श्रीगणेशाय नमः।

हंसकाकीयोपाख्यान : अहङ्कार में डूबा हुआ व्यक्ति अपनी पराजय के समय क्या अनुभव करता है?

अहङ्कार का पतन और आत्मबोध

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ४ · कर्णपर्व · अध्याय 41 · पृष्ठ 1880–1894

2,027 शब्द · 11 मिनटका पाठ · 18 श्लोक

शल्य ने कर्ण से कहा

युद्ध की तैयारी के दौरान कर्ण के अहङ्कार को शान्त करने हेतु

सञ्जय बोले— हे माननीय नरेश! युद्ध का अभिनन्दन करने वाले अधिरथपुत्र कर्ण की पूर्वोक्त बात सुनकर, शल्य ने उसे यह दृष्टान्तयुक्त बात कही।

संजय उवाच

मारिषाधिरथेः श्रुत्वा वाचो युद्धाभिनन्दिनः ।
शल्योऽब्रवीत् पुनः कर्णं निदर्शनमिदं वचः ॥

संजय कहते हैं— माननीय नरेश! युद्धका अभिनन्दन करनेवाले अधिरथपुत्र कर्णकी पूर्वोक्त बात सुनकर फिर शल्यने उससे यह दृष्टान्तयुक्त बात कही- ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 1पृष्ठ 1881

'सूतपुत्र! मैं युद्ध में पीठ न दिखाने वाले यज्ञपरायण और मूर्धाभिषिक्त नरेशों के कुल में उत्पन्न हुआ हूँ और स्वयं भी धर्म में तत्पर रहता हूँ; किन्तु वृषभस्वरूप कर्ण! जैसे कोई मदिरा से मतवाला हो गया हो, उसी प्रकार तुम भी उन्मत्त दिखाई दे रहे हो। अतः मैं हितैषी सुहृद् होने के नाते तुम जैसे प्रमत्त की आज चिकित्सा करूँगा। ओ नीच कुलाङ्गार कर्ण! मेरे द्वारा बताये जाने वाले कौए के इस दृष्टान्त को सुनो और सुनकर जैसी इच्छा हो वैसा करो।'

संजय उवाच

इमां काकोपमां कर्ण प्रोच्यमानां निबोध मे ।
श्रुत्वा यथेष्टं कुर्यास्त्वं निहीन कुलपांसन ॥

ओ नीच कुलांगार कर्ण! मेरे द्वारा बताये जानेवाले कौएके इस दृष्टान्तको सुनो और सुनकर जैसी इच्छा हो वैसा करो ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 4पृष्ठ 1881

कर्ण ने उत्तर दिया— 'महाबाहु कर्ण! मुझे अपना कोई ऐसा अपराध याद नहीं आता, जिसके कारण तुम मुझे मार डालने की इच्छा रखते हो। मैं राजा दुर्योधन का हितैषी हूँ और विशेषतः रथ पर सारथि बनकर बैठा हूँ; इसलिये तुम्हारे हिताहित को जानते हुए मेरा आवश्यक कर्तव्य है कि तुम्हें वह सब बता दूँ।'

संजय उवाच

अवश्यं तु मया वाच्यं बुद्ध्यता त्वद्धिताहितम् ।
विशेषतो रथस्थेन राज्ञश्चैव हितैषिणा ॥

मैं राजा दुर्योधनका हितैषी हूँ और विशेषतः रथपर सारथि बनकर बैठा हूँ; इसलिये तुम्हारे हिताहितको जानते हुए मेरा आवश्यक कर्तव्य है कि तुम्हें वह सब बता दूँ ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 6पृष्ठ 1881

शल्य ने कहा— 'अतस्त्वां कथये कर्ण निदर्शनमिदं पुनः। सम और विषम अवस्था, रथी की प्रबलता और निर्बलता, घोड़ों के सतत परिश्रम और कष्ट, अस्त्र हैं या नहीं, जय और पराजय की सूचना देने वाले पशु-पक्षियों की बोली, भार, अतिभार, शल्य-चिकित्सा, अस्त्रप्रयोग, युद्ध और शुभाशुभ निमित्त— इन सारी बातों का ज्ञान रखना मेरे लिए आवश्यक है; क्योंकि मैं इस रथ का एक कुटुम्बी हूँ। कर्ण! इसीलिये मैं पुनः तुमसे इस दृष्टान्त का वर्णन करता हूँ।'

राज्ञो धर्मप्रधानस्य राष्ट्रे वसति निर्भयः। कहते हैं कि समुद्र के तट पर किसी धर्मप्रधान राजा के राज्य में एक प्रचुर धन-धान्य से सम्पन्न वैश्य रहता था। वह यज्ञ-यागादि करने वाला, दानपति, क्षमाशील और अपने वर्णानुकूल कर्म में तत्पर था; वह बहुत से पुत्रों वाला, सन्तानप्रेमी और समस्त प्राणियों पर दया करने वाला था। उसके जो बहुत से अल्पवयस्क यशस्वी पुत्र थे, उन सबकी जूठन खाने वाला एक कौआ भी वहाँ रहा करता था। वैश्य के बालक उस कौए को सदा मांस, भात, दही, दूध, खीर, मधु और घी आदि दिया करते थे।

-९ ॥ वैश्यः किल समुद्रान्ते प्रभूतधनधान्यवान् ॥

यज्वा दानपतिः क्षान्तः स्वकर्मस्थोऽभवच्छुचिः ।
बहुपुत्रः प्रियापत्यः सर्वभूतानुकम्पकः ॥

राज्ञो धर्मप्रधानस्य राष्ट्रे वसति निर्भयः । कहते हैं समुद्रके तटपर किसी धर्मप्रधान राजाके राज्यमें एक प्रचुर धन - धान्यसे सम्पन्न वैश्य रहता था । वह यज्ञ- यागादि करनेवाला, दानपति, क्षमाशील, अपने वर्णानुकूल कर्ममें तत्पर, पवित्र, बहुत - से पुत्रवाला, संतानप्रेमी और समस्त प्राणियोंपर दया करनेवाला था ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 10-11पृष्ठ 1882

वैश्य के बालकों द्वारा जूठन खिला-खिलाकर पाला हुआ वह कौआ बड़े घमण्ड में भरकर अपने समान तथा अपने से श्रेष्ठ पक्षियों का भी अपमान करने लगा। एक दिन की बात है, उस समुद्र के तट पर गरुड़ के समान लम्बी उड़ानें भरने वाले मानसरोवर निवासी राजहंस आये। उनके अङ्गों में चक्र के चिह्न थे और वे मन-ही-मन बहुत प्रसन्न थे। उन हंसों को देखकर कुमारों ने कौए से कहा— 'विहङ्गम! तुम्हीं समस्त पक्षियों में श्रेष्ठ हो। देखो, ये आकाशचारी हंस आकाश में जाकर बड़ी दूर की उड़ानें भरते हैं। तुम भी इन्हीं के समान दूर तक उड़ने में समर्थ हो; तुमने अपनी इच्छा से ही अब तक वैसी उड़ान नहीं भरी।' उन सारे अल्पबुद्धि बालकों द्वारा ठगा गया वह पक्षी मूर्खता और अभिमान से उनकी बात को सत्य मानने लगा।

तान् सोऽभिपत्य जिज्ञासुः क एषां श्रेष्ठभागिति ॥

उच्छिष्टदर्पितः काको बहूनां दूरपातिनाम् ।
तेषां यं प्रवरं मेने हंसानां दूरपातिनाम् ॥

तमाह्वयत दुर्बुद्धिः पताव इति पक्षिणम् । फिर वह जूठनपर घमंड करनेवाला कौआ इन हंसोंमें सबसे श्रेष्ठ कौन है? यह जाननेकी इच्छासे उड़कर उनके पास गया और दूरतक उड़नेवाले उन बहुसंख्यक हंसोंमेंसे जिस पक्षीको उसने श्रेष्ठ समझा, उसीको उस दुर्बुद्धिने ललकारते हुए कहा — ‘ चलो, हम दोनों उड़ें'

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 18-193पृष्ठ 1883

फिर वह जूठन पर घमण्ड करने वाला कौआ इन हंसों में सबसे श्रेष्ठ कौन है? यह जानने की इच्छा से उड़कर उनके पास गया और दूर तक उड़ने वाले उन बहुसङ्ख्यक हंसों में से जिस पक्षी को उसने श्रेष्ठ समझा, उसी को ललकारते हुए कहा— 'चलो, हम दोनों उड़ें!'

उस कौए की बात सुनकर वहाँ आये हुए पक्षियों में श्रेष्ठ बलवान हंस हँसे और बोले— 'काक! हम मानसरोवर निवासी हंस हैं, जो सदा इस पृथ्वी पर विचरते रहते हैं। दूर तक उड़ने के कारण हम लोग सदा सभी पक्षियों में सम्मानित होते आए हैं। ओ खोटी बुद्धि वाले काग! तू कौआ होकर लम्बी उड़ान भरने वाले और अपने अङ्गों में चक्र का चिह्न धारण करने वाले एक बलवान हंस को अपने साथ उड़ने के लिये कैसे ललकार रहा है? बता तो सही, तू हमारे साथ किस प्रकार उड़ेगा?'

कथं हंसं नु बलिनं चक्राङ्गं दूरपातिनम् ।
भूत्वा निपतने समाह्वयसि दुर्मते ॥

कथं त्वं पतिता काक सहास्माभिर्ब्रवीहि तत् । ओ खोटी बुद्धिवाले काग! तू कौआ होकर लंबी उड़ान भरनेवाले और अपने अंगोंमें चक्रका चिह्न धारण करनेवाले एक बलवान् हंसको अपने साथ उड़नेके लिये कैसे ललकार रहा है? काग! बता तो सही, तू हमारे साथ किस प्रकार उड़ेगा?

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 23पृष्ठ 1884

हंस की बात सुनकर वह मूर्ख कौआ अपनी जातिगत क्षुद्रता के कारण उसकी निन्दा करते हुए बोला— 'हंस! मैं एक सौ एक प्रकार की उड़ानें उड़ सकता हूँ। उनमें से प्रत्येक उड़ान सौ-सौ योजन की होती है और वे सभी विभिन्न प्रकार की एवं विचित्र हैं। इसमें संशय नहीं है। इनमें से छब्बीस उड़ानें लक्ष्य का सङ्कल्प करके उड़ने वाली हैं; इसके सिवा अन्य पचहत्तर उड़ानें भी हैं। आज मैं तुम लोगों के देखते-देखते जब इतनी उड़ानें भरूँगा, उस समय मेरा बल तुम देखोगे। हंसो! तुम लोग यथोचित रूप से विचार करके बताओ कि मैं किस उड़ान से उड़ूँ? तुम सब लोग दृढ़ निश्चय करके आश्रय रहित आकाश में इन विभिन्न उड़ानों द्वारा मेरे साथ चलो।'

राधापुत्र! कौए के ऐसे कहने पर एक आकाशचारी हंस ने हँसकर उससे जो कहा, वह सुनो। हंस बोला— 'काग! तू अवश्य एक सौ एक उड़ानों द्वारा उड़ सकता है; परन्तु मैं तो जिस एक उड़ान को सारे पक्षी जानते हैं, उसी से उड़ सकता हूँ। दूसरी किसी उड़ान का मुझे पता नहीं है। लाल नेत्र वाले कौए! तू भी जिस उड़ान से उचित समझे, उसी से उड़।'

अथ काकाः प्रजहसुर्ये तत्रासन् समागताः ॥

कथमेकेन पातेन हंसः पातशतं जयेत् ।
एकेनैव शतस्यैष पातेनाभिभविष्यति ॥

हंसस्य पतितं काको बलवानाशुविक्रमः । तब वहाँ आये हुए सारे कौए जोर- जोर से हँसने लगे और आपसमें बोले — ‘ भला यह हंस एक ही उड़ानसे सौ प्रकारकी उड़ानोंको कैसे जीत सकता है? यह कौआ बलवान् और शीघ्रतापूर्वक उड़नेवाला है; अतः सौमेंसे एक ही उड़ानद्वारा हंसकी उड़ानको पराजित कर देगा'

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 35-363पृष्ठ 1886

हंस की बात सुनकर वहाँ आये हुए सारे कौए जोर-जोर से हँसने लगे और आपस में बोले— 'भला यह हंस एक ही उड़ान से सौ प्रकार की उड़ानों को कैसे जीत सकता है? यह कौआ बलवान और शीघ्रतापूर्वक उड़ने वाला है; अतः वह सौ में से एक ही उड़ान द्वारा हंस की उड़ान को परावजित कर देगा।'

तदनन्तर हंस और कौआ दोनों होड़ लगाकर उड़े। चक्राङ्ग हंस एक ही गति से उड़ने वाला था और कौआ सौ उड़ानों से। इधरसे चक्राङ्ग उड़ा और उधरसे कौआ। कौआ विभिन्न उड़ानों द्वारा दर्शकों को आश्चर्यचकित करने की इच्छा से अपने कार्यों का बखान करता जा रहा था। उस समय कौए की विचित्र उड़ानों को बारम्बार देखकर दूसरे कौए बड़े प्रसन्न हुए और जोर-जोर से काँव-काँव करने लगे। वे दो-दो घड़ी पर बारम्बार उड़-उड़कर कहते— 'देखो, कौए की यह उड़ान, वह उड़ान!' ऐसा कहकर वे हंसों का उपहास करते और उन्हें कटु वचन सुनाते थे।

हंसांश्चावहसन्ति स्म प्रावदन्नप्रियाणि च ॥

उत्पत्योत्पत्य च मुहुर्मुहूर्तमिति चेति च ।
वृक्षाग्रेभ्यः स्थलेभ्यश्च निपतन्त्युतन्ति च ॥

कुर्वाणा विविधान् रावानाशंसन्तो जयं तथा । वे दो - दो घड़ीपर बारंबार उड़- उड़कर कहते - ' देखो, कौएकी यह उड़ान, वह उड़ान' । ऐसा कहकर वे हंसोंका उपहास करते और उन्हें कटु वचन सुनाते थे । साथ ही कौएकी विजयके लिये शुभाशंसा करते और भाँति- भाँतिकी बोली बोलते हुए वे कभी वृक्षोंकी शाखाओंसे भूतलपर और कभी भूतलसे वृक्षोंकी शाखाओंपर नीचे- ऊपर उड़ते रहते थे ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 40-41पृष्ठ 1886

हंस ने एक ही मृदुल गति से उड़ना आरम्भ किया था; अतः दो घड़ी तक वह कौए से हारता हुआ प्रतीत हुआ। तब कौओं ने हंसों का अपमान करते हुए कहा— 'वह जो हंस उड़ा था, वह तो इस प्रकार कौए से पिछड़ता जा रहा है!'

हंसस्तु मृदुनैकेन विक्रान्तुमुपचक्रमे ॥

प्रत्यहीयत काकाच्च मुहूर्तमिव मारिष । आर्य! हंसने एक ही मृदुल गतिसे उड़ना आरम्भ किया था; अतः दो घड़ीतक वह कौएसे हारता - सा प्रतीत हुआ ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 42पृष्ठ 1887

यह सुनकर हंस बड़े वेग से पश्चिम दिशा की ओर समुद्र के ऊपर-ऊपर उड़ना आरम्भ कर दिया। इधर कौआ थक गया था। उसे कहीं आश्रय लेने के लिये द्वीप या वृक्ष नहीं दिखायी दे रहे थे; अतः उसके मन में भय समा गया और वह घबराकर अचेत सा हो उठा। कौआ सोचने लगा— 'मैं थक जाने पर इस जलराशि में कहाँ उतरूँगा? बहुत से जल-जन्तुओं का निवासस्थान समुद्र मेरे लिये असह्य है। असङ्ख्य महाप्राणियों से उद्भासित होने वाला यह महासागर तो आकाश से भी बढ़कर है।'

निपतेयं क्व नु श्रान्त इति तस्मिञ्जलार्णवे ॥

अविषह्यः समुद्रो हि बहुसत्त्वगणालयः ।
महासत्त्वशतोद्भासी नभसोऽपि विशिष्यते ॥

कौआ सोचने लगा, ‘ मैं थक जानेपर इस जलराशिमें कहाँ उतरूँगा? बहुत - से जल-जन्तुओंका निवासस्थान समुद्र मेरे लिये असह्य है । असंख्य महाप्राणियोंसे उद्भासित होनेवाला यह महासागर तो आकाशसे भी बढ़कर है '

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 46-47पृष्ठ 1887

सूतपुत्र कर्ण! समुद्र में विचरने वाले मनुष्य भी उसकी गम्भीरता के कारण उसकी जलराशि की थाह नहीं जान पाते, फिर वह कौआ कुछ दूर तक उड़ने मात्र से उस समुद्र के जल समूह को पार कैसे कर सकता था?

चक्राङ्ग कौआ उड़कर आगे तो बढ़ चुका था, पर वह इस चिन्ता में रुक गया कि क्या यह कौआ उड़कर मेरे पास आ जाएगा? वह प्रतीक्षा करने लगा। तभी वह अत्यन्त थका-मादा कौआ हंस के समीप आया। हंस ने जब उसे देखा, तो पाया कि कौए की दशा बड़ी शोचनीय हो गई है; अब वह पानी में डूबने ही वाला है।

ततः काको भृशं श्रान्तो हंसमभ्यागमत्तदा ॥

तं तथा हीयमानं तु हंसो दृष्ट्वाब्रवीदिदम् ।
उज्जिहीर्षुर्निमज्जन्तं स्मरन् सत्पुरुषव्रतम् ॥

तदनन्तर उस समय अत्यन्त थका-मादा कौआ हंसके समीप आया । हंसने देखा, कौएकी दशा बड़ी शोचनीय हो गयी है । अब यह पानीमें डूबनेहीवाला है । तब उसने सत्पुरुषोंके व्रतका स्मरण करके उसके उद्धारकी इच्छा मनमें लेकर इस प्रकार कहा ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 51-52पृष्ठ 1888

सत्पुरुषों के व्रत का स्मरण करते हुए, उसके उद्धार की इच्छा मन में लेकर हंस ने कहा— "काग! तू तो बारम्बार अपनी बहुत-सी उड़ानों का बखान कर रहा था; परन्तु उन उड़ानों का वर्णन करते समय उनमें से इस गोपनीय रहस्ययुक्त उड़ान की बात तो तूने नहीं बताई थी। कौए! बता तो सही, तू इस समय जिस उड़ान से उड़ रहा है, उसका क्या नाम है? इस उड़ान में तो तू अपने दोनों पङ्खों और चोंच के द्वारा जल का बार-बार स्पर्श करने लगा है।"

वह कौआ उड़ान के वेग से थककर शिथिल हो गया था। वह जल का कहीं आर-पार न देख पा रहा था और नीचे गिरता जा रहा था। उस अवस्था में उसने हंस से कहा— "भाई हंस! हम तो कौए हैं। व्यर्थ काँव-काँव किया करते हैं। हम उड़ना क्या जानें? मैं अपने इन प्राणों के साथ तुम्हारी शरण में आया हूँ। तुम मुझे जल के किनारे तक पहुँचा दो।" इतना कहकर वह अत्यन्त थका-मादा कौआ, अपने दोनों पङ्खों और चोंच से जल को स्पर्श करता हुआ, सहसा उस महासागर में गिर पड़ा। उसे बड़ी पीड़ा हो रही थी।

हंस उवाच

बहूनि पतितानि त्वमाचक्षाणो मुहुर्मुहुः ।
पातस्य व्याहरंश्चेदं न नो गुह्यं प्रभाषसे ॥

हंस बोला - काग! तू तो बारंबार अपनी बहुत - सी उड़ानोंका बखान कर रहा था; परंतु उन उड़ानोंका वर्णन करते समय उनमेंसे इस गोपनीय रहस्ययुक्त उड़ानकी बात तो तूने नहीं बतायी थी ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 53पृष्ठ 1888

समुद्र के जल में गिरकर, मृत्यु के निकट पहुँचे हुए उस दीनचित्त कौए से हंस ने कहा— "काग! तूने अपनी प्रशंसा करते हुए कहा था कि मैं एक सौ एक उड़ानों द्वारा उड़ सकता हूँ। अब उन्हें याद कर! सौ उड़ानों से उड़ने वाला तू तो मुझसे बहुत बढ़ा-चढ़ा है, फिर इस प्रकार थककर महासागर में कैसे गिर पड़ा?"

उस समय जल में अत्यन्त कष्ट पाते हुए कौए ने हंस की ओर देखकर उसे प्रसन्न करने के लिए कहा— "भाई हंस! मैं जूठन खा-खाकर घमण्ड में भर गया था और बहुत-से कौओं तथा दूसरे पक्षियों का तिरस्कार करके अपने आप को गरुड़ के समान शक्तिशाली समझने लगा था। हे हंस! अब मैं अपने प्राणों के साथ तुम्हारी शरण में आया हूँ। तुम मुझे द्वीप के पास पहुँचा दो। शक्तिशाली हंस! यदि मैं कुशलपूर्वक अपने देश में पहुँच जाऊँ तो अब कभी किसी का अपमान नहीं करूँगा। तुम इस विपत्ति से मेरा उद्धार करो।"

काक उवाच

उच्छिष्टदर्पितो हंस मन्येऽऽत्मानं सुपर्णवत् ।
अवमन्य बहूंश्चाहं काकानन्यांश्च पक्षिणः ॥

कौआ बोला- भाई हंस! मैं जूठन खा- खाकर घमंडमें भर गया था औरबहुत-से कौओं तथा दूसरे पक्षियोंका तिरस्कार करके अपने - आपको गरुड़के समान शक्तिशाली समझने लगा था ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 64पृष्ठ 1891

कौआ अचेत सा होकर दीन भाव से विलाप करने लगा और काँव-काँव करते हुए महासागर के जल में डूबने लगा। उसका पानी से भीग जाना और उसकी दशा ऐसी थी कि उसे देखना कठिन हो रहा था। तब हंस ने कृपापूर्वक उसे अपने पञ्जों से उठाकर बड़े वेग से ऊपर उछाला और धीरे से अपनी पीठ पर चढ़ा लिया। अचेत हुए कौए को अपनी पीठ पर बिठाकर हंस तुरन्त ही उसी द्वीप में आ पहुँचा, जहाँ से दोनों उड़ान की होड़ लगाकर चले थे। उस कौए को उसके स्थान पर रखकर, वह मन के समान शीघ्रगामी हंस अपने अभीष्ट देश को चला गया।

शल्य कहते हैं— "दुष्टात्मा कर्ण! वह जूठन खाकर पुष्ट हुआ कौआ उस हंस से पराजित होकर अपने बल-पराक्रम के घमण्ड को त्याग कर शान्त हो गया। जिस प्रकार वह कौआ वैश्य के कुल में सबकी जूठन खाकर पला था, उसी प्रकार धृतराष्ट्र के पुत्रों ने तुम्हें जूठन खिला-खिलाकर पाला है, इसमें संशय नहीं है। कर्ण! इसी से तुम अपने समान तथा अपने से श्रेष्ठ पुरुषों का भी अपमान करते हो।"

उच्छिष्टभोजनः काको यथा वैश्यकुले पुरा ॥

एवं त्वमुच्छिष्टभृतो धार्तराष्ट्रैर्न संशयः ।
सदृशान् श्रेयसश्चापि सर्वान् कर्णावमन्यसे ॥

पूर्वकालमें वह कौआ जैसे वैश्यकुलमें सबकी जूठन खाकर पला था, उसी प्रकार धृतराष्ट्रके पुत्रोंने तुम्हें जूठन खिला-खिलाकर पाला है, इसमें संशय नहीं है । कर्ण! इसीसे तुम अपने समान तथा अपनेसे श्रेष्ठ पुरुषोंका भी अपमान करते हो ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 71-72पृष्ठ 1892

"विराटनगर में तो द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, भीष्म तथा अन्य कौरव वीर तुम्हारी रक्षा कर रहे थे; फिर उस समय तुमने अकेले सामने आए हुए अर्जुन का वध क्यों नहीं कर डाला? वहाँ तो किरीटधारी अर्जुन ने अलग-अलग और सब लोगों से एक साथ लड़कर भी तुम लोगों को उसी प्रकार परास्त कर दिया था, जैसे एक ही सिंह ने बहुत-से सियारों को मार भगाया हो। कर्ण! उस समय तुम्हारा पराक्रम कहाँ था?"

यत्र व्यस्ताः समस्ताश्च निर्जिताः स्थ किरीटिना ।
शृगाला इव सिंहेन क्व ते वीर्यमभूत् तदा ॥

वहाँ तो किरीटधारी अर्जुनने अलग- अलग और सब लोगोंसे एक साथ लड़कर भी तुमलोगोंको उसी प्रकार परास्त कर दिया था, जैसे एक ही सिंहने बहुत - से सियारोंको मार भगाया हो । कर्ण! उस समय तुम्हारा पराक्रम कहाँ था?

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 74पृष्ठ 1893

"जब सव्यसाची अर्जुन के द्वारा समराङ्गण में तुम्हारे भाई को मारा गया, तब तुम कौरव वीरों के समक्ष सबसे पहले भागे थे। जब द्वैतवन में ग्रन्धर्वों ने आक्रमण किया था, तब समस्त कौरवों को छोड़कर तुमने ही सबसे पहले पीठ दिखाई थी। वहाँ कुन्तीकुमार अर्जुन ने ही रणभूमि में चित्रसेन आदि गन्धर्वों को मार-पीटकर विजय पाई थी और स्त्रियों सहित दुर्योधन को उनकी कैद से छुड़ाया था। तुम्हारे गुरु परशुराम जी ने भी राजसभा में अर्जुन और श्रीकृष्ण के पुरातन प्रभाव का वर्णन किया था।"

भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा समरे सव्यसाचिना ।
पश्यतां कुरुवीराणां प्रथमं त्वं पलायितः ॥

सव्यसाची अर्जुनके द्वारा समरांगणमें अपने भाईको मारा गया देखकर कौरव वीरोंके समक्ष सबसे पहले तुम्हीं भागे थे ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 75पृष्ठ 1893

"तुमने द्रोणाचार्य और भीष्म की कही हुई बातें सदा सुनी हैं, जो श्रीकृष्ण और अर्जुन को अवध्य बताते थे। मैं कहाँ तक गिनूँ कि किन-किन गुणों के कारण अर्जुन तुमसे बढ़े-चढ़े हैं? जैसे ब्राह्मण समस्त प्राणियों से श्रेष्ठ हैं, वैसे ही अर्जुन तुमसे श्रेष्ठ हैं। तुम इसी समय प्रधान रथ पर बैठे हुए वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण तथा कुन्तीकुमार अर्जुन को देखोगे। जैसे कौआ बुद्धिका आश्रय लेकर चक्राङ्ग की शरण में गया था, उसी प्रकार तुम भी श्रीकृष्ण और अर्जुन की शरण लो।"

कियत् तत् तत् प्रवक्ष्यामि येन येन धनंजयः ।
त्वत्तोऽतिरिक्तः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ब्राह्मणो यथा ॥

मैं कहाँतक गिन- गिनकर बताऊँ कि किन-किन गुणोंके कारण अर्जुन तुमसे बढ़े - चढ़े हैं । जैसे ब्राह्मण समस्त प्राणियोंसे श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार अर्जुन तुमसे श्रेष्ठ हैं ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 80पृष्ठ 1893

"कर्ण! जब तुम युद्धस्थल में उन्हें एक रथ पर बैठे देखोगे, तब ऐसी बातें नहीं बोल सकोगे। जब अर्जुन अपने सैकड़ों बाणों द्वारा तुम्हारा घमण्ड चूर-चूर कर देंगे, तब तुम स्वयं ही देख लोगे कि तुममें और अर्जुन में कितना अन्तर है? जैसे जुगनू प्रकाशमान सूर्य और चन्द्रमा का तिरस्कार करता है, वैसे ही तुम देवताओं, असुरों और मनुष्यों में विख्यात उन दोनों वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन का मूर्खतावश अपमान न करो। जैसे सूर्य और चन्द्रमा हैं, वैसे ही श्रीकृष्ण और अर्जुन हैं; वे अपने तेज से सर्वत्र विख्यात हैं, परन्तु तुम तो मनुष्यों में जुगनू के समान हो। सूतपुत्र! इन महात्मा पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुन को ऐसा जानकर उनका अपमान न करो। बढ़-चढ़कर बातें बनाना बन्द करो और चुपचाप बैठे रहो।"

यदा शरशतैः पार्थो दर्पं तव वधिष्यति ।
तदा त्वमन्तरं द्रष्टा आत्मनश्चार्जुनस्य च ॥

जब अर्जुन अपने सैकड़ों बाणोंद्वारा तुम्हारा घमंड चूर- चूर कर देंगे, तब तुम स्वयं ही देख लोगे कि तुममें और अर्जुनमें कितना अन्तर है?

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 84पृष्ठ 1894

In English

Shalya's Parable of the Crow and the Swan

King Shalya tells Karna a story about an arrogant crow that challenges a swan to a flying contest and nearly drowns in the ocean. Shalya uses this story to criticize Karna for his pride and his failure to protect the Kauravas during past battles.

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  • What is the story of the crow and the swan?
  • Why did the crow fail the flying contest?
  • How did the swan save the crow?
  • What was shalya's criticism of karna?

Also written: Hansakakiyopakhyana, Hansakakiya, Shalya, Karna, Kaua, Hansa, हंसकाकीयोपाख्यान