षड्जगीता : धर्म, अर्थ और काम में से सबसे श्रेष्ठ क्या है?
त्रिवर्गों का वास्तविक सार
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → आपद्धर्मपर्व · अध्याय 167 · पृष्ठ 1085–1095
1,154 शब्द · 6 मिनटका पाठ · 9 श्लोक
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा
राजा युधिष्ठिर के द्वारा अपने भाइयों और विदुर को दिए गए उपदेश की कथा सुनाना।
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जब भीष्मजी चुप हो गये, तब राजा युधिष्ठिर अपने घर गए। वहाँ उन्होंने अपने चारों भाइयों और विदुरजी को समीप बुलाकर एक गम्भीर प्रश्न किया। युधिष्ठिर ने पूछा— ‘लोगों की प्रवृत्ति प्रायः धर्म, अर्थ और काम की ओर होती है। इन तीनों में कौन सबसे श्रेष्ठ है, कौन मध्यम और कौन लघु? इन तीनों पर विजय पाने के लिये विशेषतः किसमें मन लगाना चाहिए? आप सब लोग हर्ष और उत्साह के साथ इस प्रश्न का यथावत्रूप उत्तर दें और वही बात कहें जिस पर आपकी पूरी आस्था हो।’
इत्युक्तवति भीष्मे तु तूष्णींभूते युधिष्ठिरः ।
पप्रच्छावसथं गत्वा भ्रातॄन् विदुरपञ्चमान् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! यह कहकर जब भीष्मजी चुप हो गये, तब राजा युधिष्ठिरने घर जाकर अपने चारों भाइयों तथा पाँचवें विदुरजीसे प्रश्न किया - ।
तब अर्थ की गति और तत्त्व को जानने वाले प्रतिभाशाली विदुरजी ने धर्मशास्त्र का स्मरण किया और सबसे पहले बोलना आरम्भ किया। विदुरजी बोले— ‘राजन्! बहुत-से शास्त्रों का अनुशीलन, तपस्या, त्याग, श्रद्धा, यज्ञकर्म, क्षमा, भावशुद्धि, दया, सत्य और संयम—ये सब आत्मा की सम्पत्ति हैं। युधिष्ठिर! तुम इन्हीं को प्राप्त करो। इनकी ओर से तुम्हारा मन विचलित नहीं होना चाहिए। धर्म और अर्थ की जड़ ये ही हैं। मेरे मत में ये ही परम पद हैं। धर्म से ही ऋषियों ने संसार-समुद्र को पार किया है, धर्म पर ही सम्पूर्ण लोक टिके हुए हैं और धर्म से ही देवताओं की उन्नति हुई है। राजन्! धर्म ही श्रेष्ठ गुण है, अर्थ को मध्यम बताया जाता है और काम सबकी अपेक्षा लघु है; ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं। अतः मन को वश में करके धर्म को अपना प्रधान ध्येय बनाना चाहिए।’
धर्मेणैवर्षयस्तीर्णा धर्मे लोकाः प्रतिष्ठिताः ।
धर्मेण देवा ववृधुर्धर्मे चार्थः समाहितः ॥
धर्मसे ही ऋषियोंने संसार- समुद्रको पार किया है । धर्मपर ही सम्पूर्ण लोक टिके हुए हैं । धर्मसे ही देवताओंकी उन्नति हुई है और धर्ममें ही अर्थकी भी स्थिति है ।
तदुपरान्त अर्जुन बोले— ‘राजन्! यह कर्म-भूमि है। यहाँ जीविका के साधनभूत कर्मों की ही प्रशंसा होती है। खेती, व्यापार, गोपालन तथा भाँति-भाँति के शिल्प—ये सब अर्थ प्राप्ति के साधन हैं। अर्थ ही समस्त कर्मों की मर्यादा के पालन में सहायक है; अर्थ के बिना धर्म और काम भी सिद्ध नहीं होते। धनवान मनुष्य धन के द्वारा उत्तम धर्म का पालन कर सकता है। श्रुतिका कथन है कि धर्म और काम अर्थ के ही दो अवयव हैं। अर्थ की सिद्धि से उन दोनों की भी सिद्धि हो जाएगी। जैसे सब प्राणी सदा ब्रह्माजी की उपासना करते हैं, उसी प्रकार उत्तम जाति के मनुष्य भी सदा धनवान पुरुष की उपासना किया करते हैं। यहाँ तक कि जटा और मृगचर्म धारण करने वाले नैष्ठिक ब्रह्मचारी भी अर्थ की अभिलाषा रखते हैं। वे जो स्वर्ग पाने की इच्छा रखते हैं या अपने वर्ण-आश्रम के धर्म का अनुष्ठान कर रहे हैं, वे भी धन की इच्छा रखते हैं। अर्थ की प्रधानता को न जानना तमोमय अज्ञान है। बुद्धिमानों में श्रेष्ठ महाराज! मुझे तो यही मत ठीक जँचता है।’
आस्तिका नास्तिकाश्चैव नियताः संयमे परे ।
अप्रज्ञानं तमोभूतं प्रज्ञानं तु प्रकाशिता ॥
दूसरे बहुत - से आस्तिक- नास्तिक संयम नियम- परायण पुरुष हैं जो अर्थके इच्छुक होते हैं । अर्थकी प्रधानताको न जानना तमोमय अज्ञान है । अर्थकी प्रधानताका ज्ञान प्रकाशमय है ।
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर माद्रीकुमार नकुल और सहदेव ने अपनी बात उपस्थित की। वे बोले— ‘धन अत्यन्त प्रिय और दुर्लभ वस्तु है। इसकी प्राप्ति हो जाने पर मनुष्य संसार में अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण कर सकता है। जो धन धर्म से युक्त हो और जो धर्म धन से सम्पन्न हो, वह निश्चितरूप से आपके लिये अमृत के समान होगा। निर्धन मनुष्य की कामना पूर्ण नहीं होती और धर्महीन मनुष्य को धन भी कैसे मिल सकता है? इसलिए मनुष्य पहले धर्माचरण करे और फिर धर्मयुक्त धन का सङ्ग्रह करे। इसके बाद दोनों की अनुकूलता रखते हुए कामका सेवन करे। इस प्रकार त्रिवर्ग का सङ्ग्रह करने से मनुष्य सफल मनोरथ हो जाता है।’
योऽर्थो धर्मेण संयुक्तो धर्मो यश्चार्थसंयुतः ।
तद्धि त्वामृतसंवादं तस्मादेतौ मताविह ॥
जो धन धर्मसे युक्त हो और जो धर्म धनसे सम्पन्न हो, वह निश्चितरूपसे आपके लिये अमृतके समान होगा, यह हम दोनोंका मत है ।
इतना कहकर नकुल और सहदेव चुप हो गये, तब भीमसेन ने बोलना आरम्भ किया। भीमसेन बोले— ‘धर्मराज! जिसके मन में कोई कामना नहीं है, उसे न तो धन कमाने की इच्छा होती है और न धर्म करने की ही। कामनाहीन पुरुष तो काम भी नहीं चाहता है; इसलिये त्रिवर्ग में काम ही सबसे बढ़कर है। किसी-न-किसी कामना से संयुक्त होकर ही ऋषि लोग तपस्या में मन लगाते हैं और फल, मूल व पत्ते चबाकर रहते हैं। कामना से ही लोग वेद-उपवेदों का स्वाध्याय करते तथा उसमें विद्वान् होते हैं। वहीं श्राद्धकर्म, यज्ञकर्म, दान और प्रतिग्रह में लोगों की प्रवृत्ति होती है। व्यापारी, किसान, ग्वाले, कारीगर और शिल्पी भी कामना से ही अपने-अपने कर्मों में लगे रहते हैं।’
नाकामः कामयत्यर्थं नाकामो धर्ममिच्छति ।
नाकामः कामयानोऽस्ति'तस्मात् कामो विशिष्यते ॥
भीमसेन बोले - धर्मराज! जिसके मनमें कोई कामना नहीं है, उसे न तो धन कमानेकी इच्छा होती है और न धर्म करनेकी ही । कामनाहीन पुरुष तो काम ( भोग ) भी नहीं चाहता है; इसलिये त्रिवर्गमें काम ही सबसे बढ़कर है ।
बुद्धिमान, सुहृद्, चन्दनसार से चर्चित तथा विचित्र मालाओं और आभूषणों से विभूषित भीमसेन अपने वीर बन्धुओं के समक्ष अपने विचार रखकर चुप हो गए। उन्होंने अत्यन्त दृढ़ता के साथ कहा था—"काम ही त्रिवर्ग का सार है क्योंकि बिना किसी कामना के कोई भी कार्य सम्भव नहीं होता। समस्त प्राणी कामना से युक्त हैं; ऐसा कोई प्राणी न कहीं है, न कभी था और न भविष्य में होगा। जैसे दही का सार माखन है, वैसे ही धर्म और अर्थ का सार काम है। जैसे वृक्ष के काष्ठ से श्रेष्ठ उसका फूल और फल है, वैसे ही धर्म और अर्थ से श्रेष्ठ काम है। बिना कामना के ब्राह्मण अच्छे अन्न का भोजन नहीं करते और न ही दान देते हैं। अतः राजन्! आप कामका को अवलम्बन करके सुन्दर वेषवाली और आभूषणों से विभूषित युवतियों के साथ विहार कीजिये; हम सबको काम को ही श्रेष्ठ मानना चाहिए। मैंने गहराई में पैठकर यह निश्चय किया है, मेरा यह वचन उत्तम और सारभूत है।"
सुचारुवेषाभिरलंकृताभि- र्मदोत्कटाभिः प्रियदर्शनाभिः ।
रमस्व योषाभिरुपेत्य कामं कामो हि राजन् परमो भवेन्नः ॥
अतः राजन्! आप कामका अवलम्बन करके सुन्दर वेषवाली, आभूषणोंसे विभूषित तथा देखनेमें मनोहर एवं मदमत्त युवतियोंके साथ विहार कीजिये । हमलोगोंको इस जगत्में कामको ही श्रेष्ठ मानना चाहिये ।
महात्माओं के मुख से धर्म का उपदेश सुनकर, उन धर्मात्माओं में श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर ने दो घड़ी तक अपने भाइयों के वचनों पर भली-भाँति विचार किया। फिर वे मन्द मुस्कान के साथ बोले—"बन्धुओ! इसमें सन्देह नहीं कि आप लोग धर्मशास्त्रों के सिद्धान्त पर विचार करके एक निश्चय पर पहुँच चुके हैं। आप सबको प्रमाणों का ज्ञान है। मैं सबके विचार जानना चाहता था, इसलिए मैंने आप सबका निश्चित सिद्धान्त ध्यान से सुना। अब आप मेरी बात को अनन्यचित्त होकर अवश्य सुनिये। जो मनुष्य न पाप में लगा हो, न पुण्य में, न अर्थोपार्जन में तत्पर हो और न धर्म या काम में; वह सब प्रकार के दोषों से रहित होकर सुख-दुःख देने वाली सिद्धियों से मुक्त हो जाता है। उस समय मिट्टी के ढेले और सोने में उसका समान भाव हो जाता है।"
यो वै न पापे निरतो न पुण्ये नार्थे न धर्मे मनुजो न कामे ।
विमुक्तदोषः समलोष्टकाञ्चनो विमुच्यते दुःखसुखार्थसिद्धेः ॥
जो न पापमें लगा हो और न पुण्यमें, न तो अर्थोपार्जनमें तत्पर हो न धर्ममें, न काममें ही । वह सब प्रकारके दोषोंसे रहित मनुष्य दुःख और सुखको देनेवाली सिद्धियोंसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है, उस समय मिट्टीके ढेले और सोनेमें उसका समान भाव हो जाता ।
युधिष्ठिर ने आगे कहा—"जो पूर्वजन्म की बातों को स्मरण करते हैं और वृद्धावस्था के विकारों से मुक्त हैं, वे मनुष्य सांसारिक दुःखों से पीड़ित होकर मोक्ष की प्रशंसा तो करते हैं, परन्तु हम उस मोक्ष के विषय में जानते ही नहीं। स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजी का कथन है कि जिसके मन में आसक्ति है, उसकी कभी मुक्ति नहीं होती। आसक्तिशून्य ज्ञानी मनुष्य ही मोक्ष को प्राप्त करते हैं; अतः मुमुक्षु पुरुष को चाहिए कि वह किसी का प्रिय अथवा अप्रिय न करे। इस प्रकार विचार करना ही मोक्ष का प्रधान उपाय है, स्वेच्छाचार नहीं। विधाता ने मुझे जिस कार्य में लगा दिया है, मैं उसे ही करता हूँ। विधाता सभी प्राणियों को विभिन्न कार्यों के लिए प्रेरित करता है; अतः आप सब जान लें कि विधाता ही प्रबल है।"
स्नेहेन युक्तस्य न चास्ति मुक्ति- रिति स्वयम्भूर्भगवानुवाच ।
बुधाश्च निर्वाणपरा भवन्ति तस्मान्न कुर्यात् प्रियमप्रियं च ॥
स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजीका कथन है कि जिसके मनमें आसक्ति है, उसकी कभी मुक्ति नहीं होती । आसक्तिशून्य ज्ञानी मनुष्य ही मोक्षको प्राप्त होते हैं; अतः मुमुक्षु पुरुषको चाहिये कि वह किसीका प्रिय अथवा अप्रिय न करे ।
वैशम्पायन जी कहते हैं—हे जनमेजय! राजा युधिष्ठिर की कही हुई बात बड़ी उत्तम, युक्तियुक्त और मन में बैठने वाली हुई। उसे पूर्ण रूप से समझकर वे सब भाई बड़े प्रसन्न हुए और हर्षनाद करने लगे। उन सभी ने कुुरुकुल के प्रमुख वीर युधिष्ठिर को अञ्जलि बाँधकर प्रणाम किया। युधिष्ठिर की वह वाणी अत्यन्त सुन्दर स्वर और व्यञ्जनों से विभूषित थी, जिसे सुनकर समस्त राजाओं ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। पराक्रमी धर्मपुत्र महामना युधिष्ठिर ने भी उन समस्त विश्वासपात्र नरेशों एवं बन्धुजनों की प्रशंसा की और पुनः उदारचेता गङ्गानन्दन भीष्म जी के पास जाकर उनसे उत्तम धर्म के विषय में प्रश्न किया।
ततस्तदग्र्यं वचनं मनोनुगं समस्तमाज्ञाय ततो हि हेतुमत् ।
तदा प्रणेदुश्च जहर्षिरे च ते कुरुप्रवीराय च चक्रिरेऽञ्जलिम् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा युधिष्ठिरकी कही हुई बात बड़ी उत्तम, युक्तियुक्त और मनमें बैठनेवाली हुई। उसे पूर्णरूपसे समझकर वे सब भाई बड़े प्रसन्न हो हर्षनाद करने लगे । उन सबने कुरुकुलके प्रमुख वीर युधिष्ठिरको अञ्जलि बाँधकर प्रणाम किया ।
In English
The Debate on Dharma, Artha, and Kama
Yudhisthira asks his brothers and Vidura which of the three goals—dharma (duty), artha (wealth), or kama (desire)—is supreme. Vidura, Arjuna, Nakula, Sahadeva, and Bhima each offer their perspectives before Yudhisthira provides his own conclusion.
This page answers
- What did vidura say about dharma and artha?
- Why did arjuna believe artha is most important?
- What was bhima's opinion on kama?
- What was yudhisthira's final answer to his brothers?
Also written: Shadjagita, Shadja, Yudhishthira, Vidura, Arjuna, Nakula, Sahadeva, Bhimasena, Bhishma, षड्जगीता