उञ्छवृत्त्युपाख्यान : परम सत्य की खोज हेतु कौन सा मार्ग सबसे श्रेष्ठ है?
उञ्छव्रत द्वारा आत्म-साक्षात्कार
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
शान्तिपर्व → मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 352–365 · पृष्ठ 2410–2447
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
धर्म और मोक्ष के साधनों पर चर्चा के समय
युधिष्ठिर ने पूछा— "पितामह! आपके बतलाये हुए कल्याणमय मोक्षसम्बन्धी धर्मोंका मैंने श्रवण किया। अब आप आश्रमधर्मों का पालन करनेवाले मनुष्योंके लिये जो सबसे उत्तम धर्म हो, उसका उपदेश करें।"
भीष्मजी ने कहा— "राजन्! सभी आश्रमोंमें स्वधर्मपालनका विधान है, सबमें स्वर्गका तथा महान सत्यफल - मोक्षका भी साधन है। धर्मके यज्ञ, दान, तप आदि बहुत- से द्वार हैं; अतः इस जगत्में धर्मकी कोई भी क्रिया निष्फल नहीं होती भरतश्रेष्ठ! जो - जो मनुष्य जिस -जिस विषय -स्वर्ग या मोक्षके लिये साधन करके उसमें सुनिश्चित सफलताको प्राप्त कर लेता है, उसी साधन या धर्मको वह श्रेष्ठ समझता है, दूसरेको नहीं। पुरुषसिंह! इस विषयमें मैं तुम्हें एक कथा सुना रहा हूँ, उसे सुनो। पूर्वकालमें महर्षि नारदने इन्द्रको यह कथा सुनाई थी।"
इमां च त्वं नरव्याघ्र श्रोतुमर्हसि मे कथाम् ।
पुरा शक्रस्य कथितां नारदेन महर्षिणा ॥
पुरुषसिंह! इस विषयमें मैं तुम्हें एक कथा सुना रहा हूँ, उसे सुनो । पूर्वकालमें महर्षि नारदने इन्द्रको यह कथा सुनायी थी ।
महर्षि नारद तीनों लोकोंद्वारा सम्मानित सिद्ध पुरुष हैं। वे वायु के समान सर्वत्र अबाधित गति से क्रमशः सभी लोकों में घूमते रहते हैं। एक समय वे देवराज इन्द्र के यहाँ पधारे। इन्द्र ने उन्हें अपने समीप ही बिठाकर उनका बड़ा आदर-सत्कार किया। जब नारदजी थोड़े देर बैठकर विश्राम कर चुके, तब शचीपति इन्द्र ने पूछा— "निष्पाप महर्षे! इधर आपने कोई आश्चर्यजनक घटना देखी है क्या? ब्रह्मर्षे! आप सिद्ध पुरुष हैं और कौतूहलवश चराचर प्राणियोंसे युक्त तीनों लोकोंमें सदा साक्षीकी भाँति विचरते रहते हैं। देवर्षे! जगत्में कोई भी ऐसी बात नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो। यदि आपने कोई अद्भुत बात देखी हो, सुनी हो अथवा अनुभव की हो तो वह मुझे बताइये।"
राजन्! उनके इस प्रकार पूछनेपर नारदजी ने अपने पास ही बैठे हुए सुरेन्द्र को एक विस्तृत कथा सुनाई— "गङ्गाके दक्षिणतटपर महापद्म नामक कोई श्रेष्ठ नगर है। वहाँ एक ब्राह्मण रहता था। वह एकाग्रचित्त और सौम्य स्वभावका मनुष्य था। उसका जन्म चन्द्रमाके कुलमें— अत्रिगोत्रमें हुआ था। वह सदा धर्मपरायण, क्रोधरहित, नित्य सन्तुष्ट, जितेन्द्रिय, तप और स्वाध्यायमें संलग्न, सत्यवादी और सत्पुरुषों के सम्मानका पात्र था। उसके कुलमें सगे-सम्बन्धियोंकी सङ्ख्या अधिक थी। जब उसके बहुत-से पुत्र हो गये, तब वह लौकिक कार्यसे विरक्त होकर महान् कर्ममें संलग्न हो गया और अपने कुलधर्मका आश्रय लेकर धर्माचरणमें ही तत्पर रहने लगा।"
स पुत्रान् बहुलान् दृष्ट्वा विपुले कर्मणि स्थितः ।
कुलधर्माश्रितो राजन् धर्मचर्यास्थितोऽभवत् ॥
राजन्! उसने देखा कि मेरे बहुत- से पुत्र हो गये, तब वह लौकिक कार्यसे विरक्त हो महान् कर्ममें संलग्न हो गया और अपने कुलधर्मका आश्रय ले धर्माचरणमें ही तत्पर रहने लगा ।
वह ब्राह्मण सदा सोचता था— 'क्या करनेसे मेरा कल्याण होगा? मेरा क्या कर्तव्य है तथा कौन मेरे लिये परम आश्रय है?' इस प्रकार वह सदा सोचते-सोचते खिन्न हो जाता था, परन्तु किसी निर्णयपर नहीं पहुँच पाता था। एक दिन जब वह इसी तरह सोच-विचार में पड़ा हुआ कष्ट पा रहा था, उसके यहाँ एक परम धर्मात्मा और एकाग्रचित्त ब्राह्मण अतिथिके रूप में आ पहुँचा।
तस्यैवं खिद्यमानस्य धर्मं परममास्थितः ।
कदाचिदतिथिः प्राप्तो ब्राह्मणः सुसमाहितः ॥
एक दिन जब वह इसी तरह सोच -विचार में पड़ा हुआ कष्ट पा रहा था, उसके यहाँ एक परम धर्मात्मा तथा एकाग्रचित्त ब्राह्मण अतिथिके रूपमें आ पहुँचा ।
उस ब्राह्मण ने उस अतिथि का शास्त्रोक्त विधि से आदर-सत्कार किया। जब वह सुखपूर्वक बैठकर विश्राम करने लगा, तब उसने कहा— "विप्रवर! मैं गृहस्थ-धर्मको अपने पुत्रों के अधीन करके सर्वश्रेष्ठ धर्मका पालन करना चाहता हूँ। ब्रह्मन्! बताइये, मेरे लिये कौन-सा मार्ग श्रेयस्कर होगा? कभी मेरी इच्छा होती है कि अकेला ही रहूँ और आत्माका आश्रय लेकर उसीमें स्थित हो जाऊँ? परन्तु इन तुच्छ विषयोंसे बँधा होनेके कारण वह इच्छा नष्ट हो जाती है। अब मैं ऐसा धर्ममय धन का सङ्ग्रह करना चाहता हूँ, जो परलोकके मार्गमें पाथेय का काम दे सके। मुझे इस संसारसागरसे पार जानेकी इच्छा हुई है, अतः मेरे मनमें यह जिज्ञासा हो रही है कि मुझे धर्ममयी नौका कहाँसे प्राप्त होगी?"
अस्मिन् हि लोकसम्भारे परं पारमभीप्सतः ।
उत्पन्ना मे मतिरियं कुतो धर्ममयः प्लवः ॥
मुझे इस संसारसागरसे पार जानेकी इच्छा हुई है, अतः मेरे मनमें यह जिज्ञासा हो रही है कि मुझे धर्ममयी नौका कहाँसे प्राप्त होगी?
उसने आगे कहा— "जब मैं देखता हूँ कि समस्त प्रजाके ऊपर यमराजकी ध्वजाएँ फहरा रही हैं, तब भोगकाल में भी भोगोंको पाने की रुचि मेरे मनमें नहीं होती। जब सन्न्यासियों को दूसरों के दरवाजों पर अन्न-वस्त्र की भीख माँगते देखता हूँ, तब उस सन्न्यास-धर्म में भी मेरा मन नहीं लगता; अतः अतिथिदेव! आप अपनी ही बुद्धिके बलसे अब मुझे धर्मद्वारा धर्ममें लगाइये।"
विद्वान् अतिथिने मधुर वाणी में कहा— "विप्रवर! मेरा भी ऐसा ही मनोरथ है। मैं भी आपकी ही भाँति श्रेष्ठ धर्मका आश्रय लेना चाहता हूँ, परन्तु मुझे भी इस विषयमें मोह ही बना हुआ है। स्वर्गके अनेक द्वार हैं, अतः किसका आश्रय लिया जाय? इसका निश्चय मैं भी नहीं कर पाता हूँ। कोई द्विज मोक्षकी प्रशंसा करते हैं तो कोई यज्ञफलकी। कोई वानप्रस्थ-धर्मका आश्रय लेते हैं तो कोई गार्हस्थ्य-धर्मका। कुछ लोग माता-पिताकी सेवा करके ही स्वर्गमें चले गये। कितने ही मनुष्य उञ्छवृत्तिके द्वारा सिद्धि प्राप्त करके स्वर्गगामी हुए हैं। इस प्रकार लोकमें धर्मके विविध दरवाजे खुले हुए हैं, जिनसे मेरी बुद्धि भी उसी प्रकार उद्विग्न एवं चञ्चल हो उठी है, जैसे वायुसे मेघोंकी घटा।"
एवं बहुविधैर्लोकैर्धर्मद्वारैरनावृतैः ।
ममापि मतिराविग्ना मेघलेखेव वायुना ॥
इस प्रकार लोकमें धर्मके विविध एवं बहुत- से दरवाजे खुले हुए हैं, उनसे मेरी बुद्धि भी उसी प्रकार उद्विग्न एवं चंचल हो उठी है, जैसे वायुसे मेघोंकी घटा ।
अतिथिने कहा— "द्विजश्रेष्ठ! पूर्वकल्पमें जहाँ प्रजापतिने धर्मचक्र प्रवर्तित किया था, उस नैमिषारण्य में गोमतीके तटपर नागपुर नामक एक नगर है। वहाँ एक महान धर्मात्मा सर्प निवास करता है, जिसका नाम पद्मनाभ है। वह पद्म मन, वाणी और क्रियाद्वारा कर्म, उपासना और ज्ञान-इन तीनों मार्गोंका आश्रय लेकर रहता है। वह यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला, दानियोंका शिरोमणि, क्षमाशील, श्रेष्ठ सदाचार में संलग्न, सत्यवादी और जितेन्द्रिय है। वह उत्कृष्ट कर्तव्य और अकर्तव्यको जानता है। तुम उसीके पास जाकर विधिपूर्वक अपना मनोवाञ्छित प्रश्न पूछो; वह तुम्हें परम उत्तम धर्मका दर्शन करायेगा। वह नाग बड़ा बुद्धिमान् और शास्त्रोंका पण्डित है।"
स हि सर्वातिथिर्नागो बुद्धिशास्त्रविशारदः ।
गुणैरनुपमैर्युक्तः समस्तैराभिकामिकैः ॥
वह नाग बड़ा बुद्धिमान् और शास्त्रोंका पण्डित है । सबका अतिथि सत्कार करता है । समस्त अनुपम तथा वाञ्छनीय सद्गुणोंसे सम्पन्न है ।
भीष्म पितामह कहते हैं— हे राजन्! उस अतिथि ने ब्राह्मण के चरणों में शीश नवाकर कहा— "अतिथिदेव! मुझपर बड़ा भारी बोझ सा लदा हुआ था, उसे आज आपने उतार दिया। आपकी यह बात दूसरों को पूर्ण सान्त्वना प्रदान करने वाली है।"
अतिभारोऽद्य तस्यैव भारावतरणं महत् ।
पराश्वासकरं वाक्यमिदं मे भवतः श्रुतम् ॥
ब्राह्मणने कहा — अतिथिदेव! मुझपर बड़ा भारी बोझ सा लदा हुआ था, उसे आज आपने उतार दिया । यह बहुत बड़ा कार्य हो गया । आपकी यह बात जो मैंने सुनी है, दूसरोंको पूर्ण सान्त्वना प्रदान करनेवाली है ।
उस ब्राह्मण की आँखों में कृतज्ञता के आँसू थे। उसने भावुक होकर कहा— "राह चलने से थके हुए बटोही को शय्या मिले, खड़े-खड़े जिसके पैर दुख रहे हों, उसे बैठने का आसन मिल जाए; प्यासे को पानी और भूख से पीड़ित मनुष्य को भोजन मिल जाए— इससे जितना सन्तोष होता है, उतनी ही प्रसन्नता मुझे आपकी यह बात सुनकर हो रही है। भोजन के समय मनोवाञ्छित अन्न की प्राप्ति होना, अतिथि को समय पर अभीष्ट वस्तु मिलना, वृद्ध को पुत्र की प्राप्ति होना और मन में जिसका चिन्तन हो रहा हो, उसी प्रेमी मित्र का दर्शन होना— आज आपने जो कहा है, वह मुझे उतना ही आनन्द दे रहा है।"
ब्राह्मण ने आगे कहा— "विद्वन्! आपने मुझे जो उपदेश दिया, उसने तो जैसे अन्धे को आँख दे दी। मैं आपके इन ज्ञानमय वचनों को सुनकर आकाश की ओर देखता हूँ और अपने कर्तव्य का विचार करता हूँ। आप जैसी सलाह दे रहे हैं, मैं वैसा ही करूँगा।"
दत्तचक्षुरिवाकाशे पश्यामि विमृशामि च ।
प्रज्ञानवचनाद्योऽयमुपदेशो हि मे कृतः ॥
आपने मुझे यह उपदेश क्या दिया, अन्धेको आँख दे दी । आपके इस ज्ञानमय वचनको सुनकर मैं आकाशकी ओर देखता और कर्तव्यका विचार करता हूँ ।
तभी आकाश में सूर्य अस्ताचल की ओर झुकने लगे थे। ब्राह्मण ने अतिथि की ओर देखा और कहा— "साधो! वे भगवान् सूर्य अब अस्ताचल की ओर जा रहे हैं; उनकी किरणें मन्द हो गई हैं। अतः आप इस रात में मेरे साथ यहीं रहिये, सुखपूर्वक विश्राम करके अपनी थकावट दूर कीजिये और सुबह अपने अभीष्ट स्थान को चले जाइयेगा।"
भीष्म कहते हैं— हे शत्रुसूदन! तदनन्तर वह अतिथि उस ब्राह्मण का आतिथ्य ग्रहण करके पूरी रात उसी के पास रहा। दोनों मोक्षधर्म के विषय में बातें करते हुए, वह पूरी रात दिन के समान ही सुखी रहे।
ततस्तेन कृतातिथ्यः सोऽतिथिः शत्रुसूदन ।
उवास किल तां रात्रिं सह तेन द्विजेन वै ॥
भीष्मजी कहते हैं – शत्रुसूदन! तदनन्तर वह अतिथि उस ब्राह्मणका आतिथ्य ग्रहण करके रातभर वहीं उस ब्राह्मणके साथ रहा ।
जब भोर हुई, तो ब्राह्मण ने अपने अतिथि को यथाशक्ति सम्मानित किया और वह अतिथि अपने कार्य की सिद्धि की इच्छा लेकर वहाँ से चला गया। उस धर्मात्मा ब्राह्मण ने अब अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का दृढ़ निश्चय कर लिया था। उसने अपने स्वजनों से अनुमति ली और अतिथि द्वारा बताए गए मार्ग पर चलते हुए नागराज के घर की ओर प्रस्थान किया।
ततः स विप्रः कृतकर्मनिश्चयः कृताभ्यनुज्ञः स्वजनेन धर्मकृत् ।
यथोपदिष्टं भुजगेन्द्रसंश्रयं जगाम काले सुकृतैकनिश्चयः ॥
तत्पश्चात् वह धर्मात्मा ब्राह्मण अपने अभीष्ट कार्यको पूर्ण करनेका निश्चय करके स्वजनोंकी अनुमति ले अतिथिके बताये अनुसार यथासमय नागराजके घरकी ओर चल दिया । उसने अपने शुभ कार्यको सिद्ध करनेका एक दृढ़ निश्चय कर लिया था ।
वह ब्राह्मण अनेक विचित्र वनों, तीर्थों और सरोवरों को लाँघता हुआ आगे बढ़ता रहा। अन्ततः वह एक मुनि के आश्रम में पहुँचा। वहाँ उसने उस मुनि से पूछा कि जिस नागराज की बात उसे बताई गई है, वे कहाँ हैं? मुनि ने जो कुछ बताया, उसे सुनकर वह ब्राह्मण पुनः अपनी यात्रा पर निकल पड़ा।
अपने उद्देश्य को ठीक-ठीक समझते हुए, वह ब्राह्मण विधिपूर्वक यात्रा करके नागराज के घर के द्वार पर जा पहुँचा। वहाँ पहुँचकर उसने 'भोः' शब्द से युक्त वचनों के साथ पुकार लगाई— "कोई है? मैं यहाँ द्वार पर आया हूँ!"
सोऽभिगम्य यथान्यायं नागायतनमर्थवित् ।
प्रोक्तवानहमस्मीति भोःशब्दालंकृतं वचः ॥
अपने उद्देश्यको ठीक- ठीक समझनेवाला वह ब्राह्मण विधिपूर्वक यात्रा करके नागके घरपर जा पहुँचा । घरके द्वारपर पहुँचकर उसने ' भोः' शब्दसे विभूषित वचन बोलते हुए पुकार लगायी —‘कोई है? मैं यहाँ द्वारपर आया हूँ'
उसकी आवाज़ सुनकर धर्म के प्रति अनुराग रखने वाली नागराज की परम सुन्दरी और पतिव्रता पत्नी ने उसे दर्शन दिए। उस धर्मपरायणा सती ने ब्राह्मण का विधिपूर्वक पूजन किया और स्वागत करते हुए पूछा— "ब्राह्मणदेव! आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?"
सा तस्मै विधिवत् पूजां चक्रे धर्मपरायणा ।
स्वागतेनागतं कृत्वा किं करोमीति चाब्रवीत् ॥
उस धर्मपरायणा सतीने ब्राह्मणका विधिपूर्वक पूजन किया और स्वागत करते हुए कहा— ' ब्राह्मणदेव! आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? '
ब्राह्मण ने शान्त स्वर में कहा— "देवि! आपने मधुर वाणी से मेरा स्वागत और पूजन किया है, जिससे मेरी सारी थकावट दूर हो गई। अब मैं परम उत्तम नागदेव का दर्शन करना चाहता हूँ। यही मेरा सबसे बड़ा कार्य और महान मनोरथ है, जिसके लिए मैं आज इस आश्रम पर आया हूँ।"
नागपत्नी ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया— "विप्रवर! मेरे माननीय पतिदेव सूर्यदेव का रथ ढोने के लिए गए हुए हैं। वर्ष में एक बार उन्हें यह कार्य करना पड़ता है। पन्द्रह दिनों में वे यहाँ दर्शन देंगे, इसमें कोई संशय नहीं है। उनके प्रवास का कारण तो आपको ज्ञात है ही; पर आप मुझे बताइए कि उनके दर्शन के सिवा आपका क्या काम है? ताकि मैं उसे पूरा कर सकूँ।"
ब्राह्मण ने कहा— "सती! मैं उनके दर्शन करने के निश्चय के साथ ही आया हूँ, अतः मैं उनके आगमन की प्रतीक्षा करते हुए इस महान वन में निवास करूँगा। जब नागराज यहाँ आ जाएँ, तब उन्हें शान्ति भाव से बता देना कि मैं यहाँ आया हूँ। तुम उन्हें इस तरह कहना कि वे स्वयं मेरे निकट आकर मुझे दर्शन दें। मैं गोमती के सुन्दर तट पर परिमित आहार करके तुम्हारे बताए समय की प्रतीक्षा करूँगा।"
इसके बाद वह श्रेष्ठ ब्राह्मण नागपत्नी को विदा कर गोमती नदी के तट पर चला गया।
भीष्म कहते हैं— हे नरश्रेष्ठ! तदनन्तर गोमती के तट पर रहता हुआ वह ब्राह्मण निराहार रहकर तपस्या करने लगा। जब उसने भोजन करना छोड़ दिया, तो वहाँ रहने वाले नागों को बड़ा दुःख हुआ। नागराज के भाई-बन्धु और स्त्री-पुत्र सब मिलकर उस ब्राह्मण के पास पहुँचे।
सर्वे सम्भूय सहिता ह्यस्य नागस्य बान्धवाः ।
भ्रातरस्तनया भार्या ययुस्तं ब्राह्मणं प्रति ॥
तब नागराजके भाई- बन्धु, स्त्री- पुत्र सब मिलकर उस ब्राह्मणके पास गये ।
उन्होंने देखा कि वह ब्राह्मण गोमती के किनारे एक एकान्त प्रदेश में, व्रत और नियम के पालन में तत्पर होकर निराहार बैठा है और मन्त्रों का जप कर रहा है। अतिथि-सत्कार के लिए प्रसिद्ध नागराज के सभी परिजन ब्राह्मण के पास गए और उसकी पूजा करके संशय रहित वाणी में बोले—
त्यक्ताहारेण भवता वने निवसता त्वया ।
बालवृद्धमिदं सर्वं पीड्यते धर्मसंकटात् ॥
‘इस वनमें रहकर आपने भोजन छोड़ दिया है । इससे हमारे धर्ममें बाधा आती है । बालकसे लेकर वृद्धतक हम सब लोगोंको इस बातसे बड़ा कष्ट हो रहा है ।
"धर्मवत्सल तपोधन! आपको यहाँ आए आज छः दिन हो गए, किन्तु अभी तक आपने हमें भोजन की आज्ञा नहीं दी। आप हमारे घर अतिथि बनकर आए हैं और हम आपकी सेवा हेतु उपस्थित हैं; आपका आतिथ्य करना हमारा कर्तव्य है क्योंकि हम सब गृहस्थ हैं। द्विजश्रेष्ठ! आप इस वन में रहकर भोजन छोड़ चुके हैं, जिससे हमारे धर्म में बाधा आती है। बालक से लेकर वृद्ध तक, हम सबको इससे बड़ा कष्ट हो रहा है। हमारे कुल में ऐसा कोई नहीं जिसने कभी भ्रूणहत्या की हो, जिसकी सन्तान पैदा होकर मर गई हो, जिसने मिथ्या भाषण किया हो या जो देवताओं और अतिथियों को भोजन देने से पहले स्वयं खा लेता हो।"
देवतानां महाभाग धर्मचर्या न हीयते ।
अतिथीनां च सत्कारे नित्ययुक्तास्म्यतन्द्रिता ॥
महाभाग! देवताओंकी आराधनारूप धर्मचर्यामें कोई कमी नहीं आयी है, अतिथियोंके सत्कारमें भी मैं सदा आलस्य छोड़कर लगी रही हूँ ।
ब्राह्मण ने उनकी बातें सुनकर कहा— "नागगण! आप लोगों के इस उपदेश से ही मैं तृप्त हो गया। आप समझें कि मैंने आहार प्राप्त कर लिया है। नागराज के आने में केवल आठ रातें बाकी हैं। यदि आठ रात बीत जाने पर भी वे नहीं आए, तब मैं भोजन कर लूँगा। उनके आगमन के लिए ही मैंने यह व्रत लिया है। आप लोग सन्ताप न करें और जैसे आए हैं, वैसे ही घर लौट जाएँ।"
ब्राह्मण के इस आदेश को सुनकर वे नाग अपने प्रयत्न में असफल होकर घर लौट गए।
भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से कहा— हे राजन! जब नागराज मन ही मन उस ब्राह्मण के कार्य का विचार करते हुए उसके समीप पहुँचे, तब उन्होंने गोमती के एकान्त तट पर उस तपस्वी को देखा। बुद्धिमान नागेन्द्र, जो स्वभाव से धर्मानुरागी थे, अत्यन्त मधुर वाणी में बोले— "हे ब्राह्मणदेव! आप मेरे अपराधों को क्षमा करें। मुझ पर रोष न करें। मैं आपसे पूछता हूँ कि आप यहाँ किसके लिए आए हैं? आपका क्या प्रयोजन है? ब्रह्मन्! मैं आपके सामने आकर प्रेमपूर्वक पूछता हूँ कि गोमती के इस एकान्त तट पर आप किसकी उपासना करते हैं?"
अथ ब्राह्मणरूपेण कं तं समनुपश्यसि ।
मानुषं केवलं विप्रं देवं वाथ शुचिस्मिते ॥
नागने पूछा- पवित्र मुसकानवाली देवि! ब्राह्मणरूपमें तुमने किसका दर्शन किया है? वे ब्राह्मण कोई मनुष्य हैं या देवता?
उस ब्राह्मण ने शान्त भाव से उत्तर दिया— "द्विजश्रेष्ठ! आपको विदित हो कि मेरा नाम धर्मारण्य है। मैं नागराज पद्मनाभ का दर्शन करने के लिए यहाँ आया हूँ। उन्हीं से मुझे कुछ कार्य है। उनके स्वजनों से मैंने सुना है कि वे यहाँ से दूर गए हुए हैं, अतः जैसे किसान वर्षा की राह देखता है, उसी प्रकार मैं भी उनकी बाट जोह रहा हूँ। उन्हें कोई क्लेश न हो और वे सकुशल घर लौटकर आ जाएँ, इसके लिए मैं नीरोग एवं योगयुक्त होकर वेदों का पारायण कर रहा हूँ।"
नागराज ने प्रसन्न होकर कहा— "महाभाग! आपका आचरण बड़ा ही कल्याणमय है। आप बड़े ही साधु हैं और सज्जनों पर स्नेह रखते हैं। आप किसी भी दृष्टि से निन्दनीय नहीं हैं, क्योंकि दूसरों को स्नेहदृष्टि से देखते हैं। ब्रह्मर्षे! मैं ही वह नाग हूँ, जिससे आप मिलना चाहते हैं। आप मुझे जैसा जानते हैं, मैं वैसा ही हूँ। इच्छानुसार आज्ञा दीजिए, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? अपने स्वजन—मेरी पत्नी—से मैंने आपके आगमन का समाचार सुना है; इसलिए स्वयं ही आपका दर्शन करने के लिए चला आया हूँ।"
को हि मां मानुषः शक्तो द्रष्टुकामो यशस्विनि ।
संदर्शनरुचिर्वाक्यमाज्ञापूर्वं वदिष्यति ॥
यशस्विनि! भला, कौन मनुष्य मुझे देखनेकी इच्छा कर सकता है और यदि दर्शनकी इच्छा करे भी तो कौन इस तरह मुझे आज्ञा देकर बुला सकता है?
नागराज के शब्दों ने ब्राह्मण को कृतार्थ कर दिया। ब्राह्मण ने कहा— "द्विजश्रेष्ठ! जब आप यहाँ तक आ गए हैं, तब अब कृतार्थ होकर ही यहाँ से लौटेंगे; अतः बेखटके मुझे अपने अभीष्ट कार्य के साधन में लगाइये। आपने हम सब लोगों को विशेष रूप से अपने गुणों से खरीद लिया है; क्योंकि आप अपने हित की बात को अलग रखकर मेरे ही कल्याण का चिन्तन कर रहे हैं।"
वयं हि भवता सर्वे गुणक्रीता विशेषतः ।
यस्त्वमात्महितं त्यक्त्वा मामेवेहानुरुध्यसे ॥
आपने हम सब लोगोंको विशेषरूपसे अपने गुणोंसे खरीद लिया है; क्योंकि आप अपने हितकी बातको अलग रखकर मेरे ही कल्याणका चिन्तन कर रहे हैं ।
ब्राह्मण ने आगे कहा— "महाभाग नागराज! मैं आप ही के दर्शन की लालसा से यहाँ आया हूँ। आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, जिसे मैं स्वयं नहीं जानता। मैं विषयों से निवृत्त होकर अपने आप में ही स्थित रहकर जीवात्माओं की परमगति स्वरूप परब्रह्म परमात्मा की खोज कर रहा हूँ, तो भी महान बुद्धियुक्त गृह में आसक्त हुए इस चञ्चल चित्त की उपासना करता हूँ। आप चन्द्रमा की किरणों की भाँति सुखद स्पर्श वाले और स्वतः प्रकाशित होने वाली सुयश रूपी किरणों से युक्त अपने मनोरम गुणों से ही प्रकाशमान हैं। पवनाशन! इस समय मेरे मन में एक नया प्रश्न उठा है। पहले इसका समाधान कीजिये, उसके बाद मैं आपसे अपना कार्य निवेदन करूँगा और आप उसे ध्यान से सुनियेगा।"
गोमती तट की नीरवता के बीच, जब ब्राह्मण ने नागराज से प्रश्न किया, तो वातावरण में एक जिज्ञासा व्याप्त हो गई। ब्राह्मण ने अत्यन्त विनयपूर्वक कहा— "नागराज! आप सूर्य के एक पहिये के रथ को खींचने के लिए बारी-बारी से जाया करते हैं। यदि वहाँ आपने कोई आश्चर्यजनक बात देखी हो, तो उसकी कृपा करके मुझे बताइए।"
विवस्वतो गच्छति पर्ययेण वोढुं भवांस्तं रथमेकचक्रम् ।
आश्चर्यभूतं यदि तत्र किंचिद् दृष्टं त्वया शंसितुमर्हसि त्वम् ॥
ब्राह्मणने कहा – नागराज! आप सूर्यके एक पहियेके रथको खींचनेके लिये बारी-बारीसे जाया करते हैं । यदि वहाँ कोई आश्चर्यजनक बात आपने देखी हो तो उसे बतानेकी कृपा करें ।
नागराज ने अपनी दृष्टि विस्तृत की और गम्भीर स्वर में उत्तर दिया— "ब्रह्मन्! भगवान् सूर्य तो अनेकों आश्चर्यों के स्थान हैं। जैसे वृक्ष की शाखाओं पर अनेक पक्षी बसेरा करते हैं, वैसे ही सूर्यदेव की सहस्रों किरणों का आश्रय लेकर देवता, सिद्ध और मुनि निवास करते हैं। महान वायुदेव भी सूर्यमण्डल से निकलकर उनकी किरणों का आश्रय लेते हुए समूचे आकाश में फैल जाते हैं। प्रजा के हित के लिए भगवान् सूर्य उस वायु को अनेक भागों में विभक्त करके वर्षा-ऋतु में जो जल की वृष्टि करते हैं, उससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा? वह शुक्र नामक काला मेघ, जो आकाश में वर्षा के समय जल उत्पन्न करता है, वास्तव में इस सूर्य का ही स्वरूप है। और देखिए, सूर्यदेव बरसात में पृथ्वी पर जो पानी बरसाते हैं, उसे अपनी विशुद्ध किरणों द्वारा आठ महीने में पुनः खींच लेते हैं। इससे बढ़कर आश्चर्य की बात और क्या होगी?"
नागराज ने थोड़ा ठहराव लिया और फिर अत्यन्त विस्मय के साथ कहा— "किन्तु इन सब आश्चर्यों में भी एक परम आश्चर्य मैंने सूर्य के सहारे निर्मल आकाश में अपनी आँखों से देखा है। सुनिए! एक दिन मध्याह्नकाल में जब भगवान् भास्कर सम्पूर्ण लोकों को तपा रहे थे, तब दूसरे सूर्य के समान एक तेजस्वी पुरुष दिखाई दिया। वह घी की आहुति से प्रज्वलित अग्नि के समान अपनी तेजोमयी किरणों से समस्त ज्योति-मण्डल को व्याप्त कर रहा था। जैसे ही वह निकट आया, भगवान् सूर्य ने उसके स्वागत के लिए अपनी दोनों भुजाएँ बढ़ा दीं और उसने भी सम्मान में अपना दाहिना हाथ उनकी ओर बढ़ा दिया। तत्पश्चात् वह आकाश को भेदकर सूर्य की किरणों के समूह में समा गया और एक ही क्षण में तेजोराश के साथ एकाकार होकर सूर्यस्वरूप हो गया। उस समय हम सबके मन में सन्देह हुआ कि असली सूर्य कौन है— जो रथ पर बैठा था या जो अभी पधारे थे?"
तत्र नः संशयो जातस्तयोस्तेजः समागमे ।
अनयोः को भवेत् सूर्यो रथस्थो योऽयमागतः ॥
उस समय उन दोनों तेजोंके मिल जानेपर हमलोगोंके मनमें यह संदेह हुआ कि इन दोनोंमें असली सूर्य कौन थे? जो उस रथपर बैठे हुए थे वे, अथवा जो अभी पधारे थे वे?
नागराज ने अपनी बात पूर्ण करते हुए कहा— "विप्रवर! उन दोनों तेजों के मिल जाने पर मुझे ज्ञात हुआ कि वह कोई अग्नि, असुर या नाग नहीं थे। वे उञ्छवृत्ति से जीवन निर्वाह करने वाले एक मुनि थे, जो दिव्य धाम में पहुँच गए हैं। वे ब्राह्मण केवल फल-मूल, सूखे पत्ते या जल-हवा पीकर एकाग्रचित्त होकर ध्यानमग्न रहते थे। उन्होंने संहिता के मन्त्रों द्वारा भगवान् शङ्कर का स्तवन किया और स्वर्गलोक पाने की साधना की। ऐसे लोग, जो असङ्ग रहकर लौकिक कामनाओं का त्याग कर देते हैं और सदा उञ्छ एवं शिलवृत्ति से प्राप्त अन्न को ही खाते हैं, उन्हें उत्तम गति प्राप्त होती है। वह मुनि अब सूर्य के साथ रहकर समूची पृथ्वी की परिक्रमा करता है।"
यह अद्भुत वृत्तान्त सुनकर ब्राह्मण का मन प्रसन्नता से भर गया। उसने कहा— "नागराज! इसमें सन्देह नहीं कि यह एक आश्चर्यजनक वृत्तान्त है। इसे सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। मेरे मन में जो अभिलाषा थी, उसके अनुकूल वचन कहकर आपने मुझे सही रास्ता दिखा दिया है। आपका कल्याण हो! अब मैं यहाँ से चला जाऊँगा। यदि आपको मुझे कहीं भेजना हो या कोई कार्य हो, तो मेरा स्मरण अवश्य कीजिएगा।"
नागराज ने उसे जाते देख कहा— "विप्रवर! आपने अभी अपने मन की बात तो बताई ही नहीं, फिर आप कहाँ चले जा रहे हैं? जब तक आपका कार्य सम्पन्न न हो जाए, तब तक मुझसे पूछकर ही अपने घर जाइएगा। आपमें मैं हूँ और मुझमें आप हैं, इस समस्त लोक में आपको किस बात की चिन्ता है?"
त्वयि चाहं द्विजश्रेष्ठ भवान् मयि न संशयः ।
लोकोऽयं भवतः सर्वः का चिन्ता मयि तेऽनघ ॥
विप्रवर! आपमें मैं हूँ और मुझमें आप हैं, इसमें संशय नहीं है । निष्पाप ब्राह्मण! यह समस्त लोक आपका ही है । मेरे रहते हुए आपको किस बातकी चिन्ता है?
ब्राह्मण ने उत्तर दिया— "महाप्राज्ञ नागराज! आपने सत्य कहा। मुझे पुण्य-सङ्ग्रह के विषय में संशय था कि कौन सा साधन अपनाऊँ, किन्तु अब सन्देह दूर हो गया है। मैं अपने अभीष्ट अर्थ की सिद्धि के लिए 'उञ्छव्रत' का ही आचरण करूँगा। मैं कृतार्थ हुआ, अब मैं जाने की आज्ञा चाहता हूँ।"
आसीत् तु मे भोगपते संशयः पुण्यसंचये ।
सोऽहमुञ्छव्रतं साधो चरिष्याम्यर्थसाधनम् ॥
नागराज! मुझे पुण्यसंग्रहके विषयमें संशय हो गया था । मैं यह निश्चय नहीं कर पाता था कि किस साधनको अपनाऊँ? किंतु अब वह संदेह दूर हो गया है । साधो! अब मैं अपने अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये उञ्छव्रतका ही आचरण करूँगा ।
भीष्म कहते हैं— युधिष्ठिर! नागराज की अनुमति लेकर वह दृढ़ निश्चय वाला ब्राह्मण उञ्छव्रत की दीक्षा लेने के लिए भृगुवंशी च्यवन ऋषि के पास गया। च्यवन मुनि ने उसे दीक्षा देकर धर्म का आश्रय दिया। इसके पश्चात वह ब्राह्मण दूसरे वन में जाकर उञ्छ-शिलवृत्ति से प्राप्त परिमित अन्न का भोजन करते हुए, यम-नियम का पालन करने लगा। यह पवित्र कथा च्यवन मुनि ने राजा जनक के दरबार में नारदजी को सुनाई, और नारदजी ने इसे देवराज इन्द्र को बताया। इस प्रकार यह कथा संसार में व्याप्त हुई।
स तेन कृतसंस्कारो धर्ममेवाधितस्थिवान् ।
तथैव च कथामेतां राजन् कथितवांस्तदा ॥
उन्होंने उसका दीक्षा - संस्कार सम्पन्न किया और वह धर्मका ही आश्रय लेकर रहने लगा । राजन्! उसने उञ्छवृत्तिकी महिमासे सम्बन्ध रखनेवाली इस कथाको च्यवन मुनिसे भी कहा ।
In English
The Brahmin and the Serpent Padmanabha
A righteous Brahmin seeks guidance on how to achieve salvation and meets a wise guest. The guest tells him to visit a great serpent named Padmanabha in Nagpur, leading the Brahmin to wait by the Gomati river for the serpent's return.
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Also written: Unchhavrittyupakhyana, Unchhavrittya, Indra, Bhishma, Nagapatni, Nagaraja, Suryadeva, उञ्छवृत्त्युपाख्यान