श्रीगणेशाय नमः।

दण्डोत्पत्युपाख्यान : संसार में अराजकता और अधर्म को रोकने के लिए दण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई?

दण्ड का उद्भव और उद्देश्य

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 122 · पृष्ठ 803–812

1,304 शब्द · 7 मिनटका पाठ · 9 श्लोक

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा

राजा को धर्मनिष्ठ शासन और दण्ड के वास्तविक स्वरूप का बोध कराने हेतु।

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस दण्ड की उत्पत्तिके विषय में जानकार लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं। उसे भी तुम सुन लो। अङ्गदेश में वसुहोम नाम से प्रसिद्ध एक तेजस्वी राजा राज्य करते थे। एक समय की बात है, वे महातपस्वी धर्मज्ञ नरेश अपनी पत्नी के साथ देवताओं, ऋषियों तथा पितरों से पूजित मुञ्जपृष्ठ नामक तीर्थस्थान में आये। वह स्थान सुवर्णमय पर्वत सुमेरु के समीपवर्ती हिमालय के शिखर पर है, जहाँ मुञ्जावट में परशुरामजी ने अपनी जटाएँ बाँधने का आदेश दिया था। तभी से कठोर व्रत का पालन करने वाले ऋषियों ने उस रुद्र-सेवित प्रदेश को मुञ्जपृष्ठ नाम दे दिया। वे वहाँ बहुतेरे वेदोक्त गुणों से सम्पन्न होकर तपस्या करने लगे। उस तप के प्रभाव से वे देवर्षियों के तुल्य हो गये और ब्राह्मणों में उनका बड़ा सम्मान होने लगा।

भीष्म उवाच

तत्र शृङ्गे हिमवतो मेरौ कनकपर्वते ।
यत्र मुञ्जावटे रामो जटाहरणमादिशत् ॥

तदाप्रभृति राजेन्द्र ऋषिभिः संशितव्रतैः ।
मुञ्जपृष्ठ इति प्रोक्तः स देशो रुद्रसेवितः ॥

राजेन्द्र! वह स्थान सुवर्णमय पर्वत सुमेरुके समीपवर्ती हिमालयके शिखरपर है, जहाँ मुंजावटमें परशुरामजीने अपनी जटाएँ बाँधनेका आदेश दिया था। तभीसे कठोर व्रतका पालन करनेवाले ऋषियोंने उस रुद्रसेवित प्रदेशको मुंजपृष्ठ नाम दे दिया ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 122 · श्लोक 3-4पृष्ठ 805

एक दिन इन्द्र के सम्मानित सखा, उदारचेता शत्रुसूदन राजा मान्धाता उनके दर्शन के लिये आये। राजा मान्धाता उत्तम तपस्वी अङ्गनरेश वसुहोम के पास पहुँचकर दर्शन करके उनके सामने विनीत भाव से खड़े हो गये। वसुहोम ने भी राजा को पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया तथा सातों अङ्गों से युक्त उनके राज्य का कुशल-समाचार पूछा। पूर्वकाल में साधु पुरुषों ने जिस पथ का अनुसरण किया था, उसी पर यथावत् रूप से निरन्तर चलने वाले मान्धाता से वसुहोम ने पूछा— "राजन्! मैं आपकी क्या सेवा करूँ?" तब परम प्रसन्न हुए मान्धाता ने वहाँ बैठे हुए महाज्ञानी नृपश्रेष्ठ वसुहोम से पूछा। मान्धाता बोले— "राजन्! नरश्रेष्ठ! आपने बृहस्पतिके सम्पूर्ण मत का अध्ययन किया है। साथ ही शुक्राचार्य के नीतिशास्त्र का भी आपको पूर्ण ज्ञान है। अतः मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ कि दण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई? इसके पहले कौन-सी वस्तु जागरूक थी? तथा इस दण्ड को सबसे उत्कृष्ट क्यों कहा जाता है? यह दण्ड क्षत्रियों के हाथ में कैसे आया है? महामते! यह सब मुझे बताइये। मैं आपको गुरुदक्षिणा प्रदान करूँगा।"

सद्भिराचरितं पूर्वं यथावदनुयायिनम् ।
अपृच्छद् वसुहोमस्तं राजन् किं करवाणि ते ॥

पूर्वकालमें साधु पुरुषोंने जिस पथका अनुसरण किया था, उसीपर यथावत् रूपसे निरन्तर चलनेवाले मान्धातासे वसुहोमने पूछा- राजन्! मैं आपकी क्या सेवा करूँ? '

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 122 · श्लोक 9पृष्ठ 806

वसुहोम बोले— "राजन्! दण्ड सम्पूर्ण जगत् के नियम के अन्दर रखने वाला है। यह धर्म का सनातन स्वरूप है। इसका उद्देश्य है प्रजा को उद्दण्डता से बचाना। इसकी उत्पत्ति जिस तरह से हुई है, सो बता रहा हूँ; सुनो। हमारे सुनने में आया है कि सर्वलोकपितामह भगवान् ब्रह्मा किसी समय यज्ञ करना चाहते थे; किन्तु उन्हें अपने योग्य कोई ऋत्विज दिखाई नहीं दिया। तब उन्होंने बहुत वर्षों तक अपने मस्तक पर एक गर्भ धारण किया। जब एक हजार वर्ष बीत गये, तब ब्रह्माजी को छींक आयी और वह गर्भ नीचे गिर पड़ा। उससे जो बालक प्रकट हुआ, उसका नाम 'क्षुप' रखा गया। महाराज! महात्मा ब्रह्माजी के उस यज्ञ में प्रजापति क्षुप ही ऋत्विज हुए।

तस्मिन् प्रवृत्ते सत्रे तु ब्रह्मणः पार्थिवर्षभ ।
दृष्टरूपप्रधानत्वाद् दण्डः सोऽन्तर्हितोऽभवत् ॥

नृपश्रेष्ठ! ब्रह्माजीका वह यज्ञ आरम्भ होते ही वहाँ प्रत्यक्ष दीखनेवाले यज्ञकी प्रधानता होनेसे ब्रह्माका वह दण्ड अन्तर्धान हो गया ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 122 · श्लोक 18पृष्ठ 807

नृपश्रेष्ठ! ब्रह्माजी का वह यज्ञ आरम्भ होते ही वहाँ प्रत्यक्ष दिखने वाले यज्ञ की प्रधानता होने से ब्रह्मा का वह दण्ड अन्तर्धान हो गया। दण्ड लुप्त होते ही प्रजामें वर्णसङ्करता फैलने लगी। कर्तव्याकर्तव्य तथा भक्ष्याभक्ष्य का विचार सर्वथा उठ गया। फिर पेया-अपेय का विचार कैसे रह सकता था? सब लोग एक दूसरे की हिंसा करने लगे। उस समय गम्यागम्य का विचार भी नहीं रह गया था। अपना और पराया धन एक-सा समझा जाने लगा। जैसे कुत्ते मांस के टुकड़े के लिये आपस में छीना-झपटी और नोच-खसोट करते हैं, उसी तरह मनुष्य भी परस्पर लूट-पाट करने लगे। बलवान् पुरुष दुर्बलों की हत्या करने लगे। सर्वत्र उच्छृङ्खलता फैल गयी।

परस्परं विलुम्पन्ति सारमेया यथामिषम् ।
अबलान् बलिनो घ्नन्ति निर्मर्यादमवर्तत ॥

जैसे कुत्ते मांसके टुकड़ेके लिये आपसमें छीना - झपटी और नोच-खसोट करते हैं, उसी तरह मनुष्य भी परस्पर लूट-पाट करने लगे । बलवान् पुरुष दुर्बलोंकी हत्या करने लगे । सर्वत्र उच्छृंखलता फैल गयी ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 122 · श्लोक 21पृष्ठ 807

ऐसी अवस्था हो जाने पर पितामह ब्रह्मा ने सनातन भगवान् विष्णु का पूजन करके वरदायक देवता महादेवजी से कहा— 'शङ्कर! इस परिस्थिति में आपको कृपा करनी चाहिये। जिस प्रकार संसार में वर्णसङ्करता न फैले, वह उपाय आप करें।' तब शूल नामक श्रेष्ठ शस्त्र धारण करने वाले सुरश्रेष्ठ महादेवजी ने देर तक विचार करके स्वयं अपने आपको ही दण्ड के रूप में प्रकट किया। उससे धर्माचरण होता देख नीतिस्वरूपा देवी सरस्वती ने दण्डनीति की रचना की जो तीनों लोकों में विख्यात है। उन्होंने सहस्रनेत्रधारी इन्द्रदेव को देवेश्वर के पद पर प्रतिष्ठित किया और सूर्यपुत्र यम को पितरों का राजा बनाया। कुबेर को धन और राक्षसों का, सुमेरु को पर्वतों का और महासागर को सरिताओं का स्वामी बना दिया। शक्तिशाली भगवान् वरुण को जल और असुरों के राज्य पर प्रतिष्ठित किया। मृत्यु को प्राणों का तथा अग्नि-देव को तेज का आधिपत्य प्रदान किया। विशाल नेत्र वाले सनातन महात्मा महादेवजी ने अपने आपको रुद्रों का अधीश्वर तथा शक्तिशाली संरक्षक बनाया। अंशुमान् को लताओं का तथा बारह भुजाओं से विभूषित शक्तिशाली कुमार स्कन्द को भूतों का श्रेष्ठ राजा नियुक्त किया। संहार और विनय जिसका स्वरूप है, उस सर्वेश्वर ने काल को चार प्रकार की मृत्यु, सुख और दुःख का भी स्वामी बनाया। सबके देवता, राजाओं के राजा और मनुष्यों के अधिपति शूलपाणि भगवान् शिव स्वयं समस्त रुद्रों के अधीश्वर हुए।

ततः स भगवान् ध्यात्वा चिरं शूलवरायुधः ।
आत्मानमात्मना दण्डं ससृजे देवसत्तमः ॥

तब शूल नामक श्रेष्ठ शस्त्र धारण करनेवाले सुरश्रेष्ठ महादेवजीने देरतक विचार करके स्वयं अपने आपको ही दण्डके रूपमें प्रकट किया ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 122 · श्लोक 24पृष्ठ 808

तदनन्तर ब्रह्माजी का वह यज्ञ जब विधिपूर्वक सम्पन्न हो गया, तब महादेवजी ने धर्मरक्षक भगवान् विष्णु का सत्कार करके उन्हें वह दण्ड समर्पित किया। भगवान् विष्णु ने उसे अङ्गिरा को दे दिया। मुनिवर अङ्गिरा ने इन्द्र और मरीचिक को दिया और मरीचिक ने भृगु को सौंप दिया। भृगु ने वह धर्म-समाहित दण्ड ऋषियों को दिया। ऋषियों ने लोकपालों को, लोकपालों ने क्षुप को, क्षुप ने सूर्यपुत्र मनु को और मनु ने सूक्ष्म धर्म तथा अर्थ की रक्षा के लिये उसे अपने पुत्रों को सौंप दिया। अतः धर्म के अनुसार न्याय-अन्याय का विचार करके ही दण्ड का विधान करना चाहिये, मनमानी नहीं करनी चाहिये। दुष्टों का दमन करना ही दण्ड का मुख्य उद्देश्य है, स्वर्णमुद्राएँ लेकर खजाना भरना नहीं। दण्ड के तपर सुवर्ण लेना तो बाह्यङ्ग—गौण कर्म है। किसी छोटे-से अपराध पर प्रजा का अङ्ग-भङ्ग करना, उसे मार डालना, उसे तरह-तरह की यातनाएँ देना तथा उसको देहत्याग के लिये विवश करना अथवा देश से निकाल देना कदापि उचित नहीं है।

विष्णुरङ्गिरसे प्रादादङ्गिरा मुनिसत्तमः ।
प्रादादिन्द्रमरीचिभ्यां मरीचिर्भृगवे ददौ ॥

भगवान् विष्णुने उसे अंगिराको दे दिया । मुनिवर अंगिराने इन्द्र और मरीचिको दिया और मरीचिने भृगुको सौंप दिया ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 122 · श्लोक 37पृष्ठ 809

सूर्यपुत्र मनु ने प्रजा की रक्षा के लिये ही अपने पुत्रों के हाथों में दण्ड सौंपा था, वही क्रमशः उत्तरोत्तर अधिकारियों के हाथ में आकर प्रजा का पालन करता हुआ जागता रहता है। भगवान् इन्द्र दण्ड-विधान करने में सदा जागरूक रहते हैं। इन्द्र से प्रकाशमान अग्नि, अग्नि से वरुण और वरुण से प्रजापति उस दण्ड को प्राप्त करके उसके यथोचित प्रयोग के लिये सदा जाग्रत् रहते हैं। जो सम्पूर्ण जगत् को शिक्षा देने वाले हैं, वे धर्म प्रजापति से दण्ड को ग्रहण करके प्रजा की रक्षा के लिये सदा जागरूक रहते हैं। ब्रह्मपुत्र सनातन व्यवसाय वह दण्ड धर्म से लेकर लोकरक्षा के लिये जागते रहते हैं।

इन्द्रो जागर्ति भगवानिन्द्रादग्निर्विभावसुः ।
अग्नेर्जागर्ति वरुणो वरुणाच्च प्रजापतिः ॥

भगवान् इन्द्र दण्ड- विधान करनेमें सदा जागरूक रहते हैं । इन्द्रसे प्रकाशमान अग्नि, अग्निसे वरुण और वरुणसे प्रजापति उस दण्डको प्राप्त करके उसके यथोचित प्रयोगके लिये सदा जाग्रत् रहते हैं ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 122 · श्लोक 43पृष्ठ 810

व्यवसाय से दण्ड लेकर तेज जगत् की रक्षा करता हुआ सजग रहता है। तेज से ओषधियाँ, ओषधियों से पर्वत, पर्वतों से रस, रस से निर्ऋति और निर्ऋति से ज्योतियाँ क्रमशः उस दण्ड को हस्तगत करके लोक-रक्षा के लिये जागरूक बनी रहती हैं। ज्योतियों से दण्ड ग्रहण करके वेद प्रतिष्ठित हुए हैं। वेदों से भगवान् हयग्रीव और हयग्रीव से अविनाशी प्रभु ब्रह्मा वह दण्ड पाकर लोक-रक्षा के लिये जागते रहते हैं। पितामह ब्रह्मा से दण्ड और रक्षा का अधिकार पाकर महान् देव भगवान् शिव जागते हैं। शिव से विश्वेदेव, विश्वेदेवों से ऋषि, ऋषियों से भगवान् सोम, सोम से सनातन देवगण और देवताओं से ब्राह्मण वह अधिकार लेकर लोक-रक्षा के लिये सदा जाग्रत् रहते हैं। इस बात को तुम अच्छी तरह समझ लो। तदनन्तर ब्राह्मणों से दण्ड धारण का अधिकार पाकर क्षत्रिय धर्मानुसार सम्पूर्ण लोकों की रक्षा करते हैं। क्षत्रियों से ही यह सनातन चराचर जगत् सुरक्षित होता रहा है। इस लोक में प्रजा जागती है और प्रजाओं में दण्ड जागता है। वह ब्रह्माजी के समान तेजस्वी दण्ड सबको मर्यादा के भीतर रखता है। भारत! यह कालरूप दण्ड सृष्टिके आदि में, मध्य में और अन्त में भी जागता रहता है। यह सर्वलोकेश्वर महादेव का स्वरूप है। यही समस्त प्रजाओं का पालक है। इस दण्ड के रूप में देवाधिदेव कल्याणस्वरूप सर्वात्मा प्रभु जटाजूटधारी उमावल्लभ दुःखहारी स्थाणु-स्वरूप एवं लोक-मङ्गलकारी भगवान् शिव ही सदा जाग्रत रहते हैं। इस तरह यह दण्ड आदि, मध्य और अन्त में विख्यात है। धर्मज्ञ राजा को चाहिये कि इसके द्वारा न्यायोचित बर्ताव करे।"

जागर्ति कालः पूर्वं च मध्ये चान्ते च भारत ।
ईश्वरः सर्वलोकस्य महादेवः प्रजापतिः ॥

भारत! यह कालरूप दण्ड सृष्टिके आदिमें, मध्यमें और अन्तमें भी जागता रहता है । यह सर्वलोकेश्वर महादेवका स्वरूप है । यही समस्त प्रजाओंका पालक है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 122 · श्लोक 52पृष्ठ 811

भीष्मजी कहते हैं — युधिष्ठिर! जो नरेश इस प्रकार बताये हुए वसुहोम के इस मत को सुनता और सुनकर यथोचित बर्ताव करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। नरश्रेष्ठ! भरतनन्दन! जो दण्ड सम्पूर्ण धार्मिक जगत् के नियम के भीतर रखने वाला है, उसके सम्बन्ध में जितनी बातें हैं, उन्हें मैंने तुम्हें बता दीं।

भीष्म उवाच

इतीदं वसुहोमस्य शृणुयाद् यो मतं नरः ।
श्रुत्वा सम्यक् प्रवर्तेत सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥

भीष्मजी कहते हैं — यधिष्ठिर! जो नरेश इस प्रकार बताये हुए वसुहोमके इस मतको सुनता और सुनकर यथोचित बर्ताव करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 122 · श्लोक 55पृष्ठ 812

In English

The Origin and Lineage of Danda

King Vasuhoma explains to King Mandhata how the concept of punishment, or Danda, was created. After Brahma's sacrifice faced chaos due to a lack of order, Lord Shiva manifested as Danda to protect the world. The text traces how this authority passed from the gods through various sages and kings down to the Kshatriyas.

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