श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 201–210
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210
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‘ सृजय! नहुषपुत्र राजा ययाति भी जीवित न रह सके- यह हमने सुना है । उन्होंने समुद्रोंसहित इस सारी पृथ्वीको जीतकर शम्यापातके * द्वारा पृथ्वीको नाप - नापकर यज्ञकी वेदियाँ बनायीं, जिनसे भूतलकी विचित्र शोभा होने लगी । उन्हीं वेदियोंपर मुख्य- मुख्य यज्ञोंका अनुष्ठान करते हुए उन्होंने सारी भारतभूमिकी परिक्रमा कर डाली ॥ ९ ४- ९ ५ ॥
इष्ट्वा क्रतुसहस्रेण वाजपेयशतेन च ।
तर्पयामास विप्रेन्द्रांस्त्रिभिः काञ्चनपर्वतैः ॥ ९ ६ ॥
' उन्होंने एक हजार श्रीतयज्ञों और सौ वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान किया तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सोनेके तीन पर्वत दान करके पूर्णतः संतुष्ट किया ॥ ९ ६ ॥
व्यूढेनासुरयुद्धेन हत्वा दैतेयदानवान् ।
व्यभजत् पृथिवीं कृत्स्नां ययातिर्नहुषात्मजः ॥ ९ ७ ॥
'नहुषपुत्र ययातिने व्यूह- रचनायुक्त आसुर युद्धके द्वारा दैत्यों और दानवोंका संहार करके यह सारी पृथ्वी अपने पुत्रोंको बाँट दी थी ॥ ९ ७ ॥
अन्त्येषु पुत्रान् निक्षिप्य यदुदुद्युपुरोगमान् ।
पुरुं राज्येऽभिषिच्याथ सदारः प्राविशद् वनम् ॥ ९ ८ ॥
‘ उन्होंने किनारेके प्रदेशोंपर अपने तीन पुत्र यदु, द्रुह्यु तथा अनुको स्थापित करके मध्य भारतके राज्यपर पूरुको अभिषिक्त किया; फिर अपनी स्त्रियोंके साथ वे वनमें चले गये ॥ ९ ८ ॥
स चेन्ममार सृजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ ९९ ॥
' सृजय! वे तुम्हारी अपेक्षा चारों कल्याणमय गुणोंमें बढ़े हुए थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिकपुण्यात्मा थे । जब वे भी मर गये तो तुम्हारा पुत्र किस गिनतीमें है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो ॥ ९९ ॥
अम्बरीषं च नाभागं मृतं सृजय शुश्रुम ।
यं प्रजा वव्रिरे पुण्यं गोप्तारं नृपसत्तमम् ॥ १०० ॥
‘ सृजय! हमने सुना है कि नाभागके पुत्र अम्बरीष भी मृत्युके अधीन हो गये थे । उन नृपश्रेष्ठ अम्बरीषको सारी प्रजाने अपना पुण्यमय रक्षक माना था ॥ १०० ॥
यः सहस्रं सहस्राणां राज्ञामयुतयाजिनाम् ।
ईजानो वितते यज्ञे ब्राह्मणेभ्यः सुसंहितः ॥ १०१ ॥
‘ ब्राह्मणोंके प्रति अनुराग रखनेवाले राजा अम्बरीषने यज्ञ करते समय अपने विशाल यज्ञमण्डपमें दस लाख ऐसे राजाओंको उन ब्राह्मणोंकी सेवामें नियुक्त किया था, जो स्वयं भी दस - दस हजार यज्ञ कर चुके थे ॥ १०१ ॥
नैतत् पूर्वे जनाश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे ।
इत्यम्बरीषं नाभागिमन्वमोदन्त दक्षिणाः ॥ १०२ ॥
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‘ उन यज्ञकुशल ब्राह्मणोंने नाभागपुत्र अम्बरीषकी सराहना करते हुए कहा था कि ' ऐसा यज्ञ न तो पहलेके राजाओंने किया है और न भविष्यमें होनेवाले ही करेंगे ' ॥
शतं राजसहस्राणि शतं राजशतानि च ।
सर्वेऽश्वमेधैरीजानास्तेऽन्वयुर्दक्षिणायनम् ॥ १०३ ॥
‘ उनके यज्ञमें एक लाख दस हजार राजा सेवाकार्य करते थे । वे सभी अश्वमेधयज्ञका फल पाकर दक्षिणायनके पश्चात् आनेवाले उत्तरायणमार्गसे ब्रह्मलोकमें चले गये थे ॥
स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ १०४ ॥
‘ सृजय! राजा अम्बरीष चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़कर थे और तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा भी थे । जब वे भी जीवित न रह सके तो दूसरेके लिये क्या कहा जा सकता है? अतः तुम अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक न करो ॥ १०४ ॥
शशबिन्दुं चैत्ररथं मृतं शुश्रुम संजय ।
यस्य भार्यासहस्राणां शतमासीन्महात्मनः ॥ १०५ ॥
सहस्रं तु सहस्राणां यस्यासन् शाशबिन्दवाः । ' सृजय! हम सुनते हैं कि चित्ररथके पुत्र शशबिन्दु भी मृत्युसे अपनी रक्षा न कर सके । उन महामना नरेशके एक लाख रानियाँ थीं और उनके गर्भसे राजाके दस लाख पुत्र उत्पन्न हुए थे ॥ १०५३ ॥
हिरण्यकवचाः सर्वे सर्वे चोत्तमधन्विनः ॥ १०६ ॥
शतं कन्या राजपुत्रमेकैकं पृथगन्वयुः ।
कन्यां कन्यां शतं नागा नागं नागं शतं रथाः ॥ १०७ ॥
‘ वे सभी राजकुमार सुवर्णमय कवच धारण करनेवाले और उत्तम धनुर्धर थे । एक-एक राजकुमारको अलग - अलग सौ- सौ कन्याएँ ब्याही गयी थीं । प्रत्येक कन्याके साथ सौ - सौ हाथी प्राप्त हुए थे । हर एक हाथीके पीछे सौ -सौ रथ मिले थे ॥ १०६-१०७ ॥
रथे रथे शतं चाश्वा देशजा हेममालिनः ।
अश्वे अश्वे शतं गावो गवां तद्वदजाविकम् ॥ १०८ ॥
‘ प्रत्येक रथके साथ सुवर्णमालाधारी सौ- सौ देशीय घोड़े थे। हर एक अश्वके साथ सौ गायें और एक- एक गायके साथ सौ - सौ भेड़ - बकरियाँ प्राप्त हुई थीं ॥ १०८ ॥
एतद् धनमपर्यन्तमश्वमेधे महामखे ।
शशबिन्दुर्महाराज ब्राह्मणेभ्यः समार्पयत् ॥ १० ९ ॥
‘ महाराज! राजा शशबिन्दुने यह अनन्त धनराशि अश्वमेध नामक महायज्ञमें ब्राह्मणोंको दान कर दी थी ॥
स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ ११० ॥
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' सृजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े -चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा भी थे । जब वे भी मृत्युसे बच न सके, तब तुम्हारे पुत्रके लिये क्या कहा जाय? अतः तुम्हें अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ११० ॥
गयं चामूर्तरयसं मृतं शुश्रुम सृजय ।
यः स वर्षशतं राजा हुतशिष्टाशनोऽभवत् ॥ १११ ॥
‘ सृजय! सुननेमें आया है कि अमूर्तरयाके पुत्र राजा गयकी भी मृत्यु हुई थी । उन्होंने सौ वर्षोंतक होमसे अवशिष्ट अन्नका ही भोजन किया ॥ १११ ॥
यस्मै वह्निर्वरं प्रादात् ततो वव्रे वरान् गयः ।
ददतो योऽक्षयं वित्तं धर्मे श्रद्धा च वर्धताम् ॥ ११२ ॥
मनो मे रमतां सत्ये त्वत्प्रसादाद् हुताशन । ‘एक समय अग्निदेवने उन्हें वर माँगनेके लिये कहा, तब राजा गयने ये वर माँगे, ‘ अग्निदेव! आपकी कृपासे दान करते हुए मेरे पास अक्षय धनका भंडार भरा रहे । धर्ममें मेरी श्रद्धा बढ़ती रहे और मेरा मन सदा सत्यमें ही अनुरक्त रहे ' ॥ ११२३ ॥
लेभे च कामांस्तान् सर्वान् पावकादिति नः श्रुतम् ॥ ११३ ॥
दर्शेश्च पूर्णमासैश्च चातुर्मास्यैः पुनः पुनः ।
अयजद्धयमेधेन सहस्रं परिवत्सरान् ॥ ११४ ॥
' सुना है कि उन्हें अग्निदेवसे वे सभी मनोवाञ्छित फल प्राप्त हो गये थे । उन्होंने एक हजार वर्षोंतक बारंबार दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य तथा अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ॥ ११३-११४ ॥
शतं गवां सहस्राणि शतमश्वतराणि च ।
उत्थायोत्थाय वै प्रादात् सहस्रं परिवत्सरान् ॥ ११५ ॥
‘वे हजार वर्षोंतक प्रतिदिन सबेरे उठ उठकर एक-एक लाख गौओं और सौ - सौ खच्चरोंका दान करते थे ॥ ११५ ॥
तर्पयामास सोमेन देवान् वित्तैर्द्विजानपि ।
पितॄन् स्वधाभिः कामैश्च स्त्रियः स पुरुषर्षभ ॥ ११६ ॥
‘ पुरुषप्रवर! इन्होंने सोमरसके द्वारा देवताओंको, धनके द्वारा ब्राह्मणोंको, श्राद्धकर्मसे पितरोंको और कामभोगद्वारा स्त्रियोंको तृप्त किया था ॥ ११६ ॥
सौवर्णी पृथिवीं कृत्वा दशव्यामां द्विरायताम् ।
दक्षिणामददद् राजा वाजिमेधे महाक्रतौ ॥ ११७ ॥
‘ राजा गयने महायज्ञ अश्वमेधमें दस व्याम ( पचास हाथ ) चौड़ी और इससे दूनी लंबी सोनेकी पृथ्वी बनवाकर दक्षिणारूपसे दान की थी ॥ ११७ ॥
यावत्यः सिकता राजन् गङ्गायां पुरुषर्षभ ।
तावतीरेव गाः प्रादादामूर्तरयसो गयः ॥ ११८ ॥
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' पुरुषप्रवर नरेश! गंगाजीमें जितने बालूके कण हैं, अमूर्तरयाके पुत्र गयने उतनी ही गौओंका दान किया था ॥
स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ ११ ९ ॥
' सृजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े -चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा भी थे । जब वे भी मर गये तो तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो ॥ ११ ९ ॥
रन्तिदेवं च सांकृत्यं मृतं सृजय शुश्रुम ।
सम्यगाराध्य यः शक्राद् वरं लेभे महातपाः ॥ १२० ॥
अन्नं च नो बहु भवेदतिथींश्च लभेमहि ।
श्रद्धा च नो मा व्यगमन्मा च याचिष्म कंचन ॥ १२१ ॥
‘ सृजय! संकृतिके पुत्र राज रन्तिदेव भी कालके गालमें चले गये, यह हमारे सुननेमें आया है । उन महातपस्वी नरेशने इन्द्रकी अच्छी तरह आराधना करके उनसे यह वर माँगा कि ' हमारे पास अन्न बहुत हो, हम सदा अतिथियोंकी सेवाका अवसर प्राप्त करें, हमारी श्रद्धा दूर न हो और हम किसीसे कुछ भी न माँगें' ॥
उपातिष्ठन्त पशवः स्वयं तं संशितव्रतम् ।
ग्राम्यारण्या महात्मानं रन्तिदेवं यशस्विनम् ॥ १२२ ॥
‘ कठोर व्रतका पालन करनेवाले, यशस्वी महात्मा राजा रन्तिदेवके पास गाँवों और जंगलोंके पशु अपने-- आप यज्ञके लिये उपस्थित हो जाते थे ॥ १२२ ॥
महानदी चर्मराशेरुत्क्लेदात् ससृजे यतः ।
ततश्चर्मण्वतीत्येवं विख्याता सा महानदी ॥ १२३ ॥
‘ वहाँ भीगी चर्मराशिसे जो जल बहता था, उससे एक विशाल नदी प्रकट हो गयी, जो चर्मण्वती ( चम्बल ) के नामसे विख्यात हुई ॥ १२३ ॥
ब्राह्मणेभ्यो ददौ निष्कान् सदसि प्रतते नृपः ।
तुभ्यं निष्कं तुभ्यं निष्कमिति क्रोशन्ति वै द्विजाः ॥ १२४ ॥
सहस्रं तुभ्यमित्युक्त्वा ब्राह्मणान् सम्प्रपद्यते । ‘ राजा अपने विशाल यज्ञमें ब्राह्मणोंको सोनेके निष्क दिया करते थे । वहाँ द्विजलोग पुकार- पुकारकर कहते कि 'ब्राह्मणो! यह तुम्हारे लिये निष्क है, यह तुम्हारे लिये निष्क है ' परंतु कोई लेनेवाला आगे नहीं बढ़ता था । फिर वे यह कहकर कि ' तुम्हारे लिये एक सहस्र निष्क है ', लेनेवाले ब्राह्मणोंको उपलब्ध कर पाते थे ॥ १२४३ ॥
अन्वाहार्योपकरणं द्रव्योपकरणं च यत् ॥ १२५ ॥
घटाः पात्र्यः कटाहानि स्थाल्यश्च पिठराणि च ।
नासीत् किंचिदसौवर्णं रन्तिदेवस्य धीमतः ॥ १२६ ॥
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‘ बुद्धिमान् राजा रन्तिदेवके उस यज्ञमें अन्वाहार्य अग्निमें आहुति देनेके लिये जो उपकरण थे तथा द्रव्य - संग्रहके लिये जो उपकरण – घड़े, पात्र, कड़ाहे, बटलोई और कठौते आदि सामान थे, उनमें से कोई भी ऐसा नहीं था, जो सोनेका बना हुआ न हो ॥ १२५-१२६ ॥
सांकृते रन्तिदेवस्य यां रात्रिमवसन् गृहे ।
आलभ्यन्त शतं गावः सहस्राणि च विंशतिः ॥ १२७ ॥
' संकृतिके पुत्र राजा रन्तिदेवके घरमें जिस रातको अतिथियोंका समुदाय निवास करता था, उस समय उन्हें बीस हजार एक सौ गौएँ छूकर दी जाती थीं ॥ १२७ ॥
तत्र स्म सूदाः क्रोशन्ति सुमृष्टमणिकुण्डलाः ।
सूपं भूयिष्ठमश्नीध्वं नाद्य भोज्यं यथा पुरा ॥ १२८ ॥
‘ वहाँ विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण किये रसोइये पुकार- पुकारकर कहते थे कि ‘ आपलोग खूब दाल - भात खाइये । आजका भोजन पहले जैसा नहीं है, अर्थात् पहलेकी अपेक्षा बहुत अच्छा है ' ॥ १२८ ॥
स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ १२ ९ ॥
'संजय! रन्तिदेव तुमसे पूर्वोक्त चारों गुणोंमें बढ़े- चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी मर गये तो तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो ॥ १२ ९ ॥
सगरं च महात्मानं मृतं शुश्रुम सृजय ।
ऐक्ष्वाकं पुरुषव्याघ्रमतिमानुषविक्रमम् ॥ १३० ॥
‘ सृजय! इक्ष्वाकुवंशी पुरुषसिंह महामना सगर भी मरे थे, ऐसा सुननेमें आया है ।
उनका पराक्रम अलौकिक था ॥
षष्टिः पुत्रसहस्राणि यं यान्तमनुजग्मिरे ।
नक्षत्रराजं वर्षान्ते व्यभ्रे ज्योतिर्गणा इव ॥ १३१ ॥
'जैसे वर्षाके अन्त ( शरद) में बादलोंसे रहित आकाशके भीतर तारे नक्षत्रराज चन्द्रमाका अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार राजा सगर जब युद्ध आदिके लिये कहीं यात्रा करते थे, तब उनके साठ हजार पुत्र उन नरेशके पीछे - पीछे चलते थे ॥ १३१ ॥
एकच्छत्रा मही यस्य प्रतापादभवत् पुरा ।
योऽश्वमेधसहस्रेण तर्पयामास देवताः ॥ १३२ ॥
‘ पूर्वकालमें राजाके प्रतापसे एकछत्र पृथ्वी उनके अधिकारमें आ गयी थी । उन्होंने एक सहस्र अश्वमेध यज्ञ करके देवताओंको तृप्त किया था ॥ १३२ ॥
यः प्रादात् कनकस्तम्भं प्रासादं सर्वकाञ्चनम् ।
पूर्णं पद्मदलाक्षीणां स्त्रीणां शयनसंकुलम् ॥ १३३ ॥
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द्विजातिभ्योऽनुरूपेभ्यः कामांश्च विविधान् बहून् ।
यस्यादेशेन तद् वित्तं व्यभजन्त द्विजातयः ॥ १३४ ॥
‘ राजाने सोनेके खंभोंसे युक्त पूर्णतः सोनेका बना हुआ महल, जो कमलके समान नेत्रोंवाली सुन्दरी स्त्रियोंकी शय्याओंसे सुशोभित था, तैयार कराकर योग्य ब्राह्मणोंको दान किया । साथ ही नाना प्रकारकी भोगसामग्रियाँ भी प्रचुरमात्रामें उन्हें दी थीं । उनके आदेशसे ब्राह्मणोंने उनका सारा धन आपसमें बाँट लिया था ॥ १३३-१३४ ॥
खानयामास यः कोपात् पृथिवीं सागराङ्किताम् ।
यस्य नाम्ना समुद्रश्च सागरत्वमुपागतः ॥ १३५ ॥
'एक समय क्रोधमें आकर उन्होंने समुद्रसे चिह्नित सारी पृथ्वी खुदवा डाली थी ।
उन्हींके नामपर समुद्रकी ' सागर' संज्ञा हो गयी ॥ १३५ ॥
स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ १३६ ॥
‘ सृजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े हुए थे । तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी मर गये, तब तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो ॥ १३६ ॥
राजानं च पृथुं वैन्यं मृतं शुश्रुम सृजय ।
यमभ्यषिञ्चन् सम्भूय महारण्ये महर्षयः ॥ १३७ ॥
' सृजय! वेनके पुत्र महाराज पृथुको भी अपने शरीरका त्याग करना पड़ा था, ऐसा हमने सुना है । महर्षियोंने महान् वनमें एकत्र होकर उनका राज्याभिषेक किया था ॥ १३७ ॥
प्रथयिष्यति वै लोकान् पृथुरित्येव शब्दितः ।
क्षताद् यो वै त्रायतीति स तस्मात् क्षत्रियः स्मृतः ॥ १३८ ॥
‘ऋषियोंने यह सोचकर कि सब लोकोंमें धर्मकी मर्यादा प्रथित ( स्थापित ) करेंगे, उनका नाम पृथु रखा था । वे क्षत अर्थात् दुःखसे सबका त्राण करते थे, इसलिये क्षत्रिय कहलाये ॥ १३८ ॥
पृथुं वैन्यं प्रजा दृष्ट्वा रक्ताः स्मेति यदब्रुवन् ।
ततो राजेति नामास्य अनुरागादजायत ॥ १३ ९ ॥
‘ वेननन्दन पृथुको देखकर समस्त प्रजाओंने एक साथ कहा कि ' हम इनमें अनुरक्त हैं ' इस प्रकार प्रजाका रञ्जन करनेके कारण ही उनका नाम ' राजा ' हुआ ॥ १३ ९ ॥
अकृष्टपच्या पृथिवी पुटके पुटके मधु ।
सर्वा द्रोणदुघा गावो वैन्यस्यासन् प्रशासतः ॥ १४० ॥
‘ पृथुके शासनकालमें पृथ्वी बिना जोते ही धान्य उत्पन्न करती थी, वृक्षोंके पुट- पुटमें मधु ( रस ) भरा था और सारी गौएँ एक-एक दोन दूध देती थीं ॥ १४० ॥
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अरोगाः सर्वसिद्धार्था मनुष्या अकुतोभयाः ।
यथाभिकाममवसन् क्षेत्रेषु च गृहेषु च ॥ १४१ ॥
' मनुष्य नीरोग थे । उनकी सारी कामनाएँ सर्वथा परिपूर्ण थीं और उन्हें कभी किसी
चीजसे भय नहीं होता था । सब लोग इच्छानुसार घरों या खेतोंमें रह लेते थे ॥
आपस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियास्यतः ।
सरितश्चानुदीर्यन्त ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥ १४२ ॥
'जब वे समुद्रकी ओर यात्रा करते, उस समय उसका जल स्थिर हो जाता था ।
नदियोंकी बाढ़ शान्त हो जाती थी । उनके रथकी ध्वजा कभी भग्न नहीं होती थी ॥
हैरण्यांस्त्रिनलोत्सेधान् पर्वतानेकविंशतिम् ।
ब्राह्मणेभ्यो ददौ राजा योऽश्वमेधे महामखे ॥ १४३ ॥
' राजा पृथुने अश्वमेध नामक महायज्ञमें चार सौ हाथ ऊँचे इक्कीस सुवर्णमय पर्वत ब्राह्मणों को दान किये थे ॥ १४३ ॥
स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुप्यथाः ॥ १४४ ॥
‘ सृजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े -चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रकी अपेक्षा बहुतअधिक पुण्यात्मा भी थे । जब वे भी मर गये तो तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक न करो ॥ १४४ ॥
किं वा तूष्णीं ध्यायसे सृजय त्वं न मे राजन् वाचमिमां शृणोषि । न चेन्मोघं विप्रलप्तं ममेदं पथ्यं मुमूर्षोरिव सुप्रयुक्तम् ॥ १४५ ॥
‘ सृजय! तुम चुपचाप क्या सोच रहे हो । राजन्! मेरी इस बातको क्यों नहीं सुनते हो? जैसे मरणासन्न पुरुषके ऊपर अच्छी तरह प्रयोगमें लायी हुई ओषधि व्यर्थ जाती है, उसी प्रकार मेरा यह सारा प्रवचन निष्फल तो नहीं हो गया? ' ॥ १४५ ॥
संजय उवाच शृणोमि ते नारद वाचमेनां विचित्रार्थं स्रजमिव पुण्यगन्धाम् । राजर्षीणां पुण्यकृतां महात्मनां कीर्त्या युक्तानां शोकनिर्णाशनार्थाम् ॥ १४६ ॥
सृजयने कहा - नारद! पवित्र गन्धवाली मालाके समान विचित्र अर्थसे भरी हुई आपकी इस वाणीको मैं सुन रहा हूँ । पुण्यात्मा महामनस्वी और कीर्तिशाली राजर्षियोंके चरित्रसे युक्त आपका यह वचन सम्पूर्ण शोकोंका विनाश करनेवाला है ॥ १४६ ॥
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न ते मोघं विप्रलप्तं महर्षे दृष्ट्वैवाहं नारद त्वां विशोकः । शुश्रूषे ते वचनं ब्रह्मवादिन् न ते तृप्याम्यमृतस्येव पानात् ॥ १४७ ॥
महर्षि नारद! आपने जो कुछ कहा है, आपका यह उपदेश व्यर्थ नहीं गया है । आपका दर्शन करके ही मैं शोकरहित हो गया हूँ । ब्रह्मवादी मुने! मैं आपका यह प्रवचन सुनना चाहता हूँ और अमृतपानके समान उससे तृप्त नहीं हो रहा हूँ ॥ १४७ ॥
अमोघदर्शिन् मम चेत् प्रसादं संतापदग्धस्य विभो प्रकुर्याः । सुतस्य सञ्जीवनमद्य मे स्यात् तव प्रसादात् सुतसङ्गमश्च ॥ १४८ ॥
प्रभो! आपका दर्शन अमोघ है । मैं पुत्रशोकके संतापसे दग्ध हो रहा हूँ । यदि आप मुझपर कृपा करें तो मेरा पुत्र फिर जीवित हो सकता है और आपके प्रसादसे मुझे पुनः पुत्र-मिलनका सुख सुलभ हो जायगा ॥ १४८ ॥
नारद उवाच यस्ते पुत्रो गमितोऽयं विजातः स्वर्णष्ठीवी यमदात् पर्वतस्ते । पुनस्तु ते पुत्रमहं ददामि हिरण्यनाभं वर्षसहस्रिणं च ॥ १४ ९ ॥ नारदजी कहते हैं - राजन्! तुम्हारे यहाँ जो यह सुवर्णष्ठीवी नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था और जिसे पर्वत मुनिने तुम्हें दिया था, वह तो चला गया। अब मैं पुनः हिरण्यनाभ नामक एक पुत्र दे रहा हूँ, जिसकी आयु एक हजार वर्षोंकी होगी ॥ १४ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि षोडशराजोपाख्याने एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सोलह राजाओंका उपाख्यानविषयक* उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥
3 - अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम- ये सात सोम- संस्थाएँ हैं । 2- पहले द्रोणपर्वमें जो सोलह राजाओंके प्रसंग आये हैं, उनमें और यहाँके प्रसंगमें पाठभेदोंके कारण बहुत अन्तर देखा जाता है । वहाँ भरतके द्वारा यमुनातटपर सौ, सरस्वतीतटपर तीन सौ और गंगातटपर चार सौ अश्वमेध यज्ञ किये गये थे— यह उल्लेख है ।
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* ‘ शम्या ' एक ऐसे काठके डंडेको कहते हैं, जिसका निचला भाग मोटा होता है । उसे जब कोई बलवान् पुरुष उठाकर चोरसे फेंके, तब जितनी दूरीपर जाकर वह गिरे, उतने भूभागको एक ' शम्यापात' कहते हैं । इस तरह एक-एक शम्यापातमें एक-एक यज्ञवेदी बनाते और यज्ञ करते हुए राजा ययाति आगे बढ़ते गये । इस प्रकार चलकर उन्होंने भारतभूमिकी परिक्रमा की थी । * यह षोडश राजाओंका उपाख्यान द्रोणपर्वके पचपनवें अध्यायसे लेकर इकहत्तरवें अध्यायतक पहले आ चुका है । उसीको कुछ संक्षिप्त करके पुनः यहाँ लिया गया है । पहलेका परशुरामचरित्र इसमें संगृहीत नहीं हुआ है और पहले जो राजा पौरवका चरित्र आया था, उसके स्थानमें यहाँ अंगराज बृहद्रथके चरित्रका वर्णन है । कथाओंके क्रममें भी उलटा-पलटी हो गयी है । श्लोकोंके पाठोंमें भी कई जगह भेद दिखायी देता है ।
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त्रिंशोऽध्यायः महर्षि नारद और पर्वतका उपाख्यान युधिष्ठिर उवाच
स कथं कांचनष्ठीवी सृजयस्य सुतोऽभवत् ।
पर्वतेन किमर्थं वा दत्तस्तेन ममार च ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! पर्वत मुनिने राजा सृजयको सुवर्णष्ठीवी नामक पुत्र किसलिये दिया और वह क्यों मर गया? ॥ १ ॥
यदा वर्षसहस्रायुस्तदा भवति मानवः ।
कथमप्राप्तकौमारः सृजयस्य सुतो मृतः ॥ २ ॥
जब उस समय मनुष्यकी एक हजार वर्षकी आयु होती थी, तब सृजयका पुत्र कुमारावस्था आनेसे पहले ही क्यों मर गया? ॥ २ ॥
उताहो नाममात्रं वै सुवर्णष्ठीविनोऽभवत् ।
कथं वा काञ्चनष्ठीवीत्येतदिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
उस बालकका नाममात्र ही सुवर्णष्ठीवी था या उसमें वैसा ही गुण भी था। सुवर्णष्ठीवी नाम पड़नेका कारण क्या था? यह सब मैं जानना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
अत्र ते वर्णयिष्यामि यथावृत्तं जनेश्वर ।
नारदः पर्वतश्चैव द्वावृषी लोकसत्तमौ ॥ ४ ॥
श्रीकृष्ण बोले – जनेश्वर! इस विषयमें जो बात है, वह यथार्थरूपसे बता रहा हूँ, सुनिये । नारद और पर्वत– ये दोनों ऋषि सम्पूर्ण लोकोंमें श्रेष्ठ हैं ॥ ४ ॥
मातुलो भागिनेयश्च देवलोकादिहागतौ ।
विहर्तुकामौ सम्प्रीत्या मानुषेषु पुरा विभो ॥ ५ ॥
ये दोनों परस्पर मामा और भानजे लगते हैं! प्रभो! पहलेकी बात है ये दोनों महर्षि मनुष्यलोकमें भ्रमण करनेके लिये प्रेमपूर्वक देवलोकसे यहाँ आये थे ॥ ५ ॥
हविःपवित्रभोज्येन देवभोज्येन चैव हि ।
नारदो मातुलश्चैव भागिनेयश्च पर्वतः ॥ ६ ॥
वे यहाँ पवित्र हविष्य तथा देवताओंके भोजन करनेयोग्य पदार्थ खाकर रहते थे ।
नारदजी मामा हैं और पर्वत इनके भानजे हैं ॥ ६ ॥
तावुभौ तपसोपेताववनीतलचारिणौ ।
भुञ्जानौ मानुषान् भोगान् यथावत् पर्यधावताम् ॥ ७ ॥