नारदपर्वतोपाख्यान : सत्य की प्रतिज्ञा भङ्ग करने का क्या परिणाम होता है?
वचनबद्धता और आत्म-नियन्त्रण
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 30 · पृष्ठ 208–215
619 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 5 श्लोक
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा
राजा सृजय के पुत्र की मृत्यु और सुवर्णष्ठीवी के रहस्य पर चर्चा हेतु
युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा— "भगवन्! राजा सृजय को उनका पुत्र सुवर्णष्ठीवी क्यों दिया गया और वह इतनी अल्प आयु में क्यों मर गया? क्या उस बालक का नाम केवल सुवर्णष्ठीवी था या उसमें वैसा ही गुण भी था?"
श्रीकृष्ण बोले— "हे जनेश्वरा! इस विषय के यथार्थ स्वरूप को मैं तुम्हें बता रहा हूँ, ध्यान से सुनिए। नारद और पर्वत—ये दोनों ऋषि सम्पूर्ण लोकों में श्रेष्ठ हैं और आपस में मामा तथा भानजे लगते हैं। एक समय की बात है, ये दोनों महर्षि देवलोक से मनुष्यलोक में भ्रमण करने हेतु आए थे। वे यहाँ पवित्र हविष्य और देवताओं के भोजन का उपभोग करते हुए पृथ्वी पर विचर रहे थे।
अत्र ते वर्णयिष्यामि यथावृत्तं जनेश्वर ।
नारदः पर्वतश्चैव द्वावृषी लोकसत्तमौ ॥
श्रीकृष्ण बोले – जनेश्वर! इस विषयमें जो बात है, वह यथार्थरूपसे बता रहा हूँ, सुनिये । नारद और पर्वत– ये दोनों ऋषि सम्पूर्ण लोकोंमें श्रेष्ठ हैं ।
भ्रमण के दौरान उन दोनों ने बड़ी प्रसन्नता और प्रेम के साथ एक शर्त रखी थी। उन्होंने एक-दूसरे से कहा था कि— 'हमारे मन में जो भी शुभ या अशुभ सङ्कल्प प्रकट हो, हम उसे एक-दूसरे से कह देंगे; अन्यथा हमें झूठे शाप का भागी होना पड़ेगा।' इस प्रतिज्ञा के पश्चात वे श्वेतपुत्र राजा सृजय के पास पहुँचे और बोले— 'हे पृथ्वीपाल! हम दोनों कुछ काल तक तुम्हारे पास ठहरेंगे। तुम हमारे अनुकूल होकर रहो।' राजा ने उन्हें 'बहुत अच्छा' कहकर उनका सत्कार किया।
स कथं कांचनष्ठीवी सृजयस्य सुतोऽभवत् ।
पर्वतेन किमर्थं वा दत्तस्तेन ममार च ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! पर्वत मुनिने राजा सृजयको सुवर्णष्ठीवी नामक पुत्र किसलिये दिया और वह क्यों मर गया?
तदुपरान्त, प्रसन्न होकर राजा सृजय ने अपनी एकमात्र कन्या सुकुमारी को उन तपस्वियों की सेवा हेतु प्रस्तुत करते हुए कहा— 'महर्षियो! यह मेरी कन्या है, जो परम सुन्दरी, निर्दोष अङ्गों वाली और शील-सदाचार से सम्पन्न है। आज से यह आप दोनों की सेवा करेगी।' पिता के आदेश पर उस धर्मचारिणी कन्या ने कहा— 'ऐसा ही होगा' और सेवा में लग गई।
किन्तु, उस सुकुमारी के अनुपम सौंदर्य और सेवा से नारद के हृदय में सहसा कामभाव का सञ्चार होने लगा। वह काम उनके मन में उसी प्रकार धीरे-धीरे बढ़ने लगा, जैसे शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की वृद्धि होती है। धर्मज्ञ नारद ने लज्जावश अपने बढ़ते हुए दुःसह काम की बात अपने भानजे पर्वत को नहीं बताई।
पर्वत ने अपनी तपस्या और नारद की चेष्टाओं से जान लिया कि उनके मामा कामवेदना से पीड़ित हैं। वह अत्यन्त कुपित होकर बोला— 'आपने मेरे साथ यह शर्त की थी कि मन में जो भी सङ्कल्प हो, उसे एक-दूसरे से कह देंगे; परन्तु आपने अपने वचन को मिथ्या कर दिया! जब आपके मन में इस सुकुमारी के प्रति कामभाव आया, तो आपने मुझे नहीं बताया। आप ब्रह्मचारी और तपस्वी हैं, फिर भी आपने शर्त तोड़ दी। इसलिए मैं आपको शाप देता हूँ— यह सुकुमारी आपकी भार्या होगी, परन्तु विवाह के पश्चात लोग आपके मुख को वानर के समान देखने लगेंगे!'"
शप्स्ये तस्मात् सुसंक्रुद्धो भवन्तं तं निबोध मे ॥
' आप ब्रह्मचारी, मेरे गुरुजन, तपस्वी और ब्राह्मण हैं तो भी आपने हमलोगोंमें जो शर्त हुई थी, उसे तोड़ दिया है; इसलिये मैं अत्यन्त कुपित होकर आपको जो शाप दे रहा हूँ उसे सुनिये—
नारद भी क्रोधित होकर बोले— 'तू तपस्या और सत्य से युक्त होने पर भी स्वर्ग में नहीं जा सकेगा!' इस प्रकार दोनों ऋषि क्रोधित हाथियों की भान्ति एक-दूसरे को शाप देकर विपरीत दिशाओं में चल दिए।
स तद् वाक्यं तु विज्ञाय नारदः पर्वतं तथा ॥
अशपत्तमपि क्रोधाद् भागिनेयं स मातुलः ।
तपसा ब्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च ॥
युक्तोऽपि नित्यधर्मश्च न वै स्वर्गमवाप्स्यसि । उस बातको समझकर मामा नारदजी भी कुपित हो उठे और उन्होंने अपने भानजे पर्वतको शाप देते हुए कहा – ' अरे! तू तपस्या, ब्रह्मचर्य, सत्य और इन्द्रिय- संयमसे युक्त एवं नित्य धर्मपरायण होनेपर भी स्वर्गलोकमें नहीं जा सकेगा'
नारद ने उस राजकन्या से विवाह किया। जैसे ही वैवाहिक मन्त्रों का प्रयोग हुआ, कन्या ने नारद के मुख को वानर जैसा देखा। किन्तु वह पतिव्रता थी, उसने घृणा नहीं की बल्कि प्रेम बढ़ाया। कुछ समय पश्चात, जब पर्वत एक एकान्त वन में घूम रहे थे, उन्होंने वहाँ नारद को देखा।
पर्वत ने हाथ जोड़कर अत्यन्त दीन भाव से कहा— 'प्रभो! आप मुझे स्वर्ग जाने की आज्ञा दें।' यह देखकर नारद भी स्वयं को दीन अनुभव कर बोले— 'वत्स! पहले तुमने मुझे वानर होने का शाप दिया था और मैंने भी मत्सरवश तुम्हें स्वर्ग न जाने का शाप दे दिया। यह तुम्हारे योग्य नहीं था, क्योंकि तुम मेरे पुत्र के समान हो।' इस संवाद के बाद दोनों ने एक-दूसरे के शापों को निरस्त कर दिया।
त्वयाहं प्रथमं शप्तो वानरस्त्वं भविष्यसि ॥
इत्युक्तेन मया पश्चाच्छप्तस्त्वमपि मत्सरात् ।
अद्यप्रभृति वै वासं स्वर्गे नावाप्स्यसीति ह ॥
तव नैतद्धि विसदृशं पुत्रस्थाने हि मे भवान् । ‘ वत्स! पहले तुमने मुझे यह शाप दिया था कि ' तुम वानर हो जाओ । ' तुम्हारे ऐसा कहनेके बाद मैंने भी मत्सरतावश तुम्हें शाप दे दिया, जिससे आजतक तुम स्वर्गमें नहीं जा सके । यह तुम्हारे योग्य कार्य नहीं था; क्योंकि तुम मेरे पुत्रकी जगहपर हो'
जब नारद के तेजस्वी रूप को देखा, तो सुकुमारी आशङ्कावश भागने लगी। तब पर्वत ने उसे समझाते हुए कहा— 'देवि! ये तुम्हारे पति हैं, सन्देह मत करो।' पर्वत के समझाने पर सुकुमारी का मन शान्त हुआ। इसके पश्चात पर्वत स्वर्ग लौट गए और नारद सुकुमारी के साथ वहीं रहे।"
In English
The Curse of Narada and Parvata
Narada and Parvata make a pact to share their every thought, but Narada breaks this by hiding his desire for King Srijaya's daughter. Parvata curses Narada so that people will see his face as a monkey after he marries her, and Narada in turn curses Parvata to be unable to enter heaven. After meeting again later, the two sages cancel each other's curses.
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