कुण्डधारोपाख्यान : धर्म, अर्थ और काम में से सबसे श्रेष्ठ क्या है?
परम सुख धर्म में
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 271 · पृष्ठ 1755–1765
1,128 शब्द · 6 मिनटका पाठ · 10 श्लोक
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
धर्म, अर्थ और काम के महत्व पर चर्चा के दौरान
राजा युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से पूछा— "भरतनन्दन पितामह! वेद तो धर्म, अर्थ और काम— इन तीनों की ही प्रशंसा करते हैं; अतः आप मुझे यह बताइये कि इन तीनों में से मेरे लिए किसकी प्राप्ति सबसे बढ़कर है?"
धर्ममर्थं च कामं च वेदाः शंसन्ति भारत ।
कस्य लाभो विशिष्टोऽत्र तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
राजा युधिष्ठिरने पूछा- भरतनन्दन पितामह! वेद तो धर्म, अर्थ और काम— तीनोंकी ही प्रशंसा करते हैं; अतः आप मुझे यह बताइये कि इन तीनोंमेंसे किसकी प्राप्ति मेरे लिये सबसे बढ़कर है ।
भीष्मजी बोले— "राजन्! इस विषय में मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा। यह कथा कुण्डधार नामक मेघ की है, जिसने पूर्वकाल में प्रसन्न होकर अपने एक भक्त का उपउपकार किया था।"
किसी समय एक निर्धन ब्राह्मण ने सकाम भाव से धर्म करने का विचार किया। उसके मन में यज्ञ करने की इच्छा थी और वह सदा ही धन प्राप्त करने के लिए बड़ी कठोर तपस्या करने लगा। उसने भक्तिपूर्वक देवताओं की पूजा-अर्चा आरम्भ कर दी, परन्तु देवताओं की पूजा करके भी उसे वाञ्छित धन प्राप्त नहीं हो सका। वह इस गहरी चिन्ता में डूब गया कि आखिर वह कौन-सा देवता है जो मुझ पर शीघ्र प्रसन्न हो जाए? वह ऐसा देवता खोज रहा था जिसे मनुष्यों ने आराधना करके जड़ न बना दिया हो।
ततश्चिन्तामनुप्राप्तः कतमद्दैवतं तु तत् ।
यन्ये द्रुतं प्रसीदेत मानुषैरजडीकृतम् ॥
तब वह इस चिन्तामें पड़ा कि वह कौन-सा देवता है, जो मुझपर शीघ्र प्रसन्न हो जाय और मनुष्योंने आराधना करके जिसे जड न बना दिया हो ।
तभी उस ब्राह्मण की दृष्टि पास ही खड़े कुण्डधार नामक मेघ पर पड़ी, जो देवताओं के अनुचर थे। उस महाबाहु मेघ को देखते ही ब्राह्मण के मन में उसके प्रति गहरी भक्ति उत्पन्न हो गई। वह सोचने लगा— 'यह अवश्य मेरा कल्याण करेगा; क्योंकि इसका यह शरीर वैसे ही लक्षणों से सम्पन्न है जो देवता के अत्यन्त निकट होने का प्रमाण देते हैं और दूसरे मनुष्यों ने इसे घेर रखा नहीं है। इसलिये यह मुझे शीघ्र ही प्रचुर धन देगा।'
ब्राह्मण ने तुरन्त धूप, गन्ध, छोटे-बड़े माल्य तथा भाँति-भाँति के पूजोपहार अर्पित करके कुण्डधार मेघ का पूजन किया। वह मेघ थोड़े ही समय में ब्राह्मण के इस उपकार से सन्तुष्ट हो गया। उसने ब्राह्मण से कहा— 'ब्रह्मन्! ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर और व्रतभङ्ग करने वाले मनुष्यों के लिये साधुपुरुषों ने प्रायश्चित्त का विधान किया है, किन्तु कृतघ्न मनुष्य के लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है। आशा का पुत्र अधर्म है, असूया का पुत्र क्रोध माना गया है और निकृति यानी शठता का पुत्र लोभ है; परन्तु एक कृतघ्न मनुष्य सन्तान पाने के योग्य भी नहीं होता।'
आशायास्तनयोऽधर्मः क्रोधोऽसूयासुतः स्मृतः ।
लोभः पुत्रो निकृत्यास्तु कृतघ्नो नार्हति प्रजाम् ॥
‘ आशाका पुत्र अधर्म है । असूयाका पुत्र क्रोध माना गया है । निकृति ( शठता) का पुत्र लोभ है; परंतु कृतघ्न मनुष्य संतान पानेके योग्य नहीं है '
उस कुण्डधार के तेज से प्रेरित होकर ब्राह्मण कुशों की शय्या पर सो गया। स्वप्न में उसे समस्त प्राणियों का एक अद्भुत दृश्य दिखाई दिया। उसने देखा कि महातेजस्वी महात्मा यक्षराज मणिभद्र वहाँ विराजमान हैं और देवताओं के समक्ष विभिन्न याचकों को उपस्थित कर रहे हैं। देवतालोग उन याचकों के शुभकर्मों के बदले उन्हें राज्य और धन दे रहे थे, किन्तु उनके अशुभ कर्मों का भोग सामने आने पर पहले से दिए गए राज्य भी छीन लिए जाते थे।
तत्र देवाः प्रयच्छन्ति राज्यानि च धनानि च ।
शुभैः कर्मभिरारब्धाः प्रच्छिन्दन्त्यशुभेषु च ॥
वहाँ देवतालोग उन याचकोंके शुभकर्मके बदले राज्य और धन आदि दे रहे थे और अशुभ कर्मका भोग उपस्थित होनेपर पहलेके दिये हुए राज्य आदिको भी छीन लेते थे ।
तब महामनस्वी मणिभद्र ने देवताओं की आज्ञा से उस मेघ से पूछा— 'कुण्डधार! तुम क्या चाहते हो?' कुण्डधार बोला— 'यह ब्राह्मण मेरा भक्त है। यदि देवतालोग मुझ पर प्रसन्न हों, तो मैं इसके ऊपर उनका ऐसा अनुग्रह चाहता हूँ जिससे इसे भविष्य में कुछ सुख मिल सके।'
मणिभद्र ने पुनः कुण्डधार से कहा— 'उठो, उठो; तुम्हारा कल्याण हो! तुम सुखी हो जाओ। यदि यह ब्राह्मण धन चाहता है, तो देवताओं की आज्ञा से मैं इसे असङ्ख्य धन दे रहा हूँ।' परन्तु कुण्डधार का विचार कुछ और ही था। उसने सोचा कि मानव जीवन चञ्चल और अस्थिर है, अतः वह ब्राह्मण के तपोबल को बढ़ाना चाहता है।
कुण्डधार ने कहा— 'धनदाता देव! मैं इस ब्राह्मण के लिये धन की याचना नहीं करता। मेरी इच्छा है कि यह धर्मात्मा हो, इसकी बुद्धि धर्म में लगी रहे और इसके जीवन में धर्म की ही प्रधानता रहे। मैं इसे रत्नों से भरी पृथ्वी नहीं, बल्कि धर्म का मार्ग देना चाहता है।' मणिभद्र ने कहा— 'धर्म के फल तो सदा राज्य और सुख ही हैं; अतः यह ब्राह्मण केवल शारीरिक कष्ट से रहित रहकर उन फलों का उपभोग करे।'
नाहं धनानि याचामि ब्राह्मणाय धनप्रद ॥
अन्यमेवाहमिच्छामि भक्तायानुग्रहं कृतम् ।
पृथिवीं रत्नपूर्णां वा महद् वा रत्नसंचयम् ॥
भक्ताय नाहमिच्छामि भवेदेष तु धार्मिकः ।
धर्मेऽस्य रमतां बुद्धिर्धर्मं चैवोपजीवतु ।
धर्मप्रधानो भवतु ममैषोऽनुग्रहो मतः ॥
कुण्डधार बोला – धनदाता देव! मैं ब्राह्मणके लिये धनकी याचना नहीं करता हूँ । मेरी इच्छा है कि मेरे इस भक्तपर किसी और प्रकारका ही अनुग्रह किया जाय । मैं अपने इस भक्तको रत्नोंसे भरी हुई पृथ्वी अथवा रत्नोंका विशाल भण्डार नहीं देना चाहता । मेरी तो यह इच्छा है कि यह धर्मात्मा हो । इसकी बुद्धि धर्ममें लगी रहे तथा यह धर्मसे ही जीवन-निर्वाह करे । इसके जीवनमें धर्मकी ही प्रधानता रहे । इसीको मैं इसके लिये महान् अनुग्रह मानता हूँ ।
परन्तु कुण्डधार अपनी बात पर अडिग रहा। उसने बार-बार आग्रह किया कि ब्राह्मण का धर्म बढ़े। अन्ततः सभी देवता सन्तुष्ट हो गए। मणिभद्र ने कहा— 'कुण्डधार! सब देवता तुम पर और इस ब्राह्मण पर भी बहुत प्रसन्न हैं। यह धर्मात्मा होगा और इसकी बुद्धि धर्म में ही लगी रहेगी।'
जब ब्राह्मण की नींद खुली, तो वह मन ही मन सोचने लगा— 'जब मेरे इस पुण्यमय तप का उद्देश्य यह कुष्ठधार ही नहीं समझ पा रहा है, तब दूसरा कौन जानेगा! अच्छा, अब मैं वन को ही चलता हूँ। धर्ममय जीवन बिताना ही श्रेष्ठ है।' वैराग्य और देवताओं के कृपाप्रसाद से उस ब्राह्मण ने वन में जाकर अत्यन्त भारी तपस्या आरम्भ कर दी। वह देवताओं और अतिथियों को अर्पण करने के बाद केवल बचे हुए फल-मूल खाता था। धीरे-धीरे उसने फलों का त्याग कर दिया, फिर पत्तों का भी और अन्त में केवल जल पीकर रहने लगा। वर्षों तक वायु पीकर निर्वाह करने के बाद भी उसकी प्राणशक्ति क्षीण नहीं हुई।
त्यक्त्वा मूलफलं सर्वं पर्णाहारोऽभवद् द्विजः ।
पर्णं त्यक्त्वा जलाहारः पुनरासीद् द्विजस्तदा ॥
वायुभक्षस्ततः पश्चाद् बहून् वर्षगणानभूत् ।
न चास्य क्षीयते प्राणस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥
कुछ कालके बाद वह ब्राह्मण सारे फल- मूलका भोजन छोड़कर केवल पत्ते चबाकर रहने लगा । फिर पत्तेका भी त्याग करके केवल जल पीकर निर्वाह करने लगा । तत्पश्चात् बहुत वर्षोंतक वह केवल वायु पीकर रहा । फिर भी उसकी प्राणशक्ति क्षीण नहीं होती थी, यह एक अद्भुत - सी बात थी ।
दीर्घकाल की उस उग्र तपस्या ने उसे दिव्य दृष्टि प्रदान कर दी। उसे अनुभव हुआ कि यदि वह सन्तुष्ट होकर किसी को राज्य दे दे, तो उसका वचन मिथ्या नहीं होगा। उसने सङ्कल्प किया— 'यदि मैं सन्तुष्ट होकर जिस किसी को भी राज्य दे दूँ, तो वह शीघ्र ही राजा हो जाएगा; मेरी यह बात कभी मिथ्या नहीं होगी।'
संनिकृष्टश्च देवस्य न चान्यैर्मानुषैर्वृतः ।
एष मे दास्यति धनं प्रभूतं शीघ्रमेव च ॥
यह देवताका संनिकटवर्ती है और दूसरे मनुष्योंने इसे घेर नहीं रखा है । इसलिये यह मुझे शीघ्र ही प्रचुर धन देगा ।
तभी कुण्डधार ने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिए। ब्राह्मण ने विधिपूर्वक उसकी पूजा की। कुण्डधार ने कहा— 'विप्रवर! तुम्हें परम उत्तम दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है; अतः तुम अपनी आँखों से देख लो कि राजाओं को किस गति की प्राप्ति होती है और वे किन लोकों में जाते हैं।'
ब्राह्मण ने अपने दिव्य नेत्रों से देखा कि सहस्रों राजा नरक में डूबे हुए हैं। कुण्डधार ने समझाया— 'ब्रह्मन्! तुमने मेरी पूजा की, पर यदि तुम धन पाकर दुःख ही भोगते रहते तो मेरा उपकार क्या होता? देखो, जो धन और भोगों में आसक्त हैं, उनके लिये स्वर्ग का दरवाजा प्रायः बन्द रहता है। देवता मनुष्यों के दोषों से भयभीत रहते हैं, इसलिये वे धर्म और तपस्या में विघ्न डालते हैं। किन्तु तुम्हें देवताओं का अनुग्रह प्राप्त हो गया है; अब तुम अपने तप के प्रभाव से दूसरों को राज्य और धन देने में समर्थ हो गए हो।'
न देवैरननुज्ञातः कश्चिद् भवति धार्मिकः ।
एष शक्तोऽसि तपसा दातुं राज्यं धनानि च ॥
देवताओंकी अनुमति प्राप्त किये बिना कोई निर्विघ्नरूपसे धर्मका अनुष्ठान नहीं कर सकता; किंतु तुम्हें तो देवताओंका अनुग्रह प्राप्त हो गया है । इसलिये अब तुम अपने तपके प्रभावसे दूसरोंको राज्य और धन देनेमें समर्थ हो गये हो ।
यह सुनकर उस धर्मात्मा ब्राह्मण ने धरती पर मस्तक टेककर कुण्डधार को साष्टाङ्ग प्रणाम किया और कहा— 'प्रभो! आपने मुझ पर महान अनुग्रह किया है। आपके स्नेह को न समझकर, काम और लोभ के बन्धन में बँधे रहने के कारण मैंने पहले आपके प्रति जो दोषदृष्टि की थी, उसके लिये मुझे क्षमा करें।'
कुण्डधार ने कहा— 'विप्रवर! मैं तो तुम्हें पहले ही क्षमा कर चुका हूँ।' इतना कहकर उसने उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को अपनी दोनों भुजाओं से हृदय से लगा लिया और वहीं अन्तर्धान हो गया।
तदनन्तर कुण्डधारके कृपाप्रसादसे तपस्याद्वारा सिद्धि पाकर वह ब्राह्मण सम्पूर्ण लोकोंमें विचरने लगा ॥ विहायसा च गमनं तथा संकल्पितार्थता ।
धर्माच्छक्त्या तथा योगाद् या चैव परमा गतिः ॥
आकाशमार्गसे चलना, संकल्पमात्रसे ही अभीष्ट वस्तुका प्राप्त हो जाना तथा धर्म, शक्ति और योगके द्वारा जो परमगति प्राप्त होती है, वह सब कुछ उस ब्राह्मणको प्राप्त हो गयी ।
उस ब्राह्मण को आकाश मार्ग से चलना, सङ्कल्प मात्र से वस्तु प्राप्त करना तथा धर्म, शक्ति और योग द्वारा परमगति प्राप्त करना— यह सब प्राप्त हुआ। देवता, साधु-सन्त, यक्ष और मनुष्य, ये सब इस जगत् में धर्मात्माओं का ही पूजन करते हैं, धनियों का नहीं। राजन्! तुम्हारे ऊपर भी देवता प्रसन्न हैं, जिससे तुम्हारी बुद्धि धर्म में लगी है। स्मरण रहे, धन में सुख का लेशमात्र भी नहीं है; परम सुख तो केवल धर्म में ही है।
सुप्रसन्ना हि ते देवा यत्ते धर्मे रता मतिः ।
धने सुखकला काचिद् धर्मे तु परमं सुखम् ॥
राजन्! तुम्हारे ऊपर भी देवता बहुत प्रसन्न हैं, जिससे तुम्हारी बुद्धि धर्ममें लगी हुई है । धनमें तो सुखका कोई लेशमात्र ही रहता है । परमसुख तो धर्ममें ही है ।
In English
The Story of the Cloud Kundadhar and the Brahmin
A poor Brahmin performs penance to worship the cloud Kundadhar. Instead of asking for wealth, Kundadhar asks the gods to grant the Brahmin a life focused on righteousness. The Brahmin eventually gains divine vision and the power to grant kingdoms through his intense asceticism.
This page answers
- Who is the cloud kundadhar?
- Why did kundadhar ask for dharma instead of wealth for the brahmin?
- What did the brahmin see with his divine vision?
- How did the brahmin's life change after his penance?
Also written: Kundadharopakhyana, Kundadhara, Bhishma, Yudhishthira, Manibhadra, कुण्डधारोपाख्यान