श्रीगणेशाय नमः।

सेनजिदुपाख्यान : परम दुःख और शोक से मुक्ति का मार्ग क्या है?

काल और त्याग का बोध

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 25 · पृष्ठ 160–167

900 शब्द · 5 मिनटका पाठ · 8 श्लोक

व्यास ने युधिष्ठिर से कहा

अर्जुन की कुपितता के समय युधिष्ठिर के शोक निवारण हेतु

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! जब अर्जुन कुपित हो गए, तब कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर ने व्यासजी को आमन्त्रित किया और उन्हें उत्तर देने के लिए कहा।

युधिष्ठिर अत्यन्त व्याकुल थे। उन्होंने भारी मन से कहा— "मुने! यह भूतल का राज्य और ये भिन्न-भिन्न प्रकार के भोग आज मेरे मन को प्रसन्न नहीं कर रहे हैं। यह शोक मुझे चारों ओर से घेरे हुए है। महर्षे! पति और पुत्रों से हीन हुई युवतियों का करुण विलाप सुनकर मुझे शान्ति नहीं मिल रही है।"

युधिष्ठिर उवाच

न पार्थिवमिदं राज्यं न भोगाश्च पृथग्विधाः ।
प्रीणयन्ति मनो मेऽद्य शोको मां रुन्धयत्ययम् ॥

युधिष्ठिर बोले — मुने! यह भूतलका राज्य और ये भिन्न - भिन्न प्रकारके भोग आज मेरे मनको प्रसन्न नहीं कर रहे हैं । यह शोक मुझे चारों ओरसे घेरे हुए है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 25 · श्लोक 2पृष्ठ 161

युधिष्ठिर के इन वचनों को सुनकर योगवेत्ताओं में श्रेष्ठ, वेदों के पारङ्गत और धर्मज्ञ महाज्ञानी व्यास ने उन्हें सम्बोधित किया। व्यासजी बोले— "राजन्! न तो कोई कर्म करने से नष्ट हुई वस्तु मिल सकती है और न ही केवल चिन्ता करने से। ऐसा कोई दाता नहीं है जो मनुष्य को उसकी विनष्ट वस्तु लौटा दे। मनुष्य बारी-बारी से विधाता के विधान के अनुसार समय पर ही सब कुछ पा सकता है।"

व्यास उवाच

न कर्मणा लभ्यते चिन्तया वा नाप्यस्ति दाता पुरुषस्य कश्चित् ।
पर्याययोगाद् विहितं विधात्रा कालेन सर्वं लभते मनुष्यः ॥

व्यासजी बोले – राजन्! न तो कोई कर्म करनेसे नष्ट हुई वस्तु मिल सकती है, न चिन्तासे ही । कोई ऐसा दाता भी नहीं है, जो मनुष्यको उसकी विनष्ट वस्तु दे दे । बारी-बारीसे विधाताके विधानानुसार मनुष्य समयपर सब कुछ पा लेता है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 25 · श्लोक 5पृष्ठ 161

व्यासजी ने आगे समझाया कि बुद्धि या शास्त्र अध्ययन से भी मनुष्य असमय में किसी विशेष वस्तु को प्राप्त नहीं कर सकता; समय आने पर तो कभी-कभी मूर्ख भी अभीष्ट पदार्थ पा लेता है। अतः काल ही कार्य की सिद्धि का सामान्य कारण है। अवनति के समय शिल्पकलाएँ, मन्त्र और औषध भी फल नहीं देते, किन्तु उन्नति के समय वे काल की प्रेरणा से सफल होकर वृद्धि में सहायक बनते हैं। समय से ही तेज हवा चलती है, समय से ही मेघ जल बरसाते हैं और समय से ही वन में वृक्ष पुष्ट होते हैं। समय से ही चन्द्रमा का मण्डल परिपूर्ण होता है और असमय में नदियाँ वेग से नहीं बहतीं। बालक भी समय आए बिना न जन्म लेता है, न मरता है और न ही असमय में बोलता है। बिना समय के जवानी नहीं आती और न ही बिना समय के बोया हुआ बीज उगता है।

कालेन कृष्णाश्च सिताश्च रात्र्यः कालेन चन्द्रः परिपूर्णबिम्बः ।
नाकालतः पुष्पफलं द्रुमाणां नाकालवेगाः सरितो वहन्ति ॥

समयसे ही अँधेरी और उजेली रातें होती हैं, समयसे ही चन्द्रमाका मण्डल परिपूर्ण होता है, असमयमें वृक्षोंमें फल और फूल भी नहीं लगते हैं और न असमयमें नदियाँ ही वेगसे बहती हैं ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 25 · श्लोक 9पृष्ठ 162

व्यासजी बोले— "युधिष्ठिर! इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं। एक समय शोक से आतुर हुए राजा सेनजित ने जो उद्गार प्रकट किए थे, वही मैं तुम्हें सुना रहा हूँ।"

राजा सेनजित ने मन ही मन कहा था— 'यह दुःसह कालचक्र सभी मनुष्यों पर अपना प्रभाव डालता है। एक दिन सभी भूपाल काल से परिपक्व होकर मृत्यु के अधीन हो जाते हैं।' उन्होंने आगे कहा था— 'राजन्! मनुष्य दूसरों को मारते हैं, फिर उन्हें भी दूसरे लोग मार देते हैं। नरेश्वर! यह मरना-मारना केवल लौकिक सञ्ज्ञा मात्र है। वास्तव में न कोई मारता है और न मारा जाता है; लोग केवल ऐसा मानते हैं। पाञ्चभौतिक शरीरों का जन्म और मरण तो स्वभावतः नियत है।'

सर्वानेवैष पर्यायो मर्त्यान् स्पृशति दुःसहः ।
कालेन परिपक्वा हि म्रियन्ते सर्वपार्थिवाः ॥

( राजा सेनजित्ने मन- ही- मन कहा कि ) ' यह दुःसह कालचक्र सभी मनुष्योंपर अपना प्रभाव डालता है । एक दिन सभी भूपाल कालसे परिपक्व होकर मृत्युके अधीन हो जाते हैं ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 25 · श्लोक 14पृष्ठ 163

सेनजित ने मनुष्य को चेतावनी दी थी— 'धन के नष्ट होने पर अथवा स्त्री, पुत्र या पिता की मृत्यु होने पर मनुष्य कहता है— हाय! मुझ पर बड़ा भारी दुःख आ पड़ा। तुम मूढ़ बनकर शोक क्यों कर रहे हो? उन मरे हुए व्यक्तियों का बारम्बार स्मरण मत करो, क्योंकि शोक करने से दुःख में दुःख और भय में भय की वृद्धि होगी। यह शरीर भी अपना नहीं है और सारी पृथ्वी भी अपनी नहीं है। जो दृष्टि रखने वाला पुरुष यह समझ लेता है कि जो मेरा है वह दूसरों का भी है, वह कभी मोह में नहीं फँसता। शोक के सहस्रों स्थान हैं और हर्ष के भी सैकड़ों अवसर; वे प्रतिदिन मूढ़ मनुष्य पर प्रभाव डालते हैं, विद्वान पर नहीं।'

शोकस्थानसहस्राणि हर्षस्थानशतानि च ।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥

' शोकके सहस्रों स्थान हैं, हर्षके भी सैकड़ों अवसर हैं । वे प्रतिदिन मूढ़ मनुष्यपर ही प्रभाव डालते हैं, विद्वान्पर नहीं ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 25 · श्लोक 20पृष्ठ 164

सेनजित के अनुसार— 'संसार में केवल दुःख ही है, सुख नहीं। तृष्णा जनित पीड़ा से दुःख होता है और दुःख से आर्त हुए मनुष्य को उसके न रहने पर ही सुख की प्रतीति होती है। सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख आता है। जो नित्य सुख की इच्छा रखता हो, वह इन दोनों का परित्याग कर दे; क्योंकि दुःख सुख के अन्त में अवश्य है और सुख दुःख के अन्त में।' उन्होंने कहा था— 'जिसके कारण शोक और बढ़ा हुआ ताप होता हो, यदि वह अपने शरीर का एक अङ्ग भी हो, तो उसे त्याग देना चाहिए। जो कुछ प्राप्त हो— चाहे सुख हो या दुःख, प्रिय हो या अप्रिय— उसे सहर्ष अपनाओ और हृदय से पराजय स्वीकार मत करो।'

सुखमेव हि दुःखान्तं कदाचिद् दुःखतः सुखम् ।
तस्मादेतद् द्वयं जह्याद् य इच्छेच्छाश्वतं सुखम् ॥

सुखान्तप्रभवं दुःखं दुःखान्तप्रभवं सुखम् । ‘ कभी दुःखके अन्तमें सुख और कभी सुखके अन्तमें दुःख भी आता है; अतः जो नित्य सुखकी इच्छा रखता हो, वह इन दोनोंका परित्याग कर दे; क्योंकि दुःख सुखके अन्तमें अवश्यम्भावी है, वैसे ही सुख भी दुःखके अन्तमें अवश्यम्भावी है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 25 · श्लोक 24पृष्ठ 165

अन्त में सेनजित ने कहा था— 'संसार में जो अत्यन्त मूर्ख हैं अथवा जो बुद्धि से परे पहुँच गए हैं, वे ही सुखी होते हैं; बीच वाले लोग कष्ट ही उठाते हैं।' धर्मवेत्ता महाज्ञानी सेनजित ने यही कहा था कि जिस दुःख से कोई दुखी है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता क्योंकि दुखों का अन्त नहीं है। सुख-दुःख, उत्पत्ति-विनाश और लाभ-हानि सबको समय-समय पर क्रम से प्राप्त होते हैं, इसलिए धीर पुरुष इनके लिए हर्ष या शोक न करे।

लाभालाभौ मरणं जीवितं च ।
पर्यायतः सर्वमवाप्नुवन्ति तस्माद् धीरो नैव हृष्येन्न शोचेत् ॥

सुख-दुःख, उत्पत्ति- विनाश, लाभ-हानि और जीवन- मरण - ये समय- समयपर क्रमसे सबको प्राप्त होते हैं; इसलिये धीर पुरुष इनके लिये हर्ष और शोक न करे ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 25 · श्लोक 31पृष्ठ 166

व्यासजी ने युधिष्ठिर को समझाते हुए कहा— "राजन्! राजा के लिए सङ्ग्राम में जूझना ही यज्ञ की दीक्षा है। राज्य की रक्षा करते हुए दण्डनीति में प्रतिष्ठित होना ही योगसाधन है और यज्ञ में दक्षिणा रूप से धन का त्याग एवं उत्तम रीति से दान करना ही राजा के लिए वास्तविक त्याग है। ये तीनों कर्म राजा को पवित्र करने वाले हैं।"

दीक्षां राज्ञः संयुगे युद्धमाहु- र्योगं राज्ये दण्डनीत्यां च सम्यक् ।
वित्तत्यागो दक्षिणानां च यज्ञे सम्यग् दानं पावनानीति विद्यात् ॥

राजाके लिये संग्राममें जूझना ही यज्ञकी दीक्षा लेना बताया गया है । राज्यकी रक्षा करते हुए दण्डनीतिमें भलीभाँति प्रतिष्ठित होना ही उसके लिये योगसाधन है तथा यज्ञमें दक्षिणारूपसे धनका त्याग एवं उत्तम रीति से दान ही राजाके लिये त्याग है । ये तीनों कर्म राजाको पवित्र करनेवाले हैं, ऐसा समझे ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 25 · श्लोक 32पृष्ठ 166

व्यासजी ने निष्कर्ष दिया— "जो राजा सङ्ग्राम में विजय, राष्ट्र का पालन, यज्ञ में सोमरस का पान, प्रजा की उन्नति तथा जनहित के लिए युक्तिपूर्वक दण्ड धारण करते हुए मृत्यु को प्राप्त होता है, वह देवलोक में आनन्द भोगता है। जो वेदों का ज्ञान, शास्त्रों का अध्ययन और चारों वर्णों के धर्म की रक्षा करके अपने मन को पवित्र कर चुका है, वह राजा देवलोक में सुखी होता है। और स्वर्ग में रहने पर भी जिसके चरित्र को नगर और जनपद के मनुष्य तथा मन्त्री मस्तक झुकाते हैं, वही राजा समस्त नरपतियों में सबसे श्रेष्ठ है।"

In English

Vyasa's Advice to Yudhishthira on Time and Suffering

Yudhishthira expresses his grief and dissatisfaction with his kingdom to the sage Vyasa. Vyasa explains that everything happens according to time and tells a story about King Senjit to illustrate that suffering and pleasure are cyclical. Vyasa concludes by advising Yudhishthira on the duties of a righteous king.

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