर– ये तीनों उस धनकी रक्षा करते हैं । इस प्रकार किसीको भी ऐसा धन नहीं मिल सकता, जो प्रारब्धवश उसे मिलनेवाला न हो और धनके बिना तुम्हें श्यामकर्ण घोड़ोंकी प्राप्ति नहीं हो सकती ।
“इसलिये मेरी राय यह है कि तुम राजर्षियों के कुल में उत्पन्न हुए किसी ऐसे राजा के पास चलकर धन के लिये याचना करो, जो पुरवासियों को पीड़ा दिये बिना ही हम दोनों को धन देकर कृतार्थ कर सके।” गरुड़ ने गालव से कहा।
गालव ने विचार किया और बोले— “चन्द्रवंश में उत्पन्न एक राजा हैं, जो मेरे मित्र हैं। हम दोनों उन्हीं के पास चलें। इस भूतल पर उनके पास अवश्य ही धन है।”
गालव ने उत्तर दिया— “मेरे उन मित्र का नाम है राजर्षि ययाति, जो महाराज नहुष के पुत्र हैं। वे सत्यपराक्रमी वीर हैं। तुम्हारे माँगने और मेरे कहने पर वे स्वयं ही तुम्हें धन देंगे। उनके पास धनाध्यक्ष कुबेर की भाँति महान् वैभव रहा है। विद्वन्! इस प्रकार दान लेकर ही तुम गुरुदक्षिणा का ऋण चुका दो।”
इस प्रकार परस्पर बातें करते हुए और उचित कर्तव्य को मन ही मन सोचते हुए, वे दोनों प्रतिष्ठानपुर में राजा ययाति के दरबार में उपस्थित हुए। राजा ने उनका सत्कारपूर्वक श्रेष्ठ अर्घ्य-पाद्य आदि से किया। जब गरुड़ ने अपने आगमन का प्रयोजन बताया, तब उन्होंने कहा—
“नहुष नन्दन! ये तपोनिधि गालव मेरे मित्र हैं। राजन्! ये दस हजार वर्षों तक महर्षि विश्वामित्र के शिष्य रहे हैं। विश्वामित्र जी ने इनकी सेवा के बदले इनका उपकार करने की इच्छा से इन्हें घर जाने की आज्ञा दे दी। तब इन्होंने उनसे पूछा— 'भगवन्! मैं आपको क्या गुरुदक्षिणा दूँ?' इनके बार-बार आग्रह करने पर विश्वामित्र जी को कुछ क्रोध आ गया; अतः इनके पास धन का अभाव है, यह जानते हुए भी उन्होंने इनसे कहा— 'लाओ, गुरुदक्षिणा दो।' गालव! मुझे अच्छी जाति में उत्पन्न हुए ऐसे आठ सौ घोड़े दो, जिनकी अङ्ग-कान्ति चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हो और कान एक ओर से श्याम रङ्ग के हों। गालव! यदि तुम मेरी बात मानो तो यही गुरुदक्षिणा ला दो।”
अयमुक्तः प्रयच्छेति जानता विभवं लघु ॥
एकतः श्यामकर्णानां शुभ्राणां शुद्धजन्मनाम् ।
अष्टौ शतानि मे देहि हयानां चन्द्रवर्चसाम् ॥
गुर्वर्थो दीयतामेष यदि गालव मन्यसे ।
इत्येवमाह सक्रोधो विश्वामित्रस्तपोधनः ॥
‘ इनके बार- बार आग्रह करनेपर विश्वामित्रजीको कुछ क्रोध आ गया; अतः इनके पास धनका अभाव है, यह जानते हुए भी उन्होंने इनसे कहा– ' लाओ, गुरुदक्षिणा दो । गालव! मुझे अच्छी जातिमें उत्पन्न हुए ऐसे आठ सौ घोड़े दो, जिनकी अंगकान्ति चन्द्रमाके समान उज्ज्वल और कान एक ओरसे श्याम रंगके हों । गालव! यदि तुम मेरी बात मानो तो यही गुरुदक्षिणा ला दो । ' तपोधन विश्वामित्रने यह बात कुपित होकर ही कही थी ।
गरुड़ ने आगे कहा— “तपोधन विश्वामित्र ने यह बात कुपित होकर ही कही थी। अतः ये द्विजश्रेष्ठ गालव महान् शोक से सन्तप्त होकर गुरुदक्षिणा चुकाने में असमर्थ हो गये हैं और इसीलिये आपकी शरण में आये हैं। पुरुषसिंह! आपसे भिक्षा ग्रहण करके ये अपने गुरु को पूर्वोक्त धन देकर क्लेशरहित होकर महान् तप में संलग्न हो जायेंगे। अपनी तपस्या के एक अंश से ये आपको भी संयुक्त करेंगे। यद्यपि आप अपनी राजर्षि जनोचित तपस्या से पूर्ण हैं, तथापि ये अपने ब्राह्म तप से आपको और भी परिपूर्ण करेंगे। नरेश्वर! भूपाल! यहाँ दान किये हुए घोड़े के शरीर में जितने रोएँ होते हैं, दान करने वाले लोगों को परलोक में उतने ही घोड़े प्राप्त होते हैं। ये गालव दान लेने के सुयोग्य पात्र हैं और आप दान करने के श्रेष्ठ अधिकारी हैं। जैसे शङ्ख में दूध रखा गया हो, उसी प्रकार इनके हाथ में दिए हुए आपके इस दान की शोभा होगी।”
नारद जी कहते हैं कि जब गरुड़ ने इस प्रकार यथार्थ बात कही, तब सहस्रों यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले, दाता, दानपति और राजोचित तेज से प्रकाशित सम्पूर्ण नरेशों के स्वामी महाराज ययाति ने सावधानी के साथ बार-बार विचार करके एक निश्चय पर पहुँचकर कहा।
ययाति ने मन में सोचा— ‘ये दोनों सूर्यवंश में उत्पन्न हुए दूसरे अनेक राजाओं को छोड़कर मेरे पास आये हैं।’ ऐसा विचार कर वे बोले— “निष्पाप गरुड़! आज मेरा जन्म सफल हो गया। आज मेरे कुल का उद्धार हो गया और आज आपने मेरे इस सम्पूर्ण देश को भी तार दिया। सखे! फिर भी मैं एक बात कहना चाहता हूँ। आप पहले से मुझे जैसा धनवान समझते हैं, वैसा धनसम्पन्न अब मैं नहीं रह गया हूँ। मित्र! मेरा वैभव इन दिनों क्षीण हो गया है। आकाशचारी गरुड़! इस दश में भी मैं आपके आगमन को निष्फल करने में असमर्थ हूँ और इन ब्रह्मर्षियों की आशा को भी मैं विफल नहीं करना चाहता। अतः मैं एक ऐसी वस्तु दूँगा, जो इस कार्य का सम्पादन कर देगी। अपने पास आकर कोई याचक हताश हो जाय तो वह लौटने पर आशा भङ्ग करने वाले राजा के समूचे कुल को दग्ध कर देता है। विनतानन्दन! लोक में कोई 'दीजिये' कहकर कुछ माँगे और उससे यह कह दिया जाय कि 'जाओ मेरे पास नहीं है', इस प्रकार याचक की आशा को भङ्ग करने से जितना पाप लगता है, इससे बढ़कर पाप की दूसरी कोई बात नहीं कही जा सकती। कोई श्रेष्ठ मनुष्य जब कहीं याचना करके हताश एवं असफल होता है, तब वह मरे हुए के समान हो जाता है और अपना हित न करने वाले धनी के पुत्रों तथा पौत्रों का नाश कर डालता है।
नातः परं वैनतेय किंचित् पापिष्ठमुच्यते ।
यथाशानाशनाल्लोके देहि नास्तीति वा वचः ॥
‘ विनतानन्दन! लोकमें कोई ' दीजिये ' कहकर कुछ माँगे और उससे यह कह दिया जाय कि जाओ मेरे पास नहीं है, इस प्रकार याचककी आशाको भंग करनेसे जितना पाप लगता है, इससे बढ़कर पापकी दूसरी कोई बात नहीं कही जाती है ।
अतः मेरी जो यह पुत्री है, यह चार कुलों की स्थापना करने वाली है। इसकी कान्ति देवकन्या के समान है। यह सम्पूर्ण धर्मों की वृद्धि करने वाली है। गालव! इसके रूप-सौन्दर्य से आकृष्ट होकर देवता, मनुष्य तथा असुर सभी लोग सदा इसे पाने की अभिलाक्षा रखते हैं; अतः आप मेरी इस पुत्री को ही ग्रहण कीजिये। इसके शुल्क के रूप में राजालोग निश्चय ही अपना राज्य भी आपको दे देंगे; फिर आठ सौ श्यामकर्ण घोड़ों की तो बात ही क्या है? अतः प्रभो! आप मेरी इस पुत्री माधवी को ग्रहण करें और मुझे यह वर दें कि मैं दौहित्रवान् होऊँ।”
अस्याः शुल्कं प्रदास्यन्ति नृपा राज्यमपि ध्रुवम् ।
किं पुनः श्यामकर्णानां हयानां द्वे चतुःशते ॥
‘ इसके शुल्कके रूपमें राजालोग निश्चय ही अपना राज्य भी आपको दे देंगे; फिर आठ सौ श्यामकर्ण घोड़ोंकी तो बात ही क्या है?
तब गरुड़ सहित गालव ने उस कन्या को लेकर कहा— “अच्छा, हम फिर कभी मिलेंगे।” राजा से ऐसा कहकर गालव मुनि कन्या के साथ वहाँ से चल दिये। गरुड़ ने कहा— “अब तुम्हें घोड़ों की प्राप्ति का यह द्वार प्राप्त हो गया है,” और वे अपने घर को चले गये।
पक्षीराज गरुड़ के जाने के पश्चात, गालव उस कन्या के साथ यह सोचते हुए चल दिये कि राजाओं में से कौन ऐसा नरेश है जो इस कन्या का शुल्क देने में समर्थ हो। मन ही मन विचार करके वे अयोध्या में इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न, महापराक्रमी और चतुरङ्गिणी सेना से सम्पन्न राजा हर्यश्व के पास गये। वे कोष, धन-धान्य और सैनिक बल से सम्पन्न थे। प्रजा उन्हें बहुत प्रिय थी और ब्राह्मणों के प्रति उनका अधिक प्रेम था। उनका मन भोगों से विरक्त और शान्त था तथा वे उत्तम तपस्या में लगे थे।
गालव ने कहा— “राजेन्द्र! मेरी यह कन्या अपनी सन्तानों द्वारा वंश की वृद्धि करने वाली है। तुम शुल्क देकर इसे अपनी पत्नी बनाने के लिये ग्रहण करो। हर्यश्व! मैं तुम्हें पहले इसका शुल्क बताऊँगा, उसे सुनकर तुम अपने कर्तव्य का निश्चय करो।”
गालव ने कन्या के लक्षणों का वर्णन करते हुए कहा— “इसकी दो जाँघें, ललाट और नासिका ऊँची हैं। इसके केश, रोम, नख और त्वचा सूक्ष्म हैं। यह बहुत-से देवताओं तथा असुरों के लिये भी दर्शनीय है। इसे गन्धर्व विद्या का भी अच्छा ज्ञान है। यह बहुत-से शुभ लक्षणों से सुशोभित है और अनेक सन्तानों को जन्म देने में समर्थ है। विप्रवर! आपकी यह कन्या चक्रवर्ती पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ है; अतः आप मेरे वैभव को देखते हुए इसके लिये समुचित शुल्क बताइये।”
गालव ने कहा— “राजन्! आप मुझे अच्छे देश और अच्छी जाति में उत्पन्न, हृष्ट-पुष्ट अङ्गों वाले आठ सौ ऐसे घोड़े प्रदान कीजिये, जो चन्द्रमा के समान उज्ज्वल कान्ति से विभूषित हों तथा जिनके कान एक ओर से श्यामवर्ण के हों। यह शुल्क चुका देने पर मेरी यह विशाल नेत्रों वाली शुभलक्षणा कन्या अग्नियों को प्रकट करने वाली अरणी की भाँति आपके तेजस्वी पुत्रों की जननी होगी।”
एकतः श्यामकर्णानां शतान्यष्टौ प्रयच्छ मे ।
हयानां चन्द्रशुभ्राणां देशजानां वपुष्मताम् ॥
ततस्तव भवित्रीयं पुत्राणां जननी शुभा ।
अरणीव हुताशानां योनिरायतलोचना ॥
गालवने कहा – राजन्! आप मुझे अच्छे देश और अच्छी जातिमें उत्पन्न हृष्ट - पुष्ट अंगोंवाले आठ सौ ऐसे घोड़े प्रदान कीजिये, जो चन्द्रमाके समान उज्ज्वल कान्तिसे विभूषित हों तथा उनके कान एक ओरसे श्यामवर्णके हों । यह शुल्क चुका देनेपर मेरी यह विशाल नेत्रोंवाली शुभलक्षणा कन्या अग्नियोंको प्रकट करनेवाली अरणीकी भाँति आपके तेजस्वी पुत्रोंकी जननी होगी ।
यह सुनकर काम-मोहित हुए राजा हर्यश्व मुनिश्रेष्ठ गालव से अत्यन्त दीन होकर बोले— “ब्रह्मन्! आपको जैसे घोड़े लेने अभीष्ट हैं, वैसे तो मेरे यहाँ इन दिनों दो ही सौ घोड़े मौजूद हैं; किन्तु दूसरी जाति के कई सौ घोड़े यहाँ विचरते हैं। अतः गालव! मैं इस कन्या से केवल एक सन्तान उत्पन्न करूँगा। आप मेरे इस श्रेष्ठ मनोरथ को पूर्ण करें।”
यह सुनकर उस कन्या ने गालव से कहा— “मुने! मुझे किन्हीं वेदवादी महात्मा ने यह एक वर दिया था कि तुम प्रत्येक प्रसव के अन्त में फिर कन्या ही हो जाओगी। अतः आप दो सौ उत्तम घोड़े लेकर मुझे राजा को सौंप दें। इस प्रकार चार राजाओं से दो-दो सौ घोड़े लेने पर आपके आठ सौ घोड़े पूरे हो जायेंगे और मेरे भी चार ही पुत्र होंगे। विप्रवर! इसी तरह आप गुरुदक्षिणा के लिये धन का सङ्ग्रह करें, यही मेरी मान्यता है। फिर आप जैसा ठीक समझें, वैसा करें।”
क्रियतामुपसंहारो गुर्वर्थं द्विजसत्तम ।
एषा तावन्मम प्रज्ञा यथा वा मन्यसे द्विज ॥
‘ विप्रवर! इसी तरह आप गुरुदक्षिणाके लिये धनका संग्रह करें, यही मेरी मान्यता है । फिर आप जैसा ठीक समझें, वैसा करें '
कन्या के कहने पर गालव मुनि ने राजा हर्यश्व से कहा— “नरश्रेष्ठ हर्यश्व! नियत शुल्क का चौथाई भाग देकर आप इस कन्या को ग्रहण करें और इसके गर्भ से केवल एक पुत्र उत्पन्न कर लें।” तब राजा ने गालव मुनि का अभिनन्दन करके उस कन्या को ग्रहण किया और उचित समय पर उसके द्वारा एक मनोवाञ्छित पुत्र प्राप्त किया, जो वसुमना के नाम से विख्यात हुआ। वह वसुओं के समान कान्तिमान् तथा धन-रत्नों से सम्पन्न और दान करने वाला नरेश हुआ। तत्पश्चात् उचित समय पर बुद्धिमान् गालव पुनः वहाँ उपस्थित हुए और प्रसन्नचित्त राजा हर्यश्व से मिलकर बोले—
राजा हर्यश्व सत्य वचन पर दृढ़ रहने वाले थे। उन्होंने पुरुषार्थ में समर्थ होने के उपरान्त भी, छः सौ श्यामकर्ण घोड़े दुर्लभ होने के कारण माधवी को पुनः लौटा दिया। इस प्रकार वह राजकन्या, जो अयोध्या की उज्ज्वल राजलक्ष्मी थी, उसे त्यागकर गालव मुनि के पीछे-पीछे चली गई। जाते समय उस ब्राह्मण ने राजा हर्यश्व से कहा— "महाराज! आपके दिए हुए दो सौ श्यामकर्ण घोड़े अभी आपके ही पास धरोहर के रूप में रहें।" ऐसा कहकर गालव मुनि उस राजकन्या के साथ राजा दिवोदास के यहाँ चले गए।
मार्ग में गालव ने राजकन्या माधवी को ढाढस बन्धाते हुए कहा— "भद्रे! काशी के अधिपति भीमसेन कुमार शक्तिशाली राजा दिवोदास महापराक्रमी एवं विख्यात भूमिपाल हैं। उन्हीं के पास हम दोनों चलें। तुम धीरे-धीरे चली आओ और मन में किसी प्रकार का शोक न करो।"
महावीर्यो महीपालः काशीनामीश्वरः प्रभुः ।
दिवोदास इति ख्यातो भैमसेनिर्नराधिपः ॥
तत्र गच्छावहे भद्रे शनैरागच्छ मा शुचः ।
धार्मिकः संयमे युक्तः सत्ये चैव जनेश्वरः ॥
मार्गमें गालवने राजकन्या माधवीसे कहा - भद्रे! काशीके अधिपति भीमसेनकुमार शक्तिशाली राजा दिवोदास महापराक्रमी एवं विख्यात भूमिपाल हैं । उन्हींके पास हम दोनों चलें । तुम धीरे- धीरे चली आओ । मनमें किसी प्रकारका शोक न करो । राजा दिवोदास धर्मात्मा, संयमी तथा सत्य - परायण हैं ।
नारद जी कहते हैं कि राजा दिवोदास के यहाँ पहुँचने पर गालव मुनि का यथोचित सत्कार किया गया। तदनन्तर गालव ने पूर्ववत् उन्हें भी शुल्क देकर उस कन्या से एक सन्तान उत्पन्न करने के लिए प्रेरित किया। राजा दिवोदास बोले— "ब्रह्मन्! यह सब वृत्तान्त मैंने पहले से ही सुन रखा है, अब इसे विस्तारपूर्वक कहने की क्या आवश्यकता है? आपके प्रस्ताव को सुनते ही मेरे मन में पुत्रोत्पादन की अभिलाषा जाग उठी है। यह मेरे लिए बड़े सम्मान की बात है कि आप दूसरे राजाओं को छोड़कर मेरे पास इस रूप में प्रार्थी होकर आए हैं। निःसन्देह ऐसा ही भावी है।"
गालव! राजा ने आगे कहा— "मेरे पास भी दो ही सौ श्यामकर्ण घोड़े हैं; अतः मैं भी इसके गर्भ से एक ही राजकुमार को उत्पन्न करूँगा।" तब 'बहुत अच्छा' कहकर विप्रवर गालव ने वह कन्या राजा को सौंप दी और राजा ने भी उसका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। जिस प्रकार अन्य महान ऋषियों और देवताओं के मिलन से श्रेष्ठ सन्तानें हुई हैं, उसी प्रकार राजा दिवोदास के वीर्य से माधवी ने 'प्रतर्दन' नामक एक पुत्र उत्पन्न किया।
तदनन्तर समय आने पर भगवान गालव मुनि पुनः दिवोदास के पास आए और उनसे बोले— "पृथ्वीपते! अब आप मुझे राजकन्या लौटा दें। आपके दिए हुए घोड़े अभी आपके ही पास रहें। मैं इस समय शुल्क प्राप्त करने के लिए अन्यत्र जा रहा हूँ।" धर्मात्मा राजा दिवोदास अपनी की हुई सत्य प्रतिज्ञा पर अटल थे, अतः उन्होंने गालव को वह कन्या लौटा दी।
दिवोदासोऽथ धर्मात्मा समये गालवस्य ताम् ।
कन्यां निर्यातयामास स्थितः सत्ये महीपतिः ॥
धर्मात्मा राजा दिवोदास अपनी की हुई सत्य प्रतिज्ञा पर अटल रहनेवाले थे; अतः उन्होंने गालवको वह कन्या लौटा दी ।
वह यशस्विनी राजकुमारी माधवी सत्य के पालन में तत्पर होकर काशी नरेश की राजलक्ष्मी को त्यागकर विप्रवर गालव के साथ चली गई। गालव का मन अपने कार्य की सिद्धि के चिन्तन में लगा था। उन्होंने मन ही मन कुछ सोचते हुए राजा उशीनर से मिलने के लिए भोजनगर की यात्रा की।
उन सत्य-पराक्रमी नरेश के पास जाकर गालव ने कहा— "राजन्! यह कन्या आपके लिए पृथ्वी का शासन करने में समर्थ दो पुत्र उत्पन्न करेगी। इसके गर्भ से सूर्य और चन्द्रमा के समान दो तेजस्वी पुत्र पैदा करके आप लोक और परलोक में भी पूर्णकाम होंगे। समस्त धर्मों के ज्ञाता भूपाल! आप इस कन्या के शुल्क के रूप में मुझे ऐसे चार सौ अश्व प्रदान करें, जो चन्द्रमा के समान उज्ज्वल कान्ति से सुशोभित हों तथा एक ओर से श्याम वर्ण के कानों वाले हों। मैंने गुरुदक्षिणा देने के लिए यह उद्योग आरम्भ किया है, अन्यथा मुझे इन घोड़ों की कोई आवश्यकता नहीं है। महाराज! यदि आपके लिए यह शुल्क देना सम्भव हो, तो कोई अन्यथा विचार न करके यह कार्य सम्पन्न कीजिए। राजर्षे! आप सन्तानहीन हैं, अतः इससे दो पुत्र उत्पन्न कीजिए और पुत्ररूपी नौका द्वारा अपने पितरों का तथा अपना भी उद्धार कीजिए। पुत्र जनित पुण्यफल का उपभोग करने वाला मनुष्य कभी स्वर्ग से नीचे नहीं गिराया जाता, जबकि सन्तानहीन मनुष्य जिस प्रकार घोर नरक में पड़ते हैं, वह नहीं पड़ेगा।"
गालव की बातें सुनकर राजा उशीनर ने उत्तर दिया— "विप्रवर गालव! आप जैसा कहते हैं, वे सब बातें मैंने सुन लीं। परन्तु विधाता प्रबल है। मेरा मन इससे सन्तान उत्पन्न करने के लिए उत्सुक हो रहा है। द्विजश्रेष्ठ! आपको जिनकी आवश्यकता है, ऐसे अश्व तो मेरे पास दो ही सौ हैं; दूसरी जाति के तो कई सहस्र घोड़े यहाँ विचरते हैं। अतः मैं भी इस कन्या के गर्भ से एक ही पुत्र उत्पन्न करूँगा और दूसरे लोग जिस मार्ग पर चले हैं, उसी पर चलूँगा। द्विजप्रवर! मैं घोड़ों का मूल्य देकर आपका सारा शुल्क चुका दूँ, यह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि मेरा धन पुरवासियों तथा जनपद निवासियों के लिए है, अपने उपभोग में लाने के लिए नहीं। धर्मात्मन्! जो राजा पराये धन को अपनी इच्छा के अनुसार दान करता है, उसे धर्म और यश की प्राप्ति नहीं होती। अतः आप इस राजकुमारी को केवल एक पुत्र उत्पन्न करने के लिए मुझे दें, मैं इसे ग्रहण करूँगा।"
अहमप्येकमेवास्यां जनयिष्यामि गालव ।
पुत्रं द्विज गतं मार्गं गमिष्यामि परैरहम् ॥
‘ अतः ब्रह्मर्षि गालव! मैं भी इस कन्याके गर्भसे एक ही पुत्र उत्पन्न करूँगा । दूसरे लोग जिस मार्गपर चले हैं, उसीपर मैं भी चलूँगा ।
इस प्रकार न्याययुक्त बातें कहने वाले राजा उशीनर की गालव ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्हें वह कन्या सौंपकर गालव मुनि वन की ओर चल दिए। जैसे पुण्यात्मा पुरुष राज्यलक्ष्मी को प्राप्त करे, वैसे ही उस राजकन्या को पाकर राजा उशीनर उसके साथ रमण करने लगे। उन्होंने पर्वतों की कन्दराओं में, नदियों के सुरम्य तटों पर, झरनों के पास, विचित्र उद्यानों में, वनों में और प्रासाद शिखरों पर माधवी के साथ विहार किया।
तदनन्तर समय आने पर उसके गर्भ से राजा को एक पुत्र प्राप्त हुआ, जो बाल-सूर्य के समान तेजस्वी था। वही बड़ा होकर 'शिबि' नाम से विख्यात हुआ। तत्पश्चात् विप्रवर गालव राजा के दरबार में उपस्थित हुए और उस कन्या को वापस लेकर वहाँ से चल दिए। मार्ग में उन्हें विनतानन्दन गरुड़ दिखाई दिए।
नारद जी कहते हैं कि उस समय विनतानन्दन गरुड़ ने हँसते हुए गालव से कहा— "ब्रह्मन्! बड़े सौभाग्य की बात है कि आज मैं तुम्हें यहाँ कृतकृत्य देख रहा हूँ।"
गालव के वचन सुनकर गरुड़ ने पूछा— "क्या कार्य बाकी रह गया है?"
गालव बोले— "अभी गुरुदक्षिणा का एक चौथाई भाग बाकी रह गया है, जिसे शीघ्र पूरा करना है।"
तब वक्ताओं में श्रेष्ठ गरुड़ ने कहा— "अब तुम्हें इसके लिए प्रयत्न नहीं करना चाहिए; क्योंकि तुम्हारा यह मनोरथ पूर्ण नहीं होगा। पूर्वकाल की बात है, कान्यकुब्ज में राजा गाधिकी कुमारी को अपनी पत्नी बनाने के लिए ऋचीक मुनि ने उसे माँगा था। तब राजा ने कहा था— 'भगवन! मुझे शुल्करूप में एक हजार ऐसे घोड़े दीजिए जो चन्द्रमा के समान कान्तिमान हों और जिनके कान श्याम रङ्ग के हों।' तब ऋचीक मुनि ने 'तथास्तु' कहकर वरुण लोक के अश्व-तीर्थ से वैसे घोड़े प्राप्त करके दे दिए थे। राजा ने यज्ञ करके वे घोड़े ब्राह्मणों को बाँट दिए और स्वयं के लिए दो-दो सौ घोड़े रख लिए।
द्विजश्रेष्ठ! मार्ग में एक जगह नदी पार करनी पड़ी। उन छः सौ घोड़ों के साथ चार सौ और थे, जो वितस्ता (झेलम) की प्रखर धारा में बह गए। इस देश में इन छः सौ घोड़ों के सिवा दूसरे घोड़े अप्राप्य हैं। अतः मेरी राय यह है कि शेष दो सौ घोड़ों के बदले यह कन्या ही विश्वामित्र जी को समर्पित कर दो। इससे तुम्हारी सारी घबराहट दूर हो जाएगी।"
एवं न शक्यमप्राप्यं प्राप्तुं गालव कर्हिचित् ।
इमामश्वशताभ्यां वै द्वाभ्यां तस्मै निवेदय ॥
विश्वामित्राय धर्मात्मन् षड्भिरश्वशतैः सह ।
ततोऽसि गतसम्मोहः कृतकृत्यो द्विजोत्तम ॥
‘ गालव! इस प्रकार इस देशमें इन छः सौ घोड़ोंके सिवा दूसरे घोड़े अप्राप्य हैं । अतः उन्हें कहीं भी पाना असम्भव है । मेरी राय यह है कि शेष दो सौ घोड़ोंके बदले यह कन्या ही विश्वामित्रजीको समर्पित कर दो । धर्मात्मन्! इन छः सौ घोड़ोंके साथ विश्वामित्रजीकी सेवामें इस कन्याको ही दे दो । द्विजश्रेष्ठ! ऐसा करनेसे तुम्हारी सारी घबराहट दूर हो जायगी और तुम सर्वथा कृतकृत्य हो जाओगे '
यह सुनकर गालव ने 'बहुत अच्छा' कहा और गरुड़ के साथ वे छः सौ घोड़े और वह कन्या लेकर विश्वामित्र जी के पास आए। उन्होंने कहा— "गुरुदेव! आप जैसा चाहते थे, वैसे ही ये छः सौ घोड़े आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं और शेष दो सौ के बदले आप इस कन्या को ग्रहण करें। राजर्षियों ने इसके गर्भ से तीन धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न किए हैं, अब आप भी एक नरश्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न कीजिए जिसकी सङ्ख्या चौथी होगी।"
‘इस प्रकार आपके आठ सौ घोड़ों की सङ्ख्या पूरी हो जाय और मैं आपसे उऋण होकर सुखपूर्वक तपस्या करूँ, ऐसी कृपा कीजिये।’
विश्वामित्र ने गरुड़ सहित गालव की ओर देखा। उनकी दृष्टि उस परम सुन्दरी कन्या माधवी पर पड़ी। महातेजस्वी विश्वामित्र ने विचार किया और कहा, ‘गालव! तुमने इसे पहले ही यहाँ क्यों नहीं दे दिया? यदि तुम इसे अभी सौंप देते, तो मुझे ही वंशप्रवर्तक चार पुत्र प्राप्त हो जाते। मैं इस कन्या को एक पुत्र के फल की प्राप्ति के लिए ग्रहण करता हूँ। ये अश्व मेरे आश्रम में आकर सब ओर चरें।’
विश्वामित्रस्तु तं दृष्ट्वा गालवं सह पक्षिणा ।
कन्यां च तां वरारोहामिदमित्यब्रवीद् वचः ॥
विश्वामित्रने गरुड़सहित गालवकी ओर देखकर इस परम सुन्दरी कन्यापर भी दृष्टिपात किया और इस प्रकार कहा- ।
इस प्रकार महातेजस्वी विश्वामित्र मुनि ने उस कन्या के साथ समय व्यतीत किया और यथासमय उसके गर्भ से एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम अष्टक रखा गया। पुत्र के जन्म के उपरान्त महामुनि ने उसे धर्म, अर्थ और उन अश्वों के वैभव से सम्पन्न कर दिया। तदनन्तर वह अष्टक चन्द्रपुरी के समान प्रकाशित होने वाली विश्वामित्र जी की राजधानी में चला गया। उधर विश्वामित्र भी अपने शिष्य गालव को वह कन्या लौटाकर वन में चले गए।
गालव ने गरुड़ सहित गुरुदक्षिणा देकर मन ही मन परम सन्तोष अनुभव किया। वे राजकन्या माधवी के पास पहुँचे और उससे बोले— ‘सुन्दरी! तुम्हारे पहले पुत्र दानपति, दूसरे शूरवीर, तीसरे सत्यधर्मपरायण और चौथे यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले होंगे। सुमध्यमे! तुमने इन पुत्रों द्वारा अपने पिता को तो तारा ही है, उन चार राजाओं का भी उद्धार कर दिया है। अतः अब हमारे साथ चलो।’
गालव ने सर्पभक्षी गरुड़ से आज्ञा ली और उस राजकन्या को लेकर पुनः उसके पिता राजा ययाति के पास लौट आए।
नारद जी कहते हैं— तदनन्तर राजा ययाति ने माधवी के स्वयंवर का विचार किया और गङ्गा-यमुना के सङ्गम पर बने अपने आश्रम में जाकर रहने लगे। उन्होंने अपनी बहन माधवी को हार हाथ में लेकर रथ पर बिठाया और अपने पुत्रों— पूरु और यदु के साथ आश्रम की ओर चल दिए। उस स्वयंवर के लिए नाग, यक्ष, मनुष्य, गन्धर्व, पशु, पक्षी तथा पर्वत, वृक्ष और वनों में निवास करने वाले समस्त प्राणियों का समागम हुआ। प्रयाग का वह वन अनेक जनपदों के राजाओं से व्याप्त हो गया था और ब्रह्माजी के समान तेजस्वी ब्रह्मर्षियों ने उस स्थान को चारों ओर से घेर लिया था।
जब माधवी को वहाँ आए हुए वरों का परिचय दिया जाने लगा, तब उस कन्या ने सारे वरों को छोड़कर तपोवन के वर को ही चुन लिया। ययाति-नन्दिनी कुमारी माधवी रथ से उतरकर अपने पिता, भाई और बन्धुओं को प्रणाम कर पुण्य तपोवन में चली गई और वहाँ तपस्या करने लगी। वह उपवासपूर्वक विविध दीक्षाओं और नियमों का पालन करते हुए, अपने मन को राग-द्वेष से मुक्त रखकर मृगी के समान वन में विचरण करने लगी। वह कोमल हरी-हरी घास चरती, पवित्र नदियों का शीतल जल पीती और व्याघ्ररहित निर्जन वनों में मृगों के साथ एक वनचारिणी की भाँति रहती थी। उसने ब्रह्मचर्य का महान धर्म आचरण किया।
अवतीर्य रथात् कन्या नमस्कृत्य च बन्धुषु ।
उपगम्य वनं पुण्यं तपस्तेपे ययातिजा ॥
ययातिनन्दिनी कुमारी माधवी रथसे उतरकर अपने पिता, भाई, बन्धु आदि कुटुम्बियोंको नमस्कार करके पुण्य तपोवनमें चली गयी और वहाँ तपस्या करने लगी ।
उधर राजा ययाति ने भी पूर्ववर्ती राजाओं के सदाचार का पालन करते हुए अनेक सहस्र वर्षों तक आयु पूरी की और अन्ततः मृत्यु को प्राप्त हुए। उनके दो पुत्र, नरश्रेष्ठ पूरु और यदु, उस कुल में अभ्युदयशील थे। उन्हीं से नहुष-पुत्र ययाति इस लोक और परलोक में प्रतिष्ठित हुए।
ययातिरपि पूर्वेषां राज्ञां वृत्तमनुष्ठितः ।
बहुवर्षसहस्रायुर्युयुजे कालधर्मणा ॥
राजा ययाति भी पूर्ववर्ती राजाओंके सदाचारका पालन करते हुए'अनेक सहस्र वर्षोंकी आयु पूरी करके मृत्युको प्राप्त हुए ।
महाराज ययाति महर्षियों के समान पुण्यात्मा और तपस्वी थे। वे स्वर्ग में जाकर वहाँ के श्रेष्ठ फलों का उपभोग करने लगे। ऐसा कई हजार वर्षों तक चला। किन्तु जब ययाति का चित्त अपने स्वर्गीय वैभव को देखकर लौटा, तो वह आश्चर्यचकित हो उठा। उनकी बुद्धि पर मोह छा गया। वे महान समृद्धिशाली राजर्षियों के समीप बैठे होने पर भी देवताओं, मनुष्यों और महर्षियों की अवहेलना करने लगे।
तदनन्तर इन्द्रदेव को ययाति की इस अवस्था का पता चल गया। उन सभी राजर्षियों ने उन्हें धिक्कार दिया। स्वर्गवासियों में यह चर्चा होने लगी— ‘यह कौन है? किस राजा का पुत्र है? इसने कहाँ तपस्या की है कि यह स्वर्ग में आ गया?’ उन्होंने विमानरक्षकों और द्वारपालों से पूछा, किन्तु सबने कहा— ‘हम इन्हें नहीं जानते।’ उनके ज्ञान पर पर्दा पड़ गया था। देखते ही देखते दो घड़ी में ययाति का तेज नष्ट हो गया।
सर्वे ते ह्यावृतज्ञाना नाभ्यजानन्त तं नृपम् ।
स मुहूर्तादथ नृपो हतौजाश्चाभवत् तदा ॥
उन सबके ज्ञानपर पर्दा पड़ गया था; अतः वे उन राजाको नहीं पहचान सके । फिर तो दो ही घड़ीमें राजा ययातिका तेज नष्ट हो गया ।
ययाति अपने सिंहासन से गिरकर उस स्वर्गीय स्थान से विचलित हो गए। उनका हृदय काँप उठा और वे शोकाग्नि से जलने लगे। उनकी दिव्य कुसुमों की माला मुरझा गई, मुकुट और बाजूबन्द शरीर से अलग होकर गिरने लगे। उन्हें चक्कर आने लगा और उनके अङ्ग शिथिल पड़ गए। वे अन्धकार से घिर जाने के कारण स्वर्गवासियों को देख नहीं पा रहे थे। पृथ्वी पर गिरने से पूर्व, शून्य हृदय से वे सोचने लगे— ‘मैंने ऐसा कौन सा अशुभ चिन्तन किया है, जिसके कारण मुझे इस स्थान से भ्रष्ट होना पड़ा?’
स्वर्ग के ऋषि, सिद्ध और अप्सराएँ उन्हें गिरते हुए देख रहे थे। तभी देवराज की आज्ञा से एक पुरुष वहाँ आया और बोला— ‘राजपुत्र! तुम अत्यन्त मदमत्त हो। यहाँ कोई ऐसा महान पुरुष नहीं है जिसका तुम तिरस्कार न करो। इस मान के कारण ही तुम गिर रहे हो। तुम्हें यहाँ कोई नहीं जानता, अतः जाओ और नीचे गिरो।’
ययाति ने तीन बार यह प्रार्थना की कि वे सत्पुरुषों के बीच गिरें। गिरते समय उन्होंने नैमिषारण्य में चार श्रेष्ठ राजाओं को देखा और उन्हीं के मध्य गिरने का प्रयत्न किया। उनके यज्ञ का धुआँ मानो स्वर्ग का द्वार बनकर उपस्थित था। ययाति उस धूमलेखा जैसी नदी के सहारे, जो आकाशगङ्गा की भाँति भूमि पर प्रवाहित हो रही थी, अपने चारों तेजस्वी सम्बन्धियों के बीच गिरे। वे चारों राजा विशाल अग्नियों के समान प्रज्वलित थे।
भूमौ स्वर्गे च सम्बद्धां नदीं धूममयीमिव ।
गङ्गां गामिव गच्छन्तीमालम्ब्य जगतीपतिः ॥
श्रीमत्स्ववभृथाग्रयेषु चतुर्षु प्रतिबन्धुषु ।
मध्ये निपतितो राजा लोकपालोपमेषु सः ॥
भूतलसे स्वर्गतक धूममयी नदी- सी प्रवाहित हो रही थी, मानो आकाशगंगा भूमिपर जा रही हों । भूपाल ययाति उसी धूमलेखाका अवलम्बन करके लोकपालोंके समान तेजस्वी तथा अवभृथ स्नानसे पवित्र अपने चारों सम्बन्धियोंके बीचमें गिरे ।
उन दिव्य कान्ति वाले राजाओं ने पूछा— ‘आप कौन हैं? किसके भाई-बन्धु हैं? आपका स्वरूप मनुष्यों जैसा नहीं है। बताइये, आप क्या सिद्ध करने आए हैं?’
ययाति ने कहा— ‘मैं राजर्षि ययाति हूँ। अपना पुण्य क्षीण होने के कारण स्वर्ग से गिर गया हूँ। गिरते समय मेरा मन सत्पुरुषों के बीच गिरने का था, अतः मैं आप लोगों के बीच आ पड़ा हूँ।’
उन राजाओं ने कहा— ‘पुरुष शिरोमणे! आपका मनोरथ सफल हो। आप हमारे यज्ञों का फल और धर्म ग्रहण करें।’
ययाति बोले— ‘प्रतिग्रह ही जिसका धन है, वह मैं ब्राह्मण नहीं, क्षत्रिय हूँ। मेरी बुद्धि पराये पुण्य को ग्रहण कर अपना क्षय करने के लिए उद्यत नहीं है।’
ययातिरुवाच नाहं प्रतिग्रहधनो ब्राह्मणः क्षत्रियो ह्यहम् ।
न च मे प्रवणा बुद्धिः परपुण्यविनाशने ॥
ययातिने कहा — प्रतिग्रह ही जिसका धन है, वह ब्राह्मण मैं नहीं हूँ। मैं तो क्षत्रिय हूँ । अतः मेरी बुद्धि पराये पुण्यका ( ग्रहण करके उनका पुण्य) क्षय करनेके लिये उद्यत नहीं है ।
उसी समय उन राजाओं ने अपनी माता माधवी को देखा, जो मृगों की भाँति उनके साथ वहाँ पहुँची थी। राजाओं ने माधवी से पूछा— ‘तपोधने! यहाँ आपके आने का क्या प्रयोजन है? हम आपके पुत्र हैं, हमें आज्ञा दें।’
माधवी अत्यन्त प्रसन्न हुई और उसने अपने पिता ययाति को प्रणाम किया। तदनन्तर तपस्विनी माधवी ने अपने पुत्रों के सिर पर हाथ रखकर कहा— ‘राजेन्द्र! ये सभी आपके दौहित्र और मेरे पुत्र हैं, पराये नहीं हैं। ये आपको तार देंगे। दादा का उद्धार करने के लिए दौहित्रों का होना पुरातन वेदों में भी स्पष्ट है। मैं आपकी पुत्री माधवी हूँ और इस तपोवन में मृगों की भाँति रहती हूँ। मैंने महान धर्म का सञ्चय किया है, उसका आधा भाग आप ग्रहण करें। हे पृथ्वीनाथ! सभी मनुष्य अपनी सन्तानों के सत्कर्मों के भागी होते हैं, इसीलिए वे दौहित्रों की इच्छा करते हैं, जैसा आपने किया था।’
|| अथ तस्मादुपगतो गालवोऽप्याह पार्थिवम् ।
तपसो मेऽष्टभागेन स्वर्गमारोहतां भवान् ॥
इसी बीचमें उस वनसे गालव मुनि भी वहाँ आ पहुँचे तथा राजासे इस प्रकार बोले –' महाराज! आप मेरी तपस्याका आठवाँ भाग लेकर उसके बलसे स्वर्गलोकमें पहुँच जायँ'
उन सभी राजाओं ने अपनी माता के चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम किया और स्वर्गभ्रष्ट नाना को भी नमस्कार किया। वे अपने उच्च, अनुपम और स्नेहपूर्ण स्वर से पृथ्वी को प्रतिध्वनित करते हुए उन्हें तारने के उद्देश्य से उनसे कुछ कहने का विचार करने लगे।
इसी बीच उस वन से गालव मुनि भी वहाँ आ पहुँचे तथा राजा से बोले— 'महाराज! आप मेरी तपस्या का आठवाँ भाग लेकर उसके बल से स्वर्गलोक में पहुँच जाएँ।'
नारदजी कहते हैं कि उन सत्पुरुषों द्वारा पहचाने जाने मात्र से नरश्रेष्ठ राजा ययाति पृथ्वीतल का स्पर्श किए बिना ही ऊपर की ओर उठने लगे। उस समय उनकी आकृति दिव्य हो गई थी; वे शोक और चिन्ता से रहित थे। उन्होंने दिव्य हार और दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे तथा दिव्य आभूषण उनके अङ्गों की शोभा बढ़ा रहे थे। वे दिव्य सुगन्ध से सुवासित हो रहे थे और अपने पैरों से पृथ्वी का स्पर्श नहीं कर रहे थे।
तदनन्तर लोक में दानपतिके नाम से विख्यात राजा वसुमना ने उच्च स्वर में उच्चारण करते हुए महाराज ययाति से कहा— 'मैंने जगत् में सभी वर्णों की निन्दा से दूर रहकर जो पुण्य प्राप्त किया है, वह भी आपको दे रहा हूँ। आप उस पुण्य से संयुक्त हों। दानशील पुरुष को जो पुण्यफल प्राप्त होता है, क्षमाशील मनुष्य को जो फल मिलता है तथा अग्निस्थापन आदि वेदोक्त कर्मों के अनुष्ठान से मुझे जिस फल की प्राप्ति होने वाली है, उन सभी प्रकार के पुण्यफलों से आप सम्पन्न हों।'
इसके पश्चात क्षत्रियशिरोमणि प्रतर्दन ने कहा— 'मैं जिस प्रकार सदा धर्म में तत्पर रहा हूँ, सर्वदा न्याययुक्त युद्ध में संलग्न होता आया हूँ तथा संसार में मैंने जो क्षत्रियवंश के अनुरूप यश एवं वीर शब्द के योग्य पुण्यफल का अर्जन किया है, उससे आप संयुक्त हों।' वह धीमान पुरुष मधुर वाणी में बोला— 'मैंने कभी असत्य भाषण नहीं किया है। उस सत्य के प्रभाव से आप स्वर्गलोक में जाइये। राजन्! मैं अपने प्राण, राज्य एवं मनोवाञ्छित सुखभोग को भी त्याग सकता हूँ, परन्तु सत्य को नहीं छोड़ सकता। यदि मेरे सत्य से धर्मदेव सन्तुष्ट हैं, यदि मेरे सत्य से अग्निदेव प्रसन्न हैं तथा यदि मेरे सत्यभाषण से देवराज इन्द्र भी तृप्त हुए हैं, तो उस सत्य के प्रभाव से आप स्वर्गलोक में जाइये।'
इसके बाद माधवी के छोटे पुत्र, कुशिकवंशी धर्मज्ञ राजर्षि अष्टक ने, जो कई सौ यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले नहुषनन्दन ययाति के पास आए, कहा— 'प्रभो! मैंने सैकड़ों पुण्डरीक, गोसव तथा वाजपेय यज्ञों का अनुष्ठान किया है। आप उन सबका फल प्राप्त करें। मेरे पास कोई भी रत्न, धन अथवा अन्य सामग्री ऐसी नहीं है, जिसका मैंने यज्ञों में उपयोग न किया हो। इस सत्य कर्म के प्रभाव से आप स्वर्गलोक में जाइये।'
शतशः पुण्डरीका मे गोसवाश्चरिताः प्रभो ।
क्रतवो वाजपेयाश्च तेषां फलमवाप्नुहि ॥
न मे रत्नानि न धनं न तथान्ये परिच्छदाः ।
क्रतुष्वनुपयुक्तानि तेन सत्येन खं व्रज ॥
‘ प्रभो! मैंने सैकड़ों पुण्डरीक, गोसव तथा वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान किया है । आप उन सबका फल प्राप्त करें । मेरे पास कोई भी रत्न, धन अथवा अन्य सामग्री ऐसी नहीं है, जिसका मैंने यज्ञोंमें उपयोग न किया हो । इस सत्य कर्मके प्रभावसे आप स्वर्गलोकमें जाइये '
जैसे-जैसे ययाति के दौहित्र उनकी बातें कह रहे थे, वैसे-वैसे वे महाराज भूतल को छोड़ते हुए स्वर्गलोक की ओर बढ़ते चले गए। इस प्रकार अपने सम्पूर्ण सत्कर्मों द्वारा उन सब राजाओं ने स्वर्ग से गिरे हुए ययाति को अनायास ही तार दिया। वे चारों दौहित्र चार राजवंशों में उत्पन्न हुए थे और उन्होंने अपने यज्ञ-दानादि जनित धर्म से उन महाप्राज्ञ मातामह ययातिके को स्वर्गलोक में पहुँचा दिया।
वे राजा बोले— 'राजन्! पृथ्वीपते! हम राजधर्म और राजोचित गुणों से युक्त, सम्पूर्ण धर्मों तथा समस्त सद्गुणों से सम्पन्न आपके दौहित्र हैं। आप हमारे पुण्य लेकर स्वर्गलोक पर आरूढ़ होइये।'
नारदजी कहते हैं कि प्रचुर दक्षिणा देने वाले उन श्रेष्ठ राजाओं ने ययाति को स्वर्ग पर आरूढ़ कर दिया। राजा ययाति अपने उन दौहित्रों को विदा देकर स्वर्गलोक में जा पहुँचे। वहाँ उनके ऊपर नाना प्रकार के सुगन्धयुक्त पुष्पों की वर्षा हुई और पवित्र सौरभ से सुवासित पावन समीर उनका सब ओर से आलिङ्गन कर रहा था। दौहित्रों के पुण्यफल से प्राप्त हुए अविचल स्थान को पाकर राजा ययाति उत्कृष्ट शोभा से प्रकाशित होने लगे। गन्धर्वों और अपस्राओं के समुदाय ने उनके सुयश का गान करते हुए नृत्य करके उन्हें प्रसन्न किया। स्वर्गलोक में दुन्दुभि आदि वाद्यों की गम्भीर ध्वनि के साथ अत्यन्त प्रेमपूर्वक उनको अपनाया गया। नाना प्रकार के देवर्षियों, राजर्षियों तथा चारणों ने उनका स्तवन किया। देवताओं ने उत्तम अर्घ्य निवेदन करके उनका पूजन और अभिनन्दन किया।
इस प्रकार ययाति ने उत्तम स्वर्गफल पाया। तदनन्तर सन्तुष्ट एवं शान्तचित्त हुए ययातिको अपने मधुर वचनों द्वारा पूर्णतः तृप्त करते हुए पितामह ब्रह्माजी उनसे बोले— 'राजन्! तुमने लोकहितकारी सत्कर्म द्वारा चारों चरणों से युक्त धर्म का सङ्ग्रह किया; अतः तुम्हें यह अक्षय स्वर्गलोक प्राप्त हुआ और स्वर्ग में तुम्हारी क्षीण न होने वाली कीर्ति फैल गयी। राजर्षे! फिर तुम्हींने अभिमानपूर्ण बर्ताव से अपने पुण्य का नाश किया था। उस समय समस्त स्वर्गवासियों का चित्त तमोगुण से व्याप्त हो गया था, जिससे वे तुम्हें नहीं जानते थे; अतः सबके लिये अज्ञात होने के कारण तुम स्वर्ग से नीचे गिरा दिये गये। फिर तुम्हारे दौहित्रों ने प्रेमपूर्वक तुम्हें तार दिया है, जिससे तुम पुनः यहाँ आ गये हो। अब तुमने अपने कर्म से जीते हुए अविचल, शाश्वत, पुण्यमय, उत्तम तथा अविनाशी स्थान प्राप्त किया है।'
ययाति बोले— 'भगवन्! मेरे मन में कोई सन्देह है, जिसका निवारण आप ही कर सकते हैं। लोकपितामह! मैं इस प्रश्न को और किसी के सामने रखना उचित नहीं समझता। मैंने कई हजार वर्षों तक अनेकानेक यज्ञों और दानों के द्वारा जिस महान् पुण्यफल का उपार्जन किया था और जिसे प्रजापालनरूपी धर्म के द्वारा उत्तरोत्तर बढ़ाया था, वह सब थोड़े ही समय में नष्ट कैसे हो गया? जिससे मैं यहाँ से नीचे गिरा दिया गया। भगवन्! महाद्युते! मुझे मेरे सत्कर्मों द्वारा जो सनातन लोक प्राप्त हुए थे, उन्हें आप जानते हैं। मेरा वह सारा पुण्य सहसा नष्ट कैसे हो गया?'
ब्रह्माजी बोले— 'राजेन्द्र! तुमने कई हजार वर्षों तक अनेकानेक यज्ञों और दानों के द्वारा जिस पुण्यफल का उपार्जन किया और प्रजापालनरूपी धर्म के द्वारा जिसे उत्तरोत्तर बढ़ाया, वह सब इस अभिमानरूपी दोष के कारण ही नष्ट हो गया था, जिससे तुम नीचे गिराये गये। तुम्हारे अभिमान के ही कारण स्वर्गलोक के निवासियों ने तुम्हें धिक्कार दिया था। राजर्षे! यह पुण्यलोक न अभिमान से, न बल से, न हिंसा से और न भाँति-भाँतिकी मायाओं से ही सुस्थिर होता है। राजन्! तुम्हें ऊँचे, नीचे एवं मध्यम वर्ग के लोगों का कभी अपमान नहीं करना चाहिये। जो लोग अभिमान की आग में जल रहे हैं, उनके उस सन्ताप को शान्त करने का कहीं कोई उपाय नहीं है।'
नारदजी कहते हैं— 'राजन्! इस प्रकार पूर्वकाल में राजा ययाति अपने अभिमान के कारण सङ्कट में पड़ गये थे और अत्यन्त आग्रह एवं हठ के कारण महर्षि गालव को भी महान् क्लेश सहन करना पड़ा था। अतः तुम्हें तुम्हारे हित की इच्छा रखने वाले सुहृदों की बात अवश्य सुननी और माननी चाहिये। दुराग्रह कभी नहीं करना चाहिये, क्योंकि वह विनाश के पथ पर ले जाने वाला है। तुम अपने सुहृदों के हितकर वचन मान लो। असत्य आचरण को न अपनाओ, अन्यथा शक्तिशाली पाण्डवों के साथ युद्ध ठानकर तुम बड़े भारी सङ्कट में पड़ जाओगे।
भूपाल! मनुष्य जो दान देता है, जो कर्म करता है, जो तपस्या में प्रवृत्त होता है और जो होम-यज्ञ आदि का अनुष्ठान करता है, उसके इस कर्म का न तो नाश होता है और न उसमें कोई कमी आती है। उसके कर्म को दूसरा कोई नहीं भोगता; कर्ता स्वयं ही अपने शुभाशुभ कर्मों का फल भोगता है। यह महत्त्वपूर्ण उपाख्यान उन महापुरुषों का है, जो अनेक शास्त्रों के ज्ञाति थे तथा रोष और राग से रहित थे। यह सबके लिये परम उत्तम और हितकर है। लोक में इस पर नाना प्रकार से विचार करके निश्चित किये हुए सिद्धान्त को अपनाकर धर्म, अर्थ और काम पर दृष्टि रखने वाला पुरुष इस पृथ्वी का उपभोग करता है।'
In English
The Story of Galava and the Directions
Narada tells Janamejaya about the sage Galava, who faced hardship after being asked by Vishvamitra for a difficult guru-dakshina. Garuda appears to Galava and describes the significance and characteristics of the East, South, and West directions.
This page answers
- What was the guru-dakshina requested by vishvamitra from galava?
- How did vishvamitra test his austerity through the character of vasishtha?
- What are the characteristics of the east direction according to garuda?
- What is described as being located in the south direction?
- Why is the west direction associated with varuna?
Also written: Galavacharita, Galava, Duryodhana, Bhishma, Vishvamitra, Dharmaraja, Garuda, Shandili, Madhavi, Ashtaka, Yayati, Puru, Yadu, Nahusha, Indra, Pratardana, Vasumana, Shibi, Ushinara, Brahmaji, गालवचरित