श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 2731–2740
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2731–2740
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और आलस्य छोड़कर अपने पिताके पास जाकर बोलीं- ' प्रभो! चन्द्रमा हमारे पास नहीं आते । वे सदा रोहिणीका ही सेवन करते हैं ॥ ५० ॥
ता वयं सहिताः सर्वास्त्वत्सकाशे प्रजेश्वर ।
वत्स्यामो नियताहारास्तपश्चरणतत्पराः ॥ ५१ ॥
‘ अतः प्रजेश्वर! हम सब बहिनें एक साथ नियमित आहार करके तपस्यामें संलग्न हो आपके ही पास रहेंगी ' ॥
श्रुत्वा तासां तु वचनं दक्षः सोममथाब्रवीत् ।
समं वर्तस्व भार्यासु मा त्वाधर्मो महान् स्पृशेत् ॥ ५२ ॥
उनकी यह बात सुनकर प्रजापति दक्षने चन्द्रमासे कहा - 'सोम! तुम अपनी सभी पत्नियोंके साथ समानतापूर्ण बर्ताव करो, जिससे तुम्हें महान् पाप न लगे ' ॥ ५२ ॥
तास्तु सर्वाब्रवीद् दक्षो गच्छध्वं शशिनोऽन्तिकम् ।
समं वत्स्यति सर्वासु चन्द्रमा मम शासनात् ॥ ५३ ॥
फिर दक्षने उन सभी कन्याओंसे कहा- ' अब तुमलोग चन्द्रमाके पास ही जाओ । वे मेरी आज्ञासे तुम सब लोगोंके प्रति समानभाव रखेंगे ' ॥ ५३ ॥
विसृष्टास्तास्तथा जग्मुः शीतांशुभवनं तदा ।
तथापि सोमो भगवान् पुनरेव महीपते ॥ ५४ ॥
रोहिणीं निवसत्येव प्रीयमाणो मुहुर्मुहुः । पृथ्वीनाथ! पिताके विदा करनेपर वे पुनः चन्द्रमाके घरमें लौट गयीं, तथापि भगवान् सोम फिर रोहिणीके पास ही अधिकाधिक प्रेमपूर्वक रहने लगे ॥ ५४३ ॥
ततस्ताः सहिताः सर्वा भूयः पितरमब्रुवन् ॥ ५५ ॥
तव शुश्रूषणे युक्ता वत्स्यामो हि तवान्तिके ।
सोमो वसति नास्मासु नाकरोद् वचनं तव ॥ ५६ ॥
तब वे सब कन्याएँ पुनः एक साथ अपने पिताके पास जाकर बोलीं — ' हम सब लोग
आपकी सेवामें तत्पर रहकर आपके ही समीप रहेंगी । चन्द्रमा हमारे साथ नहीं रहते ।
उन्होंने आपकी बात नहीं मानी' ॥ ५५-५६ ॥
तासां तद् वचनं श्रुत्वा दक्षः सोममथाब्रवीत् ।
समं वर्तस्व भार्यासु मा त्वां शप्स्ये विरोचन ॥ ५७ ॥
उनकी बात सुनकर दक्षने पुनः सोमसे कहा – ' प्रकाशमान चन्द्रदेव! तुम अपनी सभी पत्नियोंके साथ समान बर्ताव करो, नहीं तो तुम्हें शाप दे दूँगा' ॥ ५७ ॥
अनादृत्य तु तद् वाक्यं दक्षस्य भगवान् शशी ।
रोहिण्या सार्धमवसत् ततस्ताः कुपिताः पुनः ॥ ५८ ॥
गत्वा च पितरं प्राहुः प्रणम्य शिरसा तदा ।
सोमो वसति नास्मासु तस्मान्नः शरणं भव ॥ ५ ९ ॥
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दक्षके इतना कहनेपर भी भगवान् चन्द्रमा उनकी बातकी अवहेलना करके केवल रोहिणीके ही साथ रहने लगे। यह देख दूसरी स्त्रियाँ पुनः क्रोधसे जल उठीं और पिताके पास जा उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर प्रणाम करनेके अनन्तर बोलीं- ' भगवन्! सोम
हमारे पास नहीं रहते । अतः आप हमें शरण दें ॥
रोहिण्यामेव भगवान् सदा वसति चन्द्रमाः ।
न त्वद्वचो गणयति नास्मासु स्नेहमिच्छति ॥ ६० ॥
तस्मान्नस्त्राहि सर्वा वै यथा नः सोम आविशेत् । ‘ भगवान् चन्द्रमा सदा रोहिणीके ही समीप रहते हैं । वे आपकी बातको कुछ गिनते ही नहीं हैं । हमलोगोंपर स्नेह रखना नहीं चाहते हैं, अतः आप हम सब लोगोंकी रक्षा करें, जिससे चन्द्रमा हमारे साथ भी सम्बन्ध रखें' ॥ ६० ॥
तच्छ्रुत्वा भगवान् क्रुद्धो यक्ष्माणं पृथिवीपते ॥ ६१ ॥
ससर्ज रोषात् सोमाय स चोडुपतिमाविशत् । पृथ्वीनाथ! यह सुनकर भगवान् दक्ष कुपित हो उठे । उन्होंने चन्द्रमाके लिये रोषपूर्वक
राजयक्ष्माकी सृष्टि की । वह चन्द्रमाके भीतर प्रविष्ट हो गया ॥ ६१३ ॥
स यक्ष्मणाभिभूतात्माक्षीयताहरहः शशी ॥ ६२ ॥
यत्नं चाप्यकरोद् राजन् मोक्षार्थं तस्य यक्ष्मणः । यक्ष्मासे शरीर ग्रस्त हो जानेके कारण चन्द्रमा प्रतिदिन क्षीण होने लगे । राजन्! उस यक्ष्मासे छूटनेके लिये उन्होंने बड़ा यत्न किया ॥ ६२३ ॥
इष्ट्वेष्टिभिर्महाराज विविधाभिर्निशाकरः ॥ ६३ ॥
न चामुच्यत शापाद् वै क्षयं चैवाभ्यगच्छत । महाराज! नाना प्रकारके यज्ञ- यागोंका अनुष्ठान करके भी चन्द्रमा उस शापसे मुक्त न हो सके और धीरे - धीरे क्षीण होते चले गये ॥ ६३३ ॥
क्षीयमाणे ततः सोमे ओषध्यो न प्रजज्ञिरे ॥ ६४ ॥
निरास्वादरसाः सर्वा हतवीर्याश्च सर्वशः । चन्द्रमाके क्षीण होनेसे अन्न आदि ओषधियाँ उत्पन्न नहीं होती थीं । उन सबके स्वाद, रस और प्रभाव नष्ट हो गये ॥ ६४ ॥
ओषधीनां क्षये जाते प्राणिनामपि संक्षयः ॥ ६५ ॥
कृशाश्चासन् प्रजाः सर्वाः क्षीयमाणे निशाकरे । ओषधियोंके क्षीण होनेसे समस्त प्राणियोंका भी क्षय होने लगा । इस प्रकार चन्द्रमाके क्षयके साथ - साथ सारी प्रजा अत्यन्त दुर्बल हो गयी ॥ ६५३ ॥
ततो देवाः समागम्य सोममूचुर्महीपते ॥ ६६ ॥
किमिदं भवतो रूपमीदृशं न प्रकाशते ।
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कारणं ब्रूहि नः सर्वं येनेदं ते महद् भयम् ॥ ६७ ॥
श्रुत्वा तु वचनं त्वत्तो विधास्यामस्ततो वयम् । पृथ्वीनाथ! उस समय देवताओंने चन्द्रमासे मिलकर पूछा - ' आपका रूप ऐसा कैसे हो गया? यह प्रकाशित क्यों नहीं होता है? हमलोगोंसे सारा कारण बताइये, जिससे आपको महान् भय प्राप्त हुआ । आपकी बात सुनकर हमलोग इस संकटके निवारणका कोई उपाय करेंगे ' ॥ ६६-६७ ॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच सर्वांस्तान् शशलक्षणः ॥ ६८ ॥
शापस्य लक्षणं चैव यक्ष्माणं च तथाऽऽत्मनः । उनके इस प्रकार पूछनेपर चन्द्रमाने उन सबको उत्तर देते हुए अपनेको प्राप्त हुए शापके कारण राजयक्ष्माकी उत्पत्ति बतलायी ॥ ६८३ ॥
देवास्तथा वचः श्रुत्वा गत्वा दक्षमथाब्रुवन् ॥ ६ ९ ॥ प्रसीद भगवन् सोमे शापोऽयं विनिवर्त्यताम् । उनका वचन सुनकर देवता दक्षके पास जाकर बोले — ' भगवन्! आप चन्द्रमापर प्रसन्न होइये और यह शाप हटा लीजिये ॥ ६ ९ ३ ॥ असौ हि चन्द्रमाः क्षीणः किञ्चिच्छेषो हि लक्ष्यते ॥ ७० ॥
क्षयाच्चैवास्य देवेश प्रजाश्चैव गताः क्षयम् ।
वीरुदोषधयश्चैव बीजानि विविधानि च ॥ ७१ ॥
'चन्द्रमा क्षीण हो चुके हैं और उनका कुछ ही अंश शेष दिखायी देता है । देवेश्वर! उनके क्षयसे लता, वीरुत्, ओषधियाँ भाँति- भाँतिके बीज और सम्पूर्ण प्रजा भी क्षीण हो गयी है ॥ ७०-७१ ॥
तेषां क्षये क्षयोऽस्माकं विनास्माभिर्जगच्च किम् ।
इति ज्ञात्वा लोकगुरो प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ७२ ॥
‘ उन सबके क्षीण होनेपर हमारा भी क्षय हो जायगा । फिर हमारे बिना संसार कैसे रह सकता है? लोकगुरो! ऐसा जानकर आपको चन्द्रदेवपर अवश्य कृपा करनी चाहिये ' ॥ ७२ ॥
एवमुक्तस्ततो देवान् प्राह वाक्यं प्रजापतिः ।
नैतच्छक्यं मम वचो व्यावर्तयितुमन्यथा ॥ ७३ ॥
हेतुना तु महाभागानिवर्तिष्यति केनचित् । उनके ऐसा कहनेपर प्रजापति दक्ष देवताओंसे इस प्रकार बोले - ' महाभाग देवगण!
मेरी बात पलटी नहीं जा सकती । किसी विशेष कारणसे वह स्वतः निवृत्त हो जायगी ॥ ७३
३ ॥
समं वर्ततु सर्वासु शशी भार्यासु नित्यशः ॥ ७४ ॥
सरस्वत्या वरे तीर्थे उन्मज्जन् शशलक्षणः ।
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पुनर्वर्धिष्यते देवास्तद् वै सत्यं वचो मम ॥ ७५ ॥
‘ यदि चन्द्रमा अपनी सभी पत्नियोंके प्रति सदा समान बर्ताव करें और सरस्वतीके श्रेष्ठ तीर्थमें गोता लगायें तो वे पुनः बढ़कर पुष्ट हो जायँगे । देवताओ! मेरी यह बात अवश्य सच होगी ॥ ७४-७५ ॥
मासार्धं च क्षयं सोमो नित्यमेव गमिष्यति ।
मासार्धं तु सदा वृद्धिं सत्यमेतद् वचो मम ॥ ७६ ॥
‘ सोम आधे मासतक प्रतिदिन क्षीण होंगे और आधे मासतक निरन्तर बढ़ते रहेंगे । मेरी यह बात अवश्य सत्य होगी ॥ ७६ ॥
समुद्रं पश्चिमं गत्वा सरस्वत्यब्धिसङ्गमम् ।
आराधयतु देवेशं ततः कान्तिमवाप्स्यति ॥ ७७ ॥
‘ पश्चिमी समुद्रके तटपर जहाँ सरस्वती और समुद्रका संगम हुआ है, वहाँ जाकर चन्द्रमा देवेश्वर महादेवजीकी आराधना करें तो पुनः वे अपनी कान्ति प्राप्त कर लेंगे ' ॥ ७७ ॥
सरस्वतीं ततः सोमः स जगामर्षिशासनात् ।
प्रभासं प्रथमं तीर्थं सरस्वत्या जगाम ह ॥ ७८ ॥
ऋषि ( दक्ष प्रजापति ) - के इस आदेशसे सोम सरस्वतीके प्रथम तीर्थ प्रभासक्षेत्रमें गये ॥ ७८ ॥
अमावास्यां महातेजास्तत्रोन्मज्जन् महाद्युतिः ।
लोकान् प्रभासयामास शीतांशुत्वमवाप च ॥ ७९ ॥
महातेजस्वी महाकान्तिमान् चन्द्रमाने अमावास्याको उस तीर्थमें गोता लगाया । इससे उन्हें शीतल किरणें प्राप्त हुईं और वे सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करने लगे ॥ ७९ ॥
देवास्तु सर्वे राजेन्द्र प्रभासं प्राप्य पुष्कलम् ।
सोमेन सहिता भूत्वा दक्षस्य प्रमुखेऽभवन् ॥ ८० ॥
राजेन्द्र! फिर सम्पूर्ण देवता सोमके साथ महान् प्रकाश प्राप्त करके पुनः दक्षप्रजापतिके सामने उपस्थित हुए ॥ ८० ॥
ततः प्रजापतिः सर्वा विससर्जाथ देवताः ।
सोमं च भगवान् प्रीतो भूयो वचनमब्रवीत् ॥ ८१ ॥
तब भगवान् प्रजापतिने समस्त देवताओंको विदा कर दिया और सोमसे पुनः प्रसन्नतापूर्वक कहा— ॥ ८१ ॥
मावमंस्थाः स्त्रियः पुत्र मा च विप्रान् कदाचन ।
गच्छ युक्तः सदा भूत्वा कुरु वै शासनं मम ॥ ८२ ॥
' बेटा! अपनी स्त्रियों तथा ब्राह्मणोंकी कभी अवहेलना न करना । जाओ, सदा सावधान रहकर मेरी आज्ञाका पालन करते रहो ' ॥ ८२ ॥
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स विसृष्टो महाराज जगामाथ स्वमालयम् ।
प्रजाश्च मुदिता भूत्वा पुनस्तस्थुर्यथा पुरा ॥ ८३ ॥
महाराज! ऐसा कहकर प्रजापतिने उन्हें विदा कर दिया । चन्द्रमा अपने स्थानको चले गये और सारी प्रजा पूर्ववत् प्रसन्न रहने लगी ॥ ८३ ॥
एवं ते सर्वमाख्यातं यथा शप्तो निशाकरः ।
प्रभासं च यथा तीर्थं तीर्थानां प्रवरं महत् ॥ ८४ ॥
इस प्रकार चन्द्रमाको जैसे शाप प्राप्त हुआ था और महान् प्रभासतीर्थ जिस प्रकार सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ माना गया, वह सारा प्रसंग मैंने तुमसे कह सुनाया ॥ ८४ ॥
अमावास्यां महाराज नित्यशः शशलक्षणः ।
स्नात्वा ह्याप्यायते श्रीमान् प्रभासे तीर्थ उत्तमे ॥ ८५ ॥
महाराज! चन्द्रमा उत्तम प्रभासतीर्थमें प्रत्येक अमावास्याको स्नान करके कान्तिमान् एवं पुष्ट होते हैं ॥
अतश्चैतत् प्रजानन्ति प्रभासमिति भूमिप ।
प्रभां हि परमां लेभे तस्मिन्नुन्मज्ज्य चन्द्रमाः ॥ ८६ ॥
भूमिपाल! इसीलिये सब लोग इसे प्रभासतीर्थके नामसे जानते हैं; क्योंकि उसमें गोता लगाकर चन्द्रमाने उत्कृष्ट प्रभा प्राप्त की थी ॥ ८६ ॥
ततस्तु चमसोद्भेदमच्युतस्त्वगमद् बली ।
चमसोद्भेद इत्येवं यं जनाः कथयन्त्युत ॥ ८७ ॥
तदनन्तर भगवान् बलराम चमसोद्भेद नामक तीर्थमें गये । उस तीर्थको सब लोग चमसोद्भेदके नामसे ही पुकारते हैं ॥ ८७ ॥
तत्र दत्त्वा च दानानि विशिष्टानि हलायुधः ।
उषित्वा रजनीमेकां स्नात्वा च विधिवत्तदा ॥ ८८ ॥
उदपानमथागच्छत्त्वरावान् केशवाग्रजः ।
आद्यं स्वस्त्ययनं चैव यत्रावाप्य महत् फलम् ॥ ८ ९ ॥
स्निग्धत्वादोषधीनां च भूमेश्च जनमेजय ।
जानन्ति सिद्धा राजेन्द्र नष्टामपि सरस्वतीम् ॥ ९ ० ॥
श्रीकृष्णके बड़े भाई हलधारी बलरामने वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके उत्तम दान दे एक रात रहकर बड़ी उतावलीके साथ वहाँसे उदपानतीर्थको प्रस्थान किया, जो मंगलकारी आदि तीर्थ है । राजेन्द्र जनमेजय! उदपान वह तीर्थ है, जहाँ उपस्थित होनेमात्रसे महान् फलकी प्राप्ति होती है । सिद्ध पुरुष वहाँ ओषधियों ( वृक्षों और लताओं ) -की स्निग्धता और भूमिकी आर्द्रता देखकर अदृश्य हुई सरस्वतीको भी जान लेते हैं ॥ ८८ – ९० ॥
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इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां प्रभासोत्पत्तिकथने पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें प्रभासतीर्थका वर्णनविषयक पैंतीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
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षट्त्रिंशोऽध्यायः उदपानतीर्थकी उत्पत्तिकी तथा त्रित मुनिके कूपमें गिरने, वहाँ यज्ञ करने और अपने भाइयोंको शाप देनेकी कथा वैशम्पायन उवाच
तस्मान्नदीगतं चापि ह्युदपानं यशस्विनः ।
त्रितस्य च महाराज जगामाथ हलायुधः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -महाराज! उस चमसोद्भेद - तीर्थसे चलकर बलरामजी यशस्वी त्रितमुनिके उदपान तीर्थमें गये, जो सरस्वती नदीके जलमें स्थित है ॥ १ ॥
तत्र दत्त्वा बहु द्रव्यं पूजयित्वा तथा द्विजान् ।
उपस्पृश्य च तत्रैव प्रहृष्टो मुसलायुधः ॥ २ ॥
मुसलधारी बलरामजीने वहाँ जलका स्पर्श, आचमन एवं स्नान करके बहुत - सा द्रव्य
दान करनेके पश्चात् ब्राह्मणोंका पूजन किया । फिर वे बहुत प्रसन्न हुए ॥ २ ॥
तत्र धर्मप भूत्वा त्रितः स सुमहातपाः ।
कूपे च वसता तेन सोमः पीतो महात्मना ॥ ३ ॥
वहाँ महातपस्वी त्रितमुनि धर्मपरायण होकर रहते थे । उन महात्माने कुएँमें रहकर ही सोमपान किया था ॥
तत्र चैनं समुत्सृज्य भ्रातरौ जग्मतुर्गृहान् ।
ततस्तौ वै शशापाथ त्रितो ब्राह्मणसत्तमः ॥ ४ ॥
उनके दो भाई उस कुएँमें ही उन्हें छोड़कर घरको चले गये थे । इससे ब्राह्मणश्रेष्ठ त्रितने दोनोंको शाप दे दिया था ॥ ४ ॥
जनमेजय उवाच
उदपानं कथं ब्रह्मन् कथं च सुमहातपाः ।
पतितः किं च संत्यक्तो भ्रातृभ्यां द्विजसत्तम ॥ ५ ॥
कूपे कथं च हित्वैनं भ्रातरौ जग्मतुर्गृहान् ।
कथं च याजयामास पपौ सोमं च वै कथम् ॥ ६ ॥
एतदाचक्ष्व मे ब्रह्मन् श्रोतव्यं यदि मन्यसे । जनमेजयने पूछा-ब्रह्मन्! उदपान तीर्थ कैसे हुआ? वे महातपस्वी त्रितमुनि उसमें कैसे गिर पड़े और द्विजश्रेष्ठ! उनके दोनों भाइयोंने उन्हें क्यों वहीं छोड़ दिया था? क्या कारण था, जिससे वे दोनों भाई उन्हें कुएँमें ही त्यागकर घर चले गये थे? वहाँ रहकर
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उन्होंने यज्ञ और सोमपान कैसे किया? ब्रह्मन्! यदि यह प्रसंग मेरे सुननेयोग्य समझें तो अवश्य मुझे बतावें ॥ ५-६३ ॥ वैशम्पायन उवाच आसन् पूर्वयुगे राजन् मुनयो भ्रातरस्त्रयः ॥ ७ ॥
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चादित्यसंनिभाः ।
सर्वे प्रजापतिसमाः प्रजावन्तस्तथैव च ॥ ८ ॥
ब्रह्मलोकजितः सर्वे तपसा ब्रह्मवादिनः । वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! पहले युगमें तीन सहोदर भाई रहते थे । वे तीनों ही मुनि थे । उनके नाम थे एकत, द्वित और त्रित । वे सभी महर्षि सूर्यके समान तेजस्वी, प्रजापतिके समान संतानवान् और ब्रह्मवादी थे । उन्होंने तपस्याद्वारा ब्रह्मलोकपर विजय प्राप्त की भी ॥ ७-८३ ॥ तेषां तु तपसा प्रीतो नियमेन दमेन च ॥ ९ ॥
अभवद् गौतमो नित्यं पिता धर्मरतः सदा । उनकी तपस्या, नियम और इन्द्रियनिग्रहसे उनके धर्म- परायण पिता गौतम सदा ही प्रसन्न रहा करते थे ॥ ९ ३ ॥ स तु दीर्घेण कालेन तेषां प्रीतिमवाप्य च ॥ १० ॥
जगाम भगवान् स्थानमनुरूपमिवात्मनः । उन पुत्रोंकी त्याग - तपस्यासे संतुष्ट रहते हुए वे पूजनीय महात्मा गौतम दीर्घकालके पश्चात् अपने अनुरूप स्थान ( स्वर्गलोक) में चले गये ॥ १० ॥
राजानस्तस्य ये ह्यासन् याज्या राजन् महात्मनः ॥ ११ ॥
ते सर्वे स्वर्गते तस्मिंस्तस्य पुत्रानपूजयन् । राजन्! उन महात्मा गौतमके यजमान जो राजा लोग थे, वे सब उनके स्वर्गवासी हो जानेपर उनके पुत्रोंका ही आदर- सत्कार करने लगे ॥ ११३ ॥
तेषां तु कर्मणा राजंस्तथा चाध्ययनेन च ॥ १२ ॥
त्रितः स श्रेष्ठतां प्राप यथैवास्य पिता तथा । नरेश्वर! उन तीनोंमें भी अपने शुभ कर्म और स्वाध्यायके द्वारा महर्षि त्रितने सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया! जैसे उनके पिता सम्मानित थे, वैसे ही वे भी हो गये ॥ १२३ ॥
तथा सर्वे महाभागा मुनयः पुण्यलक्षणाः ॥ १३ ॥
अपूजयन् महाभागं यथास्य पितरं तथा । महान् सौभाग्यशाली और पुण्यात्मा सभी महर्षि भी महाभाग त्रितका उनके पिताके तुल्य ही सम्मान करते थे ॥ कदाचिद्धि ततो राजन् भ्रातरावेकतद्वितौ ॥ १४ ॥
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यज्ञार्थं चक्रतुश्चिन्तां तथा वित्तार्थमेव च ।
तयोर्बुद्धिः समभवत् त्रितं गृह्य परंतप ॥ १५ ॥
याज्यान् सर्वानुपादाय प्रतिगृह्य पशूंस्ततः ।
सोमं पास्यामहे हृष्टाः प्राप्य यज्ञं महाफलम् ॥ १६ ॥
राजन्! एक दिनकी बात है, उनके दोनों भाई एकत और द्वित यज्ञ और धनके लिये चिन्ता करने लगे । शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि हमलोग त्रितको साथ लेकर यजमानोंका यज्ञ करावें और दक्षिणाके रूपमें बहुत - से पशु प्राप्त करके महान् फलदायक यज्ञका अनुष्ठान करें और उसीमें प्रसन्नतापूर्वक सोमरसका पान करें ॥ १४–१६ ॥
चक्रुश्चैवं तथा राजन् भ्रातरस्त्रय एव च ।
तथा ते तु परिक्रम्य याज्यान् सर्वान् पशून् प्रति ॥ १७ ॥
याजयित्वा ततो याज्याँल्लब्ध्वा तु सुबहून् पशून् ।
याज्येन कर्मणा तेन प्रतिगृह्य विधानतः ॥ १८ ॥
प्राचीं दिशं महात्मान आजग्मुस्ते महर्षयः । राजन्! ऐसा विचार करके उन तीनों भाइयोंने वही किया । वे सभी यजमानोंके यहाँ पशुओंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे गये और उनसे विधिपूर्वक यज्ञ करवाकर उस याज्यकर्मके द्वारा उन्होंने बहुतेरे पशु प्राप्त कर लिये । तत्पश्चात् वे महात्मा महर्षि पूर्वदिशाकी ओर चल दिये ॥ १७-१८३ ॥ त्रितस्तेषां महाराज पुरस्ताद् याति हृष्टवत् ॥ १ ९ ॥ एकतश्च द्वितश्चैव पृष्ठतः कालयन् पशून् । महाराज! उनमें त्रित मुनि तो प्रसन्नतापूर्वक आगे- आगे चलते थे और एकत तथा द्वित पीछे रहकर पशुओंको हाँकते जाते थे ॥ १ ९ ३ ॥ तयोश्चिन्ता समभवद् दृष्ट्वा पशुगणं महत् ॥ २० ॥
कथं च स्युरिमा गाव आवाभ्यां हि विना त्रितम् । पशुओंके उस महान् समुदायको देखकर एकत और द्वितके मनमें यह चिन्ता समायी कि किस उपायसे ये गौएँ त्रितको न मिलकर हम दोनोंके ही पास रह जायँ ॥ २० ॥
तावन्योन्यं समाभाष्य एकतश्च द्वितश्च ह ॥ २१ ॥
यदूचतुर्मिथः पापौ तन्निबोध जनेश्वर । जनेश्वर! उन एकत और द्वित- दोनों पापियोंने एक- दूसरेसे सलाह करके परस्पर जो कुछ कहा, वह बताता हूँ, सुनो ॥ २१ ॥
त्रितो यज्ञेषु कुशलस्त्रितो वेदेषु निष्ठितः ॥ २२ ॥
अन्यास्तु बहुला गावस्त्रितः समुपलप्स्यते ।
तदावां सहितौ भूत्वा गाः प्रकाल्य व्रजावहे ॥ २३ ॥
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त्रितोऽपि गच्छतां काममावाभ्यां वै विना कृतः । ' त्रित यज्ञ करानेमें कुशल हैं, त्रित वेदोंके परिनिष्ठित विद्वान् हैं, अतः वे और बहुत - सी गौएँ प्राप्त कर लेंगे । इस समय हम दोनों एक साथ होकर इन गौओंको हाँक ले चलें और त्रित हमसे अलग होकर जहाँ इच्छा हो वहाँ चले जायँ' ॥ २२-२३३ ॥ तेषामागच्छतां रात्रौ पथिस्थानां वृकोऽभवत् ॥ २४ ॥
तत्र कूपोऽविदूरेऽभूत् सरस्वत्यास्तटे महान् । रात्रिका समय था और वे तीनों भाई रास्ता पकड़े चले आ रहे थे । उनके मार्गमें एक भेड़िया खड़ा था । वहाँ पास ही सरस्वतीके तटपर एक बहुत बड़ा कुआँ था ॥ अथ त्रितो वृकं दृष्ट्वा पथि तिष्ठन्तमग्रतः ॥ २५ ॥
तद्भयादपसर्पन् वै तस्मिन् कूपे पपात ह ।
अगाधे सुमहाघोरे सर्वभूतभयंकरे ॥ २६ ॥
त्रित अपने आगे रास्तेमें खड़े हुए भेड़ियेको देखकर उसके भयसे भागने लगे । भागते-भागते वे समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर उस महाघोर अगाध कूपमें गिर पड़े ॥ २५-२६ ॥
त्रितस्ततो महाराज कूपस्थो मुनिसत्तमः ।
आर्तनादं ततश्चक्रे तौ तु शुश्रुवतुर्मुनी ॥ २७ ॥
महाराज! कुएँमें पहुँचनेपर मुनिश्रेष्ठ त्रितने बड़े जोरसे आर्तनाद किया, जिसे उन दोनों मुनियोंने सुना ॥ २७ ॥
तं ज्ञात्वा पतितं कूपे भ्रातरावेकतद्वितौ ।
वृकत्रासाच्च'लोभाच्च समुत्सृज्य प्रजग्मतुः ॥ २८ ॥
अपने भाईको कुएँमें गिरा हुआ जानकर भी दोनों भाई एकत और द्वित भेड़ियेके भय और लोभसे उन्हें वहीं छोड़कर चल दिये ॥ २८ ॥
भ्रातृभ्यां पशुलुब्धाभ्यामुत्सृष्टः स महातपाः ।
उदपाने तदा राजन् निर्जले पांसुसंवृते ॥ २९ ॥
राजन्! पशुओंके लोभमें आकर उन दोनों भाइयोंने उस समय उन महातपस्वी त्रितको धूलिसे भरे हुए उस निर्जल कूपमें ही छोड़ दिया ॥ २ ९ ॥
त्रित आत्मानमालक्ष्य कूपे वीरुत्तृणावृते ।
निमग्नं भरतश्रेष्ठ नरके दुष्कृती यथा ॥ ३० ॥
स बुद्धयागणयत् प्राज्ञो मृत्योर्भीतो ह्यसोमपः ।
सोमः कथं तु पातव्य इहस्थेन मया भवेत् ॥ ३१ ॥
भरतश्रेष्ठ! जैसे पापी मनुष्य अपने- आपको नरकमें डूबा हुआ देखता है, उसी प्रकार तृण, वीरुध और लताओंसे व्याप्त हुए उस कुएँमें अपने - आपको गिरा देख मृत्युसे डरे और सोमपानसे वंचित हुए विद्वान् त्रित अपनी बुद्धिसे सोचने लगे कि ' मैं इस कुएँमें रहकर कैसे सोमरसका पान कर सकता हूँ? ' ॥ ३०-३१ ॥