श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 721–730

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 721–730

पृष्ठ 721

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 721 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ये माता- पिता और गुरुजन ही तीनों लोक हैं, यही तीनों आश्रम हैं, यही तीनों वेद हैं तथा ये ही तीनों अग्नियाँ हैं ॥ ६ ॥

पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताग्निर्दक्षिणः स्मृतः ।

गुरुराहवनीयस्तु साग्नित्रेता गरीयसी ॥ ७ ॥

पिता गार्हपत्य अग्नि हैं, माता दक्षिणाग्नि मानी गयी है और गुरु आहवनीय अग्निका स्वरूप है । लौकिक अग्नियोंसे माता--पिता आदि त्रिविध अग्नियोंका गौरव अधिक है ॥ ७ ॥

त्रिष्वप्रमाद्यन्नेतेषु त्रींल्लोकांश्च विजेष्यसि ।

पितृवृत्त्या त्विमं लोकं मातृवृत्त्या तथा परम् ॥ ८ ॥

ब्रह्मलोकं गुरोर्वृत्त्या नियमेन तरिष्यसि । यदि तुम इन तीनोंकी सेवामें कोई भूल नहीं करोगे तो तीनों लोकोंको जीत लोगे । पिताकी सेवासे इस लोकको, माताकी सेवासे परलोकको तथा नियमपूर्वक गुरुकी सेवासे ब्रह्मलोकको भी लाँघ जाओगे ॥ ८३ ॥

सम्यगेतेषु वर्तस्व त्रिषु लोकेषु भारत ॥ ९ ॥

यशः प्राप्स्यसि भद्रं ते धर्मं च सुमहत्फलम् । भरतनन्दन! इसलिये तुम त्रिविध लोकस्वरूप इन तीनोंके प्रति उत्तम बर्ताव करो । तुम्हारा कल्याण हो । ऐसा करनेसे तुम्हें यश और महान् फल देनेवाले धर्म की प्राप्ति होगी ॥ ९ ३ ॥ नैतानतिशयेज्जातु नात्यश्रीयान्न दूषयेत् ॥ १० ॥

नित्यं परिचरेच्चैव तद् वै सुकृतमुत्तमम् ।

कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम ॥ ११ ॥

इन तीनोंकी आज्ञाका कभी उल्लंघन न करे, इनको भोजन करानेके पहले स्वयं भोजन न करे, इनपर कोई दोषारोपण न करे और सदा इनकी सेवामें संलग्न रहे । यही सबसे उत्तम पुण्यकर्म है । नृपश्रेष्ठ! इनकी सेवासे तुम कीर्ति, पवित्र यश और उत्तमलोक सब कुछ प्राप्त कर लोगे ॥ १०-११ ॥

सर्वे तस्यादृता लोका यस्यैते त्रय आदृताः ।

अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः ॥ १२ ॥

जिसने इन तीनोंका आदर कर लिया, उसके द्वारा सम्पूर्ण लोकोंका आदर हो गया और जिसने इनका अनादर कर दिया, उसके सम्पूर्ण शुभ कर्म निष्फल हो जाते हैं ॥ १२ ॥

न चायं न परो लोकस्तस्य चैव परंतप ।

अमानिता नित्यमेव यस्यैते गुरुवस्त्रयः ॥ १३ ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! जिसने इन तीनों गुरुजनोंका सदा अपमान ही किया है, उसके लिये न तो यह लोक सुखद है और न परलोक ॥ १३ ॥

पृष्ठ 722

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 722 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

न चास्मिन्नपरे लोके यशस्तस्य प्रकाशते ।

न चान्यदपि कल्याणं परत्र समुदाहृतम् ॥ १४ ॥

न इस लोकमें और न परलोकमें ही उसका यश प्रकाशित होता है । परलोकमें जो अन्य कल्याणमय सुखकी प्राप्ति बतायी गयी है, वह भी उसे सुलभ नहीं होती है ॥ १४ ॥

तेभ्य एव हि यत् सर्वं कृत्वा च विसृजाम्यहम् ।

तदासीन्मे शतगुणं सहस्रगुणमेव च ॥ १५ ॥

तस्मान्मे सम्प्रकाशन्ते त्रयो लोका युधिष्ठिर । मैं तो सारा शुभ कर्म करके इन तीनों गुरुजनोंको ही समर्पित कर देता था । इससे मेरे उन सभी शुभ कर्मोंका पुण्य सौगुना और हजारगुना बढ़ गया है । युधिष्ठिर! इसीसे तीनों लोक मेरी दृष्टिके सामने प्रकाशित हो रहे हैं ॥ १५३ ॥

दशैव तु सदाऽऽचार्यः श्रोत्रियानतिरिच्यते ॥ १६ ॥

दशाचार्यानुपाध्याय उपाध्यायान् पिता दश ।

पितॄन् दश तु मातैका सर्वा वा पृथिवीमपि ॥ १७ ॥

गुरुत्वेनाभिभवति नास्ति मातृसमो गुरुः । आचार्य सदा दस श्रोत्रियोंसे बढ़कर है । उपाध्याय ( विद्यागुरु) दस आचार्योंसे अधिक महत्त्व रखता है, पिता दस उपाध्यायोंसे बढ़कर है और माताका महत्त्व दस पिताओंसे भी

अधिक है । वह अकेली ही अपने गौरवके द्वारा सारी पृथ्वीको भी तिरस्कृत कर देती है ।

अतः माताके समान दूसरा कोई गुरु नहीं है ॥

गुरुर्गरीयान् पितृतो मातृतश्चेति मे मतिः ॥ १८ ॥

उभौ हि मातापितरौ जन्मन्येवोपयुज्यतः । परंतु मेरा विश्वास यह है कि गुरुका पद पिता और मातासे भी बढ़कर है; क्योंकि माता- पिता तो केवल इस शरीरको जन्म देनेके ही उपयोगमें आते हैं ॥ शरीरमेव सृजतः पिता माता च भारत ॥ १ ९ ॥ आचार्यशिष्टा या जातिः सा दिव्या साजरामरा । भारत! पिता और माता केवल शरीरको ही जन्म देते हैं; परंतु आचार्यका उपदेश प्राप्त करके जो द्वितीय जन्म उपलब्ध होता है, वह दिव्य है, अजर- अमर है ॥ १ ९ ॥ अवध्या हि सदा माता पिता चाप्यपकारिणौ ॥ २० ॥

न संदुष्यति तत् कृत्वा न च ते दूषयन्ति तम् ।

धर्माय यतमानानां विदुर्देवा महर्षिभिः ॥ २१ ॥

पिता - माता यदि कोई अपराध करें तो भी वे सदा अवध्य ही हैं; क्योंकि पुत्र या शिष्य पिता -माता और गुरुका अपराध करके भी उनकी दृष्टिमें दूषित नहीं होते हैं । वे गुरुजन पुत्र या शिष्यपर स्नेहवश दोषारोपण नहीं करते; बल्कि सदा उसे धर्मके मार्गपर ही ले जानेका

पृष्ठ 723

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 723 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रयत्न करते हैं । ऐसे पिता-माता आदि गुरुजनोंका महत्त्व महर्षियोंसहित देवता ही जानते हैं ॥ २०-२१ ॥ यश्चावृणोत्यवितथेन कर्मणा ऋतं ब्रुवन्ननृतं सम्प्रयच्छन् । तं वै मन्येत पितरं मातरं च तस्मै न द्रुह्येत् कृतमस्य जानन् ॥ २२ ॥

जो सत्य कर्म ( के द्वारा यथार्थ उपदेश) के द्वारा पुत्र या शिष्यको कवचकी भाँति ढक लेता है, सत्यस्वरूप वेदका उपदेश देता और असत्यकी रोक- थाम करता है, उस गुरुको ही पिता और माता समझे और उसके उपकारको जानकर कभी उससे द्रोह न करे ॥ २२ ॥

विद्यां श्रुत्वा ये गुरुं नाद्रियन्ते प्रत्यासन्ना मनसा कर्मणा वा । तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं

नान्यस्तेभ्यः पापकृदस्ति लोके ।

यथैव ते गुरुभिर्भावनीया- स्तथा तेषां गुरवोऽभ्यर्चनीयाः ॥ २३ ॥

जो लोग विद्या पढ़कर गुरुका आदर नहीं करते, निकट रहकर मन, वाणी और क्रियाद्वारा गुरुकी सेवा नहीं करते, उन्हें गर्भके बालककी हत्यासे भी बढ़कर पाप लगता है । संसारमें उनसे बड़ा पापी दूसरा कोई नहीं है । जैसे गुरुओंका कर्तव्य है, शिष्यको आत्मोन्नतिके पथपर पहुँचाना, उसी तरह शिष्योंका धर्म है गुरुओंका पूजन करना ॥ २३ ॥

तस्मात् पूजयितव्याश्च संविभज्याश्च यत्नतः ।

गुरवोऽर्चयितव्याश्च पुराणं धर्ममिच्छता ॥ २४ ॥

अतः जो पुरातन धर्मका फल पाना चाहते हैं, उन्हें चाहिये कि वे गुरुओंकी पूजा - अर्चा करें और प्रयत्नपूर्वक उन्हें आवश्यक वस्तुएँ लाकर दें ॥ २४ ॥

येन प्रीणाति पितरं तेन प्रीतः प्रजापतिः ।

प्रीणाति मातरं येन पृथिवी तेन पूजिता ॥ २५ ॥

मनुष्य जिस कर्मसे पिताको प्रसन्न करता है, उसीके द्वारा प्रजापति ब्रह्माजीभी प्रसन्न होते हैं तथा जिस बर्तावसे वह माताको प्रसन्न कर लेता है, उसीके द्वारा समूची पृथ्वीकी भी पूजा हो जाती है ॥ २५ ॥

येन प्रीणात्युपाध्यायं तेन स्याद् ब्रह्म पूजितम् ।

मातृतः पितृतश्चैव तस्मात् पूज्यतमो गुरुः ॥ २६ ॥

जिस कर्मसे शिष्य उपाध्याय ( विद्यागुरु ) को प्रसन्न करता है, उसीके द्वारा परब्रह्म परमात्माकी पूजा सम्पन्न हो जाती है; अतः गुरु माता- पितासे भी अधिक पूजनीय

पृष्ठ 724

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 724 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

है ॥ २६ ॥

ऋषयश्च हि देवाश्च प्रीयन्ते पितृभिः सह ।

पूज्यमानेषु गुरुषु तस्मात् पूज्यतमो गुरुः ॥ २७ ॥

गुरुओंके पूजित होनेपर पितरोंसहित देवता और ऋषि भी प्रसन्न होते हैं; इसलिये गुरु परम पूजनीय है ॥

केनचिन्न च वृत्तेन ह्यवज्ञेयो गुरुर्भवेत् ।

न च माता न च पिता मन्यते यादृशो गुरुः ॥ २८ ॥

किसी भी बर्तावके कारण गुरु अपमानके योग्य नहीं होता । इसी तरह माता और पिता

भी अनादरके योग्य नहीं हैं । जैसे गुरु माननीय हैं, वैसे ही माता- पिता भी हैं ॥

न तेऽवमानमर्हन्ति न तेषां दूषयेत् कृतम् ।

गुरूणामेव सत्कारं विदुर्देवा महर्षिभिः ॥ २ ९ ॥

वे तीनों कदापि अपमानके योग्य नहीं हैं । उनके किये हुए किसी भी कार्यकी निन्दा नहीं करनी चाहिये । गुरुजनोंके इस सत्कारको देवता और महर्षि भी अपना सत्कार मानते हैं ॥ २ ९ ॥ उपाध्यायं पितरं मातरं च येऽभिद्रुह्यन्ते मनसा कर्मणा वा । तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं तस्मान्नान्यः पापकृदस्ति लोके ॥ ३० ॥

अध्यापक, पिता और माताके प्रति जो मन- वाणी और क्रियाद्वारा द्रोह करते हैं, उन्हें भ्रूणहत्यासे भी महान् पाप लगता है । संसारमें उससे बढ़कर दूसरा कोई पापाचारी नहीं है ॥ ३० ॥

भृतो वृद्धो यो न बिभर्ति पुत्रः स्वयोनिजः पितरं मातरं च । तद् वै पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं तस्मान्नान्यः पापकृदस्ति लोके ॥ ३१ ॥

जो पिता- माताका औरस पुत्र है और पाल- पोसकर बड़ा कर दिया गया है, वह यदि अपने माता- पिताका भरण - पोषण नहीं करता है तो उसे भ्रूणहत्यासे भी बढ़कर पाप लगता है और जगत्में उससे बड़ा पापात्मा दूसरा कोई नहीं है ॥ ३१ ॥

मित्रद्रुहः कृतघ्नस्य स्त्रीघ्नस्य गुरुघातिनः ।

चतुर्णां वयमेतेषां निष्कृतिं नानुशुश्रुम ॥ ३२ ॥

मित्रद्रोही, कृतघ्न, स्त्रीहत्यारे और गुरुघाती-इन चारोंके पापका प्रायश्चित्त हमारे सुननेमें नहीं आया है ॥ एतत्सर्वमनिर्देशेनैवमुक्तं

पृष्ठ 725

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 725 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यत् कर्तव्यं पुरुषेणेह लोके । एतच्छ्रेयो नान्यदस्माद् विशिष्टं सर्वान् धर्माननुसृत्यैतदुक्तम् ॥ ३३ ॥

ये सारी बातें जो इस जगत् में पुरुषके द्वारा पालनीय हैं, यहाँ विस्तारके साथ बतायी गयी हैं । यही कल्याणकारी मार्ग है । इससे बढ़कर दूसरा कोई कर्तव्य नहीं है । सम्पूर्ण धर्मोंका अनुसरण करके यहाँ सबका सार बताया गया है ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि मातृपितृगुरुमाहात्म्ये अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें माता-पिता और गुरुका माहात्म्यविषयक एक सौ आठवाँअध्याय पूरा हआ ॥ १०८ ॥

Fara

पृष्ठ 726

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 726 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नवाधिकशततमोऽध्यायः सत्य - असत्यका विवेचन, धर्मका लक्षण तथा व्यावहारिक नीतिका वर्णन युधिष्ठिर उवाच

कथं धर्मे स्थातुमिच्छन् नरो वर्तेत भारत ।

विद्वन् जिज्ञासमानाय प्रब्रूहि भरतर्षभ ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — भरतनन्दन! धर्ममें स्थित रहनेकी इच्छावाला मनुष्य कैसा बर्ताव करे? विद्वन्! मैं इस बातको जानना चाहता हूँ । भरतश्रेष्ठ! आप मुझसे इसका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥

सत्यं चैवानृतं चोभे लोकानावृत्य तिष्ठतः ।

तयोः किमाचरेद् राजन् पुरुषो धर्मनिश्चितः ॥ २ ॥

राजन्! सत्य और असत्य – ये दोनों सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त करके स्थित हैं; किंतु धर्मपर विश्वास करनेवाला मनुष्य इन दोनोंमेंसे किसका आचरण करे? ॥ २ ॥

किंस्वित् सत्यं किमनृतं किंस्विद् धर्म्यं सनातनम् ।

कस्मिन् काले वदेत् सत्यं कस्मिन् कालेऽनृतं वदेत् ॥ ३ ॥

क्या सत्य है और क्या झूठ? तथा कौन-सा कार्य सनातन धर्मके अनुकूल है? किस समय सत्य बोलना चाहिये और किस समय झूठ? ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद् विद्यते परम् ।

यत्तु लोकेषु दुर्ज्ञानं तत् प्रवक्ष्यामि भारत ॥ ४ ॥

भीष्मजीने कहा- भारत! सत्य बोलना अच्छा है । सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है; परतु लोकमें जिसे जानना अत्यन्त कठिन है, उसीको मैं बता रहा हूँ ॥ ४ ॥

भवेत् सत्यं न वक्तव्यं वक्तव्यमनृतं भवेत् ।

यत्रानृतं भवेत् सत्यं सत्यं वाप्यनृतं भवेत् ॥ ५ ॥

जहाँ झूठ ही सत्यका काम करे ( किसी प्राणीको संकटसे बचावे ) अथवा सत्य ही झूठ

बन जाय ( किसीके जीवनको संकटमें डाल दे ); ऐसे अवसरोंपर सत्य नहीं बोलना चाहिये ।

वहाँ झूठ बोलना ही उचित है ॥ ५ ॥

तादृशो बध्यते बालो यत्र सत्यमनिष्ठितम् ।

सत्यानृते विनिश्चित्य ततो भवति धर्मवित् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 727

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 727 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

जिसमें सत्य स्थिर न हो, ऐसा मूर्ख मनुष्य ही मारा जाता है । सत्य और असत्यका निर्णय करके सत्यका पालन करनेवाला पुरुष ही धर्मज्ञ माना जाता है ॥ ६ ॥

अप्यनार्योऽकृतप्रज्ञः पुरुषोऽप्यतिदारुणः ।

सुमहत् प्राप्नुयात् पुण्यं बलाकोऽन्धवधादिव ॥ ७ ॥

जो नीच है, जिसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है तथा जो अत्यन्त कठोर स्वभावका है, वह मनुष्य भी कभी अंधे पशुको मारनेवाले बलाक नामक व्याधकी भाँति महान् पुण्य प्राप्त कर लेता है * ॥ ७ ॥

किमाश्चर्यं च यन्मूढो धर्मकामोऽप्यधर्मवित् ।

सुमहत् प्राप्नुयात् पुण्यं गङ्गायामिव कौशिकः ॥ ८ ॥

कैसा आश्चर्य है कि धर्मकी इच्छा रखनेवाला मूर्ख ( तपस्वी ) ( सत्य बोलकर भी ) अधर्मके फलको प्राप्त हो जाता है । ( कर्णपर्व अध्याय ६ ९ ) और गंगाके तटपर रहनेवाले एक उल्लूकी भाँति कोई ( हिंसा करके भी ) महान् पुण्य प्राप्त कर लेता है ॥ ८ ॥

तादृशोऽयमनुप्रश्नो यत्र धर्मः सुदुर्लभः ।

दुष्करः प्रतिसंख्यातुं तत् केनात्र व्यवस्यति ॥ ९ ॥

युधिष्ठिर! तुम्हारा यह पिछला प्रश्न भी ऐसा ही है । इसके अनुसार धर्मके स्वरूपका विवेचन करना या समझना बहुत कठिन है; इसीलिये उसका प्रतिपादन करना भी दुष्कर ही है; अतः धर्मके विषयमें कोई किस प्रकार निश्चय करे? ॥ ९ ॥

प्रभवार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् ।

यः स्यात् प्रभवसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ॥ १० ॥

प्राणियोंके अभ्युदय और कल्याणके लिये ही धर्मका प्रवचन किया गया है; अतः जो इस उद्देश्यसे युक्त हो अर्थात् जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस सिद्ध होते हों, वही धर्म है, ऐसा शास्त्रवेत्ताओंका निश्चय है ॥ १० ॥

धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मेण विधृताः प्रजाः ।

यः स्याद् धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ॥ ११ ॥

धर्मका नाम ' धर्म ' इसलिये पड़ा है कि वह सबको धारण करता है — अधोगतिमें जानेसे बचाता है और जीवनकी रक्षा करता है । धर्मने ही सारी प्रजाको धारण कर रखा है; अतः जिससे धारण और पोषण सिद्ध होता हो, वही धर्म है; ऐसा धर्मवेत्ताओंका निश्चय है ॥ ११ ॥

अहिंसार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् ।

यः स्यादहिंसासम्पृक्तः स धर्म इति निश्चयः ॥ १२ ॥

प्राणियोंकी हिंसा न हो, इसके लिये धर्मका उपदेश किया गया है; अतः जो अहिंसासे युक्त हो, वही धर्म है, ऐसा धर्मात्माओंका निश्चय है ॥ १२ ॥

पृष्ठ 728

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 728 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( अहिंसा सत्यमक्रोधस्तपो दानं दमो मतिः ।

अनसूयाप्यमात्सर्यमनीर्ष्या शीलमेव च ॥

एष धर्मः कुरुश्रेष्ठ कथितः परमेष्ठिना ।

ब्रह्मणा देवदेवेन अयं चैव सनातनः ॥

अस्मिन् धर्मे स्थितो राजन् नरो भद्राणि पश्यति । ) राजन्! कुरुश्रेष्ठ! अहिंसा, सत्य, अक्रोध, तपस्या दान, मन, और इन्द्रियोंका संयम, विशुद्ध बुद्धि, किसीके दोष न देखना, किसीसे डाह और जलन न रखना तथा उत्तम शीलस्वभावका परिचय देना – ये धर्म हैं, देवाधिदेव परमेष्ठी ब्रह्माजीने इन्हींको सनातन धर्म बताया है । जो मनुष्य इस सनातन धर्ममें स्थित है, उसे ही कल्याणका दर्शन होता है ॥

श्रुतिधर्म इति ह्येके नेत्याहुरपरे जनाः ।

न च तत्प्रत्यसूयामो न हि सर्वं विधीयते ॥ १३ ॥

वेदमें जिसका प्रतिपादन किया गया है, वही धर्म है, यह एक श्रेणीके विद्वानोंका मत है; किंतु दूसरे लोग धर्मका यह लक्षण नहीं स्वीकार करते हैं । हम किसी भी मतपर दोषारोपण नहीं करते । इतना अवश्य है कि वेदमें सभी बातोंका विधान नहीं है ॥ १३ ॥

येऽन्यायेन जिहीर्षन्तो धनमिच्छन्ति कस्यचित् ।

तेभ्यस्तु न तदाख्येयं स धर्म इति निश्चयः ॥ १४ ॥

जो अन्यायसे अपहरण करनेकी इच्छा रखकर किसी धनीके धनका पता लगाना चाहते हों, उन लुटेरोंसे उसका पता न बतावे और यही धर्म है, ऐसा निश्चय रखे ॥ १४ ॥

अकूजनेन चेन्मोक्षो नावकूजेत् कथंचन ।

अवश्यं कूजितव्ये वा शङ्केरन् वाप्यकूजनात् ॥ १५ ॥

श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं सत्यादिति विचारितम् । यदि न बतानेसे उस धनीका बचाव हो जाता हो तो किसी तरह वहाँ कुछ बोले ही नहीं; परंतु यदि बोलना अनिवार्य हो जाय और न बोलनेसे लुटेरोंके मनमें संदेह पैदा होने लगे तो वहाँ सत्य बोलनेकी अपेक्षा झूठ बोलनेमें ही कल्याण है; यही इस विषयमें विचारपूर्वक निर्णय किया गया है ॥ १५३ ॥

यः पापैः सह सम्बन्धान्मुच्यते शपथादपि ॥ १६ ॥

न तेभ्योऽपि धनं देयं शक्ये सति कथंचन ।

पापेभ्यो हि धनं दत्तं दातारमपि पीडयेत् ॥ १७ ॥

यदि शपथ खा लेनेसे भी पापियोंके हाथसे छुटकारा मिल जाय तो वैसा ही करे । जहाँतक वश चले, किसी तरह भी पापियोंके हाथमें धन न जाने दे; क्योंकि पापाचारियोंको दिया हुआ धन दाताको भी पीड़ित कर देता है ॥ १६-१७ ॥

स्वशरीरोपरोधेन धनमादातुमिच्छतः ।

सत्यसम्प्रतिपत्त्यर्थं यद् ब्रूयुः साक्षिणः क्वचित् ॥ १८ ॥

पृष्ठ 729

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 729 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अनुक्त्वा तत्र तद्वाच्यं सर्वे तेऽनृतवादिनः । जो कर्जदारको अपने अधीन करके उससे शारीरिक सेवा कराकर धन वसूल करना चाहता है, उसके दावेको सही साबित करनेके लिये यदि कुछ लोगोंको गवाही देनी पड़े और वे गवाह अपनी गवाहीमें कहने योग्य सत्य बातको न कहें तो वे सब- के - सब मिथ्यावादी होते हैं ॥ १८ ॥

प्राणात्यये विवाहे च वक्तव्यमनृतं भवेत् ॥ १ ९ ॥ अर्थस्य रक्षणार्थाय परेषां धर्मकारणात् । परंतु प्राण- संकटके समय, विवाहके अवसरपर, दूसरेके धनकी रक्षाके लिये तथा धर्मकी रक्षाके लिये असत्य बोला जा सकता है ॥ १ ९ ३ ॥ परेषां सिद्धिमाकांक्षन् नीचः स्याद् धर्मभिक्षुकः ॥ २० ॥

प्रतिश्रुत्य प्रदातव्यः स्वकार्यस्तु बलात्कृतः । कोई नीच मनुष्य भी यदि दूसरोंकी कार्यसिद्धिकी इच्छासे धर्मके लिये भीख माँगने आवे तो उसे देनेकी प्रतिज्ञा कर लेनेपर अवश्य ही धनका दान देना चाहिये । इस प्रकार धनोपार्जन करनेवाला यदि कपटपूर्ण व्यवहार करता है तो वह दण्डका पात्र होता है ॥ २० ¾ ॥ यः कश्चिद् धर्मसमयात् प्रच्युतो धर्मसाधनः ॥ २१ ॥

दण्डेनैव स हन्तव्यस्तं पन्थानं समाश्रितः । जो कोई धर्मसाधक मनुष्य धार्मिक आचारसे भ्रष्ट हो पापमार्गका आश्रय ले, उसे अवश्य दण्डके द्वारा मारना चाहिये ॥ २१३ ॥

च्युतः सदैव धर्मेभ्योऽमानवं धर्ममास्थितः ॥ २२ ॥

शठः स्वधर्ममुत्सृज्य तमिच्छेदुपजीवितुम् ।

सर्वोपायैर्निहन्तव्यः पापो निकृतिजीवनः ॥ २३ ॥

धनमित्येव पापानां सर्वेषामिह निश्चयः । जो दुष्ट धर्ममार्गसे भ्रष्ट होकर आसुरी प्रवृत्तिमें लगा रहता है और स्वधर्मका परित्याग करके पापसे जीविका चलाना चाहता है, कपटसे जीवन - निर्वाह करनेवाले उस पापात्माको सभी उपायोंसे मार डालना चाहिये; क्योंकि सभी पापात्माओंका यही विचार रहता है कि जैसे बने, वैसे धनको लूट- खसोट कर रख लिया जाय ॥ २२-२३३ ॥ अविषह्या ह्यसम्भोज्या निकृत्या पतनं गताः ॥ २४ ॥

च्युता देवमनुष्येभ्यो यथा प्रेतास्तथैव ते ।

निर्यज्ञास्तपसा हीना मा स्म तैः सह सङ्गमः ॥ २५ ॥

ऐसे लोग दूसरोंके लिये असह्य हो उठते हैं । इनका अन्न न तो स्वयं भोजन करे और न इन्हें ही अपना अन्न दे; क्योंकि ये छल- कपटके द्वारा पतनके गर्तमें गिर चुके हैं और

पृष्ठ 730

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 730 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

देवलोक तथा मनुष्यलोक दोनोंसे वंचित हो प्रेतोंके समान अवस्थाको पहुँच गये हैं । इतना ही नहीं, वे यज्ञ और तपस्यासे भी हीन हैं; अतः तुम कभी उनका संग न करो ॥ २४-२५ ॥

धननाशाद् दुःखतरं जीविताद् विप्रयोजनम् ।

अयं ते रोचतां धर्म इति वाच्यः प्रयत्नतः ॥ २६ ॥

‘ किसीके धनका नाश करनेसे भी अधिक दुःखदायक कर्म है जीवनका नाश; अतः तुम्हें धर्मकी ही रुचि रखनी चाहिये' यह बात तुम्हें दुष्टोंको यत्नपूर्वक बतानी और समझानी चाहिये ॥ २६ ॥

न कश्चिदस्ति पापानां धर्म इत्येष निश्चयः ।

तथागतं च यो हन्यान्नासौ पापेन लिप्यते ॥ २७ ॥

पापियोंका तो यही निश्चय होता है कि धर्म कोई वस्तु नहीं है; ऐसे लोगोंको जो मार डाले, उसे पाप नहीं लगता ॥ २७ ॥

स्वकर्मणा हतं हन्ति हत एव स हन्यते ।

तेषु यः समयं कश्चिद् कुर्वीत हतबुद्धिषु ॥ २८ ॥

पापी मनुष्य अपने कर्मसे ही मरा हुआ है; अतः उसको जो मारता है, वह मरे हुएको ही मारता है । उसके मारनेका पाप नहीं लगता; अतः जो कोई भी मनुष्य इन हतबुद्धि पापियोंके वधका नियम ले सकता है ॥

यथा काकाश्च गृध्राश्च तथैवोपधिजीविनः ।

ऊर्ध्वं देहविमोक्षात् ते भवन्त्येतासु योनिषु ॥ २ ९ ॥

जैसे कौए और गीध होते हैं, वैसे ही कपटसे जीविका चलानेवाले लोग भी होते हैं । वे मरनेके बाद इन्हीं योनियोंमें जन्म लेते हैं ॥ २ ९ ॥ यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्य- स्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः । मायाचारो मायया बाधितव्यः साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः ॥ ३० ॥

जो मनुष्य जिसके साथ जैसा बर्ताव करे, उसके साथ भी उसे वैसा ही बर्ताव करना चाहिये; यह धर्म ( न्याय ) है। कपटपूर्ण आचरण करनेवालेको वैसे ही आचरणके द्वारा दबाना उचित है और सदाचारीको सद्व्यवहारके द्वारा ही अपनाना चाहिये ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सत्यानृतकविभागे नवाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १० ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सत्यासत्यविभागविषयक एक सौ नवाँअध्याय पूरा हआ ॥ १० ९ ॥ ( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ३२३ श्लोक हैं )