मातृपितृगुरुमाहात्म्य : श्रेष्ठ धर्म और परम यश की प्राप्ति कैसे हो?
माता-पिता और गुरु का महत्त्व
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 108 · पृष्ठ 719–725
820 शब्द · 5 मिनटका पाठ · 14 श्लोक
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
कुरुक्षेत्र की रणभूमि के समीप युधिष्ठिर की जिज्ञासा पर
कुरुक्षेत्र की रणभूमि के समीप, जहाँ शान्ति का वातावरण था, युधिष्ठिर ने अपने मन की व्याकुलता और जिज्ञासा को मुखरित करते हुए भीष्म पितामह से पूछा— "भारत! धर्म का यह मार्ग बहुत बड़ा है तथा इसकी बहुत-सी शाखाएँ हैं। इन धर्मों में से आप किसको विशेष रूप से आचरण में लाने योग्य समझते हैं? सब धर्मों में कौन-सा कार्य आपको श्रेष्ठ जान पड़ता है, जिसका अनुष्ठान करके मैं इहलोक और परलोक में भी परम धर्म का फल प्राप्त कर सकूँ?"
महानयं धर्मपथो बहुशाखश्च भारत ।
किंस्विदेवेह धर्माणामनुष्ठेय तमं मतम् ॥
युधिष्ठिरने पूछा- भारत! धर्मका यह मार्ग बहुत बड़ा है तथा इसकी बहुत - सी शाखाएँ हैं इन धर्मोंमेंसे किसको आप विशेषरूपसे आचरणमें लानेयोग्य समझते हैं?
किं कार्यं सर्वधर्माणां गरीयो भवतो मतम् ।
यथाहं परमं धर्ममिह च प्रेत्य चाप्नुयाम् ॥
सब धर्मोंमें कौन- सा कार्य आपको श्रेष्ठ जान पड़ता है, जिसका अनुष्ठान करके मैं इहलोक और परलोकमें भी परम धर्मका फल प्राप्त कर सकूँ?
मातापित्रोर्गुरूणां च पूजा बहुमता मम ।
इह युक्तो नरो लोकान् यशश्च महदश्नुते ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! मुझे तो माता-पिता तथा गुरुजनोंकी पूजा ही अधिक महत्त्वकी वस्तु जान पड़ती है । इसलोकमें इस पुण्य कार्यमें संलग्न होकर मनुष्य महान् यश और श्रेष्ठ लोक पाता है ।
यच्च तेऽभ्यनुजानीयुः कर्म तात सुपूजिताः ।
धर्माधर्मविरुद्धं वा तत् कर्तव्यं युधिष्ठिर ॥
तात युधिष्ठिर! भलीभाँति पूजित हुए वे माता--पिता और गुरुजन जिस कामके लिये आज्ञा दें, वह धर्मके अनुकूल हो या विरुद्ध, उसका पालन करना ही चाहिये ।
न च तैरभ्यनुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत् ।
यं च तेऽभ्यनुजानीयुः स धर्म इति निश्चयः ॥
जो उनकी आज्ञाके पालनमें संलग्न है, उसके लिये दूसरे किसी धर्मके आचरणकी आवश्यकता नहीं है । जिस कार्यके लिये वे आज्ञा दें, वही धर्म है ऐसा धर्मात्माओंका निश्चय है ।
एत एव त्रयो लोका एत एवाश्रमास्त्रयः ।
एत एव त्रयो वेदा एत एव त्रयोऽग्नयः ॥
ये माता- पिता और गुरुजन ही तीनों लोक हैं, यही तीनों आश्रम हैं, यही तीनों वेद हैं तथा ये ही तीनों अग्नियाँ हैं ।
पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताग्निर्दक्षिणः स्मृतः ।
गुरुराहवनीयस्तु साग्नित्रेता गरीयसी ॥
पिता गार्हपत्य अग्नि हैं, माता दक्षिणाग्नि मानी गयी है और गुरु आहवनीय अग्निका स्वरूप है । लौकिक अग्नियोंसे माता--पिता आदि त्रिविध अग्नियोंका गौरव अधिक है ।
त्रिष्वप्रमाद्यन्नेतेषु त्रींल्लोकांश्च विजेष्यसि ।
पितृवृत्त्या त्विमं लोकं मातृवृत्त्या तथा परम् ॥
सम्यगेतेषु वर्तस्व त्रिषु लोकेषु भारत ॥
नैतानतिशयेज्जातु नात्यश्रीयान्न दूषयेत् ॥
नित्यं परिचरेच्चैव तद् वै सुकृतमुत्तमम् ।
कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम ॥
इन तीनोंकी आज्ञाका कभी उल्लंघन न करे, इनको भोजन करानेके पहले स्वयं भोजन न करे, इनपर कोई दोषारोपण न करे और सदा इनकी सेवामें संलग्न रहे । यही सबसे उत्तम पुण्यकर्म है । नृपश्रेष्ठ! इनकी सेवासे तुम कीर्ति, पवित्र यश और उत्तमलोक सब कुछ प्राप्त कर लोगे ।
सर्वे तस्यादृता लोका यस्यैते त्रय आदृताः ।
अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः ॥
जिसने इन तीनोंका आदर कर लिया, उसके द्वारा सम्पूर्ण लोकोंका आदर हो गया और जिसने इनका अनादर कर दिया, उसके सम्पूर्ण शुभ कर्म निष्फल हो जाते हैं ।
न चायं न परो लोकस्तस्य चैव परंतप ।
अमानिता नित्यमेव यस्यैते गुरुवस्त्रयः ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! जिसने इन तीनों गुरुजनोंका सदा अपमान ही किया है, उसके लिये न तो यह लोक सुखद है और न परलोक ।
न चास्मिन्नपरे लोके यशस्तस्य प्रकाशते ।
न चान्यदपि कल्याणं परत्र समुदाहृतम् ॥
न इस लोकमें और न परलोकमें ही उसका यश प्रकाशित होता है । परलोकमें जो अन्य कल्याणमय सुखकी प्राप्ति बतायी गयी है, वह भी उसे सुलभ नहीं होती है ।
तेभ्य एव हि यत् सर्वं कृत्वा च विसृजाम्यहम् ।
तदासीन्मे शतगुणं सहस्रगुणमेव च ॥
इस स्तुतिके श्लोक 1–107 में से आरम्भके 14 यहाँ दिये गये हैं। पूरी स्तुति मूल ग्रन्थमें पढ़ें →
भीष्म ने युधिष्ठिर की ओर देखा और गम्भीर स्वर में कहा— "राजन्! मुझे तो माता-पिता तथा गुरुजनों की पूजा ही अधिक महत्त्व की वस्तु जान पड़ती है। इस लोक में इस पुण्य कार्य में संलग्न होकर मनुष्य महान यश और श्रेष्ठ लोक पाता है। तात युधिष्ठिर! भलीभाँति पूजित हुए वे माता-पिता और गुरुजन जिस काम के लिए आज्ञा दें, वह धर्म के अनुकूल हो या विरुद्ध, उसका पालन करना ही चाहिए। जो उनकी आज्ञा के पालन में संलग्न है, उसके लिए दूसरे किसी धर्म के आचरण की आवश्यकता नहीं है। इन धर्मात्माओं का तो यही निश्चय है कि जिस कार्य के लिए वे आज्ञा दें, वही धर्म है।"
भीष्म ने आगे विस्तार से समझाते हुए कहा— "ये माता-पिता और गुरुजन ही तीनों लोक हैं, यही तीनों आश्रम हैं, यही तीनों वेद हैं तथा ये ही तीनों अग्नियाँ हैं। पिता गार्हपत्य अग्नि हैं, माता दक्षिणाग्नि मानी गई है और गुरु आहवनीय अग्निका स्वरूप है। लौकिक अग्नियों से माता-पिता आदि त्रिविध अग्नियों का गौरव अधिक है। यदि तुम इन तीनों की सेवा में कोई भूल नहीं करोगे, तो तुम तीनों लोकों को जीत लोगे। पिता की सेवा से इस लोक को, माता की सेवा से परलोक को तथा नियमपूर्वक गुरु की सेवा से ब्रह्मलोक को भी लाँघ जाओगे। भरतनन्दन! इसलिए तुम त्रिविध लोकस्वरूप इन तीनों के प्रति उत्तम बर्ताव करो। तुम्हारा कल्याण हो। ऐसा करने से तुम्हें यश और महान फल देने वाले धर्म की प्राप्ति होगी।"
भीष्म ने युधिष्ठिर को कर्तव्य का मार्ग दिखाते हुए कहा— "इन तीनों की आज्ञा का कभी उल्लङ्घन न करे, इनको भोजन कराने के पहले स्वयं भोजन न करे, इन पर कोई दोषारोपण न करे और सदा इनकी सेवा में संलग्न रहे। यही सबसे उत्तम पुण्यकर्म है। नृपश्रेष्ठ! इनकी सेवा से तुम कीर्ति, पवित्र यश और उत्तम लोक सब कुछ प्राप्त कर लोगे। जिसने इन तीनों का आदर कर लिया, उसके द्वारा सम्पूर्ण लोकों का आदर हो गया; परन्तु जिसने इनका अनादर कर दिया, उसके सम्पूर्ण शुभ कर्म निष्फल हो जाते हैं। शत्रुओं को सन्ताप देने वाले नरेश! जिसने इन तीनों गुरुजनों का सदा अपमान ही किया है, उसके लिए न तो यह लोक सुखद है और न परलोक में। इस लोक में भी उसका यश प्रकाशित नहीं होता और परलोक में जो अन्य कल्याणमय सुख की प्राप्ति बताई गई है, वह भी उसे सुलभ नहीं होती।"
भीष्म ने अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा— "मैं तो सारा शुभ कर्म करके इन तीनों गुरुजनों को ही समर्पित कर देता था। इससे मेरे उन सभी शुभ कर्मों का पुण्य सौगुना और हजार गुना बढ़ गया। युधिष्ठिर! इसी से तीनों लोक मेरी दृष्टि के सामने प्रकाशित हो रहे हैं। मेरा विश्वास यह है कि गुरु का पद पिता और माता से भी बढ़कर है; क्योंकि माता-पिता तो केवल इस शरीर को जन्म देने के ही उपयोग में आते हैं। आचार्य का उपदेश प्राप्त करके जो द्वितीय जन्म उपलब्ध होता है, वह दिव्य है, अजर-अमर है। जो सत्य कर्म यानी यथार्थ उपदेश के द्वारा पुत्र या शिष्य को कवच की भाँति ढक लेता है, सत्यस्वरूप वेद का उपदेश देता और असत्य की रोक-थाम करता है, उस गुरु को ही पिता और माता समझे और उसके उपकार को जानकर कभी उससे द्रोह न करे।"
भीष्म ने चेतावनी देते हुए कहा— "जो लोग विद्या पढ़कर गुरु का आदर नहीं करते, निकट रहकर मन, वाणी और क्रिया द्वारा गुरु की सेवा नहीं करते, उन्हें गर्भ के बालक की हत्या से भी बढ़कर पाप लगता है। संसार में उनसे बड़ा पापी दूसरा कोई नहीं है। जिस कर्म से शिष्य उपाध्याय को प्रसन्न करता है, उसी के द्वारा परब्रह्म परमात्मा की पूजा सम्पन्न हो जाती है; अतः गुरु माता-पिता से भी अधिक पूजनीय है। गुरुओं के पूजित होने पर पितरों सहित देवता और ऋषि भी प्रसन्न होते हैं। वे तीनों कदापि अपमान के योग्य नहीं हैं। अध्यापक, पिता और माता के प्रति जो मन, वाणी और क्रिया द्वारा द्रोह करते हैं, उन्हें भ्रूणहत्या से भी महान पाप लगता है।"
अन्त में भीष्म ने अत्यन्त गम्भीर स्वर में कहा— "जो पुत्र अपने माता-पिता को पाल-पोसकर बड़ा कर दिया गया है, वह यदि अपने माता-पिता का भरण-पोषण नहीं करता है, तो उसे भ्रूणहत्या से भी बढ़कर पाप लगता है और जगत् में उससे बड़ा पापात्मा दूसरा कोई नहीं है। मित्रद्रोही, कृतघ्न, स्त्रीहत्यारे और गुरुघाती— इन चारों के पाप का प्रायश्चित्त हमारे सुनने में नहीं आया है। ये सारी बातें जो इस जगत् में पुरुष के द्वारा पालनीय हैं, यहाँ विस्तार से बताई गई हैं। यही कल्याणकारी मार्ग है। इससे बढ़कर दूसरा कोई कर्तव्य नहीं है।"
In English
Bhishma's advice to Yudhishthira on duty
Yudhishthira asks Bhishma which duties are most important for success in this life and the next. Bhishma explains that serving parents and teachers is the highest duty and compares them to sacred fires. He warns that disrespecting these figures brings great misfortune.
This page answers
- What did bhishma tell yudhishthira about parents and teachers?
- How does bhishma compare parents and teachers to fire?
- Why is a guru considered more important than parents according to bhishma?
- What are the consequences of disrespecting parents and gurus?
Also written: Matripitrigurumahatmya, Matripitriguru, Bhishma, Yudhishthira, मातृपितृगुरुमाहात्म्य