त्रिताख्यान : लोभ और स्वार्थ के कारण अपनों का साथ कैसे छूट जाता है?
लोभ का विनाशकारी परिणाम
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ४ · शल्यपर्व → गदापर्व · अध्याय 36 · पृष्ठ 2736–2743
1,003 शब्द · 6 मिनटका पाठ · 9 श्लोक
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा
राजा जनमेजय के प्रश्न पर उत्तर देने हेतु।
वैशम्पायनजी ने कहा - महाराज! उस चमसोद्भेद-तीर्थ से चलकर बलरामजी यशस्वी त्रितमुनि के उदपान तीर्थ में गये, जो सरस्वती नदी के जल में स्थित है। मुसलधारी बलरामजी ने वहाँ जल का स्पर्श, आचमन एवं स्नान करके बहुत-सा द्रव्य दान कर ब्राह्मणों का पूजन किया और अत्यन्त प्रसन्न हुए। वहाँ महातपस्वी त्रितमुनि धर्मपरायण होकर रहते थे; उन महात्मा ने कुएँ में रहकर ही सोमपान किया था।
तस्मान्नदीगतं चापि ह्युदपानं यशस्विनः ।
त्रितस्य च महाराज जगामाथ हलायुधः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -महाराज! उस चमसोद्भेद - तीर्थसे चलकर बलरामजी यशस्वी त्रितमुनिके उदपान तीर्थमें गये, जो सरस्वती नदीके जलमें स्थित है ।
जनमेजय ने पूछा - ब्रह्मन्! उदपान तीर्थ कैसे हुआ? वे महातपस्वी त्रितमुनि उसमें कैसे गिर पड़े और द्विजश्रेष्ठ! उनके दोनों भाइयोंने उन्हें क्यों वहीं छोड़ दिया था? क्या कारण था, जिससे वे दोनों भाई उन्हें कुएँ में ही त्यागकर घर चले गये थे? वहाँ रहकर उन्होंने यज्ञ और सोमपान कैसे किया? ब्रह्मन्! यदि यह प्रसङ्ग मेरे सुननेयोग्य समझें तो अवश्य मुझे बतावें।
वैशम्पायनजी ने कहा - राजन्! पहले युग में तीन सहोदर भाई रहते थे—एकत, द्वित और त्रित। वे सभी महर्षि सूर्य के समान तेजस्वी, प्रजापतिके समान सन्तानवान् और ब्रह्मवादी थे। उन्होंने तपस्या द्वारा ब्रह्मलोक पर विजय प्राप्त की थी। उनके धर्म-परायण पिता गौतम सदा उनकी तपस्या, नियम और इन्द्रियनिग्रह से प्रसन्न रहते थे। उन पुत्रों की त्याग-तपस्या से सन्तुष्ट होते हुए वे पूजनीय महात्मा गौतम दीर्घकाल के पश्चात् अपने अनुरूप स्थान स्वर्गलोक में चले गये। उनके स्वर्गवासी होने पर राजा लोग उनके पुत्रों का ही आदर-सत्कार करने लगे। उन तीनों में भी अपने शुभ कर्म और स्वाध्याय के द्वारा महर्षि त्रित ने सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया; जैसे उनके पिता सम्मानित थे, वैसे ही वे भी हो गये।
आसन् पूर्वयुगे राजन् मुनयो भ्रातरस्त्रयः ॥
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चादित्यसंनिभाः ।
सर्वे प्रजापतिसमाः प्रजावन्तस्तथैव च ॥
ब्रह्मलोकजितः सर्वे तपसा ब्रह्मवादिनः । वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! पहले युगमें तीन सहोदर भाई रहते थे । वे तीनों ही मुनि थे । उनके नाम थे एकत, द्वित और त्रित । वे सभी महर्षि सूर्यके समान तेजस्वी, प्रजापतिके समान संतानवान् और ब्रह्मवादी थे । उन्होंने तपस्याद्वारा ब्रह्मलोकपर विजय प्राप्त की भी ।
एक दिन की बात है, उनके दोनों भाई एकत और द्वित यज्ञ और धन के लिये चिन्ता करने लगे। उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि हमलोग त्रित को साथ लेकर यजमानों का यज्ञ करावें और दक्षिणा के रूप में बहुत-से पशु प्राप्त करके महान् फलदायक यज्ञ का अनुष्ठान करें और उसी में प्रसन्नतापूर्वक सोमरस का पान करें। ऐसा विचार करके उन तीनों भाइयों ने वही किया; वे सभी यजमानों के यहाँ पशुओं की प्राप्ति के उद्देश्य से गये और उनसे विधिपूर्वक यज्ञ करवाकर बहुतेरे पशु प्राप्त कर लिये। तत्पश्चात् वे महात्मा महर्षि पूर्वदिशा की ओर चल दिये। उनमें त्रित मुनि तो प्रसन्नतापूर्वक आगे-आगे चलते थे और एकत तथा द्वित पीछे रहकर पशुओं को हाँकते जाते थे।
यज्ञार्थं चक्रतुश्चिन्तां तथा वित्तार्थमेव च ।
तयोर्बुद्धिः समभवत् त्रितं गृह्य परंतप ॥
याज्यान् सर्वानुपादाय प्रतिगृह्य पशूंस्ततः ।
सोमं पास्यामहे हृष्टाः प्राप्य यज्ञं महाफलम् ॥
राजन्! एक दिनकी बात है, उनके दोनों भाई एकत और द्वित यज्ञ और धनके लिये चिन्ता करने लगे । शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि हमलोग त्रितको साथ लेकर यजमानोंका यज्ञ करावें और दक्षिणाके रूपमें बहुत - से पशु प्राप्त करके महान् फलदायक यज्ञका अनुष्ठान करें और उसीमें प्रसन्नतापूर्वक सोमरसका पान करें ।
पशुओं के उस महान् समुदाय को देखकर एकत और द्वित के मन में यह चिन्ता समायी कि किस उपाय से ये गौएँ त्रित को न मिलकर हम दोनों के ही पास रह जायँ। उन एकत और द्वित- दोनों पापियों ने आपस में सलाह की—"त्रित यज्ञ कराने में कुशल हैं, वेदों के विद्वान् हैं, अतः वे और बहुत-सी गौएँ प्राप्त कर लेंगे। इस समय हम दोनों एक साथ होकर इन गौओं को हाँक ले चलें और त्रित हमसे अलग होकर जहाँ इच्छा हो वहाँ चले जायँ।"
तावन्योन्यं समाभाष्य एकतश्च द्वितश्च ह ॥
यदूचतुर्मिथः पापौ तन्निबोध जनेश्वर । जनेश्वर! उन एकत और द्वित- दोनों पापियोंने एक- दूसरेसे सलाह करके परस्पर जो कुछ कहा, वह बताता हूँ, सुनो ।
रात्रिका समय था और वे तीनों भाई रास्ता पकड़े चले आ रहे थे। उनके मार्ग में एक भेड़िया खड़ा था। वहाँ पास ही सरस्वती के तट पर एक बहुत बड़ा कुआँ था। त्रित अपने आगे रास्ते में खड़े हुए भेड़िये को देखकर उसके भय से भागने लगे और भागते-भागते वे समस्त प्राणियों के लिये भयङ्कर उस महाघोर अगाध कूप में गिर पड़े। कुएँ में पहुँचने पर मुनिश्रेष्ठ त्रित ने बड़े जोर से आर्तनाद किया, जिसे उन दोनों भाइयों ने सुना; परन्तु अपने भाई को कुएँ में गिरा हुआ जानकर भी दोनों भाई एकत और द्वित भेड़िये के भय और लोभ से उन्हें वहीं छोड़कर चल दिये।
तं ज्ञात्वा पतितं कूपे भ्रातरावेकतद्वितौ ।
वृकत्रासाच्च'लोभाच्च समुत्सृज्य प्रजग्मतुः ॥
अपने भाईको कुएँमें गिरा हुआ जानकर भी दोनों भाई एकत और द्वित भेड़ियेके भय और लोभसे उन्हें वहीं छोड़कर चल दिये ।
उस निर्जल कूप में तृण, वीरुध और लताओं से व्याप्त स्वयं को गिरा देख मृत्यु से डरे हुए त्रित सोचने लगे—'मैं इस कुएँ में रहकर कैसे सोमरस का पान कर सकता हूँ?' तभी उन्होंने वहाँ एक लता देखी जो दैवयोग से फैली हुई थी। मुनि ने उस बालू भरे कूप में जल की भावना करके सङ्कल्प द्वारा अग्नि की स्थापना की और होता आदिके स्थान पर स्वयं को प्रतिष्ठित किया। उन्होंने उस लता में सोम की भावना करके मन-ही-मन ऋग्, यजु और सामका का चिन्तन किया। फिर कङ्कड़ और बालू के कणों में सिल और लोढ़े की भावना करके उन्हें पीसकर लता से सोमरस निकाला। जल में घी का सङ्कल्प कर उन्होंने देवताओं के भाग नियत किये और सोमरस तैयार करके उसकी आहुति देते हुए वेद-मन्त्रों की गम्भीर ध्वनि की।
त्रित की वह वेदध्वनि स्वर्गलोक तक गूँज उठी। जब वह महान् यज्ञ चालू हुआ, तो सारा स्वर्गलोक उद्विग्न हो उठा, परन्तु किसी को इसका कारण ज्ञात न हुआ। तब देवपुरोहित बृहस्पतिजी ने वेदमन्त्रों के उस तुमुलनाद को सुनकर कहा—"देवगण! त्रित मुनि का यज्ञ हो रहा है, वहाँ हमें चलना चाहिये। वे महान् तपस्वी हैं; यदि हम नहीं चलेंगे तो वे कुपित होकर दूसरे देवताओं की सृष्टि कर लेंगे।"
वर्तमाने महायज्ञे त्रितस्य सुमहात्मनः ॥
आविग्नं त्रिदिवं सर्वं कारणं च न बुद्धयते । महात्मा त्रितका वह महान् यज्ञ जब चालू हुआ, उस समय सारा स्वर्गलोक उद्विग्न हो उठा, परंतु किसीको इसका कोई कारण नहीं जान पड़ा ।
बृहस्पतिजी का वचन सुनकर सब देवता एक साथ उस स्थान पर गये जहाँ त्रित का यज्ञ प्रवर्तित था। वहाँ पहुँचकर देवताओं ने उस कूप को देखा जिसमें तेजस्वी त्रित मौजूद थे। देवताओं ने कहा—"हम लोग यज्ञ में अपना भाग लेने के लिये आये हैं।" उस समय महर्षि ने उनसे कहा—"देवताओ! देखो, मैं किस दशा में पड़ा हूँ। इस भयानक कूप में गिरकर अपनी सुध-बुध खो बैठा हूँ।" तदनन्तर त्रित ने देवताओं को विधिपूर्वक मन्त्रोच्चारण करते हुए उनके भाग समर्पित किये। इससे देवता अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्हें मनोवाञ्छित वर प्रदान करने लगे।
ददृशुस्तं महात्मानं दीक्षितं यज्ञकर्मसु ।
दृष्ट्वा चैनं महात्मानं श्रिया परमया युतम् ॥
ऊचुश्चैनं महाभागं प्राप्ता भागार्थिनो वयम् । वहाँ पहुँचकर देवताओंने उस कूपको देखा, जिसमें त्रित मौजूद थे । साथ ही उन्होंने यज्ञमें दीक्षित हुए महात्मा त्रितमुनिका भी दर्शन किया । वे बड़े तेजस्वी दिखायी दे रहे थे । उन महाभाग मुनिका दर्शन करके देवताओंने उनसे कहा - ' हमलोग यज्ञमें अपना भाग लेनेके लिये आये हैं '
मुनि ने देवताओं से वर माँगते हुए कहा—"मुझे इस कूप से आप लोग बचावें तथा जो मनुष्य इसमें आचमन करे, उसे यज्ञ में सोमपान करने वालों की गति प्राप्त हो।" मुनि के इतना कहते ही कुएँ में तरङ्गमालाओं से सुशोभित सरस्वती नदी लहरा उठी और अपने जल के वेग से मुनि को ऊपर उठाकर बाहर निकाल दिया। फिर त्रित ने देवताओं का पूजन किया। देवताओं ने 'तथास्तु' कहकर अपना प्रस्थान किया और त्रित भी प्रसन्नतापूर्वक अपने घर को लौट गये।
तत्राप्यमितविक्रान्तः स्पृष्ट्वा तोयं हलायुधः ॥
दत्त्वा च विविधान् दायान् पूजयित्वा च वै द्विजान् । अमित पराक्रमी बलरामजीने उस तीर्थमें भी जलका स्पर्श किया और ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें नाना प्रकारके धन प्रदान किये ।
वहाँ पहुँचकर महातपस्वी त्रित ने कुपित होकर अपने दोनों भाइयों को कठोर वाणी में शाप दिया—"तुम दोनों पशुओं के लोभ में फँसकर मुझे छोड़कर भाग आये; इसलिये इसी पापकर्म के कारण मेरे शाप से तुम दोनों भाई महाभयङ्कर भेड़िये का शरीर धारण करके इधर-उधर भटकते फिरोगे। तुम्हारी सन्तान के रूप में गोलाङ्गूल, रीछ और वानर आदि पशुओं की उत्पत्ति होगी।" उनके इतना कहते ही वे दोनों भाई उस सत्यवादी के वचन से उसी क्षण भेड़िये की शक्ल में दिखाई देने लगे।
क्रुद्धस्तु स समासाद्य तावृषी भ्रातरौ तदा ॥
उवाच परुषं वाक्यं शशाप च महातपाः ।
पशुलुब्धौ युवां यस्मान्मामुत्सृज्य प्रधावितौ ॥
तस्माद् वृकाकृती रौद्रौ दंष्ट्रिणावभितश्चरौ ।
भवितारौ मया शप्तौ पापेनानेन कर्मणा ॥
प्रसवश्चैव युवयोर्गोलाङ्गूलर्क्षवानराः । उन महातपस्वीने कुपित हो अपने उन दोनों ऋषि भाइयोंके पास पहुँचकर कठोर वाणीमें शाप देते हुए कहा –' तुम दोनों पशुओंके लोभमें फँसकर मुझे छोड़कर भाग आये । इसलिये इसी पापकर्मके कारण मेरे शापसे तुम दोनों भाई महाभयंकर भेड़ियेका शरीर धारण करके दाँढ़ोंसे युक्त हो इधर-उधर भटकते फिरोगे । तुम दोनोंकी संतानके रूपमें गोलांगूल, रीछ और वानर आदि पशुओंकी उत्पत्ति होगी'
In English
The Story of Tritamuni and the Sacred Well
Tritamuni falls into a deep well while fleeing a wolf, leaving his brothers Ekta and Dvita behind to steal their livestock. While trapped, Tritamuni performs a ritual sacrifice using plants and sand, which attracts the gods who then rescue him via the Saraswati river. Upon returning home, Tritamuni curses his brothers to live as wolves because they abandoned him for greed.
This page answers
- How did tritamuni fall into the well?
- Why did ekta and dvita abandon their brother?
- How did the gods rescue tritamuni from the well?
- What curse did tritamuni give to his brothers?
Also written: Tritakhyana, Trita, Ekata, Dvita, Gautama, Balarama, Brihaspati, Sarasvati, त्रिताख्यान