श्रीगणेशाय नमः।

उष्ट्रग्रीवोपाख्यान : राजा को किस प्रकार के कार्यों से सुख और विजय प्राप्त होती है?

बुद्धिबल और इन्द्रिय संयम

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 112 · पृष्ठ 750–754

591 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 5 श्लोक

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा

राजधर्म और राजा के कर्तव्य पर चर्चा के समय

युधिष्ठिर ने पूछा— "समस्त धर्मात्माओं में श्रेष्ठ पितामह! राजा को क्या करना चाहिए? क्या करने से वह सुखी हो सकता है? यह मुझे यथार्थ रूप से बताइये।"

युधिष्ठिर उवाच

किं पार्थिवेन कर्तव्यं किं च कृत्वा सुखी भवेत् ।
एतदाचक्ष्व तत्त्वेन सर्वधर्मभृतां वर ॥

युधिष्ठिरने पूछा – समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पितामह! राजाको क्या करना चाहिये? क्या करनेसे वह सुखी हो सकता है? यह मुझे यथार्थरूपसे बताइये?

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 112 · श्लोक 1पृष्ठ 751

भीष्मजी बोले— "नरेश्वर! राजा का जो कर्तव्य है और जो कुछ करके वह सुखी हो सकता है, उस कार्य का निश्चय करके अब मैं तुम्हें बतलाता हूँ, उसे सुनो। युधिष्ठिर! हमने एक ऊँट का जो महान वृत्तान्त सुन रखा है, उसे तुम सुनो। राजा को वैसा बर्ताव नहीं करना चाहिए।"

भीष्म उवाच

न चैवं वर्तितव्यं स्म यथेदमनुशुश्रुम ।
उष्ट्रस्य तु महद् वृत्तं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥

युधिष्ठिर! हमने एक ऊँटका जो महान् वृत्तान्त सुन रखा है, उसे तुम सुनो । राजाको वैसा बर्ताव नहीं करना चाहिये ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 112 · श्लोक 3पृष्ठ 751

प्राजापत्य युग में एक महान ऊँट था। उसे अपने पूर्वजन्म की बातों का स्मरण था। उसने कठोर व्रत के पालन का नियम लेकर वन में बड़ी भारी तपस्या आरम्भ कर दी। उस तपस्या के अन्त में पितामह भगवान ब्रह्मा बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने उससे वर माँगने के लिये कहा।

ऊँट बोला— "भगवन्! आपकी कृपा से मेरी यह गर्दन बहुत बड़ी हो जाय, जिससे जब मैं चरने के लिये जाऊँ तो सौ योजन से अधिक दूर तक की खाद्य वस्तुएँ ग्रहण कर सकूँ।"

वरदायक महात्मा ब्रह्माजी ने 'एवमस्तु' कहकर उसे मुँह माँगा वर दे दिया। वह उत्तम वर पाकर ऊँट अपने वन में चला गया। किन्तु वह खोटी बुद्धि वाला ऊँट वरदान पाकर कहीं आने-जाने में आलस्य करने लगा। वह दुरात्मा काल से मोहित होकर चरने के लिये कहीं जाना ही नहीं चाहता था।

स चकार तदाऽऽलस्यं वरदानात् सुदुर्मतिः ।
न चैच्छच्चरितुं गन्तुं दुरात्मा कालमोहितः ॥

उस खोटी बुद्धिवाले ऊँटने वरदान पाकर कहीं आने -जानेमें आलस्य कर लिया । वह दुरात्मा कालसे मोहित होकर चरनेके लिये कहीं जाना ही नहीं चाहता था ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 112 · श्लोक 8पृष्ठ 752

एक समय की बात है, वह अपनी सौ योजन लम्बी गर्दन फैलाकर चर रहा था और उसका मन चरने से कभी थकता ही नहीं था। इतने में ही बड़े जोर से हवा चलने लगी। वह पशु किसी गुफा में अपनी गर्दन डालकर चर रहा था, तभी सारे जगत् को जल से आप्लावित करती हुई बड़ी भारी वर्षा होने लगी।

वर्षा आरम्भ होने पर भूख और थकावट से कष्ट पाता हुआ एक गीदड़ अपनी स्त्री के साथ शीघ्र ही उस गुफा में आ घुसा। वह जल से पीड़ित था और सर्दी से उसके सारे अङ्ग अकड़ गये थे। वह मांसजीवी गीदड़ अत्यन्त भूख के कारण कष्ट पा रहा था, अतः उसने ऊँट की गर्दन का मांस काट-काटकर खाना आरम्भ कर दिया।

जब उस पशु को यह मालूम हुआ कि उसकी गर्दन खायी जा रही है, तब वह अत्यन्त दुखी होकर अपनी गर्दन को समेटने का प्रयत्न करने लगा। वह पशु जब तक अपनी गर्दन को ऊपर-नीचे समेटने का यत्न करता रहा, तब तक ही स्त्री सहित सियार ने उसे काटकर खा लिया। इस प्रकार ऊँट को मारकर खा जाने के पश्चात् जब आँधी और वर्षा बन्द हो गयी, तब वह गीदड़ गुफा के मुहाने से निकल गया।

स हत्वा भक्षयित्वा च तमुष्ट्रं जम्बुकस्तदा ।
विगते वातवर्षे तु निश्चक्राम गुहामुखात् ॥

इस प्रकार ऊँटको मारकर खा जानेके पश्चात् जब आँधी और वर्षा बंद हो गयी, तब वह गीदड़ गुफाके मुहानेसे निकल गया ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 112 · श्लोक 15पृष्ठ 753

इस तरह उस मूर्ख ऊँट की मृत्यु हो गयी। देखो, उसके आलस्य के क्रम से कितना महान दोष प्राप्त हो गया। इसलिए तुम्हें भी ऐसे आलस्य को त्याग करके इन्द्रियों को वश में रखते हुए बुद्धिपूर्वक बर्ताव करना उचित है। मनुजी का कथन है कि 'विजय का मूल बुद्धि ही है'।

भारत! बुद्धिबल से किये गये कार्य श्रेष्ठ हैं। बाहुबल से किये जाने वाले कार्य मध्यम हैं। जाँघ अर्थात् पैर के बल से किये गये कार्य जघन्य हैं तथा मस्तक से भार ढोने का कार्य सबसे निम्न श्रेणी का है। जो जितेन्द्रिय और कार्यदक्ष है, उसी का राज्य स्थिर रहता है। सङ्कट में पड़े हुए राजा की विजय का मूल बुद्धि-बल ही है।

राज्यं तिष्ठति दक्षस्य संगृहीतेन्द्रियस्य च ।
आर्तस्य बुद्धिमूलं हि विजयं मनुरब्रवीत् ॥

जो जितेन्द्रिय और कार्यदक्ष है, उसीका राज्य स्थिर रहता है । मनुजीका कथन है कि संकटमें पड़े हुए राजाकी विजयका मूल बुद्धि- बल ही है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 112 · श्लोक 19पृष्ठ 753

निष्पाप युधिष्ठिर! जो गुप्त मन्त्रणा सुनता है, जिसके सहायक अच्छे हैं तथा जो भली-भाँति जान-बूझकर कोई कार्य करता है, उसके पास ही धन स्थिर रहता है। सहायकों से सम्पन्न नरेश ही समूची पृथ्वी का शासन कर सकता है। पूर्वकाल में राज्य सञ्चालन की विधिको जानने वाले सत्पुरुषों ने यह बात कही थी। मैंने भी शास्त्रीय दृष्टि के अनुसार तुम्हें यह बात बतायी है। राजन्! इसे अच्छी तरह समझकर इसी के अनुसार चलो।

In English

Bhishma's Story of the Camel

Bhishma tells Yudhishthira a story about a camel that asked Brahma for an extremely long neck to reach food from far away. Because the camel became lazy and stuck its neck into a cave, a hungry jackal and its mate ate it alive. Bhishma uses this to teach Yudhishthira that a king must avoid laziness and rely on intelligence rather than brute strength.

This page answers

  • What did the camel ask brahma for?
  • How did the camel die?
  • Why did the jackal eat the camel's neck?
  • What is the importance of intelligence in ruling according to bhishma?

Also written: Ushtragrivopakhyana, Ushtragriva, Yudhishthira, Bhishma, Unta, Brahma, Gidada, उष्ट्रग्रीवोपाख्यान