श्रीगणेशाय नमः।

कायव्यचरित : क्या एक लुटेरा व्यक्ति भी धर्म के मार्ग पर चलकर सिद्धि प्राप्त कर सकता है?

मर्यादा और धर्म की प्रधानता

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → आपद्धर्मपर्व · अध्याय 135 · पृष्ठ 867–871

711 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 6 श्लोक

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा

धर्म और मर्यादा के पालन की महत्ता समझाने हेतु

भीष्म बोले— हे युधिष्ठिर! जो दस्यु मर्यादा का पालन करता है, वह मरने के बाद दुर्गति में नहीं पड़ता। इस विषय में विद्वान् पुरुष एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं। यह कथा कायव्य नाम के एक निषाद पुत्र की है, जिसने दस्यु होने पर भी सिद्धि प्राप्त कर ली थी।

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यथा दस्युः समर्यादः प्रेत्यभावे न नश्यति ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! जो दस्यु ( डाकू) मर्यादाका पालन करता है, वह मरनेके बाद दुर्गतिमें नहीं पड़ता । इस विषयमें विद्वान् पुरुष एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।

महाभारत · शान्तिपर्व · आपद्धर्मपर्व · अध्याय 135 · श्लोक 1पृष्ठ 868

कायव्य प्रहारकुशल, शूरवीर और बुद्धिमान था। वह क्रूरता से रहित, आश्रमवासियों के धर्म की रक्षा करने वाला, ब्राह्मणभक्त और गुरुपूजक था। यद्यपि वह एक क्षत्रिय पिता और निषादजाति की स्त्री से उत्पन्न हुआ था, किन्तु वह सदैव क्षत्रियधर्म का ही पालन करता था। वह प्रतिदिन प्रातःकाल और सायङ्काल वन में जाकर मृगों की टोलियों को उत्तेजित कर देता था; उसे मृगों की विभिन्न जातियों के स्वभाव और उन्हें काबू में करने की कला का पूर्ण ज्ञान था। वह पारियात्र पर्वत पर विचरने वाला, समस्त प्राणियों के धर्म का ज्ञाता और अचूक बाण चलाने वाला योद्धा था। वह सैकड़ों मनुष्यों की सेना को अकेले जीत सकता था, किन्तु उस महान वन में रहकर वह अपने अन्धे और बहरे माता-पिता की सेवा-पूजा में लगा रहता था। वह उन्हें मधु, मांस, फल, मूल और नाना प्रकार के अन्न से सत्कारपूर्वक भोजन कराता था और अन्य माननीय पुरुषों की भी सेवा करता था।

भीष्म उवाच

प्रहर्ता मतिमान् शूरः श्रुतवाननृशंसवान् ।
रक्षन्नाश्रमिणां धर्मं ब्रह्मण्यो गुरुपूजकः ॥

निषाद्यां क्षत्रियाज्जातः क्षत्रधर्मानुपालकः ।
कायव्यो नाम नैषादिर्दस्युत्वात् सिद्धिमाप्तवान् ॥

कायव्यनामसे प्रसिद्ध एक निषादपुत्रने दस्यु होनेपर भी सिद्धि प्राप्त कर ली थी । वह प्रहारकुशल, शूरवीर, बुद्धिमान्, शास्त्रज्ञ, क्रूरतारहित, आश्रमवासियोंके धर्मकी रक्षा करनेवाला, ब्राह्मणभक्त और गुरुपूजक था । वह क्षत्रिय पितासे एक निषादजातिकी स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न हुआ था; अतः क्षत्रियधर्मका निरन्तर पालन करता था ।

महाभारत · शान्तिपर्व · आपद्धर्मपर्व · अध्याय 135 · श्लोक 2-3पृष्ठ 868

वह वन में रहने वाले वानप्रस्थ और सन्न्यासी ब्राह्मणों की पूजा करता और प्रतिदिन उनके घर जाकर उनके लिए अन्न आदि वस्तुएँ पहुँचा देता था। जो लोग लुटेरे के घर का भोजन होने की आशङ्का से उसके हाथ से अन्न नहीं ग्रहण करते थे, वह बड़े सवेरे ही उनके घरों में अन्न और फल-मूल रख आता था।

भीष्म उवाच

अरण्ये सायं पूर्वाह्णे मृगयूथप्रकोपिता ।
विधिज्ञो मृगजातीनां नैषादानां च कोविदः ॥

कायव्य प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकालके समय वनमें जाकर मृगोंकी टोलियोंको उत्तेजित कर देता था । वह मृगोंकी विभिन्न जातियोंके स्वभावसे परिचित तथा उन्हें काबूमें करनेकी कलाको जाननेवाला था । निषादोंमें वह सबसे निपुण था ।

महाभारत · शान्तिपर्व · आपद्धर्मपर्व · अध्याय 135 · श्लोक 4पृष्ठ 868

एक दिन मर्यादा का अतिक्रमण करने वाले और क्रूरतापूर्ण कर्म करने वाले कई हजार डाकुओं ने कायव्य के पास आकर उससे अपना सरदार बनने की प्रार्थना की। वे डाकू बोले— "तुम देश, काल और मुहूर्त के ज्ञाता, विद्वान्, शूरवीर और दृढ़प्रतिज्ञ हो; इसलिए हम सब लोगों की सम्मति से तुम हमारे सरदार हो जाओ। तुम हमें जैसी-जैसी आज्ञा दोगे, वैसा ही वैसा हम करेंगे। तुम माता-पिता के समान हमारी यथोचित रीति से रक्षा करो।"

कायव्य ने उन्हें सम्बोधित करते हुए कहा— "प्रिय बन्धुओ! तुम कभी स्त्री, डरपोक, बालक और तपस्वी की हत्या न करना। जो तुमसे युद्ध न कर रहा हो, उसका भी वध न करना। स्त्रियों को कभी बलपूर्वक न पकड़ना। तुममें से कोई भी सभी प्राणियों में स्त्रीवर्ग की किसी तरह भी हत्या न करे। ब्राह्मणों के हित का सदा ध्यान रखना; आवश्यकता हो तो उनकी रक्षा के लिये युद्ध भी करना। समस्त प्राणियों में ब्राह्मण विशेष रूप से डाकुओं के हाथ से छुटकारा पाने का अधिकारी है। अपना सर्वस्व लगाकर भी तुम्हें उनकी सेवा-पूजा करनी चाहिए। देखो, ब्राह्मण लोग कुपित होकर जिसके पराभव का चिन्तन करने लगते हैं, उसका तीनों लोकों में कोई रक्षक नहीं होता। जो ब्राह्मणों की निन्दा करता है और उनका विनाश चाहता है, उसका जैसे सूर्योदय होने पर अन्धकार का नाश हो जाता है, उसी प्रकार अवश्य ही पतन हो जाता है।"

यस्य ह्येते सम्प्ररुष्टा मन्त्रयन्ति पराभवम् ।
न तस्य त्रिषु लोकेषु त्राता भवति कश्चन ॥

देखो, ब्राह्मणलोग कुपित होकर जिसके पराभवका चिन्तन करने लगते हैं, उसका तीनों लोकोंमें कोई रक्षक नहीं होता ।

महाभारत · शान्तिपर्व · आपद्धर्मपर्व · अध्याय 135 · श्लोक 17पृष्ठ 870

उसने आगे कहा— "तुम लोग यहीं बैठे-बैठे लुटेरेपन का जो फल है, उसे पाने की अभिलाषा रखो। जो-जो व्यापारी हमें स्वेच्छा से धन नहीं देंगे, उन्हीं-उन्हीं पर तुम दल बाँधकर आक्रमण करोगे। दण्ड का विधान दुष्टों के दमन के लिये है, अपना धन बढ़ाने के लिये नहीं। जो शिष्ट पुरुषों को सताते हैं, उनका वध ही उनके लिये दण्ड माना गया है। जो लोग राष्ट्र को हानि पहुँचाकर अपनी उन्नति के लिये प्रयत्न करते हैं, वे मुर्दों में पड़े हुए कीड़ों के समान उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं। यदि ये सब बातें तुम्हें स्वीकार हों, तो मैं तुम्हारा सरदार बन सकता हूँ; क्योंकि जो दस्यु जाति में उत्पन्न होकर भी धर्मशास्त्र के अनुसार आचरण करते हैं, वे लुटेरे होने पर भी शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं।"

ये पुनर्धर्मशास्त्रेण वर्तेरन्निह दस्यवः ।
अपि ते दस्यवो भूत्वा क्षिप्रं सिद्धिमवाप्नुयुः ॥

जो दस्युजातिमें उत्पन्न होकर भी धर्मशास्त्रके अनुसार आचरण करते हैं, वे लुटेरे होनेपर भी शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं ( ये सब बातें तुम्हें स्वीकार हों तो मैं तुम्हारा सरदार बन सकता हूँ)

महाभारत · शान्तिपर्व · आपद्धर्मपर्व · अध्याय 135 · श्लोक 22पृष्ठ 871

भीष्म कहते हैं— राजन्! यह सुनकर उन दस्युओं ने कायव्य की सारी आज्ञा मान ली और सदा उसका अनुसरण किया। इससे उन सभी की उन्नति हुई और वे पाप-कर्मों से हट गए। कायव्य ने उस पुण्यकर्म से बड़ी भारी सिद्धि प्राप्त कर ली; क्योंकि उसने साधु पुरुषों का कल्याण करते हुए डाकुओं को पाप से बचा लिया था। जो प्रतिदिन कायव्य के इस चरित्र का चिन्तन करता है, उसे वनवासी प्राणियों से किञ्चिन्मात्र भी भय प्राप्त नहीं होता। हे भारत! उसे सम्पूर्ण भूतों से भी भय नहीं होता और न ही किसी दुष्टात्मा से डर लगता है; वह तो वन का अधिपति हो जाता है।

भीष्म उवाच

कायव्यः कर्मणा तेन महतीं सिद्धिमाप्तवान् ।
साधूनामाचरन् क्षेमं दस्यून् पापान्निवर्तयम् ॥

कायव्यने उस पुण्यकर्मसे बड़ी भारी सिद्धि प्राप्त कर ली; क्योंकि उसने साधु पुरुषोंका कल्याण करते हुए डाकुओंको पापसे बचा लिया था ।

महाभारत · शान्तिपर्व · आपद्धर्मपर्व · अध्याय 135 · श्लोक 24पृष्ठ 871

In English

The Story of Kayavya the Bandit Leader

Kayavya is a skilled and wise warrior who lives in the forest while caring for his blind and deaf parents. He accepts leadership of a group of bandits on the condition that they follow strict moral rules, such as not attacking women, children, or ascetics. By following these codes of conduct, Kayavya and his followers avoid sin and achieve spiritual success.

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  • Who was kayavya?
  • What were the rules kayavya gave to the bandits?
  • How did kayavya serve his parents?
  • Why did kayavya refuse to lead certain types of people?

Also written: Kayavyacharita, Kayavya, Bhishma, Yudhishthira, कायव्यचरित