श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1751–1760
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1751–1760
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वे अपने - अपने कर्मोंसे ही परिपुष्ट थे । उनकी तपस्या घोर रूप धारण कर चुकी थी । वे आश्चर्यजनक सदाचारका पालन करते थे और उसका उन्हें पुरातन, शाश्वत एवं अविनाशी ब्रह्मरूप फल प्राप्त होता था ॥
अशक्नुवद्भिश्चरितुं किंचिद् धर्मेषु सूक्ष्मताम् ।
निरापद्धर्म आचारो ह्यप्रमादोऽपराभवः ॥ २१ ॥
धर्मोंमें जो किंचित् सूक्ष्मता है, उसका आचरण करनेमें कितने ही लोग असमर्थ हो जाते हैं । वास्तवमें वेदोक्त आचार और धर्म आपत्तिसे रहित है । उसमें न तो प्रमाद है और न पराभव ही है ॥ २१ ॥
सर्ववर्णेषु जातेषु नासीत् कश्चिद् व्यतिक्रमः ।
व्यस्तमेकं चतुर्धा हि ब्राह्मणा आश्रमं विदुः ॥ २२ ॥
पूर्वकालमें सब वर्णोंकी उत्पत्ति हो जानेपर आश्रमके विषयमें कोई वैषम्य नहीं था । तदनन्तर एक ही आश्रमको अवस्था - भेदसे चार भागोंमें विभक्त किया गया । इस बातको सभी ब्राह्मण जानते रहे ॥ २२ ॥
तं सन्तो विधिवत् प्राप्य गच्छन्ति परमां गतिम् ।
गृहेभ्य एव निष्क्रम्य वनमन्ये समाश्रिताः ॥ २३ ॥
गृहमेवाभिसंश्रित्य ततोऽन्ये ब्रह्मचारिणः ।
त एते दिवि दृश्यन्ते ज्योतिर्भूता द्विजातयः ॥ २४ ॥
नक्षत्राणीव धिष्ण्येषु बहवस्तारकागणाः ।
आनन्त्यमुपसम्प्राप्ताः संतोषादिति वैदिकम् ॥ २५ ॥
श्रेष्ठ पुरुष विधिपूर्वक उन सब आश्रमोंमें प्रवेश करके उनके धर्मका पालन करते हुए परम - गतिको प्राप्त होते हैं । उनमेंसे कुछ लोग तो घरसे निकलकर ( अर्थात् संन्यासी होकर ), कुछ लोग वानप्रस्थका आश्रय लेकर, कुछ मानव गृहस्थ ही रहकर और कोई ब्रह्मचर्य आश्रमका सेवन करते हुए ही उस आश्रमधर्मका पालन करके परमपदको प्राप्त होते हैं । उस समय वे ही द्विजगण आकाशमें ज्योतिर्मयरूपसे दिखायी देते हैं, जो कि नक्षत्रोंके समान ही आकाशके विभिन्न स्थानोंमें अनेक तारागण हैं – इन सबने संतोषके द्वारा ही यह अनन्त पद प्राप्त किया है, ऐसा वैदिक सिद्धान्त है ॥ २३–२५ ॥
यद्यागच्छन्ति संसारं पुनर्योनिषु तादृशाः ।
न लिप्यन्ते पापकृत्यैः कदाचित् कर्मयोनितः ॥ २६ ॥
ऐसे पुण्यात्मा पुरुष यदि कभी पुनः संसारकी कर्माधिकार युक्त योनियोंमें आते या जन्म ग्रहण करते हैं तो वे उस योनिके सम्बन्धसे पापकर्मोंद्वारा लिप्त नहीं होते हैं ॥ २६ ॥
एवमेव ब्रह्मचारी शुश्रूषुर्घोरनिश्चयः ।
एवं युक्तो ब्राह्मणः स्यादन्यो ब्राह्मणको भवेत् ॥ २७ ॥
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इसी प्रकार गुरुकी सेवामें तत्पर रहनेवाला, ब्रह्मचर्य- परायण, दृढ़ निश्चयवाला तथा योगयुक्त ब्रह्मचारी ही उत्तम ब्राह्मण हो सकता है । उससे भिन्न अन्य प्रकारका ब्राह्मण निम्न कोटिका अथवा नाममात्रका ब्राह्मण समझा जाता है ॥ २७ ॥
कर्मैवं पुरुषस्याह शुभं वा यदि वाशुभम् ।
एवं पक्वकषायाणामानन्त्येन श्रुतेन च ॥ २८ ॥
सर्वमानन्त्यमासीद् वै एवं नः शाश्वती श्रुतिः ।
तेषामपेततृष्णानां निर्णिक्तानां शुभात्मनाम् ॥ २ ९ ॥
इस प्रकार शुभ अथवा अशुभ कर्म ही पुरुषका तदनु- रूप नाम नियत करता है । जिनके राग-द्वेष आदि कषाय पक गये हैं, जिनके मनसे तृष्णा निकल गयी है, जो बाहर-भीतरसे शुद्ध हैं तथा जिनकी बुद्धि कल्याणस्वरूप मोक्षमें लगी हुई है, उन तत्त्वज्ञानी पुरुषोंकी दृष्टिमें अनन्त ब्रह्मज्ञान तथा शास्त्रज्ञानके प्रभावसे सब कुछ ब्रह्मस्वरूप हो गया था; यह बात सदा ही हमारे सुननेमें आयी है ॥ २८-२९ ॥
चतुर्थोपनिषद् धर्मः साधारण इति स्मृतिः ।
संसिद्धैः साध्यते नित्यं ब्राह्मणैर्नियतात्मभिः ॥ ३० ॥
तुरीय ब्रह्मसे सम्बन्ध रखनेवाली जो उपनिषद्- विद्या है, उसकी प्राप्ति करानेवाले शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा तथा समाधानरूप जो धर्म हैं, वह सभी वर्ण और आश्रमके लोगोंके लिये साधारण हैं - ऐसा स्मृतिका कथन है । परंतु जो संयतचित्त और तपःसिद्ध ब्रह्मनिष्ठ पुरुष हैं, वे ही सदा उस धर्मका साधन कर पाते हैं ॥ ३० ॥
संतोषमूलस्त्यागात्मा ज्ञानाधिष्ठानमुच्यते ।
अपवर्गमतिर्नित्यो यतिधर्मः सनातनः ॥ ३१ ॥
संतोष ही जिसके सुखका मूल है, त्याग ही जिसका स्वरूप है, जो ज्ञानका आश्रय कहा जाता है, जिसमें मोक्षदायिनी बुद्धि - ब्रह्मसाक्षात्काररूप वृत्ति नित्य आवश्यक है, वह संन्यास - आश्रमरूप धर्म सनातन है ॥ साधारणः केवलो वा यथाबलमुपासते ।
गच्छतां गच्छतां क्षेमं दुर्बलोऽत्रावसीदति ।
ब्रह्मणः पदमन्विच्छन् संसारान्मुच्यते शुचिः ॥ ३२ ॥
यह यतिधर्म अन्य आश्रमके धर्मोंसे मिला हुआ हो या स्वतन्त्र हो, जो अपने वैराग्य-बलके अनुसार इसका आश्रय लेते हैं, वे कल्याणके भागी होते हैं । इस मार्गसे जानेवाले सभी पथिकोंका परम कल्याण होता है; परंतु जो दुर्बल है - मन और इन्द्रियोंको वशमें न रखनेके कारण जो इसके साधनमें असमर्थ है, वही यहाँ शिथिल होकर बैठ रहता है । जो बाहर और भीतरसे पवित्र है, वह ब्रह्मपदका अनुसंधान करता हुआ संसार- बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ३२ ॥
स्यूमरश्मिरुवाच
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ये भुञ्जते ये ददते यजन्तेऽधीयते च ये ।
मात्राभिरुपलब्धाभिर्ये वा त्यागं समाश्रिताः ॥ ३३ ॥
एतेषां प्रेत्यभावे तु कतमः स्वर्गजित्तमः ।
एतदाचक्ष्व मे ब्रह्मन् यथातत्त्वेन पृच्छतः ॥ ३४ ॥
स्यूमरश्मिने पूछा— ब्रह्मन्! जो लोग प्राप्त हुए धनके द्वारा केवल भोग भोगते हैं, जो दान करते हैं, जो उस धनको यज्ञमें लगाते हैं, जो स्वाध्याय करते हैं अथवा जो त्यागका आश्रय लेते हैं, इनमेंसे कौन पुरुष मृत्युके पश्चात् प्रधानरूपसे स्वर्गलोकपर विजय पाता है? मैं जिज्ञासुभावसे पूछ रहा हूँ; आप मुझे यह सब यथार्थरूपसे बताइये ॥ ३३-३४ ॥ कपिलउवाच
परिग्रहाः शुभाः सर्वे गुणतोऽभ्युदयाश्च ये ।
न तु त्यागसुखं प्राप्ता एतत् त्वमपि पश्यसि ॥ ३५ ॥
कपिलजीने कहा — जिनका सात्त्विक गुणसे प्राकट्य हुआ है, ऐसे सभी परिग्रह शुभ हैं; परंतु त्यागमें जो सुख है, उसे इनमेंसे कोई भी नहीं पा सके हैं । इस बातको तुम भी देखते ही हो ॥ ३५ ॥
स्यूमरश्मिरुवाच
भवन्तो ज्ञाननिष्ठा वै गृहस्थाः कर्मनिश्चयाः ।
आश्रमाणां च सर्वेषां निष्ठायामैक्यमुच्यते ॥ ३६ ॥
एकत्वेन पृथक्त्वेन विशेषो नात्र दृश्यते ।
तद् यथावद् यथान्यायं भगवान् प्रब्रवीतु मे ॥ ३७ ॥
स्यूमरश्मिने पूछा — भगवन्! आप तो ज्ञाननिष्ठ हैं और गृहस्थलोग कर्मनिष्ठ होते हैं; परंतु आप इस समय निष्ठामें सभी आश्रमोंकी एकताका प्रतिपादन कर रहे हैं । इस प्रकार ज्ञान और कर्मकी एकता और पृथक्ता–दोनोंका भ्रम होनेसे इनका ठीक- ठीक अन्तर समझमें नहीं आता है । इसलिये आप मुझे उसे यथोचित एवं यथार्थरीतिसे बतानेकी कृपा करें ॥ ३६-३७ ॥ कपिलउवाच
शरीरपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः ।
कषाये कर्मभिः पक्वे रसज्ञाने च तिष्ठति ॥ ३८ ॥
कपिलजीने कहा- कर्म स्थूल और सूक्ष्म शरीरकी शुद्धि करनेवाले हैं, किंतु ज्ञान परम गतिरूप है । जब कर्मोंद्वारा चित्तके रागादि दोष जल जाते हैं, तब मनुष्य रस- स्वरूप ज्ञानमें स्थित हो जाता है ॥ ३८ ॥
आनृशंस्यं क्षमा शान्तिरहिंसा सत्यमार्जवम् ।
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अद्रोहोऽनभिमानश्च ह्रीस्तितिक्षा शमस्तथा ॥ ३ ९ ॥
पन्थानो ब्रह्मणस्त्वेते एतैः प्राप्नोति यत्परम् ।
तद् विद्वाननुबुद्धयेत मनसा कर्मनिश्चयम् ॥ ४० ॥
समस्त प्राणियोंपर दया, क्षमा, शान्ति, अहिंसा, सत्य, सरलता, अद्रोह, निरभिमानता, लज्जा, तितिक्षा और शम- ये परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके मार्ग हैं । इनके द्वारा पुरुष परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है । इस प्रकार विद्वान् पुरुषको मनके द्वारा कर्मके वास्तविक परिणामका निश्चय समझना चाहिये ॥ ३ ९ -४० ॥
यां विप्राः सर्वतः शान्ता विशुद्धा ज्ञाननिश्चयाः ।
गतिं गच्छन्ति संतुष्टास्तामाहुः परमां गतिम् ॥ ४१ ॥
सब ओरसे शान्त, संतुष्ट, विशुद्धचित्त और ज्ञाननिष्ठ विप्र जिस गतिको प्राप्त होते हैं, उसीको परमगति कहते हैं ॥ ४१ ॥
वेदांश्च वेदितव्यं च विदित्वा च यथास्थितिम् ।
एवं वेदविदित्याहुरतोऽन्यो वातरेचकः ॥ ४२ ॥
जो वेदों और उनके द्वारा जानने योग्य परब्रह्मको ठीक- ठीक जानता है, उसीको वेदवेत्ता कहते हैं । उससे भिन्न जो दूसरे लोग हैं, वे मुँहसे वेद नहीं पढ़ते, धौंकनीके समान केवल हवा छोड़ते हैं ॥ ४२ ॥
सर्वं विदुर्वेदविदो वेदे सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
वेदे हि निष्ठा सर्वस्य यद् यदस्ति च नास्ति च ॥ ४३ ॥
वेदज्ञ पुरुष सभी विषयोंको जानते हैं; क्योंकि वेदमें सब कुछ प्रतिष्ठित है । जो -जो वस्तु है और जो नहीं है, उन सबकी स्थिति वेदमें बतायी गयी है ॥ ४३ ॥
एषैव निष्ठा सर्वत्र यत् तदस्ति च नास्ति च ।
एतदन्त च मध्यं च सच्चासच्च विजानतः ॥ ४४ ॥
सम्पूर्ण शास्त्रोंकी एकमात्र निष्ठा यही है कि जो -जो दृश्य पदार्थ है वह प्रतीतिकालमें तो विद्यमान है, परंतु परमार्थ ज्ञानकी स्थितिमें बाधित हो जानेपर वह नहीं है । ज्ञानी पुरुषकी दृष्टिमें सदसत् स्वरूप ब्रह्म ही इस जगत्का आदि, मध्य और अन्त है ॥ ४४ ॥
समाप्तं त्याग इत्येव सर्ववेदेषु निष्ठितम् ।
संतोष इत्यनुगतमपवर्गे प्रतिष्ठितम् ॥ ४५ ॥
सब कुछ त्याग देनेपर ही उस ब्रह्मकी प्राप्ति होती है । यही बात सम्पूर्ण वेदोंमें निश्चित की गयी है । वह अपने आनन्दस्वरूपसे सबमें अनुगत तथा अपवर्ग ( मोक्ष ) में प्रतिष्ठित ॥ ४५ ॥
ऋतं सत्यं विदितं वेदितव्यं सर्वस्यात्मा स्थावरं जङ्गमं च । सर्वं सुखं यच्छिवमुत्तरं च
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ब्रह्माव्यक्तं प्रभवश्चाव्ययं च ॥ ४६ ॥
अतः वह ब्रह्म ऋत, सत्य, ज्ञात, ज्ञातव्य, सबका आत्मा, स्थावर- जंगमरूप, सम्पूर्ण सुखरूप, कल्याणमय, सर्वोत्कृष्ट, अव्यक्त, सबकी उत्पत्तिका कारण और अविनाशी ॥ ४६ ॥
तेजः क्षमा शान्तिरनामयं शुभं
तथाविधं व्योम सनातनं ध्रुवम् ।
एतैः सर्वैर्गम्यते बुद्धिनेत्रै- स्तस्मै नमो ब्रह्मणे ब्राह्मणाय ॥ ४७ ॥
उस आकाशके समान असंग, अविनाशी और सदा एकरस तत्त्वका ज्ञान - नेत्रोंवाले सभी पुरुष तेज, क्षमा और शान्तिरूप शुभ साधनोंके द्वारा साक्षात्कार करते हैं । जो वास्तवमें ब्रह्मवेत्तासे अभिन्न है, उस परब्रह्म परमात्माको नमस्कार है ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि गोकपिलीये सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७० ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें गोकपिलीयोपाख्यानविषयक दो सौ सत्तरवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २७० ॥
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एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः धन और काम - भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कर्ष सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा युधिष्ठिर उवाच
धर्ममर्थं च कामं च वेदाः शंसन्ति भारत ।
कस्य लाभो विशिष्टोऽत्र तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
राजा युधिष्ठिरने पूछा- भरतनन्दन पितामह! वेद तो धर्म, अर्थ और काम— तीनोंकी ही प्रशंसा करते हैं; अतः आप मुझे यह बताइये कि इन तीनोंमेंसे किसकी प्राप्ति मेरे लिये सबसे बढ़कर है ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् ।
कुण्डधारेण यत् प्रीत्या भक्तायोपकृतं पुरा ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! इस विषयमें मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा, जिसके अनुसार कुण्डधार नामक मेघने पूर्वकालमें प्रसन्न होकर अपने एक भक्तका उपकार किया था ॥ २ ॥
अधनो ब्राह्मणः कश्चित् कामाद् धर्ममवैक्षत ।
यज्ञार्थं सततोऽर्थार्थी तपोऽतप्यत दारुणम् ॥ ३ ॥
किसी समय एक निर्धन ब्राह्मणने सकामभावसे धर्म करनेका विचार किया । वह यज्ञ करनेके लिये सदा ही धनकी इच्छा रखता था, अतः बड़ी कठोर तपस्या करने लगा ॥ ३ ॥
स निश्चयमथो कृत्वा पूजयामास देवताः ।
भक्त्या न चैवाध्यगच्छद् धनं सम्पूज्य देवताः ॥ ४ ॥
यही निश्चय करके उसने भक्तिपूर्वक देवताओंकी पूजा- अर्चा आरम्भ की । परंतु देवताओंकी पूजा करके भी वह धन न पा सका ॥ ४ ॥
ततश्चिन्तामनुप्राप्तः कतमद्दैवतं तु तत् ।
यन्ये द्रुतं प्रसीदेत मानुषैरजडीकृतम् ॥ ५ ॥
तब वह इस चिन्तामें पड़ा कि वह कौन-सा देवता है, जो मुझपर शीघ्र प्रसन्न हो जाय और मनुष्योंने आराधना करके जिसे जड न बना दिया हो ॥ ५ ॥
सोऽथ सौम्येन मनसा देवानुचरमन्तिके ।
प्रत्यपश्यज्जलधरं कुण्डधारमवस्थितम् ॥ ६ ॥
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तदनन्तर उस ब्राह्मणने शान्त मनसे देवताओंके अनुचर कुण्डधार नामक मेघको पास ही खड़ा देखा ॥
दृष्ट्वैव तं महाबाहुं तस्य भक्तिरजायत ।
अयं मे धास्यति श्रेयो वपुरेतद्धि तादृशम् ॥ ७ ॥
उस महाबाहु मेघको देखते ही ब्राह्मणके मनमें उसके प्रति भक्ति उत्पन्न हो गयी और वह सोचने लगा कि यह अवश्य मेरा कल्याण करेगा; क्योंकि इसका यह शरीर वैसे ही लक्षणोंसे सम्पन्न है ॥ ७ ॥
संनिकृष्टश्च देवस्य न चान्यैर्मानुषैर्वृतः ।
एष मे दास्यति धनं प्रभूतं शीघ्रमेव च ॥ ८ ॥
यह देवताका संनिकटवर्ती है और दूसरे मनुष्योंने इसे घेर नहीं रखा है । इसलिये यह मुझे शीघ्र ही प्रचुर धन देगा ॥ ८ ॥
ततो धूपैश्च गन्धैश्च माल्यैरुच्चावचैरपि ।
बलिभिर्विविधाभिश्च पूजयामास तं द्विजः ॥ ९ ॥
तब ब्राह्मणने धूप, गन्ध, छोटे -बड़े माल्य तथा भाँति- भाँतिके पूजोपहार अर्पित करके कुण्डधार मेघका पूजन किया ९ ॥
ततस्त्वल्पेन कालेन तुष्टो जलधरस्तदा ।
तस्योपकारनियतामिमां वाचमुवाच ह ॥ १० ॥
इससे वह मेघ थोड़े ही समयमें संतुष्ट हो गया और उसने ब्राह्मणके उपकारमें नियमपूर्वक प्रवृत्ति सूचित करनेवाली यह बात कही— ॥ १० ॥
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ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नव्रते तथा ।
निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥ ११ ॥
‘ ब्रह्मन्! ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर और व्रतभंग करनेवाले मनुष्यके लिये साधुपुरुषोंने प्रायश्चित्तका विधान किया है, किंतु कृतघ्नके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है ॥ ११ ॥
आशायास्तनयोऽधर्मः क्रोधोऽसूयासुतः स्मृतः ।
लोभः पुत्रो निकृत्यास्तु कृतघ्नो नार्हति प्रजाम् ॥ १२ ॥
‘ आशाका पुत्र अधर्म है । असूयाका पुत्र क्रोध माना गया है । निकृति ( शठता) का पुत्र लोभ है; परंतु कृतघ्न मनुष्य संतान पानेके योग्य नहीं है ' ॥ १२ ॥
ततः स ब्राह्मणः स्वप्ने कुण्डधारस्य तेजसा ।
अपश्यत् सर्वभूतानि कुशेषु शयितस्तदा ॥ १३ ॥
तदनन्तर वह ब्राह्मण कुण्डधारके तेजसे प्रेरित हो कुशोंकी शय्यापर सो गया और स्वप्नमें उसने समस्त प्राणियोंको देखा ॥ १३ ॥
शमेन तपसा चैव भक्त्या च निरुपस्कृतः ।
शुद्धात्मा ब्राह्मणो रात्रौ निदर्शनमपश्यत ॥ १४ ॥
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वह शम- दम, तप और भक्तिभावसे सम्पन्न, भोगरहित तथा शुद्धचित्तवाला था । उस ब्राह्मणको रातमें कुछ ऐसा दृष्टान्त दिखायी दिया, जिससे उसे कुण्डधारके प्रति अपनी भक्तिका परिचय मिल गया ॥ १४ ॥
मणिभद्रं स तत्रस्थं देवतानां महाद्युतिम् ।
अपश्यत महात्मानं व्यादिशन्तं युधिष्ठिर ॥ १५ ॥
युधिष्ठिर! उसने देखा कि महातेजस्वी महात्मा यक्षराज मणिभद्र वहाँ विराजमान हैं और देवताओंके समक्ष विभिन्न याचकोंको उपस्थित कर रहे हैं ॥ १५ ॥
तत्र देवाः प्रयच्छन्ति राज्यानि च धनानि च ।
शुभैः कर्मभिरारब्धाः प्रच्छिन्दन्त्यशुभेषु च ॥ १६ ॥
वहाँ देवतालोग उन याचकोंके शुभकर्मके बदले राज्य और धन आदि दे रहे थे और अशुभ कर्मका भोग उपस्थित होनेपर पहलेके दिये हुए राज्य आदिको भी छीन लेते थे ॥ १६ ॥
पश्यतामथ यक्षाणां कुण्डधारो महाद्युतिः ।
निपत्य पतितो भूमौ देवानां भरतर्षभ ॥ १७ ॥
भरतश्रेष्ठ! वहाँ यक्षोंके देखते-देखते महातेजस्वी कुण्डधारने देवताओंके आगे धरतीपर माथा टेक दिया ॥
ततस्तु देववचनान्मणिभद्रो महामनाः ।
उवाच पतितं भूमौ कुण्डधार किमिष्यते ॥ १८ ॥
तब महामनस्वी मणिभद्रने देवताओंके कहनेसे पृथ्वीपर पड़े हुए उस मेघसे पूछा, ‘ कुण्डधार! तुम क्या चाहते हो? ' ॥ १८ ॥
कुण्डधार उवाच
यदि प्रसन्ना देवा मे भक्तोऽयं ब्राह्मणो मम ।
अस्यानुग्रहमिच्छामि कृतं किंचित् सुखोदयम् ॥ १ ९ ॥
कुण्डधार बोला- यह ब्राह्मण मेरा भक्त है । यदि देवतालोग मुझपर प्रसन्न हों तो मैं इसके ऊपर उनका ऐसा अनुग्रह चाहता हूँ, जिससे इसे भविष्यमें कुछ सुख मिल सके ॥ १ ९ ॥
ततस्तं मणिभद्रस्तु पुनर्वचनमब्रवीत् ।
देवानामेव वचनात् कुण्डधारं महाद्युतिम् ॥ २० ॥
तब मणिभद्रने देवताओंकी ही आज्ञासे महातेजस्वी कुण्डधारके प्रति पुनः यह बात कही ॥ २० ॥
मणिभद्र उवाच उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते कृतकृत्यः सुखी भव ।
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धनार्थी यदि विप्रोऽयं धनमस्मै प्रदीयताम् ॥ २१ ॥
मणिभद्र बोले – कुण्डधार! उठो, उठो; तुम्हारा कल्याण हो, तुम कृतकृत्य और सुखी हो जाओ । यदि यह ब्राह्मण धन चाहता तो इसे धन दे दिया जाय ॥ २१ ॥
यावद् धनं प्रार्थयते ब्राह्मणोऽयं सखा तव ।
देवानां शासनात् तावदसंख्येयं ददाम्यहम् ॥ २२ ॥
तुम्हारा सखा यह ब्राह्मण जितना धन चाहता हो, देवताओंकी आज्ञासे मैं उतना ही अथवा असंख्य धन इसे दे रहा हूँ ॥ २२ ॥
विचार्य कुण्डधारस्तु मानुष्यं चलमध्रुवम् ।
तपसे मतिमाधत्त ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर ॥ २३ ॥
युधिष्ठिर! परंतु कुण्डधारने यह सोचकर कि मानव- जीवन चंचल एवं अस्थिर है, उस ब्राह्मणके तपोबलको भी बढ़ानेका विचार किया ॥ २३ ॥
कुण्डधार उवाच नाहं धनानि याचामि ब्राह्मणाय धनप्रद ॥ २४ ॥
अन्यमेवाहमिच्छामि भक्तायानुग्रहं कृतम् ।
पृथिवीं रत्नपूर्णां वा महद् वा रत्नसंचयम् ॥ २५ ॥
भक्ताय नाहमिच्छामि भवेदेष तु धार्मिकः ।
धर्मेऽस्य रमतां बुद्धिर्धर्मं चैवोपजीवतु ।
धर्मप्रधानो भवतु ममैषोऽनुग्रहो मतः ॥ २६ ॥
कुण्डधार बोला – धनदाता देव! मैं ब्राह्मणके लिये धनकी याचना नहीं करता हूँ । मेरी इच्छा है कि मेरे इस भक्तपर किसी और प्रकारका ही अनुग्रह किया जाय । मैं अपने इस भक्तको रत्नोंसे भरी हुई पृथ्वी अथवा रत्नोंका विशाल भण्डार नहीं देना चाहता । मेरी तो यह इच्छा है कि यह धर्मात्मा हो । इसकी बुद्धि धर्ममें लगी रहे तथा यह धर्मसे ही जीवन-निर्वाह करे । इसके जीवनमें धर्मकी ही प्रधानता रहे । इसीको मैं इसके लिये महान् अनुग्रह मानता हूँ ॥ २४–२६ ॥ मणिभद्र उवाच
सदा धर्मफलं राज्यं सुखानि विविधानि च ।
फलान्येवायमश्नातु कायक्लेशविवर्जितः ॥ २७ ॥
मणिभद्र बोला – धर्मके फल तो सदा राज्य और नाना प्रकारके सुख ही हैं; अतः यह ब्राह्मण शारीरिक कष्टसे रहित हो केवल उन फलोंका ही उपभोग करे ॥ २७ ॥
भीष्म उवाच ततस्तदेव बहुशः कुण्डधारो महायशाः ।