श्रीगणेशाय नमः।

मङ्किगीता : धन की तृष्णा से ग्रस्त व्यक्ति परम सुख कैसे प्राप्त करे?

कामना का त्याग

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 177 · पृष्ठ 1147–1155

1,462 शब्द · 8 मिनटका पाठ · 13 श्लोक

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा

धन की तृष्णा से मुक्ति और सुख प्राप्ति के मार्ग पर चर्चा

युधिष्ठिर ने प्रश्न किया— "दादाजी! यदि कोई मनुष्य धन की तृष्णा से ग्रस्त होकर तरह-तरह के उद्योग करने पर भी धन न पा सके, तो वह क्या करे जिससे उसे सुख की प्राप्ति हो सके?"

युधिष्ठिर उवाच

ईहमानः समारम्भान् यदि नासादयेद् धनम् ।
धनतृष्णाभिभूतश्च किं कुर्वन् सुखमाप्नुयात् ॥

युधिष्ठिरने पूछा- दादाजी! यदि कोई मनुष्य धनकी तृष्णासे ग्रस्त होकर तरह - तरहके उद्योग करनेपर भी धन न पा सके तो वह क्या करे, जिससे उसे सुखकी प्राप्ति हो सके?

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 177 · श्लोक 1पृष्ठ 1148

भीष्म बोले— "भारत! सबमें समता का भाव, व्यर्थ परिश्रम का अभाव, सत्यभाषण, संसार से वैराग्य और कर्मासक्तिका अभाव— ये पाँचों जिस मनुष्य में होते हैं, वह सुखी होता है। ज्ञानवृद्ध पुरुष इन्हीं पाँच वस्तुओं को शान्तिका कारण बताते हैं। यही स्वर्ग है, यही धर्म है और यही परम उत्तम सुख माना गया है। युधिष्ठिर! इस विषय में जानकार पुरुष एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं। मङ्कि नामक मुनि ने भोगों से विरक्त होकर जो उद्गार प्रकट किया था, वही इस इतिहास में वर्णित है। उसे बताता हूँ, सुनो।"

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
निर्वेदान्मङ्किना गीतं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥

युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार पुरुष एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं । मङ्कि नामक मुनिने भोगोंसे विरक्त होकर जो उद्गार प्रकट किया था, वही इस इतिहासमें वर्णित है । उसे बताता हूँ, सुनो ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 177 · श्लोक 4पृष्ठ 1148

भीष्म ने कथा आगे बढ़ाते हुए कहा कि मङ्कि धन के लिये अनेक प्रकार की चेष्टाएँ करते थे; परन्तु हर बार उनका प्रयत्न व्यर्थ हो जाता था। अन्त में जब बहुत थोड़ा धन शेष रह गया, तो उसे देकर उन्होंने दो नये बछड़े खरीदे। एक दिन उन दोनों बछड़ों को परस्पर जोड़कर वे हल चलाने की शिक्षा देने के लिये ले जा रहे थे। जब वे दोनों बछड़े गाँव से बाहर निकले, तो बैठे हुए एक ऊँट को बीच में करके सहसा दौड़ पड़े। जब वे दोनों बछड़े उस ऊँट के पास पहुँचे, तो यह ऊँट के लिये असह्य हो उठा। वह रोष में भरकर खड़ा हो गया और उन दोनों बछड़ों को ऊपर लटकाये बड़े जोर से भागने लगा।

भीष्म उवाच

सर्वसाम्यमनायासं सत्यवाक्यं च भारत ।
निर्वेदश्चाविधित्सा च यस्य स्यात् स सुखी नरः ॥

भीष्मजीने कहा- भारत! सबमें समताका भाव, व्यर्थ परिश्रमका अभाव, सत्यभाषण, संसारसे वैराग्य और कर्मासक्तिका अभाव- ये पाँचों जिस मनुष्यमें होते हैं, वह सुखी होता है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 177 · श्लोक 2पृष्ठ 1148

बलपूर्वक अपहरण करने वाले उस ऊँट द्वारा उन दोनों बछड़ों को अपहृत होते देख मङ्कि ने कहा— 'मनुष्य कैसा ही चतुर क्यों न हो, जो उसके भाग्य में नहीं है, उस धन को वह श्रद्धापूर्वक भलीभाँति प्रयत्न करके भी नहीं पा सकता। पहले मैंने जो प्रयत्न किया था उसमें अनेक प्रकार के अनर्थ खड़े हो गये थे। उन अनर्थों से युक्त होने पर भी मैं धनोपार्जन की ही चेष्टा में लगा रहा; परन्तु देखो, आज इन बछड़ों की सङ्गति से मुझ पर कैसा दैवी उपद्रव आ गया? यह ऊँट मेरे बछड़ों को उछाल-उछालकर विषम मार्ग से ही ले जा रहा है। यह ऊँट इन्हें अपनी गर्दन पर उठाकर बुरे मार्ग से दौड़ रहा है। इस ऊँटके गले में मेरे दोनों प्यारे बछड़े दो मणियों के समान लटक रहे हैं। यह केवल दैव की ही लीला है। हठपूर्वक किये हुए पुरुषार्थ से क्या होता है? यदि कभी कोई पुरुषार्थ सफल होता दिखाई देता है, तो वहाँ भी खोज करने पर दैव का ही सहयोग सिद्ध होता है।'

उद्यम्योद्यम्य मे दम्यौ विषमेणैव गच्छतः ।
उत्क्षिप्य काकतालीयमुत्पथेनैव धावतः ॥

मणी वोष्ट्रस्य लम्बेते प्रियौ वत्सतरौ मम ।
शुद्धं हि दैवमेवेदं हठेनैवास्ति पौरुषम् ॥

'यह ऊँट मेरे बछड़ोंको उछाल-उछालकर विषम मार्गसे ही जा रहा है । काकतालीयन्यायसे * ( अर्थात् दैवसंयोगसे ) इन्हें गर्दनपर उठाकर बुरे मार्गसे ही दौड़ रहा है । इस ऊँटके गलेमें मेरे दोनों प्यारे बछड़े दो मणियोंके समान लटक रहे हैं । यह केवल दैवकी ही लीला है । हठपूर्वक किये हुए पुरुषार्थसे क्या होता है?

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 177 · श्लोक 11-12पृष्ठ 1149

मङ्कि ने आगे कहा— 'अतः सुख की इच्छा रखने वाले पुरुष को धन आदि की ओर से वैराग्य का ही आश्रय लेना चाहिये। धनोपार्जन की चेष्टा से निराश होकर जो विरक्त हो जाता है, वह सुख की नींद सोता है। अहा! शुकदेव मुनि ने जनक के राजमहल से विशाल वन की ओर जाते समय सब ओर से बन्धनमुक्त होकर क्या ही अच्छा कहा था— जो मनुष्य अपनी समस्त कामनाओं को पा लेता है तथा जो इन सबका केवल त्याग कर देता है, इन दोनों के कार्यों में समस्त कामनाओं को प्राप्त करने की अपेक्षा उनका त्याग ही श्रेष्ठ है। कोई भी पहले कभी धन आदि के लिये होने वाली सम्पूर्ण प्रवृत्तियों का अन्त नहीं पा सका है; शरीर और जीवन के प्रति मूर्ख मनुष्य की ही तृष्णा बढ़ती है।'

यः कामानाप्नुयात् सर्वान् यश्चैतान् केवलांस्त्यजेत् ।
प्रापणात् सर्वकामानां परित्यागो विशिष्यते ॥

“ जो मनुष्य अपनी समस्त कामनाओंको पा लेता है; तथा जो इन सबका केवल त्याग कर देता है — इन दोनोंके कार्योंमें समस्त कामनाओंको प्राप्त करनेकी अपेक्षा उनका त्याग ही श्रेष्ठ है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 177 · श्लोक 16पृष्ठ 1150

मङ्कि अपने मन को सम्बोधित करते हुए बोले— 'ओ कामनाओं के दास मन! तू सब प्रकार की चेष्टाओं से निवृत्त हो जा और वैराग्यपूर्वक शान्ति धारण कर। तू धन की चेष्टा करके बार-बार ठगा गया है, तो भी उसकी ओर से वैराग्य नहीं होता है? ओ धन की कामना वाले मन! यदि तुझे मेरा विनाश नहीं करना है, यदि तू इसी प्रकार मेरे साथ आनन्दपूर्वक रहना चाहता है, तो मुझे व्यर्थ लोभ में न फँसा। तूने बार-बार द्रव्य का सञ्चय किया और वह बारम्बार नष्ट होता चला गया। धन की इच्छा रखने वाले मूढ! क्या कभी तू इस तृष्णा और चेष्टा का त्याग भी करेगा? अहो! यह मेरी कैसी नादानी है कि मैं तेरे हाथ का खिलौना बना हुआ हूँ। यदि ऐसी बात न होती, तो क्या कोई समझदार पुरुष कभी दूसरों की दासता स्वीकार कर सकता है? पूर्वकाल के तथा पीछे के मनुष्य भी कभी कामनाओं का अन्त नहीं पा सके हैं; अतः मैं समस्त कर्मों का आयोजन त्यागकर सावधान हो गया हूँ और मैं पूर्णतः जग गया हूँ।'

न पूर्वे नापरे जातु कामानामन्तमाप्नुवन् ।
त्यक्त्वा सर्वसमारम्भान् प्रतिबुद्धोऽस्मि जागृमि ॥

‘ पूर्वकालके तथा पीछेके मनुष्य भी कभी कामनाओंका अन्त नहीं पा सके हैं, अतः मैं समस्त कर्मोंका आयोजन त्यागकर सावधान हो गया हूँ और मैं पूर्णतः जग गया हूँ ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 177 · श्लोक 22पृष्ठ 1151

मङ्कि ने अपने मन की गहराई से कहा— 'काम! निश्चय ही तेरा हृदय फौलाद का बना हुआ है, अत्यन्त सुदृढ़ है। यही कारण है कि सैकड़ों अनर्थों से व्याप्त होने पर भी इसके सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाते। काम! मैं तुझे अच्छी तरह जानता हूँ और जो कुछ तुझे प्रिय लगता है, उससे भी परिचित हूँ। चिरकाल से तेरा प्रिय करने की चेष्टा करता चला आ रहा हूँ, परन्तु कभी मेरे मन में सुख का अनुभव नहीं हुआ। काम! मैं तेरी जड़ को जानता हूँ; निश्चय ही तू सङ्कल्प से उत्पन्न होता है। अब मैं तेरा सङ्कल्प ही नहीं करूँगा, जिससे तू समूल नष्ट हो जाएगा। धन की इच्छा अथवा चेष्टा सुखदायिनी नहीं है। यदि धन मिल भी जाय, तो उसकी रक्षा के लिये बड़ी भारी चिन्ता बढ़ जाती है और यदि एक बार मिलकर वह नष्ट हो जाय, तब तो मृत्यु के समान ही भयङ्कर कष्ट होता है; और उद्योग करने पर भी धन मिलेगा या नहीं, यह निश्चय नहीं होता।'

नूनं ते हृदयं काम वज्रसारमयं दृढम् ।
यदनर्थशताविष्टं शतधा न विदीर्यते ॥

‘ काम! निश्चय ही तेरा हृदय फौलादका बना हुआ हैः अतएव अत्यन्त सुदृढ़ है । यही कारण है कि सैकड़ों अनर्थोंसे व्याप्त होनेपर भी इसके सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाते ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 177 · श्लोक 23पृष्ठ 1151

भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को मङ्कि के जीवन का वह निर्णायक मोड़ सुनाया, जहाँ धन के विनाश ने उनके भीतर एक नए जीवन का सूत्रपात किया। उन्होंने कहा कि जब धन का नाश हुआ, तो मङ्कि के भीतर वैराग्य जागृत हुआ और उन्हें वह परम सुख प्राप्त हुआ जो सांसारिक भोगों में नहीं है।

अनुतर्षुल एकार्थः स्वादु गाङ्गमिवोदकम् ।
मद्विलापनमेतत्तु प्रतिबुद्धोऽस्मि संत्यज ॥

‘ काम! स्वादिष्ट गङ्गाजलके समान यह धन तृष्णाकी ही वृद्धि करनेवाला है । मैं अच्छी तरह जान गया हूँ कि यह तृष्णाकी वृद्धि मेरे विनाशका कारण है; अतः तू मेरा पिण्ड छोड़ दे ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 177 · श्लोक 28पृष्ठ 1152

मङ्कि ने अपने अन्तर्मन की गहराइयों से संवाद करते हुए स्वयं से कहा, "काम! स्वादिष्ट गङ्गाजल के समान यह धन तृष्णा की ही वृद्धि करने वाला है। मैं अच्छी तरह जान गया हूँ कि यह तृष्णा की वृद्धि मेरे विनाश का कारण है; अतः तू मेरा पिण्ड छोड़ दे। मेरे इस शरीर का आश्रय लेकर जो पाँचों भूतों का समुदाय स्थित है, वह इसमें से अपनी इच्छा के अनुसार सुखपूर्वक चला जाए या इसमें रहे, इसकी मुझे परवा नहीं है।" उन्होंने अपने भीतर के पञ्चभूतों को सम्बोधित करते हुए कहा, "पञ्चभूतगण! अहङ्कार आदि के साथ तुम सब लोग काम और लोभ के पीछे लगे रहने वाले हो। अतः तुम पर यहाँ मेरा रत्ती भर भी स्नेह नहीं है। मैं समस्त कामनाओं को छोड़कर अब केवल सत्त्वगुण का आश्रय ले रहा हूँ।"

न युष्मास्विह मे प्रीतिः कामलोभानुसारिषु ।
तस्मादुत्सृज्य कामान् वै सत्त्वमेवाश्रयाम्यहम् ॥

‘ पंचभूतगण! अहंकार आदिके साथ तुम सब लोग काम और लोभके पीछे लगे रहनेवाले हो । अतः तुमपर यहाँ मेरा रत्तीभर भी स्नेह नहीं है । इसलिये मैं समस्त कामनाओंको छोड़कर केवल अब सत्त्वगुणका आश्रय ले रहा हूँ ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 177 · श्लोक 30पृष्ठ 1152

मङ्कि ने अपने जीवन की दिशा बदलते हुए सङ्कल्प लिया, "मैं अपने शरीर में मन के अन्दर सम्पूर्ण भूतों को देखते हुए बुद्धिको योग में, एकाग्रचित होकर श्रवण-मनन आदि साधनों में और मन को परब्रह्म परमात्मा में लगाकर रोग-शोक से रहित एवं सुखी होकर सम्पूर्ण लोकों में अनासक्त भाव से विचरूँगा; जिससे तू फिर मुझे इस प्रकार दुःखों में नहीं डाल सकेगा। काम! तृष्णा, शोक और परिश्रम—इनका उत्पत्तिस्थान सदा तू ही है। जब तक तू मुझे प्रेरित करके इधर-उधर भटकाता रहेगा, तब तक मेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है।"

य इमं मामकं देहं भूतग्रामः समाश्रितः ।
स यात्वितो यथाकामं वसतां वा यथासुखम् ॥

‘ मेरे इस शरीरका आश्रय लेकर जो पाँचों भूतोंका समुदाय स्थित है, वह इसमेंसे अपनी इच्छाके अनुसार सुखपूर्वक चला जाय या इसमें रहे, इसकी मुझे परवा नहीं है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 177 · श्लोक 29पृष्ठ 1152

उन्होंने आगे कहा, "धनलोलुपता दुःख का कारण है, यह बात बहुत देर के बाद मेरी समझ में आयी है। तू तत्त्वज्ञान से रहित और बालक के समान मूढ है; तुझे सन्तोष देना कठिन है। आग के समान तेरा पेट भरना असम्भव है और पाताल के समान तुझे भरना कठिन है। तू मुझे दुःखों में फँसाना चाहता है, किन्तु अब तू फिर मेरे भीतर प्रवेश नहीं कर सकता।" मङ्कि ने अपने सङ्कल्प को दृढ़ करते हुए कहा, "मैं अपनी सम्पूर्ण मनोवृत्तियों को दूर हटाकर तेरा परित्याग कर रहा हूँ। अब जो लोग मुझ पर आक्षेप या तिरस्कार करेंगे, मैं उनके बर्ताव को चुपचाप सह लूँगा। जो मुझे पीड़ा देंगे, मैं बदले में वैसा बर्ताव नहीं करूँगा। मैं सदा सन्तुष्ट और स्वस्थ इन्द्रियों से सम्पन्न रहकर भाग्यवश जो कुछ मिल जाए, उसी से जीवन-निर्वाह करता रहूँगा; परन्तु तुझे कभी सफल नहीं होने दूँगा, क्योंकि तू मेरा शत्रु है।"

तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं यथालब्धेन वर्तयन् ।
नसकामं करिष्यामि त्वामहं शत्रुमात्मनः ॥

‘ मैं सदा संतुष्ट एवं स्वस्थ इन्द्रियोंसे सम्पन्न रहकर भाग्यवश जो कुछ मिल जाय, उसीसे जीवन - निर्वाह करता रहूँगा; परंतु तुझे कभी सफल न होने दूँगा; क्योंकि तू मेरा शत्रु ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 177 · श्लोक 44पृष्ठ 1154

अन्ततः मङ्कि ने अपने आत्मबोध को पूर्णता दी, "तू यह अच्छी तरह समझ ले कि मुझे वैराग्य, सुख, तृप्ति, शान्ति, सत्य, दम, क्षमा और समस्त प्राणियों के प्रति दयाभाव—ये सभी सद्गुण प्राप्त हो गये हैं। अतः काम, लोभ, तृष्णा और कृपणता को चाहिये कि वे मोक्ष की ओर प्रस्थान करने वाले मुझ साधक को छोड़कर चले जाएँ। जैसे ग्रीष्म ऋतु में लोग शीतल जल वाले सरोवर में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार अब मैं परब्रह्म में प्रतिष्ठित होकर शान्त हूँ और सम्पूर्ण ओर से निर्वाण प्राप्त कर रहा हूँ। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य और ममता—ये देहधारियों के सात शत्रु हैं; इनमें सातवाँ कामरूप शत्रु सबसे प्रबल है। इस महान शत्रु कामका नाश करके मैं अविनाशी ब्रह्मपुर में राजा के समान सुखी होऊँगा।"

निर्वेदं निर्वृतिं तृप्तिं शान्तिं सत्यं दमं क्षमाम् ।
सर्वभूतदयां चैव विद्धि मां समुपागतम् ॥

'तू यह अच्छी तरह समझ ले कि मुझे वैराग्य, सुख, तृप्ति, शान्ति, सत्य, दम, क्षमा और समस्त प्राणियोंके प्रति दयाभाव - ये सभी सद्गुण प्राप्त हो गये हैं ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 177 · श्लोक 45पृष्ठ 1154

राजन्! इसी बुद्धिका आश्रय लेकर मङ्कि धन और भोगों से विरक्त हो गये और समस्त कामनाओं का परित्याग करके उन्होंने परमानन्दस्वरूप परब्रह्म को प्राप्त कर लिया। बछड़ों के नाश को निमित्त बनाकर ही मङ्कि ने काम की जड़ काट डाली और परम सुख प्राप्त किया।

दम्यनाशकृते मङ्किरमृतत्वं किलागमत् ।
अच्छिनत् काममूलं स तेन प्राप महत्सुखम् ॥

बछड़ोंके नाशको निमित्त बनाकर ही मङ्कि अमृतत्वको प्राप्त हो गये । उन्होंने कामकी जड़ काट डाली; इसीलिये महान् सुख प्राप्त कर लिया ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 177 · श्लोक 54पृष्ठ 1155

In English

The Story of Muni Manki and the Loss of His Calves

Yudhisthira asks Bhishma how to find happiness when wealth cannot be acquired through hard work. Bhishma tells the story of Muni Manki, who loses his two calves to a camel, leading him to renounce worldly desires and seek spiritual peace instead.

This page answers

  • What are the five qualities for happiness according to bhishma?
  • How did manki lose his calves?
  • Why did manki decide to practice renunciation?
  • What are the seven enemies of those with bodies?

Also written: Mankigita, Manki, Yudhishthira, Bhishma, Panchabhuta, मङ्किगीता