कालकवृक्षीयोपाख्यान : राजकीय कोष के अपहरण और मन्त्रियों के षड्यन्त्र से कैसे बचें?
विनाशकारी मन्त्रियों का दमन
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 82 · पृष्ठ 553–566
2,470 शब्द · 13 मिनटका पाठ · 18 श्लोक
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को राजनीति के मर्म समझाने हेतु
भीष्म बोले— भरतनन्दन! यह राजा अथवा राजनीतिकी की पहली वृत्ति है, अब दूसरी सुनो। जो कोई मनुष्य राजा के धन की वृद्धि करे, उसकी राजा को सदा रक्षा करनी चाहिए। यदि मन्त्री राजा के खजाने से धन का अपहरण करता हो और कोई सेवक अथवा राजा के द्वारा पालित हुआ दूसरा कोई मनुष्य राजकीय कोष के नष्ट होने का समाचार राजा को बताए, तब राजा को उसकी बात एकान्त में सुननी चाहिए और मन्त्री से उसके जीवन की रक्षा करनी चाहिए; क्योंकि चोरी करने वाले मन्त्री अपना भण्डाफोड़ करने वाले मनुष्य को प्रायः मार डालते हैं। जो राजा के खजाने की रक्षा करने वाला है, उस पुरुष को राजकीय कोष लूटने वाले सब लोग एकमत होकर सताने लगते हैं। यदि राजा के द्वारा उसकी रक्षा नहीं की जाए तो वह बेचारा बेमौत मारा जाता है। इस विषय में जानकार लोग, कालकवृक्षीय मुनि ने कोसलराज को जो उपदेश दिया था, उसी प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं।
एषा प्रथमतो वृत्तिर्द्वितीयां शृणु भारत ।
यः कश्चिज्जनयेदर्थं राज्ञा रक्ष्यः सदा नरः ॥
भीष्मजी कहते हैं- भरतनन्दन! यह राजा अथवा राजनीतिकी पहली वृत्ति है, अब दूसरी सुनो । जो कोई मनुष्य राजाके धनकी वृद्धि करे, उसकी राजाको सदा रक्षा करनी चाहिये ।
हमने सुना है कि जब राजा क्षेमदर्शी कोसल प्रदेश के राजसिंहासन पर आसीन थे, उन्हीं दिनों कालकवृक्षीय मुनि उस राज्य में पधारे थे। उन्होंने पूरे देश का समाचार जानने के लिए एक कौए को पिञ्जड़े में बाँधकर अपने साथ लिया और बड़ी सावधानी के साथ बार-बार चक्कर लगाए। घूमते समय वे लोगों से कहते थे— "सज्जनो! तुम लोग मुझसे वायसी विद्या सीखो। मैंने सीखी है, इसलिये कौए मुझसे भूत, भविष्य तथा इस समय जो वर्तमान है, वह सब बता देते हैं।" यही कहते हुए वे बहुतेरे मनुष्यों के साथ उस राष्ट्र में सब ओर घूमते फिरे। उन्होंने राजकार्य में लगे हुए समस्त कर्मचारियों का दुष्कर्म अपनी आँखों से देखा। राजकीय कर्मचारियों द्वारा राजा की सम्पत्ति के अपहरण की घटनाओं का जहाँ-तहाँ से पता लगाकर, वे उत्तम व्रत का पालन करने वाले महर्षि स्वयं को सर्वज्ञ घोषित करते हुए उस कौए के साथ राजा से मिलने आए।
ह्रियमाणममात्येन भृत्यो वा यदि वा भृतः ।
यो राजकोशं नश्यन्तमाचक्षीत युधिष्ठिर ॥
श्रोतव्यमस्य च रहो रक्ष्यश्चामात्यतो भवेत् ।
अमात्या ह्यपहर्तारो भूयिष्ठं घ्नन्ति भारत ॥
भरतवंशी युधिष्ठिर! यदि मन्त्री राजाके खजानेसे धनका अपहरण करता हो और कोई सेवक अथवा राजाके द्वारा पालित हुआ दूसरा कोई मनुष्य राजकीय कोषके नष्ट होनेका समाचार राजाको बतावे, तब राजाको उसकी बात एकान्तमें सुननी चाहिये और मन्त्रीसे उसके जीवनकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि चोरी करनेवाले मन्त्री अपना भंडाफोड़ करनेवाले मनुष्यको प्रायः मार डाला करते हैं ।
कोसल नरेश के निकट उपस्थित होकर मुनि ने सज-धज कर बैठे हुए राजमन्त्री से कौए के कथन का हवाला देते हुए कहा— "तुमने अमुक स्थान पर राजा के अमुक धन की चोरी की है। अमुक-अमुक व्यक्ति इस बात को जानते हैं, जो इसके साक्षी हैं। हमारा यह कौआ कहता है कि तुमने राजकीय कोष का अपहरण किया है; अतः तुम अपने इस अपराध को शीघ्र स्वीकार करो।" इसी प्रकार मुनि ने राजा के खजाने से चोरी करने वाले अन्य कर्मचारियों से भी कहा— "तुमने चोरी की है। मेरे इस कौए की कही हुई कोई भी बात कभी और कहीं भी झूठी नहीं सुनी गई है।" कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार मुनि के द्वारा तिरस्कृत हुए सभी राजकर्मचारी अन्धेरी रात में सोये हुए मुनि के उस कौए को बाण से बींधकर मार डाला।
तेन विप्रकृताः सर्वे राजयुक्ताः कुरूद्वह ।
तमस्यभिप्रसुप्तस्य निशि काकमवेधयन् ॥
कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार मुनिके द्वारा तिरस्कृत हुए सभी राजकर्मचारियोंने अँधेरी रातमें सोये हुए मुनिके उस कौएको बाणसे बींधकर मार डाला ।
पूर्वाह्न में जब मुनि ने अपने कौए को पिञ्जड़े में बाण से विदीर्ण पाया, तब वे राजा क्षेमदर्शी के पास पहुञ्चे और उनसे बोले— "राजन्! आप प्रजा के प्राण और धन के स्वामी हैं। मैं आपसे अभय की याचना करता हूँ। यदि आज्ञा हो तो मैं आपके हित की बात कहूँ? आप मेरे मित्र हैं। मैं आपके ही हित के लिये आपके प्रति सम्पूर्ण हृदय से भक्तिभाव रखकर यहाँ आया हूँ। आपकी जो हानि हो रही है, उसे देखकर मैं बहुत सन्तप्त हूँ। जैसे सारथि अच्छे घोड़े को सचेत करता है, उसी प्रकार यदि कोई मित्र मित्र को समझाने के लिये आया हो, जो उसकी हानि देखकर अत्यन्त दुखी हो और उसे सहन न कर पाने के कारण हठपूर्वक अपने सुहृद् राजा का हित साधने के लिये पास आकर कहे कि— 'राजन्! तुम्हारे इस धन का अपहरण हो रहा है', तो सदा ऐश्वर्य और उन्नति की इच्छा रखने वाले विज्ञ एवं सुहृद् पुरुष को अपने उस हितकारी मित्र की बात सुननी चाहिए और उसके अपराध को क्षमा कर देना चाहिए।"
|| अयं तवार्थो ह्रियते यो ब्रूयादक्षमान्वितः ॥
सम्बुबोधयिषुर्मित्रं सदश्वमिव सारथिः ।
अतिमन्युप्रसक्तो हि प्रसह्य हितकारणात् ॥
तथाविधस्य सुहृदा क्षन्तव्यं स्वं विजानता ।
ऐश्वर्यमिच्छता नित्यं पुरुषेण बुभूषता ॥
‘ जैसे सारथि अच्छे घोड़ेको सचेत करता है, उसी प्रकार यदि कोई मित्र मित्रको समझानेके लिये आया हो, मित्रकी हानि देखकर जो अत्यन्त दुखी हो और उसे सहन न कर सकनेके कारण जो हठपूर्वक अपने सुहृद् राजाका हितसाधन करनेके लिये उसके पास आकर कहे कि ‘ राजन्! तुम्हारे इस धनका अपहरण हो रहा है ' तो सदा ऐश्वर्य और उन्नतिकी इच्छा रखनेवाले विज्ञ एवं सुहृद् पुरुषको अपने उस हितकारी मित्रकी बात सुननी चाहिये और उसके अपराधको क्षमा कर देना चाहिये '
राजा क्षेमदर्शी ने मुनि को उत्तर दिया— "ब्राह्मण! आप जो कुछ कहना चाहें, मुझसे निर्भय होकर कहें। अपने हित की इच्छा रखने वाले आपको मैं क्षमा क्यों नहीं करूँगा? विप्रवर! आप जो चाहें कहिये। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आप मुझसे जो कोई भी बात कहेंगे, आपकी उस आज्ञा का मैं पालन करूँगा।"
ब्राह्मण प्रतिजाने ते प्रब्रूहि यदिहेच्छसि ।
करिष्यामि हि ते वाक्यं यदस्मान्विप्र वक्ष्यसि ॥
राजा क्षेमदर्शी और कालकवृक्षीय मुनि तब राजाने मुनिको इस प्रकार उत्तर दिया-' ब्राह्मण! आप जो कुछ कहना चाहें, मुझसे निर्भय होकर कहें । अपने हितकी इच्छा रखनेवाला मैं आपको क्षमा क्यों नहीं करूँगा? विप्रवर! आप जो चाहें, कहिये । मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आप मुझसे जो कोई भी बात कहेंगे, आपकी उस आज्ञाका मैं पालन करूँगा'
मुनि बोले— "महाराज! आपके कर्मचारियों में से कौन अपराधी है और कौन निरपराध? इस बात का पता लगाकर तथा आप पर आपके सेवकों की ओर से अनेक भय आने वाले हैं, यह जानकर प्रेमपूर्वक राज्य का सारा समाचार बताने के लिये मैं आपके पास आया था। नीतिशास्त्र के आचार्यों ने राजसेवकों के इस दोष का पहले से ही वर्णन कर रखा है कि जो राजा की सेवा करने वाले लोग हैं, उनके लिये यह पापमयी जीविका अगतिक गति है, अर्थात् जिन्हें कहीं भी सहारा नहीं मिलता, वे राजा के सेवक होते हैं। जिसका राजाओं के साथ मेल-जोल हो गया, उसकी विषधर सर्पों के साथ सङ्गति हो गयी, ऐसा नीतिज्ञों का कथन है। राजा के जहाँ बहुत से मित्र होते हैं, वहीं उसके अनेक शत्रु भी हुआ करते हैं। राजा के आश्रित होकर जीविका चलाने वालों को उन सभी से भय बताया गया है। राजन्! स्वयं राजा से भी उन्हें घड़ी-घड़ी में खतरा रहता है। राजा के पास रहने वालों से कभी भी कोई प्रमाद हो ही नहीं, यह तो असम्भव है; परन्तु जो अपना भला चाहता हो, उसे किसी तरह उसके पास जान-बूझकर प्रमाद नहीं करना चाहिए।"
प्रागेवोक्तस्तु दोषोऽयमाचार्यैर्नृपसेविनाम् ।
अगतीकगतिर्ह्येषा पापा राजोपसेविनाम् ॥
नीतिशास्त्रके आचार्योंने राजसेवकोंके इस दोषका पहलेसे ही वर्णन कर रखा है कि जो राजाकी सेवा करनेवाले लोग हैं, उनके लिये यह पापमयी जीविका अगतिक गति है, अर्थात् जिन्हें कहीं भी सहारा नहीं मिलता, वे राजाके सेवक होते हैं ।
भीष्म कहते हैं— हे युधिष्ठिर! राजा के पास रहने वालों से कभी भी कोई प्रमाद हो ही नहीं, यह तो असम्भव है; परन्तु जो अपना भला चाहता हो, उसे किसी तरह उसके पास जान-बूझकर प्रमाद नहीं करना चाहिए। क्योंकि यदि सेवक के द्वारा असावधानी के कारण कोई अपराध बन गया, तो राजा पहले के उपकार को भुलाकर कुपित हो जाता है और उससे द्वेष करने लगता है; और जब राजा अपनी मर्यादा से भ्रष्ट हो जाए, तो उस सेवक के जीवन की आशा नहीं रह जाती। जैसे जलती हुई आग के पास मनुष्य सचेत होकर जाता है, उसी प्रकार शिक्षित पुरुष को राजा के पास सावधानी से रहना चाहिए। राजा प्राण और धन दोनों का स्वामी है; जब वह कुपित होता है तो विषधर सर्प के समान भयङ्कर हो जाता है। अतः मनुष्य को चाहिए कि 'मैं जीवित नहीं हूँ' ऐसा मानकर, अर्थात् अपनी जान को हथेली पर लेकर सदा बड़े यत्न से राजा की सेवा करे। यदि राजा को प्रसन्न कर लिया जाए, तो वह देवता की भाँति सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध कर देता है, परन्तु यदि कुपित हो जाए, तो जलती हुई आग की भाँति जड़-मूल सहित भस्म कर डालता है।
आशीविषमिव क्रुद्धं प्रभुं प्राणधनेश्वरम् ।
यत्नेनोपचरेन्नित्यं नाहमस्मीति मानवः ॥
राजा प्राण और धन दोनोंका स्वामी है । जब वह कुपित होता है तो विषधर सर्पके समान भयंकर हो जाता है; अतः मनुष्यको चाहिये कि ' मैं जीवित नहीं हूँ' ऐसा मानकर अर्थात् अपनी जानको हथेलीपर लेकर सदा बड़े यत्नसे राजाकी सेवा करे ।
मुनि ने राजा के सम्मुख कहा— "राजन्! यमराज ने जो यह बात कही है, वह ज्यों-की-त्यों ठीक है; फिर भी मैं तो बारम्बार आपके महान् अर्थ का साधन करूँगा ही। मेरे जैसा मन्त्री आपत्तिकाल में बुद्धि द्वारा सहायता देता है। राजन्! मेरा यह कौआ भी आपके कार्यसाधन में संलग्न था, किन्तु मारा गया— सम्भव है मेरी भी वही दशा हो। परन्तु इसके लिये मैं आपकी और आपके प्रेमियों की निन्दा नहीं करता। मेरा कहना तो इतना ही है कि आप स्वयं अपने हित और अनहित को पहचानिये। प्रत्येक कार्य को अपनी आँखों से देखिये; दूसरों की देख-भाल पर विश्वास न कीजिये।"
इति राजन् यमः प्राह वर्तते च तथैव तत् ।
अथ भूयांसमेवार्थं करिष्यामि पुनः पुनः ॥
राजन्! यमराजने जो यह बात कही है, वह ज्यों- की- त्यों ठीक है; फिर भी मैं तो बारंबार आपके महान् अर्थका साधन करूँगा ही ।
मुनि की आँखें गम्भीर थीं, उन्होंने आगे कहा— "जो लोग आपका खजाना लूट रहे हैं और आपके ही घर में रहते हैं, वे प्रजा की भलाई चाहने वाले नहीं हैं। वैसे लोगों ने मेरे साथ वैर बाँध लिया है। राजन्! जो आपका विनाश करके आपके बाद इस राज्य को अपने हाथ में लेना चाहता है, उसका वह कर्म अन्तःपुर के सेवकों से मिलकर कोई षड्यन्त्र करने से ही सफल हो सकता है; अन्यथा नहीं। अतः आपको सावधान हो जाना चाहिए।" मुनि का स्वर धीमा पर दृढ़ था— "नरेश्वर! मैं उन विरोधियों के भय से दूसरे आश्रम में चला जाऊँगा। प्रभो! उन्होंने मेरे लिये ही बाण का सन्धान किया था, किन्तु वह उस कौए पर जा गिरा। मैं कोई कामना लेकर यहाँ नहीं आया था, तो भी छल-कपट की इच्छा रखने वाले षड्यन्त्रकारियों ने मेरे कौए को मारकर यमलोक पहुँचा दिया। राजन्! तपस्या के द्वारा प्राप्त हुई दूरदर्शिनी दृष्टि से मैंने यह सब देखा है।"
यो वा भवद्विनाशेन राज्यमिच्छत्यनन्तरम् ।
आन्तरैरभिसंधाय राजन् सिद्धयति नान्यथा ॥
राजन्! जो आपका विनाश करके आपके बाद इस राज्यको अपने हाथमें लेना चाहता है, उसका वह कर्म अन्तः पुरके सेवकोंसे मिलकर कोई षड्यन्त्र करनेसे ही सफल हो सकता है; अन्यथा नहीं ( अतः आपको सावधान हो जाना चाहिये )
मुनि ने अपनी पीड़ा और राज्य की स्थिति का वर्णन करते हुए कहा— "यह राजनीति एक नदी के समान है। राजकीय पुरुष उसमें मगर, मत्स्य, तिमिङ्गल समूहों और ग्राहों के समान हैं। बेचारे कौए के द्वारा मैं किसी तरह इस नदी से पार हो सका हूँ। जैसे हिमालय की कन्दरा में ठूँठ, पत्थर और काँटे होते हैं, उसके भीतर सिंह और व्याघ्रों का भी निवास होता है तथा इन्हीं सब कारणों से उसमें प्रवेश पाना या रहना अत्यन्त कठिन एवं दुःसह हो जाता है; उसी प्रकार दुष्ट अधिकारियों के कारण इस राज्य में किसी भले मनुष्य का रहना मुश्किल है। अन्धकारमय दुर्ग को अग्निके प्रकाश से तथा जल-दुर्ग को नौकाओं द्वारा पार किया जा सकता है, परन्तु राजारूपी दुर्ग से पार होने के लिये विद्वान् पुरुष भी कोई उपाय नहीं जानते हैं। आपका यह राज्य गहन अन्धकार से आच्छन्न और दुःख से परिपूर्ण है; आप स्वयं भी इस राज्य पर विश्वास नहीं कर सकते, फिर मैं कैसे करूँगा? अतः यहाँ रहने में किसी का कल्याण नहीं है। यहाँ भले-बुरे सब एक समान हैं। इस राज्य में बुराई करने वाले और भलाई करने वाले का भी वध हो सकता है, इसमें संशय नहीं है। न्याय की बात तो यह है कि बुराई करने वाले को ही मारा जाए और पुण्य-श्रेष्ठ कर्म करने वाले को किसी तरह भी कोई कष्ट न होने पाए, परन्तु यहाँ ऐसा नहीं होता; अतः इस राज्य में स्थिरभाव से निवास करना किसी के लिये भी उचित नहीं है। विद्वान् पुरुष को यहाँ से अति शीघ्र हट जाना चाहिए।"
अतो नायं शूभो वासस्तुल्ये सदसती इह ।
वधो ह्येवात्र सुकृते दुष्कृते न च संशयः ॥
अतः यहाँ रहनेमें किसीका कल्याण नहीं है । यहाँ भले - बुरे सब एक समान हैं । इस राज्यमें बुराई करनेवाले और भलाई करनेवालेका भी वध हो सकता है, इसमें संशय नहीं है ।
मुनि ने राजा की स्थिति पर करुण भाव से कहा— "राजन्! सीता नाम से प्रसिद्ध एक नदी है, जिसमें नाव भी डूब जाती है, वैसी ही यहाँ की राजनीति भी है। मैं तो इसे समस्त प्राणियों का विनाश करने वाली फाँसी ही समझता हूँ। आप शहद के छत्ते से युक्त पेड़ की उस ऊँची डाली के समान हैं, जहाँ से नीचे गिरने का ही भय है। आप विष मिलाये हुए भोजन के तुल्य हैं; आपका भाव असज्जनों के समान है, सज्जनों के तुल्य नहीं है। नदी मधुर पानीया यथा राजंस्तथा भवान्! भूपाल! आप विषैले सर्पों से घिरे हुए कुएँ के समान हैं। आपकी अवस्था उस मीठे जल वाली नदी के समान हो गयी है, जिसके घाट तक पहुँचना कठिन है, जिसके दोनों किनारे बहुत ऊँचे हों और वहाँ करील के झाड़ तथा बेंत की वल्लरियाँ सब ओर छा रही हों। जैसे कुत्तों, गीधों और गीदड़ों से घिरा हुआ राजहंस बैठा हो, उसी तरह दुष्ट कर्मचारियों से आप घिरे हुए हैं। जैसे लताओं का विशाल समूह किसी महान् वृक्ष का आश्रय लेकर बढ़ता है और धीरे-धीरे उस वृक्ष को लपेट लेता है तथा उसका अतिक्रमण करके उससे भी ऊँचे तक फैल जाता है, फिर वही सूखकर भयानक ईंधन बन जाता है, तब दारुण दावानल उसी ईंधन के सहारे उस विशाल वृक्ष को भी जला डालता है; राजन्! आपके मन्त्री भी उन्हीं सूखी लताओं के समान हो गये हैं— अर्थात् आपके ही आश्रय से बढ़कर आप ही के विनाश का कारण बन रहे हैं। अतः आप उनका शोधन कीजिये।"
सीता नाम नदी राजन् प्लवो यस्यां निमज्जति ।
तथोपमामिमां मन्ये वागुरां सर्वघातिनीम् ॥
राजन्! सीता नामसे प्रसिद्ध एक नदी है, जिसमें नाव भी डूब जाती है, वैसी ही यहाँकी राजनीति भी है ( इसमें मेरे जैसे सहायकोंके भी डूब जानेकी आशङ्का है ) । मैं तो इसे समस्त प्राणियोंका विनाश करनेवाली फाँसी ही समझता हूँ ।
मुनि ने अपनी विवशता प्रकट करते हुए कहा— "नरेश्वर! आपने ही जिन्हें मन्त्री बनाया और आपने जिनका पालन किया, वे आपसे ही कपटभाव रखकर आपके ही हित का विनाश करना चाहते हैं। मैं राजा के साथ रहने वाले अधिकारियों का शील स्वभाव जानना चाहता था, इसलिये सदा सशङ्क रहकर बड़ी सावधानी के साथ यहाँ रहा; ठीक उसी तरह, जैसे कोई साँप वाले मकान में रहता हो अथवा किसी शूरवीर की पत्नी के घर में घुस गया हो। क्या इस देश के राजा जितेन्द्रिय हैं? क्या इनके अन्दर रहने वाले सेवक इनके वश में हैं? क्या यहाँ की प्रजाओं का राजा पर प्रेम है और क्या राजा भी अपनी प्रजाओं पर प्रेम रखते हैं? नृपश्रेष्ठ! इन्हीं सब बातों को जानने की इच्छा से मैं आपके यहाँ आया था। जैसे भूखे को भोजन अच्छा लगता है, उसी प्रकार आपका दर्शन मुझे बड़ा प्रिय लगता है; परन्तु जैसे प्यास न रहने पर पानी अच्छा नहीं लगता, उसी प्रकार ये मन्त्री मुझे अच्छे नहीं जान पड़ते। मैं आपकी भलाई करने वाला हूँ, यही इन मन्त्रियों ने मुझमें बड़ा भारी दोष पाया है और इसीलिये ये मुझसे द्वेष रखने लगे हैं। इसके सिवा दूसरा कोई इनका रोष का कारण नहीं है। मुझे अपने इस कथन की सत्यता में कोई सन्देह नहीं है। यद्यपि मैं इन लोगों से द्रोह नहीं करता, तो भी मेरे प्रति इन लोगों की दोष-दृष्टि हो गयी है। जिसकी पूँछ दबा दी गयी हो, उस सर्प के समान दुष्ट हृदय वाले शत्रु से सदा डरते रहना चाहिये।"
ये त्वादानपरा एव वसन्ति भवतो गृहे ।
अभूतिकामा भूतानां तादृशैर्मेऽभिसंहितम् ॥
जो लोग आपका खजाना लूट रहे हैं और आपके ही घरमें रहते हैं, वे प्रजाकी भलाई चाहनेवाले नहीं हैं । वैसे लोगोंने मेरे साथ वैर बाँध लिया है ।
यह सुनकर राजा ने मुनि का सत्कार किया और कहा— "विप्रवर! आप पर आने वाले भय अथवा सङ्कट का विशेष रूप से निवारण करते हुए मैं आपको बड़े आदर-सत्कार के साथ अपने यहाँ रखूँगा। आप मेरे द्वारा सम्मानित हो बहुत काल तक मेरे महल में निवास कीजिये।"
राजोवाच भूयसा परिहारेण सत्कारेण च भूयसा ।
पूजितो ब्राह्मणश्रेष्ठ भूयो वस गृहे मम ॥
राजाने कहा – विप्रवर! आपपर आनेवाले भय अथवा संकटका विशेषरूपसे निवारण करतेहुए मैं आपको बड़े आदर - सत्कारके साथ अपने यहाँ रखूँगा । आप मेरे द्वारा सम्मानित हो बहुत कालतक मेरे महलमें निवास कीजिये ।
मुनि ने उत्तर दिया— "ब्रह्मन्! जो आपको मेरे यहाँ नहीं रहने देना चाहते, वे स्वयं ही मेरे घर में नहीं रहने पायेंगे। अब इन विरोधियों का दमन करने के लिये जो आवश्यक कर्त्तव्य हो, उसे आप स्वयं ही सोचिये और समझिये। भगवन! जिस तरह राजदण्ड को मैं अच्छी तरह धारण कर सकूँ और मेरे द्वारा अच्छे ही कार्य होते रहें, वह सब सोचकर आप मुझे कल्याण के मार्ग पर लगाइये।"
ये त्वां ब्राह्मण नेच्छन्ति ते न वत्स्यन्ति मे गृहे ।
भवतैव हि तज्ज्ञेयं यत्तदेषामनन्तरम् ॥
ब्रह्मन्! जो आपको मेरे यहाँ नहीं रहने देना चाहते हैं, वे स्वयं ही मेरे घरमें नहीं रहने पायेंगे अब इन विरोधियोंका दमन करनेके लिये जो आवश्यक कर्त्तव्य हो, उसे आप स्वयं ही सोचिये और समझिये ।
तभी मुनि ने राजा को गुप्त परामर्श देते हुए कहा— "राजन्! पहले तो कौए को मारने का जो अपराध है, इसे प्रकट किये बिना ही एक-एक मन्त्री का उसका अधिकार छीनकर उसे दुर्बल कर दीजिये। उसके बाद अपराध के कारण का पूरा-पूरा पता लगाकर क्रमशः एक-एक व्यक्ति का वध कर डालिये। नरेश्वर! जब बहुत से लोगों पर एक ही तरह का दोष लगाया जाता है, तो वे सब मिलकर एक हो जाते हैं और उस दशा में वे बड़े-बड़े कण्टकों को भी मसल डालते हैं; अतः यह गुप्त विचार दूसरों पर प्रकट न हो जाये, इसी भय से मैं तुम्हें इस प्रकार एक-एक करके विरोधियों के वध की सलाह दे रहा हूँ।"
मुनिरुवाच अदर्शयन्निमं दोषमेकैकं दुर्बलीकुरु ।
ततः कारणमाज्ञाय पुरुषं पुरुषं जहि ॥
मुनिने कहा — राजन्! पहले तो कौएको मारनेका जो अपराध है, इसे प्रकट किये बिना ही एक-एक मन्त्रीको उसका अधिकार छीनकर दुर्बल कर दीजिये । उसके बाद अपराधके कारणका पूरा- पूरा पता लगाकर क्रमशः एक-एक व्यक्तिका वध कर डालिये ।
राजा ने अत्यन्त आदरपूर्वक कहा— "महाराज! हम लोग ब्राह्मण हैं। हमारा दण्ड भी बहुत कोमल होता है और हम स्वभाव से ही दयालु होते हैं; अतः अपने ही समान आपका और दूसरों का भी भला चाहते हैं।"
वयं तु ब्राह्मणा नाम मृदुदण्डाः कृपालवः ।
स्वस्ति चेच्छाम भवतः परेषां च यथाऽऽत्मनः ॥
महाराज! हमलोग ब्राह्मण हैं । हमारा दण्ड भी बहुत कोमल होता है । हम स्वभावसे ही दयालु होते हैं; अतः अपने ही समान आपका और दूसरोंका भी भला चाहते हैं ।
मुनि ने अपना परिचय देते हुए कहा— "राजन्! अब मैं आपको अपना परिचय देता हूँ। मैं आपका सम्बन्धी हूँ। मेरा नाम कालकवृक्षीय मुनि है। मैं आपके पिता का आदरणीय एवं सत्यप्रतिज्ञ मित्र हूँ। आपके पिता के स्वर्गवास हो जाने के पश्चात् जब आपके राज्य पर भारी सङ्कट आ गया था, तब अपनी समस्त कामनाओं का परित्याग करके मैंने आपके हित के लिये तपस्या की थी। आपके प्रति स्नेह होने के कारण मैं फिर यहाँ आया हूँ और आपको ये सब बातें इसलिये बता रहा हूँ कि आप फिर किसी के चक्कर में न पड़ जायें। महाराज! आपने सुख और दुःख दोनों देखे हैं। यह राज्य आपको दैवेच्छा से प्राप्त हुआ है, तो भी आप इसे केवल मन्त्रियों पर छोड़कर क्यों भूल कर रहे हैं?"
सर्वकामान् परित्यज्य तपस्तप्तं तदा मया ।
स्नेहात् त्वां तु ब्रवीम्येतन्मा भूयो विभ्रमेदिति ॥
मैं आपके पिताका आदरणीय एव सत्यप्रतिज्ञ मित्र हूँ। नरेश्वर! आपके पिताके स्वर्गवास हो जानेके पश्चात् जब आपके राज्यपर भारी संकट आ गया था, तब अपनी समस्त कामनाओंका परित्याग करके मैंने ( आपके हितके लिये ) तपस्या की थी । आपके प्रति स्नेह होनेके कारण मैं फिर यहाँ आया हूँ और आपको ये सब बातें इसलिये बता रहा हूँ कि आप फिर किसीके चक्करमें न पड़ जायँ ।
कालकवृक्षीय मुनि ने अपने बुद्धिबल से यशस्वी कोसल नरेश को भूमण्डल का एकछत्र सम्राट् बनाया और अनेक उत्तम यज्ञों द्वारा उनका यजन किया। कोसल राजने भी पुरोहित का हितकारी वचन सुना और उन्होंने जैसा कहा, वैसा ही किया; इससे उन्होंने समस्त भूमण्डल पर विजय प्राप्त कर ली।
हितं तद्वचनं श्रुत्वा कौसल्योऽप्यजयन्महीम् ।
तथा च कृतवान् राजा यथोक्तं तेन भारत ॥
भारत! कोसलराजने भी पुरोहितका हितकारी वचन सुना और उन्होंने जैसा कहा, वैसा ही किया । इससे उन्होंने समस्त भूमण्डलपर विजय प्राप्त कर ली ।
In English
The Sage Kalakvrikshiya and King Khemdarshi
The sage Kalakvrikshiya uses a crow to observe corruption within the kingdom of King Khemdarshi. After corrupt officials kill the sage's crow to hide their theft, the sage warns the king that his own ministers are plotting against him.
This page answers
- How did kalakvrikshiya muni use a crow to spy on the kingdom?
- Why did the ministers kill the sage's crow?
- What warning did kalakvrikshiya give to king kshemdarshi?
- How does the text describe the relationship between a king and his ministers?
Also written: Kalakavrikshiyopakhyana, Kalakavrikshiya, Rajamantri, Sevakakarmachari, कालकवृक्षीयोपाख्यान