नृशंसाख्यान : नृशंस जैसे कुत्सित चरित्र वाले व्यक्तियों की पहचान कैसे करें?
दुष्टों की पहचान और सज्जनता
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → आपद्धर्मपर्व · अध्याय 164 · पृष्ठ 1058–1061
461 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 4 श्लोक
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
नृशंस के धर्म-कर्म का ज्ञान प्राप्त करने हेतु।
कुरुक्षेत्र के मैदान में शान्ति का वातावरण था। युधिष्ठिर ने भरतवंशी भीष्म की ओर देखा और अत्यन्त जिज्ञासा के साथ प्रश्न किया— "भरतनन्दन! मैं सदा श्रेष्ठ पुरुषों के सेवन और उनके दर्शन से यह तो जानता हूँ कि कोमलतापूर्ण बर्ताव कैसे किया जाता है? परन्तु नृशंस मनुष्यों और उनके कर्मों का मुझे विशेष ज्ञान नहीं है।"
युधिष्ठिर की वाणी में एक गहरी चिन्ता थी। उन्होंने आगे कहा, "जैसे मनुष्य रास्ते में मिले हुए काँटों, कुओं और आग से बचकर चलते हैं, उसी प्रकार मनुष्य नृशंस कर्म करने वाले पुरुष को भी दूर से ही त्याग देते हैं। भारत! कुरुनन्दन! नृशंस मनुष्य इस लोक और परलोक में भी सदा ही शोक की आग से जलता रहता है; अतः आप मुझे नृशंस मनुष्य और उसके धर्म-कर्म का यथार्थ परिचय दीजिये।"
नृशंसो दह्यते नित्यं प्रेत्य चेह च भारत ।
तस्मात् त्वं ब्रूहि कौरव्य तस्य धर्मविनिश्चयम् ॥
भारत! कुरुनन्दन! नृशंस मनुष्य इसलोक और परलोकमें भी सदा ही शोककी आगसे जलता रहता है; अतः आप मुझे नृशंस मनुष्य और उसके धर्म- कर्मका यथार्थ परिचय दीजिये ।
भीष्म जी ने युधिष्ठिर के प्रश्न को स्वीकार करते हुए नृशंस के लक्षणों का वर्णन करना आरम्भ किया। उन्होंने कहा कि नृशंस वह है जो हिंसा प्रधान कुत्सित कर्म करता है, दूसरों की जीविका का नाश करता है और शठ होता है। वह विषयों में आसक्त रहता है और अपनी प्रशंसा प्राप्त करने के लिए व्यर्थ ही बढ़-बढ़कर बातें बनाता है। उसके भीतर अभिमान भरा होता है और मन में सबके प्रति सन्देह बना रहता है।
भीष्म जी ने आगे विस्तार से बताया कि नृशंस मनुष्य कौए की तरह वञ्चक दृष्टि रखने वाला होता है, जिसमें कृपणता कूट-कूटकर भरी होती है। वह सदा आश्रमों से द्वेष रखता है और वर्णसङ्करता फैलाता है। ऐसा मनुष्य गुण को भी अवगुण के समान समझता है, बहुत झूठ बोलता है और अत्यन्त लोभी होता है। उसका मन उदारता से शून्य रहता है। वह धर्मात्मा और गुणवान पुरुष को ही पापी मानता है और अपने ही स्वभाव को आदर्श मानकर किसी पर विश्वास नहीं करता।
धर्मशीलं गुणोपेतं पापमित्यवगच्छति ।
आत्मशीलप्रमाणेन न विश्वसिति कस्यचित् ॥
वह धर्मात्मा और गुणवान् पुरुषको ही पापी मानता है और अपने स्वभावको आदर्श मानकर किसीपर विश्वास नहीं करता है ।
नृशंस के कर्म और भी घृणित हैं; जहाँ दूसरों की बदनामी होती हो, वहाँ वह उनके गुप्त दोषों को भी प्रकट कर देता है। वह आजीविका के लिए दूसरे का ही सर्वनाश करता है। सबसे विचित्र बात यह है कि जो उसका उपकार करता है, वह उसे अपने जाल में फँसा हुआ समझता है। यदि कोई उपकारी उसे धन भी दे दे, तो वह उसके लिए बहुत समय तक पश्चात्ताप करता रहता है। यहाँ तक कि जो मनुष्य दूसरों के देखते रहने पर भी उत्तम भक्ष्य, पेय, लेह्य तथा दूसरे-दूसरे भोज्य पदार्थों को अकेला ही खा जाता है, उसे भी नृशंस ही कहना चाहिये।
तथोपकारिणं चैव मन्यते वञ्चितं परम् ।
दत्त्वापि च धनं काले संतपत्युपकारिणे ॥
जो उसका उपकार करता है, उसको वह अपने जालमें फँसा हुआ समझता है और उपकारीको भी यदि कभी धन देता है तो उसके लिये बहुत समयतक पश्चात्ताप करता रहता है ।
भीष्म जी ने कथा का सार देते हुए कहा कि इसके विपरीत, जो मनुष्य पहले ब्राह्मण को भोजन देता है और फिर अपने सुहृदों के साथ स्वयं भोजन करता है, वह इस लोक में अनन्त सुख भोगता है और मृत्यु के पश्चात् स्वर्गलोक जाता है। भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे प्रश्न के अनुसार नृशंस मनुष्य का परिचय दिया गया है। ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह ऐसे नृशंस से सदा बचकर रहे।
ब्राह्मणेभ्यः प्रदायाग्रं यः सुहृद्भिः सहाश्नुते ।
स प्रेत्य लभते स्वर्गमिह चानन्त्यमश्नुते ॥
जो पहले ब्राह्मणको देकर पीछे अपने सुहृदोंके साथ स्वयं भोजन करता है, वह इस लोकमें अनन्त सुख भोगता है और मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें जाता है ।
In English
Yudhisthira's Question on Cruel Men
Yudhisthira asks Bhishma to define the characteristics of a cruel or wicked person. Bhishma explains that such people are dishonest, greedy, and prone to causing harm to others for their own gain. He advises wise people to avoid those who lack generosity and act with malice.
This page answers
- What are the traits of a cruel man according to bhishma?
- How does a wicked person behave toward others?
- What is the difference between a cruel man and a righteous man?
- Why should one avoid a person who lacks generosity?
Also written: Nrishansakhyana, Nrishansa, Yudhishthira, Bhishma, नृशंसाख्यान